बंगाल से बांद्रा, बुलडोजर और बवाल

images-9.jpeg

विजयमनोहरतिवारी

बंगाल से बांद्रा तक बीते दशकों में सरकारी जमीनों पर हुए कब्जों के खिलाफ एक मुहिम छिड़ी हुई है। इस संदर्भ में क्या आपने ऑल इंडिया यूनाइटेड मुस्लिम मोर्चा के प्रवक्ता हाफिज गुलाम सरवर एक ताजा बयान सुना है?
———–
भोपाल । मुंबई यात्राओं के दौरान मैं बांद्रा के होटल रंगशारदा और मरीन ड्राइव पर सी-ग्रीन में रुकते हुए अक्सर खाली शामों को जुहू-बांद्रा के तटों और खार-अंधेरी की तंग गलियों में घूमता रहा हूँ। इन इलाकों में मुंबई की चमकदमक से परे एक अलग ही शहर पसरा हुआ देखा। रेल पटरियों से सटे टीन-टप्परों के चार मंजिला ऊंचे शेड, जो दरअसल कारखाने या रहने के ठिकाने बनते गए। ज्यादातर यूपी, बिहार और बंगाल के इलाकों से 40 साल पहले कोई एक आया था। अब उसी के चार सौ रिश्तेदार यहाँ दस बस्तियों में जमा हैं। धरावी एशिया की सबसे बड़ी स्लम तो यहाँ है ही, मुंबई के सारे उपनगरों में धरावी का संक्रमण तेजी से फैला हुआ है। बेरोकटोक सुनियोजित कब्जों की खुली कहानी, घुसपैठियों के लिए जन्नत बनती गई!

कोलकाता तो पूरा कबाड़खाना ही बन चुका है, जहाँ आप एक मरते हुए शहर की साँसें अनुभव कर सकते हैं। फुटपाथ और रेलवे स्टेशनों पर ऐसे कब्जे देश में शायद ही कहीं और देखने को मिलें, जैसी ईजाद बंगाल में हुई और यह किसी एक सरकार का योगदान नहीं है। सीपीएम के सत्ता में आते ही सबै भूमि जैसे हजरत लाल सलाम की हो गई। कब्जों से वसूली का मालदार नेटवर्क बाद में टीएमसी के खातों में जुड़ गया और कोलकाता अपने पुराने वैभव के साथ मरता रहा। आप गाँधी मार्ग के दोनों ओर की गलियों में घूमिए, ढाका और इस्लामाबाद के दीदार दूर-पास से होते ही रहेंगे। जैसे कानून नाम की कोई चीज ही नहीं बची थी।

एक बात साफ है कि भारत के ग्रामीण और जनजातीय समाज के लोगों का पलायन केवल मजदूरी के लिए है, जो आपको बंगाल से बांद्रा तक के संगठित और ताकतवर कब्जाधारियों में शायद ही कहीं दिखाई दें। वे असंगठित क्षेत्र की लेबर हैं, जो इन्फ्रास्ट्रक्चर के प्रोजेक्ट्स, खदानों और कारखानों में खपती है। कुछ महीनों के बाद लौट-लौटकर अपने गाँवों में आती रहती है। बुलडोजरों के निशाने पर आ रही यह एक अलग ही दुनिया है, हाफिज सरवर इसी की ओर इशारा कर रहे हैं।

बंगाल और बांद्रा के कब्जों में डेमोग्राफी बदलने का संगठित पैटर्न साफ है, जो हर जगह दिन की रोशनी जैसा स्पष्ट है। एक ही शहर में पुरानी तंग बस्तियों के बाशिंदे रोजगार और कमाई के लिए नए विकसित होते इलाकों पर निर्भर हैं। शहरों का कोई फुटपाथ, कोई खाली जमीन, कोई नदी-नाले, पुल-पुलिया या कोई सरकारी जमीन इनसे सुरक्षित नहीं है। बहुत मामूली स्तर पर किसी धर्मस्थल के लिए कब्जाई गई जमीन पर केवल तीस साल में मेले का मजमा दिखाई देगा मगर यह गुनगुने पानी के लगातार बढ़ते तापमान जैसा परिवर्तन होगा, जिसमें बैठा मेंढक अपने अंत से बेखबर है। गैरकानूनी ढँग से फैलने-पसरने की लत कैसे और किन्होंने लगाई, हाफिज सरवर से सुनिए।

मध्यप्रदेश में लोकल फंड ऑडिट के डायरेक्टर डॉ. रमेश केवलिया नगर निगमों को “नरक निगम’ कहा करते थे। वे ऐसा केवल स्थानीय निकायों में व्याप्त भयावह भ्रष्टाचार के कारण कहते थे। नगरीय निकायों की अनदेखी या मिलीभगत लगातार बढ़ते कब्जों का मूल कारण है, जो सियासी संरक्षण के बिना संभव नहीं है। अदालतों के आदेशों की अवहेलना वर्ना कैसे मुमकिन है? बंगाल और बांद्रा के दृश्य यह बता रहे हैं कि यह नरक फैलता जब तक भी रहे मगर एक दिन मजबूर होकर सरकारों को इनके खिलाफ खुलकर आना ही होगा। असम, उत्तरप्रदेश और उत्तराखंड में हो सकता है कि बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया जा रहा हो और असल में प्रशासन केवल अपनी सुविधा से ही कब्जों को हटाने में लगा हो, मगर शहरों को पूरी तरह नर्क में बदलने के पहले यह एक व्यापक अभियान में बदलना चाहिए।

कब्जों के खिलाफ बुलडोजर एक प्रतीक बन गया है, जिसे उत्तरप्रदेश में योगी आदित्यनाथ से जोड़ दिया गया है। मगर 1991 में मुख्यमंत्री सुंदरलाल पटवा के समय बाबूलाल गौर ने भोपाल रेलवे स्टेशन के पास कुछ ऐसी ही शुरुआत सबसे पहले की थी। भोपाल को कानून के शासन का अहसास कराया गया था। इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक सीनियर वकील ने मुझे बताया था कि आपातकाल के पहले संजय गाँधी ने त्रिवेणी के रास्ते में ऐसी ही एक नाजायज घनी बस्ती साफ कराई थी और किसी भी प्रकार के उपद्रव की आशंका को देख स्थानीय मजहबी नेताओं को आगे करने के लिए खुद दिल्ली से अचानक आए थे।

कब्जों के विरुद्ध जारी मुहिम की तस्वीरें भले ही बंगाल और बांद्रा से आ रही हों मगर यह नजारा पूरे देश का है। शहरों में कब्जों की बाढ़ आई हुई है। हर खाली जमीन पर झुग्गियाँ जंगल सी उग रही हैं। हर फुटपाथ पर गुमटी-ठेले प्रकट हो रहे हैं। अगर गाँवों से लोग शहरों में पलायन कर रहे हैं तो इनके समाजशास्त्रीय अध्ययन होने चाहिए कि वो कौन लोग हैं, कहां से आते हैं, उनकी सामुदायिक पहचान क्या है, वे एकल पलायन में हैं या डेमोग्राफी के लक्ष्य से कोई संगठित पैटर्न काम कर रहे हैं। घरों की रोज सफाई घरों को रहने लायक बनाए रखती है। हमारे छोटे-बड़े शहरों की नियमित निगरानी और साफ-सफाई शहरों को रहने लायक रखेगी। वोट बैंक की राजनीति ने दशकों तक कूड़ा फैलने दिया और अब बांद्रा से उखड़ रहे कब्जाधारी कांग्रेस सांसद सुनील दत्त की रहमदिली को याद कर रहे हैं, जब उन्हें बेरोकटोक बसाया गया होगा। बंगाल में भी यही हाल है।

भारत की तेज गति से बढ़ती आबादी और असंतुलित विकास की नीतियों में गाँवों की अनेदखी अंतत: शहरों को ही नर्क बना रही है। बीस लाख आबादी की क्षमता के शहर दो गुनी से ज्यादा आबादी झेल रहे हैं। हर दिन ऑफिस टाइम में ट्रैफिक इसके सबूत दे रहा है। हर बाजार, सड़क और फुटपाथ पर कब्जे उबल रहे हैं। वे हमारे दैनिक जन-जीवन पर बुरा असर कर रहे हैं। हमारे शहर दमघोंटू चिल्लपौं में बदल गए हैं, जहाँ शहर कम और भीड़ अधिक है। यह असंतुलन पुलिस के लिए भी भारी पड़ रहा है क्योंकि हर तरह के अपराध बढ़ ही रहे हैं और कब्जाई गई जमीन पर किसी योजना से बसाए गए घुसपैठिए एक स्थाई खतरा बन रहे हैं। समय रहते इनसे न निपटा गया तो दस साल बाद हम जानेंगे कि केवल वोट बैंक को संगठित ताकत बनाकर किस दूरगामी योजना के तहत तबाही की तैयारी थी।

बहरहाल हालातों को देखते हुए हाफिज गुलाम सरवर इस नतीजे पर पहुँचे हैं कि मुसलमानों को गैरकानूनी काम करने की लत लगा दी गई थी। सेक्युलर पार्टियों ने मुसलमानों का गलत इस्तेमाल किया इसलिए सबसे बड़े भुक्तभोगी वे ही हैं। दुकान मछली, मुर्गे या गोश्त की हो लाइसेंस तो चाहिए। अब भाजपा का चाबुक चल रहा है तो ऐसे कारोबारों में मुसलमानों की अधिकता होने से उन्हें ही परेशानी हो रही है। गैरकानूनी निर्माण, गैरकानूनी दुकान, गैरकानूनी तिजारत जैसे मामले बढ़ा दिए गए थे। इसी का खामियाजा आज भुगतना पड़ रहा है।

ये उन्हीं के शब्द हैं। और भी बहुत कुछ बोले हैं मगर मैं गुलाम सरवर के आधे घंटे के इस वीडियो से पूरी तरह सहमत नहीं हूँ। वह काबिले-गौर जरूर है!

पाकिस्तान अब नहीं बचा पाएगा अपना कोई भी आतंकी

wst1GU74VjlB5TZbEy8U6DPY18lCPIeglfjXoCCm.jpg

पुलवामा आतंकी हमले का साजिशकर्ता और भारत में कई आतंकी हमलों में वाछित अल बदर मुजाहिदीन का आपरेशनल कमांडर अर्जमंद गुलजार उर्फ़ हमजा बुरहान पाकिस्तान में गुलाम कश्मीर की राजधानी मुजफ्फराबाद में मार दिया गया है। हमजा को दो अज्ञात लोगों ने आजरा में एमएस कालेज परिसर के पास मारा। मूलतः दक्षिण कश्मीर में पुलवामा के खरबतपोरा के रहने वाले बुरहान पर सुरक्षाबलों ने 10 लाख का इनाम रखा था। केंद्रीय गृह मंत्रालय ने भी उसे 20 अप्रैल 2022 को आतंकी घोषित कर रखा था।

हमजा बुरहान करीब आठ वर्ष से पाकिस्तानी सेना और उसकी खुफिया एजेंसी आईएसआई का बहुत चहेता था। आईएसआई व पाक सेना हमजा की सुरक्षा किया करती थी। वह आतंकी संगठन अल बदर मुजाहिदीन की कमान काउंसिल में तीसरा स्थान रखता है। पहले नंबर पर बख्त जमीन उसके बाद यूसुफ बलोच और हमजा बुरहान आता था। घाटी में हिजबुल मुजाहिदीन के नेटवर्क के लगभग तबाह होने के बाद आईएसआई के स्थानीय चेहरे के रूप में उसे इस्तेमाल करते हुए कश्मीर में स्थानीय आतंकियों की भर्ती का षड्यंत्र चला रही थी। पाकिस्तान में जिस प्रकार एक के बाद एक आतंकी मारे जा रहे हैं उससे यह बात सिद्ध हो रही है कि जो पाकिस्तान आज पश्चिम एशिया युद्ध में शांति दूत बनने की कोशिश कर रहा है असल में दुनिया भर में अशांति का दूत है। पाकिस्तान केवल अपने आप को बचाने के लिए अमेरिका की गोद में बैठकर दुनिया को शांति मार्ग दिखाने का नाटक कर रहा है।

पुलवामा हमले में 14 फरवरी 2019 को जम्मू कश्मीर राष्ट्रीय राजमार्ग पर पुलवामा में आतंकियों ने विस्फोटकों से भरी एक कार से सीआरपीएफ के काफिले में शामिल वाहन को टक्कर मारी थी । इस हमले में 40 जवान शहीद हो गए थे। यह कुख्यात आतंकी हमजा बुरहान उसी हमले का साजिशकर्ता था जो अब मारा जा चुका है। यह कई और आतंकी वारदातों मे भी शामिल रहा था। पाकिस्तान में जिस प्रकार से एक के बाद एक भारत विरोधी आतंकी मारे जा रहे हैं उससे इन आतकी संगठनो के नेतृत्व में खलबली व बैचेनी बढ़ गई है कि अब अगला नंबर किसका हो सकता है।आतंकी संगठनों में खलबली मचना इसलिए भी स्वाभाविक है क्योकि उनकी सुरक्षा पाक सेना करती है। पाकिस्तान में एक चर्चा यह भी हो रही है कि कहीं ये घटनाएं आपसी गुटबाजी या संघर्ष का परिणाम तो नहीं हैं। हमजा बुरहान 2017 में पाकिस्तान चला गया था। वह खुद को पाकिस्तान में शिक्षक बताता था। वह पाक अधिकृत गुलाम कश्मीर में कई आतंकी संगठनों को प्रशिक्षण देने के काम में लगा हुआ था। साथ ही वह आतंकियों को भारत में घुसपैठ करवाने में मदद करता था। हमजा को अपने सर्किल में ”डाक्टर“ नाम से भी जाना जाता था।

पाकिस्तान में एक बाद एक आतंकी लगातार मारे जा रहे हैं । सुरक्षा की दृष्टि से यह एक बहुत बड़ा बदलाव है। ऑपरेशन सिंदूर के बाद पाकिस्तान में अब तक दो दर्जन से अधिक ऐसे आतंकी मारे जा चुके हैं जो भारत में किसी बड़ी आतंकी घटना में शामिल रहे हैं। अब तक जिन आतंकियों को एक तरह से मारा गया है उनमें मार्च 2025 को लश्कर आतंकी फैजल नदीम उर्फ अबु कताल, फरवरी 2025 को लश्कर -ए -तैयबा की राजनीतिक शाखा का चीफ मौलना काशिफ अली, मार्च 2025 में ही आईएसआई का अंडर कवर एजेंट मुफ्ती शाह मीर , नवंबर 2023 मे आतंकी मससूद अजहर का करीबी रहीम उल्लह मारिक, नवंबर 2023 में ही लश्कर आतंकी अकरम गाजी और लश्कर आतंकी ख्साजा शाहिद फिर सितंबर 2023 में लश्कर आतंकी मौलना जियाउर रहमान अप्रैल 2025 में मसूद अजहर का करीबी काजी एजाज आबिद, अक्तूबर 2023 में मसूद अजहर का करीबी दाऊद मालिक दिसंबर 2023 में लश्कर आतंकी अदनान अहमद, फरवरी 2023 में हिजबुल आतंकी बशीर अहमद पीर मार्च 2022 में जैश का आतंकी जहूर इब्राहीम, मार्च 2025 में आईएसपीआर अधिकारी मेजर दानियाल, सितम्बर 2023 में लश्कर- ए -तैयबा का आतंकी रियाज अहमद तथा मई 2023 में खालिस्तानी आतंकी परमजीत सिहं पंजवार को अब तक मारा जा चुका है । यह सभी कुख्यात आतंकी रह चुक थे तथा भारत में बड़़ी आतंकी वारदातों को आंजाम देने में इन सभी की बड़ी भूमिका रह चुकी थी।

इसके अलावा भी कई और आतंकवादी अज्ञात व गुमानाम लोगों के द्वारा मारे जा चुके हैं। पाकिस्तान में अभी भी हाफिज सईद और मसूद अजहर सहित भारत के मोस्ट वांटेड आतंकवादी खुलेआम घूम रहे हैं । दाऊद इब्राहीम भी सेना व आईएसआई के संरक्षण में वहीं रह रहा है और इन सभी की सुरक्षा अत्यंत कड़ी है। यहां पर यह बात भी ध्यान देने योग्य है कि हमजा बुरहान को सेना ने सुरक्षा गार्ड और कार तक दे रखी थी। भारत के रक्षामंत्री राजनाथ सिंह कई अवसरों पर पाक को कड़ी चेतावनी दे चुके हैं कि अब पाकिस्तान की एक भी गली व कोना भारत से छिपा हुआ नहीं रह गया है, जिस देश को भारत ने जन्म दिया है वह उसे समाप्त भी कर सकता है। भारतीय सेना भी कह रही कि अगर पाकिस्तान नहीं सुधरा तो उसका इतिहास- भूगोल सब कुछ बदल जाएगा।

मोदी , मेलोनी के पहुनवा राघो की मेलोडी !

177927012768673.webp.jpeg

दयानंद पांडेय

लखनऊ: हम जब बच्चे थे कुछ वाक़ये ग़ज़ब घटते थे l जब अम्मा के साथ बैलगाड़ी से ननिहाल जाते थे तो चलते समय गांव में हमारे बाबा यानी पितामह बड़े प्यार से मुस्कुराते हुए कहते थे कि बाबू अपनी नानी से कहना कि तैयार रहेंगी, हम जल्दी ही उन्हें विदा कराने आने वाले हैं l उधर से वापस आते समय, नाना कहते कि नाती अपनी इया यानी दादी से कहना कि हम जल्दी ही उन को विदा कराने आ रहे हैं l और हम किसी कबूतर की तरह बाल सुलभ अंदाज़ दोनों को यह संदेश दे देते थे l सुन कर इधर इया हंसतीं, उधर नानी हंसतीं l

ग़ज़ब तो तब होता जब ननिहाल का हलवाह , नाई या कहार बड़े प्यार से कहता कि फूफा कहो l ददिहाल में भी यही लोग कहते मौसा कहो l हम किसी छोटी मोटी लालच में आ कर कह देते l तो पाता कि अम्मा दोनों तरफ़ नाराज हो जाती l दुखी हो जाती l ददिहाल में भी , ननिहाल में भी l बात तब समझ नहीं आती थी l कि माजरा क्या है ?

इसी तरह गांव के कुछ चाचा लोग फुआ पक्ष के लोगों को देखते ही कहते थे , पहुना कहो ! पहुना मतलब बहनोई ! ननिहाल पक्ष के लोग तो लोग पहुना कहते ही थे l गांव में इस तरह की ठिठोली, हँसी, मज़ाक़ रिश्तों में मिठास , अपनापन और आत्मीयता घोलते थे l एक दूसरे के प्रति सम्मान और मर्यादा का भाव रखते l

एक समय हरिशंकर तिवारी जब गोरखपुर के चिल्लूपार से विधायक चुन कर लखनऊ आए तो पार्क रोड पर बलिया के विधायक भोला पांडेय के बगल में ही उन्हें आवास आवंटित हुआ l दोनों ब्राह्मण , दोनों माफिया l दोनों में ही गहरा मेलजोल और हँसी मज़ाक इसी भाव में होता l कोई 1986-1987 की बात होगी यह l

भोला पांडेय से हरिशंकर तिवारी कहते , पहुना नहीं कहा l पहुना कहिए l तो यही संवाद भोला पांडेय भी दुहराते l देखा कि अकसर भोला पांडेय को ही पहुना कहना पड़ता l चुहुल चलती रहती l मिठास बनी रहती l भोला पांडेय, तिवारी के पांव भी छूते थे l पहुना भाव बना रहता l

भोला पांडेय के ऊपर बैडमिंटन खिलाड़ी सैय्यद मोदी और अमिता मोदी भी रहते थे l फर्स्ट फ्लोर पर l संजय सिंह का मोदी के घर आना जाना बना रहता था l सैय्यद मोदी के फ्लैट के सामने ही न्यूज एजेंसी यू एन आई का दफ़्तर था l सदाशिव द्विवेदी वहाँ संवाददाता थे l बलिया के ही थे l हमारी अच्छी दोस्ती थी l तो अकसर देखता था कि संजय सिंह आते l जिप्सी चलाते हुए l बिना ड्राइवर के l

सैय्यद मोदी दरवाज़ा खोलता और बाहर निकल कर सीढ़ी उतर जाता l संजय सिंह अंदर जा कर दरवाज़ा बंद कर लेते l एक बार भोला पांडेय से इस की चर्चा की l चुहुल में l वह हँसे l भोला पांडेय भले विधायक थे l माफिया थे l पर रंगबाजी और लौंडपना भी बहुत था l उन्हीं दिनों भोला पांडेय ने एक महिला विधायक सुमनलता दीक्षित से दूसरा विवाह भी कर लिया था l

सुमन लता दीक्षित सुंदर भी थीं और हट्ठी कट्ठी भी l लंबी सी l इस लिए भी भोला पांडेय चर्चा में थे l यह वही भोला पांडेय थे जो जनता पार्टी की मोरार जी देसाई सरकार के समय एक बार आकाशवाणी लखनऊ के स्टूडियो में जबरिया घुस कर इंदिरा गांधी जिंदाबाद का नारा लगा दिया था l जो प्रसारित हो गया था l उन के साथ सुल्तानपुर के देवेंद्र पांडेय भी थे l जल्दी ही भोला पांडेय और देवेंद्र पांडेय ने एक फ़्लाइट में टेनिस बाल को बम बता कर हाईजैक कर लिया था l बाद में कांग्रेस ने दोनों को टिकट दिया और दोनों विधायक चुने गए l

ख़ैर एक दिन भोला पांडेय ने संजय सिंह के भीतर जाते ही बाहर से बेलन लगा कर दरवाज़ा बंद कर पुलिस को फ़ोन कर दिया कि फला फ़्लैट में रंडीबाजी हो रही है l आनन फानन पुलिस ने फ़्लैट घेर लिया l दरवाज़ा खुलवाने पर संजय सिंह बाहर निकले l सरकार में ताक़तवर मंत्री थे l तत्कालीन मुख्य मंत्री वीर बहादुर सिंह को चुनौती देते हुए , मुख्य मंत्री पद के दावेदार l पुलिस उन्हें देखते ही सकपका गई l उल्टे पांव लौट गई l पर हंगामा हो गया l पूरा पार्क रोड जुट गया l

उस दिन भोला पांडेय ने बिना टोके हरिशंकर तिवारी से हंसते हुए कहा , पहुना आज त मजा आ गईल ! हरिशंकर तिवारी अपनी मूंछों में मुस्कुराए और बोले , सरऊ हम के बदनाम करे ख़ातिर हमरे घरे आ गईलs !

पहुना ! कह कर हाथ जोड़ कर भोला पांडेय भी ठठा कर हंस पड़े l

यह पहुना प्रकरण इटली में मेलोनी को मोदी ने जो मेलोडी खिलाई उस संदर्भ में याद आ गया l मेलोनी और मोदी की मिठास के किसिम-किसिम के रिश्ते गढ़ने , मिठास और ठिठोली के बीच ही कोई राहुल की मौसी का मज़ा ले रहा है , कोई ममेरी बहन का रिश्ता खोज रहा है , कोई कुछ l इंदिरा गांधी की भी याद आ गई है l कभी ब्रेजनेव , कभी फ़िदेल कास्त्रो के साथ उन की भी बड़ी चर्चा हुई l रीगन के साथ भी l

मोदी, मेलोनी के क़िस्से पहले भी ख़ूब गढ़े गए , गाए और बताए गए हैं l पर अब की राहुल गांधी की बौखलाहट ने इस में एक नया और चटक रंग भर दिया है l राहुल गांधी के भक्तों ने इस रंग में फिटकिरी डाल-डाल कर इसे और चटक कर दिया है l इतना कि शारदा सिन्हा का गाया मैथिली गीत, पहुनवा राघो ! याद आ गया है l पहुनवा राघो की सोंधी मिठास मन में घुल गई है l किसी राजनयिक यात्रा में पहुनवा राघो भी हो सकता है भला ! यह ठीक ही कहा जाता है कि मोदी दिल , दिमाग़ और ड्रामा एक साथ ले कर चलता है l पहुनवा राघो गाने को मजबूर कर देता है l

मोदी, अमित शाह और संघ को गद्दार कहने वाले मूर्खाधिपति के लिए भावोद्गार।

supreme-court-7-1687756994.jpg

इंदुशेखर तत्पुरुष

ये उजड्ड है, वज्रमूर्ख है,
जगह–जगह ठुकराया है।
फिर भी इसकी अकड़ तो देखो,
राजवंश का जाया है।।

जब भी इसको दौरा पड़ता,
अल्ल–बल्ल कुछ बकता है।
जब–जब ये पिटता चुनाव में,
तब विदेश जा छुपता है।।

कभी भागता थाईलैंड ये,
जाता कभी मलेशिया।
अबकी बार सुना था मस्कट,
कैसा कष्ट कलेसिया।।

सबको निपटाकर बतला रे!
अब किसको निपटाएगा?
गिरने की भी हद होती है,
कितना गिरता जाएगा?

देशद्रोहियों का पिछलग्गू ,
सोरोसी पिट्ठू लगता।
कौवे जैसी वाणी इसकी
बड़ा मियाँ मिट्ठू बनता।।

जिनकी देशभक्ति जगजाहिर,
उनको ये कहता गद्दार।
असल मूर्ख तो वे जो अब भी
करते हैं इसको स्वीकार।।

scroll to top