सृष्टि चक्र का शाश्वत सनातन संवाहक भारतीय नवसम्वत्सर

durga.jpg.webp

रायपुर : चैत्र शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि भारतीय संस्कृति में अपना विशिष्ट महत्व रखती है। यह तिथि नवसम्वत्सर – हिन्दू नववर्ष के उत्साह पर्व की तिथि है। यह तिथि भारतीय मेधा के शाश्वत वैज्ञानिकीय चिंतन – मंथन के साथ – साथ लोकपर्व के रङ्ग में जीवन के सर्वोच्च आदर्शों से एकात्मकता स्थापित करती है। वैज्ञानिकता पर आधारित प्राचीन श्रेष्ठ कालगणना पद्धति के अनुरूप ऋतु चक्र परिवर्तन एवं सूर्य – चन्द्र की गति के अनुरूप नव सम्वत्सर का प्रारम्भ होता है। भारतीय संस्कृति अर्थात् हिन्दू संस्कृति के माहों ( मासों ) का नामकरण नक्षत्रों के नाम पर हुआ। इसके लिए हमारे पूर्वजों ने व्यवस्था दी कि – जिस मास में जिस नक्षत्र में चन्द्रमा पूर्ण होगा , वह मास उसी नक्षत्र के नाम से जाना जाएगा। और इस पध्दति के अनुसार — चैत्र – चित्रा, वैशाख – विशाखा, ज्येष्ठ – ज्येष्ठ, अषाढ़ – अषाढ़ा, श्रावण – श्रवण, भाद्रपद -भाद्रपद, अश्विन – आश्विनी , कार्तिक – कृतिका, मार्गशीर्ष – मृगशिरा, पौष – पुष्य, माघ- मघा, फाल्गुन – फाल्गुनी ; आदि के आधार पर नामकरण किया है।

सृष्टि रचयिता भगवान ब्रह्मा जी ने चैत्र शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि को सूर्योदय के साथ ही सृष्टि निर्माण कार्य प्रारम्भ किया था। जो कि सात दिनों तक चला और इसी कारण से सृष्टि सम्वत्सर – नवसम्वत्सर का प्रारम्भ भी इसी तिथि से माना जाता है ‌। इस प्रकार भारत की शाश्वत सनातनी हिन्दू धर्म संस्कृति के संवाहक एवं अविरल प्रवाह के रूप में – हिन्दू नववर्ष / नवसम्वत्सर सतत् अपनी वैविध्य पूर्ण उत्सवधर्मी छटा बिखेरता आ रहा है।

भारतीय संस्कृति एवं प्रकृति का पारस्परिक तादात्म्य भी अपने आप में अनूठा है। हम प्रायः देखते हैं कि -चैत्र प्रतिपदा के साथ ही प्रकृति में परिवर्तन – नव चैतन्यता, नवोत्साह का वातावरण यत्र – तत्र सर्वत्र दिखाई देने लग जाता है। बसंतोत्सव में माँ वीणापाणि के पूजन के सङ्ग वृक्षों पर नव कोपल आने लगते हैं। साथ ही ऋतुराज वसंत चैत्र शुक्ल प्रतिपदा तिथि से
अपनी पूर्णता को प्राप्त करता हुआ दिखता है। ग्रीष्म ऋतु में फलदार वृक्षों पर प्रायः फल आ जाते हैं । सूर्य की किरणों से प्रकृति द्युतिमान होने लग जाती है। इसी समयफसलों की कटाई के साथ ही कृषकों के यहाँ धन- धान्य का आगमन होने लग जाता है। इस प्रकार नव सम्वत्सर में नव परिवर्तन की धानी चूनर ओढ़े प्रकृति आनन्द की रचना करने लग जाती है ।

प्रकृति के साहचर्य के सङ्ग जीवन की उमङ्गों को बिखेरने वाला भारतीय नव‌ सम्वत्सर अपने आप में अद्वितीय-अनूठा-अनुपमेय एवं‌ अप्रतिम है। स्थूल से लेकर सूक्ष्मतम् काल गणना की पद्धति अर्थात् – पृथ्वी के समानान्तर – सूर्य, चन्द्र व समस्त ग्रह – नक्षत्रों की गति के अनुरूप समय की लघुतम ईकाई को ध्यान में रखकर भारतीय पञ्चाङ्ग में वर्ष की कालगणना का प्रतिपादन दृष्टव्य होता है। इस दिशा में महान गणितज्ञ एवं खगोलशास्त्री भास्कराचार्य का योगदान अप्रतिम है। उन्होंने चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को ही सूर्योदय से सूर्यास्त तक कालखण्ड की वैज्ञानिक विवेचना करते हुए दिन, महीने और वर्ष की गणना करते हुए ‘पञ्चाङ्ग’ की रचना की थी। वर्तमान में गेग्रोरियन कैलेण्डर के प्रचलन के बाद भी भारतीय जीवन पद्धति में भारतीय पञ्चाङ्ग प्रणाली के अनुसार ही शुभ मुहूर्त देखकर समस्त शुभकार्य एवं प्रयोजन सम्पन्न कराए जाते हैं। संस्कारवान श्रेष्ठ समाज की रचना के उद्देश्य से महान पूर्वजों द्वारा बनाए गए सोलह संस्कारों यथा —गर्भाधान , पुंसवन , सीमन्तोन्नयन , जातकर्म, नामकरण संस्कार,निष्क्रमण संस्कार, अन्नप्राशन , चूड़ाकर्म , विद्यारम्भ , कर्णवेध , यज्ञोपवीत ,वेदारम्भ, केशान्त, समावर्तन, विवाह व अंत्येष्टि ; इन समस्त संस्कारों को भारतीय तिथि, मुहूर्त देखकर सम्पन्न कराया जााता है।

भारतीय संस्कृति में ‘शक्ति’ का बहुत बड़ा महत्व है। शक्ति की साधना और आराधना ने भारतीय चिति को ज्ञान- विज्ञान के सर्वोच्च – सर्वोत्कृष्ट वरदान दिए हैं। चैत्र शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि से ही माँ आदिशक्ति दुर्गा भवानी की उपासना का पावन पर्व चैत्र नवरात्रि भी प्रारम्भ होता है।प्रतिपदा से लेकर नवमी तक प्रमुख रूप से माता के नौ स्वरूपों की आराधना की जाती है। माँ के नव स्वरुपों का ध्यान इस मन्त्र से किया जाता है —
प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्मचारिणी।
तृतीयं चन्द्रघण्टेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम् ।।
पंचमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च।
सप्तमं कालरात्रीति महागौरीति चाष्टमम् ।।
नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गा: प्रकीर्तिता:।

भारतीय परम्परा में शक्ति स्वरूपा माता की पूजा और नौ दिनों में कन्याओं को देवी का स्वरूप मानकर कन्या पूजन करना हमारी संस्कृति के सर्वोच्च जीवनादर्शों को प्रस्तुत करता है भारतीय संस्कृति एवं परम्परा में – नारी शक्ति का स्वरूप जीवन के मूल – आधार के रूप में है। जो अपनी शक्ति से सृजन का संसार रचती है। नवरात्रि का पर्व हमारी उसी महान सभ्यता के साथ हमें एकमेव करता है । जो माता के रूप में शक्ति की भक्ति करता हुआ लोकमङ्गल की कामना करता है।

इतना ही नहीं नवसम्वत्सर की चैत्र शुक्ल पक्ष प्रतिपदा तिथि ब्रम्हा जी की सृष्टि रचना के साथ – साथ चतुर्युगों — सतयुग, त्रेता, द्वापर एवं कलियुग की वैशिष्ट्य से भी जोड़ती है। यह तिथि हमारे गौरवशाली अतीत के साथ – हमारा परिचय करवाती है। यह तिथि यह बोध करवाती है कि – हमारी संस्कृति के महान आदर्श कौन थे? कौन हैं? और उनका पथानुसरण करते हुए युगानुकुल ढंग से हमें निरन्तर गतिमान रहना चाहिए।

त्रेता में यह तिथि मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम से जुड़ती है। अपने चौदह वर्ष का वनवास काटने एवं अधर्म रुपी रावण का समूल संहार करने के पश्चात भगवान अयोध्या लौटे। तदुपरान्त चैत्र शुक्ल पक्ष प्रतिपदा तिथि को उनका वैदिक विधि विधान के‌ साथ राज्याभिषेक हुआ । रामराज्य के शंखनाद से चहुंओर आनंद की लहर दौड़ गई। बाबा गोस्वामी तुलसीदास जी ने रामराज्य के विषय में लिखा—
दैहिक दैविक भौतिक तापा।राम राज नहिं काहुहि ब्यापा॥
सब नर करहिं परस्पर प्रीती।चलहिं स्वधर्म निरत श्रुति नीती॥

इतना ही नहीं चैत की नवमी तिथि को भगवान मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम का प्राकट्योत्सव भी है। अहा! कितना सुन्दर समन्वय है न! कि चैत्र की प्रतिपदा और नवमी तिथियाँ – ये दोनों प्रभु के जीवन से जोड़ती हैं। जहां श्री राम नवमी को भगवान का प्राकट्य पर्व है तो प्रतिपदा रामराज्य के राज्याभिषेक का पर्व। वहीं द्वापर में महाभारत युद्ध पूर्ण होने पर भगवान श्री कृष्ण के पाञ्चजन्य घोष के साथ ही युधिष्ठिर का राजतिलक हुआ। उन्होंने राजसूय यज्ञ सम्पन्न करने के पश्चात चैत्र शुक्ल प्रतिपदा तिथि से ही युधिष्ठिर सम्वत का शुभारम्भ भी किया था। वरुणदेव के अवतार माने जाने वाले भगवान झूलेलाल के प्राकट्य पर्व ‘चेटी चंड’ को सिंधी समाज के साथ साथ समूचा भारत मनाता है। यह पर्व प्रेम सद्भाव एकत्व एवं सौहार्द के साथ जीवमात्र के प्रति प्रेम की कामना करता है।

चैत्र शुक्ल प्रतिपदा तिथि को ही भूतभावन बाबा महाकाल की नगरी अवंति (उज्जयिनी) में महान सम्राट राजा विक्रमादित्य ने विक्रम सम्वत का शुभारम्भ किया था। उन्होंने पतित पावनी शिप्रा के तट पर सम्वत पर्व मनाया गया था। वर्तमान में यही विक्रम सम्वत भारतीय जीवन पद्धति में सर्वाधिक प्रचलन में है। आधुनिक सन्दर्भ में हिन्दू नववर्ष के रूप में विक्रम सम्वत के साथ ही नवसम्वत्सर का शुभारम्भ पर्व सर्वत्र मनाया जाता है।

चैत्र शुक्ल प्रतिपदा की तिथि अपने आप में संस्कृति एवं विचारों के वैशिष्ट्य को समेटे हुए है। इसी तिथि को महर्षि दयानंद ने आर्य समाज की स्थापना की थी। सिख पंथ की दशम गुरु परम्परा के दूसरे गुरू – गुरु अंगदेव का जन्म भी चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को ही हुआ था। वहीं विश्व के अपने आप में अनूठे – स्वयंसेवी सांस्कृतिक संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रथम सरसंघचालक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार का जन्म भी इसी दिन हुआ था। उन्होंने 27 सितम्बर 1925 को विजयादशमी के दिन हिन्दू समाज को संगठित – सर्वशक्तिमान बनाने के उद्देश्य से संघ की स्थापना की थी। उनकी उसी विशद् दृष्टि से निर्मित रा.स्व.संघ राष्ट्रभक्त व्यक्तित्व निर्माण के पुनीत कार्य में सतत् जुटा हुआ है।

नवसम्वत्सर – हिन्दू नववर्ष अपनी महान विरासत व वैज्ञानिक पद्धति के साथ – साथ अपनी बहुवर्णी उत्सवधर्मिता के माध्यम से समूचे भारत को एकसूत्र में पिरोता है। यह पर्व देश के विभिन्न हिस्सों में यथा —दक्षिण भारत क्षेत्र के- आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, केरल व कर्नाटक इसे ‘उगादि पर्व’ व कश्मीर में ‘नवरेह’ तो वहीं पूर्वोत्तर क्षेत्र के असम में ‘बिहू’ और मणिपुर में माह के पहले दिन के रूप में – सजीबू नोंग्मा, पनबा या मीती चेरोबा सा सजीबू चेरोबा आदि के रूप में मनाया जाता है।

इसके साथ ही तमिलनाडु में ‘पुतुहांडु’ और केरल में ‘विशु’ के रूप में भी नवसम्वत्सर मनाने की परम्परा देखने को मिलती है। महाराष्ट्र में चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के दिन उत्सव के रूप में ‘गुड़ी पड़वा’ हर्षोल्लास के रंग में डूबकर मनाया जाता है। इस उल्लास पर्व का क्षेत्र भगवान परशुराम की भूमि गोवा , कोंकण क्षेत्र तक विस्तृत है। वहीं पंजाब में ‘बैसाखी’ के रूप में और बंगाल प्रांत में ‘पोहेला बैसाखी ‘ या ‘नबा बरसा’ के रूप में हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है।

ज्ञान – विज्ञान एवं उत्सव के विविध रङ्गों से सुसज्जित हिन्दू नववर्ष मनुष्य व प्रकृति के साथ एकात्म स्थापित करने वाला है। यह पर्व मनुष्य की सर्वोच्च मेधा के प्रतीक को अभिव्यक्त करता है। हमारी ऋषि परम्परा ने युगों पहले जिस वैज्ञानिक चिंतन पद्धति को जीवन में ढाल दिया था। वह वर्तमान में भी आश्चर्य का विषय है। सोचिए! प्रकृति के सूक्ष्म परिवर्तन, वैज्ञानिकीय कालगणना के साथ ही हिन्दू नववर्ष – नवसम्वत्सर का शुभारम्भ होता है। अर्थात् प्रकृति के नवोन्मेष के सङ्ग – नवसम्वत्सर का आगमन, जो कि वैज्ञानिक अनुसंधानों की कसौटी पर पूर्णतः खरा है। यह समूचे राष्ट्र के लिए गौरव का विषय है कि हमारे पास ‘स्वत्वबोध’ के महान आदर्श एवं जीवन पद्धतियाँ हैं, जो लोकल्याण की भावना से परिपूर्ण हैं। हमारी श्रेष्ठ भारतीय संस्कृति व्यष्टि -समष्टि एवं परमेष्ठि के साथ तादात्म्य एवं साहचर्य निरुपित करती है । उसी संस्कृति का शाश्वत संवाहक हिन्दू नववर्ष- नवसम्वत्सर है। जो लोकमङ्गल के विपुल उत्साह, उत्सवधर्मी जीवन और सृजन का विराट संसार रचाए बसाए हुए ‘स्व’ को पहचानकर कृण्वन्तो विश्वमार्यम का चिर सनातन संदेश दे रहा है।

खून, खामोशी और खतरनाक मंसूबों का खेल

default.jpg.avif


प्रणय विक्रम सिंह

दिल्ली । यह दौर सिर्फ युद्ध का नहीं, बल्कि वैश्विक पाखंड के बेनकाब होने का है। समय दुआओं का है, लेकिन दुनिया बारूद और खामोशी के साये में खड़ी है। रमजान का महीना है। वो महीना, जिसमें रोज़े रखे जाते हैं, दुआएं मांगी जाती हैं, इफ़्तार की थालियों में उम्मीद सजती है लेकिन आज उसी वक्त ईरान और उससे जुड़े 22 मुल्कों की फिज़ा में दुआ नहीं, धुआं उठ रहा है।

न कोई रोज़ा दिख रहा है, न इफ़्तार की रौनक, न सहरी की सादगी बस बारूद की बदबू है। और आसमान पर लाल रंग के सिवा कोई रंग नहीं।

हजारों घर ज़मीन में मिल चुके हैं, जिन चौखटों पर कभी दुआएं सजती थीं, वहां अब मातम पसरा है। बड़ी-बड़ी हस्तियां बेमौत मार दी गईं। लारिजानी, सुलेमानी और कहते हैं कि खामनेई सहित 56 शीर्ष नेता और कमांडर भी इस खामोश कत्लेआम की सूची में जोड़ दिए गए। यह दरअसल मौतों का सिलसिला भर नहीं, बल्कि एक सभ्यता के आत्मविश्वास पर हुआ गहरा आघात है।

मोसाद की आंखें ईरान की दीवारों के भीतर तक उतर गई हैं। उसकी ‘डीप पेनिट्रेशन स्ट्रेटेजी’ ने ईरान की दीवारों को ही नहीं, उसकी व्यवस्था की जड़ों को भी हिला दिया। इंटेलिजेंस वॉरफेयर, इनसाइड नेटवर्क और टार्गेटेड एलिमिनेशन इन तीनों के त्रिकोण ने मिलकर यह साबित किया कि आधुनिक युद्ध अब केवल सीमाओं पर नहीं, सिस्टम के भीतर लड़े जाते हैं। अपने ही घर के लोग अपने ही आसमान को निशाना बनवाने लगे, यह केवल जासूसी नहीं, बल्कि ‘ट्रस्ट का टोटल ब्रेकडाउन’ है।

अजीब वक्त है… न कोई मज़हब बचाने आया, न कोई खुदा उतर कर पूछ रहा है कि कैसे हो मेरे बंदो? और जो 22 इस्लामिक मुल्क हैं वो भी जैसे खामोशी की चादर ओढ़े बैठे हैं। यहां तक कि जो गाज़ा पर सड़कों को जाम कर देते थे, वे आज ईद की खरीदारी में मशगूल हैं जैसे संवेदना भी अब ‘सेलेक्टिव रिस्पॉन्स’ बन चुकी हो।

ईरान का आसमान अमेरिका और इजराइल ने मिलकर रक्तरंजित कर दिया है। मोसाद ने चुन-चुन कर इतिहास की इस धरोहर को जख्मों का जखीरा बना दिया।

इजराइल से तो दुश्मनी पुरानी है, पर अमेरिका…? उसे क्या मिला इस जंग से? शायद इसका उत्तर खुद ट्रंप भी नहीं जानते होंगे।

हां, एक सच है कि इतिहास गवाह है… हर युद्ध अपने साथ विजय से ज्यादा विनाश छोड़ता है। और यह भी तय है कि अमेरिका को इस जंग से यश नहीं, जलालत मिलेगी। अपने ही घर में सवाल उठेंगे, अपने ही लोग जवाब मांगेंगे। और जो 450 किलो यूरेनियम की चाह है वो ख्वाब ही रहेगा। क्योंकि अगर ईरान ने बम नहीं बनाया, तो उसने उसे कहीं और सुरक्षित कर दिया होगा… शायद रूस… शायद चीन।

डर एक था और वह सही भी था कि जिस दिन ईरान के पास परमाणु शक्ति आई, वह सीधे इज़राइल की ओर बढ़ेगी। और इज़राइल का अस्तित्व मिट सकता है। इस डर ने अमेरिका को युद्ध की ओर धकेला पर सवाल यह भी है कि पाकिस्तान के बमों पर यह खामोशी क्यों है…? क्या वे कभी ख़तरा नहीं बनेंगे…? या खतरे भी अब चयनित हो गए हैं…?

इसी परिप्रेक्ष्य में एक और घटना दिल दहला देती है। अभी 3 दिन पहले ही पाकिस्तान ने काबुल की राजधानी में एक अस्पताल को एयरस्ट्राइक में निशाना बनाया। जहां जीवन बचाने की कोशिश होती है, वहां मौत उतार दी गई। जहां दवाइयां होनी चाहिए थीं, वहां धुएं और चीखों का अंधकार फैल गया। 400 लोग मारे गए, 250 से अधिक घायल होकर तड़पते रह गए। पर इससे भी अधिक भयावह है उस त्रासदी पर पसरा सन्नाटा। भारत में ईरान और गाज़ा के नाम पर सड़कों पर उतरकर प्रदर्शन करने वाले लोग आज इस त्रासदी पर एक सुविधाजनक खामोशी ओढ़े हुए हैं। वैश्विक मंचों पर भी कोई तीखी प्रतिक्रिया नहीं। अमेरिका तो ऐसी चुप्पी साधे बैठा है जैसे इस हमले के बारे में वह जानता ही नहीं।

यही वह क्षण है जब यह प्रश्न भीतर तक चीर देता है कि क्या निर्दोषों का रक्त भी अब ‘जियोपॉलिटिकल इंटरेस्ट’ के तराजू पर तौला जाने लगा है? क्या संवेदनाएं भी अब ‘सेलेक्टिव सिम्पैथी’ बन चुकी हैं?

दरअसल युद्ध शुरू करना आसान होता है, पर उसे रोकना इतिहास के सबसे कठिन निर्णयों में से एक है। ऐसे समय में भारत जैसे राष्ट्र की नीति याद आती है जिसने 25 मिनट में दुश्मन के आतंकी ठिकाने ध्वस्त कर दिए, 11 एयरबेस उड़ा दिए और नूर खां के परमाणु भंडार तक ब्रह्मोस की आहट पहुंचा दी, बिना युद्ध को युद्ध बनाए।

दुनिया के बी-1 और बी-2 बॉम्बर जिन अभियानों को ‘हाइपोथेटिकल प्लानिंग’ में रखते हैं, उसका ट्रेलर भारत की धरती पर बनी एक स्वदेशी मिसाइल ने दिखा दिया। क्योंकि शक्ति का अर्थ केवल प्रहार नहीं प्रमाण भी होता है।

और शायद यही फर्क है अहंकार और आचरण में, आक्रमण और आत्मसंयम में और युद्ध और नीति में। दुनिया को अब यह तय करना होगा कि उसे सत्ता, स्वार्थ और संघर्ष की लपटों में जलकर राख होना है या संतुलन, संयम और समझ की रोशनी में चलकर अपनी राह बनानी है। क्योंकि तलवारें जीत तो लेती हैं, पर टिकती नहीं। सभ्यताएं वही जीवित रहती हैं, जो शक्ति नहीं, विवेक से दिशा चुनती हैं। जो लहू नहीं, लौ से अपना भविष्य रचती हैं।

लोक कलाकारों की रसपूर्ण प्रस्तुति के साथ संपन्न हुआ आईजीएनसीए का 39वां स्थापना दिवस

2-2-7.jpeg

नई दिल्ली :प्रख्यात लोक कलाकारों की रसमय प्रस्तुतियों के साथ इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र (आईजीएनसीए) का तीन दिवसीय स्थापना समारोह सम्पन्न हो गया। 19 से 21 मार्च तक चले इस समारोह के पहले दो दिन- डॉ. सोनल मानसिंह और डॉ. पद्मा सुब्रमण्यम की शास्त्रीय प्रस्तुतियों से गुंजायमान रहे, तो तीसरा यानी समापन दिवस लोक संगीत से गुलज़ार रहा। यह तीन दिवसीय समारोह शास्त्र और लोक का अनूठा संगम रहा। इसमें भारतीय शास्त्रीय और लोक कलाओं का ऐसा समन्वय देखने को मिला, जिसने विविधता में एकता की भारतीय सांस्कृतिक भावना को सजीव रूप में प्रस्तुत किया।

समारोह का तीसरा एवं समापन दिवस (21 मार्च) लोक संगीत के विविध रंगों से सराबोर रहा। समापन दिवस पर सांस्कृतिक प्रस्तुतियों की शुरुआत अपराह्न 4 बजे असम के बागुरुम्बा नृत्य से हुई, जिसे सुश्री स्वगता सरमा एवं संस्कृति समूह ने प्रस्तुत किया। इसके बाद, 4.30 बजे हिमाचल प्रदेश का पारम्परिक नटी नृत्य श्री प्रेम चंद बाउनाली और उनके दल द्वारा प्रस्तुत किया गया, जिसमें पहाड़ी संस्कृति की सहजता और उल्लास झलक उठा।

शाम 5 बजे गुजरात का प्रसिद्ध तलवार रास, श्री निलेश परमार एवं समूह द्वारा प्रस्तुत किया गया, जिसने वीरता और सामूहिकता का अद्भुत प्रदर्शन किया। इसके बाद 5.30 बजे केरल की प्राचीन मार्शल आर्ट ‘कलारिपयट्टु’ का रोमांचक प्रदर्शन श्री कृष्णदास गुरुक्कल एवं वल्लभट्टा कलारी समूह द्वारा किया गया, जिसने दर्शकों को आश्चर्यचकित कर दिया।

संध्या के कार्यक्रमों में 6 बजे पद्मश्री भेरू सिंह चौहान (मध्य प्रदेश) ने ‘मन लागो मेरो यार फकीरी में’ आदि कबीर के भजन सुनाकर कर श्रोताओं को एक अलग ही दुनिया में पहुंचा दिया। उनके गायन में संत कबीर की वाणी का गूढ़ आध्यात्मिक भाव मुखर हुआ। सांस्कृतिक प्रस्तुतियों की आखिरी कड़ी के रूप में, प्रसिद्ध सूफी गायिका डॉ. ममता जोशी ने सूफी एवं कबीर गायन की प्रस्तुति दी, जिसने पूरे वातावरण को भक्ति और सूफियाना रंग में रंग दिया।

ग़ौरतलब है कि समारोह के पहले दो दिन शास्त्रीय कला की उत्कृष्ट प्रस्तुतियों को समर्पित रहे। पहले दिन प्रख्यात नृत्यांगना, सांस्कृतिक विदुषी एवं पूर्व राज्यसभा सांसद ‘पद्म विभूषण’ डॉ. सोनल मान सिंह ने “नाट्य कथा – देवी” की प्रस्तुति से दर्शकों को अभिभूत कर दिया। उनकी सशक्त अभिव्यक्ति और गहन शास्त्रीयता ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। वहीं, दूसरे दिन डॉ. पद्मा सुब्रमण्यम द्वारा प्रस्तुत ‘भगवद्गीता’ पर आधारित नृत्य-नाट्य रचना केवल एक कलात्मक प्रस्तुति नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक यात्रा थी, जहां नृत्य, संगीत और दर्शन एकाकार होकर दर्शकों को भीतर तक स्पर्श कर रहे थे।

Poland Announced as Focus Country for Habitat International Film Festival 2027

2-2-6.jpeg

New Delhi : The 2026 edition of the Habitat International Film Festival (HIFF) drew to a resounding close with the screening of the acclaimed Polish biographical film Chopin, Chopin, marking a fitting finale to a vibrant celebration of global cinema.

The closing evening was attended by distinguished guests and cinema enthusiasts, culminating in a deeply moving cinematic experience that resonated strongly with the audience. Chopin, Chopin received a standing ovation, underscoring its powerful impact and the audience’s appreciation for its artistic and emotional depth.

On the occasion, Prof. (Dr.) K G Suresh, Director of the India Habitat Centre, made a significant announcement, declaring Poland as the Focus Country for the 2027 edition of the Habitat International Film Festival. The announcement reflects the growing cultural collaboration between India and Poland and builds upon the success of this year’s Polish showcase, including the Andrzej Wajda centenary retrospective.

As part of the closing ceremony, Prof. Suresh felicitated His Excellency Dr. Piotr Antoni Świtalski, Head of Mission of Poland to India, and Ms. Małgorzata Wejsis-Gołębiak, Director of the Polish Institute, in recognition of their continued efforts in fostering cultural exchange and strengthening Indo-Polish ties.

HIFF 2026 featured a diverse and engaging lineup of films from across the world, along with retrospectives, discussions, and special events that brought together filmmakers, scholars, and audiences in a shared celebration of cinema.

The festival’s successful conclusion reaffirms the India Habitat Centre’s commitment to promoting meaningful cultural dialogue through the medium of film, while setting the stage for an exciting and expanded edition in 2027 with Poland in focus

scroll to top