क्या भारत की एग्जाम फैक्ट्री कॉकरोच पैदा कर रही है!

78.jpg
पहले जमाने में, कमजोर बच्चों को प्राइवेट ट्यूशन की जरूरत पड़ती थी, अब हर किसी को……
______________________

पटना : भारत की शिक्षा व्यवस्था के अंधेरे गलियारों में आखिर रेंगता क्या है?
सपने? महत्वाकांक्षाएं? उम्मीदें?
या फिर कुछ और?
आधी रात को मेज पर झुका एक टीनएजर । लाल आंखें। थका हुआ शरीर। सामने बिखरे टेस्ट पेपर। दूसरी ओर माता-पिता, जो कोचिंग की फीस भरने के लिए कर्ज़ और कुर्बानियों का हिसाब लगा रहे हैं। बच्चे, जो खुद को इंसान नहीं, बल्कि एक रैंक और प्रतिशत के रूप में देखने लगे हैं।
कोचिंग उद्योग इसे तैयारी कहता है।
बहुत से छात्र इसे जद्दोजहद और जीवित रहने की लड़ाई कहते हैं।
जून 2026 में पटना की सड़कों पर जो कुछ हुआ, उसने इस विरोधाभास को नंगा कर दिया। खान ग्लोबल स्टडीज़ के बाहर विरोध प्रदर्शन, तोड़फोड़, आरोप और प्रत्यारोपों का तूफान उठ खड़ा हुआ। सोशल मीडिया गरज उठा। नेता भी मैदान में कूद पड़े।
और उधर दिल्ली के जंतर मंतर पर कॉकरोचों का अजीब प्रदर्शन!
यह सिर्फ एक स्थानीय विवाद नहीं था। यह भारत के कोचिंग उद्योग की आत्मा की एक झलक थी।
एक ऐसी दुनिया, जहां कुछ शिक्षक फिल्मी सितारों जैसी लोकप्रियता रखते हैं। जहां शैक्षणिक संस्थान कॉरपोरेट साम्राज्य की तरह काम करते हैं। जहां प्रतिस्पर्धा, मुनाफा और जवाबदेही की कमी आपस में टकराती है। और जहां सबसे बड़ी कीमत अक्सर छात्रों को चुकानी पड़ती है।
सवाल असहज है।
कैसा है ये समाज जो अपने सोलह साल के बच्चे से कहता है कि अगले दो साल उसकी पूरी जिंदगी की कीमत तय करेंगे?
कैसे कुछ लोग इस विश्वास के इर्द-गिर्द 58,000 करोड़ रुपये का उद्योग खड़ा कर देते हैं?
कोचिंग अब शिक्षा का सहायक साधन नहीं रही। यह समानांतर शिक्षा व्यवस्था बन चुकी है। सात करोड़ से अधिक छात्र किसी न किसी रूप में कोचिंग से जुड़े हुए हैं। अनुमान है कि अगले कुछ वर्षों में यह उद्योग 1.3 लाख करोड़ रुपये का आंकड़ा पार कर सकता है।
आंकड़े इस दीवानगी की वजह बताते हैं।
हर साल 11 लाख से अधिक छात्र जेईई की परीक्षा देते हैं। करीब 20 लाख छात्र नीट में बैठते हैं। देश के प्रतिष्ठित संस्थानों में प्रवेश पाने की संभावना कई बार पांच प्रतिशत से भी कम होती है।
जब मुकाबला इतना बेरहम हो, तो माता-पिता केवल स्कूलों पर भरोसा करना छोड़ देते हैं।
वे अपने बच्चों को कोटा भेजते हैं। पटना भेजते हैं। सीकर भेजते हैं। हैदराबाद भेजते हैं। ऐसे छात्रावासों में, जहां जिंदगी व्हाइटबोर्ड, रैंकिंग, टेस्ट और प्रदर्शन चार्ट के बीच सिमट जाती है।
कोचिंग उद्योग का उभार कोई हादसा नहीं था। यह उस शिक्षा व्यवस्था का स्वाभाविक नतीजा है जो योग्यता का वादा तो करती है, मगर कई बार लॉटरी जैसी महसूस होती है। करोड़ों मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए आईआईटी या एम्स का प्रवेश पत्र आर्थिक असुरक्षा से मुक्ति का सुनहरा टिकट माना जाता है।
स्कूल अब भी रटने को पुरस्कृत करते हैं। प्रतियोगी परीक्षाएं तेजी, रणनीति और विशेष कौशल मांगती हैं। कक्षा और परीक्षा कक्ष के बीच एक विशाल खाई मौजूद है।
कोचिंग उद्योग उस खाई को भरने आया था। फिर उसे एहसास हुआ कि यही खाई उसकी सबसे बड़ी कमाई बन सकती है।
तकनीक ने इस कारोबार को और विस्तार दिया है। ऑनलाइन कक्षाएं, रिकॉर्डेड लेक्चर, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और व्यक्तिगत शिक्षण उपकरणों ने कोचिंग को महानगरों की सीमाओं से बाहर पहुंचा दिया है। अब छोटे शहर का छात्र भी वही व्याख्यान सुन सकता है जो दिल्ली या मुंबई का छात्र सुनता है।
उद्योग इसे लोकतंत्रीकरण कहता है।
आलोचक इसे बाज़ारीकरण कहते हैं।
दोनों में कुछ न कुछ सच्चाई है।
लेकिन इस उद्योग के सबसे काले अध्याय तब सामने आते हैं जब भारी दबाव और भारी पैसा एक साथ मिलते हैं।
नीट पेपर लीक कांड पूरे देश को झकझोर गया। जांच में ऐसे नेटवर्क सामने आए जो परीक्षा केंद्रों से कहीं आगे तक फैले थे। वर्षों से मेहनत कर रहे छात्रों को अचानक महसूस हुआ कि जिस व्यवस्था पर उन्होंने भरोसा किया था, वह भीतर से खोखली भी हो सकती है।
नुकसान केवल प्रश्नपत्र लीक होने का नहीं था।
भरोसा भी लीक हो गया था।
सुर्खियों से दूर कुछ और त्रासदियां भी हैं।
‘डमी एडमिशन’ अब आम बात बन चुकी है। छात्र स्कूलों में सिर्फ कागजों पर नामांकित रहते हैं, जबकि उनका अधिकांश समय कोचिंग संस्थानों में गुजरता है। कक्षाएं खाली होती जाती हैं। स्कूलों की भूमिका कमजोर पड़ती जाती है।
फिर आती है मानसिक स्वास्थ्य की समस्या।
चिंता। अवसाद। अकेलापन। थकान।
छात्र समीकरण हल करना सीखते हैं।
निराशा से निपटना नहीं।
असमानता का पहलू भी कम चिंताजनक नहीं है। संपन्न परिवार महंगी कोचिंग, निजी मार्गदर्शन और अनगिनत टेस्ट सीरीज़ खरीद सकते हैं। गरीब परिवारों के बच्चे वही लड़ाई कहीं कम संसाधनों के साथ लड़ते हैं।
कागज पर दौड़ सबके लिए समान है।
हकीकत में कुछ धावकों के पैरों में पहले से ही बोझ बंधा होता है।
समाधान कोचिंग संस्थानों को खलनायक घोषित करने में नहीं है। वे इसलिए पैदा हुए क्योंकि व्यवस्था ने उनकी जरूरत पैदा की।
असली सुधार कहीं और है।
आईआईटी, एम्स और अच्छे सार्वजनिक विश्वविद्यालयों में सीटें बढ़ाई जाएं। प्रवेश परीक्षाओं को रटंत प्रणाली से हटाकर समझ और विश्लेषण पर आधारित बनाया जाए। कोचिंग संस्थानों को अपनी वास्तविक सफलता दर सार्वजनिक करने के लिए बाध्य किया जाए। स्कूलों को इतना मजबूत बनाया जाए कि कोचिंग शिक्षा का विकल्प नहीं, सहयोगी बने।
सबसे महत्वपूर्ण बात, छात्र के मानसिक और भावनात्मक स्वास्थ्य को नीति के केंद्र में रखा जाए।
भारत का कोचिंग उद्योग जल्द खत्म होने वाला नहीं है। जिन आकांक्षाओं को वह पोषित करता है, वे वास्तविक हैं। जिस प्रतिस्पर्धा से वह छात्रों को लड़ने में मदद करता है, वह भी वास्तविक है।
लेकिन एक ऐसा देश, जो अपने बच्चों के सपनों को 58,000 करोड़ रुपये की परीक्षा मशीन के हवाले कर देता है, उसे खुद से एक कठिन सवाल पूछना चाहिए।
क्या सफलता की हमारी परिभाषा इतनी संकरी हो गई है कि पूरी एक पीढ़ी यह मान बैठी है कि जिंदगी एक रैंक से शुरू होती है और उसी पर खत्म?
शिक्षा का उद्देश्य नागरिक, चिंतक और नवप्रवर्तक तैयार करना था।
अगर हम सावधान नहीं हुए, तो यह व्यवस्था ऐसे लाखों थके हुए युवाओं को जन्म देगी जो परीक्षा की भूलभुलैया में दौड़ना तो जानते हैं, मगर जीवन का रास्ता भूल चुके होंगे।

कई जंगें जीत चुके हैं, लेकिन अब अदालतों को पर्यावरणविद

supreme-court.jpg.avif
प्लाचीमाडा (केरल) : जब जेसीबी और बुलडोज़र तरक्की का परचम लेकर आएं , तब नदियों, जंगलों, वन्यजीवों और आने वाली नस्लों की तरफ़ से कौन बोलेगा?

और अगर पर्यावरण की हिफाज़त करने वालों को ही तरक्की का दुश्मन समझ लिया जाए, तो फिर प्रकृति की पैरवी कौन करेगा?

ये सवाल आज इसलिए और अहम हो गए हैं क्योंकि 11 मई 2026 को प्रस्तावित पीपावाव बंदरगाह विस्तार परियोजना की सुनवाई के दौरान भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्या कांत ने पर्यावरण कार्यकर्ताओं की भूमिका पर सवाल उठाए। उन्होंने पूछा कि क्या पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने कभी किसी विकास परियोजना का स्वागत किया है? साथ ही यह चिंता भी जताई कि मुकदमेबाज़ी विकास की रफ्तार रोक रही है।
इन टिप्पणियों पर देशभर के 600 से अधिक नागरिकों, पर्यावरण संगठनों, शिक्षाविदों और सेवानिवृत्त अधिकारियों ने एतराज़ जताया। उन्होंने इन टिप्पणियों को परेशान करने वाला बताया और उन्हें वापस लेने की मांग की।
उनकी चिंता वाजिब है।
पर्यावरण आंदोलन कुछ पेशेवर प्रदर्शनकारियों का शौक नहीं है। इसकी जड़ें भारत के संविधान और लोकतांत्रिक परंपराओं में गहराई तक मौजूद हैं। संविधान का अनुच्छेद 21 हर नागरिक को जीवन का अधिकार देता है, जिसमें स्वच्छ और स्वस्थ पर्यावरण का अधिकार भी शामिल है। संविधान राज्य और नागरिकों दोनों को देश की प्राकृतिक विरासत की रक्षा करने का दायित्व भी सौंपता है।
इतिहास गवाह है कि कई बार पर्यावरण कार्यकर्ता सही साबित हुए हैं। सत्तर के दशक में हिमालयी क्षेत्र में चला चिपको आंदोलन इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। गांवों की महिलाओं ने पेड़ों से लिपटकर उनकी कटाई रोकी। उस समय उन्हें विकास विरोधी कहा गया था। आज वही लोग पर्यावरण संरक्षण के अग्रदूत माने जाते हैं। उनके संघर्ष ने भारत की वन नीति को नई दिशा दी।
कर्नाटक में अप्पिको आंदोलन ने भी यही संदेश दिया। स्थानीय समुदायों ने अंधाधुंध कटाई का विरोध किया और टिकाऊ वन प्रबंधन की पैरवी की। केरल में साइलेंट वैली वर्षावन को बचाने के लिए नागरिकों, वैज्ञानिकों और पर्यावरणविदों ने लंबी लड़ाई लड़ी। अगर वे हार जाते, तो भारत की सबसे समृद्ध जैव विविधता वाली धरोहरों में से एक हमेशा के लिए मिट सकती थी।
भारत के आदिवासी समुदायों ने भी प्रकृति की हिफाज़त में अहम भूमिका निभाई है। उन्होंने देश को याद दिलाया कि जंगल सिर्फ़ लकड़ी और खनिजों के भंडार नहीं हैं। वे जीवित संसार हैं, जो समाज, संस्कृति और पारिस्थितिकी को सहारा देते हैं।
नर्मदा बचाओ आंदोलन सभी बांध परियोजनाओं को नहीं रोक सका, लेकिन उसने विस्थापन, पुनर्वास और पर्यावरणीय प्रभाव जैसे मुद्दों को राष्ट्रीय बहस का हिस्सा बना दिया।
पर्यावरण आंदोलनों ने कई बार कॉरपोरेट लापरवाही का भी पर्दाफाश किया है।
केरल के प्लाचीमाडा में ग्रामीणों ने कोका-कोला के बॉटलिंग प्लांट पर भूजल के दोहन और स्थानीय संसाधनों को नुकसान पहुंचाने का आरोप लगाया। वर्षों के संघर्ष के बाद संयंत्र बंद हुआ।
तमिलनाडु के तूतीकोरिन में लोगों ने स्टरलाइट कॉपर संयंत्र के खिलाफ प्रदूषण को लेकर आंदोलन किया। बाद की जांचों और अदालती कार्यवाहियों ने उनकी कई आशंकाओं को सही साबित किया।
हाथियों के संरक्षण के लिए दायर एक याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु के ऊटी क्षेत्र में स्थित सिगुर पठार हाथी गलियारे को बचाने का ऐतिहासिक फैसला दिया। रिसॉर्टों और अवैध निर्माणों से घिरे इस मार्ग को अदालत ने हाथियों का “आवागमन का अधिकार” मानते हुए अतिक्रमण हटाने के आदेश दिए। यह फैसला पर्यावरण और वन्यजीव संरक्षण के इतिहास में एक मील का पत्थर माना जाता है।
वृंदावन में भी पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने कई विवादास्पद परियोजनाओं के खिलाफ अदालतों में सफल लड़ाइयां लड़ी हैं।
शायद भारत की सबसे प्रसिद्ध पर्यावरणीय कानूनी जीत ताजमहल से जुड़ी है।
सत्तर के दशक में मथुरा में तेल रिफाइनरी लगाने के प्रस्ताव का पर्यावरणविदों ने विरोध किया था। उन्हें डर था कि इससे ताजमहल को नुकसान पहुंचेगा। बाद में पर्यावरण वकील एम.सी. मेहता ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया। उन्होंने दलील दी कि आगरा के आसपास का औद्योगिक प्रदूषण ताजमहल के संगमरमर को नुकसान पहुंचा रहा है।
वैज्ञानिक अध्ययनों ने उनकी बात की तस्दीक की। अदालत ने ताज ट्रेपेजियम ज़ोन का गठन किया, उद्योगों को स्वच्छ ईंधन अपनाने के निर्देश दिए और कई प्रदूषणकारी इकाइयों को स्थानांतरित कराया।
आज शायद ही कोई कहे कि ताजमहल को बचाना विकास विरोधी कदम था। इसे भारत की सबसे बड़ी पर्यावरणीय सफलताओं में गिना जाता है।
मैसूर की चामुंडी पहाड़ियों का मामला भी ऐसा ही है। वहां प्रस्तावित रोपवे परियोजना का पर्यावरणविदों, विरासत विशेषज्ञों, स्थानीय निवासियों और सांस्कृतिक संगठनों ने विरोध किया। उनकी चिंताएं वनों की कटाई, मिट्टी के कटाव और धार्मिक-सांस्कृतिक विरासत के व्यावसायीकरण को लेकर थीं। जनविरोध के चलते सरकारों को कई बार अपने फैसले पर पुनर्विचार करना पड़ा।
बार-बार पर्यावरण आंदोलनों ने एक शुरुआती चेतावनी प्रणाली का काम किया है।
उन्होंने कुएं सूखने से पहले भूजल संकट की चेतावनी दी। उन्होंने स्वास्थ्य संकट पैदा होने से पहले प्रदूषण के खतरे बताए। उन्होंने आपदा आने से पहले पारिस्थितिक जोखिमों की ओर ध्यान दिलाया।
असल खतरा तब पैदा होता है जब हर पर्यावरणीय चिंता को विकास का दुश्मन बताकर खारिज कर दिया जाता है। इससे वैज्ञानिकों, नागरिकों, वकीलों और स्थानीय समुदायों की आवाज़ दब सकती है। सवाल पूछने का लोकतांत्रिक हक़ कमज़ोर पड़ सकता है।
भारत का पर्यावरणीय इतिहास हमें एक सीधी-सी सीख देता है।
विकास और पर्यावरण दुश्मन नहीं हैं। दोनों एक-दूसरे के साझेदार हैं। सबसे सफल परियोजनाएं वही होती हैं जो प्रकृति की सीमाओं का सम्मान करती हैं, स्थानीय समुदायों की रक्षा करती हैं और दूरगामी सोच के साथ आगे बढ़ती हैं।
जलवायु परिवर्तन, जल संकट और प्रदूषण के बढ़ते दौर में भारत को पर्यावरणीय सतर्कता की ज़रूरत पहले से कहीं ज़्यादा है।
कठिन सवाल पूछने वालों को चुप नहीं कराया जाना चाहिए। उनकी बात सुनी जानी चाहिए।
भारत की सबसे बड़ी पर्यावरणीय जीतें इसलिए संभव हुईं क्योंकि आम नागरिक खामोश नहीं बैठे। उन्होंने ताकतवर हितों को चुनौती दी, सरकारी फैसलों पर सवाल उठाए और यह आग्रह किया कि विकास की कीमत अपूरणीय विनाश नहीं हो सकती।
यह रुकावट नहीं है। यही लोकतंत्र का असली काम है।

नितिन गडकरी का एथेनॉल उत्साह: ऊर्जा आत्मनिर्भरता या जल्दबाजी?

Nitin-Gadkari-News-1_V_jpg-442x260-4g.webp
नागपुर। नितिन गडकरी जी का एथेनॉल प्रेम वाकई छलांग मारकर बढ़ रहा है। ई-10 से ई-20 होते हुए ई-85 और फिर लगभग चंद दिनों में ई-100 तक का सफर हैरान कर देने वाला है। वे भारत को तेल आयात पर निर्भरता से मुक्त करना चाहते हैं, जो सराहनीय है। देश सालाना लाखों करोड़ रुपये तेल आयात पर खर्च करता है और भू-राजनीतिक तनाव (जैसे पश्चिम एशिया संकट) ने ऊर्जा सुरक्षा को प्राथमिकता बना दिया है। एथेनॉल मिश्रण से विदेशी मुद्रा बचत, किसानों को अतिरिक्त आय, रोजगार सृजन और कम प्रदूषण जैसे फायदे स्पष्ट हैं। E20 रोलआउट पहले ही लक्ष्य से पहले पूरा हो चुका है, जिससे हजारों करोड़ की बचत हुई है।
लेकिन यह तेजी परेशान भी करती है। ज्यादातर पुरानी गाड़ियां (15-20 साल पुरानी) E5-E10 के लिए बनी हैं। E20 से ही माइलेज में 3-7% की गिरावट, इंजन में संभावित जंग और परफॉर्मेंस की शिकायतें आ रही हैं। E85 या E100 के लिए फ्लेक्स-फ्यूल वाहन जरूरी हैं, जिनकी उत्पादन क्षमता, इंफ्रास्ट्रक्चर और स्टेशन नेटवर्क अभी सीमित है। एथेनॉल उत्पादन मुख्यतः गन्ने पर निर्भर है, जो पानी की भारी खपत करता है और खाद्य सुरक्षा (फूड vs फ्यूल) का संकट पैदा कर सकता है। 2G एथेनॉल (कृषि अपशिष्ट से) बढ़ावा अच्छा है, लेकिन स्केल अभी अपर्याप्त।
गडकरी जी चाहते हैं ऊर्जा स्वावलंबन, किसान कल्याण और हरित परिवहन। यह दूरदर्शी है, लेकिन क्रियान्वयन में सावधानी बरतनी चाहिए। पुरानी गाड़ियों के मालिकों को विकल्प दें, टैक्स छूट बढ़ाएं, इंफ्रा तैयार करें और वैज्ञानिक परीक्षण पारदर्शी रखें। ब्राजील जैसा मॉडल अपनाना अच्छा है, पर भारत की विविधता (वाहन बेड़ा, जलवायु, कृषि) को ध्यान में रखें।
एथेनॉल मार्ग सही दिशा है, लेकिन छलांग नहीं, स्थिर कदमों से आगे बढ़ना चाहिए। इससे न सिर्फ पर्यावरण बचेगा, बल्कि अर्थव्यवस्था भी मजबूत होगी।

रंगमंच आंदोलन विषय केंद्रित प्रथम परिसंवाद आयोजित

unnamed-6.jpg
 
प्रकाश झा

नई दिल्ली। ‘मैथिली रंगमंच आंदोलन’ की बहुत दीर्घ तो नहीं, लेकिन स्वतंत्र भारत में एक सतत परंपरा रही है। जैसा कि अन्य कई भाषाओं में रंगकर्म की शुरुआत पहले अनुवाद से हुई, उसी तरह मैथिली में रंगमंच आंदोलन को गति देने के लिए अनुवाद के साथ -साथ मौलिक नाटकों का भी लेखन हुआ। हालांकि मैथिली में धूर्तसमागम, मणिमंजरी, गोरक्षविजय जैसे मौलिक नाटक पहले से मौजूद रहे हैं। यह बात प्रमुख नाटककार, कवि और भाषाविद् प्रो. उदय नारायण सिंह ‘नचिकेता’ ने साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली और मैथिली लोक रंग (मैलोरंग) के संयुक्त तत्वावधान में राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के अंतर्मुख सभागार में आयोजित ‘मैथिली रंगमंच आंदोलन’ पर परिसंवाद में कहा ।

मैलोरंग के निर्देशक डॉ. प्रकाश झा ने अपने अध्यक्षीय भाषण में कहा कि युवा रंगकर्मियों को व्यापक रूप से साहित्य पढ़ने की जरूरत है। बिना पढ़े रंगमंच और अभिनय के साथ न्याय नहीं किया जा सकता। उन्होंने दिल्ली एनसीआर में मैलोरंग और उससे उपजी अन्य रंग संस्थाओं की रंग गतिविधियों पर भी प्रकाश डाला।

परिसंवाद में मैथिली के अन्य विद्वान वक्ताओं ने भी अपने विचार रखे। बीज वक्तव्य देते हुए प्रदीप बिहारी ने कहा कि अनेक रंग आंदोलनों से गुजरते हुए आज मैथिली रंगमंच का परिदृश्य बहुत समृद्ध हुआ है और मिथिला के विभिन्न शहरों से लेकर ग्रामीण इलाकों तक में हो रहे नाटकों और रंगकर्म की चुनौतियों पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने कहा कि मिथिला समाज को रंगकर्मियों को प्रोत्साहित करने के लिए कदम उठाना चाहिए और नाटकों में अभिनय प्रदर्शन करने वालों को बढ़ावा देने के लिए पुरस्कार और सम्मान की व्यवस्था करनी चाहिए।
नमोनारायण मिश्र ने कोलकाता में रंगमंच से जुड़ी संस्थाओं और रंगकर्मियों के रंगमंच आंदोलन को आगे बढ़ाने के लिए किए गए योगदान की चर्चा की। किसलय कृष्ण ने मिथिला और नेपाल में मैथिली रंगमंच की गतिविधियों पर शोधपूर्ण आलेख का पाठ किया। मैथिली रंगमंच की वरिष्ठ अभिनेत्री प्रेमलता मिश्र प्रेम ने पटना के रंग आंदोलनों, रंगमंच से जुड़ी संस्थाओं और उन संस्थाओं की गतिविधियों के बारे में विस्तृत और सारगर्भित चर्चा की। उन्होंने कहा कि शुरू में रंगकर्म के लिए महिला अभिनेत्रियों का अभाव दिखता था, लेकिन धीरे-धीरे समाज में जागृति के कारण अब मैथिली रंगमंच में बड़ी संख्या में महिला अभिनेत्री और निर्देशिका सक्रिय हैं।
दूसरे सत्र में युवा लेखक अरुणाभ सौरभ ने मैथिली रंगमंच आंदोलन और उस पर वैश्विक रंगमंच के प्रभाव से संबंधित शोधपूर्ण आलेख का पाठ किया और विभिन्न नाट्य शैलियों की चर्चा की। संजीव सिन्हा ने दिल्ली रंगकर्म के संबंध में प्रेक्षकीय दृष्टि से विचार करते हुए मैथिली में मंचित नाटकों के आम लोगों पर पड़ने वाले सकारात्मक प्रभावों का उल्लेख किया।
दूसरे सत्र की अध्यक्षता प्रो. देवशंकर नवीन ने की और उन्होंने आशा व्यक्त की कि ‘मैथिली रंगमंच आंदोलन’ ने मिथिला के समाज और संस्कृति को प्रभावित किया है और आगे भी सकारात्मक योगदान करता रहेगा।
उन्होंने कहा कि साहित्य कभी भी मनोरंजन का साधन नहीं रहा, बल्कि उसका मूल उद्देश्य समाज सुधार रहा है।
कार्यक्रम की शुरुआत में साहित्य अकादेमी के उप सचिव एन सुरेश बाबु ने सभी आमंत्रित विद्वान प्रतिभागियों एवं श्रोताओं का अपनी तरफ से अकादेमी के सचिव डॉ. वरुण गुलाटी की ओर से स्वागत किया। पूरे परिसंवाद में सभागार खचाखच भरा हुआ था और इसमें मैथिली के अनेक लेखक, कवि, आलोचक उपस्थित थे। उद्घाटन सत्र का संचालन नाटककार रौशन झा तथा दूसरे सत्र का संचालन नाट्यालोचक संतोषी कुमार ने किया । अंत में धन्यवाद ज्ञापन नीतीश कुमार झा द्वारा किया गया ।
scroll to top