हर वैश्विक मंच पर भारत को कटघरे में क्यों खड़ा करते हैं राहुल?

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-डॉ. मयंक चतुर्वेदी

दिल्ली । राहुल गांधी को अब शायद हर अंतरराष्ट्रीय मुलाकात में भी भारत के लिए संकट नजर आने लगा है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी इटली दौरे पर क्या गए, वहां इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी को भारतीय कंपनी पारले की ‘मेलोडी’ चॉकलेट क्या भेंट कर दी, कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने इसे भी राजनीतिक व्यंग्य और कटाक्ष का विषय बना डाला। उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा कि “आर्थिक तूफान सर पर है और हमारे प्रधानमंत्री इटली में टॉफी बांट रहे हैं।” इतना ही नहीं, उन्होंने प्रधानमंत्री पर “रील बनाने” और “नौटंकी” करने जैसे शब्दों का इस्तेमाल भी किया। सवाल यह है कि क्या विपक्ष की राजनीति अब इतनी सतही हो चुकी है कि भारत के प्रधानमंत्री की हर विदेश यात्रा और हर कूटनीतिक संवाद भी उपहास का विषय बना दिया जाए?

यह पहली बार नहीं है जब राहुल गांधी ने राजनीतिक मर्यादा और शब्दों की सीमा को लांघा हो। वस्‍तुत: राहुल गांधी की राजनीति का एक बड़ा हिस्सा विवादित बयानों और उत्तेजक टिप्पणियों के इर्द-गिर्द घूमता रहा है। कभी वे विदेशों में जाकर भारत के लोकतंत्र पर सवाल उठाते हैं, कभी देश की संस्थाओं को कठघरे में खड़ा करते हैं और कभी प्रधानमंत्री के लिए अमर्यादित शब्दों का प्रयोग कर बैठते हैं। यही कारण है कि उनके बयान अक्सर कांग्रेस पार्टी के भीतर भी असहजता पैदा कर देते हैं।

रायबरेली में कांग्रेस कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए राहुल गांधी ने जिस तरह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को “गद्दार” कहने तक की भाषा इस्तेमाल की, उसने राजनीतिक बहस को और विषाक्त बना दिया है। लोकतंत्र में मतभेद हो सकते हैं, वैचारिक संघर्ष भी हो सकता है, किंतु देश के प्रधानमंत्री और संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों के लिए इस तरह की भाषा क्या किसी जिम्मेदार नेता को शोभा देती है? भाजपा ने स्वाभाविक रूप से इस पर तीखी प्रतिक्रिया दी। भाजपा नेताओं ने इसे न सिर्फ प्रधानमंत्री का अपमान बताया, बल्कि देश की जनता और लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ भी करार दिया है और यह सही भी है ।

राहुल गांधी की यह शैली नई नहीं है। याद कीजिए, उन्होंने कभी प्रधानमंत्री मोदी को “चौकीदार चोर है” कहा था। कभी “पनौती” जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया। विदेशों में जाकर उन्होंने कहा कि भारत में लोकतंत्र खतरे में है, विपक्ष की आवाज दबाई जा रही है और संस्थाएं कब्जे में हैं। ब्रिटेन के कैम्ब्रिज और अमेरिका में दिए गए उनके भाषणों ने भी राजनीतिक विवाद खड़े किए थे। तब भी सवाल उठा था कि क्या देश के अंदर की राजनीतिक लड़ाई को विदेशी मंचों पर ले जाकर भारत की छवि को धूमिल करना उचित है?

विडंबना यह है कि राहुल गांधी हर मुद्दे में नकारात्मकता खोजने लगे हैं। प्रधानमंत्री किसी वैश्विक मंच पर भारत की बात करें तो उन्हें समस्या दिखती है। किसी विदेशी नेता से आत्मीय संबंध बनाएं तो उसमें भी उन्हें “रील” और “नौटंकी” दिखाई देती है। जबकि अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में व्यक्तिगत संबंधों और सांस्कृतिक प्रतीकों का अपना महत्व होता है। मेलोनी को ‘मेलोडी’ चॉकलेट देना कोई राजनीतिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि भारतीय सॉफ्ट पावर और आत्मीयता का प्रतीक था। दुनिया के बड़े नेता ऐसे अनौपचारिक पलों के जरिए ही संबंधों को सहज और मजबूत बनाते हैं।

राहुल गांधी के बयान पर दिलचस्प प्रतिक्रिया राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के नेता शरद पवार की ओर से आई है । वैचारिक मतभेद होने के बावजूद उन्होंने साफ कहा कि प्रधानमंत्री मोदी विदेशों में भारत की प्रतिष्ठा को मजबूत करने का काम कर रहे हैं और जब बात राष्ट्रहित की हो, तब राजनीतिक मतभेदों को आड़े नहीं आना चाहिए। यह बयान इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह परिपक्व राजनीति का उदाहरण प्रस्तुत करता है। विपक्ष का काम आलोचना करना है, किंतु राष्ट्रीय सम्मान और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की छवि को लेकर एक मर्यादा भी होनी चाहिए।

भाजपा ने राहुल गांधी की बयानबाजी को उनकी राजनीतिक हताशा से जोड़कर देखा है। केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने कहा कि राहुल गांधी सत्ता नहीं मिलने की निराशा में देश को ही गाली देने लगे हैं। भाजपा प्रवक्ता प्रदीप भंडारी ने उनकी भाषा की तुलना पाकिस्तान समर्थित तत्वों से कर दी। वहीं उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इसे लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति अनादर बताया। भाजपा अध्यक्ष नितिन नवीन ने तो यहां तक कह दिया कि राहुल गांधी “देश की राजनीति के राहु” बन चुके हैं, जो लगातार राजनीतिक वातावरण को दूषित कर रहे हैं।

असल सवाल यही है कि राहुल गांधी आखिर किस दिशा में अपनी राजनीति को ले जाना चाहते हैं? क्या सिर्फ आक्रामक भाषा और विवादित बयान ही अब उनकी पहचान बनकर रह गए हैं? लोकतंत्र में मजबूत विपक्ष बेहद जरूरी होता है, लेकिन विपक्ष की विश्वसनीयता उसके तर्क, दृष्टि और संयम से बनती है, कटाक्ष और कटुता से नहीं। यदि हर राष्ट्रीय उपलब्धि, हर कूटनीतिक पहल और हर वैश्विक संवाद को केवल व्यंग्य और उपहास में बदल दिया जाएगा, तो स्‍वभाविक है कि इससे सबसे अधिक नुकसान विपक्ष की गंभीरता को ही होगा।

राहुल गांधी को यह समझना चाहिए कि प्रधानमंत्री पद किसी व्यक्ति तक सीमित न होकर देश का प्रतिनिधित्व करता है। राजनीतिक विरोध अपनी जगह है, किंतु जब भारत का प्रधानमंत्री किसी विदेशी धरती पर देश का प्रतिनिधित्व कर रहा हो, तब शब्दों की मर्यादा और राष्ट्रीय सम्मान का ध्यान रखना हर जिम्मेदार नेता का कर्तव्य है। दुर्भाग्य यह है कि राहुल गांधी बार-बार इसी कसौटी पर चूकते नजर आते हैं। शायद यही वजह है कि उनके बयान जितनी सुर्खियां बटोरते हैं, उतने ही सवाल उनकी राजनीतिक परिपक्वता पर भी खड़े कर जाते हैं।अब बड़ा सवाल यही है कि वे कभी परिपक्‍व होंगे या नहीं !!!

यमुना स्वच्छता अभियान: प्लास्टिक कूड़ा उठाया, बाजार में जागरूकता मार्च

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नई दिल्ली। नमामि गंगे के नेतृत्व में यमुना टास्क फोर्स के सहयोग से युवा परिवर्तन फाउंडेशन द्वारा रविवार 17 मई को यमुना घाट पर स्वच्छता अभियान चलाया गया। सुबह 7:30 बजे से 10:30 बजे तक ढाई पुस्ते यमुना घाट पर आयोजित इस अभियान में टीम ने घाट को प्लास्टिक कूड़े से मुक्त करने का कार्य किया।

अभियान के पहले भाग में स्वयंसेवकों ने यमुना घाट से बड़ी मात्रा में प्लास्टिक कूड़ा एकत्रित किया। अभियान के दूसरे भाग में टीम सोनिया विहार के दूसरे पुस्ता मार्केट पहुंची, जहां पैदल जागरूकता मार्च निकाला गया। मार्केट के दुकानदारों से अपील की गई कि वे स्वयं जागरूक हों और ग्राहकों को भी जागरूक करें।

युवा परिवर्तन फाउंडेशन की महासचिव निशा राठौर के दिशा-निर्देश में चलाए गए इस अभियान में मुख्य संदेश दिया गया कि पूजा सामग्री आने वाले किसी भी प्लास्टिक पैकेट को कूड़े के रूप में ही देखा जाए। इसे यमुना में प्रवाहित न किया जाए बल्कि कूड़ेदान में डाला जाए। घाटों की स्वच्छता बनाए रखने की अपील की गई।

इस अभियान में नवजागृति योग समिति और माँ जानकी सेवा समिति ने भी सहयोग प्रदान किया। टीम के सदस्यों ने कहा कि यमुना की सफाई केवल एक दिन का कार्यक्रम नहीं है, बल्कि यह निरंतर प्रक्रिया है। आम नागरिकों, दुकानदारों और पूजा सामग्री विक्रेताओं की भागीदारी से ही हम यमुना को स्वच्छ बना सकते हैं।

अभियान में शामिल स्वयंसेवकों ने घाट पर जमा कूड़े को साफ करते हुए और बाजार में जागरूकता फैलाते हुए पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक सकारात्मक कदम उठाया। युवा परिवर्तन फाउंडेशन ने भविष्य में भी ऐसे नियमित अभियानों का आयोजन करने की योजना बनाई है।

हेले लेंग : भारत विरोध का नया चेहरा, पुरानी टूलकिट

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— कृष्णमुरारी त्रिपाठी अटल

नॉर्वे के ओस्लो में ग्लोबल टूलकिट के प्रोपेगैंडा वाली बात कोई नहीं है। पत्रकार के भेष में जिस हेले लेंग ने अपने ही देश नॉर्वे के प्रोटोकॉल का पालन नहीं किया। जब भारत और नॉर्वे अपने महत्वपूर्ण फैसलों को विश्व के समक्ष रख रहे हों।जहां प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं है, प्रेस ब्रीफिंग हो। जहां
दोनों देशों के प्रमुख प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और प्रधानमंत्री जोनास — द्विपक्षीय संबंधों, फैसलों को प्रेस को ब्रीफ करने के बाद वहां से अपने दूसरे कार्यक्रमों के लिए जा रहे हों। उसी वक्त — अचानक वहाँ जानबूझकर योजनाबद्ध तौर पर अपना प्रोपेगैंडा चलाना। हेले लेंग का ये पूछना कि—“प्रधानमंत्री मोदी, आप दुनिया की सबसे स्वतंत्र प्रेस के सवालों को क्यों नहीं लेते?”

— फिर 2024 के बाद अचानक 2026 में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर एक्टिव होना।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के ख़िलाफ़ उस वीडियो को मोहतरमा हेले लेंग द्वारा X पोस्ट करना।भारत विरोध में विष वमन करना। तत्पश्चात भारत में बैठे भारत विरोधियों का उस पर लहालोट होना। उस वीडियो के सहारे कांग्रेस के शहजादे राहुल एंड कंपनी द्वारा —प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर आक्षेप लगाना। राहुल गांधी का सबसे पहले उस वीडियो को रिट्वीट करना।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के बहाने भारत को अपमानित करना। ये सब कुंठित और पराजित भारत विरोधी राजनीति के अतिरिक्त कुछ नहीं है। वैश्विक स्तर पर भारत को पत्रकारिता, मानवधिकार आदि पर ज्ञान देना। ये सब पुरानी टैक्टिक्स, टूलकिट के नए प्रयोग हैं। फ़र्क इतना है कि भारत विरोधी कंटेंट वही है बस पैकेजिंग चेंज है। ये कोई संयोग नहीं है बल्कि भारत की साख को कमतर सिद्ध करने के टूलकिटिए प्रयोग हैं।

अब आते हैं कहानी पर..
हेले लेंग के X Post के बाद जब भारत के विदेश मंत्रालय (पश्चिमी ) के सचिव सिबी जार्ज ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्हें बुलाया। वहां हेले लेंग NGO’s पैटर्न वाली टूलकिट के क्वेश्चन लेकर आईं। प्रोवोक करने पर उतर आईं। वहां सिबी जार्ज ने उनका अच्छी तरह से ज्ञानवर्धन किया। तथ्य के आधार पर उन्हें समझाया। लेकिन हेले लेंग अपने प्रोपेगैंडा से बाज नहीं आईं। हेले लेंग का एक सवाल उनके प्रोपेगैंडा को आईने की तरह साफ़ कर देता है। हेले पूछती हैं कि—’ दुनिया भारत पर भरोसा क्यों करें?’

— उनके इसी सवाल में उनकी और उन्हें प्लांट करने वाले उनके आकाओं की भूमिका स्पष्ट दिखाई देती है। ये सारी योजनाएं भारत की बढ़ती साख, विश्व समुदाय के बीच भारत की स्वीकार्यता के विरुद्ध नैरेटिव चलाने का अहम हिस्सा है। हेले लेंगे वही तथाकथित पत्रकार हैं जो चीन और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के कसीदे पढ़ती रही हैं। उनकी प्रशंसा में आर्टिकल लिखती रही हैं। हेले लेंग का एजेंडा एकदम साफ़ था वो था — भारत विरोध। हालांकि ये सब नई बात नहीं है भारत के ख़िलाफ़ ये सब वर्षों से जारी है। भारत इन सबसे ऊपर उठकर नए दौर में है। जहां ऐसे सस्ते तरीक़े, पब्लिसिटी स्टंट भारत की साख पर बट्टा नहीं लगा सकते। हां केवल इतना है कि मीडिया की सनसनी ज़रूर बन सकते हैं। मोदी विरोधियों,भारत विरोधियों के लिए मिर्च मसाला ज़रूर बन सकते हैं। जो लोग ख़ुश हैं कि— अहा! हेले लेंग ने तो मोदी की बेइज्जती कर दी।उनकी सोच पर तरस आती है। ये कैसे लोग हैं जिन्हें ‘मोदी विरोध और भारत विरोध’ में फ़र्क नहीं पता? हेले लेंग स्पष्ट तौर पर भारत के ख़िलाफ़ ज़हर उगल रही हैं। क्या ये भारत में बैठे इन दुर्बुद्धियों को समझ नहीं आता है?

लेकिन दूसरी ओर चिन्ता की बात ये भी है कि— भारत के ख़िलाफ़ जब भी कोई वैश्विक प्रोपेगैंडा चलाया जाता है। ठीक वैसे ही कांग्रेस और राहुल गांधी—पूरी ऊर्जा के साथ एक्टिव हो जाते हैं।
उन्हें अपनी राजनीति के लिए खाद-पानी ; भारत विरोधी प्रोपेगैंडा से मिलता है। तत्पश्चात राहुल एंड कंपनी अपने अभियान में जुट जाते हैं।

चाहे पूर्व का हिंडेनबर्ग रिपोर्ट वाला प्रोपेगैंडा हो। याकि 2021 में किसान आंदोलन के समय ग्रेटा थनबर्ग के ट्वीट वाली टूलकिट। याकि राहुल गांधी का विभिन्न विदेशी यूनिवर्सिटी में पूर्व प्रायोजित कार्यक्रमों में जाकर — भारत के लोकतंत्र पर हमला बोलना हो। दूसरे देशों को भारत के आतंरिक मामलों में हस्तक्षेप का आमंत्रण देना हो।याकि दुनिया का ऐसा कोई नेता हो— जो भारत के ख़िलाफ़ बोलता है। राहुल एंड कंपनी उस पर प्रो एक्टिव रहती है। राहुल गांधी इन सबको तोते की तरह रट लेते हैं। फिर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के बहाने अपने ही देश के अपमान में जुट जाते हैं। ठीक ऐसा ही कांग्रेस के शहजादे राहुल गांधी अब हेले लेंग के बहाने कर रहे हैं। शायद अब राहुल गांधी को देश की जनता पर नहीं बल्कि विदेशी टूलकिट पर ज्यादा भरोसा हो गया है?

जबकि आप देखिए कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नॉर्वे दौरे से भारत के लिए कितने सुखद संदेश आए। जहां नॉर्वे के राष्ट्र प्रमुख, भारत के साथ आत्मीयता और कृतज्ञता के बोध के साथ आगे बढ़ रहे हैं। प्रधानमंत्री जोनास गहर स्टोर से लेकर वहां के विदेश मंत्री एस्पेन बार्त आईडे भारत और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की भूरि-भूरि प्रशंसा कर रहे हैं । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को नॉर्वे अपने सर्वोच्च सम्मान ‘ग्रैंड क्रॉस ऑफ द रॉयल नॉर्वेजियन ऑर्डर ऑफ मेरिट’ से सम्मानित कर रहा है। नॉर्वे समेत विश्व के लगभग 32 से अधिक देश प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को अपने सर्वोच्च सम्मान से सम्मानित कर चुके हैं। ये क्या भारत की वैश्विक साख को नहीं बता रहे हैं?

तथाकथित पत्रकार हेले लेंगे के कंधे पर बंदूक रखकर भारत विरोध में जो प्रोपेगैंडा चलाया गया। उसे नॉर्वे ख़ुद ध्वस्त कर चुका है। नार्वे के विदेश मंत्री एस्पेन बार्त आईडे भारत और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की प्रशंसा कर रहे हैं। नार्वे के विदेश मंत्री ने जो कहा वो हेले लेंग और राहुल गांधी जैसों के मुंह पर करारा तमाचा है।
विदेश मंत्री एस्पेन बार्त आईडे ने कहा कि— “प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भारत के लोकप्रिय और प्रभावशाली राजनेता हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भारत को वैश्विक मंच पर एक मजबूत और महत्वपूर्ण स्थान दिलाने में अहम भूमिका निभाई है।”

इतना ही नहीं विदेश मंत्री आईडे कह रहे हैं कि— “भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है और बहुत तेजी से आगे बढ़ती हुई अर्थव्यवस्था है। आने वाले समय में यह दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की ओर अग्रसर है। भारत एक बहुत महत्वपूर्ण और नवाचार से भरपूर साझेदार है।”

क्या नॉर्वे के विदेश मंत्री का ये कहना हेले लेंग और उनके समर्थकों के लिए पर्याप्त नहीं है? ऐसे में हेले लेंगे जैसे टूलकिट वाले एजेंडाबजों की क्रेडिबिलिटी क्या रह जाती है? ये कौन होते हैं जो भारत को ज्ञान देंगे? स्पष्ट है कि भारत विरोध अस्वीकार्य है।

वहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नॉर्वे के प्रधानमंत्री के साथ भारत-नॉर्वे व्यापार और अनुसंधान शिखर सम्मेलन को संबोधित किया। भारत तथा नॉर्वे और दोनों देशों की 50 से अधिक कंपनियों के बीच कई व्यापारिक समझौतों पर हस्ताक्षर किए गए। आर्थिक साझेदारी समझौते-टीईपीए TEPA जैसे महत्वपूर्ण निर्णय नई कहानी बयां कर रहे हैं। इसके साथ ही विज्ञान, नवाचार, ग्रीन एनर्जी (स्वच्छ ऊर्जा)— (ग्रीन हाइड्रोजन, पवन ऊर्जा), समुद्री अर्थव्यवस्था (ब्लू इकोनॉमी) और अंतरिक्ष सहयोग की दृष्टि से ऐतिहासिक ‘ग्रीन स्ट्रेटेजिक पार्टनरशिप’ तथा त्रिकोणीय विकास सहयोग समझौते भारत की रणनीतिक और कूटनीतिक मजबूती को दर्शा रहे हैं। इतना ही नहीं अंतरिक्ष, डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना, स्थिरता, टनलिंग प्रौद्योगिकी, स्वास्थ्य और उन्नत प्रौद्योगिकियों जैसे प्रमुख क्षेत्रों में हुए समझौते दोनों देशों के संबंधों को गति देने वाले होंगे।

लेकिन रुकिए.. कहानी कुछ और भी है।
भारत को लेकर पश्चिमी मीडिया कैसे प्रोपेगैंडा चलाता है। वो भारत के ख़िलाफ़ कैसे Micro Level प्लानिंग के साथ Global Propaganda चलाता है।राष्ट्रनिष्ठ व्यक्ति के लिए उसे समझना इतना भी मुश्किल नहीं है। वरिष्ठ पत्रकार रहे स्व. उमेश उपाध्याय
ने वर्षों के शोध के बाद प्रामाणिक पुस्तक लिखी थी। ‘Western Media Narratives on India :From Gandhi to Modi’ — इसे मंगाकर पढ़िए। इसके पन्ने पलटिए। आपको पश्चिमी मीडिया से लेकर भारत को लेकर पश्चिम की हीनग्रंथि का सहज ही अनुमान हो जाएगा। ये दुनिया कभी भी भारत की प्रगति बर्दाश्त नहीं कर सकती है। भारत को लेकर दुराग्रह पालने वाला पश्चिमी मीडिया एक ख़ास एजेंडे पर काम करता है। फिर पत्रकारिता पर भारत को ज्ञान बघारता है। स्व. उमेश उपाध्याय ने अपनी पुस्तक में तथ्यात्मक रूप से सारे संदर्भ उकेरे हैं।

क्योंकि बाजारवादी आसुरी शक्तियां भारत की एकता, शक्ति और सम्प्रभु नीति से भयभीत हैं। उन्हें भारत की स्थिरता रास नहीं आ रही है। ऐसे में वैश्विक शक्तियां भारत के ख़िलाफ़ अनेकानेक प्रोपेगैंडा चलाएंगी। विभाजनकारी, विप्लवकारी टूलकिट चलाएंगी। नाम, चेहरे और स्थान बदले रहेंगे लेकिन उनका काम एक रहेगा। वो है भारत विरोध।भारत को अस्थिर करना। जैसा उन्होंने हमारे पड़ोस नेपाल, बांग्लादेश, श्रीलंका आदि में किया। लेकिन भारत के मामले में डीप स्टेट, ब्रेकिंग इंडिया फोर्सेज, भारत विरोधी शक्तियों को मुंह की खानी पड़ी। किन्तु उनके प्रोपेगैंडा बदस्तूर जारी हैं। ऐसे में कांग्रेस और राहुल गांधी का इनके साथ कदमताल करना। भारत विरोधी हर चीज़ को मुद्दा बनाकर पेश करना। इनसे अपनी खोई हुई राजनीतिक ज़मीन तलाशना भी कोई नई बात नहीं है। जब भी दुनिया के किसी हिस्से से भारत विरोधी टूलकिट एक्टिवेट होगी। कांग्रेस के शहजादे राहुल गांधी उसके सबसे बड़े प्रचारक के तौर पर आएंगे। क्योंकि भारत की जनता ने उन्हें इतनी बार ख़ारिज कर दिया है कि— ब्रेकिंग इंडिया फोर्सेज के अलावा उनके पास अब कोई और सहारा नहीं बचा है।

बाक़ी भारत के अंदर और बाहर ‘सोरोस के जितने पपेट’ हैं वो एक स्वर में जोरों-शोरों से ब्रेकिंग इंडिया फोर्सेज की टूलकिट पर काम कर रहे हैं। इन्हें आप अर्बन नक्सलियों के तौर पर भी जानते हैं। जो हर मुद्दे पर, हर प्रोपेगैंडा पर, हर स्थान पर अलग-अलग रूप धरकर आते हैं। लेकिन इन्हें और इनके आकाओं को नहीं पता कि भारत माता की संतानें हर विभाजनकारी मंसूबे को ध्वस्त कर देती हैं। ये नया भारत है जो सर्जन की सामूहिक चेतना के साथ आगे बढ़ चला है। भारत को आगे बढ़ने से कोई नहीं रोक सकता। हमारी आपकी सतर्कता और राष्ट्रनिष्ठा भारत विरोधियों की नींद उड़ाने के लिए पर्याप्त है।

सनातन के अपमान का दुस्साहस

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सर्वेश कुमार सिंह

दिल्ली । सनातन के अपमान का फिर दुस्साहस हुआ है। वहीं जहां सितंबर 2023 में हुआ था। वही उदयनिधि स्टालिन जिसने तब कहा था। सनातन डेंगू और मलेरिया है। इसे खत्म करना होगा। थोड़ा विरोध, हल्ला गुल्ला हुआ। मामला शांत हो गया। अब फिर सनातन पर हमला। वही व्यक्ति उदयनिधि जब तमिलनाडु विधान सभा में द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (डीएमके) विधायक दल का नेता चुना जाता है, और नेता विरोधी दल बनता है, तो पहले भाषण में ही सनातन को खत्म करने की बात कहता है। वह कहता है सनातन समाज को बांटता है। इसलिए इसे समाप्त करना जरूरी है।

जब तमिलनाडु विधान सभा में सनातन के अपमान का दुस्साहस होता है, तो विरोध का कोई स्वर सुनाई नहीं देता। यहां तक कि मुख्यमंत्री टी जोसेफ विजय भी कोई प्रतिक्रिया नहीं देते। न ही प्रतिकार और न ही रोकने की कोई कोशिश। ऐसा लगता है कि तमिलनाडु विधानसभा सनातन विरोध का केंद्र बन गई है। दो बार उदयनिधि दुस्साहस कर चुके है। ये पूर्व मुख्यमंत्री एमके स्टालिन के बेटे और द्रमुक संस्थापक के करुणानिधि के पौत्र हैं। इस परिवार ने दीर्घ काल तक तमिलनाडु में सरकार चलाई है। ईसाई मतावलंबी होने के बावजूद इस परिवार को तमिल हिंदुओं का समर्थन मिलता रहा है। लेकिन इस परिवार के आचार,व्यवहार और सोच में सहिष्णुता और सर्वधर्म समभाव का पूर्णतः अभाव है। अगर ऐसा नहीं होता तो एमके स्टालिन अपने बेटे को रोकते, टोकते और भारत की विविधतापूर्ण सांस्कृतिक विरासत रक्षा की कोशिश करते मगर उन्होंने ऐसा कोई प्रयास नहीं किया। न अब जब 11 मई को उनके पुत्र ने सनातन का अपमान किया और न ही वर्ष 2023 में जब सनातन को डेंगू कहा गया।

भारत के सांस्कृतिक विकास क्रम में तमिल संस्कृति का अनूठा और अनुपम योगदान है। तमिल भाषा विश्व की प्राचीनतम भाषाओं में से एक है। इस गौरव से संपूर्ण भारत गौरवान्वित है। तमिल संस्कृति के महत्व को देखते हुए ही भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने निर्वाचन क्षेत्र में काशी-तमिल संगमम आयोजन किए। ये आयोजन उतर और दक्षिण की सनातन संस्कृति का मिलन ही नहीं। भारत की एकरूपता का संदेश है। लेकिन पीएम मोदी की इस भावना को समझने के लिए स्टालिन परिवार तैयार नहीं है।

आज आवश्यकता है कि सनातन संस्कृति पर बढ़ रहे आक्रमणों और नियोजित, प्रायोजित अपमान का संगठित रूप से लोकतांत्रिक मर्यादाओं में रहकर प्रतिकार किया जाए, अन्यथा ये दुस्साहस बढ़ता जाएगा।

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