नेपाल में यह भी चल रहा है …

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आन्दोलन र पितृ पक्षको पहिलो दिन : एक अनौठो संयोग

सुन्दा अचम्म लाग्न सक्छ—पितृ पक्ष (सोर्ह श्राद्ध) को पहिलो दिनमै जेन Z आन्दोलन सुरु हुनु केवल संयोग मात्र हो । पितृ पक्ष र जेन Z आन्दोलन बीच कुनै प्रत्यक्ष सम्बन्ध छैन जस्तो लाग्न सक्छ । अझ आयोजक समूहले पनि पितृ पक्षकै दिन आन्दोलन सुरु गर्ने भन्ने उल्लेख गरेको पाइँदैन । त्यसैले यो कुरालाई सामान्य संयोग मात्र मान्दा फरक पर्दैन । तर यो संयोगलाई किन अनौठो संयोग भनिएको हो भने, दुवै कुराको मूल जरो एउटै प्रश्नमा जोडिन्छः

“बाबुआमाले गरेको गल्तीको सजाय छोराछोरीले पाउनु ठीक कि गलत ?”

झट्ट सुन्दा यो प्रश्न नै गलत लाग्छ । आधुनिक न्याय प्रणालीले त यसलाई स्वीकार्नै सक्दैन ।

तर न्याय प्रणालीलाई यदि केवल राज्यको एउटा अङ्ग मात्रै भनेर बुझियो भने त्यो बुझाइ साँघुरो हुन सक्छ । ब्रह्माण्ड आफैंमा एउटा न्याय प्रणाली हो । त्यसले आफ्नै हिसाबले काम गर्छ—कतिपय अवस्थामा तत्क्षण सजाय दिन्छ, कतिपय अवस्थामा जन्मजन्मान्तर पर्खाउँछ ।

हाम्रो सनातन हिन्दू, बौद्ध, बोन, किरात लगायत मृत्युपछि पुनर्जन्म र आत्माको यात्रामा विश्वास गर्ने सभ्यताले यो कुरा राम्ररी बुझेको छ । त्यसैले किरात/बोन परम्परामा मृत्यु पश्चात् धामीले आत्मालाई बोलाएर हालखबर सोध्ने चलन छ (बिजुवा खेलाउने भनिन्छ) । त्यस्तै हिन्दू परम्परामा तिथिअनुसार श्राद्ध गर्ने गरिन्छ । पितृ पक्षमा पनि तिथिअनुसार श्राद्ध–तर्पण गर्ने चलन छ ।

यसलाई वैज्ञानिक ढङ्गले बुझ्न खोज्दा कुरा जटिल बन्छ, किनकि मृत्युपश्चातको यात्रा प्रत्येकको कर्म अनुसार ब्रह्माण्डले आफैं निर्धारण गर्छ । हाम्रो हातमा कसैको सबै कर्मको लेखाजोखा छैन, न त ब्रह्माण्डरूपी अदालतमा मुद्दा हाल्ने व्यवस्था नै छ ।

त्यसो भए, फेरि प्रश्न उठ्छ—श्राद्ध किन गर्ने ?

यदि ब्रह्माण्ड आफैं न्याय दिन्छ भने हामी किन हस्तक्षेप गर्ने ?

उत्तर होः ब्रह्माण्डले हाम्रो पिता–पुर्खाको पापको सजाय हामीलाई अदृश्य रूपमा दिइरहेको हुन्छ । तर त्यसैसँगै सुधार्ने अवसर पनि दिएको हुन्छ ।

उदाहरणका लागि, कुनै गाउँलाई डाकुले लुट्यो भने पुस्तौँसम्म त्यहाँ गरिबी रहिरहन्छ । डाकुको सन्तान कानुनी हिसाबले निर्दोष भए पनि लुटेको सम्पत्तिमा मोज गर्दै, अरूलाई थिचोमिचो गर्दै बसिरहेका हुन्छन् । ब्रह्माण्डको दृष्टिमा उनीहरू निर्दोष होइनन्, कारण उनीहरूको समृद्धि पुर्खाको पापमा टेकेको हुन्छ । डाकुको आत्माले मुक्ति नपाएर सन्तानलाई निरन्तर दुख दिने कथा प्रचलित छ ।

यसै दृष्टान्तले ब्रह्माण्डीय न्याय प्रणाली कस्तो जटिल हुन्छ भन्ने बुझाउँछ ।

श्राद्ध गर्ने भन्ने अर्थ, आफ्ना पुर्खाले अन्जानमा वा जानाजान गरेका पापका कारण मृत्यु पश्चात् कठिन यात्रामा रहेकालाई सहज बनाउन तर्पण, दानपुण्य गरेर सघाउने हो । सन्तान भएको नाताले उनीहरूको जिम्मेवारी पनि हामीमा पर्छ । यसरी पुर्खाको उद्धार भए उनीहरूको आशिर्वादले हाम्रो जीवन पनि सहज बन्छ भन्ने विश्वास छ । त्यसैले यसलाई “कर्म–काण्ड” भनिन्छ—पुस्तौँदेखिको कर्मको हिसाबकिताब पुनः नवीकरण गर्ने प्रक्रिया ।

अब जेन Z आन्दोलनको मर्मतर्फ जाऔँ ।

हालसालै नयाँ पुस्ताले सामाजिक सञ्जालमा भ्रष्ट्र नेताका छोराछोरीको विलासी जीवन भण्डाफोर गर्ने अभियान चलाएको छ । “जेन Z आन्दोलन” भन्ने चलन त्यही अभियानको निरन्तरता हो ।

यस अभियानका कारण केही भ्रष्ट्र बाउआमाका छोराछोरी सामाजिक सञ्जालमा आएर रोइलो गर्न थालेका छन्—

“हामी निर्दोष हौँ, हाम्रो के गल्ती ? बाउआमाको पापको सजाय हामी किन पाउनु ? राज्यलाई मात्रै सजाय दिने अधिकार छ ।”

तर यहाँ एउटा प्रश्न छ—राज्यमा विश्वास हुने भए जेन Z पुस्ता सामाजिक सञ्जालमा भण्डाफोर नगरी कानुनी बाटोमा जान्थे ।

तर उनीहरूले कानुन होइन, सामाजिक दबाब रोजे । यसको अर्थ, उनीहरूलाई प्रणालीमै भरोसा छैन ।

अब फेरि प्रश्न—बाउआमाको पापको सजाय छोराछोरीले पाउनु उचित हो ?

सजाय भन्नाले के भण्डाफोर मात्र हो ? के सजाय भ्रष्ट्र नेताका छोराछोरीले मात्र पाएका छन् ?

हामी सबैले त सजाय पाइरहेका छौँ—

पुरानो पुस्ताले भोट बेचेर गरेको गल्तीको सजाय अहिलेको युवाले भोगिरहेका छन् ।

कलिलो उमेरमा ऋण लिएर खाडीमा पसिना बगाइरहेका छन् ।

अस्पताल नभएर सुत्केरी महिलाले ज्यान गुमाइरहेछन् ।

प्रत्येक दिन एयरपोर्टमा बाउआमा सन्तानको लास बुझ्न बाध्य छन् ।

यो सब पुरानो पुस्ताको गलत निर्णयको सजाय होइन त ?

त्यसैले जेन Z ले भनेको यति मात्र हो—“हामीले सजाय पाइरहेका छौँ, त्यसैले तिमीले पनि पाउनु पर्छ ।”

हाम्रो बाउआमाले गल्ती गरेर सजाय हामीलाई दिए भने, भ्रष्ट्रको सन्तान भएर लुटेको सम्पत्तिमा मोज गर्ने तिमीहरू कसरी निर्दोष हुन सक्छौ ?

समग्रमा भन्नुपर्दा—पितृ पक्षको सुरु हुने दिन र जेन Z आन्दोलन सुरु हुने दिन एकै हुनु संयोग मात्र होइन, ब्रह्माण्डकै संकेत पनि हो ।

भ्रष्ट्राचारले भरिएको पापको घैटो जेन Z को चेतनाको हथौडाले फुटोस् ।

ब्रह्माण्डीय न्याय सबैले अनुभूत गर्न पाओस् ।

जेन Z ले ल्याएको चेतनाको क्रान्ति सफल होस् ।

शुभकामना 🙏

नेपाल की फर्जी जेन-जी क्रांति

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डॉ राजीव मिश्रा

क्रान्ति शब्द सुनने में बड़ा आकर्षक लगता है. और दुनिया में बड़े बड़े परिवर्तन इन क्रांतियों से आए हैं.

लेकिन किसी भी क्रान्ति का सत्य क्या होता है?
किसी भी देश की कितनी प्रतिशत जनता क्रांति की फिक्र करती है?
बड़ी से बड़ी क्रांतियों में भाग लेने के लिए कितने की भीड़ जुटती है?

दुनिया की सबसे महत्व की तीन आधुनिक क्रांतियां गिनी जाती हैं जिसने पूरी दुनिया का इतिहास बदल दिया.

*पहली, फ्रांस की राज्य क्रांति..(1789).*
यह क्रांति जनसामान्य की क्रांति नहीं थी, वह रॉयल्टी और नोबेलिटी यानि सामंती शक्तियों के विरुद्ध बुर्जुआ यानि मध्यम वर्ग की क्रांति थी… यानि नए नए प्रभावशाली और सम्पन्न हुए लोगों की सत्ता में भागीदारी के लिए किया हुआ विद्रोह था. *अगर उन्हें समझदारी से सत्ता में भागीदारी दे दी जाती तो कोई विद्रोह उद्रोह नहीं होना था.* और पूरी क्रांति का विंदुपथ मूलतः क्रांति के बाद उत्पन्न वैक्यूम में सत्ता पर कब्जा करने के लिए आपसी प्रतिस्पर्धा थी जिसमें क्रांति के नेता दूसरे नेताओं को क्रांति विरोधी बता कर गिलोटिन पर चढ़ा रहे थे.
*इस काम के लिए उन्हें कुछ हजार लोगों की भीड़ चाहिए थी…सामान्य जन का काम यह भीड़ बनना था, बदले में उन्हें हर रोज चौराहे पर गिलोटिन पर कटते सरों को देखने का मुफ्त मनोरंजन मिलता था.*

*दूसरी सबसे महत्वपूर्ण रूसी क्रांति* की मूल “क्रांतिकारी” घटना में मुश्किल से कुछ सौ लोग शामिल हुए थे.

जिस रात सत्ता के केंद्रों पर कब्जा कर लिया गया था, उसकी अगली सुबह ज्यादातर लोगों को रात की घटना का महत्व भी ठीक से समझ नहीं आया था.

*कुल मिला कर परिणाम यह हुआ कि सामंती पृष्ठभूमि एक महत्वाकांक्षी व्यक्ति ने अव्यवस्था और पॉवर वैक्यूम का लाभ उठा कर सत्ता पर कब्जा कर लिया. पब्लिक दर्शक थी, और जबतक उसे सत्य समझ में आता, उसके हाथ में कुछ नहीं बचा था, सिवाय सात दशकों की यातना के.*

*तीसरी सबसे महत्व की क्रांति,*
जो सामान्य अर्थों में क्रांति गिनी भी नहीं जाती, वह था अमेरिका का स्वतंत्रता संग्राम. विचार की दृष्टि से यह एक अधिक समग्र क्रांति थी, और परिणाम की दृष्टि से भी. इसका शीर्ष नेतृत्व भी अमेरिका का नव धनाढ्य व्यापारी और भूमिपति वर्ग था. पर *इसकी क्रांतिकारी बात यह थी कि उन लोगों ने जिस व्यवस्था के विरुद्ध विद्रोह किया, उसे वैसी ही एक अन्य व्यवस्था से नहीं बदला.*
*उन्होंने व्यक्तियों के बजाय संस्थाओं में विश्वास व्यक्त किया और सत्ता और नियंत्रण के बजाय स्वतंत्रता और उद्यम को केंद्रीय विचार बनाया.*

लेकिन *किसी भी क्रांति के मूल में कभी जन सामान्य नहीं हुआ करता. वह सिर्फ भीड़ जुटाता है, तथ्य़ यह है कि क्रांति के केंद्र में हमेशा एलीट वर्ग हुआ करता है. क्रांतियां उसके लिए सत्ता पर कब्जा करने का एक माध्यम मात्र हुआ करती हैं. सत्ता मिलने के बाद वह वही करता है जो अपनी सत्ता को सुदृढ़ और स्थायी बनाने के लिए आवश्यक होता है.*

इस शताब्दी में जो भी *चिल्लर टाइप क्रांतियां हुई हैं,* उनमें भी मूल रूप से यही हुआ है…चाहे अरब स्प्रिंग हो, या श्रीलंका, बांग्लादेश और नेपाल टाइप छीछालेदर. अंतर सिर्फ इतना आया है कि सत्ता पर कब्जा करने, भीड़ जुटाने और भीड़ को नियंत्रित और निर्देशित करने का काम देश के भीतर बैठे महत्वाकांक्षी व्यक्तियों के बजाय बाहरी तंत्र कर रहा है.

*आवश्यक है कि हम “क्रांति” शब्द के रोमांस में ना फंसें. अगर आप सत्ता के प्रत्याशी एलीट में से नहीं हैं तो क्रांति में आपके काम का कुछ नहीं है, सिवाय कटते सरों और जलते घरों के मुफ्त मनोरंजन के. और उनमें से एक सर या एक घर हममें से किसी का भी हो सकता है.*

(डॉ राजीव मिश्र जी से साभार)

भ्रामक खबरों से राजशाही की ओर

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राकेश उपाध्याय

एक अच्छा सा शीर्षक दीजिए

दिल्ली: नेपाल के बारे में कई भ्रामक खबरें भारत के कुछ समाचार चैनलों ने प्रसारित की हैं, हालांकि बाद में उन्होंने उसे हटा लिया। उदाहरण के लिए, पशुपतिनाथ मंदिर में तोड़फोड़ की न कोई घटना हुई और न ही वायरल वीडियो का संबंध मौजूदा घटनाक्रम से है।

नेपाल में मेरे अनेक विद्यार्थियों ने मुझे सूचित किया है कि वीडियो तीन साल पुराना है, एक उत्सव का है, जिसमें मंदिर का गेट बंद हो जाने पर उसे खोलने के प्रयास में कुछ उत्साही भक्त उस पर चढ़ गए हैं। लेकिन इसी वीडियो को वायरल कर बताया जा रहा है कि मंदिर में तोड़-फोड़ की कोशिश हुई है। नितांत गलत और झूठी खबर है।

दूसरा मुद्दा जाति को लेकर आया है। नेपाल के मेरे एक छात्र जिन्होंने मेरे मार्गदर्शन में पीएचडी उपाधि प्राप्त की है, उनका कहना है कि कम्युनिस्ट नेता यदि जाति मानते होते तो इतनी दुर्गति के शिकार नेपाल में नहीं होते। जाति को न मानने के कारण ही उन्हें बचाने कोई भी नेपाल में सामने नहीं आया। असलियत यही है कि नेपाल का कोई भी भला आदमी किसी कम्युनिस्ट को ब्राह्मण मानता ही नहीं है, और कम्युनिस्ट तो हैं ही इस बात के लिए बदनाम कि धर्म और जाति सब उनके लिए अफीम के सिवाय कुछ नहीं। यही तो वामपंथ की ट्रेनिंग है। आजतक सीपीआई और सीपीएम के पोलित ब्यूरो में उनके नेताओं की जाति गणना से संबंधित कोई रिपोर्ट भारत के किसी चैनल में क्यों नहीं चलाई गई, आखिर इसका जवाब कौन वामी पत्रकार दे सकता है?

तो ऐसे लोगों की जाति गिनने वाले बिना बुद्धि के मूर्खपेटजीवी के अतिरिक्त और कौन हो सकते हैं भला। राजनीतिक आकाओं के संकेत और उनसे कुछ बजट पाकर नेवारो टाइप बकवास करने वाले पत्रकारों को आखिर कौन और कब तक सुने? भारत में कुछ वामपंथी समाजवादी मिजाज के लोगों ने कम्युनिस्ट नेताओं को वैसे ही ब्राह्मण बताना शुरु किया है, जैसे ट्रंप के सलाहकार पीटर नवारों को लगता है कि रशिया का सारा पेट्रोल ब्राह्मण गटक जा रहे हैं। खैर, सबको बोलने की आजादी है।
तीसरा मुद्दा कि नेपाल का भविष्य क्या है? इस पर महाराजा कर्ण सिंह ने नेपाल की राजशाही और तत्कालीन पीएम गिरजा प्रसाद कोइराला से बातचीत कर साल 2007 में एक रास्ता निकाला था कि राजा ज्ञानेंद्र पद छोड़ दें और उनके उस समय 5 साल के शिशु पौत्र ह्रदयेंद्र बीर बिक्रम शाह देव को सेरेमोनियल राष्ट्रप्रमुख के पद पर आसीन किया जाए। शेष, ब्रिटेन की तरह लोकतंत्र फले-फुले, चुनाव से प्रधानमंत्री और संसद का गठन हो।

लेकिन उस समय होनी को यह मंजूर नहीं था। प्रचंड समेत तमाम कम्युनिस्ट नेताओं ने इस प्रस्ताव को मानने से इन्कार कर दिया। बात वहीं पर खत्म हो गई। बाद में नेपाल के संविधान में बदलाव कर सदा के लिए राजशाही का रास्ता भी बंद किया गया।

लेकिन अब वह सूत्र पुनः बड़ी खामोशी से नेपाल के जन-मन में आगे बढ़ता दिख रहा है। राजा ज्ञानेंद्र के पौत्र ह्रदयेंद्र बीर बिक्रम शाह देव नेपाल में चुपचाप अनेक सामाजिक सेवा कार्यों से जुड़कर अपनी उपस्थित जनता के बीच दर्ज कराते रहे हैं।

ह्रदयेंद्र की लोकप्रियता नेपाल के कम्युनिस्ट नेताओं को चुभती रही है। केपी ओली ने तो एक बार यहां तक धमकी दी थी कि ह्रदयेंद्र राजा बनने का सपना देखना छोड़ दें। उन्हें जनता के बीच जाने की कोई जरूरत नहीं है। ह्रदयेंद्र के नाम से कम्युनिस्ट नेताओं की छाती में दर्द बार बार उठते रहने का एक और कारण है। कारण है ह्रदयेंद्र की मां का राजस्थान के शेखावत वंश से संबंधित होना। कम्युनिस्ट नेताओं ने चीन के अपने वैचारिक आकाओं के संकेत पर ह्रदयेंद्र को तब नेपाल का नायक बनने से रोक दिया था।

यह तानाशाही भी नेपाल के लोगों को अखरने लगी थी। सूत्र ने बताया है कि ह्रदयेंद्र सुशील और विनम्र हैं। ह्रदयेंद्र का जन्म महाराजा बीर बीरेंद्र की दुर्भाग्यपूर्ण हत्या के ठीक एक वर्ष बाद जुलाई 2002 में हुआ था। तब अनेक पंडितों ने उनकी जन्मकुंडली देखकर भविष्यवाणी भी की थी कि नेपाल के महाराजा वापस आ गए हैं। जाहिर तौर पर, आज की परिस्थिति में यदि वह आगे बढ़कर नेपाल की बागडोर संभालते हैं तो महाराजा कर्ण सिंह का 2007 में दिया गया सुझाव और स्वप्न साकार हो सकता है। और जिस जेन-जी के सर पर नेपाल में बदलाव का मुकुट पहनाया जा रहा है, उस जेन-जी की जरूरतों को समझने वाले उनके बीच के नायक की कमी भी पूरी हो सकेगी।

दूसरी तरफ, राष्ट्रपति अथवा राजपद पर ह्रदयेंद्र की शपथ होते ही नेपाल के हिंदू राष्ट्र घोषित होने का रास्ता भी साफ हो जाएगा, क्योंकि सदियों तक नेपाल में राजा को ही ईश्वर के प्रतीक स्वरूप में देखकर विकेंद्रित प्रणाली से स्वराज और स्वशासन चलाने की व्यवस्था चलती रही है।
देखना लाजिमी है कि नेपाल का भविष्य आखिर किस करवट बैठता है।

(सोशल मीडिया से साभार)

क्या ‘एक मौत’ गृहयुद्ध करवा सकती है, सरकारें बदल सकती है?

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मनीष शर्मा

दिल्ली। 26 जनवरी को एक कथित किसान नवनीत सिंह की मौत हो गयी। मीडिया ने हल्ला मचाया कि पुलिस ने गोली मार दी, लेकिन CCTV फुटेज से पता लगा कि नवनीत साहब तो स्टंट कर रहे थे, तेजी से ट्रेक्टर चला कर बैरिकेड्स पर चढ़ा दिया, जिससे ट्रेक्टर पलटा और उसकी मौत हो गई।

लेकिन इस एक अदद हिस्से में आई मौत को विपक्ष और मीडिया, येन केन प्रकारेण…..पुलिस के अत्याचार से जोड़ने में लगी रही। फिर चाहे वो The Wire की फर्जी स्टोरी हो, जिसमे एक डॉक्टर ने कथित रूप से कहा कि ‘our hands are tied’ , मतलब सरकार ने दबाव बना रखा है…..कुल मिलाकर ये दिखाया जा रहा था कि मौत गोली मारने से ही हुई है। बाद में रामपुर के CMO ने बाकायदा बयान दिया और स्टेटमेंट जारी किया कि मौत एक्सीडेंट से ही हुई, शरीर से कोई गोली नही मिली।
लेकिन गिद्धों ने तो आतंक मचा दिया, सोशल मीडिया पर पोस्ट्स, Wire के आर्टिकल्स घूम रहे थे। फिर FIR हुई और अब सरकार एक्शन लेगी और कथित ‘सेक्युलर-लिबरल’ गैंग का रोना धोना शुरू हो जाएगा।

यहां सवाल ये है, कि इस एक्सीडेंट से हुई मौत को क्यों पुलिस द्वारा गोली मारने पर जोर दिया जा रहा है? क्या इस मौत से माहौल बदल सकता है? क्या इससे गृहयुद्ध छिड़ सकता है? क्या सरकार जा सकती है?

इन सबके उत्तर हैं……हाँ

चलिए आपको एक कहानी सुनाते हैं…..शायद तब समझ आये कि आखिर चल क्या रहा है आपके आस पास

इस कहानी की शुरुआत होती है 17 दिसंबर 2010 को, जिस दिन ट्यूनीशिया के एक आम नागरिक मुहम्मद बुज़ीजी ने अपने आपको आग लगा ली थी। वो काफी हद तक जल गए थे, और 4 जनवरी 2011 को उनकी मौत हो गयी।

आग क्यों लगाई??

मुहम्मद बुजीजी एक आम नागरिक थे, नौकरी चली गयी, काम धंधा मिला नही, इसलिए एक सब्जियों की दुकान लगा ली। नगरपालिका वाले आये और रिश्वत मांगने लगे, नही देने पर उनका सारा सामान उठा कर ले गए। इस घटना से दुखी हो कर उन्होंने आग लगा ली, और बाद में उनकी मृत्यु हो गयी।

अब थोड़ा फ्लैशबैक में चलते हैं….मिडिल ईस्ट और अफ्रीका के जितने भी इस्लामिक देश हैं, कुछ एक को छोड़ कर सभी मे तानाशाही/राजशाही थी या फिर किसी एक ही शासक का राज चल रहा था। लोग वहां के शासन से परेशान थे। कानून व्यवस्था ठीक थी, लेकिन कामगारों के कानून और नौकरियों को लेकर काफी समस्याएं थी।

इजिप्ट हो, अल्जीरिया हो, ट्यूनीशिया हो, वेस्टर्न सहारा इलाका हो, यमन हो, जॉर्डन हो…इन सभी देशों में कहीं ना कहीं सत्ता विरोध पनप रहा था। इसके पीछे मुख्य कारण गरीबी, नौकरियों की कम संख्या, हड़ताल, लंबे समय से सत्ता का ‘एक’ ही हाथ मे होना था।

इन सभी देशों में 2004 से ही छोटे मोटे प्रदर्शन होते रहे, लेकिन सरकारें सुरक्षित थी। छोटे मोटे उपद्रव होते रहे….लेकिन ऊपर की सतह पर सब शांत ही दिखता था।
2009-2010 में स्थिति बदली….सोशल मीडिया पैर जमा चुका था…भारत मे लोग तब ट्विटर से अनजान थे, और फेसबुक को दोस्तो से जुड़ने का एक माध्यम मात्र माना जाता था। लेकिन मिडिल ईस्ट में यही सोशल मीडिया अगले 1-2 साल में एक बहुत बड़ी सुनामी लाने वाला था।

अब वापस आते हैं बुजीजी कि मौत पर। जिस दिन बुजीजी ने अपने आपको आग लगाई, ट्यूनिशिया में एकाएक बवाल शुरू हो गया। ऐसा लगा कि शायद जिस घटना का इंतज़ार था, वो घट गई है। पूरे ट्यूनिशिया में जबरदस्त सत्ता विरोध होने लगा। देखादेखी आस पास के देशों में भी उपद्रव शुरू हो गए।

4 जनवरी 2011 को बुजीजी की मौत हुई, और पिछले 19 दिनों से ‘एक मौत’ के इंतज़ार में बैठे गिद्ध अब काम मे लग गए। सोशल मीडिया का जम कर इस्तेमाल हुआ। ढेरो ट्वीट्स, पोस्ट्स, फोटो, वीडियो शेयर होना शुरू हुए। उंस समय तो Fake News का कांसेप्ट भी लोगो को समझ नही आता था…..लेकिन गिद्धों को इस सोशल मीडिया की ताकत का पता था। कुछ ही घंटों में पूरे मिडिल ईस्ट और अफ्रीका में लाखों वीडियो और पोस्ट, जिनमे सरकारी अत्याचार दिखाया जा रहा था (सच और झूठ) हर इंसान के फ़ोन में पहुँचा दिए गए।और उसके बाद जो हुआ, उसकी कल्पना भी नही की थी किसी ने।

अरब स्प्रिंग – Arab Awakening

जनवरी 2011 से दिसंबर 2012 तक, मिडिल ईस्ट ,अरब और अफ्रीका के देशों ने एक अचंभित करने वाला कृत्य देखा और महसूस किया। बुजीजी की मौत ने पिछले 5-7 साल से चले आ रहे गुस्से को नफरत के विस्फोट में बदल दिया, और ये पूरा रीजन एक भयावह स्थिति में पड़ गया।

इजिप्ट, सीरिया, ट्यूनिशिया, यमन, लीबिया, बहरीन, कुवैत, सूडान, सऊदी अरब, मोरक्को, इराक़ जैसे कई देश इस आग की चपेट में आ गए। सत्ता विरोध शुरू हुआ और इसका अगला प्रतीक बना इजिप्ट का ‘तहरीर चौक’ जिसे Tahrir Square कहा जाता है। लाखो लोगो ने एक sqaure पर इकट्ठे हो कर धरना दिया और सरकारों को झुकने पर मजबूर कर दिया।

तौर तरीके जो इस्तेमाल किये गए

इस पूरे घटनाक्रम में पुराने तरीको के अलावा कुछ नए और अनजाने तरीके भी इस्तेमाल किये गए।

नीचे कुछ शब्द दे रहा हूँ, इन्हें कृपया अपनी डिक्शनरी में ढूँढिये,पढिये और समझिए। भारत मे भी अब आपको ये शब्द आसानी से सुनने को मिल रहे हैं, मिलते रहेंगे।
Political activism, Civil Disobedience, Civil Unrest, Protest, Defection, Insurgency, Media Activism, Social Media Activism, Riots, Self Immolation, Mutiny, Defection, Internet Activism, Urban Warfare, Silent Protests, Silent Uprising, Revolution and last but not the least ‘Huriya’…that means आज़ादी।

रातों रात सैकड़ो फेसबुक पेज बने, हजारो ट्विटर हैंडल बनाये गए। लोगो को mobilize करने का काम शुरू हुआ। लोगो को इकट्ठा करना अब काफी आसान था, फिर चाहे शांतिपूर्ण प्रोटेस्ट्स हो, पत्थरबाजी करनी हो…ये सब अब एक ट्वीट या एक फेसबुक पोस्ट से संभव था। सरकार विरोधी ब्लॉग्स और वेबसाइट की बाढ़ आ गयी, आज़ादी और ह्यूमन राइट्स के किस्से कहानी सुना कर लोगो को भड़काना शुरू किया गया। ट्यूनिशिया में एक सर्वे किया गया था, जिसमे 90% लोगो ने कहा कि इस uprising में उनका मुख्य टूल था  सोशल मीडिया। सोशल मीडिया को रोकना आसान नही था, क्योंकि तब तक इसके प्रभाव के बारे में सत्ता में रहने वाले लोगो को अंदेशा ही नही था। सत्ता केवल मीडिया पर रोक लगा सकती है, यहां तो स्मार्टफोन रखने वाला हर इंसान एक पत्रकार की भूमिका निभा सकता था।
अरब स्प्रिंग से हासिल क्या हुआ?

लोगो को भड़काया गया, उन्हें ये दिखाया गया कि तुम्हारी जिंदगी बर्बाद है, आइये इस गुलामी से, इस गुरबत की ज़िंदगी से आज़ादी लेते हैं। सोशल मीडिया और मेनस्ट्रीम मीडिया द्वारा लोगो को भड़काया गया। मोहम्मद बुजीजी की मौत, उसके जलने के दृश्य, अस्पताल में उसकी तस्वीरों से हर स्मार्टफोन को भर दिया गया। जाहिर है, जब आपको एक ही तरह का कंटेंट मिलेगा, तो भड़कना लाजिमी है। और आप किसी को भी कहें कि आपकी जिंदगी में में दुख है, कमी है, आप पर अत्याचार हो रहा है….तो 99.9% लोग किसी न किसी रूप में सहमति जता ही देंगे। लोग अमूमन अपनी जिंदगी से खुश नही हैं।

अरब स्प्रिंग की वजह से कई देशों में सत्ता पलट गई। ट्यूनिशिया, लीबिया, यमन, इजिप्ट जैसे देशो में बड़े ही हिंसक तरीके से सत्ता बदली गयी। लीबिया के तानाशाह गद्दाफी को लोगो ने अपने हाथों से मार दिया। सीरिया में असद के खिलाफ Civil war शुरू हो गया। अरब, कुवैत, बहरीन जैसे देशों ने इस अरब स्प्रिंग को ताकत से कुचल दिया। मोरक्को, जॉर्डन और फिलिस्तीन में वहां के सत्ताधीशों ने जरूरी बदलाव किए और जान बचाई।

कुल मिलाकर 61,000 लोगो की अपनी जान गंवानी पड़ी। सीरिया में सिविल वॉर की वजह से ISIS का उद्भव हुआ और वो धीरे धीरे सिरिया से होते हुए इराक़ और अन्य इलाकों तक पहुच गया। उसके द्वारा हुई कत्ल ए आम को जोड़ दें, तो ये संख्या लाखो में पहुचेगी।

गिद्धों ने जनता को एक छद्म लोकतंत्र और आज़ादी का लॉलीपॉप दिया, जनता मासूम थी और पड़ गयी इस चक्कर मे। सत्ता भी गयी, देश भी जल गया…..आज तक ये देश संभल नही पाए हैं। कोई भी चाहे तो इन देशों की इकनोमिक, न्याय व्यवस्था, आम नागरिक के जीवन स्तर, काम धंधे, आम जनजीवन के स्तर के बारे में तथ्यात्मक आंकलन करे, तो ये पता लगेगा कि 2010 से पहले और 2010 के बाद इन सभी इंडीकेटर्स में जबरदस्त गिरावट आई है।

तो सवाल है कि आखिर मिला क्या? उत्तर है ‘कुछ नही’

अब घूम फिर कर भारत पर आते हैं। किसानों का आंदोलन चल रहा है…..उससे पहले दलितों का आंदोलन चला, CAA के नाम पर मुसलमानों का आंदोलन चला, कभी जाट आंदोलन चलता है, कभी गुज्जर आंदोलन चलता है। ये सब हमारी ‘Fault Lines’ हैं…जैसे जमीन के अंदर fault lines होती हैं…उनके हिलने डुलने से भूकंप आता है…..वैसे ही ये सब हमारे देश की फाल्ट लाइन्स है। समय समय पर इनकी testing होती है। इस बार माहौल एकदम गर्म था। खालिस्तानियों द्वारा इसको हवा दी गयी, मासूम किसानो को भड़का कर दिल्ली के मुहाने पर लाया गया। 2 महीने की घेराबंदी के बाद 26 जनवरी को चुना गया Action Day के लिए।
वो हर कोशिश की गई, जिससे पुलिस या सरकार को भड़काया जाए। वो हर काम किया गया जिससे किसी का भी खूब उबाल मारे और बदले में हाथ उठा दिया जाए। लेकिन एक गोली नही चली, एक भी जान नही गयी।

क्या होता अगर एक भी मौत होती?

लाल किला ‘तहरीर स्क्वायर’ में बदल जाता…..सोशल मीडिया, मीडिया और अंतरराष्ट्रीय घेराबंदी होती, देश भर में दंगे होते, सरकार को किसान विरोधी और सिख विरोधी बताया जाता….और emotional stories से मीडिया को पाट दिया जाता। उसमे हम आप जैसे ‘भक्त’ भी फंस जाते। और फिर शुरू होता India Spring या Indian Uprising….. जिसका परिणाम होता भारत मे लोकतंत्र का खात्मा। ये गिद्ध वो सब काम कर रहे थे जो arab spring के समय किये गए। आप ऊपर जा कर पढिये, और अरब की जगह भारत सोचिए….क्या ये सब अब भारत मे नही किया जा रहा?

आज गिद्ध परेशान हैं, जान बूझकर एक एक्सीडेंट की मौत को सत्ता द्वारा की गई हत्या साबित नही कर पा रहे। इन्हें दुख है कि नवनीत सिंह को मुहम्मद बुजीजी नही बनाया जा सके। इन्हें दुख है कि लाल किले तक इनके लोग पहुच गए, फिर भी सरकार ने एक भी गोली क्यों नही चलाई। इन्हें दुख है कि हजारो करोड़ की फंडिंग फूंकने के बाद भी इनके हाथ कुछ नही लगा।

चलिए गिद्धों के तो दुख है…..लेकिन आम जनता का क्या…..क्या आपको पता भी है कि पर्दे के पीछे खेल क्या चलते हैं? पैटर्न्स समझना सीखिए, घटनाओं को सही context में देखना सीखिए…..चीजें जो होती हैं, अमूमन वैसी दिखती नही। कभी कभी Inaction ही सबसे बड़ा Action होता है…..think strategically……else you will be doomed very soon……Vultures are here to stay for long…buckle up and brace for more such attacks….all they need is 1 bloody dead body.

(सोशल मीडिया से साभार)

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