आहुति बन जले स्वातन्त्र्य वीर सावरकर

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कृष्ण मुरारी तिवारी

रायपुर : भारतीय राजनीति में स्वातन्त्र्य वीर विनायक दामोदर सावरकर का नाम सदैव चर्चा में रहता है। मात्र चौदह वर्ष की अल्पायु से अपना जीवन स्वतन्त्रता की बलिवेदी में आहुतकर देने वाले सावरकर। अपने भाई बाबाराव सावरकर सहित पूरे के पूरे परिवार क्रान्तिकारी कार्य में हवन करने वाले सावरकर। जिन्होंने राष्ट्र को जीवन के केन्द्र में रखने और राष्ट्र के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर करने का आजीवन व्रत लिया और सभी को इसकी प्रेरणा दी। उन सावरकर को भी कुटिल राजनीति अपनी सत्ता व स्वार्थ सिद्धि के लिए अपमानित करने का अवसर ढूँढ़ती रहती है,जिन्हें दो-दो आजन्म कारावास की सजा अँग्रेजों ने सुनाई हो। वीर सावरकर जिनके लेखों, वक्तव्यों,पुस्तकों से अँग्रेज सरकार इतनी भयभीत रहती थी कि — उन्हें जब्त करने , बोलने, प्रकाशन रोकने और मुकदमा लगाकर जञ्जीरों में बाँध देती थी। वह सावरकर जिनकी क्रान्तिकारी व सामाजिक -राजनैतिक गतिविधियों का अँग्रेज सरकार ने नृशंसता पूर्वक दमन किया और उनके भाईयों -सहयोगियों को जेल में डाल दिया। घर के आर्थिक संसाधनों को नष्ट कर दिया हो और उनके जीवन के अठ्ठाईस वर्षों तक उन्हें कालापानी की कैद व सख्त निगरानी में रखकर महाराष्ट्र के रत्नागिरी की सीमाओं में कैद करके रखा। ब्रिटिश हुकूमत ने उनके क्रान्तिकारी ,सामाजिक कार्यों पर अंकुश लगाने,यातना देने में जिन क्रूरताओं के साथ सावरकर और उनके परिवार को प्रताड़ित किया ; स्वातन्त्र्य भारत के इतिहास में ऐसा अन्य कोई उदाहरण देखने को नहीं मिलता है।

यह सावरकर के क्रान्तिकारी विचारों, कार्यों, दर्शन और भारतीय संस्कृति, हिन्दू राष्ट्र के प्रति उनकी अगाध,असंदिग्धश्रद्धा का ही परिणाम है कि — वे जनमानस के हृदय में अपना अद्वितीय स्थान तो बनाए  हुए हैं।साथ ही उत्तरोत्तर उनके व्यक्तित्व एवं कृतित्व का मस्तक उन्नत ही होता जा रहा है।

साथ ही उनका अनादर व अपमान करने वालों के लिए भी वे वर्षों से पत्थर में सर पीटने का विषय बने हुए है। हालाँकि इसके केन्द्र में स्वार्थ पिपासु राजनीति है जिसे पता है कि — सावरकर के दर्शन में कितना अपार ओज और तेज है ।  उन्हें यह भी पता है कि  –  वीर सावरकर के विचारों- सिद्धान्तों को लोक द्वारा आत्मसात करने पर भारत-भारतीयता और भारतीय संस्कृति की ध्वज पताका सदैव फहराती रहेगी। इससे उसी सत्ता की प्रतिष्ठा होगी जो भारत की सनातन संस्कृति के प्रति निष्ठावान होगी।

इस कारण से सावरकर सदैव एक संगठित गिरोह के  निशाने पर सदैव बने रहते हैं। हमें यह तथ्य भी ध्यान में रखना चाहिए कि — सावरकर उस समय से ही क्रान्तिकारियों के महान आदर्शों में स्थापित हो चुके थे‌ । जब स्वतन्त्रता आन्दोलन के बहुचर्चित नेता — चाहे गाँधी जी हों ,सुभाषचंद्र बोसहों,सरदार पटेल हों,नेहरू हों ; इन सभी का उभार नहीं हो पाया था।

महात्मा गाँधी तो दक्षिण अफ्रीका से सन् 1915 में भारत वापस आए थे। किन्तु सावरकर सन् उन्नीस सौ के प्रवेश के साथ ही क्रान्तिकारी कार्यों में अपने अपूर्व तेज के साथ गतिमान थे। बालगंगाधर तिलक उनसे अत्यंत प्रभावित थे। तिलक जी ने  श्याममजीकृष्ण वर्मा द्वारा लन्दन में भारतीय छात्रों के लिए हॉस्टल के रुप में स्थापित ‘इण्डिया हाउस’  में सावरकर को भेजा। इंडिया हाउस क्रांतिकारी निर्माण की फैक्ट्री के तौर पर चर्चित थी। वहाँ तिलक जी ने उन्हें पढ़ने के उद्देश्य से — क्रान्तिकारी गतिविधियों के प्रसार के लिए भेजा था।

सावरकर कौन थे ?

सन् उन्नीस सौ चार 1904 में लन्दन में अपनी पढ़ाई के दौरान ही अभिनव भारत जैसे क्रांतिकारी संगठन को खड़ा करने वाले सावरकर। लाला हरदयाल, सेनापति बापट, भाई परमानंद और भगत सिंह के गुरु – मार्गदर्शक करतार सिंह सराभा के प्रेरणास्रोत सावरकर। लन्दन के विभिन्न पुस्तकालयों के पन्ने-पन्ने को पढ़कर तथ्यात्मक और प्रामाणिक तौर पर  ‘सन् अठारह सौ सन्तावन का स्वातन्त्र्यसमर’ लिखकर इतिहास के गौरव बोध को भरने वाले सावरकर थे।

सन् 1857 का स्वातन्त्र्य समर :

‘सन् 1857 का स्वातन्त्र्य समर’ — यह कोई सामान्य पुस्तक भर नहीं थी। बल्कि इस पुस्तक ने अनेकानेक क्रान्तिकारियोंको क्रान्ति की नई राह दिखलाई।गदर पार्टी के जन्म के पीछे यही पुस्तक है। अँग्रेजी सरकार इससे इतना भयभीत हुई कि प्रकाशन के पूर्व ही पुस्तक को जब्त करने की योजना बना ली थी। किन्तु सावरकर अँग्रेजों की मानसिकता और योजना को पूर्व में ही भाँप गए। इसकी तीन प्रतियाँ तैयार करवाई। जो कि उन्होंने मूल रूप से मराठी भाषा में लिखी थी।और इसे उन्होंने भारत में अपने बड़े भाई —   गणेश सावरकर, फ्रांस में भीकाजी कामा और एक प्रति डॉ.कुटिन्हों के पास भेजकर उसके व्यापक प्रकाशन व प्रसारण की रणनीति तैयार की थी।

इस पुस्तक की विचार दृष्टि – क्रान्तिकारी भावना की उपयोगिता इतनी अधिक थी कि – इसके विविध भाषाओं में अनेकानेक संस्करण प्रकाशित हुए। नेताजी सुभाषचंद्र बोसने इसके तमिल संस्करण को प्रकाशित करवाया, तो भगत सिंह ने इसके अन्य संस्करणों को राजाराम शास्त्री की सहायता से प्रकाशित करवाने व अधिकाधिक प्रसार में जुटे रहे। रासबिहारी बोस से लेकर राजर्षि पुरुषोत्तम दास दण्डनसहित अनेकानेक क्रान्तिकारियों के लिए गौरवपूर्ण इतिहास बोध से परिपूर्ण इस पुस्तक ने — क्रान्तिकारियों को आत्मबल व पुरुषार्थ के साथ त्याग और बलिदान का साहस प्रदान किया।

वे सावरकर ही थे जिन्होंने  सन् उन्नीस सौ पाँच में सर्वप्रथम बंगाल विभाजन का विरोध करते हुए विदेशी वस्त्रों की होली जलाकर प्रखर प्रतिशोध दर्ज करवाया था। इस विचार को आगे चलकर महात्मा गाँधी ने बाईस अगस्त सन् उन्नीस सौ इक्कीस 22 अगस्त 1919 को ‘स्वदेशी’ अभियान में विदेशी वस्त्रों की होली जलाकर अपनाया।

सन् उन्नीस सौ सात (1907) में  —अँग्रेजों द्वारा जब भारत के अठारह सौ सन्तावन के स्वतन्त्रता संग्राम को कुचलने की लन्दन में झाँकी प्रस्तुत की गई । उस समय सावरकर इससे उद्वेलित और विचलित हो गए और फिर वे गौरवगाथा के अभियान में जुटे। उन्होंने अंग्रेजों के घर यानी लंदन में नया अध्याय लिखा  दस मई सन् उन्नीस सौ सात को इण्डियाहाउस में अपने सहयोगी साथियों के साथ उन्होंने अँग्रेजों से आँखें तरेरते हुए  —  भारत के प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम की स्वर्ण जयन्ती मनाने का साहसिक कार्य किया। आगे चलकर यही प्रेरणा उन्हें भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास लिखने के लिए बनी। सन् उन्नीस आठ में तथ्यात्मक ढँग से उन्होंने भारतीय स्वतन्त्रता के अप्रतिम संग्राम को  पुस्तकाकार रूप दिया। लन्दन के इण्डिया हाउस से भारत की स्वतन्त्रता के लिए अनवरत – अथक रणनीति और आन्दोलनों की पटकथा रचने वाले सावरकर ने चाहे भारत में हो या विदेश भूमि में हों  या जेल की कोठरी में ; वे अपने स्वतन्त्रता के व्रत को किसी न किसी रणनीति के माध्यम से पूर्ण करने के लिए सदैव उद्दत रहे ।

वीर सावरकर के प्रति आदर और श्रद्धा :

क्रान्तिकारी कवि,उपन्यासकार , इतिहासकार, विद्वान, दार्शनिक, कानूनविद् ,समाजसुधारक और अखण्ड भारत के जाज्वल्यमान स्तम्भ सावरकर ने अपना सर्वस्व राष्ट्र के लिए सौंप दिया। उन सावरकर का भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम में योगदान अतुलनीय है जिसे अकादमिक तौर पर सत्तासंरक्षणमें विकृत करने के अनेकानेक षड्यन्त्रों के उपरान्त भी वामपंथी मिटा पाने में असफल ही रहे। हालाँकि जब सावरकर के समक्ष वे किसी पसंघे में नहीं टिक पाए — तो वे सभी सावरकर पर माफी माँगने और गाँधीजी की हत्या में संलिप्तता, भारत विभाजन के दुष्प्रचार और मिथ्यारोप लगाने में वर्षों से अनवरत जुटे हुए हैं।   किन्तु वे न तो कभी सावरकर को समझ सकते हैं ।  न ही भारतीय जनमानस के अन्दर वीर सावरकर के प्रति आदर व श्रद्धा को कम कर सकते हैं।

सावरकर पर किताब लिखने वाले विक्रम सम्पत बतलाते हैं कि — “सावरकर ने अपनी याचिकाओं के सम्बन्ध में स्वयं ‘ मेरा आजन्म कारावास’ में लिखा है।  उनकी सभी याचिकाएँ उसी फॉर्मेट में हैं जिस फॉर्मेट में उस समय राजनीतिक बन्दीयाचिकाएँ प्रस्तुत करते थे। छठवीं याचिका के लिए महात्मा गाँधी ने उन्हें  स्वयं सलाह दी थी‌।  महात्मा गाँधी स्वयं  सावरकर बन्धुओं की मुक्ति के लिए अपने स्तर पर प्रयासरत थे। इस बावत्। महात्मा गाँधी ने  स्वयं छब्बीस मई सन् उन्नीस सौ बीस व सन् उन्नीस सौ इक्कीस में अपने पत्र ‘ यंग इण्डिया’ में लेख लिखा था। जिसमें  सावरकर बन्धुओंके विषय में विस्तृत विवेचन के साथ अँग्रेज सरकार से उन्हें छोड़ने के लिए कहते हैं।”

यह सबकुछ ऐतिहासिक तौर पर दर्ज है। कोई भी इसका अवलोकन कर सकता है। तथ्यों के आलोक में जहाँ सावरकर के प्रति दुस्प्रचार करने वाले बेदम पिटते हैं । तो वहीं गाँधी हत्या के आरोप में भले ही उन्हें जेल जानी पड़ी हो।  लेकिन अन्ततोगत्वा भारतीय सर्वोच्च न्यायालय की अग्निपरीक्षा से भी सावरकर तपकर कुन्दन की भाँति निष्कलंक निकल कर आते हैं।

सावरकर के विषय में यदि हम आधुनिक सन्दर्भ में बात करें — तो न्यायपालिका हर बार उन्हें निर्दोष सिद्ध करती है। किन्तु सावरकर के विरुद्ध ऐतिहासिक रुप से पर्याप्त कानूनी प्रमाण है ; ऐसा उनको अपमानित करने वाली कुंठित बिरादरी हमेशा कहती रहती है।

यदि सावरकर के विरुद्ध गाँधी हत्या में संलिप्त होने के कोई भी प्रमाण होते तो – क्या न्यायपालिका संज्ञान में लेकर उन्हें अपराधी सिद्ध नहीं करती? यदि सावरकर गाँधीजी की हत्या में संलिप्त होते तो क्या सन् पैंसठ में गठित कपूर आयोग उन्हें दोषी सिद्ध नहीं करता ?

ऊपर से कपूर आयोग की रिपोर्ट पूर्व प्रधानमंत्री इन्दिरा के शासनकाल में आई थी। ऐसे में यदि सावरकर नाममात्र के लिए भी संलिप्त होते —  तो क्या तत्कालीन इन्दिरा गाँधी सरकार सावरकर को दोषी नहीं ठहराती ? किन्तु ‘साँच को आँच’ क्या की भाँति सावरकर सर्वोच्च न्यायालय ,जाँच आयोगों के द्वारा सदैव दोषमुक्त सिद्ध हुए। बल्कि इन्दिरागाँधी ने वीर सावरकर के अप्रतिम योगदान को ध्यान में रखते हुए —सन् उन्नीस सौ सत्तर में महान क्रान्तिकारी, राष्ट्रवादी, कवि के रुप में याद करते हुए ‘डाक टिकट’ जारी करती हैं ‌‌।इतना ही नहीं इंदिरा गांधी ‘सावरकर ट्रस्ट’ को अपने निजी कोष से ग्यारह हजार रुपये भी देती हैं । साथ ही इन्दिरा गांधी ने  सन् उन्नीस सौ तिरासी में  भारतीय फिल्म डिवीजन को वीर सावरकर पर एक वृत्तचित्र बनाने का आदेश देते हुए कहा था कि -‘’आने वाली पीढ़ियों को ‘इस महान क्रांतिकारी’ के बारे में न सिर्फ पता चल सके बल्कि पीढ़ियाँ जान सकें कि वीर सावरकर ने देश की आजादी में क्या और किस तरह से योगदान दिया।”

यदि सावरकर दोषी होते तो क्या सर्वोच्च न्यायालय उन्हें अपराधी सिद्ध नहीं करता ? यदि वीर सावरकर क्रान्तिकारीनहीं होते तो क्या लालबहादुर शास्त्री के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार उन्हें शासकीय कोष से पेंशन देती ? जैसा कि वर्तमान में कांग्रेस के दिग्भ्रमित, विचारशून्य कथित नेता और वामपंथियों द्वारा वीर सावरकर के विरुद्ध विषवमन किया जा रहा है। पंडित नेहरू की बेटी पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी वीर सावरकर के प्रति आदर और श्रद्धा का भाव रखती थीं। इसीलिए वीर सावरकर के अप्रतिम योगदान को ध्यान में रखते हुए इंदिरा गांधी— 1970 में महान क्रान्तिकारी, राष्ट्रवादी, कवि के रुप में याद करते हुए ‘डाक टिकट’ जारी करती हैं ‌‌। साथ ही इंदिरा गांधी ‘सावरकर ट्रस्ट’ को अपने निजी कोष से ग्यारह हजार रुपए भी देती हैं। इसी संदर्भ में वीर सावरकर की जन्म शताब्दी के समय का यह तथ्य महत्वपूर्ण है। इंदिरा गांधी का आ 20 मई 1980 को लिखा पत्र उल्लेखनीय है। अपने इस पत्र के माध्यम से वो सावरकरस्मारक के सचिव बाखले को वीर सावरकर की ‘सौ’ वींजयन्ती पर शुभकामना सन्देश भेजकर कहतीं कि – ‘’मुझे आपका 8 मई 1980 को भेजा हुआ पत्र प्राप्त हुआ है। वीर सावरकर का अँग्रेजी सरकार के विरुद्ध बहादुरी पूर्ण प्रतिकार करना भारत के स्वतन्त्रता के आन्दोलन में अपना एक महत्वपूर्ण और अहम स्थान रखता है। मैं भारत के इस असाधारण सपूत की जन्म शताब्दी मनाने की योजना की सफलता की कामना करती हूँ।”

“Dear Shri Bakhle,

I have received your letter of the8th May 1980.

Veer Savarkar’s daring defiance of the British Government has its own important place in the annals of our freedom movement. I wish success to the plans to celebrate the birth centenary of this remarkable son of India”

Your sincerely

Indira Gandhi

( NO.838 -PMO/80, 20 MAY 1980)

इसके अतिरिक्त इंदिरा गांधी ने सन् 1983 में भारतीय फिल्म डिवीजन को वीर सावरकर पर एक वृत्तचित्र बनाने का आदेश देते हुए कहा था कि -“आने वाली पीढ़ियों को ‘इस महान क्रांतिकारी’ के बारे में न सिर्फ पता चल सके बल्कि पीढ़ियाँ जान सकें कि वीर सावरकर ने देश की आजादी में क्या और किस तरह से योगदान दिया।”

स्पष्ट है कि इंदिरा गांधी वीर सावरकर के प्रति अगाध श्रद्धा रखती थीं। इसीलिए उन्होंने उनके सम्मान में कोई कमी नहीं की। ऐसे में क्या पूरी कांग्रेस और अराजक वामपंथी गिरोह इन्दिरा गाँधी से अधिक बुद्धिमान और शक्तिशाली हैं ? क्या इन्दिरा गाँधी को सत्य और असत्य का ज्ञान नहीं था ? जो वे स्वातंत्र्य वीर सावरकर का सदैव सम्मान करती रहीं । उन्हें हमेशा प्रेरणास्रोत बतलाया।

जब सोनिया गांधी ने प्रणब मुखर्जी और शिवराज पाटिल को डांटा :

बात सन् दो हजार तीन की है – जब अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में— प्रणब मुखर्जी शिवराज पाटिल की समिति द्वारा संसद भवन के सेन्ट्रल हॉल में वीर सावरकर का पोर्टरेटलगाने के लिए समिति ने अपना प्रस्ताव पारित किया। प्रस्ताव लोकसभा अध्यक्ष को स्वीकृति के लिए भेजा था। इसी कारण बाद में — सोनिया गाँधी ने प्रणब मुखर्जी व शिवराज पाटिल को डाँटा भी था कि — आप लोग समिति में होकर यह प्रस्ताव कैसे दे सकते हैं? कांग्रेस द्वारा पोर्टरेटअनावरण समारोह का बहिस्कार करने के बाद प्रणब मुखर्जीव शिवराज पाटिल भी नहीं पहुँचे थे‌ । किन्तु तत्कालीन राष्ट्रपति—श्री एपीजे कलाम ने संसद जाकर विधिवत सावरकर के पोर्टरेट का अनावरण किया।

यदि सावरकर गाँधी हत्या के दोषी होते तो क्या प्रणबमुखर्जी व शिवराज पाटिल की समिति उस प्रस्ताव को पारित करती? क्या कांग्रेस का वर्तमान नेतृत्व- अराजक वामपंथी गिरोह — पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी व एपीजेअब्दुल कलाम से अधिक विद्वान हैं ?

चाहे एपीजे कलाम हों या प्रणब मुखर्जी हों – जो भारतीय स्वतन्त्रता में सावरकर के योगदान को जानते व समझते थे। वे सावरकर का आदर करना जानते थे इसीलिए उन्हें कोई नहीं डिगा सका। किन्तु इन सबके उपरान्त भी ‘ वीर सावरकर’ के विरुद्ध विष वमन करने वाला गिरोह जब उन पर लगातार गाँधी हत्या का बेबुनियाद आरोप लगाता है। तो क्या यह सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय की अवमानना नहीं है? अक्सर सर्वोच्च न्यायालय का सम्मान व जनभावनाओं का आदर करने का ढोंग रचने वाला यह संगठित गिरोह है‌। जो सावरकर पर दोषारोपण करने के लिए इस सीमा तक गिर जाता है कि — वह सावरकर के विषय में सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय को मानने को तैयार नहीं होता है‌ ।  न ही सावरकरकी जनस्वीकार्यता को पचा पाता है। लेकिन सावरकर का नाम जब भी चर्चा में आता है — तब उनके ऊपर मनगढ़न्ततरीके से मिथ्यादोषारोपण के लिए पूरी की पूरी फौज अपने लाव-लश्कर के साथ राजनीति के अखाड़े में कूद पड़ती है।

 

इसके पीछे उस फौज में चाहे कांग्रेसी हों – चाहे वामपंथी हों या अन्य मुखौटाधारी। ये सब अपने कुकर्मों से बचने के लिए बेबुनियाद तर्कों की ओट में उन्हें लाँछित करने के लिए उतर पड़ते हैं।

सावरकर पर अपने-अपने मिथ्यारोपों को गढ़ने के लिए — ये कभी गाँधी का सहारा ले लेते हैं तो कभी भगत सिंह के बरक्स सावरकर को खड़ा कर अपनी कुत्सित राजनीति को सिद्ध करने का प्रयत्न करते हैं। लेकिन जो सावरकर – भगत सिंह के गुरू – प्रेरक रहे करतारसिंह सराभा के प्रेरणास्रोत रहे हों। जिन सावरकर के साहित्य का प्रकाशन व प्रसारण कार्य भगत सिंह ने करवाया हो। जिन सावरकर के साथ सुभाषचन्द्र बोस ने ब्रिटिश साम्राज्य के शत्रु देशों व नेताओं की भारतीय स्वतन्त्रता के लिए सहायता लेने की कार्ययोजनाबनाई हो। जिन सावरकर ने सशस्त्र और सैनिक क्रांति के लिए ब्रिटिश सेना में शामिल होकर — उसे खोखला करने की दूरगामी रणनीति बनाई हो। उन सावरकर को अपमानित करने के लिए जब एक गिरोह बेबुनियाद आरोप मढ़कर अपना एजेण्डा साधना चाहता है। तब ही यह स्पष्ट हो जाता है कि — ये सभी क्रान्तिकारियों व महापुरुषों का कितना सम्मान करते हैं। ये सभी न तो गाँधी के अनुयायी हैं – न भगत सिंह के,न अम्बेडकर के, न सुभाष के और न ही अन्य सभी क्रान्तिकारियों के।

ऐसा कुकृत्य करने वाले महापुरुषों के सहारे अपने प्रोपेगैण्डाको चलाने के लिए जी – जान लगाए रहते हैं। किन्तु सावरकर के त्याग,बलिदान,साहस-शौर्य और उनकी राष्ट्रनिष्ठा पर जब भारतीय सर्वोच्च न्यायालय तथा जनमानस ने खरे होने की बारम्बार मुहर लगा दी है,तब वीर सावरकर को किसी के प्रमाणपत्र की आवश्यकता नहीं है।

भले ही उन पर बौद्धिक जुगाली के कीचड़ उछालने के कितने भी प्रयास किए जाएँ। लेकिन वे सावरकर के अवदान को कभी भी कम नहीं कर सकते। उल्टे यह जरूर संभव है कि ऐसा करने वालों का चाल-चरित्र और चेहरा हमेशा बेनकाबहोता जाएगा।उनके इन कुकृत्यों से यह सुस्पष्ट होता है कि – ऐसा करने वाले उन्हीं अँग्रेजों की नाजायज़ सन्तानें हैं जिन्होंने वीर सावरकर की क्रान्ति से डरकर उन्हें कठोर सजा सुनाई। सावरकर को लाँछित करने के लिए विमर्श चलाने वाले इन पाखण्डियों से यह भी सिध्द होता है कि – ये न तो राष्ट्रभक्त हो सकते, न गाँधीभक्त और न ही स्वतन्त्रता संग्राम के हुतात्माओं का आदर करने वाले। ये केवल विकृत मानसिकता के गिरहकट हैं जिन्हें सावरकर के विचार और दर्शन में भारत की उन्नति व भारतीय संस्कृति की पुनर्प्रतिष्ठाहोने का भय सता रहा है।

अतएव,ऐसा करने वाले सावरकर को अपमानित करने के सहारे अपनी राजनीतिक प्राण प्रतिष्ठा की उम्मीद लगाकर बैठे हुए हैं। इसके लिए वे किसी भी स्तर तक गिर सकते हैं। अपने आपको इतिहासकार, प्रोफेसर,पत्रकार, कलाकार, नेता – कहने और कहलाने का प्रपञ्च रचने वाले ये सब वही लोग हैं — जिन्होंने कभी भी भारतीय संस्कृति ,इतिहास, महापुरुषों का आदर नहीं किया। बल्कि उन्हें अपमानित करने के अपने -अपने स्तर पर कोई भी अवसर नहीं चूके।

मनसा -वाचा -कर्मणा माँ भारती के लिए अपनी आहुति देने वाले सावरकर जिन्होंने क्रान्ति की ऐसी ज्वाला सुलगाई कि क्रूर अँग्रेजी सरकार झुलसने लगी।

जब लंदन में सावरकर को अंग्रेजों ने किया गिरफ्तार :

मदनलाल ढींगरा के द्वारा जब सन् उन्नीस सौ नौ में कर्नलवायली की हत्या कर दी गई । तब सावरकर ने मदनलाल ढींगरा के समर्थन में लन्दन टाईम्स में लेख लिखा। इतना ही नहीं इसके पूर्व और बाद में भी सावरकर ने उन्हें कानूनी और क्रान्ति के लिए सहयोग प्रदान किया। इस आधार पर वे सन्देह के घेरे में आ गए। सावरकर को मदनलाल ढींगरा को सहयोग देने, वायली की हत्या का षड्यंत्र रचने के आरोप में लन्दन में उन्हें तेरह मई सन् उन्नीस सौ दस को गिरफ्तार कर लिया गया। तत्पश्चात अँग्रेजों द्वारा भारत ले आते समय — वे जहाज से समुद्र में कूदकर आठ जुलाई उन्नीस सौ दस को फ्रांस के सीमाक्षेत्र में चले गए। किन्तु बाद में फ्रांस सरकार ने उन्हें ब्रिटिश सरकार को सौंप दिया।

अँग्रेजों ने षड्यन्त्रपूर्वक ब्रिटिश अधिकारी जैकसन की हत्या में उन्हें दोषी ठहराते हुए चौबीस दिसम्बर सन् उन्नीस सौ दस को आजीवन कारावास की सजा सुनाई। तत्पश्चात पुनः इकतीस जनवरी उन्नीस सौ ग्यारह को  उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई।सात अप्रैल सन् उन्नीस सौ ग्यारह को कालापानी की सजा में पोर्टब्लेयर की सेलुलरजेल में दस वर्षों तक उन्हें अमानवीय यातनाएँ दी गईं। वे यातनाएँ इतनी क्रूर व वीभत्स थीं कि — जिसे आज सोच भर लेने से अन्तरात्मा काँप उठती है।

मगर, वह कठोर -क्रूर यातनाएँ भी सावरकर को न तो तोड़ पाईं और न ही उनके स्वतन्त्रता और क्रान्ति के व्रत को डिगा पाईं।इक्कीस मई सन् उन्नीस सौ इक्कीस तक अँग्रेजों ने उन्हें दस वर्ष अण्डमान के पोर्ट ब्लेयर की सेलुलर जेल में रखा। उसके बाद अँग्रेज अधिकारियों के लिए अण्डमान की जलवायु हानिकारक होने के कारण उन्हें तीन वर्षों के लिए — रत्नागिरी की जेल में ही रखा गया। तदुपरान्त सन् उन्नीस सौ चौबीस में वे जेल से छूट जाते हैं ,लेकिन कठोर सख्ती व नजरबन्दी में उन्हें पन्द्रह वर्षों तक रत्नागिरी में ही एक नए तरह की ही कैद में रखा जाता है।

अन्ततोगत्वा अठ्ठाईस वर्षों की लम्बी यातना के बाद भारत शासन अधिनियम सन् उन्नीस सौ पैंतीस के बाद — जब बॉम्बे प्रेसीडेंसी में कांग्रेस की सरकार बनी तब उन्हें सन् उन्नीस सौ सैंतीस में एक प्रकार से अँग्रेज़ी सरकार की क्रूर परतन्त्रता से मुक्ति मिली। तत्कालीन कांग्रेस ने उन्हें कांग्रेस में शामिल होने का आमन्त्रण दिया था किन्तु सावरकर ने कांग्रेस का आमन्त्रण अस्वीकार करते हुए कहा था –

“कांग्रेसी नेताओं को ये विश्वास था कि हिन्दू मुस्लिम एकता के बिना भारत को स्वतन्त्रता नहीं मिल सकती, मुस्लिम नेता इसी का फायदा उठाते हुए हिन्दुओं के अधिकारों की कीमत पर अपने समुदाय के लिए रियायतें हासिल कर रहे हैं। राष्ट्रवाद के नाम पर -हिन्दुओं की कीमत पर ;मुसलमानों को तुष्ट करना राष्ट्र के साथ धोखा है।मैं ऐसी स्थिति में कांग्रेस में शामिल नहीं हो सकता। राष्ट्रभक्तों की अन्तिम कतार में खड़े होना भी ,मैं राष्ट्रद्रोह करने वालों की पहली कतार में खड़े होने से बेहतर समझता हूँ। ”

विकृत मानसिकता वाले मानसिक गिरोहों के अनुसार यदि सावरकर ने क्रान्तिकारी कार्य छोड़ने की कीमत पर याचिका दायर की थी। तो उनके छूटने के बाद तत्कालीन कांग्रेस उन्हें साथ में शामिल करने व कांग्रेस सरकार में प्रतिनिधित्व के लिए क्यों आमन्त्रित कर रही थी ? सावरकर व स्वतन्त्रतासंग्राम, कांग्रेस व स्वतन्त्रता आन्दोलन के नेताओं के साथ तुलनात्मक अध्ययन में कई सारे आयाम निकलकर आते हैं।

सन् उन्नीस सौ सैंतीस में अपनी स्वतन्त्रता के उपरान्त वीर सावरकर पुनः सामाजिक -राजनैतिक – सांस्कृतिक स्तर पर दूरगामी व्यापक कूटनीति एवं रणनीति के अन्तर्गतक्रान्तिकारी कार्य में तत्परता के साथ जुट गए। अपनी कैद के दौरान उन्होंने विपुल साहित्य रचा था। और स्वतन्त्रता के पुजारी सावरकर ने अनेकानेक कठोर यातनाओं की त्रासदी को अपने ऊपर वज्रपात की भाँति सह लिया। लेकिन उन्होंने अपने सिद्धान्तों , अखण्ड भारत के सपनों से किसी भी परिस्थिति में समझौता नहीं किया। उन्होंने अँग्रेजी शत्रुओं को धोखा देने के लिए विविध रणनीतियाँ बनाई और अपने जीवन को सार्थकता प्रदान की। सावरकर पर चाहे गाँधी हत्या में संलिप्तता के मनगढ़न्त आरोप हों याकि उनकी याचिकाओं को लेकर कुत्सित दुराग्रहों की तुष्टि के यत्न हों – सभी केवल राजनीतिक हित साधने व स्वातन्त्र्य समर के महान क्रान्तिकारी वीर सावरकर को अपमानित करते हुए उनके माध्यम से भारतीय धर्म, संस्कृति व इतिहास पर कुठाराघात करने के षड्यन्त्र ही सिद्ध होते हैं। सावरकर राष्ट्र की रग- रग में व्याप्त हैं। उनकी क्रांतिकारी हुंकार और विपुल साहित्य उनके व्यक्तित्व एवं कृतित्व की आभा बिखेर रहा है‌ ।

क्या असम विधानसभा चुनाव पर जुबिन गर्ग का मुद्दा छाया रहेगा?

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नव ठाकुरीया
गुवाहाटी । असम की चुनावी राजनीति अब तक विकास, पहचान, जातीय संतुलन और सुरक्षा जैसे मुद्दों के इर्द-गिर्द घूमती रही है। लेकिन आगामी विधानसभा चुनावों से पहले एक असाधारण सवाल सार्वजनिक विमर्श के केंद्र में खड़ा हो गया है—क्या लोकप्रिय सांस्कृतिक आइकन जुबिन गर्ग की रहस्यमयी मौत चुनावी एजेंडे पर हावी रहेगी?
राजनीतिक दल भले ही सार्वजनिक रूप से यह कहते नज़र आएँ कि किसी कलाकार के नाम पर राजनीति नहीं होनी चाहिए, लेकिन 19 सितंबर 2025 को सिंगापुर में हुई जुबिन गर्ग की असामयिक मौत और उसके बाद चली जांच व कानूनी प्रक्रिया ने असम की राजनीति में एक भावनात्मक और संवेदनशील धुरी बना दी है। निधन के कई महीनों बाद भी सोशल मीडिया पर न्याय की मांग थमी नहीं है, खासकर युवा वर्ग में यह मुद्दा लगातार उबाल पर है।
सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी और मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व शर्मा पर विपक्ष यह आरोप लगा रहा है कि पूरे मामले को शुरू से ही गलत ढंग से संभाला गया। मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने जुबिन के मामले को सरकार की जवाबदेही से जोड़ते हुए आक्रामक रुख अपनाया है। असम प्रदेश कांग्रेस कमेटी ने ‘चार्जशीट 2026’ जारी कर न केवल जुबिन की मौत की जांच पर सवाल उठाए, बल्कि बढ़ते सरकारी कर्ज़, कथित भ्रष्टाचार, विभिन्न समुदायों से किए गए वादों के अधूरे रहने और सरकारी स्कूलों को बंद किए जाने जैसे मुद्दों को भी सामने रखा।
कांग्रेस की वरिष्ठ नेता प्रियंका गांधी वाड्रा के असम दौरे के दौरान यह बहस और तेज़ हो गई। उन्होंने जुबिन को श्रद्धांजलि देते हुए कहा कि महान कलाकार राजनीति से दूर रहते हैं और उनकी मौत पर राजनीति नहीं होनी चाहिए। इसके साथ ही उन्होंने गुवाहाटी के पास सोनापुर स्थित जुबिन के समाधि स्थल पर जाकर श्रद्धांजलि दी और मुख्यमंत्री पर ध्रुवीकरण की राजनीति को बढ़ावा देने का आरोप लगाया। यह संदेश राजनीतिक भी था और भावनात्मक भी, जिसका असर चुनावी माहौल पर साफ दिखाई दिया।
कानूनी मोर्चे पर असम पुलिस ने जुबिन की कथित हत्या के मामले में सात लोगों को गिरफ्तार किया है। इनमें आयोजनकर्ता, मैनेजर, बैंड से जुड़े सदस्य, एक पारिवारिक सदस्य और निजी सुरक्षा कर्मी शामिल हैं। शीर्ष पुलिस अधिकारी के नेतृत्व में गठित विशेष जांच टीम सिंगापुर जाकर साक्ष्य जुटा चुकी है और अदालत में हज़ार पन्नों से अधिक की चार्जशीट दाखिल की जा चुकी है। इसके बावजूद, जांच की दिशा और गति को लेकर सार्वजनिक संतोष नहीं दिखता।
मामले ने तब नया मोड़ लिया जब जुबिन के परिवार ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर विशेष अदालत के गठन और सुनवाई में तेज़ी की मांग की। जुबिन की पत्नी गरिमा सैकिया गर्ग ने सिंगापुर में समुचित राजनयिक हस्तक्षेप पर ज़ोर दिया, ताकि मौत की परिस्थितियों को लेकर उठ रहे सवालों का स्पष्ट जवाब मिल सके। इसी बीच, सिंगापुर के एक प्रमुख अख़बार की रिपोर्ट सामने आई, जिसमें जुबिन की मौत को दुर्घटना बताया गया, और यहीं से राजनीतिक बहस और तीखी हो गई।
कोरोनर जांच में सिंगापुर पुलिस ने डूबने को मौत का कारण बताया और किसी आपराधिक साज़िश से इनकार किया। इसके बाद कांग्रेस नेताओं ने सवाल उठाया कि यदि अंतरराष्ट्रीय जांच एजेंसियां आपराधिक तत्व नहीं पातीं, तो असम में शुरू से ‘हत्या’ का नैरेटिव क्यों गढ़ा गया। विपक्ष का तर्क है कि इससे जनता को भ्रमित किया गया।
मुख्यमंत्री शर्मा ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि असम पुलिस की जांच स्वतंत्र थी और मामला अदालत में है, इसलिए राजनीतिक अनुमानबाज़ी से बचना चाहिए। सत्तारूढ़ दल ने जुबिन के लिए न्याय की मांग को लेकर राज्य के कई हिस्सों में न्याय यात्राएं भी निकाली हैं, जिससे यह साफ़ होता है कि सरकार भी इस मुद्दे को पूरी तरह राजनीतिक विमर्श से बाहर नहीं रख पा रही।
दिलचस्प यह है कि जुबिन के प्रति संवेदना और न्याय की मांग असम की सीमाओं से बाहर भी पहुँची। देश के अन्य हिस्सों से राजनीतिक और सामाजिक हस्तियों ने परिवार से मुलाकात की और निष्पक्ष जांच की मांग की। इससे यह मामला केवल एक व्यक्तिगत त्रासदी न रहकर व्यापक सार्वजनिक सरोकार बन गया है।
अब असली सवाल यह है कि क्या यह भावनात्मक मुद्दा मतदान व्यवहार को प्रभावित करेगा। क्या जुबिन गर्ग का मामला सत्ता-विरोधी भावना को धार देगा, या फिर यह समय के साथ अन्य चुनावी मुद्दों में दब जाएगा? चुनाव नज़दीक आने के साथ यह स्पष्ट होगा कि यह विषय केवल संवेदना तक सीमित रहता है, या सचमुच असम की राजनीति पर छाया रहता है।
(लेखक पूर्वी भारत के वरिष्ठ पत्रकार)

Will Zubeen Garg dominate Assam 2026 assembly election issues !

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Nava Thakuria
Guwahati : Even all political parties, not to speak of millions of fans and well-wishers of Assam’s revered cultural icon Zubeen Garg, continue preaching for sparing the maverick singer’s name in doing politics, his mysterious death last year in a foreign land may dominate the electoral politics in the forthcoming legislative polls. Indications surface that Assam assembly elections (scheduled for March-April 2026 along with West Bengal, Tamil Nadu, Kerala and Puducherry) will observe a high voltage campaigning on Zubeen’s unexplained demise in Singapore on 19 September 2025 and subsequent investigation and judicial processes. Even after five months of his final departure, Zubeen continues to influence the young people in their social media outbursts demanding justice and nothing else.
As the ruling Bharatiya Janata Party (BJP), precisely State chief minister Himanta Biswa Sarma, faced an initial backlash for ‘mishandling’ the icon’s sudden death issue, the prime opposition party recently filed a series of charges including the demand for a prompt justice to the bereaved family of Zubeen. Assam Pradesh Congress Committee (APCC), while releasing the Chargesheet 2026 targeting the BJP-led government in Dispur, highlighted the inefficient way of investigations into Zubeen’s unsolved death issue. The party, once ruled Assam and other north-eastern States for decades with little oppositions, also raised the issue of rising public debts, illegal wealth concentrations, failure to deliver on promises for Koch Rajbongshi, Tai Ahom, Moran, Motok, Chutia and Tea Tribes people, inactions on various irregularities detected by the Comptroller and Auditor General of India, closure of government schools, along with others.
During the recent visit of senior Congress leader Priyanka Gandhi Vadra to Assam, the Wayanad Parliamentarian raised the issue of Zubeen stating that the legendary king of humming always stayed away from politics and hence there should be no politics over his unfortunate death. Ms Priyanka did not forget to visit Samadhi Kshetra of Zubeen at Sonapur locality near Guwahati to pay tribute to the departed soul. Personally attacking CM Sarma for pursuing politics of polarization, the Gandhi scion denounced the relentless mental harassment to APCC chief Gaurav Gogoi and his family over their gratuitous Pakistan links. She also visited the sacred Shakti Peeth atop NIlachal hills in the heart of Guwahati to seek eternal blessings from Devi Kamakhya.
Assam police team had already arrested seven individuals suspecting their involvement in the alleged ‘murder’ of Zubeen as he was in the island nation to perform in the 4th North East India Festival, scheduled for 19, 20 and 21 September 2025. All the accused including Shyamkanu Mahanta (organizer of the festival) Siddharth Sharma (Zubeen’s manager), Shekhar Jyoti Goswami (bandmate), Amritprava Mahanta (co-singer), Sandipan Garg (Zubeen’s cousin) and two personal security officers still remain under the judicial custody. A special investigative team, formed under top Assam police officer Munna Prasad Gupta, travelled to Singapore to collect material for the probe and later filed a thousand-page chargesheet in the court on 12 December.
Recently, the bereaved family wrote a letter to the PMO on 24 January urging Prime Minister Narendra Modi to initiate for constituting a special court to expedite the concerned trials. Garima Saikia Garg, wife of the 53-year-old singer turned filmmaker, expressed concern over delays in the trial at the local court. Earlier, during a media interaction, Ms Garg expressed worries as distressing news relating to Zubeen’s death surfaced from Singapore stating that he died while being ‘severely intoxicated’ and swimming in the sea without a mandatory life jacket. Pointing out to Singapore’s mainstream newspaper The Straits Times, which reported on 14 January that there was no foul play at Zubeen’s demise, they insisted on facilitating appropriate diplomatic intervention in Singapore to unearth circumstances that prompted the disaster.
Mentionable is that Singapore police investigator David Lim during a coroner’s inquiry testified that Zubeen consumed alcohol, refused a life vest before jumping off a yacht, and ultimately drowned near Lazarus island. The officer informed that his friends, who were present at the yacht, attempted to persuade Zubeen to swim back from the sea waters to the vessel before he suddenly became motionless and began floating face down. Zubeen was immediately brought back on board and efforts were made to resuscitate him. Later he was declared dead at Singapore General Hospital at 5.15 pm (local time). The cause of death was confirmed as drowning. The singer did not exhibit suicidal tendencies, nor was he coerced or subjected to duress, asserted the officer, adding that Zubeen ignored repeated reminders by the yacht captain to wear a life jacket.
The recently concluded four-day budget session in the State legislative assembly also witnessed the opposition leaders demonstrating for a fast-track trial and justice for Zubeen. Earlier, APCC president Gogoi criticised CM Sarma for alleging a murder conspiracy to Zubeen’s death, arguing that Singapore’s findings contradicted such claims. Gogoi asked whom now the Assamese public should believe as Singapore authorities repeatedly stated there was no evidence of unnatural death. Responding to the criticism, Sarma said the Assam investigation was independent of Singapore’s and praised the State police for a thorough inquiry. Sarma also insisted politicians refrain from speculation since the matter is before the court. Months back, the ruling BJP also organised a series of Nyay Yatras in Guwahati, Nalbari, Mangaldoi, Dhemaji, Dibrugarh, Cachar etc to emphasise on speedy judicial proceedings over Zubeen’s demise.
It was preceded by an influential Congress leader from south India visiting the bereaved family to pay tributes to Zubeen. Karnataka deputy chief minister DK Shivakumar, while attending the post-death rituals organised in Jorhat termed Zubeen as a cultural ambassador whose work transcended boundaries in his lifetime. More recently, a Samajwadi Party leader in Dhubri raised a question over the fate of investigation and trials regarding Zubeen’s death. The leader SP, a strategic supporter to the Congress in Assam, also demanded an independent central agency probe (preferably by the Central Bureau of Investigation) to investigate the matter so that the people of Assam can have a clarity over Zubeen’s death and also the justice overdue for months.
The current term of 126-member State legislative assembly is expiring on 20 May 2026. The last two consecutive Assam elections (2016 and 2021) witnessed the overwhelming victory for the BJP-led alliance. Recently, a team led by chief election commissioner Gyanesh Kumar, ECs Sukhbir Singh Sandhu and Vivek Joshi with other poll-officials visited Assam. The representatives from national and local political parties in Guwahati urged the ECI team during a meeting to hold the election within two phases. The local media space is now over-poured by election related news and views. A recent television talk show in a Guwahati-based news channel (NewsLive Bangla, which was anchored by journalist Rupa Chowdhury and graced by three speakers including practicing lawyer Shubhrajyoti Sarkar and Barak-valley resident Kamakhya Purkayastha and this writer) also highlighted the electoral issues ahead of the polls.

Social Media and Sex Workers: Unfiltered Stories from the Digital Frontlines

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Zena

Delhi : In the digital age, social media platforms have transformed sex work from street corners and shadowy backrooms into accessible online spaces. Platforms like Twitter (now X), Instagram, OnlyFans, and Reddit allow sex workers to share personal narratives, build communities, market services, and challenge stereotypes. These stories reveal a complex reality: empowerment alongside precarity, connection amid isolation, and resilience in the face of stigma and platform policies.

Many sex workers describe social media as a lifeline for financial independence and self-expression. One non-binary creator, who attended an Ivy League school, began selling underwear online to cover tuition and rent. “I needed extra income and figured it could be something kind of anonymous,” they shared. Expanding to sexting and companionship via Instagram, FetLife, Seeking Arrangements, Kik, Twitter, and Tumblr, they connected with clients ranging from college students to 70-year-olds. This shift offered control over their body and boundaries, especially as someone who didn’t strongly identify with their physical form.

Online platforms also enable intimate, everyday sharing beyond explicit content. Cortana Blue, an escort, sells access to her real life through social media. Fans pay not just for nudity but for chats, shopping trips, bad jokes, and glimpses of her pets. “You get to chat with me whenever you want,” she explained, highlighting how fans crave genuine connection. Similarly, creators on OnlyFans often blend personal updates with content, turning subscribers into a pseudo-community. One performer noted how fans engage with goofy videos, cosplay, or daily quirks, making the work feel more relational than transactional.

Yet these stories also expose harsh challenges. Platform policies frequently penalize sex workers. Instagram’s updated terms have cracked down on solicitation, forcing creators to use coded language—like “only flans” for OnlyFans—or shift promotion to Twitter and Reddit. One creator lost accounts after indirect ads, waking up daily fearing deletion. “Instagram has made it clear they don’t like that,” a curvy, LGBTQ+ worker said, describing the constant anxiety of shadowbans and revenue drops.

Personal disclosures carry emotional weight. Some recount using sex work to explore sexuality after strict upbringings, gaining confidence and empowerment. “Sex work has been a wonderful experience for me,” one shared, crediting it with overcoming inhibitions. Others highlight vulnerabilities: loneliness among clients seeking human touch, or the mental toll of constant online presence blurring work and personal life. One former OnlyFans creator stopped masturbating for months after quitting, as the act became commodified.

Survival stories vary widely. Trans women often enter sex work due to limited options, while others adapt during crises like COVID-19 by sharing experiences on Twitter. Activist Alisa Bernard, reflecting on her path into prostitution, emphasized healing through storytelling: “My story is my power.” She warns that online tools don’t guarantee safety, as objectification persists in reviews and interactions.

These unfiltered accounts humanize sex workers, countering narratives of universal exploitation or glamour. Social media amplifies diverse voices—some thriving through self-branding, others navigating precarity—but reveals systemic issues: hostile moderation, stigma, and the need for better protections. As one creator put it, the work demands thick skin against harassment while offering autonomy in a world that often silences such stories.

In sharing openly, sex workers reclaim narratives, fostering solidarity and pushing for recognition of their labor as valid and multifaceted.

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