Assam: When prince of melody departs

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Nava Thakuria
Guwahati: The heartbroken news surfaced from Singapore in multiple media outlets, which shocked the people of Assam in grief, but also in instant outrage among the young generation, who were born in eastern India and brought up with the melodious voice of iconic singer Zubeen Garg. The sadness and melancholy soon turned into outrages with a vital question, why Zubeen was taken to Singapore as he was not physically well for months. Millions of his fans were annoyed when they encountered some clippings of videos on social media, where Zubeen was seen swimming in the seawater (without a life-jacket), whereas he was cautioned by the doctors in Guwahati to avoid the fire and water body. The netizens cried foul, why his tragic incident was not properly reported, even though a group of Asomiya people had accompanied Zubeen to participate in the North East India Festival, organized in the southeast Asian nation of islands on 19, 20 and 21 September 2025.
For nearly five days, Assam was brought to a standstill, where markets places were closed, streets deserted, people flocked to roadside points with life-size portraits to pay homage to their beloved prince of melody, newspapers dedicated front-pages only with Zubeen related developments and news channels telecast all important updates with true to the term 24 hours a day. Hundreds of thousands of Zubeen- admirers poured on the streets from Guwahati international airport to his residence inside the prehistoric city. Thousands arrived from different parts of northeast India to turn the city into a sea of humans- weeping, sobbing, crying and exclaiming why Zubeen was ‘put to die’ in the sea thousands of kilometers away from his motherland.
Born to the modest family of Mohini Mohon Borthakur (a retired magistrate with pen-name Kapil Thakur) and Ily Borthakur (a classical singer, who died a few years back) in Tura of Meghalaya, adjacent to western Assam, on 18 November 1972, Zubeen was named in childhood days as Jiban Borthakur. He had two sisters namely Jonkey (who died in a road accident while traveling to a distant place to perform in a cultural show) and Palme, a city-based professional. Married to popular fashion designer Garima Saikia in 2002, Zubeen got instant national fame with his resounding voice in the song ‘Ya Ali..’ for Bollywood movie Gangster (2006). An animal lover, a philanthropist and versatile genius, Zubeen sang thousands of songs in multiple languages and could play a number of musical instruments. Awarded with various honours, the identical face of Assam’s hugely popular Bihu functions in recent decades, Zubeen also produced and acted in Assamese movies.
When fractured and unauthentic reports about his sudden demise in Singapore started beaming, it was really difficult to guess how Zubeen died, was it a mishap in paragliding, scuba diving, yacht or any usual sea outing. Widely circulated newspaper of the island nation, The Straits Times reported on 19 September that Zubeen was admitted in a critical condition at Singapore General Hospital after a freak accident from where the police rescued him from the sea and rushed him to hospital. Although doctors provided treatment to him in the intensive care unit and monitored his condition closely, they could not revive him. Meanwhile, a number of police complaints were lodged in various parts of Assam demanding stringent actions against those involved in the series of events that ultimately led to Zubeen’s unfortunate death.
Zubeen’s mortal remains were received by Assam chief minister Himanta Biswa Sarma at New Delhi international airport and soon he was flown back to Guwahati on 21 September. A flower-decked ambulance carried him driving amidst unprecedented crowds to his Kahilipara residence and later moved to Sarusajai stadium, where Zubeen was put inside a glass-casket, for public viewing and homage. Later he was cremated on 23 September at Kamarkuchi near Guwahati with full state honours after four days of mourning. Thousands of people, who attended his funeral facing searching sunlight, echoed chanting ‘Zubeen Garg will live forever’ for Assam and Asomiyas in centuries to come. Probably after Dr Bhupen Hazarika (8 September 1926 – 5 November 2011), a widely acclaimed Assamese singer, musician, writer, filmmaker and an extraordinary public communicator, people of the eastern Indian subcontinent grieved in total with the loss of Zubeen.

Goodbye, prince of melody…..

देश के पहले ‘गोदी चैनल’ की कहानी: एनडीटीवी का उदय और पतन

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दिल्ली। भारतीय मीडिया के इतिहास में एनडीटीवी को अक्सर ‘पहले गोदी चैनल’ के रूप में चित्रित किया जाता है, जो कांग्रेस पार्टी के प्रचार तंत्र की तरह कार्य करता था। 1988 में प्रणय रॉय और राधिका रॉय द्वारा स्थापित यह चैनल शुरू में दूरदर्शन के लिए सामग्री उत्पादन करता था, लेकिन 2003 में स्वतंत्र ब्रॉडकास्टर बनने के बाद यह कांग्रेस के एजेंडे को बढ़ावा देने का माध्यम बन गया। आलोचकों का मानना है कि एनडीटीवी ने कांग्रेस की नीतियों को ग्लैमराइज किया, विपक्षी दलों को निशाना बनाया और ‘सेक्युलर’ छवि के नाम पर पार्टी लाइन को मजबूत किया। उदाहरणस्वरूप, 2004 के लोकसभा चुनावों में एनडीटीवी की कवरेज ने यूपीए की जीत को ‘लोकतंत्र की विजय’ के रूप में पेश किया, जबकि भाजपा की हार को ‘सांप्रदायिकता की असफलता’ बताया। इसी तरह, 2जी घोटाले (2010) में कांग्रेस को बचाने के लिए चैनल ने जांच एजेंसियों पर हमला बोला, जबकि यूपीए-2 के भ्रष्टाचार कांडों को न्यूनतम कवरेज दिया।

प्रणय रॉय (जिन्हें कभी-कभी ‘जेम्स प्रणय रॉय’ कहा जाता है) पर ईसाई होने का आरोप लगता रहा है, जो सोनिया गांधी की कथित ईसाई पृष्ठभूमि से मेल खाता था। पत्रकारों ने खुलासा किया कि सोनिया इस वजह से रॉय पर अधिक विश्वास करती थीं। पूर्व पीएमओ मीडिया सलाहकार संजय बरू की किताब ‘द एक्सिडेंटल प्राइम मिनिस्टर’ (2014) में उल्लेख है कि सोनिया-मनमोहन सिंह युग में एनडीटीवी को विशेष पहुंच मिली, क्योंकि रॉय को ‘विश्वसनीय’ माना जाता था। पत्रकार स्वपन दासगुप्ता ने एक इंटरव्यू में कहा, “सोनिया की वेलफेयर योजनाओं के लिए बजट सुनिश्चित करने में एनडीटीवी जैसी मीडिया ने भूमिका निभाई।” मार्गरेट अल्वा की आत्मकथा ‘कौरेज एंड कमिटमेंट’ (2022) में भी सोनिया के मीडिया पर नियंत्रण का जिक्र है, जहां रॉय को ‘अंदरूनी सर्कल’ का सदस्य बताया गया।

एनडीटीवी ने देश को कई ‘गोदी एंकर’ दिए, जो कांग्रेस की गोद में बैठे चिल्लाते थे। रविश कुमार ने ‘प्राइम टाइम’ में यूपीए की तारीफों के पुल बांधे, जबकि बरखा दत्त ने ‘वी द पीपल’ में विपक्ष को ‘अराजक’ ठहराया। विपल मेहता और सोनाली भंसजी जैसे एंकरों ने 26/11 कवरेज (2008) में पाकिस्तान को फोकस कर कांग्रेस की ‘सॉफ्ट’ इमेज बचाई। ये एंकर आज सक्रिय हैं, लेकिन तब वे ‘सेक्युलर वारियर’ बने घूमते थे।

कांग्रेस के सत्ता हटने के बाद एनडीटीवी पर सीबीआई छापे (2017) पड़े, जो ‘विच हंट’ बताए गए। लेकिन आलोचक कहते हैं, यह ‘गोदी’ का अंतिम अध्याय था। आज अडानी समूह के अधिग्रहण (2022) के बाद चैनल बदल गया, लेकिन पुरानी ‘गोदी’ की यादें बाकी हैं।

विकास के सहभागी भी हैं, हम भारतीय राष्ट्रभक्त मुसलमान

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गौहर आसिफ

दिल्ली। 27 सितंबर 2025 को दिल्ली के तालकटोरा इंडोर स्टेडियम में एक ऐतिहासिक आयोजन होने जा रहा है-अखिल भारतीय मुस्लिम महासम्मेलन जिसका आयोजन मुस्लिम राष्ट्रीय मंच (MRM) द्वारा किया जा रहा है । यह अधिवेशन भारत के विभिन्न हिस्सों से आए हुए उलेमा सूफी संत बुद्धिजीवी शिक्षाविद और मुस्लिम समुदाय के प्रतिनिधियों को एक मंच पर एकत्र करेगा।

डॉ. इन्द्रेश कुमार की अगुवाई में होने वाला यह सम्मेलन दो प्रमुख उद्देश्यों पर केंद्रित है पहला मुस्लिम समाज के आर्थिक और शैक्षिक सशक्तिकरण पर विचार करना] दूसरा “वतन से मोहब्बत“ यानी राष्ट्र के प्रति प्रेम की भावना को मज़बूत करना।

ऐसे समय में जब देश में धार्मिक और सामाजिक विभाजन की रेखाएँ गहरी हो रही हैं यह महासम्मेलन एक सकारात्मक पहल के रूप में देखा जा रहा है। यह भारतीय मुसलमानों की पहचान को केवल शिकायत और हाशिये से निकाल कर सकारात्मक भागीदारी सुधार और रचनात्मक राष्ट्रनिर्माण की दिशा में ले जाने का एक प्रयास है।

संवाद और आत्ममंथन का मंच

मुस्लिम राष्ट्रीय मंच की स्थापना 2002 में इस विचार के साथ हुई थी कि मुसलमानों और मुख्यधारा की राष्ट्रवादी विचारधारा के बीच संवाद कायम किया जाए। यह मंच राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) से वैचारिक रूप से जुड़ा हुआ है।

हालांकि] 27 सितंबर को होने वाला अधिवेशन केवल मंच का प्रचार नहीं है-यह मुस्लिम समाज के भीतर आत्ममंथन और आत्म-निर्णय का एक अवसर भी प्रदान करता है।

वतन से मोहब्बत एक भावनात्मक लेकिन महत्वपूर्ण संदेश

इस अधिवेशन का एक भावनात्मक पक्ष है-मुसलमानों की देशभक्ति पर ज़ोर देना है। पिछले कुछ वर्षों में देश में मुसलमानों की राष्ट्र के प्रति निष्ठा पर बार-बार सवाल उठाए गए हैं-राजनीतिक, सामाजिक और मीडिया स्तर पर।

वतन से मोहब्बत के माध्यम से MRM यह संदेश देना चाहता है कि भारतीय मुसलमान देशभक्त हैं और उनकी पहचान राष्ट्रविरोध नहीं] बल्कि राष्ट्रनिर्माण से जुड़ी होनी चाहिए। यह महासम्मेलन मुसलमानों की पहचान को सकारात्मक राष्ट्र निर्माण से जोड़ता है जोकि एक सकारात्मक कदम है।

मुस्लिम समाज की आंतरिक विविधताः एकजुटता की चुनौती

भारतीय मुस्लिम समाज केवल एकरूपी नहीं है। इसमें सुन्नी शिया सूफी बोहरा देवबंदी बरेलवी आदि अनेक संप्रदाय हैं। साथ ही सामाजिक दृष्टिकोण से भी यह समुदाय विविधताओं से भरा है-शहरी और ग्रामीण] शिक्षित और अल्पशिक्षित संपन्न और वंचित। महासम्मेलन की कोशिश है कि यह विविधता मंच पर भी झलके। यह अधिवेशन समाज के सभी संप्रदायों का समान रूप से प्रतिनिधित्व भी कर रहा है विशेषकर महिलाओं और युवाओं का] तो यह समाज के भीतर आंतरिक संवाद और सहयोग को बढ़ावा देगा।

27 सितंबर 2025 का यह अधिवेशन सिर्फ एक दिन का कार्यक्रम नहीं बल्कि एक सोच की शुरुआत हो सकता है। भारत जैसे विविध देश में हर समुदाय की भागीदारी ज़रूरी है। मुसलमानों को यह सोचना होगा कि अब समय आ गया है सिर्फ प्रतिक्रिया देने का नहीं बल्कि पहल करने का।

यह महासम्मेलन एक मंच हो सकता है आत्म-निर्माण का जहाँ मुसलमान अपने भविष्य को स्वयं आकार देने की दिशा में पहला कदम उठाएं- एक ऐसे भविष्य की ओर जहाँ वे गर्व से कह सकेंः

हम भारतीय हैं-मुसलमान भी राष्ट्रभक्त भी और विकास के सहभागी भी।

भारत की मूल्यहीन, अव्यवस्थित प्रगति में अनुशासनहीनता का तड़का

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भारत में अब भोर चिड़ियों की चहचहाहट से नहीं, बल्कि अव्यवस्था के बेसुरे शोर से शुरू होती है। सड़क पर भोंपुओं, का कोलाहल, दफ्तर में देर से खिसकती फाइलें, स्कूलों में गायब अध्यापक और संसद में माइक टूटने की मारकाट—हर जगह अनुशासन की कमी का भूत साया डाले खड़ा है। यह कोई बिखरे हुए दृश्य नहीं, बल्कि एक सम्पूर्ण राष्ट्रीय चरित्र बन चुका है, जहां नियम कागज पर मरते हैं और “चलता है” का मंत्र हर गली-कूचे में गूंज रहा है। सवाल है—क्या यह अराजकता भारत के सपनों को निगल जाएगी, या कभी दिशा मिलेगी?
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क्लास शुरू हो चुकी थी, लेकिन मास्टर साहब गायब थे। आधे घंटे तक उनका इंतजार चलता रहा। फिर वही हंगामा: चॉक हवा में तीर की तरह चल रहे थे, पेपर रॉकेट दीवारों से टकरा रहे थे, लड़कियां सहमकर चीख रही थीं और लड़के पकड़े जाने पर खिलखिला रहे थे। हेड मास्टर जब डांटते हुए पहुंचे तो कुछ देर को सन्नाटा छा गया, मगर उनके जाते ही शोरगुल लौट आया। आखिर में आचार्यजी आए, हाजिरी ली और निकल लिए। यह दृश्य किसी अपवाद का नमूना नहीं, बल्कि हिंदुस्तान के सरकारी स्कूलों की रोजमर्रा की सच्चाई है।

अगर इसे बढ़ाकर सरकारी दफ्तरों तक ले जाएं, तो तस्वीर और भी स्पष्ट हो जाती है। दफ्तर भले ही दस बजे खुलते हों, काम ग्यारह बजे शुरू हो जाए तो उसे उपलब्धि माना जाता है। कर्नाटक का उदाहरण तो दिलचस्प है, जहां ग्यारह बजे ‘केला ब्रेक’ जैसी परंपरा बनी हुई है। पूरे देश का माहौल शासन और व्यवस्था के विपरीत, अव्यवस्था और ढीलेपन में सांस लेता है। जानकार साफ कहते हैं कि भारत की सबसे बड़ी समस्या गरीबी या बेरोजगारी नहीं, बल्कि अनुशासनहीनता है—जो हर क्षेत्र में जड़ तक समाई हुई है।

रिटायर्ड टीचर मीरा जी कहती हैं, “सड़कें हों, अस्पताल हों, अदालतें हों या फिर लोकतंत्र का गर्व मानी जाने वाली संसद—किसी जगह अनुशासन की झलक नहीं मिलती। कतारें टूटती हैं, नियम केवल कागज पर लिखे रहते हैं, समय की कीमत को शून्य मान लिया गया है। यह “कुछ भी चलेगा” वाला रवैया केवल आदतन आलस्य नहीं, बल्कि एक ऐसी सोच का प्रतीक है जिसमें व्यक्तिगत उल्लंघन को सामान्य बना दिया गया है। यहां शॉर्टकट की पूजा होती है और सामूहिक भलाई को हमेशा निजी लाभ के नीचे दबा दिया जाता है।”

भारत की सड़कों पर नज़र डाल लीजिए। ट्रैफिक नियम केवल साइनेज पर दर्ज रहते हैं, व्यवहार में नहीं। लेन बदलना एक सहज कला है, लाल बत्ती तोड़ना किसी खेल की तरह लिया जाता है। कुछ सेकंड बचाने के लिए ड्राइवरों की यह अव्यवस्थित भागदौड़ अक्सर जाम और हादसों में बदल जाती है। यह स्वार्थ पैदल यात्रियों तक फैला है, जो बेखौफ सड़क पार करते हैं, और उन वाहनों तक जो सिग्नल के नियमों को चुटकियों में तोड़ देते हैं। यही नहीं, रेलवे स्टेशन और सरकारी दफ्तरों पर कतारें भी हमेशा टूटती दिखाई देती हैं। लोग धक्का देकर आगे निकलते हैं, रिश्वत देकर अपना काम पहले करवाते हैं और थोड़े से अधिकार या ताकत के बल पर वीआईपी कल्चर का सहारा लेते हैं।

लोकतंत्र की सर्वोच्च संस्था संसद का नजारा भी अनुशासनहीनता का सबसे बड़ा प्रतीक है। वह जगह, जहां साफ-सुथरी बहस और तार्किक तर्कों से जनहित के फैसले होने चाहिए, अक्सर अखाड़े में बदल जाती है। गाली-गलौज, माइक तोड़ना, कुर्सियां खींचना और बिलों पर हाथापाई, ये सब किसी लोकतंत्र का गौरव नहीं बल्कि उसकी विडंबना बन चुके हैं, ये कहना है पब्लिक कॉमेंटेटर प्रोफेसर पारस नाथ चौधरी का।

“लेट-लतीफ” का मुहावरा केवल मजाक नहीं, बल्कि भारतीय रोज़मर्रा की मानसिकता है। यहां देरी पर किसी प्रकार का अपराधबोध नहीं होता। काम समय पर न करना और वादों का पूरा न होना सार्वजनिक जीवन की पहचान बन गया है। यही ढीलापन सामूहिक समय की भारी बर्बादी का कारण है। जब इस संस्कृति पर भ्रष्टाचार का तड़का लगता है, तो स्थिति और भी बदतर हो जाती है। ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल की रिपोर्टें बार-बार साबित करती हैं कि पुलिस से लेकर न्यायपालिका तक रिश्वत आम है, और शॉर्टकट को ही नियम बना लिया गया है।

कुछ वर्ष पूर्व मुझे जापान जाने का मौका मिला। स्कूल्स और दफ्तरों को विजिट करने के बाद अनुभव हुआ कि जापान अनुशासन और समर्पण का जीवंत उदाहरण है। वहां बच्चों को प्राथमिक विद्यालय से ही जिम्मेदारी और अनुशासन का महत्व सिखाया जाता है। छोटे-छोटे काम जैसे—कक्षा की सफाई, साझा कामों में सहभागिता और दूसरों की भलाई के लिए त्याग—यह सब उनकी शिक्षा का हिस्सा है। यही संस्कार “राष्ट्र पहले” की भावना पैदा करते हैं। जापानी समाज में अनुशासन केवल पालन करने का नियम नहीं, बल्कि सामूहिक जीवन का नैतिक कर्तव्य है। यही कारण है कि उनकी शिनकानसेन ट्रेनें कभी एक मिनट भी लेट नहीं होतीं। यही कारण है कि परमाणु हमले के खंडहरों से निकलकर जापान आर्थिक महाशक्ति बन सका।

भारत और जापान के बीच यह तुलना दर्दनाक है। भारत की संभावनाएं अनुशासनहीनता और अव्यवस्था से दब गई हैं जबकि जापान ने वही अनुशासन टिकाऊ विकास की इंजन बना लिया है। सवाल यह है कि क्या भारत कभी इस दिशा में गंभीरता से बढ़ेगा?

भारत के पास संसाधन हैं, प्रतिभा है और अवसरों की कमी नहीं है। कमी है तो केवल अनुशासन की। यही हमारी प्रगति की सबसे बड़ी बाधा है और सबसे बड़ा उपाय भी। अगर भारत ने जापान और सिंगापुर जैसे मॉडलों से सीखा, और नियमों को अपवाद नहीं बल्कि जीवन का हिस्सा बना लिया, तो राह बदलेगी।

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