लोकतंत्र में आंदोलन के अधिकार के साथ सामाजिक जिम्मेदारी भी जरूरी

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– डॉ. मयंक चतुर्वेदी

दिल्ली । लोकतंत्र में अपनी बात कहने का अधिकार हर नागरिक को है। सत्ता के फैसलों से असहमति हो, किसी संवैधानिक संस्था की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाना हो या चुनावी प्रक्रिया की शिकायत हो, जनता को आवाज उठाने का पूरा अधिकार है। मगर जब विरोध की कीमत वे लोग चुकाने लगें जिनका उस विवाद से कोई संबंध नहीं, तब आंदोलन के तरीके पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के 10 अक्टूबर के प्रदर्शन ने यही बहस देशभर में खड़ी कर दी है। पार्टी मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के विरोध में दिल्ली में प्रदर्शन कर रही है। राजधानी में संभावित भीड़, जाम और सुरक्षा चुनौतियों को देखते हुए रेलवे ने बड़े पैमाने पर ट्रेनें रद्द कीं और कई के समय व मार्ग बदले।

रेलवे ने नौ अक्टूबर को दोपहर दो बजे के बाद अपने मूल स्टेशनों से चलने वाली वे सभी मेल/एक्सप्रेस ट्रेनें रद्द कर दी गईं, जो 10 अक्टूबर को सुबह चार बजे से दोपहर दो बजे के बीच नई दिल्ली या हजरत निजामुद्दीन पहुंचने वाली थीं। उत्तर रेलवे की दिल्ली क्षेत्र में 170 यात्री ट्रेनें भी रद्द रहीं। कुल 245 ट्रेनों के रद्द होने की जानकारी आई है, जिनमें 75 मेल-एक्सप्रेस और 170 पैसेंजर गाड़ियां शामिल हैं। कई ट्रेनों के समय बदले गए और कुछ को बीच के स्टेशनों तक सीमित किया गया।

वस्‍तुत: स्टेशनों पर इसका असर साफ दिखा। जम्मू में यात्री फंसे रह गए। कानपुर में एक यात्री को दिल्ली के लिए सीधी ट्रेन न मिलने पर पहले 50-60 किलोमीटर बस से जाना और फिर ट्रेन पकड़ना पड़ा। एक युवक ने कहा कि टिकट पाना पहले ही कठिन है और अब कन्फर्म टिकट के बाद भी ट्रेन रद्द हो गई। बेंगलुरु से चलनेवाली ट्रेनों के भोपाल से रास्‍ता बदल दिया गया, जिन्‍हें आगे अपने घर पहुंचना था, मजबूरी में उन्‍हें बीच रास्‍ते में ट्रेन से उतरकर अब सड़क मार्ग से अपनी यात्रा करनी पड़ रही है। इस तरह से देश के कई राज्‍यों के मिलाकर लाखों यात्री परेशान हुए हैं। हर यात्री के साथ उसका परिवार, उसका काम और उसकी योजनाएं भी जुड़ी होती हैं, स्‍वभाविक है सबकुछ प्रभावित हुआ है।

अब जो लोग संविधान की दुहाई देकर यह सब कुछ देश भर में अराजकता का माहौल खड़ा करने का प्रयास कर रहे हैं, उनके लिए यहां यह भी देख लेते हैं कि संविधान क्‍या कहता है। संविधान का अनुच्छेद 19(1)(ए) अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है और 19(1)(बी) शांतिपूर्वक तथा बिना हथियार एकत्र होने का अधिकार। लेकिन अनुच्छेद 19(3) सार्वजनिक व्यवस्था के हित में इस पर युक्तियुक्त प्रतिबंध की व्यवस्था करता है। अनुच्छेद 51ए(आई) हर नागरिक का मौलिक कर्तव्य बताता है कि वह सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा करे और हिंसा से दूर रहे।

सर्वोच्च न्यायालय ने भी संतुलन की यही रेखा खींची है। रामलीला मैदान मामले (2012) में कहा गया कि शांतिपूर्ण सभा मौलिक अधिकार है, पर उस पर कानून सम्मत प्रतिबंध लग सकते हैं। मजदूर किसान शक्ति संगठन (2018) में प्रदर्शन के लिए निर्धारित स्थान और संतुलित नियमों की बात हुई। अमित साहनी बनाम पुलिस आयुक्त (2020), यानी शाहीन बाग मामले, में न्यायालय ने सार्वजनिक मार्गों पर अनिश्चितकालीन कब्जे को अस्वीकार्य बताया, इसलिए विरोध के अधिकार से अधिक महत्‍व इस बात का है कि उसके असर का परिणाम आखिर क्‍या सामने आता है।

वस्‍तुत: जिस यात्री की ट्रेन रद्द हुई, वह मरीज, बुजुर्ग, परीक्षार्थी, मजदूर या परिवार के साथ यात्रा करने वाला कोई भी हो सकता है। उसके लिए एक दिन की देरी नौकरी, इलाज या परीक्षा पर भारी पड़ सकती है। आंदोलन का उद्देश्य जनसमर्थन जुटाना होता है। यहां तो जिस जनता से समर्थन लेना है, वही परेशान होती हुई नजर आ रही है।

जिस मुद्दे को लेकर यह अराजकता देश में राहुल गांधी, सीजेपी एवं अन्‍य नेता फैला रहे हैं, उन्‍हें भी जानना चाहिए कि संविधान आखिर कहता क्‍या है, अनुच्छेद 324 मतदाता सूची तैयार करने और चुनाव के संचालन का अधीक्षण, निदेशन और नियंत्रण निर्वाचन आयोग को सौंपता है। अनुच्छेद 326 वयस्क मताधिकार का आधार है, जिसके तहत 18 वर्ष या उससे अधिक आयु के हर नागरिक को मतदाता बनने का अधिकार है, इसलिए पात्र का नाम सूची में रहना और अपात्र प्रविष्टियों का हटना, दोनों जरूरी हैं, और त्रुटिवश कटे नाम को सुधारने का अवसर भी हमेशा रहता ही है।

मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग का संवैधानिक पक्ष भी इन आन्‍दोलनजीवियों को देखना चाहिए । अनुच्छेद 324(5) के अनुसार उन्हें सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश की तरह ही संसद की निर्धारित प्रक्रिया से हटाया जा सकता है। यह व्यवस्था आयोग की स्वतंत्रता के लिए है। इसका अर्थ यह नहीं कि आयोग सवालों से परे है, पर इस्तीफे की मांग को प्रमाणों का आधार चाहिए। यदि किसी संगठन के पास पात्र मतदाताओं के नाम गलत तरीके से हटने के सबूत हैं, तो उन्हें सार्वजनिक किया जाना चाहिए। अनुच्छेद 32 सर्वोच्च न्यायालय और अनुच्छेद 226 उच्च न्यायालयों में सीधे जाने का रास्ता भी देता है। सड़क और अदालत, दोनों रास्ते साथ चल सकते हैं, पर तथ्य दोनों में जरूरी हैं।

आज हो क्‍या रहा है! जो संगठन मतदाताओं के अधिकारों की रक्षा का दावा करता है, उसके आचरण में आम नागरिकों के अधिकारों, यानी आने-जाने, इलाज पाने और समय पर पहुंचने के अधिकार, के प्रति भी संवेदनशीलता दिखनी चाहिए थी, वह गायब है।

लोकतंत्र में अधिकार मांगने वाले से यह अपेक्षा स्वाभाविक है कि वह दूसरों के अधिकारों का भी सम्मान करेंगे। दिल्ली के इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के संस्थापक अभिजीत दिपके, सह-संयोजक सौरव दास और प्रवक्ता आशुतोष रांका की हिरासत से जुड़ा घटनाक्रम इसे और खुलकर स्‍पष्‍ट करता है। ये सभी मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर के विरोध में जंतर-मंतर पर प्रदर्शन करने के लिए दिल्ली पहुंचे थे।

इस दौरान विमान में सवार दूसरे यात्रियों को भी इंतजार करना पड़ा। एक यात्री की नाराजगी में कहा कि वह नहीं जानता कौन है अभिजीत दिपके, लेकिन उसके कारण से हमें परेशानी उठानी पड़ रही है। यदि जनता को ही हर समस्या के समाधान के लिए संघर्ष करना है, तो न्यायालयों और स्थापित संस्थाओं की भूमिका क्या है?

वस्‍तुत: विमान में मौजूद यात्री की यह टिप्पणी कि जनता ही सब कुछ करेगी, तो न्‍यायालय बंद कर दी जाएं, मौजूदा परिस्थितियों पर तीखी प्रतिक्रिया है। इसमें व्यवस्था के प्रति आम नागरिक की अपेक्षा भी दिखती है। लोग चाहते हैं कि विवादों का समाधान निर्धारित प्रक्रियाओं के माध्यम से हो और सार्वजनिक जीवन सामान्य गति से चलता रहे।संविधान ने विभिन्न संस्थाओं को अलग-अलग जिम्मेदारियां सौंपी हैं। अत: आजजन का संदेश साफ है। विरोध कीजिए, मांगें मजबूती से रखिए, गड़बड़ी के आरोप हैं तो प्रमाण दीजिए और जिम्मेदार संस्थाओं से जवाब मांगिए, पर यह भी सुनिश्चित कीजिए कि आपकी लड़ाई का बोझ उन लाखों-करोड़ों नागरिकों पर न पड़े, जिनका उस विवाद से कोई संबंध ही नहीं है।

नाना पाटेकर – एक अप्रतिम अभिनेता की जीवन के रंगमंच से विदाई 

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लखनऊ । भारतीय सिने मंच के क्रांतिकारी नायक नाना पाटेकर की जीवन के रंगमंच से विदाई स्तब्ध करने वाली है। इसका समाचार आते ही सिने जगत सहित सिने प्रेमियों में शोक की लहर दौड़ गई। नाना पाटेकर का वास्तविक नाम विश्वनाथ पाटेकर था किंतु उनकी बहिन उन्हें नाना नाम से पुकारती थी और वे दर्शकों के बीच इसी नाम से लोकप्रिय हुए।
प्रधानमत्री नरेंद्र मोदी ने नाना को श्रद्धांजलि देते हुए कहा कि नाना पाटेकर का जीवन तिरंगे की आन बान और शान के लिए समर्पित रहा। वो बंधनो में नहीं रहे वरन एक परिंदे की तरह फिल्मों के आसमान में उड़े।नाना पाटेकर ने समाज में व्याप्त व्यवस्था पर अपनी फिल्मों के माध्यम से करारा प्रहार किया। वह एक ऐसे क्रांतिवीर थे जिन्होंने बुराइयों के विरोध में काम किया। उनकी वाणी जितनी तेज थी उनकी खामोशी उतनी ही प्रभावी थी। वह देश विरोधियों पर निरंतर अंकुश के समर्थक थे।
नाना पाटेकर हिंदी सिनेमा से भी पहले मराठी रंगमंच के नायक बन गए थे जिसके कारण भी सिनेमा जगत में उनकी लोकप्रियता तेजी से बढ़ी थी। नाना पाटेकर का अभिनय देखने के लिए लाइन लग जाती थी। फिल्मों में उनके संवाद दर्शकों को छू जाते थे व सोचने के लिए मजबूर भी कर देते थे। नाना ने अपनी प्रतिभा से सिनेमा जगत में एक अलग पहचान बनाई। नाना ने अपने फिल्मी कैरियर की शुरुआत 1978 में फिल्म गमन से की थी। इसके बाद सिंहासन, अंकुश, प्रतिघात, और सलाम बाम्बे जैसी लोकप्रिय फिल्में दीं। वर्ष 1992 में उन्हें अंगार फिल्म के लिए राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला। 1994 में क्रांतिवीर के लिए उन्हें राष्ट्रीय पुरस्कार और फिल्म फेयर मिला। नाना ने परिंदा, तिरंगा, अग्निसाक्षी, खामोशीःद म्यूजिकल, वेलकम, अपहरण और राजनीति जैसी फिल्मों में भी काम किया। उन्होंने सभी तरह की भूमिकाएँ एक जैसी सहजता से निभाईं। नाना हिंदी सिनेमा के नायक ही नहीं अपितु निर्देशक और लेखक भी बने। वर्ष 1991 में फिल्म ”प्रहार:द फाइनल अटैक“ से उन्होंने निर्देशन में कदम रखा।
नाना पाटेकर को 2013 में पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। 2013 में ही महाराष्ट्र सरकार द्वारा राज कपूर विशेष योगदान पुरस्कार से सम्मानित किया गया। पाटेकर एक मात्र ऐसे अभिनेता हैं जिन्होंने सर्वश्रेष्ठ अभिनेता ,सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता नेता और सर्वश्रेष्ठ खलनायक की श्रेणियों में फिल्मफेयर पुरस्कार जीते।नाना पाटेकर को 2015 व 2017 में मराठी फिल्म के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेता श्रेणी में फिल्मफेयर मराठी पुरस्कार मिला। उन्हें 2004 में बंगाल फिल्म पत्रकार संगठन का पुरस्कार भी मिला।
नाना पाटेकर सामाजिक जीवन में भी सक्रिय रहते थे।वह किसानों के मसीहा कहे जाते थे। नाना आतंकवाद के खिलाफ अत्यंत कड़ा रुख रखते थे। पहलगाम आतंकी हमले और ऑपरेशन सिंदूर के बाद जब भारत और पाकिस्तान के मध्य एशिया कप में होने वाले मैच का नाना पाटेकर ने आगे बढ़कर कड़ा विरोध करते हुए कहा था कि मुझे लगता है कि जिन्होंने हमारे लोगों का खून बहाया है तो हम उनके साथ क्यों खेलें?
एक बार नाना ने एक किस्सा सुनाते हुए बताया था कि उनके पास कार नहीं थी और उन्होंने कार खरीदने के लिए पैसे एकत्र किए थे। एक दिन उन्होंने समाचार में देखा कि सूखा व अकाल के कारण किसान आत्महत्या कर रहे हैं तब उन्होंने कार खरीदने का इरादा त्याग दिया और वह पीड़ित परिवार के घर पहुंच गए तथा कार खरीदने के लिए जो रुपए एकत्र किए थे वह किसानों के परिजनों को दे आए। बाद में उन्होंने किसानों की सहायता के लिए एक नाम फाडंडेशन की स्थापना भी की। उनकी संस्था आज भी किसानों की मदद कर रही है।ये संस्था सूखाग्रस्त क्षेत्रों में बेसहारा और जरूरतमंद किसानों की मदद करती है।संस्था गांवों में तालाबों को गहरा करने, नहरों की सफाई करनेऔर नदियों को पुनर्जीवित करने का काम करती है। वह किसानों के मुद्दों पर खूब चर्चा करते थे।
नाना पाटेकर चकाचौंध से दूर सादगी भरा जीवन व्यतीत करना पसंद करते थे। उनके फार्म हाउस में 12गाय दो बैल और पांच कुत्ते थे। उनके फार्म हाउस में खेती भी होती है। नाना पाटेकर एक सच्चे राष्ट्रभक्त थे और वह कारगिल युद्ध के समय वह 60 दिनों तक जवानों के साथ श्रीनगर, द्रास और लेह जैसे मुश्किल इलाकों में रहे थे । सेना के साथ गहरा जुड़ाव होने के कारण वह 1980 के दशक में टेरीटोरियल आर्मी में भी भर्ती हुए थे।
भारत का सिने जगत नाना जैसे बहु आयामी व्यक्तित्व को सदा स्मरण रखेगा।

भारत के मीडिया जगत को चाहिए एक समावेशी और सशक्त प्रेस काउंसिल

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नव ठाकुरीया

दिल्ली । भारत सरकार ने अपनी कानूनी और स्वायत्त संस्था—जो प्रिंट मीडिया की निगरानी और उसके अधिकारों की रक्षा करती है-में खाली पदों को भरने के लिए 13 मीडिया पेशेवरों को नामित किया है। इसके बाद दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में पत्रकार बिरादरी को अब बेहतर दिनों की उम्मीद है। प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया (PCI) को पूर्ण रूप से गठित न करने के कारण कई तरफ से कड़ी आलोचना झेलने के बाद, नई दिल्ली में केंद्र सरकार ने 7 अक्टूबर 2026 को 15वीं काउंसिल का पुनर्गठन किया। इसमें अखबारों और समाचार एजेंसियों से जुड़े छह संपादकों और सात कामकाजी पत्रकारों को शामिल किया गया। जस्टिस रंजना प्रकाश देसाई (सेवानिवृत्त) की अध्यक्षता वाली PCI में 14 सदस्य थे, जिनमें कानून निर्माता, बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI), यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (UGC), साहित्य अकादमी के प्रतिनिधि और कुछ अखबारों के मालिक शामिल थे। हैरानी की बात यह है कि 29 सदस्यों वाली 15वीं काउंसिल का कार्यकाल 18 दिसंबर 2027 को समाप्त हो जाएगा।

केंद्रीय सूचना और प्रसारण मंत्रालय की एक अधिसूचना में कहा गया, “प्रेस काउंसिल एक्ट, 1978 (1978 का 37) की धारा 5 की उप-धारा (3) के क्लॉज (a) और उप-धारा (5) तथा धारा 6 की उप-धारा (1) के तहत मिली शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए, केंद्र सरकार प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया के लिए इन सदस्यों को नामित करती है: संपादक—प्रदीप कुमार जैन, सैयद रज़ा हुसैन रिज़वी, अंकुर दुआ, अपर्णा शुक्ला, राज परवाना/नरेंद्र सिंह और विनोद बाजपेयी; और कामकाजी पत्रकार—विनोद कोहली, गीतार्थ पाठक, प्रज्ञानानंद चौधरी, किंगशुक प्रमाणिक, सीके नायक, प्रसन्न कुमार मोहंती और बिजोय काकचिंगताबम।”
लेकिन कई महीनों से अर्ध-न्यायिक PCI कामकाजी पत्रकारों (संपादकों सहित) की श्रेणी के प्रतिनिधियों के बिना ही काम कर रही थी। PCI को शुरू में 1966 में ‘प्रेस काउंसिल एक्ट, 1965’ के तहत बनाया गया था और बाद में दक्षिण एशियाई देश में मुख्यधारा की मीडिया की आजादी और गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए ‘प्रेस काउंसिल एक्ट, 1978’ के तहत 1979 में इसे फिर से स्थापित किया गया। जस्टिस आरपी देसाई, जिन्होंने 17 जून 2022 से 16 दिसंबर 2025 तक PCI चेयरमैन के तौर पर काम किया, उन्होंने 24 अप्रैल 2026 को एक बार फिर वही पद संभाला। सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त जज को तीन साल के एक और कार्यकाल के लिए नामित किया गया था। लेकिन PCI की 15वीं काउंसिल को पूरा करने के लिए काम करने वाले पत्रकारों का कोटा खाली ही रहा (http://www.presscouncil.nic.in/CurrentMemberPCI.aspx)।
कुछ महीने पहले, राज्यसभा (भारतीय संसद का ऊपरी सदन) के एक सदस्य ने यह मुद्दा उठाया था और सस्मित पात्रा ने नई दिल्ली में केंद्र सरकार से मौजूदा PCI को पूरा करने का आग्रह भी किया था, ताकि मीडिया पर नजर रखने वाली यह संस्था लोकतांत्रिक सिद्धांतों की रक्षा और मीडिया की जवाबदेही को मजबूत करने का अपना काम कर सके। ओडिशा से बीजू जनता दल के नेता पात्रा ने कहा कि एक आजाद, निष्पक्ष और जिम्मेदार प्रेस के लिए 14वीं काउंसिल (जिसका कार्यकाल 5 अक्टूबर 2024 को खत्म हो गया था) के बाद पूरी काउंसिल का गठन जरूरी था। इससे पहले, संबंधित मंत्रालय ने संसद को बताया था कि इन सदस्यों (काम करने वाले पत्रकारों की श्रेणी के तहत) के नामांकन की प्रक्रिया दिल्ली हाई कोर्ट में विचाराधीन थी।
चेयरपर्सन (आमतौर पर सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त जज को यह पद दिया जाता है) के अलावा, PCI में 28 सदस्य होते हैं, जिनमें से 13 सदस्य पेशेवर पत्रकारों का प्रतिनिधित्व करते हैं। छह सदस्य अखबारों के मैनेजमेंट (मालिकों सहित) का प्रतिनिधित्व करते हैं—इनमें बड़े, मध्यम और छोटे अखबारों से दो-दो सदस्य लिए जाते हैं—जबकि एक सदस्य समाचार एजेंसियों का प्रतिनिधित्व करता है। संसद के दोनों सदनों से आमतौर पर पांच सदस्य आते हैं और BCI, UGC और साहित्य अकादमी से तीन लोगों को नामित किया जाता है; साथ ही छोटे अखबारों का प्रतिनिधित्व करने वाले लोगों को भी काउंसिल में जगह मिलती है।
अब तक PCI में काम करने वाले सदस्यों में डॉ. सुधांशु त्रिवेदी, बृज लाल (राज्यसभा सांसद), डॉ. संबित पात्रा, नरेश गणपत म्हास्के और काली चरण मुंडा (लोकसभा सदस्य), प्रो. अश्विनी के. महापात्रा (UGC), मनन कुमार मिश्रा (BCI), डॉ. के. श्रीनिवासराव (साहित्य अकादमी), सुधीर कुमार पांडा, एम.वी. श्रेयम्स कुमार, गुरिंदर सिंह, अरुण कुमार त्रिपाठी, ब्रज मोहन शर्मा और आरती त्रिपाठी (ये सभी बड़े, मध्यम या छोटे अखबारों के मालिक हैं या उनके मैनेजमेंट का काम देखते हैं) शामिल रहे हैं।
PCI के लिए संकट तब शुरू हुआ जब कुछ राष्ट्रीय पत्रकार संगठनों (जिनमें इंडियन जर्नलिस्ट्स यूनियन और ऑल इंडिया वर्किंग न्यूज़ कैमरामैन एसोसिएशन शामिल हैं) ने PCI के नियमों में बदलाव का कानूनी तौर पर विरोध किया। इस बदलाव के तहत, वर्किंग जर्नलिस्ट्स के राष्ट्रीय मंच के बजाय अलग-अलग प्रेस क्लबों से सदस्य चुने जाने थे। उनका तर्क है कि प्रेस क्लब मूल रूप से मनोरंजन के लिए बने संगठन हैं और उनका दायरा आमतौर पर किसी खास इलाके, शहर या कस्बे तक ही सीमित होता है। कई प्रेस क्लब अपना प्रभाव बढ़ाने के लिए गैर-पत्रकारों (जैसे शिक्षाविदों, लेखकों, फिल्मी हस्तियों और राजनयिकों) को भी सदस्यता देते हैं; इसलिए, हो सकता है कि उनके सदस्य कई अहम मौकों पर पेशेवर मीडिया कर्मियों के हितों के साथ सही न्याय न कर पाएं।
भारत का प्रिंट मीडिया जगत बहुत बड़ा है, जिसमें ‘रजिस्ट्रार ऑफ न्यूज़पेपर्स फॉर इंडिया’ द्वारा मान्यता प्राप्त 1,00,000 से ज्यादा प्रकाशन शामिल हैं, जो अलग-अलग भाषाओं और समय-अंतराल (जैसे दैनिक, साप्ताहिक आदि) पर प्रकाशित होते हैं। एक अरब से ज्यादा आबादी वाले इस देश में लगभग 400 सैटेलाइट न्यूज चैनल भी हैं, साथ ही हजारों पोर्टल, व्हाट्सऐप चैनल और अन्य डिजिटल मीडिया आउटलेट भी मौजूद हैं। कोविड-19 महामारी के बाद, जब वैकल्पिक मीडिया ने फाइनेंशियल मार्केट पर कब्जा करना शुरू किया, तो भारतीय अखबारों की कमाई (बिक्री और विज्ञापन दोनों से) लगातार घटती गई। हालांकि, प्रिंट मीडिया पर नजर रखने वाले कई लोगों का मानना है कि पारंपरिक मीडिया धीरे-धीरे अपने अचानक हुए नुकसान से उबर जाएगा। पाठकों की संख्या में फिर से बढ़ोतरी की उम्मीद है क्योंकि डिजिटल थकान से परेशान उपभोक्ता जल्द ही भरोसेमंद जानकारी के लिए प्रिंट मीडिया की ओर लौटेंगे। अनुमान है कि 2030 तक भारतीय प्रिंट मीडिया के पाठकों की संख्या लगभग दोगुनी हो जाएगी।
सबसे बड़ी विडंबना यह है कि PCI के पास किसी भी अखबार/न्यूज़ एजेंसी या संपादक/काम करने वाले पत्रकार के खिलाफ शिकायतें स्वीकार करने का अधिकार है, अगर वे पेशेवर दुर्व्यवहार करते हैं, जिससे पत्रकारिता के व्यवहार का स्तर गिरता है। हालांकि, दिशा-निर्देशों के उल्लंघन के लिए प्रिंट आउटलेट और उनके संपादकों व पत्रकारों को दंडित करके अपने दिशा-निर्देशों को लागू करने की उसकी शक्ति सीमित है। कई मीडिया पेशेवर PCI को फिर से संगठित करने (इसका नाम बदलकर ‘मीडिया काउंसिल ऑफ इंडिया’ करने) की मांग कर रहे हैं, ताकि टेलीविजन चैनल, रेडियो और डिजिटल प्लेटफॉर्म भी इसके अधिकार क्षेत्र में आ सकें।
चूंकि प्रेस काउंसिल को यह देखने का अधिकार है कि क्या प्रेस की गारंटीकृत आजादी के संबंध में किसी सरकार का आचरण उचित है या नहीं, इसलिए पत्रकार समुदाय एक ऐसी काउंसिल की मांग कर रहा है जो ज्यादा अधिकार-संपन्न हो और जिसका दायरा बड़ा हो।

खाद्य पदार्थों के उपभोग में पूरे विश्व को आज भारत जैसे संयम की आवश्यकता है 

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दिल्ली । वर्ल्ड वाइड फंड फार नेचर (WWF) जिसे विश्व वन्यजीव कोष भी कहा जाता है, के एक प्रतिवेदन में बताया गया है कि विश्व यदि भारत की तरह खाद्य पदार्थों की खपत करता है तो प्रकृति द्वारा इस धरा पर उपलब्ध कराई गई खाद्य सामग्री की आपूर्ति को वर्ष 2050 तक पर्याप्त मात्रा में सुनिश्चत किया जा सकता है। परंतु, विश्व में यदि अर्जेंटीना की तरह खाद्य सामग्री का उपभोग किया जाता है तो खाद्य पदार्थों की आपूर्ति हेतु इस एक धरा से काम चलने वाला नहीं हैं बल्कि वर्ष 2050 तक इसी प्रकार की 7.42 पृथ्वियों की आवश्यकता होगी। इसी क्रम में, कई प्रमुख देशों में खाद्य पदार्थों के उपभोग को ध्यान में रखकर उक्त रिपोर्ट में यह आंकलन करने का प्रयास किया गया है कि यदि पूरा विश्व इन देशों की तरह ही खाद्य पदार्थों का उपभोग करना प्रारम्भ कर दे तो वर्ष 2050 तक विश्व को कितनी पृथ्वियों की आवश्यकता होगी। भारत की तरह खाद्य पदार्थों का सेवन करने पर 0.84 पृथ्वियों की आवश्यकता होगी और इंडोनेशिया की तरह खाद्य पदार्थों का उपभोग करने पर 0.90 पृथ्वियों की आवश्यकता होगी इसी प्रकार, चीन की तरह – 1.77 पृथ्वी; जापान की तरह – 1.86 पृथ्वी; सऊदी अरब की तरह – 2.08 पृथ्वी; तुर्की की तरह – 2.11 पृथ्वी; दक्षिण कोरीया की तरह – 2.30 पृथ्वी; दक्षिण अफ्रीका की तरह – 2.94 पृथ्वी; मेक्सिको की तरह – 3.03 पृथ्वी; जर्मनी की तरह – 3.36 पृथ्वी; रूस की तरह – 3.42 पृथ्वी; यूरोपीय यूनियन की तरह – 3.52 पृथ्वी; यूके की तरह – 3.98 पृथ्वी; कनाडा की तरह – 4.50 पृथ्वी; इटली की तरह – 4.64 पृथ्वी; फ्रान्स की तरह – 5.02 पृथ्वी; ब्राजील की तरह – 5.21 पृथ्वी; अमेरिका की तरह – 5.55 पृथ्वी; ऑस्ट्रेलिया की तरह – 6.83 पृथ्वी एवं अर्जेंटीना की तरह – 7.42 पृथ्वियों की आवश्यकता होगी।

दरअसल, भारत में सनातन संस्कृति के संस्कारों के अंतर्गत खाद्य सामग्री के संयमित उपयोग को महत्व प्रदान किया जाता है, जिससे खाद्य पदार्थों का निर्माण आवश्यकता के अनुसार ही किया जाता है और इसकी बर्बादी को रोकने के भरपूर प्रयास किए जाते हैं। दूसरे, संयुक्त परिवार के चलते चार सदस्यों के साथ पांचवा सदस्य अथवा मेहमान भी समयोजित हो जाता है। अतः खाद्य पदार्थों का सर्वोत्तम उपयोग सम्भव होता है। बचपन में ही नागरिकों में यह संस्कार दिए जाते हैं कि पृथ्वी से उतना ही लें जितना आवश्यक है, अर्थात, प्रकृति का शोषण नहीं करें। तीसरे, भारत में शाकाहार का अनुपालन करने वाले नागरिकों की संख्या बहुत अधिक है एवं मांसाहार का उपयोग भी सीमित मात्रा में ही किया जाता है, जिससे पशु एवं पक्षियों की संख्या पर किसी प्रकार का विपरीत प्रभाव नहीं दिखाई देता है।

स्वामी विवेकानंद जी वर्ष 1893 से 1897 के बीच चार वर्षों तक सनातन संस्कृति के संस्कारों से पश्चिमी देशों के नागरिकों को अवगत कराने के उद्देश्य से पश्चिमी देशों में प्रवास पर गए थे। उस खंडकाल में भारतीय संस्कारों के प्रति पश्चिमी जगत में कई प्रकार की भ्रांतियां थीं। इन भ्रांतियों को दूर करने में उन्हें बहुत सफलता मिली थी। अमेरिका में आयोजित धर्म संसद में तो स्वामी विवेकानंद जी के उदबोधन, जिसकी शुरुआत, “अमेरिका में मेरे प्रिय भाईयों और बहनों” कहने भर से लगभग 3 मिनिट तक तालियां बजाकर, नागरिकों ने उनका अभिवादन किया था। इसी क्रम में, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के परमपूज्य सर संघचालक डा मोहन भागवत जी भी हाल ही में अमेरिका, कनाडा एवं ब्रिटेन देशों की यात्रा पर सनातन संस्कृति के संस्कारों से इन देशों के नागरिकों को अवगत कराने के उद्देश्य से प्रवास पर गए थे। डॉक्टर साहब ने प्रकृति का दोहन करने एवं शोषण नहीं करने का विषय भी वैश्विक स्तर पर पर्यावरण की लगातार बिगड़ रही स्थिति को सम्हालने के संदर्भ में उठाया था। डा भागवत जी ने अपने प्रवास के दौरान इस बात की चर्चा भी की है कि सनातन संस्कृति के संस्कारों का अनुपालन कर न केवल भारत बल्कि पूरे विश्व की समस्याओं का हल निकाला जा सकता है।

विकसित देशों में पूंजीवाद की व्यवस्था के चलते नागरिकों में “मैं” की भावना रहती है एवं वे केवल अपने विकास की बात करते दिखाई देते हैं एवं पदार्थों का अधिकतम उपभोग करते हैं। ईसाई एवं इस्लाम धर्मों में पुनर्जन्म की व्यवस्था पर विश्वास नहीं किया जाता है एवं जो कुछ करना है इसी जन्म में भोगना है, अर्थात जो कुछ करना है आज ही करना है कल किसने देखा है, की मानसिकता से अपना जीवन यापन करते हैं, जिससे पदार्थों का उपभोग उच्च स्तर तक जाकर करते हैं। इसके विपरीत भारतीय नागरिक “हम” की भावना के साथ परिवार के बीच मिलकर रहते हैं। उपभोक्ता के रूप में विभिन्न पदार्थों की प्रति व्यक्ति खपत विकसित देशों की तुलना में भारत में बहुत कम है और सनातन संस्कृति में पुनर्जन्म की व्यवस्था पर विश्वास किया जाता है, जिसके चलते भारतीय नागरिक पदार्थों का उपभोग संयम के साथ करते हैं। भारतीय मनीषी एवं विद्वान भी समय समय पर वैश्विक स्तर पर विभिन्न देशों को आगाह करते रहते हैं कि “भोगवादी” बनने के स्थान पर संयमित होकर पदार्थों का उपभोग किया जाना चाहिए। भारत के वेदों एवं पुराणों में भी यह उपदेश दिया गया है कि नागरिकों द्वारा किए जाने वाले “कर्म” एवं “काम”, “धर्म” आधारित होने चाहिए एवं संयमित होकर करना चाहिए।

विश्व वन्यजीव कोष की स्थापना 29 अप्रेल 1961 में ग्लैंड, स्विट्जरलैंड में की गई थी। यह एक अंतरराष्ट्रीय गैर सरकारी संगठन है। स्थापना के समय इसके मुख्य उद्देश्यों में शामिल था – पर्यावरण संरक्षण करना, लुप्तप्राय प्रजातियों और उनके प्राकृतिक आवासों की रक्षा करना, वनों, मीठे पानी के स्त्रोतों (नदियों) और महासागरों का संरक्षण करना, आदि। आज यह संगठन विश्व के 100 से अधिक देशों में लगभग 1300 संरक्षण एवं पर्यावरण से जुड़ी परियोजनाओं पर कार्य कर रहा है। वन्यजीव सप्ताह 2026 के अवसर पर अपने संदेश में, भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी ने कहा है कि वनों एवं वन्यजीवों की सुरक्षा प्रकृति के संतुलन को बनाए रखने और आने वाली पीढ़ियों के लिए एक मूल्यवान विरासत को सुरक्षित रहखने हेतु आवश्यक है। आपने नागरिकों से वन्यजीवों और उनके आवासों की रक्षा में योगदान देने का आग्रह किया है। आपने कहा है कि जानवरों की सुरक्षित आवाजाही और पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने के लिए जुड़े हुए आवास और वन्यजीव गलियारे आवश्यक हैं। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार, राज्यों के सहयोग से, वन्यजीव गलियारों की पहचान और संरक्षण के लिए निरंतर कार्य कर रही है। प्रकृति में संतुलन बनाए रखने के लिए समस्त जीवों का पर्याप्त मात्रा में इस धरा पर रहना आवश्यक है। अन्यथा, कई देशों में तो जीवों की प्रजातियां आज विलुप्त होने की कगार पर पहुंच गई हैं और कई प्रजातियां तो विलुप्त भी हो गई हैं क्योंकि कई देशों में मांसाहार का अत्यधिक मात्रा में सेवन किया जाता है, जबकि भारत में शाकाहारी भोजन की मांग अधिक रहती है। एक अनुमान के अनुसार, भारत में सबसे अधिक वनस्पति एवं जीवों की प्रजातियां पाई जाती हैं। नए जंगलों का विकास भी भारत में सबसे अधिक मात्रा में हो रहा है। भारत में तो पशु, पक्षियों, नदियों एवं पहाड़ों की पूजा की जाती है इसीलिए भारतीय नागरिकों को प्रकृतिप्रेमी की संज्ञा दी जाती है।

प्रतिवर्ष विश्व वन्यजीव कोष द्वारा वन्यजीव दिवस मनाया जाता है। वर्ष 2026 का विषय – जैव विविधता – भारत के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। भारत जैव विविधता से समृद्ध विश्व के 17 विशाल देशों में से एक है और विश्व की जैव विविधता का 7 प्रतिशत भाग इसी देश में हैं। यहां 15 कृषि जलवायु क्षेत्र, 45,000 विभिन्न पौधों की प्रजातियां हैं जिनमें से 15,000 औषधीय पौधे हैं। इनमे से लगभग 8,000 प्रजातियों का उपयोग भारतीय चिकित्सा प्रणालियों और लोक चिकित्सा प्रणालियों में किया जाता है। भारत के लगभग 70 प्रतिशत औषधीय और सुगंधित पौधे पश्चिमी और पूर्वी घाट, हिमालय और अरावली क्षेत्र के ऊष्णकटिबंधीय जंगलों में पाए जाते हैं। भारतीय वनस्पति सर्वेक्षण ने 5,250 से अधिक पौधों की प्रजातियों की पहचान की है और विभिन्न रोगों के सम्बंध में उपयोग के लिए 9,567 से अधिक लोक दावों का प्रलेखन किया है। भारत इस समृद्ध विरासत की रक्षा के लिए कड़े कदम उठा रहा है।

औषधीय और सुगंधित पौधों की अपनी विरासत को बचाने में भारत की जड़ें गहरी और दूरदर्शितापूर्ण हैं। पश्चिमी घाट के जंगलों से लेकर विदर्भ के खेतों तक, प्राचीन आयुर्वेदिक ज्ञान से लेकर ई-चरक जैसे आधुनिक डिजिटल प्लेटफार्म तक, देश संरक्षण, आजीविका और स्वास्थ्य सेवाओं को एक मजबूत सूत्र में पिरो रहा है। प्रतिबद्ध संस्थानों, सशक्त समुदायों और समावेशी नीतियों के साथ, भारत न केवल अपनी हरित संपदा को संरक्षित कर रहा है, बल्कि इसे आने वाली पीढ़ियों के लिए अच्छे स्वास्थ्य, गौरव और समृद्धि के स्त्रोत में बदल रहा है।

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