अजीत भारती को हुआ अपनी गलती का एहसास

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नई दिल्ली: चर्चित लेखक और टिप्पणीकार अजीत भारती ने अपने पुराने लेखों और टिप्पणियों को लेकर खेद व्यक्त किया है। उन्होंने स्वीकार किया कि हिंसक प्रदर्शनों से निपटने के लिए ‘आयरन हैंड’ नीति की वकालत करने वाली उनकी टिप्पणियाँ गलत थीं। भारती ने कहा, “कुछ घटनाएँ, अपने होने के वर्षों पश्चात् अपना उचित उद्देश्य बता पाती हैं।” उन्होंने बांग्लादेश में शेख हसीना सरकार द्वारा दंगाइयों पर गोली चलाने की घटना का उल्लेख करते हुए कहा कि उन्होंने तब लिखा था कि भारत को भी ऐसा करना चाहिए। साथ ही, CAA और किसान आंदोलन के दौरान भी उन्होंने ‘वेट एंड वाच’ की जगह सख्त कार्रवाई की पैरवी की थी।

भारती ने स्वीकार किया कि उनकी यह सोच दूरदर्शिता और अनुभव की कमी के कारण थी। उन्होंने कहा, “लाल किले पर चढ़े खालिस्तानी पर एक गोली चलाने की देरी थी, तो यही भीड़ संसद की ओर बढ़ सकती थी।” उन्होंने राजदीप सरदेसाई द्वारा एक युवक के ट्रक से गिरने को पुलिस की गोली लगने की बात बताने और जामिया नगर में आपसी गोलीबारी को पुलिस की कार्रवाई बताने जैसे गलत नैरेटिव का भी जिक्र किया।

भारती ने सरकार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नीतियों की सराहना करते हुए कहा, “सरकार में लोग संभवतः चीजों की भयावहता को स्पष्ट देख पाते हैं। पीएम मोदी और पीएमओ का आभार कि उन्होंने अराजकता को सीमित रखकर दीर्घकालिक शांति सुनिश्चित की।”
यह बयान सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बना हुआ है।

परम आदरणीय मोहन भागवत जी का आज जन्मदिन है

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दिल्ली : आज 11 सितंबर है। यह दिन अलग-अलग स्मृतियों से जुड़ा है। एक स्मृति 1893 की है, जब स्वामी विवेकानंद ने शिकागो में विश्वबंधुत्व का संदेश दिया और दूसरी स्मृति है 9/11 का आतंकी हमला, जब विश्व बंधुत्व को सबसे बड़ी चोट पहुंचाई गई। आज के दिन की एक और विशेष बात है। आज एक ऐसे व्यक्तित्व का 75वां जन्मदिवस है जिन्होंने वसुधैव कुटुंबकम के मंत्र पर चलते हुए समाज को संगठित करने, समता-समरसता और बंधुत्व की भावना को सशक्त करने में अपना पूरा जीवन समर्पित किया है।

संघ परिवार में जिन्हें परम पूजनीय सरसंघचालक के रूप में श्रद्धाभाव से संबोधित किया जाता है, ऐसे आदरणीय मोहन भागवत जी का आज जन्मदिन है। यह एक सुखद संयोग है कि इसी साल संघ भी अपना शताब्दी वर्ष मना रहा है। मैं भागवत जी को हार्दिक शुभकामनाएँ देता हूँ और प्रार्थना करता हूँ कि ईश्वर उन्हें दीर्घायु और उत्तम स्वास्थ्य प्रदान करें।
मेरा मोहन भागवत जी के परिवार से बहुत गहरा संबंध रहा है। मुझे उनके पिता, स्वर्गीय मधुकरराव भागवत जी के साथ निकटता से काम करने का सौभाग्य मिला था। मैंने अपनी पुस्तक ज्योतिपुंज में मधुकरराव जी के बारे में विस्तार से लिखा भी है। वकालत के साथ-साथ मधुकरराव जी जीवनभर राष्ट्र निर्माण के कार्य में समर्पित रहे। अपनी युवावस्था में उन्होंने लंबा समय गुजरात में बिताया और संघ कार्य की मजबूत नींव रखी।

मधुकरराव जी का राष्ट्र निर्माण के प्रति झुकाव इतना प्रबल था कि अपने पुत्र मोहनराव को भी इस महान कार्य के लिए निरंतर गढ़ते रहे। एक पारसमणि मधुकरराव ने मोहनराव के रूप में एक और पारसमणि तैयार कर दी।
भागवत जी का पूरा जीवन सतत प्रेरणा देने वाला रहा है। वे 1970 के दशक के मध्य में प्रचारक बने। सामान्य जीवन में प्रचारक शब्द सुनकर ये भ्रम हो जाता है कि कोई प्रचार करने वाला व्यक्ति होगा, लेकिन जो संघ को जानते हैं उनको पता है कि प्रचारक परंपरा संघ कार्य की विशेषता है। गत 100 वर्षों में देशभक्ति की प्रेरणा से भरे हजारों युवक-युवतियों ने अपना घर-परिवार त्याग करके पूरा जीवन संघ परिवार के माध्यम से राष्ट्र को समर्पित किया है। भागवत जी भी उस महान परंपरा की मजबूत धुरी हैं।
भागवत जी ने उस समय प्रचारक का दायित्व संभाला, जब तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने देश पर इमरजेंसी थोप दी थी। उस दौर में प्रचारक के रूप में भागवत जी ने आपातकाल-विरोधी आंदोलन को निरंतर मजबूती दी। उन्होंने कई वर्षों तक महाराष्ट्र के ग्रामीण और पिछड़े इलाकों, विशेषकर विदर्भ में काम किया।

1990 के दशक में अखिल भारतीय शारीरिक प्रमुख के रूप में मोहन भागवत जी के कार्यों को आज भी कई स्वयंसेवक स्नेहपूर्वक याद करते हैं। इसी कालखंड में मोहन भागवत जी ने बिहार के गांवों में अपने जीवन के अमूल्य वर्ष बिताए और समाज को सशक्त करने के कार्य में समर्पित रहे। 20वीं सदी के आखिरी पड़ाव पर वे अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख बने। वर्ष 2000 में वे सरकार्यवाह बने और यहाँ भी भागवत जी ने अपनी अनोखी कार्यशैली से हर कठिन परिस्थिति को सहजता और सटीकता से संभाला। 2009 में वे सरसंघचालक बने और आज भी अत्यंत ऊर्जा के साथ कार्य कर रहे हैं। भागवत जी ने राष्ट्र प्रथम की मूल विचारधारा को हमेशा सर्वोपरि रखा।

सरसंघचालक होना मात्र एक संगठनात्मक जिम्मेदारी नहीं है। यह एक पवित्र विश्वास है, जिसे पीढ़ी-दर-पीढ़ी दूरदर्शी व्यक्तित्वों ने आगे बढ़ाया है और इस राष्ट्र के नैतिक और सांस्कृतिक पथ को दिशा दी है। असाधारण व्यक्तियों ने इस भूमिका को व्यक्तिगत त्याग, उद्देश्य की स्पष्टता और माँ भारती के प्रति अटूट समर्पण के साथ निभाया है। यह गर्व की बात है कि मोहन भागवत जी ने न केवल इस विशाल जिम्मेदारी के साथ पूर्ण न्याय किया है, बल्कि इसमें अपनी व्यक्तिगत शक्ति, बौद्धिक गहराई और सहृदय नेतृत्व भी जोड़ा है।भागवत जी का युवाओं से सहज जुड़ाव है और इसलिए उन्होंने अधिक से अधिक युवाओं को संघ कार्य के लिए प्रेरित किया है। वे लोगों से प्रत्यक्ष संपर्क में रहते हैं, और संवाद करते रहते हैं। श्रेष्ठ कार्य पद्धति को अपनाने की इच्छा और बदलते समय के प्रति खुला मन रखना, ये मोहनजी की बहुत बड़ी विशेषता रही है।

अगर हम व्यापक संदर्भ में देखते हैं तो संघ की 100 साल की यात्रा में भागवत जी का कार्यकाल संघ में सर्वाधिक परिवर्तन का कालखंड माना जाएगा। चाहे वो गणवेश परिवर्तन हो, संघ शिक्षा वर्गों में बदलाव हो, ऐसे अनेक महत्वपूर्ण परिवर्तन उनके निर्देशन में संपन्न हुए। कोरोना काल में मोहन भागवत जी के प्रयास विशेष रूप से याद आते है। उस कठिन समय में उन्होंने स्वयंसेवकों को सुरक्षित रहते हुए समाजसेवा करने की दिशा दी और टेक्नोलॉजी का उपयोग बढ़ाने पर बल दिया। उनके मार्गदर्शन में स्वयंसेवकों ने जरूरतमंदों तक हरसंभव सहायता पहुँचाई, जगह-जगह मेडिकल कैंप लगाए। उन्होंने वैश्विक चुनौतियों और वैश्विक विचार को प्राथमिकता देते हुए व्यवस्थाओं को विकसित किया। हमें कई स्वयंसेवकों को खोना भी पड़ा, लेकिन भागवत जी की प्रेरणा ऐसी थी कि अन्य स्वयंसेवकों की दृढ़ इच्छाशक्ति कमजोर नहीं पड़ी।

इस वर्ष की शुरुआत में, मैंने नागपुर में उनके साथ माधव नेत्र चिकित्सालय के उद्घाटन के दौरान मैंने कहा था कि संघ अक्षयवट की तरह है, जो राष्ट्रीय संस्कृति और चेतना को ऊर्जा देता है। इस अक्षयवट वृक्ष की जड़ें इसके मूल्यों की वजह से बहुत गहरी और मजबूत हैं। इन मूल्यों को आगे बढ़ाने में जिस समर्पण से मोहन भागवत जी जुटे हुए हैं, वो हर किसी को प्रेरणा देता है।समाज कल्याण के लिए संघ की शक्ति के निरंतर उपयोग पर मोहन भागवत जी का विशेष बल रहा है। इसके लिए उन्होंने पंच परिवर्तन का मार्ग प्रशस्त किया है। इसमें स्व बोध, सामाजिक समरसता, नागरिक शिष्टाचार, कुटुम्ब प्रबोधन और पर्यावरण के सूत्रों पर चलते हुए राष्ट्र निर्माण को प्राथमिकता दी गई है। देश और समाज के लिए सोचने वाले हर भारतवासी को पंच परिवर्तन के इन सूत्रों से अवश्य प्रेरणा मिलेगी।

संघ का हर कार्यकर्ता वैभव संपन्न भारत माता का सपना साकार होते देखना चाहता है। इस सपने को पूरा करने के लिए जिस स्पष्ट विज़न और ठोस एक्शन की जरूरत होती है, मोहन जी इन दोनों गुणों से परिपूर्ण हैं। मोहन जी के स्वभाव की एक और बड़ी विशेषता ये है कि वो मृदुभाषी हैं। उनमें सुनने की भी अद्भुत क्षमता है। यह विशेषता न केवल उनके दृष्टिकोण को गहराई देती है, बल्कि उनके व्यक्तित्व और नेतृत्व में संवेदनशीलता और गरिमा भी लाती है।

मोहन जी, हमेशा ‘एक भारत श्रेष्ठ भारत’ के प्रबल पक्षधर रहे हैं। भारत की विविधता और भारत भूमि की शोभा बढ़ा रही अनेक संस्कृतियों और परंपराओं के उत्सव में भागवत जी पूरे उत्साह से शामिल होते हैं। वैसे बहुत कम लोगों को ये पता है कि मोहन भागवत जी अपनी व्यस्तता के बीच संगीत और गायन में भी रुचि रखते है। वे विभिन्न भारतीय वाद्ययंत्रों में भी निपुण हैं। पठन-पाठन में उनकी रुचि, उनके अनेक भाषणों और संवादों में साफ दिखाई देती है।

पिछले दिनों देश में जितने सफल जन-आंदोलन हुए चाहे स्वच्छ भारत मिशन हो या बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ, मोहन भागवत जी ने पूरे संघ परिवार को इन आंदोलनों में ऊर्जा भरने के लिए प्रेरित किया। मैं पर्यावरण से जुड़े प्रयासों और सस्टेनेबल लाइफस्टाइल को आगे बढ़ाने के प्रति उनके समर्पण को जानता हूँ। मोहन जी का बहुत जोर आत्मनिर्भर भारत पर भी है।

कुछ ही दिनों में विजयादशमी पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ 100 वर्ष का हो जाएगा। यह भी सुखद संयोग है कि विजयादशमी का पर्व, गांधी जयंती, लाल बहादुर शास्त्री की जयंती और संघ का शताब्दी वर्ष एक ही दिन आ रहे हैं।
यह भारत और विश्वभर के लाखों स्वयंसेवकों के लिए एक ऐतिहासिक अवसर है। हम स्वयंसेवकों का सौभाग्य है कि हमारे पास मोहन भागवत जी जैसे दूरदर्शी और परिश्रमी सरसंघचालक हैं, जो ऐसे समय में संगठन का नेतृत्व कर रहे हैं। एक युवा स्वयंसेवक से लेकर सरसंघचालक तक की उनकी जीवन यात्रा उनकी निष्ठा और वैचारिक दृढ़ता को दर्शाती है। विचार के प्रति पूर्ण समर्पण और व्यवस्थाओं में समयानुकूल परिवर्तन करते हुए उनके नेतृत्व में संघ कार्य का निरंतर विस्तार हो रहा है। मैं माँ भारती की सेवा में समर्पित मोहन भागवत जी के दीर्घ और स्वस्थ जीवन की पुनः कामना करता हूँ। उन्हें जन्मदिवस पर अनेकानेक शुभकामनाएं।

~ नरेंद्र मोदी

नेपालः कम्यूनिस्ट दिवास्वप्न का अंत

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सर्वेश कुमार सिंह-

लखनऊ: नेपाली राष्ट्रीय कम्यूनिस्ट पार्टी एकीकृत (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) के नेता और प्रधानमंत्री के. पी. शर्मा औली के त्यागपत्र के साथ ही एक दिवास्वप्न का अंत हो गया है। नेपाल की जनता ने गणतंत्र के नाम पर 17 साल तक कम्यूनिस्ट शासन को देखा। लगभग डेढ़ दशक के इस कालखण्ड में नेपाल में 14 बार सरकारों में बदलाव हुआ। यानि नेपाल अस्थिरता के आगोश में समाया रहा। राजनीतिक अस्थिरता ने चार बार श्री औली को प्रधानमंत्री पद तक पहुंचाया। इसी कालखण्ड में मार्क्सवादी नेता और राजशाही के खिलाफ हिंसक आन्दोलन का नेतृत्व करने वाले पुष्प कमल दहल उर्फ प्रंचण्ड भी 3 बार प्रधानमंत्री रहे। माधव नेपाल ने भी कम्यूनिस्ट नेता के रूप में सरकार का नेतृत्व किया। लेकिन,कोई भी प्रधानमंत्री नेपाल को राजनीतिक स्थिरता और समावेशी विकास के रास्ते पर नहीं चला सका। बल्कि सभी प्रधानमंत्रियों पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगे। परिवारवाद से कोई अछूता नहीं रहा। परिणाम सामने है, नेपाल के युवाओं ने एक झटके में उस दिवास्वपन का अंत कर दिया, जिसके भरोसे ये नेता 2008 में राजाशाही को खत्म करके सत्ता के गलियारों में आ गए थे।

नए परिवेश और सत्ता की चकाचौंध में कामरेड ऐसे समाये कि वे आदर्श और सिद्धान्त जो सर्वहारा के कल्याण, समानता और समाजवाद का नारा देते थे। शुचिता की बात करते थे, वे नारे पानी पर उभरे बुलबुलों की तरह फूट गए। परिणाम सामने है, युवाओं का आक्रोश फूट पड़ा। वे न केवल घरों से निकले बल्कि उन्होंने नेताओं को भी घरों से घसीट कर उनके घरों में आग लगा दी। संसद, सर्वोच्च न्यायालय, प्रशासनिक भवन, प्रधानमंत्री, पूर्व प्रधानमंत्रियों के निजी आवास, मंत्रियों के आवास जला दिये।

नेपाल में एक दशक से अधिक तक राजशाही के अंत के लिए आन्दोलन चला। इसका नेतृत्व मार्क्सवादी-माओवादी नेता पुष्प कमल दहल उर्फ प्रचण्ड ने किया था। यह हिंसक आंदोलन था। सेना के साथ माओवादियों ने सीधा टकराव लिया था। वर्ष 2006 में यह आन्दोलन उग्र हो गया था। सार्वजनिक प्रतिष्ठानों पर हमले हो रहे थे। पुलिस और सेना पर माओवादियों ने आक्रमण किये। लेकिन, अंततः जनआक्रोश में इस आदोलन को बदलने में प्रचण्ड सफल रहे। परिणाम 28 मई 2008 को नेपाल में राजशाही के अंत और गणतांत्रिक शासन की स्थापना हो गई। सत्ता कामरेड पुष्प कमल दहल प्रंचण्ड के हाथों में आ गई। इसी दिन संविधान सभा का गठन भी करने का निर्णय हो गया। संविधान सभा में कम्यूनिस्टों के बहुमत के सामने नेपाली कांग्रेस के राष्ट्रवादी नेता नतमस्तक रहे। सत्ता के सुख की चाह रखने वाले नेपाली कांग्रेस के नेताओं ने भी एक तरह से कम्यूनिस्टों की अधीनता स्वीकार कर ली और सरकारों में भागीदारी भी की। वर्ष 2015 में नया संविधान स्वीकार कर लिया गया। हालांकि इस संविधान पर कई क्षेत्र के लोगों की अहसहमति थी। मधेशी समुदाय की उपेक्षा और कम प्रतिनिधित्व के आरोप लगे थे।लेकिन संविधान सभा में कम्यूनिस्ट नेताओं के दबाव के आगे इन आपत्तियों को नजरअंदाज कर दिया गया।
नेपाल में लगभग एक दशक तक चले हिंसक माओवादी आंदोलन का समर्थन भारतीय कम्यूनिस्टों ने भी खुले तौर पर किया था। इतना ही नहीं जब नेपाल की सरकार ने माओवादियों पर कड़ाई की और सीधी कार्रवाई शुरु की तो प्रचण्ड ने भारत के कम्यूनिस्टों के सहयोग से नई दिल्ली में शरण ली थी। वे यहां के कम्यूनिस्ट नेताओं के लगातार सम्पर्क में थे। यूपीए सरकार में कम्यूनिस्ट पार्टियों की बात गंभीरता से सुनी और मानी जाती थी। प्रेक्षकों का यह भी मानना है कि नेपाल में 2008 में हुए सत्ता परिवर्तन और हिन्दू राष्ट्र के स्वरूप को समाप्त करने में भारत सरकार के मौन अथवा माओवादियों से सहानुभूति की भी मुख्य भूमिका रही। यदि भारत सरकार ने पडोसी हिन्दू राष्ट्र के प्रति अपनी प्रचलित और पूर्व नीति में परिवर्तन नहीं किया होता तो शायद नेपाल आज भी हिन्दू राष्ट्र होता। भले ही राजशाही ब्रिटेन की तर्ज पर सत्ता शीर्ष पर प्रतीकात्मक स्वरूप में विद्यमान रहती। इस दौर में भारत के प्रमुख कम्यूनिस्ट नेता सीपीएम के स्व. सीताराम येचुरी ने कई बार नेताल यात्राएं कीं। अंततः विश्व का एकमात्र घोषित हिन्दू राष्ट्र धर्मनिरपेक्षता और लोकतंत्र के नाम पर चीन प्रेरित कम्यूनिस्ट तानाशाही के आगोश में समा गया।

नेपाल में सत्ता बदलते ही इन कामरेडों ने भारत विरोध को हवा देनी शुरु कर दी। भारत से मित्रता और बन्धुत्व के भाव को नकारते हुए चीनी लाल सलाम स्वीकार किया। चीन का हस्तक्षेप नेपाल में बढ़ता चला गया। चीनी विस्तारवाद की नीति को अनदेखा करते हुए कम्यूनिस्ट राजनेताओं ने उस पर अपनी निर्भरता बढा ली। परिणाम सामने आने लगा जब आवश्यक वस्तुओं का अभाव होने लगा। भारत से सप्लाई चेन टूटने लगी। भारत विरोध बढ़ने से व्यापारियों और ट्रक ड्राइवरों के सामने कठिनाई आने लगी। चीन ने नेपाल की सीमाओं का अतिक्रमण शुरु कर दिया,लेकिन लाल कालीन की कामना में उन्होंने उसे भी अनदेखा किया।

नेपाल के कम्यूनिस्ट नेताओं ने कभी यह चिंता नहीं की कि सदियों से स्वाभाविक सहयोगी रहे भारत-नेपाल के सम्बन्ध कहीं खराब न हो जाएं। बल्कि उल्टे चार बार के प्रधानमंत्री के.पी.शर्मा औली ने एक नया मानचित्र जारी कर भारत के कई क्षेत्रों को नेपाल का हिस्सा बता दिया। इसमें उत्तराखण्ड के लिपुलेख, लिम्पियाधुरा और कालापानी को नेपाल का हिस्सा बता दिया। नक्शे के विवाद में भारत और नेपाल के सम्बन्धों में प्रतिकूल प्रभाव पड़ा। भारत सरकार ने नेपाल के विकास खास तौर पर सड़क, यातायात, पुल, स्वास्थ्य आदि के लिए दीर्घकालीन योजनाएं शुरु की थीं। ये योजनाएं कई दशकों से चल रही थीं। नेपाल के युवाओं को भारतीय सेना में भर्ती किया जाता है। नेपाल और भारत के सम्बन्ध रोटी-बेटी के रहे हैं। किसी तरह का भेदभाव नेपाल के साथ भारत में नहीं है और न ही नेपाल की जनता कोई भेदभाव भारतीय समाज के साथ करती है। लेकिन, काल्पनिक विकास के मास्टर कम्यूनिस्टों को ये सम्बन्ध रास नहीं आते थे। हालांकि जन दबाव में उन्हें भी सामाजिक परम्पराओं को निभाना पड़ता था।

भारत में 2014 में मोदी सरकार आने के बाद नेपाल के प्रति फिर से सम्बन्ध सुधारने और कम्यूनिस्ट शासन के बावजूद वहां की जनता के हितों पर फोकस किया गया। मोदी सरकार ने अतीत की कटुता को भुलाते हुए नेपाल के विकास में भारत की प्रतिबद्धता को दोहराया और कई परियोजनाओं को शुरु करने की अनुमति दी। लेकिन, औली सरकार ने हमेशा भारत की तुलना में चीन को तरजीह दी। नेपाल हर मोर्चे पर भारत की बजाय चीन के साथ खड़ा दिखायी दिया। विश्व स्तर पर भी उसने कभी यह संदेश नहीं दिया कि वह भारत का स्वाभाविक सहयोगी पड़ोसी है।

आधुनिक नेपाल को गढ़ने में भारत की अहम भूमिका रही है। नेपाल के 80 और 90 के दशक के अनेक नेताओं को शिक्षा प्रदान करने से लेकर उनके हितों का संरक्षण भारत ने किया है। नेपाली कांग्रेस के नेता गणेश मान सिंह, वीपी कोईराला, गिरिजा प्रसाद कोईराला सभी नेताओं के भारत में नेताओं के साथ बहुत ही मथुर सम्बन्ध रहे। इनमें से कई नेताओं की शिक्षा दीक्षा काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में हुई थी। वे भारत को अपना घर मानते थे। इसी कारण जब 1991 में आम चुनाव हुए तो नेपाली कांग्रेस के प्रधानमंत्री बने गिरिजा प्रसाद कोईराला ने सबसे पहले भारत की यात्रा की। लेकिन नेपाली कांग्रेस लम्बे समय तक सत्ता में काबिज नहीं रह सकी। उसके खिलाफ लगातार कम्यूनिस्ट पार्टियां आन्दोलन कर रही थीं। नेपाली कांग्रेस को भारत समर्थक दल घोषित कर दिया गया और इसे नेपाल की अस्मिता और स्वतंत्रता से जोड़कर नेपाली युवाओं को भडकाया गया कि नेपाल को भारत अपने अधीन रखना चाहता है। विमर्श गढा गया कि नेपाली कांग्रेस नेपाल को भारत के अधीन कर देगी। ये सब कुछ चीन की शह पर हो रहा था। चीन नहीं चाहता था कि नेपाल लम्बे समय तक भारत के साथ रहे। उसे इस हिमालयी देश को अपने चंगुल में लाना था। ताकि भारत पर दबाव बनाकर रखा जा सके।

लेकिन तमाम तरह के हथकंडे अपना कर और जनता को भ्रमित करके कम्यूनिस्ट 2008 में नेपाल की सत्ता पर काबिज तो हो गए। लेकिन, वे अपने कारनामों की वजह से स्थायी रूप से टिक न सके। यही वजह रही कि बार-बार सरकार बदलते रहे ताकि जनता को लगे कि कोई परिवर्तन हो गया है। जनता सब कुछ चुपचाप देखती है, लेकिन लम्बे समय तक चुप नहीं रहती। यही नेपाल में हुआ, जब 5 सितम्बर को तत्कालीन प्रधानमंत्री के.पी.शर्मा औली ने 26 सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर प्रतिबंध लगा दिया। इससे युवाओं में आक्रोश पैदा हो गया। नेपाल में सोशल मीडिया व्यापारिक सुविधाओं का एक संचार माध्यम भी बन चुका है। चूंकि नेपाल का मुख्य आर्थिक स्रोत पर्यटन है और पर्यटन में सोशल मीडिया की मुख्य भूमिका है। इस लिए युवा इस मुद्दे कों लामबंध हो गए। युवाओं ने 8 सितंम्बर को संसद तक मार्च निकाल दिया। इस मार्च के संसद भवन पहुंचने पर पुलिस और आन्दोलनकारियों में हुई भिड़ंत में गोली चलने से 19 युवाओं की मृत्यु हो गी। इससे नेपाल पूरी तरह अशांत हो गया। युवा वेकाबू हो गए। उन्होंने फिर जो कुछ किया वह अभूतपूर्व, अकल्पनीय है। इसी आक्रोश के आगोश में आकर आखिर नेपाल की कम्यूनिस्ट सरकार का पतन हो गया है। नौ सितम्बर को प्रधानमंत्री के.पी. शर्मा औली ने भी त्यागपत्र दे दिया। फिलहाल नेपाल सेना के नियंत्रण में है। लेकिन,अब कम्यूनिस्ट शासन की विफलता दुनिया भर में नये विमर्श को जन्म देगी कि क्या वामपंथी विचारधारा किसी देश को लम्बे समय तक स्थायी और समावेशी विकास और उन्नति के मार्ग पर ले जा सकती है।

10 सितंबर 1915 सुप्रसिद्ध क्राँतिकारी जतिन्द्र नाथ मुखर्जी का बलिदान

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दिल्ली । भारतीय स्वाधीनता संग्राम में कुछ ऐसी प्रतिभाओं ने अपने जीवन का बलिदान दिया जो यदि अंग्रेजों की आधीनता स्वीकार कर लेते तो उन्हें उचचतम प्रसिद्धि मिल जाती । ऐसे ही बलिदानी थे बाघा जतिन ।

उनका नाम जतिनन्द्र नाथ मुखर्जी था लेकिन वे बाघा जतिन के नाम से भी जाने जाते हैं । उनका जन्म 7 दिसम्बर 1879 को जैसोर क्षेत्र में हुआ था । यह क्षेत्र अब बंगलादेश में है । जब पाँच वर्ष के हुये, तभी पिता का देहावसान हो गया था। माँ ने बड़ी कठिनाई से लालन-पालन किया। वे शरीर से बहुत हृष्ट-पुष्ट थे । किशोर वय में वे जंगल घूमने गये तो बाघ सामने आ गया। वे बाघ से भिड़ गये । बाघ भाग गया । तब से उनका नाम बाघा जतिन पड़ गया । वे जितने शरीर से सुदृढ़ थे उतने ही पढ़ने में भी बहुत कुशाग्र थे । उन्होंने 18 वर्ष की आयु में मैट्रिक परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की थी । फिर स्टेनोग्राफी सीखी और कलकत्ता विश्वविद्यालय में स्टेनोग्राफर की नौकरी कर ली । अपनी सेवा काल में भी पढ़ाई जारी रखी । लेकिन वे अधिक नौकरी न कर सके । अपनी सेवा काल में जब भी अंग्रेजों द्वारा भारतीयों के साथ अपमानजनक व्यवहार देखते तो खून खौल उठता उसका प्रतिकार भी करते । लेकिन परिवार की जरूरत को ध्यान में रखकर समझौता करके नौकरी करते रहे । तभी 1905 आया । अंग्रेज सरकार ने बंगाल विभाजन की घोषणा कर दी । इसका विरोध आरंभ हुआ । यतींद्र नाथ मुखर्जी ने बंगाल विभाजन का विरोध किया । उन्होंने नौकरी छोड़कर कर आन्दोलन की राह पकड़ी। उन्होने युवकों की टोली बनाई और अंग्रेज अधिकारियों की घेराबंदी शुरू की । इस आँदोलन में उनकी आगे की पढ़ाई छूट गई। आँदोलन इतना तीव्र हुआ कि अंग्रेज सरकार को बंगाल विभाजन का निर्णय वापस लेना पड़ा। लेकिन बाघा जतिन ने राह न बदली । उन्हे दोवारा नौकरी पर आने का प्रस्ताव भी आया पर सरकारी नौकरी में न गये और क्राँतिकारी आंदोलन से सीधे जुड़ गये । वे 1910 में ‘हावड़ा षडयंत्र केस’ में गिरफ्तार हुये । एक साल का कारावास मिला ।

जेल से मुक्त होने पर’अनुशीलन समिति’ और ‘युगान्तर’ से जुड़ गये । वे दोनों प्रकार से कार्य करते थे एक तो क्रांति की गतिविधियों में सीधे भागीदारी और दूसरे आलेख लिखकर जन जागरण करना । क्रांतिकारियों के पास आन्दोलन के लिए धन जुटाने के लिये दुलरिया नामक स्थान पर अपने ही सहयोगी अमृत सरकार घायल हो गए थे । समस्या यह थी कि धन लेकर भागा जाये या साथी के प्राणों की रक्षा । स्वयं अमृत सरकार ने जतींद्र नाथ से कहा कि धन लेकर चले जाओ । पर जतींद्र तैयार न हुए तो अमृत सरकार ने आदेश दिया- ‘मेरा सिर काट कर ले जाओ ताकि अंग्रेज पहचान न सकें।’ पर जतिन ने अपने साथी को वहाँ न छोड़ा और साथ लेकर ही चले । क्रान्तिकारियो के ऐसे जज्वे से मिली है स्वतंत्रता।

कलकत्ता में उन दिनों एक राडा कम्पनी बंदूक-कारतूस का व्यापार करती थी। क्रान्तिकारियो ने इस कम्पनी की एक गाडी पर धावा बोला, जिसमें ५२ माउजर पिस्तौलें और ५० हजार गोलियाँ प्राप्त हुई । कुछ विश्वास घातियों ने सरकार को य। अवगत करा दिया था कि ‘बलिया घाट’ तथा ‘गार्डन रीच’ घटनाओ में यतींद्र नाथ का हाथ था। पुलिस पीछे लगी । कयी मुखबिर छोड़ दिये गये । अंततः सितंबर 1915 को पुलिस ने जतींद्र नाथ के अड्डा ‘काली पोक्ष’ स्थित गुप्त निवास पर पहुंच गयी । यतींद्र अपने साथियों के साथ वह जगह छोड़ने ही वाले थे कि पुलिस ने घेर लिया । यतींद्र नाथ ने गोली चला दी । मुखबिर राज महन्ती वहीं ढेर हो गया। यतीश नामक एक क्रांतिकारी बीमार था। जतींद्र उसे अकेला छोड़कर जाने को तैयार नहीं थे। चित्तप्रिय नामक क्रांतिकारी उनके साथ था। दोनों तरफ़ से गोलियाँ चली। चित्तप्रिय भी बलिदान हो गये। वीरेन्द्र तथा मनोरंजन नामक अन्य क्रांतिकारी मोर्चा संभाले हुए थे। इसी बीच यतींद्र नाथ का शरीर गोलियों से छलनी हो गया था । वे जमीन पर गिर पड़े। मनोरंजन ने उन्हें उठा कर भागने का प्रयत्न किया । किंतु अंग्रेज अफसर किल्वी ने घेर लिया । सामान्यतः ऐसी स्थिति में क्राँतिकारी में स्वयं को गोली मार लिया करते हैं पर मनोरंजन के कंधे पर जतिन थे इसलिये पकड़े गये । उनका बलिदान अगले दिन 10 सितंबर को हुआ । यद्धपि अंग्रेज रिकार्ड में घायल होने के कारण उनकी मौत हुई पर कुछ लोगों का मानना है कि पुलिस प्रताड़ना से उनका बलिदान हुआ । जो भी सत्य हो 10 सितंबर 1915 को इस महान क्राँतिकारी का बलिदान हो गया ।
शत शत नमन्’

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