मेरी और भागवतजी की ट्रैन यात्रा ‘भागवत जी होना आसान नहीं’

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सीपी सिंह

उन्नाव (उप्र) : 11 जून 2026 को लखनऊ जक्शन के प्लेट फार्म नम्बर – 06 से ठीक 3.30 बजे शताब्दी एक्सप्रेस दिल्ली के लिए रवाना हुई। मै भी इसी शताब्दी एक्सप्रेस के एग्जीक्यूटिव कोच नंबर E-1 में सीट नम्बर -22 पर बैठा था।

ठीक 4.32 बजे ट्रेन उन्नाव स्टेशन पर रुकी। देखा कि तभी जेड प्लस श्रेणी एएसएल (Assistant Squad Leader) के चार कमांडो बम डिस्पोजल स्क्वायड के साथ कोच में सवार हुए। कमांडो ने पूरे कोच में गहनता से बम डिस्पोजल तंत्र से पूरे कोच को चेक किया। कही कुछ आपत्तिजनक नहीं मिला तो कमांडो टीम के चेहरे पर संतोष के भाव दिखे।

क्योंकि मैने काफी लंबे समय तक हिन्दुस्तान, दैनिक जागरण और अमर उजाला में क्राइम की पत्रकारिता की है तो मुझे समझने में देर नहीं लगी कि कोई जेड प्लस श्रेणी प्राप्त वीवीआईपी ट्रेन में अगले स्टेशन से बैठने वाला है। लेकिन दिमाग में आया कि आखिर आज के समय में जहाँ अधिकांश ब्लॉक प्रमुख तक ट्रेन में चलने पर अपनी तौहीन समझते हैं, ऐसे समय में ऐसा कौन वीवीआईपी है जिसे जेड प्लस जैसी उच्च सुरक्षा प्राप्त हो, और वह ट्रेन से जायेगा, वह भी आम लोगों के बीच में। इसे लेकर कई पूर्व सीएम जिन्हें जेड प्लस श्रेणी की सुरक्षा मिली है , इनके आने के कयास लगाए। लेकिन उनके रौब और रुतबे के सामने नहीं लगा कि वह ट्रेन से जाने वाले होंगे। आखिरकार मैने विचार किया कि क्यों माथा पच्ची की जाए। जो भी वीवीआईपी होंगे, वह कुछ देर में सामने आ ही जायेंगे। फिर मै उस महान विभूति के कोच में आने का इंतजार करने लगा।

ठीक शाम के 4:57 बजे का समय था। ट्रेन कानपुर सेंट्रल स्टेशन पर आकर रुकी। क्योंकि मेरी सीट विंडो साइड में थी तो स्टेशन पर कुछ हलचल सी दिखाई थी। मुझे भरोसा हो गया कि शायद आज भौकाली युग में जो वीवीआईपी ट्रेन से हमारे साथ जाने वाले हैं, वही वीवीआईपी हो सकते। और मेरा अंदाजा भी सही निकला।

कुछ पल बाद ही साधारण से मिजाज के एक व्यक्ति जो साधारण खादी का कुर्ता और चप्पल पहने कोच में सवार हुए। एकदम शांत, चाल में कोई रौब और घमंड लेशमात्र नहीं, लेकिन चेहरे पर चमक साफ दिखाई दे रही थी। मैने पहली नजर में पहचान लिया कि ये आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत जी हैं। क्योंकि मुझे एक बार सहारनपुर में उनका इंटरव्यू लेने सौभाग्य मिल चुका था।

वह मेरे सामने दूसरी साइड में पड़ने वाली विंडो सीट पर बैठ गए। इस तरह भागवत जी का चेहरा मुझे साफ दिखाई दे रहा था। आसपास की सीटों पर कमांडो बैठ गए। भागवत जी ने भी आम यात्रियों की तरह ट्रेन में मिलने वाला पानी, नाश्ता और सूप भी लिया। खास बात ये रही कि कमांडो टीम ने भी कोच में कोई पैनिक क्रिएट नहीं किया। ट्रेन कर्मी और यात्री आसानी से आते जाते रहे।

क्योंकि मैं भागवत जी से पहले मिल चुका था तो इच्छा हुई कि ट्रेन में मुलाकात की जाए। लेकिन कमांडो कही रोक न दे, ये आशंका जरूर मन में आ रही थी। क्योंकि पत्रकारिता के कई बार वीवीआईपी के कमांडो से पाला पड़ता रहता है तो सोचा नहीं मिलने देंगे, जब देखा जाएगा।

मै भागवत जी की सीट तक गया और इन्हें प्रणाम किया। लेकिन मैने तो पत्रकारिता की आदत के मुताबिक जुबान से ही उन्हें प्रणाम किया था, लेकिन उन्होंने दोनों हाथ जोड़कर मुझे नमस्कार किया। फिर सहज भाव से बोले मैने आपको कहीं देखा है। तब मैने बताया कि सहारनपुर में पदमश्री भारत भूषण जी द्वारा आयोजित कार्यक्रम में आप और महामहिम गवर्नर साहिबा ने भाग लिया था। उस समय मैने आपका इंटरव्यू लिया था। इसके बाद वह मुस्कराये और कहा अब पहचान लिया। फिर उन्होंने घर परिवार की कुशलता के साथ पूछा कि अब कहा पर हो। मैने बता दिया लखनऊ में हूं। इस दौरान मैने भागवत जी को ये भी बताया कि मैं अलीगढ़ के उस गांव सिंघारपुर का निवासी हूं जहां के केशव धाम में आपने तीन दिन तक प्रवास किया था। इसके बाद तो वह काफी खुश हुए। इसके बाद मै आकर अपनी सीट पर बैठ गया। मेरे बाद एक या दो लोगों ने भी हिम्मत करके उन्हें जाकर नमस्कार किया।

ट्रेन पर चला पत्थर

इसी बीच फिरोजाबाद की सीमा में शताब्दी दौड़ रही थी। तभी जिस ई-1 में भागवत जी और मै बैठे थे, शीशे पर एक पत्थर लगा। हालांकि पत्थर ट्रेन की राइट साइड की खिड़की पर लगा, जबकि संघ प्रमुख लेफ्ट साइड की विंडो सीट पर थे, इसलिए पूरी तरह सुरक्षित रहे। उधर पत्थर लगते ही कमांडो हरकत में आ गए और पड़ताल की। अच्छी बात ये रही कि इस दौरान भागवत जी बड़े ही शांत भाव से बैठे रहे। ऐसा कोई कार्य नहीं जिससे यात्री परेशान हों।

भूपेंद्र जी की सहजता ने प्रभावित किया

अब बात करते हैं ट्रेन में बैठे एक और वीआईपी की सादगी की। जैसे ही मै भागवत जी से मिलने को उठा तो देखा कि मेरे पीछे वाली सीट पर भी एक सज्जन बैठे हैं, जिनका चेहरा यूपी के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष और फिलहाल कैबिनेट मंत्री भूपेंद्र सिंह जैसा लगा। क्योंकि सहारनपुर चीफ रहने के दौरान भूपेंद्र जी जब भी आते थे, मुझे चाय पर सर्किट हाउस बुलाते थे। इसलिए उनसे अच्छी पहचान रही। लेकिन भूपेंद्र जी के पास कोई गनर भी नहीं था और जब भागवत जी ट्रेन में आए थे तो वह साथ भी नहीं दिखाई दिये थे। वह प्रदेश अध्यक्ष जैसे कद्दावर पद पर रहे हैं और फिलहाल कैबिनेट मंत्री भी हैं तो प्रोटोकॉल में सुरक्षा कर्मी और विभाग के कुछ अफसर तो होने चाहिए थे। इससे लगा कि मंत्री इतना सादगी से कैसे बैठ सकता है, इसलिए एक बार लगा कि कई बार एक शक्ल के कई व्यक्ति भी हो सकते हैं।

लेकिन फिर भी दूसरी तरफ मेरा दिल कह रहा था कि ये चौधरी भूपेंद्र जी ही हैं । मैने उनसे नमस्कार किया तो उन्होंने सहज भाव से हाथ जोड़ कर नमस्कार किया। जब मुझे भरोसा हुआ कि ये चौधरी भूपेंद्र सिंह जी हैं। इसके बाद मैने जब सहारनपुर के साथ ही लखनऊ में मेरे द्वारा उनके लिए इंटरव्यू के बारे में बताया तो कहा भाई अच्छी तरह से पहचान रहा हूं, आप सीपी सिंह जी हैं।

भागवत जी की तरह भूपेंद्र सिंह जी ने भी काफी सहजता और सरलता से यात्रा की। किसी को भी अहसास नहीं होने दिया कि वह सूबे के कद्दावर मंत्री हैं। सही कहूं तो भागवत जी होना तो आज के समय में कतई आसान नहीं है। साथ ही चौधरी भूपेंद्र सिंह की सादगी ने भी मुझे काफी प्रभावित किया।

(सोशल मीडिया से)

डॉ. शैलेश शुक्ला को अंतरराष्ट्रीय ERAI फेलोशिप 2026 के लिए चयनित किया गया

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लखनऊ। जनसंचार, डिजिटल मीडिया और उत्तरदायी कृत्रिम बुद्धिमत्ता (Responsible AI) के क्षेत्र में सक्रिय वरिष्ठ मीडिया विशेषज्ञ एवं शोधकर्ता डॉ. शैलेश शुक्ला का चयन प्रतिष्ठित ERAI Fellowship Program – June 2026 के लिए किया गया है। यह अंतरराष्ट्रीय फेलोशिप अमेरिका स्थित Knowledge Networks द्वारा आयोजित की जा रही है, जो कृत्रिम बुद्धिमत्ता की नैतिकता, शासन (AI Ethics and Governance), जवाबदेही तथा मीडिया के बदलते स्वरूप से जुड़े वैश्विक विमर्श को आगे बढ़ाने के लिए जानी जाती है।

इस फेलोशिप कार्यक्रम के माध्यम से विभिन्न देशों के मीडिया पेशेवरों, नीति विशेषज्ञों और प्रौद्योगिकी विशेषज्ञों को कृत्रिम बुद्धिमत्ता के जिम्मेदार उपयोग, नियमन और समाज पर उसके प्रभाव से संबंधित विषयों पर वैश्विक विशेषज्ञों से सीखने और विचार-विमर्श का अवसर प्राप्त होगा।

डॉ. शैलेश शुक्ला जनसंचार में पीएच.डी. उपाधि प्राप्त हैं तथा हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में मीडिया, डिजिटल संचार, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, भाषा प्रौद्योगिकी और सामाजिक सरोकारों से जुड़े विषयों पर सक्रिय लेखन एवं शोध कार्य कर रहे हैं। वर्तमान में वे Srijan Sansar के ग्लोबल ग्रुप एडिटर के रूप में भी कार्यरत हैं।

डॉ. शुक्ला ने अपनी प्रतिक्रिया में कहा कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता के तीव्र विस्तार के वर्तमान दौर में मीडिया और संचार जगत की जिम्मेदारियां पहले से कहीं अधिक बढ़ गई हैं। ऐसे समय में AI Ethics and Governance जैसे विषयों पर वैश्विक स्तर पर संवाद और सहयोग अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने कहा कि यह फेलोशिप न केवल उनके लिए बल्कि भारतीय मीडिया समुदाय के लिए भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सीखने और अनुभव साझा करने का एक महत्वपूर्ण अवसर है।

ज्ञातव्य है कि Knowledge Networks द्वारा संचालित विभिन्न वैश्विक कार्यक्रम कृत्रिम बुद्धिमत्ता के उत्तरदायी विकास, नियमन तथा समाज, मीडिया और सार्वजनिक नीति पर उसके प्रभाव से जुड़े विषयों पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कार्य कर रहे हैं।

जसपाल राणा-अभी तो बहुत काम बाकी था

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दिल्ली । भारतीय निशानेबाजी के महारथी और कोच जसपाल राणा के असामयिक निधन से सभी ओर शोक व्याप्त है। मात्र 49 वर्ष में चले जाना निश्चय ही ह्रदय विदारक है। देश के लिए अपूरणीय क्षति है। जसपाल निशानेबाजी के ऐसे पुरोधा थे जिन्होंने कॉमनवेल्थ खेलों में 15 पदक जीतकर भारत का मान बढ़ाया, स्वयं एशियाई खेलों और ओलपिंक में देश का प्रतिनिधित्व करने के बाद नई पीढ़ी को तैयार करने में जुट गए। इस समय वे युवा निशानेबाज मनु भाकर के गुरु थे। जसपाल राणा को अर्जुन पुरस्कार, पद्मश्री और द्रेाणाचार्य पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। वह भारतीय खेल इतिहास के सबसे चमकदार व होनहार निशानेबाज थे। उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले में जन्मे जसपाल राणा को उनके पिता नारायण सिंह राणा ने बीएसएफ अधिकारी द्वारा प्रशिक्षित करवाया था।12 वर्षीय राणा ने अहमदाबाद में 31वीं राष्ट्रीय शूटिंग चैंपियनशिप से राष्ट्रीय निशानेबाजी में पदार्पण किया था। तब किसी ने यह नहीं सोचा था कि एक दिन यह छोटा बालक इतना करिश्माई निकलेगा।

जसपाल ने आरम्भ में पिस्टल और राइफल दोनों से अभ्यास किया किंतु बाद में फेडरेशन ने एक इवेंट के लिए एक ही शूटर को चुनने का नियम लागू किया जिसके बाद उन्होंने पिस्टल शूटिंग को चुना। जसपाल 12 वर्ष की आयु तक आते आते राज्य और राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं में भाग लेने लगे थे। उन्होंने 1988 में 12 वर्ष की अवस्था में ही 31वीं नेशनल शूटिंग चैंपियनशिप में रजत पदक जीत लिया था। जसपाल राणा ने कॉमनवेल्थ खेलों और एशियाई खेलों को मिलाकर कुल 23 पदक अपने नाम किए थे। जसपाल ने एशियाई खेलों में चार स्वर्ण पदक, दो रजत और दो कांस्य पदक जीते वहीं राष्ट्रमंडल खेलों में नौ स्वर्ण, चार रजत व दो कांस्य पदक जीतकर इतिहास रच दिया। एशियाई चैंपियनशिप में एक स्वर्ण और एक कांस्य पदक जीता जबकि विश्व जूनियर चैंपियनशिप में एक स्वर्ण पदक अपने नाम किया।

जसपाल ने कई अंतरराष्ट्रीय स्पर्धाओं में अद्भुत व शानदार प्रदर्शन कर भारत का मस्तक गर्व से ऊंचा किया। 1994 मिलान विश्व शूटिंग चैंपियनशिप में उनकी जीत यादगार रही। उन्होंने यह जीत दर्द से कराहते हुए प्राप्त की थी। प्रतियोगिता से एक दिन पहले उन्हें घुटने में फोड़ा हो गया था और डाक्टरो ने उन्हें सर्जरी की सलाह देकर अस्पताल से छुट्टी देने से मनाकर दिया था किंतु उन्होंने राष्ट्रप्रथम की भावना को ध्यान में रखा और डॉक्टरों की सलाह को दरकिनार करते हुए प्रतियोगिता मे भाग लेने का निश्चय किया किंतुअस्पताल से निकलने के बाद उसी रात फोड़ा फूट गया और उनका दर्द बढ़ गया। वे अपनी जींस तक नहीं उतार पा रहे थे। ऐसे में उन्होंने जीन्स को फाड़कर ही हाफ पैंट बनाई और उसे पहनकर ही अगली सुबह प्रतियोगिता में उतरे। राणा ने असहनीय दर्द में मैच खेला और जूनियर कैटेगरी में विश्व रिकार्ड के साथ अपना पहला अंतरराष्ट्रीय स्वर्ण पदक जीता। इसी वर्ष उन्होंने हिरोशिमा एशियाई खेलों में भी स्वर्ण पदक जीता था। 1994 में हिरोशिमा एशियाई खेलों में स्वर्ण पदक जीतने के बाद जसपाल को इसी वर्ष मात्र 18 वर्ष की अवस्था में अर्जुन पुरस्कार मिला।
जसपाल राणा का जीवन खेल व राष्ट्र के प्रति समर्पित रहा। वह हर बार रेंज पर उतरते समय देश का गौरव अपने साथ लेकर चलते थे। एक खिलाड़ी के रूप में तो उनका कैरियर शानदार रहा। दूसरी पारी में वह एक अच्छे प्रशिक्षक बने। उनके मार्गदर्शन में मनु भाकर ने पेरिस ओलंपिक में दो पदक जीते। उन्होंने सौरभ चौधरी, अनीश भानवाला और चिंकी यादव सहित कई अन्य निशानेबाज़ो के कैरियर को संवारने में अहम भूमिका निभाई ।

जसपाल राणा की उपलब्धियों ने देश को ख़ुशी से झुमने का अवसर दिया। अगली पीढ़ी को गढ़ा। उनकी लोकप्रियता का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि उत्तराखंड के लोकप्रिय गीतकार नरेंद्र सिंह नेगी ने जसपाल के नाम से वर्ष 1999 में एक गीत बनाया था। मात्र 49 वर्ष की अवस्था में जसपाल का जाना एक शून्य उत्पन्न कर गया है। अभी तो बहुत कुछ करना था जसपाल…..इतनी जल्दी क्यों की जाने की ?

क्या अब तक नहीं देखी तुमने धुरंधर

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पुनीत बिसारिया

दिल्ली । अनेक मित्रगण आदेशित कर रहे थे कि धुरंधर फ़िल्म के बारे में कुछ लिखूँ, किन्तु मुझे लगता था कि जब तक इसके दोनों भाग न देख लूँ, तब तक इसके बारे में लिखना अनुचित होगा।

अब दोनों भाग देखने के बाद मुझे लगता है कि बीते तीन दशक के भारत और इसके पड़ोसी देश के बीच के ख़ुफ़िया तंत्र के बीच की उठापटक को समझने के लिए यह फ़िल्म बहुत महत्वपूर्ण है। पिछले कुछ समय में ऐसी अनेक फ़िल्में आई हैं, जिन्होंने इसी समयावधि की कुछ बेहद भयावह घटनाओं को उकेरने का काम किया है और यह फ़िल्म इनसे आगे बढ़कर आज के दौर में अज्ञात भारत मित्रों द्वारा भारत के दुश्मन आतंकवादियों के अड्डों में घुसकर उन्हें यमराज तक पहुँचाने की आज की कहानी भी बयान करती है; साथ ही मक्की और अतीक अहमद जैसे आतंकवादियों को मिट्टी में मिलाने और दाऊद इब्राहीम को ठिकाने लगाने की कोशिशों की कहानी भी बयान करती है और इन सबका केंद्रबिंदु बनता है कराची के पास स्थित ल्यारी नामक कस्बा,जहाँ के कुख्यात अपराधियों के बीच वर्चस्व की जंग के बीच में भारत के तीन जासूस ख़ुद को स्थापित करते हुए भारत पर होने वाले हमलों को रोकने में सफल होते हैं और आतंकवादियों को निपटाने का काम भी बखूबी करते जाते हैं।इस फ़िल्म के पहले भाग के गाने भी चर्चित हुए थे और भारत ही नहीं बल्कि पाकिस्तान में भी शादी विवाहों में लोग उसके बोलों पर थिरक रहे थे।

यह फ़िल्म वास्तव में भारत विरोधी बॉलीवुड फिल्मकारों के कफ़न में आख़िरी कील ठोंकने का काम करती है क्योंकि भारत की जानता अब इस बात को अच्छी तरह से समझ चुकी है कि वामपंथी एजेंडे के फ़िल्मकार केवल मनोरंजन नहीं परोसते, बल्कि अपने भारत विरोधी और सनातनद्रोही एजेंडे को भी फ़िल्मों के माध्यम से धार ओ देने का काम करते हैं। इसीलिए अब दबे मुँह से ही सही ऐसे फ़िल्मकार भी इस फ़िल्म तथा ऐसी अन्य फ़िल्मों की प्रशंसा करने के लिए विवश हैं। यहाँ यह तथ्य भी ध्यान में रखना चाहिये कि वामियों ने रणबीर सिंह के अभिनय की प्रशंसा करने की जगह उनके बहिष्कार का निकृष्ट प्रयास किया जिसमें वे बुरी तरह विफल रहे और उन्हें इस अभिनेता के आगे झुकना पड़ा। मेरे विचार से फ़िल्मकार आदित्य धर ने कई कालजयी फ़िल्में बनाई हैं, जिनमें उनकी अब तक की सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म धुरंधर है एल, जिसे एक बार अवश्य देखना चाहिए, किन्तु यह आरम्भ है अंत नहीं।

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