मखाना की खेती और बिहार के किसानों की चुनौतियां

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दरभंगा (बिहार) मखाना, जिसे फॉक्स नट या गोर्गोन नट भी कहा जाता है, एक जलजनित फसल है जो बिहार की अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुकी है। यह सुपरफूड के रूप में वैश्विक स्तर पर लोकप्रिय हो रहा है, लेकिन इसके उत्पादन का 90 प्रतिशत से अधिक हिस्सा बिहार से आता है। मिथिला, कोसी और सीमांचल क्षेत्रों में इसकी खेती सदियों से चली आ रही है। प्राचीन ग्रंथों में इसे ‘महान फल’ कहा गया है, जो विटामिन, मिनरल्स और फाइबर से भरपूर होता है। बिहार सरकार की ‘मखाना विकास योजना’ और केंद्र सरकार के ‘वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रोडक्ट’ स्कीम के तहत इसे बढ़ावा मिला है। फिर भी, बिहार के किसान इसकी खेती में भारी चुनौतियों का सामना कर रहे हैं।

मखाना की खेती: प्रक्रिया और संभावनाएं
मखाना की खेती मुख्य रूप से जल-आधारित होती है, जो तालाबों, पोखरों या जलभराव वाले खेतों में की जाती है। यह ईउरियाल फेरॉक्स नामक जलकुंभी पौधे से प्राप्त होता है। बिहार के मधुबनी, दरभंगा, सहरसा, कटिहार, पूर्णिया, सुपौल और अररिया जैसे जिलों में 40-45 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में इसकी खेती होती है। पिछले नौ वर्षों में खेती का क्षेत्र 171 प्रतिशत और उत्पादन 152 प्रतिशत बढ़ा है। एक हेक्टेयर में औसतन 21 क्विंटल बीज (गुड़िया) प्राप्त होता है, जो प्रसंस्करण के बाद 8-10 क्विंटल लावा (पॉप्ड मखाना) बनता है।

खेती की प्रक्रिया जटिल और श्रमसाध्य है। फरवरी-मार्च में बीज रोपाई की जाती है। तालाब या खेत में 6-9 इंच पानी जमा रखा जाता है। खरपतवार हटाने के बाद बीज बोए जाते हैं। जुलाई-अगस्त में फूल आते हैं, जो सितंबर-अक्टूबर में बीजों में बदल जाते हैं। कटाई के दौरान किसान 4-5 घंटे पानी में खड़े होकर हाथ से गुड़िया तोड़ते हैं। इसके बाद सुखाना, छंटाई, भूनना और फोड़ना होता है। एक किलो गुड़िया से लगभग 400 ग्राम लावा मिलता है। प्रसंस्करण में लकड़ी के हथौड़े से बीज फोड़े जाते हैं, जो हाथों को जलाने का कारण बनता है।

बिहार सरकार 75 प्रतिशत सब्सिडी देती है, जैसे ‘स्वर्ण वैदेही’ प्रजाति के बीज पर 97,000 रुपये प्रति हेक्टेयर। राष्ट्रीय मखाना अनुसंधान केंद्र, दरभंगा (ICAR) ने आधुनिक तकनीकों जैसे उथले पानी वाली खेती और बाढ़ प्रतिरोधी किस्में विकसित की हैं। इससे उत्पादकता 1.7-1.9 टन/हेक्टेयर से बढ़ाकर 3-3.5 टन/हेक्टेयर की जा सकती है। एक एकड़ में 1-1.5 लाख रुपये का मुनाफा संभव है। वैश्विक मांग बढ़ने से निर्यात 25-30 करोड़ रुपये का हो गया है, जो पाकिस्तान, अरब देशों और यूरोप तक पहुंचता है। ‘मिथिला मखाना’ को GI टैग मिला है, जो ब्रांडिंग में मदद करता है।

कुछ किसान सफलता की मिसाल पेश कर रहे हैं। दरभंगा के रामखिलावन सहनी जैसे किसान 20 बीघा में खेती कर परिवार सहित काम करते हैं। कटिहार के शोभित ने सरकारी अनुदान से शुरू की खेती अब लाखों की आय दे रही है। मिथिला के 25 जिलों में जागरूकता अभियान चल रहे हैं, जहां मशीनीकरण और ड्रोन का उपयोग बढ़ावा दिया जा रहा है।

बिहार के किसानों की चुनौतियां: मेहनत के बावजूद खाली जेबें

मखाना की चमक किसानों तक नहीं पहुंच रही। 50-60 हजार किसान और मजदूर इससे जुड़े हैं, लेकिन अधिकांश गरीब मल्लाह समुदाय से हैं, जो भूमिहीन हैं। वे किराए की जमीन पर 10-20 हजार रुपये प्रति बीघा देते हैं। प्रमुख चुनौतियां निम्न हैं:

श्रमसाध्य और स्वास्थ्य जोखिम: कटाई में किसान घुटनों तक पानी में 8-10 घंटे डूबे रहते हैं। सांस लेना मुश्किल, त्वचा रोग और दुर्घटनाएं आम हैं। सहरसा में एक किसान की मौत की घटना इसका उदाहरण है। प्रसंस्करण में हाथ जलना और धूल से सांस की बीमारियां होती हैं। कोई स्वास्थ्य सुविधा या बीमा नहीं।

बाजार और मूल्य संबंधी समस्याएं: किसानों को गुड़िया के लिए 300-500 रुपये/क्विंटल मिलता है, जबकि बाजार में लावा 5-6 हजार रुपये/क्विंटल बिकता है। बिचौलिए 80-90 प्रतिशत मुनाफा कमा लेते हैं। MSP की कमी से किसान मजबूर हैं। निर्यात लाभ किसानों को नहीं, व्यापारियों को मिलता है।
जलवायु और प्राकृतिक चुनौतियां: बाढ़ और सूखा फसल नष्ट कर देते हैं। बढ़ते तापमान से विकास प्रभावित होता है। पारंपरिक तालाबों में जल प्रबंधन कठिन; खेतों में 6-9 इंच पानी बनाए रखना चुनौतीपूर्ण। बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में 1.04 लाख हेक्टेयर बर्बाद भूमि का उपयोग संभव, लेकिन सिंचाई की कमी।

आर्थिक और तकनीकी बाधाएं: उच्च लागत (बीज, पटवन, मजदूरी) के बावजूद लाभ कम। भूमिहीन किसान ऋण पर निर्भर। आधुनिक तकनीक (मशीनरी, उच्च उपज वाली किस्में) का अभाव। प्रसंस्करण इकाइयों की कमी से कच्चा माल बाहर बिकता है। केवल 2 प्रतिशत मखाना अंतरराष्ट्रीय मानकों पर खरा उतरता है।

नीतिगत और सामाजिक मुद्दे: मखाना बोर्ड की घोषणा (2025 बजट में 100 करोड़ रुपये) हुई, लेकिन कार्यान्वयन धीमा। योजनाएं कागजी; FPO गठन सीमित। महिलाओं और युवाओं को रोजगार मिलता है, लेकिन आर्थिक तंगी बनी रहती है। GI टैग के बावजूद केवल 67 अधिकृत उपयोगकर्ता हैं।
कटिहार के देवसुंदर कुमार जैसे किसान कहते हैं, “महीनों की मेहनत पर 25 हजार बचत।” पूर्णिया के शाहजहां बताते हैं, “योजनाएं कागज पर, जमीन पर कुछ नहीं।”

समाधान की दिशा में कदम
मखाना बिहार के लिए ‘ब्लैक गोल्ड’ है, जो 70,000 हेक्टेयर क्षेत्र और दोगुना उत्पादन का लक्ष्य रखता है। मखाना बोर्ड से उत्पादन, प्रसंस्करण और विपणन मजबूत होगा। FPO, MSP, मशीनीकरण और प्रशिक्षण से किसानों को सशक्त बनाना होगा। जल प्रबंधन और जैविक खेती पर जोर दें। यदि चुनौतियां दूर हुईं, तो लाखों किसान समृद्ध होंगे। सरकार, वैज्ञानिक और किसान मिलकर ‘मखाना क्रांति’ ला सकते हैं। यह न केवल आर्थिक उन्नति, बल्कि सांस्कृतिक गौरव भी बहाल करेगा। बिहार का मखाना दुनिया की थाली सजाता है, लेकिन किसानों की थाली भरना पहली प्राथमिकता होनी चाहिए।

मखाना की छाया: बिहार के तालाबों में छिपी कहानी

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पूर्णिया (बिहार) : बिहार के पूर्णिया जिले के श्रीनगर गांव में, कोसी नदी की बाढ़ भरी धारा सालाना अपना कहर बरपाती है। चिन्मयानंद सिंह, एक युवा किसान, जो कभी पत्रकारिता की पढ़ाई कर शहर की चकाचौंध में खो जाना चाहते थे, आज तालाब के किनारे खड़े हैं। उनके हाथों में कीचड़ से सने हुए मखाने की गुड़िया हैं—वह कांटेदार बीज जो दुनिया भर में ‘सुपरफूड’ के नाम से जाना जाता है। लेकिन चिन्मयानंद के चेहरे पर मुस्कान कम, चिंता ज्यादा है। “मौसम की मार ने धान-मक्का की फसलें तबाह कर दीं,” वे कहते हैं, “लेकिन मखाना ने उम्मीद की किरण दिखाई। फिर भी, यह खेती इतनी आसान नहीं।”

यह कहानी 2021 की एक शोध रिपोर्ट से प्रेरित है, जहां ‘मॉन्गाबे इंडिया’ के पत्रकारों ने कोसी-सीमांचल क्षेत्र के 25-30 हजार हेक्टेयर मखाना खेतों का दौरा किया। चिन्मयानंद की तरह, यहां के हजारों किसान मौसम की अनिश्चितताओं से जूझ रहे हैं। बाढ़ आती है तो फसल डूब जाती है, सूखा पड़ता है तो पानी का प्रबंधन असंभव। बिहार सरकार ने 1.04 लाख हेक्टेयर बर्बाद भूमि को मखाना के लिए उपयुक्त बनाने की योजना बनाई, लेकिन जमीनी हकीकत अलग है। चिन्मयानंद बताते हैं, “हम खेतों में मेढ़ बनाते हैं ताकि 6-9 इंच पानी जमा रहे, लेकिन तूफान आते ही पत्तियां उलट जाती हैं। इन्हें सीधा करने में घंटों लग जाते हैं।” शोध के अनुसार, मखाना जलवायु-प्रतिरोधी है—इसकी पत्तियां तूफान में मुड़ जाती हैं लेकिन टूटती नहीं—फिर भी, बाढ़ से 20-25% फसल नष्ट हो जाती है।

चिन्मयानंद की कहानी शुरू होती है 2018 से, जब उन्होंने 5 एकड़ जमीन पर मखाना की खेती आजमाई। पारंपरिक रूप से, मखाना तालाबों में उगाया जाता है, जहां किसान कमर तक पानी में उतरकर कटाई करते हैं। “फरवरी-मार्च में बीज बोते हैं, जुलाई तक फूल खिलते हैं, और सितंबर-अक्टूबर में गुड़िया तोड़ते हैं,” वे वर्णन करते हैं। लेकिन कटाई की प्रक्रिया श्रमसाध्य है। सुबह 4 बजे से शाम तक, कीचड़ भरे पानी में खड़े होकर हाथों से बीज चुनना पड़ता है। कांटे हाथ चुभोते हैं, संक्रमण फैलता है, और सांस लेना मुश्किल। एक शोध अध्ययन, ‘इंटीग्रेटेड एक्वाकल्चर विद फॉक्स नट’ (2017, रिसर्चगेट), बताता है कि उत्तर बिहार के किसान मल्लाह समुदाय से हैं, जो भूमिहीन हैं और किराए की जमीन पर 10-20 हजार रुपये प्रति बीघा देते हैं। चिन्मयानंद कहते हैं, “हम 8-10 घंटे पानी में डूबे रहते हैं। कई बार दुर्घटनाएं होती हैं—एक साथी की मौत हो गई थी। कोई स्वास्थ्य बीमा नहीं।”

प्रसंस्करण की चुनौतियां और भी कठिन हैं। गुड़िया सुखाने, छंटाई, भूनने और फोड़ने का काम हाथों से होता है। लकड़ी के हथौड़े से बीज फोड़ते समय हाथ जल जाते हैं, धूल से सांस की बीमारियां होती हैं। चिन्मयानंद ने बताया, “एक किलो गुड़िया से 400 ग्राम लावा बनता है। हमें 300-500 रुपये प्रति क्विंटल मिलता है, जबकि बाजार में 5-6 हजार रुपये प्रति क्विंटल बिकता है।” यह असमानता एक 2025 की रिपोर्ट ‘ए बिलियन-डॉलर ग्लोबल मार्केट फॉर न्यूट्रिएंट-रिच फॉक्स नट्स’ में उजागर हुई, जहां कहा गया कि बिहार 90% वैश्विक उत्पादन करता है, लेकिन बिचौलिए 80-90% मुनाफा ले जाते हैं। कोई स्थानीय प्रसंस्करण इकाई नहीं, कोई कोल्ड स्टोरेज नहीं—कच्चा माल बाहर बिकता है। कीमतों में उतार-चढ़ाव से किसान कर्ज के जाल में फंसते हैं। चिन्मयानंद ने 2-3 लाख उधार लेकर शुरू किया, लेकिन पिछले साल फसल बर्बाद होने से 1.5 लाख का घाटा हुआ।

फिर भी, आशा की किरण है। राष्ट्रीय मखाना अनुसंधान केंद्र (ICAR), दरभंगा के डॉ. मनोज कुमार की शोध ने बदलाव लाया। उनकी ‘शैलो वॉटर फार्मिंग’ तकनीक से तालाबों के बजाय खेतों में 1-2 फुट पानी में खेती संभव हुई। एक केस स्टडी में, पूर्णिया के धीरेंद्र ने 48 क्विंटल फसल ली, जिससे 2.58 लाख का शुद्ध लाभ हुआ—धान की तुलना में 4 गुना ज्यादा। डॉ. कुमार ने बाढ़-प्रतिरोधी किस्में जैसे ‘स्वर्ण वैदेही’ विकसित कीं, जो उत्पादकता 1.7 टन से बढ़ाकर 3.5 टन प्रति हेक्टेयर कर सकती हैं। लेकिन चुनौतियां बरकरार हैं: बढ़ते तापमान से पौधे प्रभावित, और केवल 2% मखाना अंतरराष्ट्रीय मानकों पर खरा उतरता है।

2025 के बजट में मखाना बोर्ड की घोषणा हुई—100 करोड़ की योजना से MSP, FPO और मशीनीकरण का वादा। चिन्मयानंद जैसे किसान उम्मीद बांधे हैं। “अगर बोर्ड बना, तो बिचौलियों का राज खत्म होगा। हमारा ‘मिथिला मखाना’ GI टैग के साथ वैश्विक बाजार में चमकेगा।” लेकिन फिलहाल, वे तालाब में उतरते हैं, कांटों से जूझते हैं, और सपने बुनते हैं—एक ऐसी फसल की, जो न केवल पोषण दे, बल्कि सम्मान भी।

यह कहानी बिहार के 50-60 हजार किसानों की वास्तविकता को दर्शाती है। मखाना ‘ब्लैक गोल्ड’ है, लेकिन किसानों की थाली अभी भी खाली। क्या बोर्ड यह बदलाव लाएगा? समय बताएगा।

पैसा वसूल परिवार के साथ देखने लायक फिल्म जॉली एलएलबी थ्री

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विष्णु शर्मा

मुम्बई : जॉली एलएलबी ने राहुल गांधी की मुहिम पर हैट्रिक बनाई, लेकिन क्या विलेन राहुल गांधी हैं?
जॉली एलएलबी की तीसरी मूवी आ गई है, मूवी लोगों को पसंद भी आ रही है क्योंकि दोनों जॉली यानी सीनियर जॉली मेरठ वाले अरशद वारसी व जूनियर जॉली कानपुर वाले अक्षय कुमार एक साथ इसमें दिखेंगे. उन दोनों की जुगलबंदी ने फिल्म तो वाकई में देखने लायक बना दी है लेकिन जो लोग इस मूवी की असली कहानी जानते हैं, उनमें चर्चा शुरू हो गई है कि राहुल गांधी को क्या उस विधायक के रोल में दिखाया गया है जो पुलिस की कार्यवाही के दौरान चुपके से अपने गुंडे के जरिए डीएम को गोली मरवा देता है?  

जिन लोगों को नहीं पता, वो ये जान लें कि इस मूवी की कहानी यूपी के ग्रेटर नोएडा के जुड़वां गांवों भट्टा पारसौल में हुए किसानों और पुलिस के बीच हुए संघर्ष से जुड़ी है. हालांकि मूवी में ये गांव बीकानेर में दिखा दिया गया है. जहां असली कहानी प्रशासन की उन दो गावों की जमीन ग्रेटर नोएडा के लिए दो नए सैक्टर्स के लिए अधिग्रहण से जुड़ी थी, जिसके लिए किसान कम मुआवजे के चलते नाराज थे. वहीं मूवी में इसे एक उद्योगपति हरिभाई खेतान के ड्रीम प्रोजेक्ट ‘बीकानेर टू बोस्टन’ के लिए सूदखोंरो के जरिए किसानों की जमीन खरीदने में दिखाया गया है, जिसमें घूस लेकर डीएम व सारे अधिकारी उनकी मदद करते हैं.

असल कहानी में जहां 2011 में गांव वालों ने जब सर्वे करने कुछ अधिकारियों को बंधक बना लिया तो उन्हें छुड़ाने पुलिस गई थी, तब बवाल हुआ, और दो पुलिस वाले और दो गांव वाले मांरे गए. मूवी में ये बवाल डीएम के गांव खाली करने के ऐलान और विधायक के गुर्गे द्वारा छुपकर डीएम को गोली मारने से शुरू होता है. ऐसे में फिल्म किसानों को खुश कर देने वाली है, जबकि हकीकत में इस जनवरी में भी बवाल करने वाले 27 किसानों के घरों पर कुर्की के नोटिस चिपकाए गए हैं. हालांकि बाकी किसान खुश हैं, फिल्म के विपरीत उनको बढा हुआ मुआवजा मिल गया है, विकसित प्लॉट भी मिल गए हैं.

2011 में 4 हत्याओं की खबर से राहुल गांधी एक्शन में आ गए थे, छुपकर वहां किसी की बाइक पर बैठकर पहुंचे और खूब माहौल बनाया, बयान दिए कि मैंने राख के ढेर में कई लाशें देखी थीं, बाद में सूचना मीडिया से ली हुई बताई. लेकिन जब चुनाव हुए तो भट्टा पारसौल के लोगों ने ही उनके विधायक प्रत्याशी को वोट नहीं दिया. हारा हुआ प्रत्याशी और उनको बाइक पर लिफ्ट देने वाला दोनों आज बीजेपी में हैं. 2012 के यूपी चुनावों में कांग्रेस को 28 सीटें आईं और लोकसभा में यूपी में जीरो.
लेकिन इस मूवी में जिस तरह से विधायक का छुपा किरदार दिखाया गया है कि उसी ने कंपनी के मालिक खेतान से पैसा लेकर डीएम पर गोली चलवाकर किसानों और पुलिस के  बीच बवाल करवाया था, लोग अनुमान लगा रहे हैं कि वो राहुल गांधी का किरदार हो सकता है. लेकिन राहुल की तरह वो फ्रंट पर आने से बचता रहा था. राहुल का किरदार हो ना हो लेकिन विपक्ष के वकील विक्रम (राम कपूर) का किरदार जरूर कई मौकों पर कपिल सिब्बल जैसा लगा है.

कुछ भी कहिए मूवी मजेदार है, सुभाष कपूर ने अरशद-अक्षय और सौरभ शुक्ला की तिकड़ी से पैसा वसूल परिवार के साथ देखने लायक फिल्म बनाई है. गजराज राव तो हमेशा की तरह बेमिसाल हैं. कई डायलॉग्स मारक हैं जैसे ‘मुक्का जब लड़ाई के बाद याद आए तो उसे अपने मुंह पर मार लेना चाहिए’ या फिर ‘किसान है तो जहान है’ और कॉमेडी मूवी में इमोशनल तड़का भी जबरदस्त है, वकील व किसान परिवारों के लिए तो मस्ट वाच है ही.  हालांकि दिल्ली की सैशन कोर्ट में बीकानेर का केस क्यों लड़ा जा रहा था, या फौरन वकील दिल्ली से बीकानेर के गांव में और बीकानेर की पुलिस दिल्ली की कोर्ट में वर्दी पहने कैसे नजर आती है, इन सब बहस में पड़ना बेकार है, बाकी गाना तो हिट हो ही गया है, फिकर ना कर तेरा भाई वकील है।

आखिर कौन कर रहा है सांप्रदायिक तनाव भड़काने की साजिश ?

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उत्तर प्रदेश के कानपुर में बारावफात जुलूस के दौरान  लगे, “आई लव मोहम्मद” बोर्ड से शुरू हुआ विवाद अब देशभर  में फैल रहा है। उत्तर प्रदेश के उन्नाव,  बरेली, लखनऊ, महराजगंज, जालौन से लेकर कैसरगंज समेत कई शहरों में मुस्लिम समाज अत्यंत उग्रता के साथ जुलूस निकाल रहा है। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के बहुत ही सघन मुस्लिम बहुल इलाके में  भी “आई लव मोहम्मद” लिखा बैनर टांगा गया है जिसके कारण स्थानीय स्तर पर तनाव अनुभव किया गया। इन जुलूसों में कई जगह पुलिस से टकराव और पथराव भी हो रहा है। मुस्लिम समाज के लोग व मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति में संलिप्त रहने वाले लोग इसे मुस्लिम समाज का जेन -जी आंदोलन कहकर आग में घी डालने का कुत्सित प्रयास करते नजर आ रहे हैं  जो  तनाव को और बढ़ा रहा है। सोची समझी रणनीति के अंतर्गत  इस आंदोलन में नाबालिग बच्चों को आगजनी और पुलिस पर पथराव करने के लिए आगे किया जा रहा है।

उत्तर प्रदेश से शुरू हुयी ये अराजकता अब उत्तराखंड  के काशीपुर  और तेलंगना के हैदराबाद समेत देश के कई शहरों में पहुँच गई है। आइ लव मोहम्मद के समर्थन में उत्तराखंड में पुलिस बल पर सीधा पथराव तथा हमला किया गया, हमले में जिसमें महिला पुलिस कर्मी भी अभद्रता और मार पीट का शिकार हुयीं । पुलिस की गाड़ियाँ तोड़ दी गयीं । यही हाल गुजरात के गोधरा शहर में भी हुआ और महाराष्ट्र के नागपुर में भी। इन प्रदर्शनों के दौरान “सिर तन से जुदा” आरै लब्बैक-लब्बैक जैसे बेहद आक्रामक और आपत्तिजनक नारे लगाए जा रहे हैं।

इस पूरे विवाद की पटकथा उत्तर प्रदेश के कानपुर से शुरू हुई। कानपुर के रावतपुर में  बारावफात जुलूस निकाला जा  रहा था। जिस मार्ग पर जुलूस निकाला जा रहा था उसी रास्ते पर एक जगह  ”आई लव मोहम्मद“  का साइन बोर्ड लगा दिया गया। इसको लेकर हिंदू पक्ष ने विरोध किया और आरोप लगाया कि यहां नई परंपरा शुरू की जा रही है। दोनों पक्षों में तनाव बढ़ता देखकर पुलिस ने हस्तक्षेप किया और किसी प्रकार से मामला यह कहकर शांत करवाया कि नियम है कि जुलूस में किसी तरह की नई परंपरा नहीं डाली जाएगी । किन्तु  बारावफात के जुलूस के दौरान कुछ लोगों ने नई परंपरा डालते हुए परंपरा वाली जगह पर ही टेंट और साइन बोर्ड फिर से लगवा दिया।

पुलिस ने स्पष्ट किया कि, “आई लव मोहम्मद” को लेकर कोई भी मुकदमा दर्ज नहीं किया गया है।

इस बीच संभवतः पूर्व नियोजित साजिश के अनुसार कानपुर में मुस्लिम  पक्ष ने हिंदू पक्ष पर आरोप लगाया कि उसने साइन बोर्ड  को फाड़ दिया था। वहीं हिंदू पक्ष ने इसका खंडन करते हुए कहा  कि मुस्लिम पक्ष के जुलूस में शामिल लोगों ने हिन्दुओं के  धार्मिक पोस्टर फाड़े। पुलिस के बीच-बचाव के बाद ऐसा लगा  कि अब मामला शांत हो गया है। बाद में  कानपुर पुलिस ने बारावफात के जुलूस के दौरान “आई लव मोहम्मद“ नाम का एक नया बोर्ड बनाकर नई परंपरा शुरू करने  और सांप्रदायिक सौहार्द्र बिगाड़ने के लिए मुकदमा दर्ज किया।

इस बीच पहले से तैयार बैठे एआईएमआईएम नेता और सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने सोशल मीडिया एक्स पर कानपुर पुलिस को टैग करते हुए एक पोस्ट लिखा कि,“ आई लव मोहमद“ कहना जुर्म नहीं है अगर है तो इसकी हर सजा मंजूर हैं। ओवैसी ने जिस पोस्ट को लेकर कोट किया था उसमें दावा किया गया था कि मुस्लिम पक्ष की ओर से कथित तौर पर नई परंपरा शुरू करने को लेकर पुलिस ने मुकदमा कर दिया है। इस बात की प्रबल संभावना  व्यक्त की जा रही है कि ओवैसी की इस  पोस्ट के बाद सोशल मीडिया के माध्यम से अफवाहों का बाजार गर्म होता गया और अब यह आग देश के अनेकानेक हिस्सों में फैलती जा रही है।

तमाम कट्टरपंथी और मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति करने वाले तत्व इस आग में  घी डालने का प्रयास कर रहे हैं। सोशल मीडिया पर आपत्तिजनक वीडियो और कमेंट पोस्ट करके  तनाव बढ़ाने का प्रयास किया जा रहा है। यह सब कुछ उस समय हो रहा है जब हिन्दू पर्वो की नवरात्र से देवदीपावली तक एक लंबी  श्रृंखला चलने वाली है।

इन सभी घटनाओं  का पैटर्न लगभग एक ही जैसा नजर आ रहा है। बरेली के जखीरा मुहल्ले में ”आई लव मोहम्मद“ लिखे कई पोस्टर लगे थे। इंस्पेक्टर सुभाष कुमार ने बताया कि भीड़ होने की सूचना पर, वे पहुंचे तो पाया कि वहां  इत्तेहाद -ए-  मिल्लत काउंसिल के महासचिव डा. नफीस खान भी थे। पुलिस के पहुंचने पर नफीस खान ने वहां पर उपस्थित लोगों को घर जाने के लिए कह दिया किंतु बाद में इंटरनेट मीडिया पर एक वीडियो प्रसारित हुआ उसमें डा़ नफीस कुछ लोगों से कहते सुनाई दे रहे हैं कि मैंने इंस्पेक्टर को ”बहुत अपशब्द कहे। मैंने कहा कि, “हाथ काट लूंगा, वर्दी उतरवा दूंगा“। जांच मे पता चला है कि  पुलिस के मोहल्ले से लौटने के बाद नफीस ने भीड़ को भड़काने का प्रयास किया । नफीस बरेली में मौलाना तौकीर रजा खां की पार्टी  आईएमसी के महासचिव हैं।

सबसे अधिक चिंता का विषय यह है कि इन जुलूसों में 10 साल से कम आयु के लड़कों तथा औरतों द्वार  उग्र प्रदर्शन कराया जा रहा है । उन्नाव में  हिंसक उपद्रव का नेतृत्व महिलाओे व बच्चो ने किया। बुर्कानशीं महिलाओं  ने ही पुलिस बल पर पत्थर बरसाये ओर नाबालिगों ने “सर तन से जुदा“ के नारे लगाकर माहौल खराब किया।  कठिनाई यह है कि हमारे देश के संविधान में  नाबालिगों को केवल सुधार गृह भेज दिया जाता है और  महिलाओं की प्राय: जल्दी गिरफ्तारी नहीं होती । वहीं दूसरी ओर तथाकथित संविधान रक्षक  मुस्लिम तुष्टिकरण का खेल प्रारंभ कर देते हे। इन सभी उपद्रवियों को पता है कि उन्हें सभी छद्म धर्मनिरपेक्ष दलों का खुला समर्थन प्राप्त है। नाबालिगों को सोच समझ कर केवल इसलिए शामिल किया जा रहा है क्योंकि वह आसानी से छूट जाएंगे और सजा भी बहुत कम होगी।

भारत में सार्वजनिक जगहों पर बिना अनुमति पोस्टर बैनर लगाना गैरकानूनी है किंतु सभी लोग इसका उल्लंघन करते हैं । पुलिस का कहना है कि यह आंदोलन गुमराह करने वाला है। मुस्लिम तुष्टिकरण में संलिप्त नेता इस आंदोलन को अल्पसंख्यकों के दमन से उपजा आक्रोश बता रहे हैं और भाजपा व हिंदू संगठनों को दोष दे रहे हैं। एक पार्टी के प्रवक्ता तो तुष्टिकरण में इतने आगे बढ़ गए कि आंदोलन सम्बन्धी एफआईआर को ही संविधान विरोधी कृत्य बताने लगे। विगत दिनों  बहराइच में एआईएमआईएम के नेता द्वारा  स्थानीय महाराजा सुहेलदेव राजभर का अपमान करने के कारण भी तनाव उत्पन्न हो गया था।

इस प्रकार के तनाव उत्पन्न करने का प्रयास उस समय किया जा रहा है जब योगी आदित्यनाथ जी के नेतृत्व में देश का ग्रोथ इंजन बनने की ओर अग्रसर है। योगी जी को अच्छी तरह से पता है कि उपद्रवियों व दंगाइयो से किस प्रकार निपटा जाता है। उत्तर प्रदेश की जनता को सरकार व योगी जी की रणनीति पर पर पूरा भरोसा है। यहां की पुलिस सतर्क भी है और कड़क भी। उत्तर प्रदेश प्रशासन इस आंदोलन की जड़ तक जाएगा और षड्यंत्रकारियों को ढूंढ निकालेगा।

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