संघ, राष्ट्रवाद और कांग्रेस की सियासी असहजता

Rashtriya-Swayamsevak-Sangh-rss-path-sanchalan-dusshaera-festival-allahabad.jpg.webp

प्रणय विक्रम सिंह

दिल्ली । भारतीय लोकतंत्र का सौंदर्य उसकी विविधता, वैचारिक बहुलता और संवाद की परंपरा में निहित है। यहां असहमति को स्थान मिला है, आलोचना को भी। किंतु जब राजनीतिक विरोध मर्यादा की सीमा लांघकर राष्ट्रसेवा से जुड़े संगठनों, नेतृत्व और करोड़ों नागरिकों की वैचारिक आस्था को ‘गद्दारी’ जैसे शब्दों से परिभाषित करने लगे, तब वह केवल राजनीतिक प्रतिक्रिया नहीं रह जाती, वह उस गहरी वैचारिक बेचैनी का उद्घाटन बन जाती है, जो लंबे समय से भारत की सांस्कृतिक राष्ट्रवादी चेतना के प्रति एक विशेष राजनीतिक मानसिकता के भीतर विद्यमान रही है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृहमंत्री अमित शाह और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रति राहुल गांधी की अमर्यादित टिप्पणी को इसी व्यापक संदर्भ में समझना होगा। यह विवाद केवल एक बयान का विवाद नहीं है। यह भारत की राजनीति में चल रहे उस गहरे वैचारिक संघर्ष का प्रतिबिंब है, जिसमें एक ओर सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, सभ्यतागत आत्मविश्वास और ‘राष्ट्र प्रथम’ की चेतना है, जबकि दूसरी ओर वह राजनीति है, जिसने दशकों तक भारतीय समाज को जाति, क्षेत्र, तुष्टीकरण और प्रतीकात्मक धर्मनिरपेक्षता की रेखाओं में बांटकर सत्ता का गणित साधने का प्रयास किया।

विडंबना यह है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर प्रश्न वही कांग्रेस उठा रही है, जिसका राजनीतिक इतिहास स्वयं लोकतांत्रिक संस्थाओं के केंद्रीकरण, आपातकाल, तुष्टीकरण और वोटबैंक की राजनीति से जुड़ा रहा है। भारतीय राजनीति का यह शायद सबसे बड़ा विरोधाभास है कि जिसने लोकतंत्र पर आपातकाल थोपकर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का गला घोंटा, वही दल आज लोकतांत्रिक मूल्यों और राष्ट्रभक्ति का प्रमाणपत्र बांटने का प्रयास कर रहा है।

राहुल गांधी की टिप्पणी को यदि केवल चुनावी बयान मानकर छोड़ दिया जाए, तो यह अधूरा विश्लेषण होगा। दरअसल यह उस वैचारिक असहजता का परिणाम है, जो पिछले एक दशक में भारत की राजनीति में आए बड़े परिवर्तन के कारण उत्पन्न हुई है। लंबे समय तक राष्ट्रवाद को संदेह और संकोच के घेरे में रखने वाली राजनीति अब स्वयं वैचारिक रक्षात्मकता में खड़ी दिखाई दे रही है।

नरेंद्र मोदी का उदय केवल एक नेता का उदय नहीं था। वह उस भारत के पुनरुत्थान का प्रतीक था, जो दशकों तक अपनी सांस्कृतिक पहचान को राजनीतिक संकोच में जीता रहा। पहली बार राष्ट्रवाद केवल चुनावी नारा नहीं रहा, वह शासन का दर्शन बना।

विदेश नीति से लेकर सुरक्षा नीति तक, सांस्कृतिक पुनर्जागरण से लेकर आत्मनिर्भरता तक, भारत ने स्वयं को एक आत्मविश्वासी राष्ट्र के रूप में प्रस्तुत करना शुरू किया।

यही वह बिंदु है, जहां कांग्रेस की वैचारिक बेचैनी सबसे अधिक स्पष्ट होती है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को लेकर कांग्रेस की असहजता नई नहीं है। स्वतंत्रता के बाद से ही संघ को संदेह की दृष्टि से देखने का एक स्थायी राजनीतिक आग्रह कांग्रेस के भीतर रहा। क्योंकि संघ सत्ता आधारित संगठन नहीं है, वह समाज आधारित वैचारिक शक्ति है। उसकी जड़ें चुनावी राजनीति में नहीं, बल्कि सामाजिक संगठन, सेवा और सांस्कृतिक चेतना में हैं।

विश्व के सबसे विशाल सांस्कृतिक संगठन ‘संघ’ ने शाखा की अनुशासित पंक्ति में राष्ट्रप्रेम के संस्कार बोये, समाज के प्रत्येक क्षेत्र में सेवा, समरसता और संगठन का भाव जगाया।

भारत की आत्मा को आत्मविश्वास दिया, बिखरे समाज को एकात्मता के सूत्र में पिरोया, राष्ट्रवाद को जीवन का आधार बनाया और अखंड भारत के निर्माण के दिव्य संकल्प से जन-जन को जोड़ने का कार्य किया।

यही कारण है कि संघ को केवल राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी की तरह परिभाषित करना संभव नहीं रहा। आपदा हो, महामारी हो, बाढ़ हो, भूकंप हो या सामाजिक संकट, संघ के स्वयंसेवक बिना प्रचार और राजनीतिक लाभ की अपेक्षा के सबसे पहले मैदान में दिखाई देते हैं। गांवों, वनवासी क्षेत्रों, सीमांत समाज और शिक्षा के क्षेत्र में दशकों से चल रहे कार्यों ने संघ को समाज के भीतर गहरी स्वीकार्यता दी है। यही सामाजिक स्वीकार्यता कांग्रेस की सबसे बड़ी वैचारिक असहजता का कारण बनती रही है।

दरअसल कांग्रेस की राजनीति लंबे समय तक ‘छद्म धर्मनिरपेक्षता’ पर आधारित रही। इफ्तार राजनीति, तुष्टीकरण आधारित भाषण, पहचान-आधारित गठजोड़ और वोटबैंक की रणनीतियों को धर्मनिरपेक्षता का पर्याय बना दिया गया। इस राजनीति में राष्ट्रवाद को अक्सर संदेह की दृष्टि से देखा गया, सांस्कृतिक प्रतीकों को ‘बहुसंख्यकवाद’ कहकर खारिज किया गया और भारत की सभ्यतागत चेतना को राजनीतिक विमर्श में हाशिए पर रखने का प्रयास हुआ।

लेकिन भारत का सामाजिक मानस बदल चुका है। आज का भारत अपनी सांस्कृतिक पहचान को लेकर अपराधबोध में नहीं जीता। वह काशी विश्वनाथ धाम के पुनरुत्थान को भी स्वीकार करता है और चंद्रयान की सफलता पर भी गर्व करता है। वह राम मंदिर को भी अपनी सभ्यता का प्रतीक मानता है और ‘आत्मनिर्भर भारत’ को भी राष्ट्रीय स्वाभिमान का विस्तार समझता है। यही ‘नया भारत’ कांग्रेस की पुरानी राजनीतिक भाषा को अप्रासंगिक बना रहा है।

यही कारण है कि जब भारत सर्जिकल स्ट्राइक करता है, सीमाओं पर निर्णायक रुख अपनाता है, आतंकवाद पर कठोर नीति लागू करता है और वैश्विक मंचों पर आत्मविश्वास से अपनी बात रखता है, तब कांग्रेस का वैचारिक संकट और गहरा होता जाता है।

सवाल यह भी है कि ‘गद्दारी’ का नैतिक अधिकार किसके पास है? क्या राष्ट्रभक्ति पर उपदेश देने का अधिकार उन लोगों को है, जिन्होंने सर्जिकल स्ट्राइक पर सेना से सबूत मांगे? क्या नैतिकता का दावा वे लोग कर सकते हैं, जिन्होंने विदेशी मंचों पर भारत की लोकतांत्रिक संस्थाओं और छवि को कठघरे में खड़ा किया? क्या राष्ट्रवाद पर प्रश्न उठाने वाले यह भूल सकते हैं कि वर्षों तक अलगाववादी राजनीति और तुष्टीकरण आधारित समीकरणों ने देश को कितनी बड़ी वैचारिक क्षति पहुंचाई?

कश्मीर में वर्षों तक अलगाववादी तत्वों के प्रति दिखाई गई राजनीतिक नरमी, यासीन मलिक जैसे चेहरों के प्रति सत्ता प्रतिष्ठानों की अस्वाभाविक सहजता और पंजाब में अस्थिरता के दौर में वोटबैंक आधारित राजनीतिक समीकरणों ने देश की एकता को गहरी चोट पहुंचाई। विडंबना यह है कि राष्ट्रवाद पर प्रश्न वही राजनीति उठा रही है, जिसने कई बार राष्ट्रीय सुरक्षा और वैचारिक स्पष्टता के स्थान पर तुष्टिकरण और राजनीतिक सुविधा को प्राथमिकता दी।

भारत की जनता अब इन प्रश्नों को समझती है। यही कारण है कि कांग्रेस की भाषा जितनी तीखी होती जा रही है, उसका जनाधार उतना ही सिमटता जा रहा है। क्योंकि राजनीतिक आक्रोश और वैचारिक आत्मविश्वास में अंतर होता है। आत्मविश्वास संवाद करता है, हताशा आरोप लगाती है। राहुल गांधी की टिप्पणी को इसी राजनीतिक अधैर्य और वैचारिक संकट के संदर्भ में पढ़ा जाना चाहिए।

राष्ट्रसेवा, सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और भारत की एकात्म चेतना को निरंतर सशक्त कर रहे प्रधानमंत्री, गृहमंत्री और ‘संघ’ के प्रति कांग्रेस की वैचारिक असहजता स्वाभाविक है।

दरअसल लोकतंत्र में आलोचना आवश्यक है। नरेंद्र मोदी की नीतियों का विरोध भी लोकतांत्रिक अधिकार है। अमित शाह के निर्णयों पर प्रश्न उठाना भी राजनीतिक प्रक्रिया का हिस्सा है। किंतु आलोचना और अवमानना के बीच एक स्पष्ट रेखा होती है। जब राजनीतिक संवाद तथ्य और विचार से हटकर अपमानजनक विशेषणों पर उतर आए, तब वह लोकतांत्रिक परिपक्वता नहीं, बल्कि वैचारिक असंतुलन का संकेत बन जाता है।

राष्ट्रवादी विचारधारा से मतभेद हो सकते हैं, लेकिन करोड़ों स्वयंसेवकों की राष्ट्रनिष्ठा पर प्रश्न उठाना अंततः भारत की उस सामाजिक चेतना का अपमान है, जिसने सेवा, संगठन और समर्पण को राजनीति से ऊपर रखा है।
आज भारत एक निर्णायक संक्रमण काल से गुजर रहा है। यह केवल सत्ता परिवर्तन का दौर नहीं है, यह राजनीतिक संस्कृति के परिवर्तन का दौर है। यहां राजनीति अब केवल चुनावी समीकरणों का खेल नहीं रह गई। वह सभ्यतागत दिशा, सांस्कृतिक आत्मविश्वास और राष्ट्रीय पहचान का विमर्श बन चुकी है।

यही कारण है कि कांग्रेस और राहुल गांधी की भाषा में बढ़ती आक्रामकता दरअसल उस वैचारिक असहजता का संकेत है, जो बदलते भारत को समझने में असमर्थता से उत्पन्न हुई है।

लेकिन भारत अब बदल चुका है। यह ‘नया भारत’ राष्ट्रवाद को संकोच से नहीं, स्वाभिमान से देखता है। यह सांस्कृतिक चेतना को विभाजन नहीं, एकात्मता का आधार मानता है। यह ‘राष्ट्र प्रथम’ को राजनीतिक नारा नहीं, राष्ट्रीय चरित्र का आधार मानता है। यही परिवर्तन आज भारत की राजनीति की नई धुरी है। और शायद यही वह सत्य है, जिसे स्वीकार करने में जाति, क्षेत्र और तुष्टीकरण की विभाजक रेखाओं पर खड़ी जनाधारहीन, मुद्दाविहीन और नीतिविहीन कांग्रेस सबसे अधिक असहज महसूस कर रही है और उसकी कुंठा हास्यास्पद बयानों के रूप में सामने आ रही है। कांग्रेस को समझना होगा कि…
अंधेरों के दम पर तारीख़ नहीं बदला करती
सूरज के ख़िलाफ़ साज़िशें हर दौर में होती हैं

सुमित व संगीता की पुस्तकें हुईं लोकार्पित

unnamed-1-2.jpg

दिल्ली। सुपरिचित साहित्यकार सुमित प्रताप सिंह की ग्यारहवीं पुस्तक म्लेच्छ और अन्य लघुकथाएं तथा युवा लेखिका संगीता सिंह तोमर की प्रथम पुस्तक एवं बाल कहानी संग्रह मोटा चश्मा का लोकार्पण हरिहर आश्रम के पीठाधीश्वर श्री श्री 108 बाबा सुयज्ञमुनि जी महाराज के करकमलों द्वारा शुक्रवार, 15 मई 2026 को दिल्ली के कमला मार्केट में स्थित हरिहर उदासीन आश्रम में संपन्न हुआ।

इस अवसर पर वक्तव्य देते हुए महाराज जी ने कहा कि सुमित प्रताप सिंह कई वर्षों से साहित्य सेवा में समर्पित भाव से जुटे हुए हैं तथा उनके द्वारा लिखा गया साहित्य समाज को नई दिशा देने का कार्य कर रहा है। उन्होंने आशा व्यक्त की कि सुमित भविष्य में भी साहित्य के माध्यम से समाज में जागरूकता फैलाने का कार्य निरंतर करते रहेंगे। महाराज जी ने युवा लेखिका संगीता सिंह तोमर को उनकी पुस्तक मोटा चश्मा के प्रकाशन पर बधाई एवं आशीर्वाद देते हुए उज्ज्वल लेखन भविष्य की शुभकामनाएं प्रदान कीं।

सुमित प्रताप सिंह ने आश्रम में उपस्थित भक्तजनों को संबोधित करते हुए कहा कि उनकी इस पुस्तक में जीवन के अच्छे-बुरे अनुभवों एवं विभिन्न घटनाओं से प्रेरित लघुकथाओं का संकलन किया गया है। उन्होंने बताया कि अपनी इस पुस्तक को उन्होंने श्रद्धापूर्वक श्री श्री 108 बाबा सुयज्ञमुनि जी महाराज को समर्पित किया है।

इस अवसर पर युवा पत्रकार प्रवीण कुमार ने दोनों पुस्तकों के विमोचन पर लेखक सुमित प्रताप सिंह एवं लेखिका संगीता सिंह तोमर को शुभकामनाएं देते हुए पाठकों से आग्रह किया कि वे इन पुस्तकों को अवश्य पढ़ें। उन्होंने बताया कि दोनों पुस्तकें अमेजॉन पर उपलब्ध हैं।
कार्यक्रम में सुमित एवं संगीता के पिता पूर्व पुलिसकर्मी एवं समाजसेवी सुरेश सिंह तोमर, पुरबिया समाचार के संपादक मनोज कुमार सिंह, युवा पत्रकार आदित्य भारद्वाज, संजीव असवाल सहित अनेक भक्तगण एवं श्रोता उपस्थित रहे। ज्ञात हो कि दोनों पुस्तकों को दिल्ली के शिवांक प्रकाशन ने प्रकाशित किया है।

न्यूयॉक के सफ़ोल्क काउंटी ने किया नेपाली बेटी ‘देवी प्रतिभा’ को सम्मानित

unnamed-5.jpg

मनोज बस्नेत

न्यूयॉर्क (अमेरिका)– भारत में आध्यात्मिक प्रवचन के क्षेत्र में तीसरे स्थान पर गिनी जाने वाली नेपाली बेटी देवी प्रतिभा को अमेरिका के न्यूयॉर्क राज्य के सफ़ोल्क काउंटी (Suffolk County) ने विशेष सम्मान प्रदान किया है। ‘हामी नेपाली इंटरनेशनल’ द्वारा आयोजित और ‘रिवील इवेंट्स आईएनसी’ के सहयोग से न्यूयॉर्क के वुडसाइड में ‘क्रियापुत्री भवन’ (अंतिम संस्कार गृह) और गुम्बा (मठ) निर्माण के लिए धन जुटाने हेतु आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के समापन अवसर पर सफ़ोल्क काउंटी ने उन्हें विशेष सम्मान पत्र देकर सम्मानित किया। 15 से 17 मई तक चले इस श्रीमद्भागवत कार्यक्रम में उन्होंने कथा वाचन किया था।

सफ़ोल्क काउंटी के प्रशासक सैमुअल गोंजालेज द्वारा हस्ताक्षरित सम्मान पत्र में उल्लेख किया गया है— “सुश्री प्रतिभा ने सनातन धर्म के लिए एक वैश्विक राजदूत के रूप में भूमिका निभाई है और अपनी सुंदर प्रस्तुति के माध्यम से दुनिया भर की अनगिनत हिंदू-संबंधित संस्कृतियों को एकीकृत किया है। देवी प्रतिभा ने अपने जीवन के कई वर्ष हिंदू और नेपाली समुदायों के लिए आध्यात्मिक प्रवचन, कथा और प्रेरक भाषणों के माध्यम से समर्पित किए हैं। ये कार्यक्रम आध्यात्मिकता, संस्कृति, भक्ति और सकारात्मक ऊर्जा को जोड़ते हैं, जो आस्था, धर्म और संस्कृति की बाधाओं को पार करते हैं।”

देवी प्रतिभा ने कम उम्र में ही आध्यात्मिकता को अपना लिया था और वह देश-विदेश के धार्मिक कार्यक्रमों में अपने प्रखर प्रवचनों के लिए प्रसिद्ध हो रही हैं। नेपाल के काभ्रेपलाञ्चोक जिले के मण्डनदेउपुर नगरपालिका-10, ज्वानेटार में जन्मी प्रतिभा ने भारत के वृंदावन में संस्कृत व्याकरण में ‘आचार्य’ तक की शिक्षा प्राप्त की है। वह गायन और संगीत में भी निपुण हैं। प्रवचन के दौरान धार्मिक भजनों पर श्रद्धालुओं को झूमने और नाचने पर मजबूर कर देने की उनमें विशेष कला है।

‘हामी नेपाली इंटरनेशनल’ के केंद्रीय अध्यक्ष नवराज केसी ने कहा, “उनका यहाँ सम्मानित होना हम सभी नेपालियों का सम्मान है। उनके द्वारा वाचन की गई श्रीमद्भागवत कथा अत्यंत भव्य और सफल रही।”

कांग्रेस की मुस्लिम-ईसाई पिच पर मंत्रिमंडल का फंदा

Muslims-Christians.jpg

आचार्य श्रीहरि

दिल्ली । केरल में कम्युनिस्टों की सत्ता गई तो कांग्रेस नेतृत्व की सरकार आयी पर हिन्दुओं के लिए कुछ भी नहीं बदला है। कम्युनिस्टों की तरह ही कांग्रेसी ने भी सेक्युलरिज्म का नंगा नाच शुरू कर दिए हैं। हिंदुओं को दोयम दर्जे का नागरिक बनाने का कार्य कांग्रेसी सरकार ने शुरू कर दिया है। कांग्रेसी सरकार के लिए पहले नम्बर पर मुस्लिम हैं, दूसरे नंबर पर ईसाई है, आखिरी नम्बर पर हिंदू है। अनुमान यह लगाया जा रहा है कि कांग्रेसी सरकार हिंदुओं को अपना दुश्मन और संघ बीजेपी के समर्थक मानकर काम करेगी। इसलिए आने वाले समय में हिंदुओं के साथ उपेक्षा बढने वाला है, विकास में भेदभाव बढेगा, भागीदारी कमजोर होगी, सुरक्षा की चुनौतियां खतरनाक और हिंसक होने वाली है, लव जिहाद की घटनाएं बढने वाले है, धर्मांतरण की मार भी पडेगी। कहने का अर्थ यह है कि हिंदुओं के लिए कांग्रेस, कम्युनिस्टों से भी ज्यादा खतरनाक और जहरीला साबित होगी।

केरल कांग्रेस सरकार द्वारा सेक्युलरिज्म की नंगा नाच की बात सच है या फिर कोरी कल्पना है? अभी अभी तो कांग्रेस की सरकार बनी है फिर सेक्युलरिज्म की नंगा नाच की बात कहा से आ गई? यह कोरी कल्पना नहीं है, सौ आने सही बात है। साक्षात प्रमाण है। साक्षात प्रमाण देखिए फिर आपको सेक्युलरिज्म का नंगा नाच भी दिखेगा और कांग्रेस की हिंदुओं के साथ दुश्मनी भी दिखेगी और भेदभाव भी दिखेगा। प्रमाण तो कांग्रेस का मंत्रिमंडल है। मंत्रिमंडल में हिंदुओं को सर्वश्रेष्ठ भागीदारी मिलने की उम्मीद थी, पर उचित भागीदारी भी नहीं मिली। हिंदू धर्म का प्रतिनिधित्व करने वाले सिर्फ छह लोगों को कांग्रेस सरकार में जगह मिली है जबकि मुस्लिम और ईसाई वर्ग से सात सात लोगो को मंत्रिमंडल में जगह मिली है। जनसंख्या की कसौटी पर भी यह न्यायसंगत नहीं है और अत्याचार है। केरल की जनसांख्यिकी परिधि और परिस्थितियों को देखना जरूरी ही नहीं है बल्कि अनिवार्यता भी है। केरल में अभी भी हिंदू सर्वश्रेष्ठ है, जनसंख्या इनकी मुस्लिम और ईसाई आबादी से बडी है, मुस्लिम आबादी से तो दुगनी है। हिंदुओं की आबादी 55 प्रतिशत से ही ज्यादा है, मुस्लिम आबादी 27 प्रतिशत, ईसाई आबादी 18 प्रतिशत है। मंत्रिमंडल में मुस्लिम आबादी और ईसाई आबादी को तरजीह देने और हिंदू आबादी को सीमित रखने का संदेश क्या है? जबकि केरल की सत्ता परिवर्तन में हिंदुओं की भूमिका अग्रणी रही है, हिंदुओं ने परिवर्तन के पक्ष में वोट किया, कांग्रेस गठबंधन की किस्मत चमकाई, कम्युनिस्ट गठबंधन की कब्र खोदी। अगर 55 प्रतिशत आबादी एक साथ कम्यूनिस्टों को वोट कर दिया होता तो फिर क्या केरल में कांग्रेस की सरकार बनती?

यह कांग्रेसी की केंद्रीय कृत राजनीति का ही प्रकटीकरण है। मुस्लिम तुष्टिकरण करण और ईसाई तुष्टिकरण का लोमहर्षक प्रदर्शन है। हिंदूद्रोह तो कांग्रेस की जन्मजात रीती नीति रही है। जवाहरलाल नेहरू ने इसे अपना राजनीतिक हथियार बनाया था। जवाहरलाल नेहरू कहते थे कि हम गलती से हिंदू धर्म में जन्म लिया हूँ, स्वभाव और मन से हिंदू नहीं बल्कि मुस्लिम हूं, इस्लाम के नजदीक हूँ, क्योंकि इस्लाम मुझे प्रभावित करता है। मुस्लिम तुष्टिकरण के लिए नेहरू ने संविधान में भी विशेष व्यवस्थाएं कराई थी। मुसलमानों को चार शादियां करने का सौगात दिया था। इंदिरा गांधी से लेकर मनमोहन सिंह, सोनिया गांधी तक यह कडी टूटी नहीं। मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी ने मिलकर हिंदुओं के संहार करने का सपना देखा था। दंगा रोधी विधेयक के माध्यम से हिंदुओं के अस्तित्व को ही कुचलने का सपना देखा था। नरेंद्र मोदी ने कांग्रेस पर विजय प्राप्त नहीं की होती तो फिर हिंदुओं के अस्तित्व संहार का इनका सपना पूरा भी हो सकता था। प्रचंड हिंदुत्व के प्रवाह ने राहुल गांधी को हारने के लिए बाध्य कर दिया। स्मृति ईरानी ने राहुल गांधी को अमेठी से खदेड दिया था। राहुल गांधी ने मुस्लिम बहुलता वाली लोकसभा सीट वायनाड चुनी। मुस्लिम आबादी ने बहुलता की शक्ति का प्रदर्शन कर लोकसभा भेज दिया, वायनाड से अभी सांसद राहुल गांधी की बहन प्रियंका गांधी है। राहुल गांधी ने वायनाड सीट इसीलिए चुनी थी कि क्योंकि वह सीट मुस्लिम बहुल थी, मुस्लिम बहुल होने के कारण उनकी जीत की गारंटी थी। कांग्रेस के हिंदू आतंक की थ्योरी भी कुख्यात रही है। मुस्लिम आतंकवाद को कभी भी इस्लाम से नहीं जोडा, पर प्रत्यारोपित हिंदू आतंक को हिन्दू धर्म से जरूर जोड दिया। जबकि हिंदू आतंक एक फर्जी और हिंदू लक्षित सोच से निकला हुआ कांग्रेसी शब्द था। हिंदू आतंक पर बोलने वाले कांग्रेसी नेता और मनमोहन सरकार में गृह मंत्री रहे सुशील कुमार शिंदे ने कहा था कि हिंदू आतंक नाम की कोई चीज ही नहीं थी, मेरी पार्टी यानी कांग्रेस ने मुझे हिंदू आतंक को स्थापित करने के लिए कहा था, इसीलिए मैने पार्टी फरमान का पालन करते हुए हिंदू आतंक को स्थापित कर दिया। केरल मे कांग्रेस हमेशा से मुस्लिम समर्थक पार्टी मानी जाती है।

एक बडा प्रश्न यह है कि केरल में मुस्लिम आबादी कांग्रेस को समर्थन क्यों करती है और इनके प्रति सहानुभूति क्यों रखती है, मुस्लिम आबादी को कम्यूनिस्टों का साम्यवाद और धर्म एक अफीम है कि थ्योरी क्यों नहीं पसंद आई?हालांकि कम्युनिस्टों ने भी चुनाव राजनीति की सफलता के लिए अपने निर्धारित सिद्धांत से समझौता किया था और मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति खेली थी। तत्कालीन कम्युनिस्ट सरकार के मुख्यमंत्री विजयन की बेटी ने मुस्लिम से शादी की थी, विजयन ने इसका लाभ उठाने की भी कोशिश की थी। लेकिन कम्युनिस्टों का विकल्प मुस्लिम आबादी के सामने था, क्योकि कम्युनिस्ट सिर्फ सीमित स्तर पर तुष्टिकरण कर सकते थे पर कांग्रेस परिधि मुक्त तुष्टिकरण करने की लिए तैयार थी। इसी कारण मुस्लिम आबादी कांग्रेस को चुनी। जहा तक ईसाई समुदाय के झुकाव की बात है तो फिर कम्युनिस्टों के विकासहीन नीति ने उन्हें विरोधी बनाया और कांग्रेस के लिए लाभकारी बन गये। लेकिन मुस्लिम और ईसाई एकता ज्यादा दिनों तक चलने वाली नहीं है। लव जिहाद और धर्मातंरण तथा मुस्लिम आतंकवाद को लेकर ईसाइयों और मुस्लिम आबादी के बीच जिहाद छिड सकता है, शह मात का खेल शुरू हो सकता है। लव जिहाद को लेकर ईसाई समुदाय भी वही सोच रखती है जो सोच हिन्दू वर्ग रखता है। मुस्लिम आतंकवादियों ने केरल में एक ईसाई प्रोफेसर का हाथ काट देने का दुस्साहस किया था जिन्होंने इस्लाम के प्रेरणा पुरूष के खिलाफ कोई असुविधाजनक प्रश्न पत्र बनाये थे।

कांग्रेस ने केरल में पश्चिम बंगाल और ममता बनर्जी के उदाहरण से कुछ भी नहीं सीखा है। अगर पश्चिम बंगाल और ममता बनर्जी के उदाहरण से सबक लिया होता तो फिर निश्चित तौर पर केरल मे मुस्लिम और ईसाई सर्वश्रेष्ठता वाली रणनीति नहीं बनायी होती और मंत्रिमंडल का आकार संतुलित होता। ममता बनर्जी भी ऐसी ही रणनीति के वाहक और अभियानी थी। ममता बनर्जी ने सोच लिया था कि पश्चिम बंगाल की 29 प्रतिशत मुस्लिम आबादी उनकी सत्ता को अपराजित बनाते रहेगी। मुस्लिम आबादी के खिलाफ प्रतिक्रिया हुई, हिन्दुत्व की गोलबंदी हुई। हिन्दुत्व के प्रचंड प्रवाह में ममता बनर्जी की सरकार बह गयी। कांग्रेस हिन्दुत्व के प्रचंड प्रवाह में ही केन्द्रीयकृत सरकार से बाहर हुई थी, कई राज्यों में कांग्रेस की हार के पीछे हिन्दुत्व का प्रचंड प्रवाह ही माना जाता है। हिन्दुओं की एकता के सामने असम में भी कांग्रेस की वापसी नहीं हो सकी। केरल में भाजपा आक्रामक तौर पर खडी है। भाजपा ने स्वयं के बल पर दो विधान सभा सीटों पर जीत हासिल की थी, कई विधान सभा सीटों पर भाजपा का प्रदर्शन भी उल्लेखनीय रहा है। अगर भाजपा थोडी सी भी मजबूत होती तो फिर कांग्रेस के लिए उम्मीद ना उम्मीदी में तब्दील हो जाती। भाजपा भी जनाधार के आधार पर तीसरी शक्ति जरूर है। त्रिपुरा में भी भाजपा ने जीरो से शुरू कर कम्युनिस्ट सरकार की कब्र खोद डाली थी और त्रिपुरा में अपनी सरकार बनायी थी। केरल में भाजपा के पास लोकसभा सीट भी है। केरल की राजधानी त्रिवनतपुरम नगर निगम पर भाजपा का कब्जा है। ये सभी राजनीतिक परिस्थितियां यह साबित करने के लिए काफी हैं कि भाजपा उतनी कमजोर तो कतई नहीं जितनी कमजोर कांग्रेस मानती है। भाजपा ने कांग्रेस मंत्रिमंडल को ईसाई और मुस्लिम सर्वश्रेष्ठता को लेकर प्रश्न भी उठाना शुरू कर दिया है। भाजपा ने विशेष अभियान भी चलाया है। सोशल मीडिया पर इसकी बडी चर्चा हुई और कांग्रेस को हिन्दू विरोधी पार्टी घोषित कर दिया गया है। केरल के हिन्दुओ में इसकी नाराजगी देखी जा रही है। अगर केरल की 55 प्रतिशत हिन्दू आबादी भाजपा के वोटर बन जायेगी तो फिर क्या कांग्रेस की सरकार स्थायी रह सकती है?, कांग्रेस सरकार गतिशील रह सकती है? निश्चित तौर पर भाजपा केरल में अपनी सरकार बनाने की संभावनाएं बनायेगी, पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा और असम की तरह अपनी सरकार बना सकती है, कांग्रेस की सरकार की कब्र खोद सकती है। कांग्रेस ने आत्मघाती राजनीति खेल कर अपनी मौत का फंदा ही बनाया है।

( यह लेख जागरूकता एवं ज्ञानार्जन के लिए प्रेषित है, इसका व्यवसायिक उपयोग प्रतिबंधित है और कॉपी राइट एक्ट के दायरे में है )

scroll to top