अब समय आ गया है कि आगरा को यूनेस्को विश्व धरोहर नगर का दर्जा मिले

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आगरा : किसी शहर को अपनी महानता साबित करने के लिए और क्या चाहिए?
तीन विश्व धरोहर स्मारक? हजारों वर्षों का इतिहास? ऐसी सांस्कृतिक विरासत जिसने साम्राज्यों, धर्मों, कला, स्थापत्य, संगीत, खानपान और सभ्यता को आकार दिया हो?
अगर यही कसौटी है, तो आगरा यह परीक्षा बहुत पहले पास कर चुका है।
फिर भी विडंबना देखिए। ताजमहल के शहर को आज भी विश्व धरोहर नगर के रूप में पहचान नहीं मिल सकी है। दूसरी ओर अतिक्रमण बढ़ रहे हैं, ऐतिहासिक क्षेत्रों का स्वरूप बिगड़ रहा है और नागरिकों में अपनी धरोहर के प्रति गर्व की भावना लगातार कमजोर पड़ रही है।
आगरा आज एक चौराहे पर खड़ा है।
एक रास्ता अव्यवस्थित शहरीकरण, प्रदूषण और विरासत के क्षरण की ओर जाता है। दूसरा रास्ता संरक्षण, सांस्कृतिक गौरव, टिकाऊ पर्यटन और वैश्विक पहचान की ओर।
चुनाव कठिन नहीं होना चाहिए।
दशकों से सरकारें स्मारकों की सुरक्षा पर सैकड़ों करोड़ रुपये खर्च करती रही हैं। लेकिन उन स्मारकों को जन्म देने वाले पूरे शहर की अनदेखी होती रही है। ताजमहल अकेले नहीं बच सकता। विरासत केवल संगमरमर की एक इमारत नहीं होती। विरासत पूरे सांस्कृतिक परिदृश्य का नाम है।
ताजगंज की गलियों में चलिए। सिकंदरा, एतमादुद्दौला, दिल्ली गेट या फतेहपुर सीकरी का चक्कर लगाइए। हर जगह एक दर्दनाक विरोधाभास दिखाई देता है। एक ओर भव्य इतिहास खड़ा है, दूसरी ओर अतिक्रमण, कूड़े के ढेर, अव्यवस्थित निर्माण और बदहाल नागरिक व्यवस्था।
ऐतिहासिक क्षेत्रों के आसपास अतिक्रमण लगातार बढ़ रहे हैं। नोटिस जारी होते हैं, सर्वेक्षण होते हैं, समितियाँ बनती हैं, लेकिन जमीन पर बदलाव बहुत कम दिखाई देता है।
नतीजा सबके सामने है।
जो शहर दुनिया की सबसे बड़ी ऐतिहासिक धरोहरों में गिना जाना चाहिए, वह अपनी पहचान बचाने के लिए संघर्ष कर रहा है।
पर्यावरणीय संकट ने स्थिति और गंभीर बना दी है।
यमुना, जिसने आगरा की सभ्यता को जन्म दिया और ताजमहल की सुंदरता को निखारा, आज दम तोड़ती दिखाई देती है। कभी जीवनदायिनी रही यह नदी अब कई जगह सूखी और बीमार नजर आती है। सूखे नदी तल से उड़ती धूल और रेत हवा को प्रदूषित कर रही है। वाहनों की बढ़ती संख्या स्थिति को और खराब बना रही है।
क्या कोई विरासत नगर अपनी जीवनरेखा नदी के बिना जीवित रह सकता है?
यह सवाल केवल पर्यावरण का नहीं, आगरा के भविष्य का है।
विडंबना यह भी है कि स्मार्ट सिटी बनने की दौड़ में कहीं न कहीं आगरा की ऐतिहासिक पहचान दांव पर लग गई है। नई सड़कें, फ्लाईओवर और व्यावसायिक परियोजनाएँ अपनी जगह महत्वपूर्ण हैं, लेकिन विकास ऐसा होना चाहिए जो इतिहास को कुचल कर आगे न बढ़े।
यहीं पर विश्व धरोहर नगर की अवधारणा अधिक सार्थक दिखाई देती है।
यह मांग नई नहीं है।
पर्यावरणविदों, इतिहासकारों और संरक्षण कार्यकर्ताओं ने वर्षों पहले केंद्र सरकार से आगरा को यूनेस्को विश्व धरोहर नगर का दर्जा दिलाने की मांग की थी। सर्वोच्च न्यायालय ने भी ताज ट्रेपेजियम क्षेत्र के लिए एक दृष्टि दस्तावेज तैयार करने का निर्देश दिया था। स्कूल ऑफ प्लानिंग एंड आर्किटेक्चर ने आगरा की विरासत संरक्षण के लिए विस्तृत सुझाव भी तैयार किए।
लेकिन फाइलें आगे नहीं बढ़ीं।
सबसे बड़ी बात यह है कि आगरा का दावा केवल ताजमहल, आगरा किला और फतेहपुर सीकरी तक सीमित नहीं है।
यह शहर भारत की साझा सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत का जीवंत प्रतीक है।
यमुना किनारे बसे बटेश्वर के प्राचीन शिव मंदिर इस क्षेत्र को भारत की सबसे पुरानी धार्मिक परंपराओं से जोड़ते हैं। ब्रज संस्कृति और भक्ति आंदोलन ने यहां की मिट्टी को आध्यात्मिक ऊर्जा दी।
फतेहपुर सीकरी में सम्राट अकबर ने दीन-ए-इलाही के माध्यम से विभिन्न धर्मों के बीच संवाद का प्रयोग किया। आगरा के ऐतिहासिक चर्च ईसाई विरासत की कहानी कहते हैं। सिकंदरा के निकट गुरु का ताल धार्मिक स्वतंत्रता के लिए सिख बलिदान की याद दिलाता है। राधास्वामी मत का जन्म भी इसी शहर में हुआ, जिसके अनुयायी आज पूरी दुनिया में हैं।
दुनिया में बहुत कम शहर ऐसे हैं जहाँ इतनी विविध आध्यात्मिक परंपराएँ एक साथ सांस लेती हों।
आगरा केवल मुगलों का शहर नहीं है।
यह भारत की हजारों वर्षों पुरानी सांस्कृतिक यात्रा का जीवंत दस्तावेज है।
मध्यकाल में आगरा को लंदन और पेरिस से भी बड़ा और अधिक विश्वनगरीय शहर बताया गया था। दुनिया भर से व्यापारी, विद्वान, कलाकार और यात्री यहां आते थे। यह शहर विविधताओं को आत्मसात करता था, लेकिन अपनी आत्मा नहीं खोता था।
वह आत्मा आज भी जीवित है।
पुरानी मंडियों में, पारंपरिक शिल्प में, स्थानीय व्यंजनों में, त्योहारों में, पुरानी हवेलियों में, मंदिरों, मस्जिदों, चर्चों, गुरुद्वारों और नदी किनारे बसे ऐतिहासिक मोहल्लों में।
लेकिन केवल जीवित रहना पर्याप्त नहीं है।
विरासत को बचाना, संजोना और आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाना भी जरूरी है।
विश्व धरोहर नगर का दर्जा आगरा को अंतरराष्ट्रीय पहचान देगा। इससे संरक्षण परियोजनाओं को गति मिलेगी, बेहतर शहरी नियोजन संभव होगा और सबसे महत्वपूर्ण, स्थानीय लोगों में अपनी विरासत के प्रति गर्व की भावना पैदा होगी।
आज आगरा की सबसे बड़ी समस्या स्मारकों की कमी नहीं है।
समस्या है विरासत चेतना की कमी।
लोग सदियों पुराने भवनों के पास से गुजर जाते हैं, लेकिन उनकी ऐतिहासिक महत्ता से अनजान रहते हैं। स्कूलों, कॉलेजों और समाज में धरोहर शिक्षा को मजबूत करने की जरूरत है।
हेरिटेज वॉक, सांस्कृतिक उत्सव, संरक्षण अभियान और जनजागरूकता कार्यक्रमों के माध्यम से लोगों को अपनी जड़ों से जोड़ा जा सकता है।
आगरा केवल वह शहर नहीं होना चाहिए जहाँ पर्यटक कुछ घंटे बिताकर आगे बढ़ जाएँ।
आगरा को एक जीवंत विरासत नगर के रूप में पहचाना जाना चाहिए, जिसकी कहानी आज भी दुनिया को प्रेरित करती है।
नीति निर्माताओं के सामने सवाल सीधा है।
यदि तीन विश्व धरोहर स्मारकों, अद्वितीय सांस्कृतिक विरासत, बहुधार्मिक आध्यात्मिक परंपरा और वैश्विक ऐतिहासिक महत्व वाला आगरा विश्व धरोहर नगर बनने योग्य नहीं है, तो फिर कौन सा भारतीय शहर है?
अब रिपोर्टों और आश्वासनों का समय बीत चुका है।
अब कार्रवाई का समय है।
यमुना को पुनर्जीवित कीजिए। अतिक्रमण हटाइए। पुराने मोहल्लों और बाजारों को संरक्षित कीजिए। विरासत चेतना जगाइए। शहर के गौरव को पुनर्स्थापित कीजिए।
और मिलकर वह मांग उठाइए जिसका आगरा लंबे समय से हकदार है।
सिर्फ स्मार्ट सिटी नहीं।
दुनिया के महानतम विरासत नगरों में सम्मानजनक स्थान।

गर्मियों की छुट्टी का मजा, रोमांच हुआ गायब

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लखनऊ: वे भी क्या दिन थे।
गर्मी की छुट्टियां शुरू होते ही बच्चों की दुनिया बदल जाती थी। कोई नानी के घर भागता था, कोई दादा-दादी के गांव। कोई पहाड़ों में ट्रेकिंग करता, कोई आम के बागों में चढ़ जाता। दोपहरें कॉमिक्स पढ़ते गुजरती थीं। शामें गिल्ली-डंडा, पतंगबाजी और बेवजह की शरारतों में बीतती थीं।
घड़ी का कोई महत्व नहीं था। कोई लक्ष्य नहीं था। कोई प्रदर्शन नहीं था। छुट्टियां आत्मा की मरम्मत का मौसम थीं।
फिर भारत बदल गया।
अब गर्मी की छुट्टियां भी बच्चों की नहीं रहीं।
सुबह स्विमिंग क्लास। फिर क्रिकेट अकादमी। फिर गिटार सीखना। फिर डांस क्लास। फिर कोडिंग कोर्स। फिर स्पोकन इंग्लिश। शाम को ऑनलाइन वर्कशॉप।
बच्चा स्कूल से छुट्टी पाता है, लेकिन बचपन से नहीं।
आज भारत में जन्म लेते ही प्रतिस्पर्धा शुरू हो जाती है। डेढ़-दो साल के बच्चों को प्ले स्कूल भेजा जा रहा है, जब वे ठीक से बोलना भी नहीं सीख पाए होते। मध्यमवर्गीय परिवार सालाना पचास हजार से एक लाख रुपये तक फीस भर रहे हैं। माता-पिता को डर है कि कहीं उनका बच्चा दौड़ में पीछे न रह जाए।
और यह डर काल्पनिक नहीं है।
भारत में अवसर सीमित हैं और दावेदार करोड़ों। अच्छी नौकरियां कम हैं। सरकारी नौकरियां और भी कम। प्रतिष्ठित कॉलेजों में सीटें मुट्ठी भर हैं। यही वजह है कि कोचिंग संस्कृति एक समानांतर शिक्षा व्यवस्था बन चुकी है। बच्चा स्कूल में पढ़ता है, फिर कोचिंग में पढ़ता है, फिर टेस्ट सीरीज में बैठता है। उसकी पूरी किशोरावस्था प्रतियोगिता की प्रयोगशाला बन जाती है।
लेकिन अब यह होड़ केवल पढ़ाई तक सीमित नहीं है।
खेल भी कमाई का नया टिकट बन गए हैं।
माता-पिता क्रिकेटरों की करोड़ों की नीलामी देखते हैं। ओलंपिक पदक विजेताओं को मिलने वाले नकद पुरस्कार देखते हैं। सरकारी नौकरियां और विज्ञापन अनुबंध देखते हैं। फिर वे अपने बच्चों को खेल अकादमियों में भेज देते हैं। खेल अब स्वास्थ्य, आनंद और मित्रता का माध्यम कम, करियर की रणनीति अधिक बनता जा रहा है।
सच यह है कि कुछ बच्चे सितारे बनेंगे, लेकिन लाखों नहीं। हर सफल खिलाड़ी के पीछे हजारों ऐसे बच्चे होंगे जो वर्षों का समय, मेहनत और उम्मीदें लगाकर भी मंजिल तक नहीं पहुंच पाएंगे।
इसी बीच मनोरंजन उद्योग ने भी बचपन को बाजार में उतार दिया है।
गायन प्रतियोगिताएं, नृत्य प्रतियोगिताएं, टैलेंट शो और क्विज कार्यक्रम बच्चों को सफलता के शॉर्टकट के रूप में बेच रहे हैं। माता-पिता ऑडिशन दर ऑडिशन भटक रहे हैं। बच्चे कैमरों, जजों और वोटिंग के दबाव में बड़े हो रहे हैं।
कुछ को शोहरत मिलती है। कुछ को पुरस्कार मिलते हैं। लेकिन अधिकांश बच्चे कुछ वर्षों बाद गुमनामी में लौट आते हैं। पीछे छूट जाती है थकान, निराशा और खोया हुआ बचपन।
सबसे दुखद बात यह है कि बच्चों के पास अब खाली समय नहीं बचा।
खाली समय, जिसे आधुनिक समाज लगभग अपराध मानने लगा है।
किताबें पढ़ना समय की बर्बादी समझा जाता है। पेड़ों पर चढ़ना अनुपयोगी गतिविधि बन गया है। दादा-दादी और नाना-नानी की कहानियां किसी पाठ्यक्रम का हिस्सा नहीं हैं। गांव की गलियां, खेतों की पगडंडियां, रिश्तेदारों के घरों की चहल-पहल और बेफिक्र आवारागर्दी अब धीरे-धीरे स्मृतियों का हिस्सा बनती जा रही हैं। जिन बच्चों को कुछ नहीं करना वो मोबाइल वाचिंग करते हैं, या रील बनाते हैं।
हर शौक को करियर में बदला जा रहा है। गाना सीखो ताकि स्टार बनो। नाचो ताकि टीवी पर आ सको। खेलो ताकि करोड़पति बन सको। कोडिंग सीखो ताकि नौकरी मिल सके। अंग्रेजी सीखो ताकि इंटरव्यू निकल जाए।
मानो जीवन का हर क्षण किसी भविष्य की कमाई में निवेश किया जाना चाहिए।
पैसे की चमक इतनी तेज हो गई है कि बचपन उसकी रोशनी में धुंधला पड़ गया है।
समस्या खेल, संगीत, पढ़ाई या प्रतियोगिताओं में नहीं है। समस्या उस मानसिकता में है जो हर बच्चे को एक परियोजना, एक निवेश और एक संभावित आय स्रोत की तरह देखने लगी है।
माता-पिता दोषी नहीं हैं। वे डरे हुए हैं। महंगाई बढ़ रही है। रोजगार अनिश्चित हैं। भविष्य धुंधला है। वे अपने बच्चों के लिए सुरक्षा चाहते हैं।
लेकिन इस प्रक्रिया में एक बड़ा सवाल अनुत्तरित रह जाता है।
यदि बच्चा बचपन में ही थक गया, तो वह जीवन कब जिएगा?
यदि छुट्टियां भी प्रशिक्षण शिविर बन गईं, तो यादें कहां बनेंगी?
यदि हर प्रतिभा का मूल्य रुपये में तय होगा, तो खुशी का मूल्य कौन तय करेगा?
शायद हमारे समय की सबसे बड़ी त्रासदी यही है।
हम बच्चों को भविष्य के लिए तैयार करते-करते उनका वर्तमान छीन रहे हैं।
और एक दिन जब वे सफल होकर पीछे मुड़कर देखेंगे, तो शायद पूछेंगे:
वे गर्मियां कहां चली गईं, जिनमें जिंदगी कमाई नहीं, खुशियां हुआ करती थी?

बेतिया कोर्ट में प्रशांत किशोर को समन: 125 करोड़ की मानहानि याचिका में 15 जुलाई को पेश होंगे पीके

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बेतिया। पश्चिम चंपारण के भाजपा सांसद डॉ. संजय जायसवाल ने जन सूरज पार्टी के सूत्रधार प्रशांत किशोर पर 125 करोड़ रुपये की मानहानि का मुकदमा दायर किया है। बेतिया सिविल कोर्ट के मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी (CJM) श्री आनंद कुमार त्रिपाठी ने मामले की सुनवाई करते हुए प्रशांत किशोर को 15 जुलाई को अदालत में व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होकर अपने आरोपों को सिद्ध करने का नोटिस जारी किया है।
प्रशांत किशोर ने अपनी सार्वजनिक सभाओं और प्रेस कॉन्फ्रेंस में डॉ. संजय जायसवाल को “टूटपुंजिया नेता” कहा था। जबकि हकीकत यह है कि डॉ. जायसवाल चार बार लोकसभा सांसद चुने जा चुके हैं। वे लोकसभा में भाजपा के मुख्य सचेतक, छह प्रदेशों के प्रभारी और पूर्व प्रदेश अध्यक्ष भी रह चुके हैं। वहीं प्रशांत किशोर ने खुद राघवपुर विधानसभा सीट से चुनाव लड़ने की घोषणा कर हार के डर से मैदान छोड़ दिया। सवाल उठता है कि चार बार का निर्वाचित सांसद “टूटपुंजिया” हो सकता है या चुनाव से भागने वाला नेता?
दूसरा गंभीर आरोप बेतिया छावनी ओवरब्रिज के अलाइनमेंट बदलवाने का था। प्रशांत किशोर ने दावा किया कि सांसद ने अपने निजी पेट्रोल पंप के फायदे के लिए अलाइनमेंट बदला। लेकिन भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) की लिखित जांच रिपोर्ट साफ कहती है कि अलाइनमेंट में कोई बदलाव नहीं हुआ।
तीसरा आरोप नगर निगम के ईंधन बिलों में अनियमितताओं और पेट्रोल चोरी का था।  पीके  ने सांसद को “पेट्रोल चोर” जैसे अपमानजनक शब्दों से नवाजा। सांसद डॉ. जायसवाल ने स्पष्ट किया कि उक्त पेट्रोल पंप उनका है ही नहीं। बिना किसी ठोस प्रमाण के इस तरह के वल्गर आरोप लगाना मर्यादा के बाहर है।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यदि प्रशांत किशोर अदालत में अपने आरोपों के समर्थन में कोई ठोस दस्तावेज या साक्ष्य पेश नहीं कर पाए तो भारतीय दंड संहिता की धारा 499-500 के तहत मानहानि साबित होने पर उन पर भारी जुर्माना, सजा या दोनों हो सकते हैं।
यह मामला केवल व्यक्तिगत मानहानि का नहीं, बल्कि लोकतंत्र में बिना तथ्यों के जिम्मेदार नेताओं पर गंभीर आरोप लगाकर जनता को भ्रमित करने की प्रवृत्ति का भी प्रतीक है। अब सबकी नजरें 15 जुलाई पर टिकी हैं, जब प्रशांत किशोर को अपने दावों की सच्चाई अदालत में साबित करनी होगी।
इनपुट: सुशील कुमार जायसवाल

रीलबाज़ों, सेल्फीबाज़ों और धार्मिक पर्यटन की भीड़ ने पवित्र स्थलों का क्या हाल कर दिया है?

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मथुरा : क्या भगवान अब भक्तों से मिलते हैं या कैमरे के लेंस से?
क्या तीर्थयात्रा अब आत्मा की यात्रा है या इंस्टाग्राम की स्टोरी?
इन दिनों किसी भी पवित्र धाम का दृश्य देख लीजिए। वृंदावन हो, केदारनाथ हो, बद्रीनाथ हो या वैष्णो देवी। ऐसा लगता है जैसे किसी धार्मिक स्थल पर नहीं, बल्कि किसी मेले, पिकनिक स्पॉट या मनोरंजन पार्क में पहुँच गए हों। हाथ में माला कम, मोबाइल ज्यादा हैं। भक्ति कम, रील ज्यादा है। श्रद्धा कम, प्रदर्शन ज्यादा है।
भारत की प्राचीन परंपरा में तीर्थयात्रा जीवन के उत्तरार्ध का विषय मानी जाती थी। जब व्यक्ति संसार के मोह-माया, दौड़-धूप और महत्वाकांक्षाओं से कुछ दूरी बनाता था, तब वह ईश्वर की ओर मुड़ता था। साठ वर्ष की आयु के बाद वानप्रस्थ और आध्यात्मिक जीवन की परिकल्पना यूँ ही नहीं की गई थी। इसके पीछे गहरा सामाजिक और मनोवैज्ञानिक अनुभव था।
लेकिन आज तस्वीर उलट गई है।
कॉलेज से छुट्टी मिली नहीं कि चलो वृंदावन। नई कार खरीदी नहीं कि चलो चारधाम। शादी की सालगिरह है तो केदारनाथ। हनीमून, चलो तिरुपति जी के दर्शन से शुरू करें, वेरी गुड idea!! जन्मदिन है तो महाकाल। मंदिर अब मन की शांति के स्थान नहीं रहे, बल्कि “चेक-इन” करने और सोशल मीडिया पर दिखाने के मंच बनते जा रहे हैं।
इन धार्मिक स्थलों पर पहुँचने वाली विशाल युवा भीड़ अपने साथ क्या ला रही है?
प्लास्टिक की बोतलें। चिप्स के पैकेट। डिस्पोज़ेबल कप। लाउडस्पीकर जैसी आवाजें। सड़क किनारे फैला कचरा। शराब की खाली बोतलें। सेल्फी के लिए धक्का-मुक्की। ऊँची आवाज में फिल्मी गाने। और सबसे बढ़कर, पवित्रता के प्रति उदासीनता।
हिमालय के नाज़ुक पारिस्थितिकी तंत्र पर इसका असर साफ दिख रहा है। पहाड़ कूड़ेदान बन रहे हैं। नदियाँ प्लास्टिक से भर रही हैं। तीर्थ मार्गों पर कूड़े के ढेर लग रहे हैं। जहाँ कभी घंटियों और मंत्रों की ध्वनि सुनाई देती थी, वहाँ अब मोबाइल नोटिफिकेशन और रीलों का शोर गूँजता है।
भक्ति अब एक उपभोक्ता उत्पाद बन गई है।
एक पैकेज टूर खरीदिए। हेलीकॉप्टर से दर्शन कीजिए। पाँच मिनट मंदिर में बिताइए। दस सेल्फियाँ लीजिए। फिर लौटकर घोषणा कर दीजिए कि आध्यात्मिक अनुभव प्राप्त हो गया।
यह आध्यात्मिकता नहीं है। यह धार्मिक उपभोक्तावाद है।
कड़वा लग सकता है, लेकिन शायद समय आ गया है कि हम एक असहज प्रश्न पूछें। क्या सभी तीर्थस्थल पर्यटन के लिए खुले रहने चाहिए? क्या हर धार्मिक स्थल को मनोरंजन और अवकाश उद्योग का हिस्सा बना देना चाहिए?
शायद नहीं।
देश के प्रमुख तीर्थस्थलों पर आयु-आधारित प्रतिबंधों पर गंभीर बहस होनी चाहिए। कम से कम पचास या साठ वर्ष से कम आयु के लोगों की सामान्य पर्यटक एंट्री सीमित की जा सकती है। विशेष धार्मिक, शैक्षिक या पारिवारिक कारणों को छोड़कर तीर्थस्थलों को वरिष्ठ नागरिकों और वास्तविक साधकों के लिए प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
यह किसी पीढ़ी के खिलाफ युद्ध नहीं होगा। बल्कि पवित्र स्थलों की गरिमा बचाने का प्रयास होगा।
युवाओं के लिए घूमने-फिरने के हजार विकल्प हैं। पहाड़ हैं। समुद्र तट हैं। ट्रैकिंग है। खेल हैं। सांस्कृतिक यात्राएँ हैं। रोमांचक पर्यटन है। जीवन का आनंद लीजिए। दुनिया देखिए। काम कीजिए। सपने पूरे कीजिए।
लेकिन हर जगह को पर्यटन स्थल बना देना बुद्धिमानी नहीं है।
कुछ स्थान ऐसे भी होने चाहिए जहाँ शांति हो। मौन हो। ध्यान हो। अनुशासन हो। जहाँ लोग फोटो खिंचवाने नहीं, आत्मचिंतन करने जाएँ।
आज वृंदावन की गलियाँ, गंगा के घाट, हिमालय के धाम और अनेक मंदिर उस भीड़ के बोझ तले कराह रहे हैं जो दर्शन से अधिक प्रदर्शन में विश्वास करती है। यह “टच एंड गो” संस्कृति तीर्थों को आध्यात्मिक केंद्रों से मनोरंजन केंद्रों में बदल रही है।
यदि अभी नहीं चेते, तो आने वाली पीढ़ियाँ मंदिर तो देखेंगी, लेकिन उनकी आत्मा खो चुकी होगी।
तीर्थ यात्रा कोई वीकेंड पिकनिक नहीं है। यह मन की तैयारी, अनुशासन, संयम और श्रद्धा की यात्रा है।
जब तक हम इस अंतर को नहीं समझेंगे, तब तक हमारे पवित्र स्थल भीड़ तो जुटाएँगे, लेकिन भक्ति नहीं। श्रद्धालु तो आएँगे, लेकिन शांति नहीं। मंदिर तो बचेंगे, मगर उनकी मर्यादा धीरे-धीरे भीड़ के पैरों तले कुचलती चली जाएगी।
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