अपने भाग्योदय के लिए कांग्रेस को गांधी परिवार से आगे जाना होगा

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सुरेंद्र चतुर्वेदी

जयपुर । प्रश्न यह है कि राहुल गांधी कांग्रेस से और कांग्रेस राहुल से चाहते क्या हैं ? और ये भी कि सोनिया गांधी और प्रियंका वाडरा के अलावा *कांग्रेस में अपना राजनीतिक भविष्य तलाश या संघर्ष कर रहे राजनेता राहुल और कांग्रेस के भविष्य को लेकर क्या सोचते हैं ? प्रश्न यह भी है कि क्या कांग्रेस का राजनीतिक उदय हो भी पाएगा ?* या फिर वह राष्ट्रीय पार्टी होते हुए भी कुछ क्षेत्रों में सिमट कर रह जाएगी ?

क्या वह *बंगाल, बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश, जम्मू कश्मीर,पंजाब, दिल्ली, गुजरात, तमिलनाडू जैसे राज्यों में कभी राजनीति की मुख्यधारा में लौट पाएगी ? या यह दल 10 जनपथ की आकांक्षाओं और अपेक्षाओं की कश्मकश में ही दम तोड़ देगी ?* यह प्रश्न तब और भी महत्वपूर्ण हो जाता है *जब मोदी सरकार के प्रति आक्रमक रहने वाले राहुल गांधी क्षेत्रिय नेताओं के सामने नतमस्तक हो जाते हैं, जैसा कि पिछले दिनों पंजाब में या दिल्ली विश्वविद्यालय के चुनावों में हुआ। दरअसल कांग्रेस में ही राहुल गांधी के नेतृत्व को स्वीकारा नहीं जा रहा है। वो सिर्फ इसलिए ढोये जा रहे हैं क्योंकि वो इंदिरा गांधी के पोते और राजीव गांधी के पुत्र हैं। एक राजनेता के रूप में उनको जनमानस की अंतरधारा को समझने और उसको पकड़ने पाने की क्षमता का अभाव दिखता है।* इसीलिए वो जो भी मुद्दा उठाते हैं वो उनका अपना व्यक्तिगत मामला बन जाता है। *देश के मतदाता की तो छोड़ो कांग्रेस नेता भी उसको स्वीकार नहीं कर पाते। इसीलिए चौकीदार चोर है से लेकर वोट चोरी के आरोप तक वे अलग थलग पड़ जाते हैं।*

*विदेशों में जाकर देश की संवैधानिक संस्थाओं की आलोचना करना, भारत के आंतरिक मामलों में विदेशी हस्तक्षेप को आमंत्रित करना राहुल गांधी के ऐसे अपराध हैं जो उनकी हीन भावनाओं को सतह पर ले आते हैं। अदालतों में कई बार माँगी गई बिना शर्त माफ़ी इस बात का पर्याप्त प्रमाण है कि राहुल गांधी की बात को ज़िम्मेदारी से कहा हुआ नहीं माना जा सकता।* इसी बात का प्रतिफल राहुल के साथ साथ कांग्रेस को भी भुगतना पड़ रहा है। कमोबेश यही स्थिति आगे भी रहने की संभावना प्रबल है।

तो फिर कांग्रेस का उदय कैसे होगा ? इस प्रश्न का जवाब तो अभी भविष्य के गर्भ में हैं। जहाँ भाजपा के पास पार्टी और देश का नेतृत्व कर सकने वाले नेताओं की लंबी लाइन है, वहीं कांग्रेस 2014 में सत्ता से बाहर होने के बाद भी राहुल गांधी में ही उम्मीद की किरण देख रही है। यही वो वजह है जिसके कारण इंडी गठबंधन भी राहुल को अपना नेता मानने को तैयार नहीं है। *कांग्रेस के साथ दिक्कत यह है कि उसका नेतृत्व राहुल गांधी कर रहे हैं। वो एक ज़िद्दी बच्चे की तरह हैं, जिसको लगता है कि वो सही हैं और सिर्फ़ वो ही सही हैं बाक़ी सब ग़लत, क्योंकि वो उनकी तरह नहीं सोचते !* यही वो मूल कारण है कि राहुल और कांग्रेस एक दूसरे के ख़िलाफ़ खड़े नज़र आते हैं।

जब तक कांग्रेस सोनिया, राहुल और प्रियंका वाडरा से आगे जाकर अपना नेतृत्व तलाश नहीं लेती तब तक कांग्रेस का भाग्योदय होने में शंका ही है। चाहे फिर राहुल अपने बारे में कुछ भी चाहें या सोचें।

अपने देश का दुर्भाग्य..!

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– प्रशांत पोळ

नागपुर : जोसेफ गोबेल्स यह 1933 से 1945 तक, एडोल्फ हिटलर के नाजी जर्मनी का कुख्यात प्रचार मंत्री था। ‘हिटलर का सबसे विश्वासपात्र और निष्ठावान मंत्री’ यह उसकी पहचान थी। द्वितीय विश्व युद्ध में जर्मनी की हार होते ही हिटलर ने आत्महत्या की थी। हिटलर की मृत्यु के पश्चात मात्र एक दिन वह जर्मनी का चांसलर रहा, और 1 मई 1945 को अपनी पत्नी और 6 बच्चों को विष पिलाने के पश्चात इसने भी आत्महत्या की थी।

‘एक गलत या झूठी बात को बारंबार बोलने से वह सच लगने लगती हैं, और सत्य बन जाती हैं’। यह इसका प्रचार तंत्र था। इसे ही “गोबेल्स नीति’ या ‘बिग लाई’ (Big Lie) कहा जाता हैं।

*इस देश के विपक्ष के नेता (LoP) इस समय इसी ‘गोबेल्स तंत्र’ का उपयोग करते दिख रहे हैं।* वह कुछ दिनों से चुनाव में धांधली और वोट चोरी के आरोप लगा रहे हैं। पिछले एक महीने से उन्होंने प्रमुख चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के विरोध में मोर्चा खोल रखा हैं। राहुल गांधी, ज्ञानेश कुमार का इस्तीफा मांग रहे हैं।

वें जो आंकड़े दे रहे हैं, उन्हें देखकर कोई भी सामान्य नागरिक यही कहेगा की दाल में कुछ काला लग रहा हैं। कारण मतदाता सूचियों का जो गहन पुनरीक्षण (SIR – Special Intensive Revision) हुआ हैं, उसके कारण ड्राफ्ट मतदाता सूची (यह अंतिम सूची नहीं हैं) से 13.3 करोड़ मतदाताओं के नाम काटे (delete किए) गए हैं।

अब देखने में यहां आंकड़ा बड़ा भारी लगता है, किंतु क्या कारण है कि इतने ज्यादा नाम निकाले गए हैं?

इनमें मृत व्यक्तियों के नाम 2.7 करोड़ (20%) हैं। यह सत्यापित नाम हैं, जो निकाले ही जाने हैं। इनमें विवाद नहीं हैं। इसके सिवाय, जिनका नाम एक से ज्यादा स्थानों की मतदाता सूची में हैं, ऐसे डुप्लीकेट नामों की संख्या है 1.01 करोड़ (7.6%)। यह भी सत्यापित हैं, और इनमें विवाद नहीं हैं।

अब विवाद कहां हैं? तो वह है 9.5 करोड़ (71.5%) नामों पर, जिन्हें स्थानांतरित या गैरहाजिर बताया गया हैं। यह संख्या बड़ी हैं, किंतु इसे ठीक से समझना चाहिए। यदि व्यक्ति नहीं मिलता है या नही दिखता हैं, तो उस अनुपस्थित व्यक्ति को मतदाता कैसे मान ले? भारत में पिछले दशकों में जो इतनी बड़ी घुसपैठ हुई, वह इसी प्रकार से। इनमें से अधिकतम लोगों के पास वोटर आईडी हैं। यह कैसे हो गया? तो, उस समय वहां के बीएलओ ने, बिना प्रत्यक्ष देखे, मतदाता की अनुपस्थिति में उसे सत्यापित कर दिया था।

*किंतु अब यह नहीं चलने वाला। वोटर की अनुपस्थिति में उसे सत्यापित नहीं किया जा सकता। सही (अधिकृत) मतदाता ढूंढने की यही योग्य पद्धति हैं।*

*पिछले सप्ताह, 1 अक्टूबर 2026 से, इन 9.5 करोड़ मतदाताओं को सत्यापित करने का एक जबरदस्त अभियान चलाया जा रहा हैं। अर्थात, 9.5 करोड में से अधिकतम मतदाता, यदि वह वास्तविक (genuine) हैं, तो सत्यापित हो जाएंगे।*

अब इस प्रक्रिया में गलत क्या हैं.?

क्या यह पहली बार हो रहा हैं..?

*अपने देश में मतदाता सूची का ‘विशेष गहन पुनरीक्षण’ (SIR) इसके पहले, वर्ष 1952 से लेकर 2004 के बीच आठ बार हुआ हैं।*

1952 में देश में सबसे पहला ऐसा SIR हुआ, जब स्वतंत्र भारत की पहली निर्वाचक नामावली (वोटर लिस्ट) सत्यापित करके तैयार की गई।

1957 – 1961 और 1965 – 66 में जनसंख्या बदलावों के साथ, नए प्रदेशों के निर्मित के कारण, SIR किया गया।

1983 – 84 और 1987 -1989 इन वर्षों में मतदाता सूचियों की त्रुटियों को दूर करने के लिए, सत्यापन पर बल देने के लिए, SIR किया गया।

1992 – 1993 और 1995 यह दौर था, जब देश में पहली बार वोट देने के लिए ‘मतदाता फोटो पहचान पत्र’ (EPIC) की अवधारणा लागू हुई। सूचियों का व्यापक स्तर पर पुनरीक्षण किया गया।

2002 – 2004 यह इसके पहले का अंतिम बडा पुनरीक्षण था। उसके बाद, अभी तक विस्तृत SIR नहीं किया गया।

*इस बार के SIR की विशेषता हैं कि भारत के मतदाताओं का डिजिटल डेटाबेस (ECI – Net) बनाया जा रहा हैं। इसके कारण अब भविष्य में, एक ही व्यक्ति का, देश के दो विभिन्न सूचियों में नाम रहने जैसी समस्याएं नहीं रहेगी।*

अर्थात, अभी हो रहा ऐसा SIR पहली बार नहीं हैं। इस SIR में डिजिटाइजेशन पर जोर दिया जा रहा हैं। ताकि मतदाता सूचियों में धांधली को रोका जा सके।

तो फिर इस SIR का विरोध क्यों?

जिनको हटाने की मांग राहुल गांधी कर रहे हैं, वह ज्ञानेश कुमार 14 मार्च 2024 को चुनाव आयुक्त बने। उसके बाद हुए चुनाव में भाजपा बहुमत का आंकड़ा भी छू न सकी। 240 पर सिमट गई। वें 19 फरवरी 2025 को मुख्य चुनाव आयुक्त बनाए गए। किंतु उसके पहले, भाजपा ने 2014 में और 2019 में शानदार जीत हासिल की थी। वह किसके कारण? तब तो ज्ञानेश कुमार चित्र में ही नहीं थे..!

*आपका और हमारा दुर्भाग्य हैं कि इस देश का विपक्ष, विकास की संभावनाओं पर नहीं बोलता, देश के नीति निर्धारण की बहस में हिस्सा नहीं लेता, सामान्य व्यक्ती की सही समस्याओं को नही उठाता। वह तो केवल, जितनी भी संवैधानिक संस्थाएं हैं, उन पर आक्रमण कर रहा हैं।*

यह ठीक नहीं हैं।

जब पूरे विश्व में भारत के जांबाज कैप्टन स्मिथ माछर के शौर्य की वीरगाथाएं गायी जा रही हैं, तब हमारा विपक्ष इस वीर कैप्टन के बारे में एक शब्द भी नहीं बोल रहा हैं। भारत एशियाई खेलों में अच्छा प्रदर्शन कर रहा हैं, उसपर भी यह सब खामोश हैं। देश में इस समय हनुमान भक्ति की बयार बह रही हैं। विपक्ष उसपर भी नि:शब्द हैं।

उनका एक सूत्रीय कार्यक्रम संवैधानिक संस्थाओं को कमजोर करने का हैं।

ऐसा विपक्ष हमारे देश में हैं, यह हम सब का दुर्भाग्य हैं..!

संस्थागत विध्वंस के माध्यम से सत्ता प्राप्ति का रास्ता बेज़मेनोव की चेतावनी और इतिहास के उदाहरण

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धिप्रज्ञ द्विवेदी

दिल्ली । किसी भी राजनीतिक व्यवस्था को केवल चुनाव, सरकार और सत्ता के पदों से नहीं समझा जा सकता। उसके पीछे संस्थाएँ होती हैं, संस्थाओं के पीछे विश्वास होता है और उस विश्वास के पीछे समाज की वह मानसिकता होती है जो यह मानती है कि सत्ता बदल सकती है, लेकिन व्यवस्था बनी रहती है। जब यह विश्वास टूटने लगता है, तब राजनीतिक संघर्ष केवल सरकार बदलने तक सीमित नहीं रहता; वह धीरे-धीरे संस्थाओं, सामाजिक संबंधों और अंततः स्वयं राजनीतिक व्यवस्था को प्रभावित करने लगता है।

यही कारण है कि सत्ता प्राप्त करने की प्रक्रिया को समझते समय एक महत्वपूर्ण प्रश्न सामने आता है—क्या सत्ता हासिल करने के बाद वही लोग, समूह और संगठन भी उसी राजनीतिक संरचना में अपनी स्वतंत्र भूमिका बनाए रख पाते हैं, जिन्होंने सत्ता तक पहुँचने में योगदान दिया था?

सोवियत खुफिया तंत्र से जुड़े रहे यूरी बेज़मेनोव ने 1984 के अपने चर्चित साक्षात्कार में वैचारिक संघर्ष की एक ऐसी प्रक्रिया का वर्णन किया था, जिसे उन्होंने Demoralization, Destabilization, Crisis और Normalization जैसे चरणों में समझाया। उनके अनुसार किसी समाज को बदलने की प्रक्रिया में आरंभिक चरणों में कुछ ऐसे लोग और समूह उपयोगी हो सकते हैं, जो बाद में सत्ता के लिए ही असुविधाजनक बन जाएँ। उन्होंने विशेष रूप से कहा कि अस्थिरता पैदा करने के चरण में उपयोगी रहे कुछ लोग सत्ता परिवर्तन के बाद आवश्यक नहीं रहते और यदि वे नई सत्ता से असहमत हो जाएँ तो उसके विरोधी भी बन सकते हैं।

बेज़मेनोव की इस बात को किसी एक देश या किसी एक विचारधारा तक सीमित करके देखना आवश्यक नहीं है। उनके द्वारा बताए गए विशिष्ट ऐतिहासिक उदाहरणों की सत्यता अलग-अलग स्रोतों से जाँची जानी चाहिए, लेकिन “सत्ता के लिए सहयोगी और सत्ता के बाद प्रतिद्वंद्वी” का राजनीतिक पैटर्न इतिहास में अनेक बार दिखाई देता है।

यहीं से संस्थागत क्षरण और सत्ता के केंद्रीकरण का संबंध समझ में आता है।

सत्ता के रास्ते में सबसे पहले क्या बदलता है?

किसी स्थापित व्यवस्था को चुनौती देने वाली राजनीतिक शक्ति के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल चुनाव जीतना नहीं होती। उसे समाज के अलग-अलग वर्गों, विचारधाराओं और व्यक्तियों को एक साझा मंच पर लाना होता है।

इस प्रक्रिया में ऐसे लोग भी साथ आते हैं जिनके उद्देश्य पूरी तरह समान नहीं होते।

किसी को व्यवस्था में परिवर्तन चाहिए, किसी को भ्रष्टाचार का अंत, किसी को आर्थिक परिवर्तन, किसी को सामाजिक न्याय, किसी को राजनीतिक स्वतंत्रता और किसी को केवल मौजूदा सत्ता का विकल्प चाहिए।

सत्ता प्राप्ति के पहले यह विविधता ताकत बनती है।

लेकिन सत्ता प्राप्त होने के बाद वही विविधता कभी-कभी चुनौती बन जाती है।

क्योंकि अब प्रश्न होता है—निर्णय कौन करेगा?

यदि सत्ता का केंद्र एक व्यक्ति, एक परिवार, एक गुट या एक छोटे संगठन में अधिकाधिक केंद्रित होने लगे तो स्वतंत्र आवाजें धीरे-धीरे असुविधाजनक लगने लगती हैं। जो व्यक्ति कल तक आंदोलन का चेहरा था, वह आज निर्णय प्रक्रिया में बाधा माना जा सकता है। जो व्यक्ति कल तक विचारधारा का प्रमुख समर्थक था, वह आज “असहमति” का प्रतिनिधि बन सकता है।

और यहीं से शुरू होती है—साथियों को किनारे करने की राजनीति।

स्टालिन: क्रांति के साथियों से सत्ता के प्रतिद्वंद्वी तक

सोवियत संघ इसका सबसे कठोर ऐतिहासिक उदाहरण प्रस्तुत करता है।

बोल्शेविक क्रांति के दौरान अनेक ऐसे नेता थे जिन्होंने रूसी साम्राज्य को समाप्त करने और नई कम्युनिस्ट व्यवस्था स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। लेकिन सत्ता के स्थिर होने के बाद राजनीतिक संघर्ष समाप्त नहीं हुआ। वह स्वयं कम्युनिस्ट पार्टी के भीतर चला गया।

स्टालिन ने 1920 के दशक के उत्तरार्ध में अपने संभावित प्रतिद्वंद्वियों को क्रमशः हटाना शुरू किया। ट्रॉट्स्की, जिनोविएव और कामेनेव जैसे प्रमुख बोल्शेविक नेता पार्टी से निकाले गए। बाद में निकोलाई बुखारिन भी स्टालिन की नीतियों के विरोध के कारण निशाने पर आए। अमेरिकी Library of Congress के सोवियत अभिलेखों पर आधारित विवरण के अनुसार 1930 के दशक के Great Terror में स्टालिन के पुराने बोल्शेविक विरोधियों के विरुद्ध मुकदमे और व्यापक शुद्धिकरण हुए; अंततः पार्टी और समाज दोनों में भय तथा अधीनता का वातावरण स्थापित हुआ।

यहाँ महत्वपूर्ण बात केवल यह नहीं है कि स्टालिन ने अपने विरोधियों को हटाया।

महत्वपूर्ण बात यह है कि जिन लोगों ने उसी क्रांतिकारी राजनीतिक परियोजना को आगे बढ़ाने में भूमिका निभाई थी, वे सत्ता के केंद्रीकरण के बाद स्वयं सत्ता के लिए खतरा माने जाने लगे।

अर्थात संघर्ष अब “क्रांति बनाम पुरानी व्यवस्था” का नहीं था।

संघर्ष बदलकर हो गया—

“सत्ता के भीतर कौन रहेगा और किसकी स्वतंत्र राजनीतिक शक्ति स्वीकार की जाएगी?”

माओ और चीन: क्रांति के बाद क्रांतिकारियों की बारी

चीन में माओ के नेतृत्व में भी सत्ता संघर्ष का एक ऐसा ही दूसरा रूप दिखाई देता है।

1966 में शुरू हुई Cultural Revolution ने चीन की राजनीतिक और सामाजिक व्यवस्था को गहराई से प्रभावित किया। वरिष्ठ कम्युनिस्ट नेता लियू शाओछी, जो कभी चीन के सर्वोच्च नेतृत्व में थे, स्वयं राजनीतिक संघर्ष के शिकार हुए। पेंग दहुआई जैसे वरिष्ठ सैन्य नेता भी पहले ही राजनीतिक रूप से किनारे किए जा चुके थे।

Cultural Revolution के दौरान वरिष्ठ नेताओं, बुद्धिजीवियों और लाखों सामान्य नागरिकों को राजनीतिक उत्पीड़न का सामना करना पड़ा।

इसका एक महत्वपूर्ण राजनीतिक संदेश था—क्रांति के पुराने प्रमाणपत्र से किसी व्यक्ति की राजनीतिक सुरक्षा सुनिश्चित नहीं होती।

कल का क्रांतिकारी आज पर्याप्त क्रांतिकारी नहीं माना जा सकता।

कल का सहयोगी आज संशयास्पद हो सकता है।

और कल का नायक आज सत्ता के लिए बाधा बन सकता है।

यही वह बिंदु है जहाँ बेज़मेनोव की चेतावनी इतिहास के इन उदाहरणों से जुड़ती है।

बांग्लादेश: सत्ता के केंद्रीकरण का दूसरा रूप

बेज़मेनोव ने अपने साक्षात्कार में बांग्लादेश के शेख मुजीबुर रहमान का भी उदाहरण दिया था। उनके द्वारा प्रस्तुत व्याख्या को उसी रूप में स्वीकार करने के बजाय ऐतिहासिक घटनाओं को स्वतंत्र स्रोतों से देखना अधिक उचित है।

बांग्लादेश की स्वतंत्रता के बाद मुजीब देश के निर्विवाद राजनीतिक केंद्र बने। लेकिन आर्थिक संकट, प्रशासनिक कठिनाइयों और राजनीतिक अस्थिरता के बीच 1975 में उन्होंने संवैधानिक परिवर्तन के माध्यम से कार्यपालिका को अधिक शक्तिशाली बनाया और एक-दलीय व्यवस्था BAKSAL स्थापित की। अमेरिकी विदेश विभाग के ऐतिहासिक रिकॉर्ड के अनुसार इससे विधायिका और न्यायपालिका की शक्तियों पर भी सीमाएँ आईं। अगस्त 1975 में सैन्य अधिकारियों के एक समूह ने तख्तापलट किया और मुजीब तथा उनके परिवार के अधिकांश सदस्यों की हत्या कर दी।

यह उदाहरण सोवियत या चीनी शुद्धिकरण के समान नहीं था। यहाँ घटनाक्रम का स्वरूप अलग था। लेकिन एक साझा राजनीतिक प्रश्न फिर भी सामने आता है—

जब सत्ता का केंद्रीय आधार अत्यधिक संकुचित हो जाता है तो उसके आसपास मौजूद स्वतंत्र संस्थाएँ और स्वतंत्र शक्ति-केंद्र कितने मजबूत रह जाते हैं?

भारत में लोकतांत्रिक राजनीति का अलग लेकिन महत्वपूर्ण उदाहरण

भारत में परिस्थितियाँ इन अधिनायकवादी उदाहरणों से बिल्कुल अलग हैं। यहाँ बहुदलीय लोकतंत्र, चुनाव, न्यायपालिका, संविधान और सार्वजनिक राजनीतिक प्रतिस्पर्धा मौजूद हैं।

इसलिए भारतीय उदाहरणों को स्टालिन या माओ के साथ समान स्तर पर रखना उचित नहीं होगा।

फिर भी लोकतांत्रिक राजनीति के भीतर एक छोटा लेकिन महत्वपूर्ण पैटर्न देखा जा सकता है—सत्ता या संगठन के भीतर पुराने साथियों और स्वतंत्र प्रभाव वाले नेताओं के बीच टकराव।

इसका सबसे चर्चित आधुनिक उदाहरण आम आदमी पार्टी का प्रारंभिक दौर है।

आम आदमी पार्टी: आंदोलन से संगठन तक

आम आदमी पार्टी का उदय भ्रष्टाचार-विरोधी आंदोलन की पृष्ठभूमि में हुआ। इसके शुरुआती दौर में अरविंद केजरीवाल के साथ योगेंद्र यादव, प्रशांत भूषण, कुमार विश्वास, शांति भूषण, शाजिया इल्मी, आशुतोष और अन्य कई प्रमुख चेहरे जुड़े।

यह एक सामान्य राजनीतिक दल की तरह जन्मी पार्टी नहीं थी। इसके पीछे आंदोलन की ऊर्जा थी और आंदोलन में अलग-अलग व्यक्तित्वों तथा विचारों का योगदान था।

लेकिन सत्ता और संगठन के विस्तार के साथ मतभेद सामने आए।

2015 में योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण को पार्टी की Political Affairs Committee से हटा दिया गया। उस समय पार्टी के भीतर नेतृत्व और संगठनात्मक दिशा को लेकर गंभीर मतभेद सामने आए।

इसके बाद पार्टी के कई पुराने प्रमुख चेहरे अलग होते गए। आशुतोष ने 2018 में इस्तीफा दिया। कुमार विश्वास भी पार्टी की सक्रिय राजनीति से अलग हो गए। शाजिया इल्मी ने भी पार्टी छोड़ी। बाद के वर्षों में अन्य प्रमुख नेताओं के साथ भी अलगाव हुआ। 2026 में राघव चड्ढा के नेतृत्व में AAP के कई राज्यसभा सांसदों के पार्टी छोड़ने ने इस क्रम को फिर चर्चा में ला दिया।

यहाँ भी हर व्यक्ति के अलग होने का कारण एक जैसा नहीं था।

इसलिए यह कहना उचित नहीं होगा कि सभी को किसी एक व्यक्ति ने “हटा दिया”।

लेकिन राजनीतिक दृष्टि से प्रश्न फिर भी महत्वपूर्ण है—

जिस आंदोलन ने अनेक प्रभावशाली और स्वतंत्र व्यक्तित्वों को एक साथ लाकर राजनीतिक शक्ति बनाई थी, समय के साथ वह संगठन कितनी स्वतंत्र आवाजों को अपने भीतर बनाए रख पाया?

यही वह प्रश्न है जिसे बेज़मेनोव के “कल के उपयोगी सहयोगी, आज के असुविधाजनक व्यक्ति” वाले विचार के संदर्भ में देखा जा सकता है।

राजस्थान: सत्ता साझा करने से सत्ता संघर्ष तक

राजस्थान में 2018 में कांग्रेस की सरकार बनने के बाद अशोक गहलोत और सचिन पायलट के बीच नेतृत्व और संगठन को लेकर तनाव खुलकर सामने आया।

सचिन पायलट उस समय प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष थे और पार्टी को सत्ता में वापस लाने की प्रक्रिया में उनकी महत्वपूर्ण संगठनात्मक भूमिका थी। लेकिन मुख्यमंत्री पद अशोक गहलोत को मिला। इसके बाद मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री के बीच राजनीतिक तनाव बना रहा।

2020 में संघर्ष इतना बढ़ा कि पायलट को उपमुख्यमंत्री और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दोनों पदों से हटा दिया गया। उनके समर्थक माने जाने वाले कुछ नेताओं पर भी कार्रवाई हुई।

यह भी किसी अधिनायकवादी शुद्धिकरण का उदाहरण नहीं था। यह लोकतांत्रिक पार्टी के भीतर नेतृत्व संघर्ष था।

लेकिन इससे एक सामान्य राजनीतिक सत्य सामने आता है—

जो नेता सत्ता तक पहुँचने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, वह सत्ता स्थापित होने के बाद स्वतः ही सत्ता का सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति नहीं बन जाता।

कर्नाटक: साथ चलने वाले दो नेता और सत्ता का परिवर्तन

कर्नाटक का उदाहरण इससे भी अलग है।

2023 में कांग्रेस ने बहुमत हासिल किया। मुख्यमंत्री पद के लिए सिद्धारमैया और डी.के. शिवकुमार दोनों दावेदार थे। अंततः सिद्धारमैया मुख्यमंत्री बने और शिवकुमार उपमुख्यमंत्री। उस समय पार्टी के भीतर सत्ता-साझेदारी को लेकर लंबे विचार-विमर्श की चर्चा हुई।

मई 2026 में नेतृत्व परिवर्तन हुआ और डी.के. शिवकुमार मुख्यमंत्री बने।

यहाँ भी “साथी को हटाने” की बात सीधे लागू नहीं होती। यह पार्टी के भीतर सत्ता-संतुलन और नेतृत्व परिवर्तन का उदाहरण है।

लेकिन यह उदाहरण यह समझने में उपयोगी है कि सत्ता एक स्थिर वस्तु नहीं है। सत्ता के भीतर भी शक्ति-केंद्र बनते और बदलते रहते हैं।

बेज़मेनोव की चेतावनी का असली अर्थ

बेज़मेनोव की बात को केवल “कम्युनिस्ट षड्यंत्र” की कहानी बनाकर देखना उनके तर्क को छोटा कर देना होगा।

उनकी मूल चेतावनी का एक व्यापक राजनीतिक अर्थ है।

किसी व्यवस्था को कमजोर करने के लिए पहले उसके प्रति विश्वास कमजोर किया जाता है।

संस्थाओं पर विश्वास कम होता है।

समाज के अलग-अलग वर्गों के बीच अविश्वास बढ़ता है।

पुरानी व्यवस्था के विरुद्ध विभिन्न समूहों को एक साथ लाया जाता है।

फिर परिवर्तन आता है।

लेकिन परिवर्तन के बाद वही विविध गठबंधन एक समस्या बन सकता है।

क्योंकि सत्ता को एक दिशा चाहिए और सहयोगी अपने-अपने विचार लेकर आते हैं।

तब दो रास्ते होते हैं।

पहला—सत्ता विभिन्न मतों और स्वतंत्र संस्थाओं को स्वीकार करके उन्हें व्यवस्था का हिस्सा बनाए रखे।

दूसरा—सत्ता धीरे-धीरे निर्णय प्रक्रिया को केंद्रीकृत करे और स्वतंत्र शक्ति-केंद्रों को कमजोर या किनारे करे।

इतिहास के कठोर उदाहरणों में दूसरा रास्ता कभी हिंसक दमन तक पहुँचा। लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में इसका हल्का रूप संगठनात्मक निष्कासन, पद से हटना, गुटबंदी, इस्तीफा या राजनीतिक अलगाव के रूप में दिखाई दे सकता है।

परिणाम की तीव्रता अलग हो सकती है, लेकिन राजनीतिक प्रश्न समान रह सकता है—स्वतंत्र शक्ति-केंद्र सत्ता के साथ कितनी देर तक सह-अस्तित्व में रह सकते हैं?

संस्थाओं से भी अधिक महत्वपूर्ण है स्वतंत्र शक्ति-केंद्र

यही कारण है कि केवल संविधान या संसद को संस्था मानना पर्याप्त नहीं है।

एक स्वस्थ लोकतंत्र में राजनीतिक दलों के भीतर भी आंतरिक लोकतंत्र आवश्यक है।

मीडिया स्वतंत्र हो।

न्यायपालिका स्वतंत्र हो।

प्रशासनिक संस्थाएँ राजनीतिक सत्ता से अलग पेशेवर भूमिका निभाएँ।

विश्वविद्यालय और बौद्धिक संस्थान प्रश्न पूछ सकें।

और राजनीतिक दलों के भीतर भी ऐसे लोग मौजूद रहें जो नेतृत्व से असहमति व्यक्त कर सकें।

क्योंकि समस्या केवल तब पैदा नहीं होती जब कोई संस्था समाप्त कर दी जाए।

समस्या तब भी पैदा होती है जब संस्था मौजूद तो रहे, लेकिन उसके भीतरस्वतंत्र निर्णय लेने की क्षमता धीरे-धीरे समाप्त हो जाए।

यहीं “संस्थागत विध्वंस” का व्यापक अर्थ सामने आता है।

संस्था की इमारत गिराना आवश्यक नहीं।

उसकी स्वतंत्रता समाप्त करना भी पर्याप्त हो सकता है।

कल के साथी ही कल के सबसे बड़े प्रतिद्वंद्वी क्यों बन सकते हैं?

राजनीति में विरोधी से संघर्ष अपेक्षित होता है।

लेकिन पुराने साथी के साथ संघर्ष अधिक महत्वपूर्ण होता है।

क्योंकि पुराना साथी सत्ता के बनने की पूरी प्रक्रिया जानता है।

वह संगठन को जानता है।

वह निर्णय लेने की शैली जानता है।

वह पुराने समझौतों को जानता है।

और सबसे महत्वपूर्ण—वह यह जानता है कि सत्ता तक पहुँचने के समय कौन-कौन साथ था।

इसलिए सत्ता के अत्यधिक केंद्रीकरण की स्थिति में पुराने स्वतंत्र सहयोगी स्वाभाविक रूप से असुविधाजनक हो सकते हैं।

स्टालिन के दौर में पुराने बोल्शेविक इसका चरम उदाहरण बने। चीन में Cultural Revolution ने वरिष्ठ कम्युनिस्ट नेताओं तक को नहीं छोड़ा। बांग्लादेश में सत्ता के अत्यधिक केंद्रीकरण के बाद राजनीतिक संकट ने अंततः सैन्य हस्तक्षेप का रूप लिया। भारत में लोकतांत्रिक परिस्थितियों में यही व्यापक प्रश्न कहीं हल्के रूप में पार्टी के भीतर गुटीय संघर्ष और नेतृत्व विवाद के रूप में दिखाई देता है।

इन घटनाओं को एक जैसा कहना इतिहास के साथ अन्याय होगा।

लेकिन उन्हें बिल्कुल अलग-अलग, एक-दूसरे से असंबद्ध घटनाएँ मानना भी राजनीतिक सत्ता के एक महत्वपूर्ण व्यवहार को नजरअंदाज करना होगा।

सत्ता की असली परीक्षा

सत्ता प्राप्त करना किसी भी राजनीतिक आंदोलन की पहली बड़ी सफलता हो सकती है।

लेकिन सत्ता को लोकतांत्रिक, संस्थागत और दीर्घकालिक बनाए रखना उससे कहीं बड़ी चुनौती है।

किसी नेता की शक्ति केवल इस बात से नहीं मापी जानी चाहिए कि उसके विरोधी कितने कमजोर हैं।

एक स्वस्थ राजनीतिक व्यवस्था में असली प्रश्न यह होना चाहिए—

क्या उसके साथ असहमति रखने वाला व्यक्ति भी उसी व्यवस्था के भीतर सम्मानपूर्वक रह सकता है?

क्या कल का साथी आज भी स्वतंत्र होकर प्रश्न पूछ सकता है?

क्या संगठन में नेतृत्व से असहमति के बाद भी व्यक्ति अपनी राजनीतिक भूमिका बनाए रख सकता है?

क्या सत्ता के आसपास एक से अधिक स्वतंत्र शक्ति-केंद्र मौजूद रह सकते हैं?

और क्या संस्थाएँ व्यक्ति से बड़ी रह सकती हैं?

यूरी बेज़मेनोव की चेतावनी को यदि किसी व्यापक ऐतिहासिक सूत्र में बदला जाए तो वह शायद यही होगा—

व्यवस्था को कमजोर करने के लिए पहले विश्वास कमजोर होता है; सत्ता प्राप्त करने के लिए गठबंधन बनते हैं; लेकिन सत्ता को स्थायी बनाने के लिए वही गठबंधन सीमित भी किए जा सकते हैं।

इसीलिए लोकतंत्र की सबसे बड़ी सुरक्षा केवल चुनाव नहीं है।

उसकी वास्तविक सुरक्षा है—मजबूत संस्थाएँ, स्वतंत्र शक्ति-केंद्र, असहमति का सम्मान और सत्ता के भीतर भी सत्ता पर प्रश्न पूछने की क्षमता।

क्योंकि जिस दिन किसी व्यवस्था में यह मान लिया जाता है कि “सत्ता के साथ होना ही राजनीतिक अस्तित्व की शर्त है,” उसी दिन लोकतांत्रिक संस्था धीरे-धीरे व्यक्ति या संगठन की अधीनस्थ संरचना में बदलने लगती है।

और इतिहास बार-बार यह दिखाता है कि सत्ता की राह में साथ चलने वाले लोग हमेशा सत्ता के अंतिम चरण तक साथ नहीं रहते।

कल के साथी, आज के प्रतिद्वंद्वी बन सकते हैं—और कभी-कभी सत्ता की सबसे बड़ी चुनौती बाहर से नहीं, भीतर से आती है।

यह संस्करण अब धारा 356 से पूरी तरह मुक्त है और लेख का केंद्रीय सूत्र शुरू से अंत तक “सत्ता प्राप्ति के बाद पुराने सहयोगियों और स्वतंत्र शक्ति-केंद्रों को किनारे करने” पर ही रखा गया है।

 

प्रांजय का आरएसएस सोर्स

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कोलकाता। प्रांजय गुहा ठाकुरता ने एक्स पर ‘लाइव ब्रेकिंग न्यूज’ के नाम से दावा किया कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के एक हिस्से की इच्छा है कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार तुरंत इस्तीफा दें। उनके अनुसार, नाम न छापने की शर्त पर बोलने वाले एक स्रोत ने कहा कि कुमार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार के लिए शर्मिंदगी बन गए हैं, क्योंकि उन्होंने भारत के सर्वोच्च न्यायालय से झूठ बोला। स्रोत का यह भी कहना था कि विशेष गहन पुनरीक्षण में मतदाता सूचियों का काम बिगड़ गया और पूर्व उपप्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी का नाम तक सूची से छूट जाना अक्षम्य है। ठाकुरता ने लिखा कि सरकार के लिए हालात गर्म हो रहे हैं।

यह टिप्पणी किसी दस्तावेज, रिकॉर्ड या नामजद बयान पर नहीं, केवल गुमनाम स्रोत पर टिकी है। जवाब में वही व्यक्ति, जिसे ठाकुरता अपना स्रोत बता रहे हैं, उनका फोन आया। उन्होंने कहा कि ठाकुरता बात करने के लिए पीछे पड़ा है। मेरी कोई रुचि नहीं है। बंगाल चुनाव की जीत के बाद ही कई लोगों के माध्यम से चिरौरी करा चुका है कि मिलने के लिए समय दे दीजिए। लेकिन यह जिस तरह झूठ फैलाता है। वह मुझे पसंद नहीं। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह पूरा विवरण झूठ है। न तो आरएसएस के किसी हिस्से ने मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की ऐसी मांग की है, न सरकार के भीतर इस आधार पर कोई शर्मिंदगी है, और न आडवाणी का नाम छूटने को लेकर बताया गया आरोप सही है। जिस मुख से कथित तौर पर यह ‘ब्रेकिंग’ निकली है, अब उसी मुख से इनकार आ चुका है। क्या अपने एक और झूठ के लिए एक और माफीनाम लिखेंगे ठाकुरता साहब।

गुमनाम स्रोत पत्रकारिता का स्थायी लाइसेंस नहीं होता। जब आरोप किसी संवैधानिक पद, चुनावी प्रक्रिया और सत्तारूढ़ दल की वैचारिक संस्था पर एक साथ लग रहा हो, तो स्रोत की पहचान, उसका पद और उसके शब्दों का सत्यापन पहली शर्त है। ‘नाम न छापने की शर्त’ लिख भर देने से न सुप्रीम कोर्ट में झूठ साबित होता है, न मतदाता सूची का कोई आंकड़ा गलत हो जाता है। आडवाणी जैसे नाम का उल्लेख सनसनी बढ़ाता है, पर सनसनी प्रमाण नहीं है।

ठाकुरता का सार्वजनिक रिकॉर्ड भी इस दावे की विश्वसनीयता नहीं बढ़ाता। सोशल मीडिया पर बार-बार सफाई और माफी का सिलसिला यह दिखाता है कि उनकी ‘सबसे तेज’ पंक्तियां पहले छपती हैं, जांच बाद में होती है। उनकी तुलना इस मामले में राहुल गांधी से की जा सकती है, अदालत में माफी देने और टाइमलाइन पर माफी लिखने में फर्क केवल मंच का है, आदत का नहीं। ऐसी आदत वाले लेखक का गुमनाम सूत्र तब तक खबर नहीं बन सकता, जब तक वह सूत्र खुद सामने आकर उसी शब्द का स्वामित्व न ले।
आगे से अफवाह फैलाने से पहले दस बार सोचने की जरूरत इसीलिए है: स्रोत अगर इनकार कर दे, तो ‘ब्रेकिंग’ केवल बदनामी रह जाती है। नाम, तारीख, दस्तावेज और जवाबदेही के बिना लिखा गया वाक्य खबर नहीं, अभियोग है।

Paranjoy’s RSS source says he wanted to join the RSS and had expressed that wish. When he received no positive response from there, he lost his composure. That is why he now wants to defame his own source. Is this not sheer pettiness, Paranjoyji? His behaviour is that of a desperate lover whose proposal has been turned down by the woman he loves.

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