PEC demands probe into Uttarakhand scribe’s mysterious death

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Nava Thakuria

Geneva, 30 September 2025: Press Emblem Campaign (PEC), the global media safety and rights body, expresses concern over the mysterious death of an Indian scribe based in Uttarakhand and demanded a fair probe into the circumstance that led to the untimely demise of Rajeev Pratap Singh. The body of Rajeev (36) was recovered from Joshiyara hydroelectric barrage on Bhagirathi river in the north Indian State on Sunday, 28 September, whereas he went missing on 18 September. Initial reports say, Rajeev was riding his car and fell into the river. An alumnus of Indian Institute of Mass Communication in New Delhi, Rajeev used to run a digital platform named ‘Delhi Uttarakhand Live’ covering primarily local issues.

“We demand an authentic probe to identify the probable culprits involved with the incident that caused the death of Rajeev Pratap Singh and punish them under the law. Uttarakhand chief minister Pushkar Singh Dhami should take personal interest in the case, as the scribe reportedly received multiple threats from various sources for his reports,” said Blaise Lempen, president of PEC (https://www.pressemblem.ch/pec-news).

Earlier, the PEC insisted on an impartial probe into the violence perpetuated against media persons in Nepal during a recent unrest (on 8 and 9 September) and urged the interim government in Kathmandu (led by Sushila Karki) to adequately compensate the affected scribes and media organizations during the turmoil that resulted in the killing of over 70 people, including 55 protesting youths, and injuries to over 1500 individuals. The miscreants targeted mainstream media groups like Kantipur Media Group and Annapurna Media Network. Moreover, five journalists namely Shyam Shrestha, Dipendra Dhungana, Umesh Karki, Barsha Shaha and Shambhu Dangal were injured while reporting from the ground.

PEC’s south and southeast Asia representative Nava Thakuria informed that globally 136 media workers have been killed so far this year. Nepal witnessed the killing of journalists namely Suresh Rajak during a pro-monarchy agitation in Kathmandu a few months back. India has lost Mukesh Chandrakar, Raghavendra Vajpayee, Sahadev Dey, Dharmendra Singh Chauhan and Chintakayalu Naresh Kumar to assailants since 1 January 2025. At least four journalists namely Md Asaduzzaman Tuhin, Bibhuranjan Sarkar, Anwar Hossain and Khandaker Shah Alam were killed in Bangladesh.

स्वदेशी सोशलिज्म के 90 साल: टूटन की दास्तान और विचारों की अमर विरासत

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पुणे में हाल ही में आयोजित “समाजवादी एकजुटता सम्मेलन” ने हमें उस सदी-भर पुराने आंदोलन की याद दिला दी, जिसने भारतीय लोकतंत्र को दिशा और ताक़त दी थी। यह सम्मेलन मानो एक आईना था—जिसमें अतीत की चमक, वर्तमान की मायूसी और भविष्य की उम्मीद—तीनों एक साथ दिखाई दिए।
जेपी से लोहिया तक की वह धारा, जिसने भारतीय राजनीति को गहराई से बदला, आज युवाओं की याददाश्त से तक़रीबन गायब हो चुकी है। दर्जनों दूरदर्शी नेताओं को जन्म देने वाला यह आंदोलन अब गुमनामी से जूझ रहा है। लेकिन इसकी मूल धारणाएं—बराबरी, इंसाफ़ और जनप्रतिबद्धता—आज भी उतनी ही रोशन हैं, जितनी 90 साल पहले थीं।

पुणे का जमावड़ा: यादें और सवाल
यह सम्मेलन 1934 में कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी (CSP) की स्थापना की 90वीं वर्षगांठ के अवसर पर बुलाया गया था। राजस्थान के सौ वर्षीय पंडित रामकिशन ने उद्घाटन किया और डॉ. जीजी पारीख ने तल्ख़ अंदाज़ में कहा—सत्ता के मोह ने हमें हमारे असूल भुला दिए। समतावादी नज़रिया ज़िंदगी में उतर नहीं पाया।

डॉ. सुनीलम, प्रो. आनंद कुमार, प्रो. राजकुमार जैन, प्रो. रामा शंकर सिंह, विजय प्रताप और योगेंद्र यादव जैसे वक्ताओं ने साफ़ कहा कि आंदोलन का सबसे बड़ा संकट है—युवा पीढ़ी की गैरहाज़िरी। एक विचारक ने चेतावनी दी, “अगर समाजवाद को डिजिटल दौर से नहीं जोड़ा गया, तो यह सिर्फ़ किताबों का हिस्सा बनकर रह जाएगा।”

सम्मेलन में एस.एम. जोशी और दूसरे पुरखों को याद किया गया। बुज़ुर्ग समाजवादियों की आँखों में चमक थी, मगर दर्द भी कि नई नस्ल समाजवादी सपनों से बेग़ाना हो चुकी है।

गौरवशाली अतीत: जब समाजवाद था जनता की आवाज़
प्रो. पारसनाथ चौधरी ने याद दिलाया—1934 में CSP का गठन महज़ एक संगठन नहीं था, बल्कि भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के भीतर बराबरी और सामाजिक न्याय की अलख जगाने वाला बिगुल था। भारत छोड़ो आंदोलन इसका स्वर्णिम अध्याय था, जब जयप्रकाश नारायण, लोहिया और उषा मेहता जैसे नेता भूमिगत संघर्ष का प्रतीक बने।
आज़ादी के बाद समाजवादियों ने विपक्ष की मज़बूत धारा तैयार की। मजदूरों, किसानों, पिछड़ी जातियों और ग़रीब तबकों को आवाज़ दी। लोकतंत्र की शुरुआती बुनियाद में समाजवाद की गहरी छाप है।
लेकिन, यह दास्तान जितनी गौरवशाली है, उतनी ही टूटन और विघटन से भरी हुई। अनुशासनहीनता, अहंकार और बार-बार के बंटवारे ने आंदोलन की ताक़त खोखली कर दी। 1950 के दशक में प्रजा सोशलिस्ट पार्टी और समाजवादी पार्टी का विभाजन हो या जनता पार्टी का बिखरना—हर बार आंदोलन पिछड़ गया।

नेताओं की बारात, मगर संगठन खोखला
लोहिया और उनके साथी जनता से गहरे जुड़े, बड़े आंदोलनों को जन्म दिया, मगर मज़बूत संगठन कभी खड़ा नहीं कर सके। हाँ, इस आंदोलन ने असंख्य विजनरी नेता दिए—मधु लिमए, मधु दंडवते, सुरेंद्र मोहन, जॉर्ज फर्नांडिस, नाथ पाई, बहुत लंबी लिस्ट है। जॉर्ज की 1974 की ऐतिहासिक रेल हड़ताल याद की जाती है, जिसने पूरे देश को हिला दिया। वह पल दिखाता था कि समाजवादी विचारधारा महज़ किताबों का नारा नहीं, बल्कि जन-शक्ति का विस्फोट है।

दो धाराओं की कहानी
समाजवादी आंदोलन broadly दो धाराओं में बंटा रहा—1. लोहियावादी SSP – जाति प्रश्न, मंडल राजनीति और हिंदी को केंद्र में रखकर। 2. प्रजा सोशलिस्ट पार्टी (PSP) – पश्चिमी लोकतांत्रिक समाजवाद की ओर झुकी। दोनों धाराओं ने युवाओं को जोड़ने की कोशिश की—राष्ट्र सेवा दल, समाजवादी युवक सभा, रेलवे यूनियनें। लेकिन अंततः निरंतर टूटन ने इस ताक़त को कमज़ोर कर दिया।

भारतीय रंग में ढला समाजवाद
भारतीय समाजवाद यूरोपीय मॉडल की नकल नहीं था। लोहिया और उनके साथियों ने इसे भारतीय हालात के मुताबिक ढाला। इसकी चार बुनियादी धारणाएं आज भी उतनी ही अहम हैं:

विस्तारित समानता: सिर्फ़ आर्थिक नहीं, जाति, लिंग और भाषा की बराबरी।

सतत विकास: पर्यावरण और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर आधारित मॉडल।

सत्याग्रह की रणनीति: गांधीवादी तरीक़े से संघर्ष।
सांस्कृतिक राजनीति: भारतीय भाषाओं और लोक संस्कृति से जुड़ाव।

आज जब जलवायु संकट, बेरोज़गारी और असमानता चरम पर हैं, ये धारणाएं और भी प्रासंगिक हो उठती हैं।
नई पीढ़ी से दूरी: सबसे बड़ा संकट

आज “समाजवाद” शब्द ही सार्वजनिक विमर्श से ग़ायब हो चुका है। युवा इसे “वामपंथी अवशेष” मानते हैं। वैश्वीकरण और नवउदारवाद के दौर में समाजवाद को पुरातन कहकर किनारे किया जा रहा है। जबकि सच यही है कि यह असमानता और अन्याय के खिलाफ़ सबसे बड़ा औज़ार है।
इतने नेता, जितने सोशलिस्ट मूवमेंट ने दिए, कोई और धारा नहीं दे सकी—आचार्य नरेंद्र देव, कृपलानी, संपूर्णानंद, चंद्रशेखर, कर्पूरी ठाकुर, मुलायम सिंह, लालू यादव, नीतीश कुमार… और अनगिनत कार्यकर्ता जो गाँव-गाँव जनता के बीच लड़े। कर्पूरी ठाकुर की आरक्षण नीति ने सामाजिक न्याय को नई दिशा दी। पत्रकारिता और साहित्य में भी समाजवादी असर रहा। कई संपादक और लेखक जन-आंदोलनों की आवाज़ बने।

आज की हकीकत और उम्मीद

पुणे में जुटे बुज़ुर्ग समाजवादी—जिनमें से कई आपातकाल के दौरान जेल में रहे थे—आज भी लोकतंत्र की गिरती हालत पर बेचैन नज़र आते हैं। सवाल यही है कि क्या उनकी मशाल नई पीढ़ी तक पहुँचेगी? सम्मेलन में कुछ कोशिशें हुईं—युवाओं के लिए कार्यशालाएं, डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म, ऑनलाइन कैंपेन। लेकिन चुनौतियाँ बड़ी हैं—संगठनात्मक कमज़ोरी, फंडिंग की तंगी, मीडिया की बेरुख़ी।

विरासत या भविष्य का रास्ता?

समाजवाद की विरासत महज़ अतीत की याद नहीं, बल्कि भविष्य की कुंजी है। बराबरी, इंसाफ़, सांस्कृतिक जुड़ाव और अहिंसक प्रतिरोध—ये चार स्तंभ आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं जितने 90 साल पहले थे।
आज जब लोकतंत्र की बुनियाद पर सत्तावाद का साया है, जब अमीरी-ग़रीबी की खाई बढ़ रही है, तब समाजवाद की लौ को फिर से भड़काना ज़रूरी है। पुणे सम्मेलन ने यही संदेश दिया—“लौ बुझी नहीं है, उसे बस नए ईंधन की दरकार है।”

डॉक्टर हेडगेवार जी का हिंदुत्व.

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प्रशांत पोळ

किसी व्यक्ति के कार्य का मूल्यांकन करना है, या उस व्यक्ति ने किये हुए कार्य का यश – अपयश देखना हैं, तो उस व्यक्ति के पश्चात, उसके कार्य की स्थिती क्या है, यह देखना उचित रहता हैं। उदाहरण हैं – छत्रपती शिवाजी महाराज। मात्र पचास वर्ष का जीवन। लगभग तीस वर्ष उन्होंने राज- काज किया और हिंदवी साम्राज्य खडा किया। किंतु उनके मृत्यु के पश्चात उस हिंदवी स्वराज्य की परिस्थिती क्या थी? हिंदुस्थान का शहंशाह औरंगजेब तीन लाख की चतुरंग सेना लेकर महाराष्ट्र मे आया था, इसी हिंदवी स्वराज्य को मसलने के लिए, सदा के लिए समाप्त करने के लिए।

परिणाम?

सारी जोड़-तोड़ करने के बाद, वह संभाजी महाराज से मात्र २ – ४ दुर्ग (किले) ही जीत सका। आखिरकार छल कपट कर के, ११ मार्च १६८९ को औरंगजेब ने संभाजी महाराज को तड़पा – तड़पा के, अत्यंत क्रूरता के साथ समाप्त किया। उसे लगा, अब तो हिंदुओं का राज्य, यूं मसल दूंगा। लेकिन मराठों ने, शिवाजी महाराज के दूसरे पुत्र – राजाराम महाराज के नेतृत्व में संघर्ष जारी रखा। आखिर ३ मार्च १७०० को राजाराम महाराज भी चल बसे। औरंगजेब ने सोचा, ‘चलो, अब तो कोई नेता भी नहीं बचा इन मराठों का। अब तो जीत अपनी हैं।’

किन्तु शिवाजी महाराज की प्रेरणा से सामान्य व्यक्ति, मावले, किसान… सभी सैनिक बन गए। मानो महाराष्ट्र में घास के तिनके भी भाले और बर्छी बन गई। आलमगीर औरंगजेब इस हिंदवी स्वराज्य को जीत न सका। पूरे २६ वर्ष वह महाराष्ट्र में, भारी भरकम सेना लेकर मराठों से लड़ता रहा। इन छब्बीस वर्षों में उसने आग्रा / दिल्ली का मुंह तक नहीं देखा। आखिरकार ८९ वर्ष की आयु में, ३ मार्च १७०७ को, उसकी महाराष्ट्र में, अहिल्यानगर के पास मौत हुई, और उसे औरंगाबाद के पास दफनाया गया। जो औरंगजेब हिंदवी स्वराज्य को मिटाने निकला था, उसकी कब्र उसी महाराष्ट्र में खुदी। मुगल वंश मानो समाप्त हुआ। मराठों का दबदबा दिल्ली पर चलने लगा। बाद मे तो हिंदूओंका भगवा ध्वज लाल किल्ले की प्राचीर पर फहरने लगा। मात्र तीन – चार जिलों तक फैला हुआ हिंदवी स्वराज्य, छत्रपती शिवाजी महाराज की मृत्यु के पश्चात सारे भारत वर्ष मे फैल गया। अटक के भी उस पार तक गया।

इसी दृष्टिकोन से डॉक्टर केशव बळीराम हेडगेवार जी के कार्य को देखना चाहिए। 1889 से 1940, यह मात्र 51 वर्षों का जीवन प्रवास है। इस प्रवास के अंतिम 15 वर्ष राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना के पश्चात के है। जिन दिनों लोग हिंदू हितों की रक्षा के लिए बोलने मे भी घबराते थे, हिंदू कहलाने सकुचाते थे, उन्ही दिनों डॉक्टर हेडगेवार जी अत्यंत आत्मविश्वाससे बोल रहे थे, “हां, मै कहता हूं, यह हिंदू राष्ट्र है।”

आज डॉक्टर हेडगेवार जी के कार्य का स्वरूप क्या है?

*डॉक्टर जी ने सन 1925 मे शुरू किया हुआ संघ आज भारत के कोने – कोने मे पहुंचा है। इसी के साथ विश्व के उन सभी देशों में, जहां हिंदू कम संख्या मे भी क्यूं ना रहते हो, उन सभी देशों में संघ के स्वयंसेवक है। और यह सज्जनशक्ती डॉक्टर हेडगेवार जी को अपेक्षित ऐसे हिंदू संस्कृती के मूलाधार राष्ट्र को वैभवशाली, समृद्ध और संपन्न बनाने मे जुटी है।*

यह डॉक्टर हेडगेवार जी का निर्विवाद यश है।

डॉक्टर हेडगेवार जी ने अपने जीवन का उत्तरार्ध यह हिंदू संघटन के लिए दिया। बाल्यकाल से ही डॉक्टर हेडगेवार प्रखर देशभक्त थे, साथ ही प्रत्यक्ष कार्य करने वाले कृतिशील कार्यकर्ता थे। उनके मन मे जो अंगार जल रही थी वह परतंत्रता को लेकर थी। इसीलिए विशाल भारत वर्ष पर राज करने वाली अंग्रेजी सत्ता को उखाडकर फेकना यह उनके जीवन का ध्येय (लक्ष्य) बना था। इसी ध्येय का अनुसरण करते हुए उन्होने अपने महाविद्यालयीन शिक्षा के लिए कलकत्ता (वर्तमान में कोलकाता) यह शहर चुना। वे बंगभंग आंदोलन के दिन थे। कलकत्ता यह क्रांतीकारियों का केंद्र बना था। हेडगेवार जी छह वर्ष कलकत्ता मे रहे। क्रांतिकारीयों की ‘अनुशीलन समिती’ के वे सदस्य बने। ‘कोकेन’ इस नाम से क्रांतिकारीयों मे जाने जाते थे। इस क्रांतिकारी आंदोलन को उन्होने अत्यंत निकट से देखा।

किंतु ‘इस रास्ते से स्वराज्य मिलेगा क्या?’ यह एक प्रश्न तथा साथ ही दुसरा महत्त्व का प्रश्न ‘स्वतंत्रता मिलने के बाद हमारे देश की रचना कैसी होनी चाहिये?’ यह भी उनको सताये जा रहा था। हमारा देश जिन कारणों से गुलाम हुआ, उन कारणोंको दूर करते हुए नया स्वतंत्र भारत कैसा होना चाहिये इस पर वह सतत चिंतन करते थे। किंतु उनके प्रश्नों के उत्तर उनको नही मिल रहे थे। उन्होने कांग्रेस मे रहकर काम किया। पहिले सदस्य बने फिर पदाधिकारी। अत्यंत सक्रियतासे उन्होने काँग्रेस के आंदोलनों मे हिस्सा लिया। दो बार जेल गए। सश्रम कारावास की सजा हुई। किंतु उनको समझ मे आया की काँग्रेसमें, या अन्य सभी प्रवाहो में, इस देश का मूलाधार हिंदू यह उपेक्षित हो रहा है। *मुस्लिम तुष्टीकरण के नाम पर हिंदूओं पर जबरदस्त दबाव बनाया जा रहा है। इसका दोषी भी हिंदू समाज ही है। हिंदू अपने तेजस्वी इतिहास को, शौर्य को, साहस को तेज को, गौरवशाली परंपराओंको भुलते जा रहे है।*

स्वतंत्रता मिलने पर स्वतंत्र भारत मे हिन्दुओं की स्थिती, अर्थात देश की स्थिती कैसी रहेगी इसका भीषण और भयानक चित्र उनको सामने दिख रहा था। इसलिये वर्ष 1916 मे मेडिकल की परीक्षा उत्तीर्ण करके वे नागपूर आये। अविवाहित रहकर संपूर्ण जीवन राष्ट्र कार्य के लिए लगाने का उनका प्रण था। अगले नौ वर्ष, वे स्वतंत्रता प्राप्ति के विविध प्रवाहों मे शामिल होकर अपने प्रश्न का उत्तर खोज रहे थे। 1923 और 1924 मे नागपूर मे मुस्लिम आक्रमकता बढ रही थी। डॉक्टर हेडगेवार काँग्रेस के पदाधिकारी थे। अपने प्रश्न का उत्तर ढूंढने वे फरवरी 1924 मे वर्धा मे महात्मा गांधीजी से मिले। किंतु हिंदू – मुस्लिम समस्या के बारे मे उन्हे तर्कपूर्ण या समाधानकारक उत्तर नही मिले।

इन सभी प्रक्रियाओंसे निकलते हुए, अपने सहकारी कार्यकर्ताओं से, नेताओं से विचार विनिमय करते हुए, डॉक्टर जी के मन मस्तिष्क मे हिंदू संघटन की रूपरेखा तैयार हो रही थी। किसी का भी द्वेष न करते हुए, एक ऐसा हिंदू संघटन खडा करना, जिससे अनुशासन रहेगा, सैनिकी पद्धती का कामकाज रहेगा, और वैचारिक स्पष्टता होगी। इसी को आगे बढाते हुए वर्ष 1925 के विजयादशमी के दिन, अर्थात रविवार दिनांक 27 सितंबर को नागपूर मे डॉक्टर हेडगेवार जी के घर पर संघ प्रारंभ हुआ। यह संघटन मुस्लिम आक्रामकता के प्रतिक्रिया के स्वरूप बना था क्या? इसका स्पष्ट उत्तर है – नही। दिनांक 28 मार्च 1937 मे अकोला के इस्टर कॅम्प मे स्वयंसेवकोंके सामने बोलते हुए डॉक्टर जी ने कहा था, *”हिंदुस्तान की रक्षा के लिए एखादा स्वयंसेवक संघ बना होता, जिसमे मुसलमान, ख्रिश्चन, अंग्रेज अथवा अन्य देशीय, अन्य धर्मीय लोग रहते या नही रहते, तो भी अपने हिंदू समाज को ऐसे संघ का निर्माण करना क्रमप्राप्त (आवश्यक) था।”*

डॉक्टर साहब की सोच बहुत दूर की थी। यह राष्ट्र संपन्न होना चाहिये, समृद्ध होना चाहिये, शक्तिशाली बनना चाहिये और इसलिये इस देश की जो मूल अस्मिता है, पहचान है, जो हिंदू आचार, विचार और परंपरांओंपर आधारित है, वह सशक्त और बलशाली होना चाहिये। यह तभी संभव है जब हमारा देश स्वतंत्र होगा। इसीलिए संघ का प्रारंभिक ध्येय इस देश को स्वतंत्र करने का था।

संघ प्रारंभ होने के ढाई वर्ष बाद, अर्थात वर्ष १९२८ के मार्च महिने मे नागपूर – अमरावती रास्ते के ‘स्टार्की पॉईंट’ पर विशेष रूप से चुने हुए 99 स्वयंसेवकों को डॉक्टर जी ने स्वयं प्रतिज्ञा दी। इस प्रतिज्ञा मे भी स्वतंत्रता का यही भाव प्रकट होता है। प्रतिज्ञा मूल मराठी मे इस प्रकार है –
“मी सर्व शक्तिमान श्री परमेश्वराला व आपल्या पूर्वजांना स्मरून प्रतिज्ञा करतो की, मी आपला पवित्र हिंदू धर्म, हिंदू संस्कृती व हिंदू समाज यांचे संरक्षणाकरिता व हिंदू राष्ट्राला स्वतंत्र करण्याकरिता राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघाचा घटक झालो आहे। संघाचे कार्य मी प्रामाणिकपणे, नि:स्वार्थ बुद्धीने आणि तनमनधने करून करीन, व हे व्रत मी आजन्म पाळीन।”

“जय बजरंग बली। हनुमान जी की जय!”
_(मै सर्व शक्तिमान श्री परमेश्वर और मेरे पूर्वजों का स्मरण करते हुए प्रतिज्ञा लेता हूँ कि अपना पवित्र हिंदू धर्म, हिंदू संस्कृती व हिंदू समाज की रक्षा के लिए एवं हिंदू राष्ट्र को स्वतंत्र करने के लिए मै राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का घटक बना हूं। संघ का कार्य मैं प्रामाणिकता से, निस्वार्थ बुध्दि से व तन – मन – धन से करुंगा। इस व्रत का मै आजन्म पालन करूंगा।_
_जय बजरंग बली। हनुमान जी की जय।)_

_(रा. स्व. संघ शताब्दी विशेष)

Nepal at the Edge: Broken Dreams, Fragile Democracy, and the Flight of a Generation

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Delhi : The fizz has gone flat. The promises of democracy in Nepal now taste like froth – empty, bitter, and vanishing fast. Will political stability ever return to this Himalayan nation? Can a country of three crore people, caught between India and China, offer its citizens more than despair and migration? These haunting questions echo louder each passing day.

“Democracy is an expensive hobby,” quips Professor Paras Nath Choudhary. “To expect a herd of white elephants (politicians) to feed the poor before filling their own coffers is a dream, not reality.” He reminds us that the monarchy once gave Nepal stability, but since embracing democracy in 2008, the country has witnessed 14 governments in 17 years – a carousel of chaos still spinning after the violent student uprisings.

From Hope to Ashes
The September rebellion, sparked by a clumsy social media ban, left more than seventy dead and $600 million in ruins. Prime Minister K.P. Sharma Oli fell within 48 hours, and for a fleeting moment, Chief Justice Sushila Karki’s “online coronation” as interim leader promised a new dawn. But as the smoke cleared, the scenery was painfully familiar: broken promises, fake change, and a public left disillusioned yet again.

The Calm Before the Next Storm
Curfews have lifted, and the streets look quiet, but the revolution hasn’t ended. On TikTok and Discord, young Nepalis are still demanding electoral reforms, an end to corruption, and justice for the fallen. Is Nepal now trapped in a “blocked revolution,” where unresolved rage could spill into bloodshed, dictatorship, or foreign intervention?

A Government Without Ground
Since 2008, not a single government has lasted its full term. The interim administration faces impossible deadlines – elections by March 2026, justice for victims, and rebuilding public trust. But faith is missing.
The economy, already fragile, is now shattered. Growth projections of 4.5% for 2025 have collapsed to near zero. The damage: 3 trillion rupees ($22.5 billion) – half the nation’s GDP. Tourism has evaporated, businesses have shuttered, and investors have fled.

Living on Borrowed Breath
Nepal does not survive on its own strength. It breathes through remittances and India’s lifeline. Every day, 2,000 young Nepalis leave the country for work abroad. Remittances, 30% of GDP, are both a blessing and a curse – sustaining families but hollowing out society.

Agriculture still employs the majority but fails to feed the population, forcing food imports worth 400 billion rupees annually. Industry contributes just 5–6% of GDP, mainly from selling edible oil to India. In short, Nepal imports life itself – fuel, electricity, grain, machinery – all from India.

Meanwhile, 10–15 lakh Nepalis toil in India, sending back $2–3 billion each year. This dependence is both Nepal’s crutch and chain.

The Young, Restless, and Unemployed
Nepal’s greatest resource – its youth – is also its greatest crisis. Educated and digitally connected but jobless, they face unemployment rates above 20%. Per capita income is stuck at $1,400, and one in five people still live in poverty. Their future is migration; their reality, exploitation.

The Darkest Tragedy
Each year, between 5,000 and 10,000 Nepali women and girls are trafficked into India’s flesh trade. Over one lakh remain trapped in brutal exploitation, invisible in brothels and cities. Despite decades of awareness drives and rescue missions, the numbers barely change. It is the most painful proof that political decay translates directly into human suffering.

Sandwiched Between India and China
Nepal’s helplessness must transform into dignity. India, as its closest partner, must extend genuine support rather than discrimination. And Nepalis themselves must recognize that India is their evergreen ally, while China lurks as an opportunist. But without courage in Kathmandu to uproot corruption and rebuild domestic productivity, Nepal risks falling deeper into the abyss of instability.

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