Nepal at the Edge: Broken Dreams, Fragile Democracy, and the Flight of a Generation

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Delhi : The fizz has gone flat. The promises of democracy in Nepal now taste like froth – empty, bitter, and vanishing fast. Will political stability ever return to this Himalayan nation? Can a country of three crore people, caught between India and China, offer its citizens more than despair and migration? These haunting questions echo louder each passing day.

“Democracy is an expensive hobby,” quips Professor Paras Nath Choudhary. “To expect a herd of white elephants (politicians) to feed the poor before filling their own coffers is a dream, not reality.” He reminds us that the monarchy once gave Nepal stability, but since embracing democracy in 2008, the country has witnessed 14 governments in 17 years – a carousel of chaos still spinning after the violent student uprisings.

From Hope to Ashes
The September rebellion, sparked by a clumsy social media ban, left more than seventy dead and $600 million in ruins. Prime Minister K.P. Sharma Oli fell within 48 hours, and for a fleeting moment, Chief Justice Sushila Karki’s “online coronation” as interim leader promised a new dawn. But as the smoke cleared, the scenery was painfully familiar: broken promises, fake change, and a public left disillusioned yet again.

The Calm Before the Next Storm
Curfews have lifted, and the streets look quiet, but the revolution hasn’t ended. On TikTok and Discord, young Nepalis are still demanding electoral reforms, an end to corruption, and justice for the fallen. Is Nepal now trapped in a “blocked revolution,” where unresolved rage could spill into bloodshed, dictatorship, or foreign intervention?

A Government Without Ground
Since 2008, not a single government has lasted its full term. The interim administration faces impossible deadlines – elections by March 2026, justice for victims, and rebuilding public trust. But faith is missing.
The economy, already fragile, is now shattered. Growth projections of 4.5% for 2025 have collapsed to near zero. The damage: 3 trillion rupees ($22.5 billion) – half the nation’s GDP. Tourism has evaporated, businesses have shuttered, and investors have fled.

Living on Borrowed Breath
Nepal does not survive on its own strength. It breathes through remittances and India’s lifeline. Every day, 2,000 young Nepalis leave the country for work abroad. Remittances, 30% of GDP, are both a blessing and a curse – sustaining families but hollowing out society.

Agriculture still employs the majority but fails to feed the population, forcing food imports worth 400 billion rupees annually. Industry contributes just 5–6% of GDP, mainly from selling edible oil to India. In short, Nepal imports life itself – fuel, electricity, grain, machinery – all from India.

Meanwhile, 10–15 lakh Nepalis toil in India, sending back $2–3 billion each year. This dependence is both Nepal’s crutch and chain.

The Young, Restless, and Unemployed
Nepal’s greatest resource – its youth – is also its greatest crisis. Educated and digitally connected but jobless, they face unemployment rates above 20%. Per capita income is stuck at $1,400, and one in five people still live in poverty. Their future is migration; their reality, exploitation.

The Darkest Tragedy
Each year, between 5,000 and 10,000 Nepali women and girls are trafficked into India’s flesh trade. Over one lakh remain trapped in brutal exploitation, invisible in brothels and cities. Despite decades of awareness drives and rescue missions, the numbers barely change. It is the most painful proof that political decay translates directly into human suffering.

Sandwiched Between India and China
Nepal’s helplessness must transform into dignity. India, as its closest partner, must extend genuine support rather than discrimination. And Nepalis themselves must recognize that India is their evergreen ally, while China lurks as an opportunist. But without courage in Kathmandu to uproot corruption and rebuild domestic productivity, Nepal risks falling deeper into the abyss of instability.

संयुक्त राष्ट्र महासभा में अमेरिका, पाकिस्तान और बांग्लादेश का झूठ

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दिल्ली । अमेरिका में आयोजित हो रही संयुक्त राष्ट्र महासभा- 2025 की वार्षिक आम महासभा में हो रहे कुछ वैश्विक नेताओं के संबोधन स्थायी शांति व विकास की दृष्टि से पूरे विश्व को को निराश करने वाले हैं। अमेरिका, पाकिस्तान, बांग्लादेश के शासनाध्यक्षों के भाषण इंगित करते हैं कि भारत को अपनी सामरिक सीमा सुरक्षा के प्रति और अधिक सचेत रहना होगा । यदि भारतीय सुरक्षा दृष्टिकोण से देखा जाए तो अमेरिका, पाकिस्तान और बांग्लादेश ने पहलगाम हमले की निंदा नहीं की अपितु पाकिस्तान ने खुद को ही आतंकवाद से पीड़ित बताने का असफल प्रयास किया। इस दौरान उसने एक बार फिर ऑपरेशन सिंदूर के अतंर्गत अपनी करारी पराजय को अपनी विजय बताने का प्रयास करते हुए झूठा राग अलापा कि उसने भारत के सात लड़ाकू फाइटर जेट विमान मार गिराए।

अमेरिकी राष्ट्रपति नोबेल पुरस्कार पाने के लिए इतने अधिक उतावले हो रहे हैं कि वह सामाजिक, राजनैतिक और वैश्विक मर्यादा ही भूल गये हैं।अंतरर्राष्ट्रीय मंच से उन्होंने यह सिद्ध करने का प्रयास किया कि दादागिरी करने का अधिकार केवल उन्हीं के पास है। उन्होने सात युद्ध समाप्त करवाने का दावा किया, भारत और चीन द्वारा रूस से तेल खरीद पर झूठ का पुलिंदा प्रस्तुत किया। ट्रम्प भारत के साथ साथ रूस के राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन से भी बहुत निराश हैं क्योकि भारत, रूस और चीन सहित कुछ अन्य देश भी अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प को नोबेल पुरस्कार के लिए नामित नहीं कर रहे हैं।अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प आत्ममुग्धता के शिकार हो चुके हैं, संभवत: वह ऐसे पहले व्यक्ति हैं जो अपने लिए नोबेल मांग रहे हैं। उन्होंने अपने कोट पर एफ -35 फाइटर जेंट का लोगो लगाकर एक बड़ा खतरनाक संदेश देने का काम किया है।

अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प को यह डर भी सता रहा है कि अगर भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रूस -यूक्रेन युद्ध समाप्त करवाने में सफलता प्राप्त कर ली तो कहीं मोदी जी को नोबेल शांति पुरस्कार के लिए नामित न कर दिया जाए। ट्रम्प बार -बार भारत -पाकिस्तान के मध्य युद्ध रुकवाने का दावा कर रहे हैं जबकि वास्तविकता यह है कि पहलगाम हमले के बाद भारत ने केवल पाकिस्तान स्थित आतंकवादी ठिकानों पर हमले किये थे और उन्हें नेस्तनाबूद किया था। जिसके बाद पाकिस्तान की सेना ने भारत पर हमला किया था और भारत ने पाकिस्तान को धूल चटाई थी जिससे पाकिस्तान घुटनों पर आ गया था।

भारत तीव्र गति से विश्व की तीसरी सबसे बड़ी आर्थिक शक्ति बनने की ओर अग्रसर है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में अब भारत में अब चिप से लेकर शिप तक का निर्माण हो रहा है। कई अन्य नए क्षेत्रों में भी अब भारत का दबदबा बढ रहा है जिसके कारण जिसके कारण भारत विरोधी शक्तियां बुरी तरह से घबरा गई हैं और भारत को रोकने के लिए तरह -तरह के षड्यंत्र कर रही हैं किंतु अब भारत अत्यंत सतर्क है।

पाकिस्तान और बांग्लादेश ने उगला जहर – अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने तीन माह में दूसरी बार पाक प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और सेनाध्यक्ष मुनीर को एक घंटे तक इंतजार करवाकर उनकी सरेआम बेइज्जती करी किंतु दोनों ने मुलाकात के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप की जमकर चापलूसी को और उन्हें शांतिदूत कहकर संबोधित किया। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शाहबाज शरीफ ने भारत को स्पष्ट रूप से अपना दुश्मन बताया और कहा कि हाल ही में भारत के साथ हुए संघर्ष में पाक की जीत हुई थी और पाकिस्तान ने भारत के सात विमान मार गिराए थे। उन्होंने एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय मंच से यह झूठ बोला कि भारत का कट्टरपंथी हिंदुत्व पूरी दुनिया के लिए एक गंभीर खतरा है। महासभा में शाहबाज शरीफ का भाषण उनकी मूल विचारधारा का ही प्रतिबिम्ब है। शरीफ ने सिन्धु समझौते रद्द रहने पर भयावह युद्ध की धमकी भी दी।

पाक प्रधानमंत्री शाहबाज शरीफ का संबोधन केवल भारत और हिन्दुओं के प्रति नफरत का प्रदर्शन था । शाहबाज ने एक बार फिर कश्मीर का मुद्दा उठाया और कहा कि वह कश्मीरियों के साथ खड़े हैं। ये कहते हुए शायद शाहबाज भूल गए थे कि इसी मंच से भारत की पूर्व विदेश मंत्री स्वर्गीय सुषमा स्वराज पूरे विश्व को बता गई हैं कि “जम्मू -कश्मीर भारत का अभिन्न अंग था है और कायनात की अंतिम रात तक रहेगा। जम्मू कश्मीर की स्थापना भारत के महर्षि कश्यप ने की थी। कश्मीर का मूल अस्तित्व भारत ही है और उसकी चाहत में एक दिन पाकिस्तान का अस्तित्व ही पूरी दुनिया से समाप्त हो जाएगा ।

पाक प्रधानमंत्री शाहबाज शरीफ ने संयुक्त राष्ट्र महासभा के मंच से ही अमेरिकी राष्ट्रपति को खुश करने के लिए उनके लिए नोबेल पुरस्कार मांग लिया। उसे लग रहा है कि ऐसा करने से वह कश्मीर को लेकर भारत पर दबाव बना सकता है और अमेरिका से अपने हक के लिए ईनाम मांग सकता है।

बांग्लादेश के मोहम्मद यूनुस ने भी एक सुनियोजित साजिश के तहत जमकर भारत के विरुद्ध जहर उगला और कहा कि उन्हें भारत से बहुत समस्याएं हैं । यूनुस के अनुसार इस समय भारत और बांग्लादेश के मध्य रिश्ते बहुत बिगड़ चुके हैं और अब तक के सबसे निचले पायदान पर हैं।

भारत सरकार इन देशों के संयुक्त राष्ट्र महासभा में ऐसे प्रलापों के लिए पहले से चौकन्नी और तैयार थी। पाकिस्तान और बांग्लादेश के इस अनर्गल प्रलाप का उत्तर देते हुए भारत के प्रतिनिधि ने तथ्यों और तर्कों के साथ इनकी जमकर धुलाई ।

लेखक का कार्य और पहचान

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प्रो. रामेश्वर मिश्र पंकज

जो बातें सदा बहुत सरल और स्पष्ट थी, आधुनिकता के नाम से अर्धशिक्षित लोगों के द्वारा उन बातों को दुरूह और जटिल कर दिया गया है, धुंध फैला दी गई है। उदाहरण के लिए लेखक और लेखन की बात।

लेखक वह है जो लेखन करता है। कोई भी लेखक वह लेखन करता है जो उसकी बौद्धिक सामर्थ्य, बौद्धिक प्रशिक्षण, संवेदना की संरचना, दृश्यजगत को देखने की दृष्टि विशेष और परिवेश से प्राप्त दृष्टि, शिक्षा, भाषा, पदावली, विम्ब, उपमाये, रूपक, उपमान, वर्णन शैलियां, उक्तियां, मुहावरें और सौंदर्य संबंधी बोध होगा। जगत भवसागर है अतः भावसागर भी है, बोध सागर भी है, भाषा सागर भी है, पदावली सागर भी है और विराट वैविध्य से भरपूर है। अतः लेखक भी विविध प्रकार के होगें, यह स्वाभविक है।

इनमें से जो प्रकार जिस भावक या सहृदय समुदाय को भायेगा या आलोकित करेगा, वह समुदाय उस लेखक को अच्छा या श्रेष्ठ मानेगा।

प्रत्येक लेखन पाठक में कुछ बोध और भाव जगाता है। ये भाव कुछ प्रभाव और संवेग तथा रस जगाते है। हमारे यहाँ इसके सार्वभौम वर्ग या भेद या रूप बताये गये – श्रृंगार, वीर, करूण, हास्य, अदभुत, बीभत्स, रौद्र, शांत आदि। बाद में विद्वानों ने इनमें एक दो और जोड़े-घटाये। प्रत्येक रस की प्रस्तुति और प्रभाव गहराई और प्रबलता के भेद से भी विश्लेषित किये गये। इस प्रकार भाव, संवेदना, सराहना और रसानुभूति का एक विराट संसार सदा भारतीय समाज को ज्ञात रहा। वर्णन या रचना की विलक्षणता और भावक या पाठक या सहृदय के मन को छू पाने, विभोर कर पाने या स्पन्दित कर पाने की विपुल चुनौती और अवसर समाज में सदा उपस्थित रहते है। इस तरह लेखन का विराट संसार और लेखकों का विशाल समुदाय अपने लिए अवसर और आदर पाता रहता है।

विषय की विविधता, प्रत्येक विषय के अंतर्गत वस्तु की विविधता, शिल्पों की विविधता, वर्णन की विशेषता की विविधता और प्रभावों की विविधता का भरा पूरा संसार जीवन्त समाज में हिलोरें मारता रहता है।

दरिद्र और दीन-हीन समुदायों में जब विगत 300 वर्षों में पहली बार चर्च की भयंकर जकड़न से बाहर भी लिख सकने की स्थिति बनी तो उसमें चर्च के विरोध में राजनीति की मुख्य भूमिका रही। पुराने अभिजनों ने अपने साथी पादरियों की प्रतिस्पर्था में यह स्थिति उत्पन्न की। इस लिए शीघ्र ही वहां के लेखक राजनैतिक वर्गीकरण को कसौटी बनाकर सोचने में गौरव का अनुभव करने लगे। क्योंकि उनके लिए यह जकडन से मुक्ति का दौर था।
भारत में बौद्धिक रूप से दरिद्र और आत्म-गौरव से रहित तथा राजनेताओं से आतंकित और साथ ही उनकी प्रभुता पर अनुरक्त लोगों ने यूरोपीय मतवादों की जूठन पर जी रहे राजनेताओं की नकल में राजनैतिक मतवादों के वर्गीकरण को दासवत अपना लिया। वाम-दक्षिण जैसे विचित्र और दयनीय विशेषण इसी दास बुद्धि की उपज हैं। लेखकों में इस दासता के उदय का अर्थ है उनका विराट भारतीय समाज की चेतना से विच्छेद और स्वयं स्वीकृत परायापन।

वाम और दक्षिण: एक वैचारिक यात्रा

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दिल्ली। वामपंथ और दक्षिणपंथ के बीच का अंतर लंबे समय से बहस का विषय रहा है। कुछ इसे गंभीर वैचारिक टकराव मानते हैं, तो कुछ इसे बचकाना विवाद। असहमति और सहमति के बीच यह समझना जरूरी है कि आप वास्तव में कहां खड़े हैं। आपकी विचारधारा चाहे जो हो, अपनी पहचान को समझना सरल है, बशर्ते आप आत्ममंथन करें।

वामपंथ सवालों पर टिकी विचारधारा है। यह परिवर्तन और आंदोलन में विश्वास रखती है, जो आज को कल के लिए बलिदान करने के बजाय वर्तमान में बदलाव चाहता है। उदाहरण के लिए, यदि आप सीपीएम के नेतृत्व में बार-बार दीपांकर भट्टाचार्य के महासचिव चुने जाने पर सवाल नहीं उठाते, लेकिन दूसरों पर ब्राह्मणवाद का आरोप लगाते हैं, तो यह आत्म-विरोध है। वामपंथी होने का मतलब है बगावत का जज्बा, सत्ता और व्यवस्था पर सवाल उठाना। यदि आप बदलाव को संभलकर चलने की रणनीति मानने लगे हैं, तो शायद आपका वामपंथी होना संदेहास्पद है।

वहीं, दक्षिणपंथ, विशेष रूप से संघी होना, धैर्य और समर्पण का रास्ता है। जब आपके सारे सवाल खत्म हो जाएं, जवाब सुनने का धैर्य आए, और आप पूर्ण समर्पण के साथ किसी विचार को स्वीकार करें, तभी आप सही मायनों में संघी हैं। यह आसान नहीं है। इसमें उम्रभर की साधना लगती है। संघी होने का मतलब है प्रश्नों का अंत और समर्पण की शुरुआत। यही कारण है कि युवावस्था में लोग अक्सर वामपंथ की ओर आकर्षित होते हैं, क्योंकि यह सवालों और बगावत का दौर है। वहीं, उम्र बढ़ने पर, धैर्य और स्थिरता के साथ, दक्षिणपंथ का आकर्षण बढ़ता है।

वामपंथ त्वरित परिवर्तन में विश्वास रखता है, जबकि दक्षिणपंथ दीर्घकालिक समर्पण और धैर्य की मांग करता है। दोनों के बीच का अंतर समझना आत्म-निरीक्षण से शुरू होता है। समाजवाद और गांधी मार्ग की चर्चा फिर कभी।

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