Open Letter to Shri Prakash Ambedkar

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Dear Shri Prakash Ambedkarji,

I write to you with respect and concern, as your influence as a leader carries immense weight in shaping public discourse. Your recent remarks regarding the Chief Justice of India (CJI) and the unfortunate incident involving an attack on him have caused me to reflect deeply. With utmost humility, I urge you to reconsider the narrative you’ve presented, as it risks perpetuating misinformation that can fracture our society’s unity.

Firstly, I must express my disappointment at the claim that the CJI is a Shudra or Ati Shudra. This assertion is factually incorrect. The CJI, like many who have embraced Buddhism, follows the path of Lord Buddha, a philosophy that transcends caste divisions. Dr. B.R. Ambedkar, your revered grandfather, may have been born into a community labeled as Shudra, but his life’s work and eventual embrace of Buddhism were a rejection of caste hierarchies. He did not die as a Shudra—he died as a global icon of justice, equality, and intellectual emancipation. To label the CJI in such terms undermines the very legacy of Dr. Ambedkar, who envisioned a casteless society. I humbly request, sir, that you verify your facts and correct this narrative.

When leaders of your stature make statements without due diligence, the consequences ripple far beyond the immediate context. Misinformation spreads like wildfire, sowing division and mistrust in society. Your remarks, perhaps made in haste, have the potential to fuel misunderstanding, particularly among those who look to you for guidance. The incident of someone throwing shoes at the CJI is deplorable, but linking it to caste without evidence is dangerous. It risks inflaming tensions and painting communities in broad, unfair strokes. When people like you spread rumors, misinformation spreads far in society, distorting truths and deepening divides.

Moreover, do we know the caste of the attacker? Is it possible that the individual who committed this act belongs to the Shudra community, as you seem to imply? Without concrete evidence, such assumptions are baseless. The CJI, as a member of the general category within Buddhist society, represents a position of impartiality and justice, not caste-based identity. To frame this incident through a caste lens without substantiation is to perpetuate a cycle of prejudice that Dr. Ambedkar fought tirelessly to dismantle. When people like you spread rumors, misinformation spreads far in society, and it erodes the principles of equality and reason that should guide us.

I implore you, sir, to lead with the same rigor and commitment to truth that Dr. Ambedkar exemplified. Your voice has the power to unite or divide, to clarify or confuse. The incident with the CJI should be condemned unequivocally, but it must not be reduced to a caste-based narrative without evidence. Let us focus on fostering dialogue that uplifts, not divides. Let us honor Dr. Ambedkar’s vision by rejecting casteist assumptions and embracing facts. I respectfully ask for your forgiveness if my words seem harsh, but they stem from a deep desire to see our society progress toward unity and truth.

In closing, I urge you to retract any misleading statements and lead with the wisdom and integrity that your legacy demands. Let us work together to build a society where justice, not rumor, prevails, and where every individual is judged by their actions, not their caste. With hope for a brighter, united future, I remain,

Yours sincerely,

Ashish Kumar ‘Anshu’
Delhi

मेरी नजरों में ‘राजस्थान के साहित्य साधक’

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– दिनेश कुमार माली

जयपुर: डॉ. प्रभात कुमार सिंघल की बहुचर्चित पुस्तक ‘राजस्थान केसाहित्य साधक’ में राजस्थान के मूल और प्रवासी साहित्यकारोंके अतिरिक्त अन्य स्थानों से प्रवास करते हुए राजस्थान में दीर्घ समय से रहने वाले साहित्यकारों के व्यक्तित्व एवं कृतित्व की जानकारी दी गई हैं। इस पुस्तक को पढ़कर पाठक न केवलसमकालीन हिंदी और राजस्थानी साहित्य की गतिविधियों सेपरिचित हो सकते हैं, बल्कि उन साहित्यकारों के कृतित्व के साथ-साथ उनकी आंतरिक अथवा बाहरी दुनिया से भी कुछ हद तक अवगत हो सकते हैं।

निस्संदेह, डॉ. प्रभात कुमार सिंघल का नाम भारतीय साहित्यएवं पर्यटन पत्रकारिता के क्षेत्र में अपने परिचय का मोहताज नहींहै। उन्होंने हिन्दी और राजस्थानी साहित्य में ऐसे-ऐसे उल्लेखनीयएवं ऐतिहासिक कार्य किए हैं, जिसे बड़ी-से-बड़ी सरकारी अथवागैर सरकारी साहित्यिक संस्थाएं भी अधिकतर हाथ लगाने सेकतराती है। वे अधिकतर ऐसे प्रोजेक्टों का चयन करते है, जिसमेंसुदीर्घ समय और विपुल धनराशि के साथ-साथ अथक परिश्रमकी आवश्यकता होती है। ‘नारी चेतना की साहित्यक उड़ान’, ‘जियो तो ऐसे जियो’ ‘बाल मन तक’ ‘राजस्थान के साहित्यसाधक’ आदि उनकी पुस्तकें इस श्रेणी में ली जा सकती हैं।आधुनिक युग में अधिकांश लोग पुराने मंदिरों के चमचमाते कंगूरेदेखकर तत्कालीन समाज के ऐश्वर्य का आकलन करते हैं, मगरउनका ध्यान नींव की ईंट की तरफ नहीं जाता। इस आलेख कामेरा मुख्य उद्देश्य नींव की ऐसी ईंट के महत्व को आपके समक्षरखना है, क्योंकि नींव की ईंट पर ही कंगूरों की भव्यता झलकतीहै।

इस पुस्तक में जोधपुर, जयपुर, अजमेर, उदयपुर, बीकानेर, कोटा, भरतपुर, सीकर संभागों के अतिरिक्त राजस्थान छोड़करव्यापार या व्यवसाय की तलाश में देश के अन्य हिस्सों जैसे ओड़िशा, कोलकाता, मुंबई आदि जाने वाले और देश के अन्यप्रांतों जैसे उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश आदि से राजस्थान में आकरबसने वाले प्रमुख लेखकों को शामिल किया गया है।

डॉ. प्रभात कुमार सिंघल राजस्थान के कोटा जिले के रहनेवाले है, और यहां की धरती शिक्षा-साहित्य के क्षेत्र में अति उर्वराहोने के कारण शिक्षकों और साहित्यकारों की समृद्ध खेप पैदाकरती है। इस धरा ने ओम थानवी, केसरी सिंह मंडियार, हेमंतशेष, जगजीत सिंह, निकिता ललवानी जैसे महत्वपूर्ण पत्रकारोंऔर साहित्यकारों की पृष्ठभूमि तैयार की है। शिक्षा के क्षेत्र मेंतो कोटा का कहना ही क्या! देश का एक नंबर एजुकेशन हब है।खासकर आईआईटी और मेडिकल की तैयारी करने वाले बच्चोंके लिए तो किसी ‘धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र’ से कम नहीं है। इस दृष्टिकोण से कोटा को आधुनिक युग के ‘नालंदा’, ‘तक्षशिला’, ‘रत्नगिरी’ आदि के रूप में देखा जा सकता है। कभी पुरातन कालमें देश-विदेश के कोने-कोने से विद्यार्थीगण वहाँ अध्ययन के लिएआते थे, वैसे ही कोटा में आधुनिक युग में देश के कोने-कोने बच्चेयहां पढ़ने आते हैं। कोटा की धरती के माटी-पानी-पवन में लक्ष्मीकी तुलना में सरस्वती का ज्यादा प्रभाव है। यही वजह है कि कोटाका अंचल न केवल साहित्य, कला, संस्कृति, शिक्षा, संगीत, इतिहास, भूगोल, खेल, पुरातत्व, पर्यावरण सभी के क्षेत्रों में अपनीअमिट छाप छोड़ता है, बल्कि डॉ. प्रभात कुमार सिंघल जैसेसाहित्यकार अपनी मेहनत, लगन और समर्पण की बदौलत संपूर्णमानव समाज के प्रतिनिधि पुरूषों, महिलाओं, बच्चों, बुजुर्गों-सभीको साहित्य के माध्यम से जोड़कर एक सुशृंखलित समाज केनिर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं। कभी वे राजस्थानसरकार के सूचना एवं जनसंपर्क विभाग के संयुक्त निदेशक पदको सुशोभित कर रहे थे और अपनी नौकरी से प्रभावित होकर आज वे समाज के सर्वांगीण विकास हेतु हिंदी भाषा के द्विवेदी युगके प्रर्वतक महावीर प्रसाद द्विवेदी की तरह ज्ञान के हर विषय परअपनी कलम चलाते है। चाहे पर्यटन हो या इतिहास, साहित्य होया पत्रकारिता। उन्होंने अर्द्ध शताधिक पुस्तकों की रचना कर पूरेदेश में शिक्षा, साहित्य और पत्रकारिता के क्षेत्र में ऐसा वातावरणतैयार किया है, जिसे बिरले व्यक्ति ही उसे साकार कर सकते है।ढ़िबरी या लालटेन की सलिता की तरह जलकर वे दूसरों कोउजाला प्रदान कर सकते है। डॉ. प्रभात कुमार सिंघल काव्यक्तित्व बहुआयामी है और कृतित्व विपुल। उनके भीतर दोसत्ताएं मुझे साफ नजर आती है। पहली सत्ता,जो उन्हें खोजीपत्रकारिता की ओर ले जाती है और दूसरी, उन्हें साहित्य के सूक्ष्मपहलुओं पर विचार-विमर्श के लिए प्रेरित करती है। यह पुस्तकउनकी दूसरी सत्ता की ज्यादा उपज है। इस पुस्तक के एक छोटे सेहिस्से में अपनी उपस्थित दर्ज कराने के कारण मैं उनकीरचना-प्रक्रिया से अच्छी तरह अवगत हूँ, इसलिए आसानी सेसमझ सकता हूँ कि इस पुस्तक में संकलित आलेखों के लिए उन्हेंकितनी अधिक मेहनत करनी पड़ी होगी। वह भी पूरी तरहनिःस्वार्थ भावना से। जहाँ तक मेरा मानना है; ‘राजस्थान केसाहित्य साधक’ शीर्षक किसी विश्वविद्यालय के लिए पीएचडी. का विषय हो सकता है, या फिर साहित्य अकादमी अथवा उसकेजैसी कई गैर-सरकारी साहित्यिक अनुष्ठान ऐसे शोधपरकप्रोजेक्ट अपने हाथ में ले सकते है। उसके लिए तन-मन-धन तीनोंकी नितांत जरूरत होती है। यहाँ ‘तन’, साहित्यकारों के बारे मेंआंकड़े इकट्ठे करने तथा उन्हे प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत के लिएकिया जाने वाला श्रम है; ‘मन’, उनकी साहित्यिक संवेदनाओं औरउपादानों को टटोलने का और ‘धन’ लगभग चार सौ पृष्ठों वालीपुस्तक प्रकाशित करने के लिए अदा की जाने वाली कीमत।सजिल्द, सुंदर फांट वाली, आकर्षक पृष्ठ और साहित्यकारों केफोटो, पता, मोबाइल नंबर समेत 62 साहित्यकारों को समेटनेवाली पुस्तक की कम से कम 300 प्रतियां अवश्य छपी होगी, जिसकी लागत अस्सी-नब्बे हजार रुपए के करीब आई होगी।इतना खर्च करना क्या किसी एक दशक से ऊर्ध्व अपनी सरकारी नौकरी से सेवानिवृत्त हुए लेखक के लिए संभव है ? ऐसे प्रोजेक्ट में ‘तन-मन-धन’ से सेवा वहीं साहित्यकार कर सकता है, जिसकेभीतर प्रचंड साहित्य-क्षुधा हो, और सकारात्मक प्रखर पत्रकारिता का उच्च ज्वार-भाटे की लहरें जोर-जोर से हिलोरें मार रहा हो।इसलिए उन्हें ‘लेखकों के लेखक’, ‘पत्रकारों के पत्रकार’, ‘साहित्यकारों के साहित्यकार’ कहने में कोई अतिश्योक्ति नहींहैं। अभी तक तो मैंने केवल इस पुस्तक की पृष्ठभूमि में डॉ. सिंघलके साहित्यिक अवदान और साधना को उजागर करने का क्षुद्रप्रयास किया है, मगर अब मैं इस पुस्तक की अंतर्वस्तु, राजस्थानके साहित्यकारों के व्यक्तित्व और कृत्तित्व पर प्रकाश डालते हुएउनके साहित्य पर हल्का-फुल्का विमर्श, चिंतन-मनन केसमुद्र-मंथन से पैदा होने वाले सुधा रस के जलपान हेतु अग्रसरहोंगे।
इस पुस्तक की भूमिका विख्यात आलोचक विजय जोशी नेलिखी है, जिसमें उन्होंने डॉ. प्रभात कुमार सिंघल को मानवीयसंवेदनाओं की उजास और गंभीर चिंतन-मनन के अनुनाद कोआत्मसात करने वाला साहित्यकार बताया है, जो रचनात्मकदृष्टिकोण से अपने लेखन कर्म के प्रति सजग और चेतन होकरलगातार साहित्य साधकों की सर्जन यात्रा में सहभागी बने हुए है।उनके इस कथन से सहमत होते हुए मैं, यह भी जोड़ना चाहूँगा किवे केवल सहयात्री ही नहीं है, बल्कि उनके साहित्य को उर्ध्वगतिदेने में उत्प्रेरक (catalyst) का भी कार्य कर रहे हैं।

राजस्थान न केवल महाराणा प्रताप, पृथ्वीराज चौहान, दुर्गादास जैसे शूरवीरों की भूमि रही है, बल्कि ‘पृथ्वीराज रासों’ जैसे वीर रस वाले काव्य लिखने वाले कवि चंद्र बरदाई की धरतीभी है। यहां गौरी शंकर हीरालाल ओझा जैसे महान पुरातत्वविद्पैदा होते हैं तो ‘चाणक्य’ सीरियल बनाने वाले चंद्र प्रकाश द्विवेदीजैसे कलाकार , ‘नदीम-श्रवण’ की जुगल जोडी में विख्यातसंगीतकार श्रवण,‘तारक मेहता का उल्टा चश्मा’ टीवी धारावहिकमें काम करने वाला मेरा सहपाठी शैलेश लोढ़ा भी इसी धरती की देन है। खैर, यह दूसरी बात है कि भारत के हर प्रांतों कीअपनी-अपनी विशेषता है, मगर राजस्थान की लोक-संस्कृति, कला, साहित्य, खान-पान, परिवेश, आत्मीयता, मनुहार आदिसर्वोत्कृष्ट है। इस वजह से यह पुस्तक नवोदित रचनाकारों केलिए समकालीन भारतीय साहित्य, संस्कृति और कला के राजस्थानी चैप्टर का प्रतिनिधि इन्साक्लोपीड़िया है; और वरिष्ठसाहित्यकारों को अपने अतीत में झाँकने और वर्तमान में पीढ़ीके लेखकों से परिचित होने का स्वर्णिम अवसर प्रदान करणे वाला दस्तावेज़।

व्यक्तिगत तौर पर मेरे लिए यह अत्यंत ही खुशी व गर्व काविषय है कि इस पुस्तक बासठ साहित्यकारों में से दस-बारहसाहित्यकारों से मेरा प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से जान-पहचान है। उनसे किसी-न-किसी संदर्भ में भेंट-मुलाकात भी हुई हैं, जिनमेंरमाकांत शर्मा ‘उद्भ्रांत’, डॉ. रति सक्सेना, जय प्रकाश पांड्या‘ज्योतिपुंज’, डॉ. अखिलेश पालरिया, नंद भारद्वाज, बी.एल. आछा, डॉ. विमला भंडारी आदि। कुछ ऐसे भी लेखक-लेखिकाएंहैं, जिनकी रचनाओं को मैंने हिन्दी की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओंमें पढ़कर बहुत कुछ सीखा है। उदाहरण के तौर पर फारूखआफरीदी, किरण खेरूका, कुसुम खेमानी, ओम नागर, विकासदेव, इकराम राजस्थानी, वेद व्यास, नीरज दहूया, महेन्द्र भाणावत, मधु माहेश्वरी, अतुल कनक, जितेन्द्र कुमार शर्मा ‘निर्मोही’, बालमुकुंद ओझा, दीनदयाल शर्मा प्रमुख है। और सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण, जिन साहित्यकारों को मैं व्यक्तिगत तौर पर मिल नहींपाया, उस कमी को डॉ. प्रभात कुमार सिंघल की इस संग्रहनीयपुस्तक ने पूरा कर दिया। घर बैठे राजस्थान की समकालीनसाहित्य-संस्कृति के पुरोधाओं और आने वाली पीढ़ी से परिचितहोने का अवसर मिला, इसके लिए मैं उन्हें हार्दिक साधुवाद देताहूँ।

मेरे दीर्घ साहित्यक सफर के दौरान मैंने अपने जीवन में कईउतार-चढ़ाव देखे। कुछ घटनाओं को लिपिबद्ध कर पाया, कुछ मेरे स्मृतियों के कोषों में संचित हो गए। वे कब बाहर निकलेंगे, कहनहीं सकता। मेरा यह मानना है कि किसी भी लेखक के निर्माण मेंन केवल पुरानी पीढ़ी की साहित्य संपदा जरूरी है, बल्किसमकालीन लेखकों से संपर्क, बौद्धिक चर्चा, उनके साहित्य परविमर्श भी उतना ही जरूरी है; बदलती हवा के रूख के बारे मेंजानने के लिए।
इस संदर्भ में कुछ उदाहरण, मैं अपने व्यक्तिगत जीवन सेदूँगा।

सन् 2009 या 2010 की बात होगी, जब मैंने ओड़िया सेहिन्दी में अनुवाद का काम शुरू किया था। ओड़िया भाषा केप्रतिष्ठित लेखक स्व. जगदीश मोहंती ने मेरे लिए ‘सरोजिनी साहूकी श्रेष्ठ कहानियां’ शीर्षक से ब्लॉग बनाया था। उस पर पोस्टकी हुई मेरी कहानियों को पढ़कर विमला भंडारी जी ने फोन कियाथा और उन अनूदित कहानियाँ की, प्रशंसा की थी और फिर जबउनसे थोड़ा-थोड़ा परिचय हो गया तो मैंने उनसे अपने पहलेअनूदित उपन्यास ‘पक्षीवास’ की भूमिका लिखने के लिए आग्रहकिया था, जिसे उन्होंने सहर्ष स्वीकार कर लिया था।

यही कारण है कि 1 फरवरी 1955 को राजसमंद के गांवराजनगर में जन्मी डॉ. विमला भंडारी का नाम सामने आते ही मेरीकलम श्रद्धा से झुक जाती है। यही नहीं, उन्होंने मुझे सलूंबर मेंअपनी ‘सलिला संस्था’ द्वारा आयोजित अखिल भारतीय बालसाहित्य सम्मेलनों में भी आमंत्रित किया, जहाँ मेरा अनेकख्याति-लब्ध लेखकों में परिचय हुआ, जैसे प्रो. दिविक रमेश, प्रो. प्रभापंत, मधु माहेश्वरी, सुधा जौहरी, आशा पांडेय ‘ओझा’ आदि।कालांतर में उनका समग्र बाल साहित्य पढ़कर मैंने दो आलोचनापुस्तकें (भाग 1 एण्ड भाग 2) लिखी, जिसमें एक यश पब्लिकेशन्स, नई दिल्ली से ‘विमला भंडारी की रचना धर्मिता’शीर्षक से प्रकाशित हुई और दूसरी प्रकाशनाधीन है। एक बार वेअपने जेठ जी के बेटी की शादी के सिलसिले में भुवनेश्वर आईहुई तो ‘सारला पुरस्कार’ से पुरस्कृत ओड़िया लेखिका सरोजिनीसाहू, हमारी कंपनी महानदी कोल्फ़िल्ड्स लिमिटेड के राजाभाषाप्रबंधक, उदयनाथ बेहेरा, विमला भण्डारी और उनके पति जगदीशभण्डारी जी के साथ मैं भी पुरी और कोणार्क भ्रमण के लिए गया था। उस पर मैंने अपना संस्मरण ‘पूर्व और पश्चिम का सांस्कृतिकसेतु: जगन्नाथ पुरी’ लिखा था, जो अनेक पत्र-पत्रिकाओं मेंप्रकाशित हुआ। कनाडा के प्रकाशित वेब मैगजीन ‘साहित्य कुंज’ ने उसे धारावाहिक प्रकाशित किया था। इस तरह एक लेखकदूसरे लेखक का सान्निध्य पाकर अपने साहित्यिक सफर पर तेजी से अग्रसर होता जाता है। उनकी बहुचर्चित पुस्तक ‘सलूंबर काइतिहास’ के कुछ सदंर्भ मैंने अपने संस्मरण ‘चीन में सात दिन’ मेंभी पिरोए है।

उन्हीं के एक आयोजन में उदयपुर की मधु माहेश्वरी सेमुलाकात होती है। वे बाल साहित्यकार है। उसकी प्रसिद्ध कृतियोंमें ‘बेटी की अभिलाषा’, ‘बतख डाले डेरा’ और ‘मित्रता कीमिसाल’ है।

डॉ. विमला भंडारी के बाद अगर मेरे जीवन में कोई विशिष्टहिन्दी साहित्यकार संपर्क में आया और जिसने मेरी लेखन कीकला और विधा दोनों को पूरी तरह से प्रभावित किया। वे मुझेअनुवाद से हटाकर आलोचना के क्षेत्र में खींचकर ले गए। विचारों और चिंतन-मनन की एक नई दुनिया में, तो वे हैं हिंदी के अन्यतम शीर्ष कवि रमाकांत शर्मा ‘उद्भ्रांत’।

27 अगस्त 2012 को लखनऊ के उमाबाली प्रेक्षागृह में उन्हेंमंच पर मुख्य अतिथि के रूप में उद्बोधन देते हुए दूर से देखा और सुना था, मगर मुलाकात हुई चीन में सन् 2013 अगस्त को, एकसाल बाद। इस साहित्यिक विदेश यात्रा पर मैंने अपनी पुस्तक‘चीन में सात दिन’ लिखी थी, जो मैंने उद्भ्रांत जी के अनवरतमार्गदर्शन के कारण उन्हें समर्पित की थी। बाद में, मेलजोल कासिलसिला शुरू हुआ, जो आज तक जारी है। कालान्तर में, हमारा संबंध ज्यादा से ज्यादा निबिड़ होता गया है। अपने जीवन के 78 बसंत देखने वाले, हिन्दी में 150 से ज्यादा सार्थक साद्देश्यपरककृतियों की रचना करने वाले उद्भ्रांत जी की मुख्य काव्य-कृतियों में ‘त्रेता’, ‘अनाद्य सूक्त’, ‘राधा माधव’, ‘रुद्रावतार’ पर मैंने चारआलोचनात्मक पुस्तकें- ‘त्रेताः’ एक सम्यक् मूल्यांकन (राजस्थानसाहित्य अकादमी से पुरस्कृत), ‘अनाद्य सूक्तः विज्ञानकाव्याध्यात्मिक दर्शन का अणुचिंतन (विद्योत्तमा पुरस्कार सेपुरस्कृत)’, ‘राधा माधवः एक समग्र विवेचन’ (म.प्र. राष्ट्र भाषासमिति, भोपाल के डॉ. हजारीमल जैन वांडमय पुरस्कार प्राप्त), ‘मिथकीय सीमाओं से परे रुद्रावतार’ के साथ-साथ उनकी अन्यरचनाओं और गीतों पर आधारित दो ‘उद्भ्रांत साहित्य पर मेरेनोट्स’ एवं ‘उद्भ्रांत की गीत साधना’ पुस्तकें लिखी है। उद्भ्रांतजी हरिवंश राय बच्चन को अपना गुरू मानते हैं और उनकी प्रसिद्धउक्ति अक्सर दोहराते है कि भगवान को पाना मुश्किल है, उसीतरह किसी एक इंसान को समझ पाना भगवान पाने से कमतरनहीं है। उद्भ्रांत जी की दूरदर्शन में उप महानिदेशक पद से सेवानिवृत्त हुए है और संप्रति नोएड़ा में रहते है, मगर जन्म तो उनकाराजस्थान के नवलगढ़ हुआ था, 4 सितम्बर 1948 को। उनसे सेजुड़ना मेरे लिए किसी दैविक अनुकंपा से कम नहीं है।

प्रवासी राजस्थानियों की शृंखला में एक और सुपरिचित नाममेरे लिए है, डॉ. रति सक्सेना का। उनसे मेरी मुलाकात हुई थीमध्यप्रदेश के राजनांद गांव में, सन् 2012 में। रायपुर कीसाहित्यिक संस्था ‘सृजनगाथा’ द्वारा आयोजित दो दिवसीयलेखक शिविर के एक सत्र में मुख्य अतिथि के रूप में वेआमंत्रित की गई थी। सन् 1954 को उदयपुर में जन्मी रतिसक्सेना केरल की राजधानी त्रिवेंद्रम में रहती है, अपने सेवानिवृत्तवैज्ञानिक पति के साथ। उन्हें केंद्र साहित्य अकादमी के अनुवादपुरस्कार, राजस्थान साहित्य अकादमी के मीरा पुरस्कार, केरलसाहित्य अकादमी के समग्र साहित्य पुरस्कार के साथ-साथ कईअंतरराष्ट्रीय पुरस्कार भी प्राप्त हुए है। वह एक दशक से द्विभाषीपत्रिका ‘कृत्या’ का संपादन कर रही है और वैश्विक संगठन ‘वर्ल्डपोइट्री मूवमेंट’ की फाउंडर भी है। उन्होंने 22 से अधिक विदेशीसाहित्यिक समारोहों में भाग लेकर वैदिक कविताओं के माध्यम सेविश्व में हिन्दी की विशिष्ट उपस्थिति दर्ज करवाई हैं। प्रसिद्धओड़िया कवि रमाकांत रथ की कविताओं को मेरे द्वारा किए गएअनुवाद को ‘कृत्या’ में प्रकाशित कर न केवल मेरा उत्साहवर्धनकिया, बल्कि अनुवाद को भी मुख्यधारा की श्रेणी का साहित्यसमझकर आगे के लेखन के लिए प्रेरणा दी। कैंसर की बीमारी सेजूझते हुए भी वह ‘आईसीयू में ताओ’ जैसी पुस्तक लिखकर‘चिकित्सा में कविता के उपयोग’ को तलाशते हुए अपनी अटूटजिजीविषा का परिचय देती है।

डॉ. रति सक्सेना के बाद प्रवासी राजस्थानी साहित्यकारोंकी श्रेणी में ऋतु भटनागर का नाम आदर के साथ लिया जाता है।यद्यपि उनसे कभी मेरी मुलाकात नहीं हुई, मगर ऑथर प्रेस, नईदिल्ली के प्रकाशक सुदर्शन केसरी ने मेरी रचनाओं का अंग्रेजीअनुवाद करने हेतु उनका नाम सुझाया था। यद्यपि उनका जन्म1973 में लखनऊ में हुआ, मगर शादी हुई है जयपुर के सुमितभटनागर से। जो आईआरएस है और बैंगलुरू में नौकरी करते हैं।इस वजह से यह दंपती बेंगलुरू शिफ्ट हो गई। ऋतु भटनागर बहुतअच्छी पेंटर है। वह अंग्रेजी से हिंदी और हिंदी से अंग्रेजी केअनुवाद में भी सिद्ध हस्त है। इंफोसिस के संस्थापक नारायण मूर्तिकी धर्मपत्नी, समाज-सेविका, लेखिका सुधा मूर्ति की अनेकअंग्रेजी पुस्तकों का उन्होंने हिंदी में अनुवाद किया है। मेरीआलोचना की तीन पुस्तकों का भी उन्होंने अंग्रेजी में अनुवाद कियाहै।

प्रो. अज़हर हाशमी ‘राजस्थान के साहित्य साधक’ पुस्तकलिखी जाने के समय इस दुनिया में थे, मगर इस पुस्तक पर मेरीसमीक्षा लिखे जाने से पूर्व उनका देहांत हो गया। उन्हें अश्रुलश्रद्धांजलि अर्पित करते हुए उनके व्यक्तित्व और कृतित्व परप्रकाश डालना चाहूँगा। 13 जनवरी 1950 को झालावाड़ में जन्मेंप्रो. अजर हाशमी इंसानियत और सद्कर्म का संदेश देने वाले देशके प्रसिद्ध गीतकार थे। बाद में वे मध्यप्रदेश चले गए। उन्हें अपनी‘माँ’ कविता के लिए उत्तरप्रदेश के तत्कालीन राज्यपाल तथाभारत के सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति मार्कंडेय काटजू द्वारा ‘‘विशिष्टकाव्य पुरस्कार’’और मध्यप्रदेश के राज्यपाल द्वारा सम्मानितकिया गया था। प्रो. हाशमी के गीतों पर, व्यंग्यों पर, गज़लों परपीएचडी की गई है। मध्यप्रदेश बोर्ड की कक्षा 10वीं की हिन्दीपाठ्यपुस्तक में उनकी कविता ‘‘बेटियां पावन दुआएं है’’ शामिलकी गई है। राजस्थान पत्रिका व नवभारत के स्तंभकार थे। उनकीकविताएं दूरदर्शन एवं आकाशवाणी से प्रसारित होती रहती है।उनका कालजयी गीत ‘‘मुझको राम वाला हिंदुस्तान चाहिए’’1976 में लिखा गया था, जब देश के हालात ठीक नहीं थे। यहगीत 26 जनवरी 1991 को दूरदर्शन पर प्रसारित किया गया।जिससे उनकी लोकप्रियता शिखर चूमने लगी। वह गीत‘यू-ट्यूब पर उपलब्ध है। गायक रूप कुमार राठौड़ ने आवाज कीऔर संगीतकार सिद्धार्थ कश्यप ने संगीत दिया है।

रेडियो और दूरदर्शन में 33 साल कार्य करने वाले नंदभारद्वाज साहब के नाम हिंदी साहित्य जगत भलीभांति परिचित है।उनसे मेरी पहली मुलाकात हुई थी, राजनांद गांव में,सन् 2012 में। वहाँ गजानन माधव मुक्ति बोध पर एक संगोष्ठी आयोजित कीगई थी, क्योंकि मुक्तिबोध राजनांद गांव की कॉलेज में अध्यापनकार्य करते थे। वहां के एक संग्रहालय में उनकी पांडुलिपियां वअन्य रचनाएं रखी हुई है। नंद भारद्वाज ने मुक्तिबोध की कविताओंपर पीएचडी. की, इसलिए उन्हें मुख्य वक्ता के रूप में‘सृजनगाथा’ वालों ने आमंत्रित किया था। वहां मुझे उनकाबीज-वक्तव्य सुनने का स्वर्णिम अवसर प्राप्त हुआ। उनसेमुलाकात हुई। मैंने उन्हें मेरा पहला अनूदित उपन्यास ‘पक्षीवास’भेंट किया। परवर्ती समय में, मुझे उनके जयपुर के मानसरोवर मेंस्थित आवास में जाने का अवसर मिला था। वहाँ उन्होंने मुझेअपना उपन्यास ‘आगे खुलता रास्ता’ अवलोकनार्थ भेंट किया था।मैंने उस पर संक्षिप्त समीक्षात्मक टिप्पणी की थी, तो उन्होंने फोनपर कहा था, ‘‘आपने भले ही छोटी समीक्षा की है, मगर सारगर्भितओर हृदयस्पर्शी है।’’ उस उपन्यास के राजस्थानी अनुवाद पर उन्हेंकेंद्र साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त हुआ था। अगस्त 1978 कोबाड़मेर के माड़पुरा गांव में जन्मे, राजस्थानी साहित्य पत्रिका‘हरावल’ और राजस्थान साहित्य अकादमी से प्रकाशितराजस्थान के कवि शृंखला के तीसरे भाग ‘रेत पर नंगे पांव’ केसंपादक के रूप में उन्होंने खूब कीर्ति अर्जित की थी। उनकेपसंदीदा लेखकों में विक्टर हयूगो, हैमिंग्वे, चेखब, सार्त्र, मैक्सिमगोर्की, टालस्टॉय आदि है।

डुंगरपुर जिले के टामरिया गांव में 28 सिंतबर 1952 कोस्वतंत्रता सेनानी के घर जन्मे श्री जय प्रकाश पांड्या ‘ज्योतिपुंज’ से मेरी अब तक तीन बार मुलाकात हो चुकी है। दो बार सलूंबर में, विमला भंडारी जी की ‘सलिला संस्था’ द्वारा आयोजित अखिलभारतीय बाल साहित्य सम्मेलनों में और एक बार राजस्थानसाहित्य अकादमी, उदयपुर के प्रेक्षागृह में- जब मुझे राजस्थानसाहित्य अकादमी का आलेचना पुरस्कार प्राप्त हुआ और उन्होंनेदर्शक दीर्घा से खड़े होकर हाथ हिलाते हुए मुझे बधाई दी थी।फ्रेंच-कट दाढ़ी, हंसमुख चेहरे वाले पांड्या केंद्रीय साहित्यअकादमी और राजस्थान साहित्य अकादमी के सर्वोच्च ‘मीरापुरस्कार’ के अतिरिक्त अनेक सम्मानों से सम्मानित है। उनकीप्रसिद्ध राजस्थानी कृतियों में ‘बोल डूंगरी टब टनुक’, ‘गोविंद गुरूनो चौपड़ो’ तथा हिन्दी कृतियों में ‘बोल मनु बोलते क्यों नहीं?’, ‘कसम भूखे भीन की’, ‘नई टापरी का नया दु:ख’’ के अतिरिक्तकन्नड़ साहित्यकार चंद्रशेखर के नाटक ‘सिरि सलिंग’ तथा रवींद्रनाथ ठाकुर के एक बांग्ला नाटक का राजस्थानी में अनुवाद कियाहै।

ऐसे ही, एक दो वर्ष पूर्व मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में, डॉ. अखिलेश पालरिया से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।साहित्य में ‘पीएचडी’वाले डॉक्टर नहीं, बल्कि ‘एमबीबीएस’ वालेअसली डॉक्टर। उनका जन्म 28 अगस्त 1956 को अजमेर मेंहुआ। मध्यप्रदेश राष्ट्र भाषा समिति, भोपाल द्वारा आयोजितसम्मान समारोह में उन्हें और मुझे मध्यप्रदेश के राज्यपाल श्री मंगुभाई पटेल के कर-कमलों से साहित्य के क्षेत्र में उल्लेखनीययोगदान के लिए पुरस्कृत किया गया था। पूछ-ताछ के दौरानपता चला कि वे हमारी एमबीएम इंजीनियरिंग कॉलेज, जोधपुर मेंखनन अभियांत्रिकी के प्रो. वी.एस. पालरिया के बड़े भाई है। उन्हेंवह पुरस्कार 75 किताबों की समीक्षा पर तैयार की हुई, उनकीपुस्तक पर मिला था और मुझे उद्भ्रांत के महाकाव्य ‘राधामाधव’पर अपनी आलोचना के लिए। व्यंजना पत्रिका में धारावाहिकप्रकाशित होने वाली उनकी आत्मकथा ‘जो भुला न सका’ का मैंनियमित पाठक हूं, जिसमें उन्होंने अपने 37 वर्षीय चिकित्सकीयसेवाकाल और दीर्घ साहित्यिक यात्रा लिपिबद्ध की है। उनकेकहानी-संग्रह ‘मन के रिश्ते’, ‘सूर्योदय से सूर्यास्त तक’, ‘चाहतके रंग’, ‘आखिर मन ही तो है’, ‘ डस्टबिन तथा अन्य कहानियां’, ‘पुजारिन व अन्य कहानियां’, ‘कर्तव्य पथ’ और ‘मेरी प्रियकहानियां’ पर अक्सर चर्चा होती रहती है।

इस तरह, मैं राजस्थान में साहित्य साधकों से अपने यायावरीजीवन के कारण संपर्क साधते हुए कर्तव्य पथ पर अग्रसर होतारहता हूं। सन 2022 में हिन्दी की हृदय-स्थली रायबरेली के फिरोज गांधी महाविद्यालय में महावीर प्रसाद द्विवेदी स्मृतिसंरक्षण अभियान के संयोजक हमारे देश के प्रसिद्ध पत्रकार गौरवअवस्थी द्वारा आयोजित रजत वर्षगांठ के उपलक्ष में पद्मश्रीहलधर नाग को डॉ. राम मनोहर त्रिपाठी लोक सेवा सम्मान सेसम्मानित किया गया था। मैं इस आयोजन में हलधर नाग केअनुवादक के रूप में शरीक हुआ था और वहां विशिष्ट वक्ताओं मेंआमंत्रित थे प्रसिद्ध आलोचक प्रोफेसर बी.एल. आछा। उनसेबातचीत के दौरान पता चला कि 5 फरवरी 1950 को राजसमंदके देवगढ़ मदरिया में जन्मे प्रोफेसर बी.एल. आछा ने मेरे जन्मस्थान सिरोही के पास पडोसी जिले जालोर के राजकीयमहाविद्यालय में एक साल अध्यापन कार्य किया था। बाद में वेइंदौर चले गए, अपने आगे के अध्यापन कार्य के सिलसिले में। वेराजस्थान अकादमी से पुरस्कृत आलोचक है। उनकी रचनाएं‘अक्षरा’, ‘वागर्थ’ जैसी प्रसिद्ध हिन्दी पत्रिकाओं में प्रकाशितहोती रहती है। उनकी व्यंग्य कृतियां मुझे बहुत अच्छी लगती है, जिसमें ‘आस्था के बैंगन’, ‘पिताजी का डैडी संस्करण’, ‘मेघदूतका टी.ए.बिल’ प्रमुख है। उनकी मुख्य रचनाओं में ‘आचार्यहजारी प्रसाद द्विवेदी के उपन्यास’, ‘सृजनात्मक भाषा औरआलोचक ‘सृजन का अंतर्पाठ’, ‘रचनात्मक समीक्षा’ आदि है।

यद्यपि फारूख आफ़रीदी जी से मेरी कभी व्यक्तिग्तमुलाकात नहीं हुई, फिर भी उनके प्रति मेरे मन में अगाध श्रद्धा औरस्नेहिल भाव है। सन् 1998 में मेरी पहली पुस्तक प्रकाशित हुई थी‘न हन्यते’, मेरे दिवंगत पिताजी के श्रद्धांजलि-स्वरूप मैंने लिखीथी। यह पुस्तक मेरे संस्मरणात्मक छोटे-छोटे आलेख औरकविताओं का संकलन है। मेरी पहली कृति ‘न हन्यते’ और उसके दस साल बाद, मेरे पहले अनूदित उपन्यास ‘पक्षीवास’ मैंनेराजस्थान के तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री अशोक गहलोत कोअवलोकनार्थ भेजी थी। मैंने सपने में भी नहीं सोचा था कि मेरी उन किताबों पर मुख्यमंत्री का अभिमत प्राप्त होगा। मगर सपना साकार हुआ, मुझे उनके अभिमत प्राप्त हुए। उन अभिमत के साथ था एक फार्वडिंग लेटर; जिस पर हस्ताक्षर थे फारूख आफ़रीदीसाहब के। यह किस्सा मैं कभी भी लिख नहीं पाता, अगर डॉ. प्रभात कुमार सिंघल यह किताब नहीं लिखी होती। आज भी उस फावर्डिंग लेटर और अभिमत को बचाकर रखा हूँ, एक अनमोलअमानत के रूप में। इस पुस्तक में उन पर लिखे आलेख को पढ़नेके बाद पता चला कि 24 दिसंबर 1952 को जोधपुर में जन्म, जोधपुर विश्वविद्यालय से स्नातकोत्तर, राजस्थान प्रगतिशीललेखक संघ के कार्यकारी अध्यक्ष और ‘काव्या’ इंटरनेशनलफाउंडेशन, राजस्थान चैप्टर के महासचिव आदि-आदि। परसाईपरंपरा के व्यंग्यकार होने के कारण उनकी रचनाओं में तीक्ष्णव्यंग्य देखने को मिलते है उदाहरण के तौर पर ‘अपनी छबिसुधारिए, ‘मामूलीराम की डायरी’, ‘बुद्धि का सफर स्टॉक’, ‘धन्यहै आम आदमी’ आदि। उनकी पुस्तकों में ‘गांधी जी और आधीदुनिया’, ‘हम सब एक है’ (कहानी-संग्रह),‘शब्द कभी बांझ नहींहोते’ (काव्य-संग्रह) मुझे बहुत अच्छी लगती है। ‘कथा’ पत्रिकाऔर राजस्थान पत्रिका में छपे उनके आलेख भी मेरी नजरों सेगुजरते रहते है। उद्भ्रांत जी के अनन्य मित्र होने के कारण उनसेबातचीत के दौरान उनके नाम का उल्लेख अवश्य आता है।

फारूख आफरीदी जी के बाद मैं नाम लेना चाहूंगा, चूरू केडॉ. नीरज दइया जी का। न कभी फोन पर बातचीत हुई और न हीकभी मेल-मुलाकात। वे मेरे हम उम्र है। मेरे मन में उनसे जुड़ने केपीछे एक खास कारण है, डॉ. सुधीर सक्सेना, मेरे प्रिय कवि।उनकी कविताओं का दइया जी ने राजस्थानी में अनुवाद किया है,जिसे सुधीर जी ने मुझे अवलोकनार्थ भेजी थी। उसे पढ़ने केबाद मेरे मन में नीरज दइया के प्रति सम्मान की भावना जाग उठी।मैंने सुधीर सक्सेना और ओड़िया भाषा के प्रख्यात कवि सीताकांतमहापात्र के काव्यों का तुलनात्मक अध्ययन करते हुए ‘दो कविःएक दृष्टि’ आलोचना नामक पुस्तक लिखी थी। प्रसिद्ध लेखकजितेंद्र ‘निर्मोही’ उनके साहित्य कर्म पर टिप्पणी करते हुए लिखतेहै कि उन्होंने राजस्थानी समालोचना क्षेत्र की परंपरा को बदलदिया है और ऐसे हर राजस्थानी साहित्यकार पर कलम चलाई है, जिनको प्रकाश में लाना जरूरी था। उनका ‘‘राजस्थानी उपन्यासआंगल-सीध’’ मील का पत्थर साबित हुआ है।

वेदव्यास जी के अनेक विचारोत्तेजक आलेखों को मैंनेउदयपुर के हिम्मत सेठ जी द्वारा संपादित ‘महावीर समता संदेश’ में पढ़ा और यू-टयूब पर उनके अनेक साक्षात्कार भी देखें। साहित्यअकादमी के सर्वोच्च सम्मान ‘साहित्य मनीषी’ से सम्मानितशिक्षा, साहित्य, कला, संस्कृति और पत्रकारिता के क्षेत्र मेंअनवरत लेखन और जनशिक्षण के लिए समर्पित वेदव्यास जी काजन्म 1 जुलाई 1942 को अविभाजित भारत के सिंध प्रांत में हुआथा। पुश्तैनी गांव अलवर जिले के गढ़ी सवाई राम है। आपराजस्थान साहित्य अकादमी के तीन बार अध्यक्ष रहे। 1964 मेंआकाशवाणी जयपुर में कार्यरत ओर जून 2002 में सेवा निवृत्त।राजस्थानी भाषा के प्रथम समाचार वाचक। आज भी कानों मेंगूंजता है यह स्वर- ‘अब आप वेद व्यास से राजस्थानी में सुना’, ‘ आपकी धरती हैलो मारे’, ‘राष्ट्रीय धरोहर’, ‘राजस्थान केलोकतीर्थ’, ‘अब नहीं तो कब बोलोगे?’, ‘आजादी रा भागीरथःगांधी’ आदि पुस्तकें बहुचर्चित रही है।उनकी प्रकाशित आठपुस्तकों में ‘अपना ही गणतंत्र है बंधु’, ‘सुजन के सह-यात्री’, ‘मैंभी जाँऊ, तू भी इबा’, ‘संस्मरण का संदूक समीक्षा के सिक्के’, ‘मामला पानी का’ और ‘मुक्तक शतक’ प्रमुख है।

13 नवंबर 1937 को उदयपुर के कानोड़ कस्बे में जन्मे डॉ. महेंद्र भाणावत को मैंने बाल साहित्यकार राजकुमार की पुस्तक‘कठपुतली’ पर उनकी लिखी हुई भूमिका पढ़कर अभिभूत हुआथा। आज इस पुस्तक के माध्यम से उनके कृतित्व और व्यक्तित्वके बारे में विस्तार से जानकर बहुत खुशी हुई। आंचलिकलोक-संस्कृति पर काम करने के लिए वे देश के विभिन्न प्रांतों जैसेराजस्थान, गुजरात, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, उत्तरप्रदेश, तमिलनाडु मेंघूम-घूमकर वहां की अलग-अलग जातियों, लोकानुरंजनकारीप्रवृतियों, जनजाति सरोकारों तथा कठपुतली, कावड़ जैसीविधाओं पर एक सौ से ज्यादा किताबें लिखकर देशव्यापी हीनहीं, अंतरराष्ट्रीय पहचान बनाई है। राजस्थान के लोक-नृत्य, गुजरात के लोक-नृत्य, महाराष्ट्र के लोक-नृत्य, उदयपुर केआदिवासी, ‘कुंवारे देश के आदिवासी’ जैसी पुस्तकों केअतिरिक्त राजस्थान के लोक देवताओं जैसे तेजाजी, पाबूजी, देवनारायण, काला-गोरा पर अनेक स्वतंत्र पुस्तकें लिखी है।

ऐसा ही एक और व्यक्तित्व है, चित्तौड़ के निनोर गांव में 3 मई1969 को जन्मे विकास दवे जी का। विमला भंडारी जी के किसीयात्रा-संस्मरण की भूमिका लेखक के रूप में मैंने उन्हें पहली बारपढ़ा था। फिलहाल वे मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी, इंदौर केनिदेशक है। बाल-साहित्य में उल्लेखनीय योगदान के अतिरिक्त, वीणा-वादन में प्रवीण, जयदेव के गीत गोविंद पर टिप्पणी, चंडीशतक पर व्याख्या, संगीत पर आधारित ‘संगीत रास’, ‘संगीतमीमांसा’, ‘संगीत रत्नाकर’, ‘शुद्ध प्रबंध ‘ नामक अनेक ग्रंथों केरचियता है।

8 जुलाई 1946 को जयपुर के चौमूं जिले में जन्मे डॉ. इकराम राजस्थानी सुप्रसिद्ध कवि, लेखक, शायर, गीतकारअंतरराष्ट्रीय कमेंटेर व ब्रॉड कास्टर है, उनका एक सुप्रसिद्धराजस्थानी गीत ‘‘इंजन की सीटी में, म्हारे मन डोले, चला चला रेड्राइवर गाड़ी होले-होले’’ हम बचपन से सुनते आ रहे है। यह गीतहमारी स्कूल के वार्षिकोत्सव में गाया जाता था। कई बार उस परनृत्य प्रस्तुति भी होती थी। इकराम राजस्थानी अनुवाद को Heart Transplant की तरह मानते है। वे आकाशवाणी के केंद्र निदेशकथे। सेवानिवृत्त होने के बाद इग्नू, ज्ञानवाणी कार्यक्रम में 31 जुलाई2008 तक स्टेशन मैंनेजर रहे।
एक और महत्वपूर्ण साहित्य साधिका है, डॉ. कुसुम खेमानी, जिनकी रचनाएं लगभग सभी हिंदी पत्रिकाओं के पढ़ने को मिलतीहै। 19 सितम्बर 1949 को चुरू के मंडवा जिले में जन्मी लेखिका, स्नात्तकोत्तर की पढ़ाई चुरू से और पी.एच.डी. कोलकाता केकिसी यूनिवर्सिटी से पूरी करती है। भारतीय भाषा परिषद में 38 वर्षों तक मंत्री, दो दशकों से मासिक पत्रिका ‘वागार्थ’ कासंपादन, हिन्दी साहित्य ज्ञानकोष की संयोजिका होने केसाथ-साथ पर्यावरण-संरक्षण में भी योगदान देती रही है। वहभाषा को संवाद का माध्यम मानती है, इस वजह से संवाद जितनासीधा, सरल, पारदर्शी और आत्मीय हो- उतना अच्छा मानती है।उनके उपन्यास ‘लालबत्ती की अमृत कथाएं’, ‘सोनागाछी’, ‘विषकन्याएं’, ‘‘जड़िया बाई’’, ‘‘गाथा रामभतेरी’’, ‘‘लावण्यदेवी’’, बहुचर्चित रहे है। उनके कहानी-संग्रहों में ‘अनुगूंजजिंदगी की’, ‘सच कहती कहानियां’, ‘रश्मिरथी मां’ आदि संग्रहोंकी अनेक कहानियों के देश की भिन्न-भिन्न भाषाओं में अनुवादहुआ हैऔर यहां तक कि कुछ कहानियों पर टेलीफिल्में भी बनीहै।

जैसा कि मैंने पूर्व में कहा है कि राजस्थान से दूर रहने कीवजह से मैं राजस्थान के युवा साहित्य साधकों के संपर्क में नहींआ सका और न ही उनकी रचनाएं पढ़ने का कोई अवसर प्राप्तहुआ; इस कमी को सिंघल साहब की इस पुस्तक ने पूरा कर दिया। साहित्य के क्षेत्र में यह ज्यादा जरूरी है कि आने वालीपीढ़ी ज्यादा संवेदनशील और जागरूक हो। परंपराओं के बीज और पूर्वजों का खून इस पीढ़ी की धमनियों में प्रवाहित होता है, अतः उनसे उम्मीद है कि वे अधिक से अधिक उदात्त एवंसमाजोपयोगी साहित्य की रचना करें। डॉ. प्रभात कुमार सिंघल नेउन्हें वह मंच प्रदान किया है, जिससे दोनों पीढ़ियों के भीतर संवादस्थापित हों और दोनों पीढ़ियाँ साहित्यिक दृष्टिकोण से अधिक सेअधिक लाभान्वित हो। मैं अपने इस आलेख में राजस्थान के उनसाहित्य साधकों की ओर ध्यानाकर्षित करना चाहूंगा; जिनमें मुझेहमारे साहित्य को समृद्ध करने की अपरिमित संभावनाएँ नजरआती है।

डॉ. ओम नागर युवा लेखक है राजस्थान के बारां जिले केअंटाना गांव में रहने वाले। जन्म 20 नवम्बर 1980। राजस्थानीमातृभाषा में लेखन के कारण उन्हें बड़े-बड़े पुरस्कारों से नवाजागया है, साहित्य अकादमी, भारतीय ज्ञान पीठ, भारतीय भाषापरिषद आदि की तरफ से। वे राजस्थानी भाषा के मूर्धन्य कविकन्हैया लाल सेठिया से ज्यादा प्रभावित है। वे कहते थे- ‘‘मायड़भाषा बोलतां/जीननै आवे लाज/इस्या कपूता सै दुखी/आखो देशसमाज।”
ऐसे ही दूसरे युवा आलोचक कवि है, 1974 में जन्मे, पाली केरहने वाले गजेसिंह राजपुरोहित- आप भी राजस्थानी भाषा कोमान्यता दिलाने में संघर्षरत है। इसी श्रेणी में नंदू राजस्थानी केनाम भी उल्लेख किया जा सकता है। वे भी मानवीय संवेदनाओं केउभरते रचनाकार है। 23 अप्रेल 1988 को टोंक जिले के लक्ष्मीपुरागांव में जन्मे। उनकी दो पुस्तकें प्रकाशित हुई है- ‘फिर से तम छंटजाएगा’ (काव्य-संग्रह) और दूसरी ‘राजस्थानी कुंडलियों कासंग्रह’, ‘कैद मातसी चोर’ (मायड़ भाषा में)।
इसी श्रेणी में कोटा के कवि उपन्यासकार किशन प्रणय (ज. 3 मार्च 1992) ने भी युवा रचनाकार के तौर पर अच्छी खासीपहचान बनाई है। सन् 1975 में मध्यप्रदेश के मुरैना जिले केसबलगढ़ में जन्मी, संप्रति कोटा में रहने वाली रश्मि गर्ग, जिनकीरचनाएं ‘पीली चूडियाँ’, ‘हाथ का बना स्वेटर’, कहानी-संग्रह‘प्रतिबिंब’ ओर आलेख संग्रह ‘अंतररश्मियां’ बहुचर्चित रही है।

‘वैदेही गौतम (ज. 1975) गद्य और पद्य दोनों में लिखती है।आपने धर्मवीर भारती के साहित्य पर पीएचडी की उपाधि प्राप्तकी है। उनका साहित्य तुलसीदास से प्रभावित है और मनोविज्ञानसच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय और धर्मवीर भारती से।

6 जुलाई 1983 को जन्मी मीनाक्षी पंवार ‘मीशांत’ उदयपुरकी युवा कवयित्री है। उनके कविता-संग्रह ‘महकता पलाश’ कोउदयपुर के साहित्यकार तरूण कुमार दाधीच उनके सृजन को उच्चधरातल पर ले जाने का प्रयास मानते हैं। ये सभी हमारी नई पौधहै जो राजस्थानी साहित्य, हिन्दी साहित्य या कहें भारतीय साहित्यको ; अपनी अनुभूतियों से लिपिबद्ध कर उन्हें समृद्ध कर हमारासपना साकार करते हुए अपना कर्तव्य पूरा करेंगे और उनकी आनेवाली नई पीढ़ी के नए-नए वातायन को खोलेंगे।

डॉ. प्रभात कुमार सिंघल की इस पुस्तक ने कई अनमोल रत्नों से परिचय करवाया हैं, जैसे फतेहपुर शेखावटी में सन् 1941 मेंजन्मे साहित्यकार, राजेन्द्र केड़िया। उन्होंने 65 वर्ष की आयु मेंलिखना शुरू किया और फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा। अथकअनवरत आगे बढ़ते चलते गए। लोक कहानीकार पद्यश्रीविजयदान देथा में उनकी पहली पुस्तक ‘तीसरा नर’ पढ़कर उनकीकहानियों पर सविस्तार पुनर्लेखन की इच्छा जाहिर की थी। किसीभी साहित्यकार के लिए इससे बड़ा और क्या सम्मान हो सकताहै! साहित्य-लेखन उम्र के किसी पडाव का इंतजार नहीं करता।केड़िया जी राजस्थान को दुनिया के सबसे खूबसूरत स्थान मानतेहैं। उसके सामने न काश्मीर, न पेरिस, न वेनिस। उनके कहानीसंग्रह ‘जाट रे जाट’, ‘वाह रे जाट!, ‘अमल कांटा’ और उपन्यास‘मदन बावनिया’, ‘जोग-संजोग’ आदि बहु चर्चित रहे।

दूसरे रत्न है ‘राजेन्द्र राव’। जिनका जन्म 1944 में कोटा मेंहुआ, मगर कालांतर में वे कानपुर शिफ्ट हो गए। जब ‘साप्ताहिकहिंदुस्तान’ में उनकी कथा-शृंखला ‘सोमला भईन राख’ प्रकाशितहोती थी तो पाठक बेसब्री से इंतजार करते थे। राजेन्द्र राव पेशेसे इंजीनियर , मगर मन में साहित्य की धुन सवार। उनकीकहानियाँ ‘साप्ताहिक हिदुस्तान’, ‘धर्मयुग’, ‘सारिका’, ‘कहानी’, ‘रविवार’ आदि पत्र-पत्रिकाओं में छपकर लोकप्रिय हुई।

इसी कड़ी में 1964 को जयपुर में जन्मी मंचीय कवयित्री डॉ. मधु खंडेलवाल ‘मधुर’ ने देश-विदेश के अनेक मंचों से काव्य-पाठकरते हुए मानवता एवं प्रेम का संदेश देकर राजस्थान का नामगौरवान्वित किया है। 1971 में जन्मे अजमेर में शिक्षाविद् मीडियाविशेषज्ञ, कवि कलाकार,नाट्यकार, वेदों पर कार्य करने वालेलेखक, आलोचक डॉ. संदीप अवस्थी की सर्जन-यात्रा भी हिंदीको विश्व दरबार में स्थापित करने में महती भूमिका अदा करतीहै।
पूत के पांव पालने में पहचाने जाते है। ‘जैसी मां, वैसी बेटी’, ‘जैसा पिता, वैसा पुत्र’, जैसी अनेक कहावतें और लोकोक्तियांहमें अक्सर सुनने को मिलती है; मगर ‘जैसा पिता, वैसी बेटी’जैसी नई लोकोक्ति गढ़ने का कार्य कर रही है साहित्य साधिकाशिखा अग्रवाल। इस पुस्तक के लेखक डॉ. प्रभात कुमार सिंघलजी की वह सुपुत्री है। बचपन से ही घर में मिले साहित्यिकपरिवेश ने उन्हें समकालीन स्पंदनों को ध्वनित कर साहित्यिक रूपदेने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है। न केवल बाल कविताओंकी रचना के माध्यम से, बल्कि दूसरी कविता-लेखक में भी सिद्धहस्त शिखा अग्रवाल अंग्रेजी में भी अपने लेखन के माध्यम सेविश्व स्तर पर अपनी उपस्थिति दर्ज करवाती है।

1946 में जन्मे अलवर के देवदत्त शर्मा हिंदी साहित्यक केगोल्ड मेडिलिस्ट है। आधुनिक हिन्दी महाकाव्यों में दार्शनिकअणुचिंतन विषय पर पीएचडी होल्डर भी। राजस्थान के प्रमुखमंदिर, किले, मेले, शहीदों, संतों, संग्रहालयों, लोक देवताओं, तीर्थों आदि विषयों पर कलम चलाने के साथ-साथ जैन दर्शन, अरविंद दर्शन पर भी उल्लेखनीय कार्य किया है।

यद्यपि डॉ. मंजुला सक्सेना का जन्म 4 अक्टूबर 1956 कोउत्तर प्रदेश के बिजनौर जिले में हुआ, मगर उनके पिताजी मूलतःबारां के निवासी थे। वे हिंदी, संस्कृत और अंग्रेज साहित्य केप्रकांड पंडित थे और पुस्तकों को वे अपनी असली पूंजी मानते थे।मंजुला सक्सेना की चार पुस्तकें ‘बाल कहानियां’, ‘विलक्षणगणितज्ञ श्रीनिवास रामानुजन’, ‘मेहंदी’, ‘पौराणिक देववाद औरतुलसीदास’ के अतिरिक्त भारतीय सेना में परम वीरचक्र, महावीरचक्र और वीर चक्र से सम्मानित सेनानियों के जीवन पर आधारितशौर्य-गाथाओं का संकलन ‘रण बांकुरे’ प्रकाशित हुई है।

बीकानेर में 5 मार्च 1959 को जन्मे प्रभात गोस्वामी व्यंग्यलेखन में सिद्ध हस्त है। ‘बहुमत की बकरी’, ‘चुगली की गुगली’, ‘ऐसा भी क्या सेल्फियाना’, ‘पुस्तक मेले में खोई भाषा’ और‘प्रभात गोस्वामी के चयनित व्यंग्य’ प्रमुख प्रकाशित पुस्तकें है।देश के लोकप्रिय न्यूज चैनल ‘आज तक’ के ‘साहित्य तक’ मेंउनके विडीयो प्रसारित होते है ओर बॉक्स एफएम रेडियो, जयपुरपर हर बुधवार ‘व्यंग्य के रंगः प्रभात के संग’, में ‘व्यंग्यकारों सेसाक्षात्कार’। उन्हीं की तरह बीकानेर के एक और साहित्यकार है, राजेन्द्र जोशी जी, जो अपनी कलम के माध्यम से नई सोच औरनए कलेक्टर से सृजन को नया आयाम दे रहे है।
राजस्थान साहित्य अकादमी से व्यंग्य लेखन के लिएपुरस्कृत डॉ. अतुल चतुर्वेदी का नाम व्यंग्यकार के रूप में पूरे देशमें चिर-परिचित है। उनका जन्म 30 जुलाई 1965 को उत्तरप्रदेशसे मैनपुरी में हुआ था, मगर उनके पिता जी नौकरी की तलाश मेंकोटा आ गए। वह विज्ञान पढ़ना चाहते थे, मगर नियति में हिंदीसाहित्य लिखा हुआ था। संभागीय संयुक्त निदेशक शिक्षाकार्यालय, कोटा में सहायक निदेशक पद पर रहते हुए ‘व्यंग्य- लेखन’ में अपना योगदान देते रहे। प्रसिद्ध व्यंग्यकार परसाई सेप्रभावित अतुल चतुर्वेदी जी के व्यंग्य-संग्रहों में ‘गणतंत्र बनामचेंपा’, ‘लोकतंत्र के टेकर’, ‘सपनों के सहारे देश’ औरकविता-संग्रहों में, ‘कितने खुशबू भरे दिन वे’, ‘स्मृतियों में पिता’, ‘घोषणाओं का बसंत’, आदि बहुचर्चित रहे है।

राजेन्द्र जोशी जी एक अच्छे कवि है, कथाकार है, संस्कृतिकर्मी और साक्षरता के पैरोकार है। वे विगत तीन दशकों से हिंदीओर राजस्थानी में लगातार अपनी कलम चला रहे हैं। उनकाराजस्थानी कहानी-संग्रह, ‘जुम्मै की नमाज’ और खाप पंचायतोंपर आधारित कहानी ‘पैला गुण’, बहुचर्चित रही है।
अब हम मिलते है अजमेर की हैं, डॉ. चंद्रकांता बसंल से। 1 अक्टूबर 1964 को जन्मी लेखिका वह अध्यात्म व संस्कृति मेंरची-बची है। उनकी दो पुस्तकें ‘सातवें दशक की हिन्दी कहानी’और ‘स्वातंत्र्योत्तर हिन्दी कहानी में मानवीय संबंध’ प्रकाशित हुई।

इसी तरह, 17 नवम्बर 1951 को डॉ. इन्द्र प्रकाश श्रीमालीका जन्म राजसमंद में हुआ, उन्होंने ‘समकालीन हिंदी उपन्यासों मेंप्रेम’ विषय में पीएचडी उपाधि प्राप्त की है। ‘पखेरु नापै आकाश’राजस्थानी कविता संकलन प्रकाशित हुआ है और उनकी‘सामान्य हिन्दी ज्ञान’ UGC द्वारा निर्देशित एवं मोहन लालसुखाड़िया यूनिवर्सिटी, उदयपुर के त्रिवर्षीय, डिग्री कोर्स की संदर्भपुस्तिका है। इसके अतिरिक्त, ‘आकाशवाणी एवं प्रसारणविद्याएं’, ‘संचार-जनसंचार, रेडियो, टेलीविजन एवं फिल्म’, ‘आवाज का जादू’, सामुदायिक रेडियो’, ‘आकाशवाणी कीअनुभव यात्रा’ आदि अनेक पुस्तकें उनके खाते में शोभायमान है।
‘भारतीय विज्ञापन में नैतिकता’ विषय पर पीएचडी करनेवाली डॉ. मधु अग्रवाल का उदयपुर में 1956 में जन्म हुआ था। वहप्रसिद्ध गजलकार एवं कवयित्री है। भारत सरकार के सूचना एवंप्रसारण मंत्रालय के ‘भारतेंदु हरिशचंद्र पुरस्कार’ के सम्मानित है।उनके कविता-संग्रह ‘कस्तूरी बसे मन में’, ‘यहां सूरज डूबा नहीं’, ‘धूप का आंचल’ आदि चर्चा में रहे हैं और उनकी पीएचडी थीसिस‘भारतीय विज्ञापन में नैतिकता’ एवं अन्य कृतियां ‘राजस्थान मेंसांस्कृतिक जबरन का संरक्षण एवं संवर्धन’ पाठकोपयोगी साबितहुई है, जबकि उनकी कृति ‘विपणन-प्रबंधन’ द्वितीय वाणिज्य मेंपढ़ाई जाती है।
27 मई 1958 को जन्मी उदयपुर की डॉ. मंजु चतुर्वेदीप्रतिष्ठित साहित्यकार है, अपने गुरू तुल्य पिता स्व. नंद चतुर्वेदीजी की तरह। वह भक्तिकालीन कवयित्री मीरा में बहुत प्रकाशितहै। अपने ‘पृथ्वी गंधमयी’ काव्य की रचना की है। उनकीआलोचनात्मक कृतियां ‘मीराः व्यक्तित्व एवं कृतित्व’, ‘साठोतरीहिंदी कहानी में प्रेम’, ‘स्त्री-विमर्श और हिंदी कहानी’, ‘हिन्दीसाहित्य विमर्श’, ‘हिंदी सहित्य का समग्र इतिहास’, ‘भक्तिकालपरिचय एवं प्रवृत्तियां’ एवं ‘रीतिकाल एवं आधुनिक काल’महत्वपूर्ण है।
1960 में डूंगरपुर के पीढ गांव में जन्मी महिला सशक्तिकरणको आधार बनाकर हिन्दी भाषा के गद्य-पद्य दोनों विधाओं मेंलिखती है- रागिनी प्रसाद। जिनके सृजन में आधी आबादी कादुःख झलकता है।
डॉ. अर्पणा पांडेय का जन्म मैनपुरी, उत्तरप्रदेश में हुआ था, मगर 1988 में शादी के बाद कोटा आ गई। वे भारत के साथ-साथढाका में हिंदी सेवी शिक्षिका के रूप में काम करती है। उनकापरिवार साहित्यिक सांस्कृतिक और आध्यात्मिक रूप से समृद्धहै। उन्होंने महाकवि कालिदास के मेघदूत का ‘काव्यानुवाद’ कियाहै, जिस पर आचार्य अग्निमित्र शास्त्री लिखते है कि इस अनुवादमें महाकवि जयशंकर प्रसाद, आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी कीशास्त्रीय हिंदी की झलक प्रत्यक्ष रूप से दृष्टि गोचर होती है।उन्होंने कपिल मुनि के सांख्यदर्शन की 72 कारिकाओं का भीकाव्यानुवाद किया है। उन्मेष, प्रवासी मन, काव्य-संग्रह मेंआध्यात्मिक सांस्कृतिक, राष्ट्रीय भाव, पर्यावरण संरक्षण विषयोंवाली कविताएं है। बांग्ला भाषा के लेखक ‘बड़े अली मियां’ कीपुस्तक ‘प्रिय गल्प’ का भी हिंदी अनुवाद किया है। ‘पुराणों मेंशुकदेव’ विषय पर शोध किया है। उनकी संस्मरण कृति ‘विदेशीप्रवास और हिंदी सेवा’ पर वरिष्ठ साहित्यकार जितेंद्र ‘निर्मोही’ लिखते है कि ‘‘अर्पणा पांडेय का अपना शिल्प है। उनके संस्मरणोंके मूल में भारतीयता है और दृष्टिकोण में ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ कादर्शन। वह बांग्लादेश की मिट्टी में भारतीयता की खुशबू खोजनिकालती है।’’
राजस्थान साहित्य अकादमी से सम्मानित अतुल कनक, प्रेम और अध्यात्म से ओत-प्रोत वाले असाधारण कवि है। उनकीसभी कविताएं सरल, सपाट, छंदमुक्त और गहरे अर्थ वाली होतीहै। किसी कवि-सम्मेलन में उनके मित्र ने उन पर व्यंग्य किया,- ‘‘हिंदी में चार कविताएं लिखकर गला फाड़कर चिल्लाने से तोकोई भी अखिल भारतीय कवि हो सकते है। राजस्थानी में कवितालिखकर दिखाओ तो जानूं?’’। इस व्यंग्योक्ति को उन्होंने गंभीरतासे लिया और देखते-देखते राजस्थानी साहित्य लिखने वालेकवियों की अग्रपंक्ति में पहुंच गए। ‘अंतिम तीर्थंकर’ उपन्यास कीमन में रूपरेखा तैयार होने के बावजूद कागज पर नहीं उतर पा रहाथा, तो उन्होंने पूरे 550 दिन भोजन त्यागकर अपना मनोरथ पूर्णकिया। ‘जूण जातरा’ और ‘छेक डलो राख’ नामक दो राजस्थानीउपन्यास, ‘चलो चूना लगाएं’ (हिन्दी व्यंग्य), और ‘अंतिम तीर्थंकर’ (हिन्दी उपन्यास) बहुत प्रसिद्ध हुए।
राजस्थान में कोटा एक ऐसी जगह है जो न केवलआईआईटी और मेडिकल स्टूडेंटों को अपनी ओर खींचती है, बल्कि उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश आदि प्रदेशों के साहित्यकार भी इसअंचल की ओर खींचे चले आते है और यहां की संस्कृति मेंघुल-मिलकर यहीं के हो जाते है। इस श्रेणी में एक ऐसा ही नामहै- भगवंत सिंह जादौन ‘मयंक’ का, जिनका जन्म 1 सितंबर1945 को मध्यप्रदेश में हुआ था। उन्होंने असंख्य मंचों कासंचालन, कवि-सम्मेलनों और काव्य-गोष्ठियों में काव्य-पाठकिया।
इसी शृंखला के एक और शख्स है- सी.एल. सांखला। कोटाजिले के टाकर बाड़ा गांव के निवासी। राजस्थानी बाल-कहानियां, छंद विधा, पुस्तकों की समीक्षा और भूमिका लेखन में सिद्ध हस्तकवि है और विगत चार दशक से साहित्य सर्जन में लगे हुए है।हेमराज सिंह ‘हेम’ भी कोटा के कवि है, रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की छाप लिए वीर रस वाले कवि। उनकी कविताओं में अध्यात्मऔर राष्ट्र प्रेम में सुगंध मिलती है। उन्होंने अनेक महाकाव्य, खंडकाव्य और कहानियाँ लिखी है। ‘समरांगण’ उनका कृष्णार्जुनसंवाद को केन्द्र में रखकर लिखा गया महाकाव्य है, तो राजस्थानके धीरोदात्त नायक- नायिकाओं पर आधारित ‘जयनाद’ खंडकाव्य।
7 अप्रेल 1953 को जन्मे जितेंद्र कुमार शर्मा ‘निर्मोही’ झालावाड़ के निवासी है। हिंदी, उर्दू और ब्रज भाषा के अच्छेजानकार। उनका ‘द्रौपदी’ महाकाव्य ज्ञानपीठ से पुरस्कृतओड़िया लेखिका प्रतिभा राय के उपन्यास ‘द्रौपदी’ (हिन्दी में) (याज्ञसेनी-मूल ओडिया में) की याद दिलाती है, जिसमें नारी काअपमान, मूल्यहीनता, हत्या, भ्रष्टाचार, बलात्कार जैसे घृण्य कार्योंके अतिरिक्त नारी मनोविज्ञान और अंतर्मन में अंतर्द्वन्द्व को उकेरागया है। उनकी कहानियाँ ‘हंस’, ‘कथा प्रवाह’, ‘कथा समय’ आदि में छपकर लोकप्रियता के तुंग को स्पर्श करती है। उनकीएक कहानी ‘एक नजर का प्यार’ बहुचर्चित रही। विज्ञान मेंस्नातक होने के बावजूद सेवानिवृत्ति के पश्चात् कोटा खुलाविश्वविद्यालय से स्नातकोत्तर की डिग्री प्राप्त की। वे गर्व से कहतेहै- ‘‘जीवन में कुछ कर सका या नहीं, मगर श्रीमती कोसाहित्यकार बना दिया।’’ उनकी पत्नी श्यामा शर्मा ने बालरचनाकार के रूप में पहचान बनाई है। ‘निर्मोही’ जी के साहित्यसृजन का फलक व्यापक है। काव्य, निबंध, संस्मरण, समालोचना, उपन्यास, रेडियो नाटक, कहानी-गीत-नवगीत, समीक्षा, मोनोग्राफ आदि विधाओं में उन्होंने कार्य किया है। उनकीपत्नी श्यामा शर्मा ने प्रसिद्ध बाल साहित्यकार विमला भंडारी, भगवती प्रसाद गौतम, डॉ. तारा लक्ष्मण गहलोत और कमलाकमलेश के मध्य अपनी पहचान बनाई है। वे जितेन्द्र ‘निर्मोही’ कोअपना प्रेरणास्रोत मानती है। अपने पति की वन और वन्य विभागमें पोस्टिंग होने के कारण उनका प्रकृति की ओर ज्यादा झुकाव।

उस डॉ. प्रभात कुमार सिंघल के इस पुस्तक ने एक औरसाधक खोजा है- कालीचरण राजपूत। जन्म तारीख 10 नवंबर1957। शिक्षाः बीएससी और इलैक्ट्रिकल इंजीनियरिंग मेंडिप्लोमा। रहने वाले उत्तर प्रदेश के एटा जिले में लोधीपुर के।सेवानिवृत्ति के बाद स्वाध्याय और साहित्य सर्जन में लगे हुए है।श्रीमद् भागवत गीता को अपने साहित्य का आधार बनाया है।‘महारानी अवंती बाई का इतिहास’ उनकी बहुचर्चित पुस्तक हैऔर ‘कुरूवंश पर संकट’ काव्य-संग्रह प्रकाशनाधीन है।

डॉ. कृष्णा कुमारी कोटा के चेचर गांव की हैं, जो सूरदास, सुमित्रानंदन पंत, सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’, तुलसीदास, रामचंद्र शुक्ल, बिहारी, रहीम, मैथिलीशरण गुप्त से प्रभावित रहीहै। उनकी पुस्तकों में ‘मैं पुजारिन हूँ’ (काव्य-संग्रह), ‘बहुत प्यारकरते हैं शब्द’ (काव्य-संग्रह) ‘भय बिन हो प्रीत’ (निबंध), ‘आओनैनीताल चलें’ (यात्रा-वृत्तांत) बहुचर्चित रहे हैं।

मोहन वर्मा राष्ट्र प्रेम को समर्पित और विसंगतियों, विद्रूपताओं और सामाजिक समस्याओं के प्रति समाज में अलखजगाने वाले कवि, गीतकार और गजलकार की रचना‘जगतमिथ्या ब्रह्मसत्य’ प्रसिद्ध रही हैं। प्रेम की भावनाओं औरप्रकृति शृंगार पर सृजन करने वाली सवाई माधोपुर की मूलनिवासी डॉ. प्रीति मीणा ने वृद्ध जनों की आर्थिक सामाजिकसमस्याओं का समाज शास्त्रीय अध्ययन पर पीएचडी की उपाधिप्राप्त की है। महादेवी शर्मा से प्रभावित कवयित्री डॉ. प्रीति मीणाका कविता संग्रह ‘गीत केसर, कस्तूरी मन’ प्रकाशित हुआ है।

कोटा में रहने वाले, अध्यात्म की धरा से पुखर रचनाओं केसर्जक रघुनंदन हरीला ‘रघु’ का जन्म 10 दिसंबर 1949 कोहरियाणा में हुआ। पश्चिम मध्य रेल्वे के संकेत एवं दूर संचारअभियंता पद से सेवानिवृत्त हुए है। सृजन से आध्यात्मिक धाराबहाने वाले रामेश्वर शर्मा ‘रामू भैया’ का जन्म 1 अक्टूबर 1950 को बूंदी जिले के लाखेरी गांव में हुआ। उनकी गीत पुस्तिका‘हरिद्वार में द्वार-द्वार’ का लोकार्पण योग गुरू रामदेव जी ने किया, जिसका सीधा प्रसारण ‘आस्था चैनल’ द्वारा विश्व के 159 से भीअधिक राष्ट्रों में देखा गया।इसी प्रकार ‘वंदे मातरम्’ गीतों केहिन्दी काव्यानुवाद का पन्द्रह भाषाओं में पन्द्रह लाख प्रतियों मेंकिया गया, जो कि एक विश्व रिकॉर्ड है। लोक सभा चुनाव केसंदर्भ में चुनाव चालीसा को राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त चैनलों में लोकहितार्थ दिखा गया।
1946 में जन्मे, बूंदी के रहने वाले रामस्वरूप मूंदड़ा ने अनेकविधाओं- गीत, गजल, हाइकु, मुक्तक, कविताएं, दोहे, आलेखऔर समीक्षा आदि को अपने लेखन का आधार बनाया हैं। वे हिंदीऔर हाड़ौती दोनों में समान अधिकार रखते है।

कवि विश्वामित्र ‘दाधीच’ साहित्य, संगीत और कला कीत्रिवेणी है। 25 नवंबर 1954 में जन्म और कोटा कलेक्ट्रेट से2024 में सेवानिवृत्ति। अच्छे गायक, वादक कलाकार है। ‘बोल्योंअण बोल्या’,‘मछलियां रा आंसू’ प्रसिद्ध काव्य-संग्रह है और नारीप्रधान उपन्यास ‘वेदवती’ तथा ‘मंच का मिजाज’ (संस्मरण) लोकप्रिय सिद्ध हुए।

1 जनवरी 1969 में जन्मे, कोटा में विजय जोशी विज्ञान केविद्यार्थी है, मगर साहित्याकरण ने उन्हें साहित्य, शिक्षा, पत्रकारिता और संचार, कला, संगीत, चित्रकारी, आलेख, समीक्षाकी ओर ले गया। उनके उपन्यास ‘चीखते चौबारे’, ‘रिश्ते हुएरिश्ते’, कहानी संग्रह ‘खामोश गलियारे’, ‘कैनवास से परे’, ‘कुहासे का सफर’, बिंधे हुए रिश्ते’, ‘खिसकती वादियां’, ‘सुलगता मौन;’ बाल कहानी-संग्रह ‘बदल गया मिंकू’ राजस्थानीकहानी-संग्रह ‘मंदर में एक दिन’ के अतिरिक्त पांच समीक्षात्मककृतियां ‘आखर निरख; पोथी परख’, ‘समीक्षा के पथ पर’, ‘अपनेसमय की बानगी; निकश पर’, ‘अनुभूति के पथ परः जीवन कीबातें’, कहानीकार प्रहलाद सिंह राठौडः कथ्य एवं शिल्प’ प्रसिद्धहै। उन्होंने उर्दू कहानी-संग्रह ‘वादे सवा का इंतजार’ का ‘पुरवा कीउड़ीक’ के नाम से राजस्थानी अनुवाद भी किया है। उनके साहित्यका मूल्यांकन भी बहुत सारे विद्वानों द्वारा किया गया है। पांचशोधार्थियों ने शोध भी किया है।

गद्य-पद्य विधा में प्रसिद्ध रचनाकार डॉ. इंदुशेखर ‘तत्पुरूष’ का जन्म 9 अक्टूबर 1962 को राजस्थान के गंगापुर सिटी में हुआथा। पेशे से आयुर्वेद चिकित्सक है और मन से साहित्यकार।उनकी पुस्तकों में ‘हिदुत्व एक विमर्श’ (आलेख-संग्रह), ‘खिलीधूप में बारिश’, ‘पीठ पर आंच’ (कविता-संग्रह) के अतिरिक्त‘अर्थायाम’, ‘जगद्गुरु शंकराचार्य’, ‘साहित्य परिक्रमा’ कासंपादन कर रहे है।

डॉ. पुरूषोत्तम यकीन राजस्थान के करौली के प्रसिद्धगजलकार है। अपने तीखे तेवर, अनूठी अभिव्यक्ति और अपनेअंदाज के लिए प्रसिद्ध है। बाल मुकुंद ओझा बिना नागा किएप्रतिदिन आलेख लिखते है। उनकी दो पुस्तकें ‘लोकतंत्र कापोस्टमार्टम’ और ‘शिकायत झूठी है’ (लघुकथा) बहुचर्चित रहीहै। इसमें अतिरिक्त, ‘जब बाड को खेत खा जाए’ (कहानी) ‘खेतऔर खुशी’, ‘मेहनत की रोटी’, ‘बजट’, आदि लघु कथाएं पाठकोंद्वारा आदृत हुई है। सन् 1953 में चुरू में जन्मे मानवीय संवेदनाओंके रचनाकार बालमुकुंद ओझा जन संपर्क अधिकार और संयुक्तनिदेशक पद से सेवानिवृत्त हुए। सन् 1974 से 1979 तक दैनिकराजस्थान पत्रिका के संवाददाता बने। जे.पी. आंदोलन में सक्रियभागीदारी के कारण गिरफ्तार हुए और जेल की यंत्रणा भी भोगनीपड़ी।
राजस्थान साहित्य अकादमी से पुरस्कृत लेखक दीनदयालशर्मा को बाल साहित्य के क्षेत्र में देशभर में जाने जाते हैं। 15 जुलाई 1956 को हनुमानगढ़ जिले में जन्म हुआ। ‘दीनदयाल कीचौपाल’ और अपने यू-टयूब चैनल के लिए लोकप्रिय है। सन्1975 में हिन्दी में लिखना शुरू किया, मगर दस साल बाद सन्1985 में राजस्थानी में मूल विद्या ‘बाल साहित्य’ है। 63 पुस्तकेंप्रकाशित है, जिसमें ‘बालपणे री बातां’, ‘एक टाबर की डायरी’, ‘कुछ अनेक ही बातें’ (जिसके 101 साहित्यकारों ने उन पर लिखाहैं) और ‘टाबर टोली’ (पाक्षिक बाल समाचार पत्र ) के लिएप्रसिद्ध है।

7 अक्टूबर 1943 में रतनगर, चुरू में जन्मे श्याम महर्षि, बीकानेर जिले के डूंगरपुर के रचनाकार माने जाते है। उनकेकाव्य-संग्रह ‘उकलती ओकल’, ‘साच तो है’, ‘मेह सूं पैलया’, ‘कीं तो बोल’ आदि राजस्थानी पाठकों द्वारा पसंद किए गए है।

अंत में, मैं विजय जोशी की भूमिका के निष्कर्ष से मैं पूरी तरहसहमत हूँ, जिसमें उन्होंने लिखा है कि डॉ. प्रभात कुमार सिंघल कीयह पुस्तक राजस्थान के साहित्यकारों की गहन संवेदना औरउनके रचाव को उद्घाटित करती है। यह वह रचाव है, जो इनसाहित्यकारों ने राजस्थान की धरापर ही नहीं उकेरा, वरन् अपनेप्रवास की धरती के आंगन को भी स्पंदित किया है। यह स्पंदनवरिष्ठ लेखकों के साथ-साथ नवोदित सृजन-कर्मियों के साथध्वनित होता हुआ रचनात्मक संस्कारों को अनुदित करता है औरसाहित्य के विविध आगामी संदर्भो में सृजनात्मक वैशिष्ट्य कोप्रतिपादित तो करता ही है, उल्लेखित साहित्यकारों के योगदानको समझने और परखने का अवसर भी प्रदान करता है।’’

निस्संदेह, डॉ प्रभात कुमार सिंघल की ‘राजस्थान के साहित्यसाधक’ अत्यंत सार्थक कृति बनती, अगर एकाध अध्याय में वेहमारे प्रसिद्ध पूर्वज साहित्यकारों जैसे चंद्रधर शर्मा गुलेरी (1883-1922),दादू दयाल (1544-1103),मीरा (1498-1546), संत पीपा(1359-1420), आईदान सिंह भाटी (1952), राघेय राघव(1923-1962), विजयदान देथा (1926-2013), नंद चतुर्वेदी(1923-2014), हनुमान प्रसाद पोद्दार (1872-1931), हरीशभादानी (1933-2009), कन्हैयालाल सेठिया (1919-2005), मदनलाल डांगी (1935-1988) आदि का संक्षिप्त उल्लेख करतेऔर समकालीन साहित्यकारों और पत्रकारों में नंद किशोरआचार्य, ओम थानवी,मनीषा कुलश्रेष्ठ,अंबिका दत्त, हरिराममीणा, हिम्मत सेठ, दुर्गा प्रसाद अग्रवाल, पद्मजा शर्मा,ओमपुरोहित ‘कागद’ आदि के व्यक्तित्व और कृतित्व पर भीप्रकाश डालते।

अंत में, इतना ही कहूँगा कि यह पुस्तक अनेक दैदीप्यमान साहित्यकारों का लेखा-जोखा है, जिसके लिए पृष्ठ भूमि तैयारकी है, डॉ. प्रभात कुमार सिंघल ने। उन्होंने एक ऐसा मंच तैयारकिया है, जिसके द्वारा न केवल पाठक वर्ग, बल्कि नवोदित और स्थापित लेखक, साहित्यकार भी एक-दूसरे के कृतित्व औरव्यक्तित्व से परिचित हो सकते हैं। कई बार ऐसा भी होता है किहम साहित्यकारों के नाम जानते हो अवश्य हैं, लेकिन उनके समग्रव्यक्तित्व और कृतित्व से अपरिचित होते हैं। भले ही, उनकीएक-दो रचनाओं से हम गुजरे भी होते हैं, मगर उनके वृत्तीयआकलन से वंचित रहते हैं। इस कमी को पूरा करते है, डॉ. प्रभातकुमार सिंघल जैसे संवेदनशील साहित्यकार,पेशे से खोजी पत्रकार। जो साहित्य के विशाल महासागर की अथाह गहरायों मेंगोते लगाते हैं और खोजकर ले आते हैं, अपने हाथों में बहुमूल्यमुक्ता-मोती-प्रवाल। बाद में, उसकी माला पिरोकर समाजोपयोगी बनाकर पाठकों के समक्ष प्रस्तुत कर देते हैं, ताकि वे अपनेमनपसंदीदा व्यक्तित्व और उनके कृतित्व से वाकिफ होकर इसकीमाला आगे से आगे पिरोते चलेजाए। अथक, अनवरत और शृंखलाबद्ध मानो एक जले हुए दीए से दूसरे बुझे हुए दीए या मंदपड़ रहे दीए को जलाकर दीपों की एक दीर्घ अवली तैयार की जारही हो। यह ही तो साहित्य की सच्ची दीपावली है। उनकी यह पुस्तक न केवल राजस्थान के साहित्यकारों को जोड़ती है, बल्किदेश के अन्य समकालीन साहित्यकारों को एकता के सूत्र में पिरोने के लिए भी प्रेरणा-स्रोत बनकर अतुलनीय उदाहरण प्रस्तुतकरती है।

चुकाना ही पड़ता है, कर्मों का हिसाब

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लंबे समय से एक ऐसी कहानी लिखने की इच्छा है, जो भ्रष्ट सरकारी कर्मचारियों और राजनेताओं की केस स्टडी हो। ऐसे लोग, जिनका भ्रष्टाचार जगजाहिर हो और जिन्होंने अपने करियर के सुनहरे दिनों में समाज की ओर कभी ध्यान ही नहीं दिया। उनका एकमात्र लक्ष्य अधिक से अधिक धन कमाना रहा।
कहानी का फोकस इन भ्रष्टाचारियों के जीवन के उत्तरार्ध पर होगा। कहानी का छोटा हिस्सा उनकी सेवा के दौरान का होगा, जबकि बड़ा हिस्सा उनकी सेवानिवृत्ति के बाद के जीवन पर केंद्रित होगा। सवाल यह है कि सैकड़ों लोगों के जीवन से खिलवाड़ करने वाला कोई चिकित्सक, थाना प्रभारी, अंचल अधिकारी, जिला अधिकारी, मंत्री, सांसद या विधायक क्या बुढ़ापे में चैन से जी पाता है?

मैंने एक भ्रष्ट आईएएस अधिकारी की कहानी पर विचार किया। वह जीवन भर रौब और ठसक के साथ रहा। उसने इंसान को इंसान नहीं समझा। उसके बच्चे विदेश में पढ़े और वहीं बस गए। उन्होंने अपने पिता द्वारा भारत में इकट्ठा की गई संपत्ति की ओर मुड़कर भी नहीं देखा। पत्नी का देहांत हो गया, और वह पूरी तरह अकेला रह गया। एक दिन चुपके से दुनिया से चला गया।

इसी तरह, एक अन्य अधिकारी को उनके घरेलू सहायक तक सुबह-शाम गालियाँ देते थे। कभी अपने आसपास के लोगों को जूते की नोक पर रखने वाला यह अधिकारी, उसी शहर में रहते हुए भी अपने बच्चों से दूर हो गया। बच्चे अलग बंगले में रहने लगे। उनकी मृत्यु अत्यंत दर्दनाक थी। अंतिम दिन घिसट-घिसट कर जिए, और एक दिन गुमनामी में खो गए।

ऐसा नहीं कि जिनके जीवन में बाहर से संपन्नता दिखती है, वे वास्तव में सुखी होते हैं। ऐसे कई परिवार अंदर से खोखले होते हैं, जहाँ किसी को किसी की परवाह नहीं होती। जब बच्चों को पता है कि उनके पिता भ्रष्टाचारी थे, वे चाहे समाज में कितना ही सम्मानित चेहरा दिखाएँ, बच्चे मन से उनका सम्मान नहीं करते।

बिहार के एक कुख्यात भ्रष्ट नेता का उदाहरण लें। उनके चेहरे पर भ्रष्टाचार की छाप साफ दिखती है। टमाटर-सा लाल चेहरा अब काला पड़ चुका है। ऐसे भ्रष्टाचारी आमतौर पर लंबा जीवन जीते हैं, लेकिन उनका बुढ़ापा कष्टों में बीतता है। यदि आप किसी ऐसे व्यक्ति को जानते हैं, जो जीवन की दूसरी पारी में है और जिसके भ्रष्टाचार की कहानियाँ आपको मालूम हैं, तो उनके करीब जाकर देखिए। और यदि वह व्यक्ति आप स्वयं हैं, तो आज से अपने साथ घट रही घटनाओं का लेखा-जोखा रखना शुरू कीजिए।
स्वर्ग और नर्क अलग से कुछ हो या न हो, लेकिन यहाँ अपने कर्मों का हिसाब कुछ हद तक चुकाना ही पड़ता है।

झारखंड की धरती पर एक बाल हठ की कहानी

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रांची। उन दिनों झारखंड में यह नैरेटिव जोरों पर था कि ‘आदिवासी हिंदू नहीं होते हैं।’ इसी नैरेटिव के सहारे वहां बड़े पैमाने पर कन्वर्जन हो रहा था। इस यात्रा में मुझे एक आदिवासी सज्जन मिले। उनकी मां क्रिश्चियन थीं, पिता आदिवासी। लेकिन वह खुद को हिंदू मानते थे। इतना ही नहीं, उन्होंने खुद चलकर RSS की शाखा में कदम रखा, क्योंकि वह समझना चाहते थे कि RSS आखिर है क्या। अब आगे।
कहानी उन दिनों की है, जब झारखंड की हवा में एक अजीब-सी बात गूंज रही थी। लोग कहते थे, “आदिवासी हिंदू नहीं होते।” यह बात हवा में तैरती थी, और इसके सहारे वहां बड़े पैमाने पर धर्मांतरण का खेल चल रहा था। उसी हवा में, एक नन्हा-सा बालक बड़ा हो रहा था, जिसके मन में सवालों का जंगल उग रहा था। उसका नाम था, मान लीजिए, रघु। रघु की मां क्रिश्चियन थीं, पिता गर्व से भरे आदिवासी। लेकिन रघु? वह खुद को हिंदू मानता था। उसका मन उस जमीन से जुड़ा था, जहां पेड़, पहाड़ और नदियां उसके लिए पूजनीय थीं।

एक दिन, चर्च की सीढ़ियों पर बैठा रघु अपनी मां के साथ पादरी की बातें सुन रहा था। पादरी की आवाज में चेतावनी थी, “बच्चे को उन RSS वालों से दूर रखो। वे लोग चर्च के खिलाफ लोगों को भड़काते हैं। वे हमारे लोगों को हिंदू बनाना चाहते हैं।” रघु का छोटा-सा मन ठिठक गया। “हिंदू बनाना? मगर मैं तो हिंदू ही हूं!” उसने सोचा। फिर उसे गुस्सा आया। “ये लोग चर्च के खिलाफ भड़काते हैं? ये तो गलत है!” बाल मन में एक हठ जागा। वह तय कर चुका था कि वह RSS के उस संगठन में जाएगा, जिसके बारे में इतनी बातें सुनी थीं। वह देखना चाहता था कि आखिर ये संघी करते क्या हैं, और अगर कुछ गलत हो रहा है, तो उसे ठीक कर देगा।

रघु ने गांव में शाखा की तलाश शुरू की। मगर गांव में शाखा कहां? पास के गांव में एक मैदान में कुछ लोग इकट्ठा होते थे, डंडे लिए, खेल खेलते, गीत गाते। रघु वहां पहुंचा। पहले दिन, दूसरा दिन, फिर सप्ताह बीता। महीना गुजरा। छह महीने हो गए। मगर शाखा में न तो चर्च की बात हुई, न क्रिश्चियनों की, न मुसलमानों की, न मस्जिद की। रघु हैरान था। “मैं तो इन्हें सुधारने आया था, मगर ये तो बस खेलते हैं, गीत गाते हैं, और देश-समाज की बातें करते हैं!” उसका मन निराश हुआ। उसे लगा, शायद असली रहस्य कहीं और छुपा है।

फिर किसी ने उसे बताया, “रघु, इन संघियों का एक सात दिन का वर्ग होता है। वहां सारा रहस्य खुलता है। वहीं सारा षड्यंत्र रचा जाता है। वहीं बच्चों के दिमाग में जहर भरा जाता है।” रघु का मन फिर जोश से भर गया। “बस, यही मौका है!” उसने वर्ग में जाने का फैसला किया। सात दिन का वर्ग बीता। मगर वहां भी कुछ नहीं मिला। न कोई नफरत की बात, न चर्च के खिलाफ कोई साजिश, न क्रिश्चियनों को भगाने की कोई योजना। रघु का मन फिर बैठ गया। “आखिर ये संघी करते क्या हैं?” उसने सोचा।
उन्होंने ही बताया कि जिद थी कि संघ को समझना है। इसलिए फिर प्रथम और द्वितीय वर्ष का प्रशिक्षण भी पूरा किया। अब थोड़ा संघ समझ आया लेकिन जितना समझ आया वह बहुत कम था। मतलब आधा प्रतिशत।

उम्र बढ़ती गई, और रघु की जिद भी। उसने सोचा, “शायद संघ का साहित्य पढ़ने से कुछ समझ आए।” उसने संघ की हर किताब, जो हाथ लगी, पढ़ डाली। मगर किताबों में भी वही बातें थीं—देश, समाज, संस्कृति। कुछ ऐसा नहीं, जो उसे पादरी की बातों से जोड़ सके। फिर उसने नागपुर जाकर संघ का तृतीय वर्ष का प्रशिक्षण लिया। अब वह प्रचारक बन चुका था। चालीस साल बीत गए। रघु अब रघु बाबू बन चुके थे। एक दिन, किसी से बात करते हुए उन्होंने हंसकर कहा, “चालीस साल बाद भी मुझे लगता है कि मैंने संघ को बस दो, सवा दो फीसदी ही समझा है।”

रघु बाबू ने गहरी सांस ली और कहा, “लोग जो संघ के बारे में कहते हैं, लिखते हैं, सुनते हो, पढ़ते हो, वह सब बाहर की बात है। असली संघ को समझना है, तो शाखा में जाओ। वहां कोई पंजीकरण नहीं होता, कोई तस्वीर नहीं ली जाती। जब मन करे, जाओ। जब मन न करे, छोड़ दो। फिर सुनी-सुनाई बातों पर यकीन क्यों?”

रघु बाबू की यह बात सुनने वाले के मन में गांठ-सी बंध गई। वह सोचने लगा, “सचमुच, जो सुनता हूं, क्या वही सच है? या सच को जानने के लिए मुझे खुद चलकर देखना होगा?” और यही सवाल, मेरे दोस्त, आज तुमसे भी पूछता हूं। तुम गांधीवादी हो, समाजवादी हो, या किसी और वाद में यकीन रखते हो—सुनी-सुनाई बातों पर यकीन करने से पहले, एक बार शाखा में जाकर देखो। शायद वहां तुम्हें रघु बाबू जैसा कोई मिले, जो तुम्हें सच का एक और टुकड़ा दे जाए।

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