कांग्रेस का भ्रष्टाचार और वामपंथी प्रोपगैंडा: दयानंद पांडेय की कलम से

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दिल्ली वरिष्ठ पत्रकार दयानंद पांडेय ने अपनी बेबाक लेखनी से कांग्रेस के भ्रष्टाचार और वामपंथी ब्रिगेड के प्रोपगैंडा को उजागर किया है। उनकी गहरी पड़ताल ने कांग्रेस की पोल खोलकर जनता के सामने एक कड़वी सच्चाई लाई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने एक भाषण में कांग्रेस के भ्रष्टाचार पर तंज कसते हुए कहा था कि कांग्रेस ऐसी योजनाओं का लाभ उन लोगों को देती थी, जो “पैदा भी नहीं हुए” और “विधवा पेंशन” जैसी योजनाओं का दुरुपयोग करती थी। यह बयान कांग्रेस की कथित नीतियों की हकीकत बयान करता है, जहां जनता का पैसा तिजोरी भरने के लिए इस्तेमाल होता था।
मोदी के इस बयान को वामपंथी ब्रिगेड ने तोड़-मरोड़कर प्रोपगैंडा का हथियार बना लिया। उन्होंने इसे सोनिया गांधी से जोड़कर “कांग्रेस की विधवा” का नैरेटिव गढ़ा, ताकि भ्रष्टाचार के मुद्दे को दबाया जा सके। कांग्रेस ने भी अपनी इस “नौकरानी” वामपंथी ब्रिगेड की हां में हां मिलाकर इस झूठ को बढ़ावा दिया। मूल वीडियो को एडिट कर इस नैरेटिव को हवा दी गई, जिससे जनता के बीच भ्रम फैला। दयानंद पांडेय ने इस प्रोपगैंडा को बेनकाब करते हुए दिखाया कि कैसे कांग्रेस और उसके सहयोगी सच को दबाने के लिए झूठ का सहारा लेते हैं।
भाजपा कार्यकर्ता इस प्रोपगैंडा का प्रभावी जवाब नहीं दे पाए और रक्षात्मक रुख अपनाने लगे। लेकिन पांडेय की लेखनी ने साफ किया कि कांग्रेस का भ्रष्टाचार और वामपंथी प्रोपगैंडा देश को गुमराह करने की साजिश है। यह “विधवा” कोई व्यक्ति नहीं, बल्कि कांग्रेस की भ्रष्ट नीतियों का प्रतीक है, जिसे वामपंथी ब्रिगेड ने सोनिया गांधी से जोड़कर भटकाने की कोशिश की।

आर्थिक रूप से समृद्ध होते भारत को किसी खतरा और कैसा षड्यंत्र?

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अमित श्रीवास्तव।

दिल्ली। भारत की सुदृढ़ आर्थिक व्यवस्था के पीछे विवाह व्यवस्था, परिवार, सनातन संस्कृति तथा धार्मिक अनुष्ठान प्रमुख है। विवाह व्यवस्था, परिवार को केंद्र में रखने का एक विशेष कारण है। परिवार की इस शक्ति पर चर्चा कम होती है। विवाह व्यवस्था से परिवार बनता है। परिवार से जिम्मेदारियां आती है, जिम्मेदारियां बचत को प्रेरित करती हैं। परिवार गहने, कैश, बैंक तथा अन्य उपक्रमों में बचत भारत को अंदर से मजबूत करता हैं। भारत की महिलाओं के श्रृंगार की पेटी में जमा रकम कठिन समय में परिवार के काम आता है। भारत में यह सामान्य घटना है। जिन देशों में परिवार का महत्व नहीं वहां सरकारों पर नागरिकों को सामाजिक सुरक्षा देने का बड़ा दबाव होता है। जिस कारण ऐसे देशों का एक बड़ा बजट इन स्कीमों पर खर्च होता है और परिवार जिम्मेदारियां से रहित हो जाता है। वहीं भारत में परिवार खुद की चिंता कुछ हद तक स्वयं करता है जिस कारण भारत में आर्थिक संकट का असर बहुतायत परिवारों पर कम पड़ता है । परिवारों द्वारा किया गया बजट उसे आर्थिक संकटों से बचाते हैं वहीं सरकारें परिवार पर खर्च करने से ज्यादा अन्य विकास कार्यों में बजट तय करती है।

वहीं मंदिर, धार्मिक प्रयोजन, धार्मिक यात्राएं / तीर्थ भारत में निहित वो शक्तियां है जो भारत की अर्थव्यवस्था को चलाने में भूमिका निभाती है। परिवार एवं धर्म ये दोनों ही कारक भारत को आर्थिक रूप से मजबूत करने में कितनी भूमिका निभाते हैं । धार्मिक अनुष्ठान तथा तीर्थ यात्राओं से बाजार में पैसे आते हैं जिससे आर्थिक गतिविधियां चलती हैं। काशी शहर का बढ़ा बजट तथा हाल ही में हुए महाकुंभ इसके ताजा उदाहरण हैं।

आर्थिक गतिविधि चलाने में इनका योगदान कितना है इसे मांपने का कोई अंतरराष्ट्रीय पैमाना है ही नहीं। जो कुछ हैं भी वो मानक सिद्धांत है, प्रमाणिक नहीं हैं। किंतु इन दोनों ही कारकों के महत्व को दुनिया समझ रही है और सदैव इन पर ही आघात करने के लिए षड्यंत्र रचे जाते हैं।

भारत को कमजोर करने वाली शक्तियां समय समय पर परिवार, विवाह व्यवस्था तथा भारतीय संस्कृति के विरुद्ध षड्यंत्र रचती हैं।

परिवार के केंद्र में महिलाएं होती हैं और धर्म के केंद्र में ब्राह्मण अथवा पंडित हैं। ब्राह्मण अपना धर्मकाज नहीं छोड़ सकते इसलिए इससे समाज ही अलग करने का षड्यंत्र होता है, इन्हें विलेन के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। महिला को परिवार से अलग करना भी कठिन है इस कारण विवाह व्यवस्था को बदनाम करने की साजिश रची जाती है। महिलाओं की स्वस्त्रता एवं आत्म निर्भरता का छलावा दिखा इन्हें परिवार से दूर करने की साजिश रची जाती है। समय समय पर My Life My Choice जैसे नारों को हवा दी जाती है। बच्चियों के बीच विवाह व्यवस्था को उसकी गुलामी का कारक के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। ये सब भारत को आर्थिक रूप से कमजोर करने की साजिश का टूलकिट है।

परिवार एवं परिवार में धार्मिक कार्य दोनों की जिम्मेवारी महिलाओं पर ज्यादा निर्भर करती है अतः महिलाओं को स्वतंत्रता का छलावा दिखा कर महिलाओं को हथियार बनाया जाता है।

इन साजिशों में भारत का स्वयंसिद्ध बौद्धिक समाज जिनकी एक विशेष विचारधारा है, अपनी तरफ से योगदान देता है।

इस गुट के सदस्य स्वयं तथा गुट के अन्य सदस्यों को बुद्धिजीवी कह कर संबोधित करते हैं, अनवरत कहते हैं और तब तक करते हैं जब तक आम आदमी भी उन्हें बुद्धिजीवी न कहने लगे। आम आदमी कहते सुनते मानने भी लगते हैं।

इनकी पुस्तकों अथवा लेखों को इस प्रकार प्रस्तुत किया जाता है कि इनकी बातों से सहमत न होने वाला निरीह मूर्ख साबित कर दिया जाता है। ऐसे बुद्धिजीवी सदैव विवाह व्यवस्था, परिवार एवं धर्म का विरोध करते नजर आते हैं इसका कारण भी भारत को कमजोर करना है। कमजोर राष्ट्र इनके फलने फूलने के लिए उत्तम परिस्थिति है, यही कारण है कि ये वर्ग धर्म एवं विवाह व्यवस्था पर चोट करता है।

समय समय पर ऐसे लोग प्लांट किए जाते हैं जो इन साजिशों की अग्नि को प्रज्वलित करते रहे। ऐसे चेहरे को समाज में स्थापित कराने के लिए स्वयंसिद्ध बुद्धिजीवियों का यह वर्ग इनकी भूरू भूरी प्रशंसा करता है, इन्हें मंच दिया जाता है। इनके सच को दबा कर इनके झूठ को इतना प्रचारित एवं प्रसारित किया जाता है कि आम जन इनकी चकाचौंध में खोकर इनकी तरह ही अपना भी विचार बना लेते हैं। इनके आलेखों को इस प्रकार प्रस्तुत किया जाता है कि पढ़ने वाला पढ़ने से पूर्व ही इसे महान रचना मन लेता है।

उदाहरण के रूप में दो व्यक्तियों को इस आलेख में समाहित कर रहा हूं। एक हैं इन दिनों सोशल मीडिया पर प्रवचन देने वाले आचार्य प्रशांत एवं दूसरे हैं लेखक राजेंद्र यादव।

आचार्य प्रशांत भारत में woke culture को प्रसारित कर रहे हैं। woke culture पश्चिम का विषदिंतर है जो भारत को अंदर से खोखला कर देगा।
प्रशांत सोशल मीडिया का सहारा लेकर परिवार एवं विवाह व्यवस्था पर आघात कर रहे हैं। महिलाओं को स्वतंत्रता का स्वप्न दिखा परिवार व्यवस्था से दूर कर रहे हैं। इनके अनुसार परिवार बनने अथवा विवाह का केवल और केवल कारण है शारीरिक भूख। इनके अनुसार विवाह महिलाओं के विरुद्ध षड्यंत्र हैं। विपत्ति काल में परिवार की महत्ता को समझने में ये अक्षम है शायद। महिलाओं को भारतीय संस्कृति को पाश्चात्य चश्में से दिखाने का प्रयास करते हुए प्रशांत भी उसी कार्य में लगे हैं जिसका एक ही ध्येय है भारत को अंदर से खोखला कर दो।

वहीं राजेंद्र यादव भारतीय संस्कृति के विरुद्ध खूब लिखते रहे हैं दोनों की एकसमान विचारधारा रही है। दोनों का लक्ष्य महिलाएं एवं नई पीढ़ी हैं, जिन्हें व्यक्तिगत स्वतंत्रता का छलावा दिखा कर मार्ग से भटकाने के कार्य में अपने अपने समय में काम कर रहे या कर चुके हैं।

इन दोनों को ही समाज में स्थापित करने के लिए इनके विचारधारा के कामरेड की एक फौज खड़ी है जो इनके सच को सामने लाने वालों पर टूट पड़ती है।

राजेंद्र यादव की पुस्तक सारा आकाश एक सटीक उदाहरण है। इन उपन्यास को दो भागों में बांटा जा सकता है। पहले अध्याय में उस हिस्से को रखा जा सकता है जिस पर ऋषिकेश मुखर्जी ने फिल्म बनाई। जब तक उपन्यास संयुक्त परिवार के किसी एक सदस्य के द्वारा किए जा रहे नाकारात्मक कार्यों को प्रमुखता देकर पूरे परिवार व्यवस्था पर ही प्रश्न चिह्न लगाए जाते हैं । वहीं उपन्यास का दूसरा अंश एक विशेष विचारधारा के प्रसार का मुखपत्र प्रतीत होता है। राजेंद्र यादव ने अपनी विचारधारा के प्रसार हेतु पहले हिस्से में पति पत्नी के प्रेम को आधार बना पाठक को पहले तो अपने वश में करते हैं ताकि पाठक उस मानसिक अवस्था में पहुंच जाए कि आगे पढ़ी जाने वाले कंटेंट में निहित विचारधारा की प्रचार सामग्री का निष्पक्ष विश्लेषण ही न कर पाए। फिर खेल शुरू होता है भारतीय संस्कृति के विरुद्ध विष प्रवाह का।

लेखक राजेंद्र यादव की पुस्तक बाद में पढ़ने को दी जाती है पहले उन्हें महान लेखक एवं उनकी रचना को महान रचना बता दिया जाता है। पाठक को इस मानसिक अवस्था में पहुंचा दिया जाता कि वह निष्पक्ष रह ही नहीं जाता। वह यह सोच कर पढ़ता है कि एक महान लेखक की एक महान रचना पढ़ रहा है। पाठन के उपरांत वो विश्लेषण भी उसी आधार पर विश्लेषण भी करता है किंतु यदि पाठक इस योगनिद्रा से बाहर आकर निष्पक्ष विश्लेषण कर भी दे तो विचारधारा के ये मौलाना टाइप बुद्धिजीवी वर्ग पाठक का चरित्र हनन करता हैं, उस पर इतने आघात होते हैं कि कोई दूसरा निष्पक्ष विश्लेषण करने की हिम्मत नहीं कर पाता।

इन उदाहरणों के बाद मुझ पर भी आघात संभव है किंतु बदले समय में अब इनका प्रभाव खत्म या कमजोर होता जा रहा है।।अतः निष्पक्ष विश्लेषण करने का उपयुक्त समय आ चुका है।

इन दोनों उदाहरणों से समझा जा सकता है कि भारत को अंदर से खोखला करने के लिए कैसे षड्यंत्र रचे जाते हैं, किसे हथियार बनाने का प्रयास चल रहा है और कैसे ऐसे लोगों को साज में झूठे प्रशंसाओं के आधार पर समाज में स्थापित किया जा रहा है। भारत को यदि शक्तिसंपन्न एवं सुदृढ़ बनाना है तो युवा को पिधिविशेषकर महिलाओं को इनसे बचने की आवश्यकता है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक के व्याख्यान (23-25 सितंबर 2025) पर मीडिया की प्रतिक्रिया

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दिल्ली। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में 23 से 25 सितंबर 2025 को नई दिल्ली के विज्ञान भवन में आयोजित तीन दिवसीय व्याख्यानमाला, जिसका शीर्षक था “100 वर्ष की संघ यात्रा: नए क्षितिज”, ने देश भर में व्यापक चर्चा उत्पन्न की। संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत के व्याख्यानों ने संगठन की विचारधारा, कार्यप्रणाली, और भविष्य की योजनाओं को स्पष्ट करने का प्रयास किया। इस आयोजन पर मीडिया में पक्ष और आलोचना दोनों देखने को मिली।पक्ष में मीडिया की प्रतिक्रिया

  1. संघ की समावेशी दृष्टि पर जोर: कई मीडिया हाउस, जैसे पाञ्चजन्य और रॉयल बुलेटिन, ने सरसंघचालक के व्याख्यानों को ऐतिहासिक और दृष्टिकोण बदलने वाला बताया। पाञ्चजन्य ने लिखा कि डॉ. भागवत ने हिंदू की परिभाषा को सांस्कृतिक और समावेशी दृष्टिकोण से प्रस्तुत किया, जिसमें उन्होंने कहा कि “हिंदू कोई जातीय या धार्मिक पहचान नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक जीवन दृष्टि है जो विविधता में एकता को बढ़ावा देती है।” इस दृष्टिकोण को कई समाचार माध्यमों ने भारत की सांस्कृतिक एकता को मजबूत करने वाला माना।
  2. सामाजिक समरसता का संदेश: NDTV ने अपने लेख में डॉ. भागवत के सामाजिक समरसता पर जोर को सराहा। उन्होंने चार गुणों—मैत्री, करुणा, मुदिता, और उपेक्षा—को संघ के सामाजिक व्यवहार का आधार बताया। यह संदेश विशेष रूप से सामाजिक तनाव और ध्रुवीकरण के दौर में सकारात्मक माना गया। NDTV ने इसे “वैकल्पिक नैतिक नेतृत्व” का प्रयास बताया।
  3. पारदर्शिता और संवादशीलता: VSK भारत और TV9 हिंदी ने संघ की बढ़ती पारदर्शिता और उत्तरदायित्व की प्रशंसा की। तीसरे दिन के प्रश्नोत्तर सत्र को विशेष रूप से रेखांकित किया गया, जहां डॉ. भागवत ने काशी-मथुरा मंदिरों जैसे संवेदनशील मुद्दों पर स्पष्टता दी, यह कहते हुए कि “संघ की कोई योजना नहीं है कि मथुरा-काशी के लिए कोई आंदोलन चलाया जाए। राम जन्मभूमि एक अपवाद था।” यह बयान संघ की संवैधानिक प्रक्रिया और न्यायपालिका में विश्वास को दर्शाता है।
  4. संघ की वैश्विक दृष्टि: पाञ्चजन्य ने डॉ. भागवत के उस बयान को उद्धृत किया जिसमें उन्होंने भारत की वैश्विक भूमिका पर जोर दिया, यह कहते हुए कि भारत ने हमेशा संयम और सेवा का मार्ग अपनाया है, चाहे वह उन लोगों की मदद हो जो भारत को नुकसान पहुंचाते हैं। यह वैश्विक दृष्टिकोण कई समाचार माध्यमों ने सराहा।

आलोचना में मीडिया की प्रतिक्रियाहालांकि, कुछ मीडिया हाउस और टिप्पणीकारों ने व्याख्यानों की आलोचना की। ये आलोचनाएं मुख्य रूप से निम्नलिखित बिंदुओं पर केंद्रित थीं:

  1. हिंदुत्व के एजेंडे पर सवाल: कुछ विपक्षी नेताओं और टिप्पणीकारों, जैसे कि X पर
    @Schandillia

    और

    @GopeshKhetan

    , ने संघ के हिंदुत्व के एजेंडे को “विभाजनकारी” करार दिया।

    @Schandillia

    ने एक पोस्ट में कहा कि संघ का दृष्टिकोण “शिक्षा जैसे पवित्र क्षेत्र को भी राजनीतिक रंग देने का प्रयास करता है।”

    @GopeshKhetan

    ने बस्तर और कश्मीर के संदर्भ में डॉ. भागवत के बयानों को ‘असत्य’ और “UAPA के तहत कार्रवाई योग्य” बताया।

  2. सामाजिक समरसता पर संदेह: कुछ समाचार माध्यमों और विश्लेषकों ने सामाजिक समरसता के दावों को “खोखला” बताया, यह कहते हुए कि संघ का हिंदू राष्ट्र का विचार दलित और आदिवासी समुदायों को अलग-थलग कर सकता है। TV9 हिंदी ने उल्लेख किया कि विपक्षी दल, विशेष रूप से कांग्रेस और राहुल गांधी, संघ के हिंदुत्व के एजेंडे को लेकर आक्रामक हैं और इसे जातिगत जनगणना और आरक्षण जैसे मुद्दों के खिलाफ मानते हैं।
  3. राजनीतिक प्रभाव पर आलोचना: कुछ आलोचकों ने व्याख्यानों को भारतीय जनता पार्टी (BJP) के लिए अप्रत्यक्ष समर्थन के रूप में देखा। X पर
    @Randeep_Sisodia

    ने तमिलनाडु में AIADMK नेता ई. पलानीस्वामी के बयानों का हवाला देते हुए कहा कि संघ और BJP के बीच गठजोड़ क्षेत्रीय दलों को कमजोर कर सकता है।

  4. संघ की मंशा पर सवाल: कुछ टिप्पणीकारों ने यह सवाल उठाया कि क्या संघ वास्तव में समावेशी है, या यह केवल अपनी छवि को नरम करने का प्रयास कर रहा है। एक लेख में यह दावा किया गया कि संघ का समावेशी दृष्टिकोण केवल ‘रणनीतिक परिपक्वता’ का हिस्सा है, न कि विचारधारा में वास्तविक बदलाव।

आलोचनाओं का जवाब

  1. हिंदुत्व के एजेंडे पर: आलोचकों द्वारा हिंदुत्व को विभाजनकारी कहना एक पुराना नैरेटिव है जो तथ्यों पर आधारित नहीं है। डॉ. भागवत ने अपने व्याख्यान में स्पष्ट किया कि हिंदू शब्द एक सांस्कृतिक पहचान है, जो सभी धर्मों और समुदायों को समाहित करता है। उन्होंने कहा, “जो सबको साथ लेकर चलता है, वह हिंदू है।” यह विचार भारत की सनातन संस्कृति की विशेषता “वसुधैव कुटुंबकम” को दर्शाता है। आलोचकों का यह दावा कि संघ शिक्षा को राजनीतिक रंग देता है, निराधार है, क्योंकि संघ की शाखाएं व्यक्तिगत चरित्र निर्माण और सामाजिक सेवा पर केंद्रित हैं, न कि राजनीतिक प्रचार पर।
  2. सामाजिक समरसता पर: आलोचकों का यह कहना कि संघ का सामाजिक समरसता का दावा खोखला है, तथ्यों से मेल नहीं खाता। TV9 हिंदी ने स्वयं उल्लेख किया कि संघ ने “एक श्मशान, एक मंदिर, एक जल स्रोत” के विचार को बढ़ावा देकर जातिगत भेदभाव को कम करने का प्रयास किया है। संघ की शाखाओं में विभिन्न जातियों और समुदायों के लोग एक साथ कार्य करते हैं, जो सामाजिक एकता का जीवंत उदाहरण है। विपक्षी दलों का जातिगत जनगणना का मुद्दा उठाना केवल राजनीतिक लाभ के लिए है, जबकि संघ का फोकस सामाजिक एकता और समरसता पर है।
  3. राजनीतिक प्रभाव पर: यह आरोप कि संघ BJP का अप्रत्यक्ष समर्थन करता है, गलत है। डॉ. भागवत ने व्याख्यान में स्पष्ट किया कि संघ एक सामाजिक-सांस्कृतिक संगठन है, जो किसी भी राजनीतिक दल का प्रत्यक्ष समर्थन नहीं करता। NDTV के अनुसार, उन्होंने सत्ता से दूरी और विचारधारा के प्रति प्रतिबद्धता पर जोर दिया। क्षेत्रीय दलों के नेताओं, जैसे ई. पलानीस्वामी, की टिप्पणियां उनकी अपनी राजनीतिक रणनीति का हिस्सा हो सकती हैं, न कि संघ की मंशा का प्रमाण।
  4. संघ की मंशा पर: यह दावा कि संघ केवल अपनी छवि को नरम करने का प्रयास कर रहा है, एक पूर्वाग्रहपूर्ण दृष्टिकोण है। संघ ने पिछले 100 वर्षों में लगातार सामाजिक सेवा, आपदा राहत, और व्यक्तिगत चरित्र निर्माण पर कार्य किया है। VSK भारत ने बताया कि संघ का संचालन गुरुदक्षिणा के माध्यम से होता है, जो इसकी स्वावलंबिता और निःस्वार्थ सेवा को दर्शाता है।

आलोचकों को उजागर करना

  • @Schandillia

    और

    @GopeshKhetan

    : इन X उपयोगकर्ताओं की टिप्पणियां तथ्यहीन और अतिशयोक्तिपूर्ण हैं।

    @Schandillia

    का यह दावा कि संघ शिक्षा को राजनीतिक रंग देता है, बिना किसी ठोस सबूत के है।

    @GopeshKhetan

    का UAPA जैसे गंभीर कानून का उल्लेख करना केवल सनसनीखेज बयानबाजी है, जो गंभीर विश्लेषण की कमी को दर्शाता है।

  • विपक्षी दल और मीडिया: कांग्रेस और राहुल गांधी जैसे नेताओं ने संघ को बार-बार निशाना बनाया है, लेकिन उनके दावों में तथ्यों की कमी रहती है। TV9 हिंदी ने स्वीकार किया कि संघ का सामाजिक समरसता अभियान प्रभावी रहा है, फिर भी विपक्ष इसे विभाजनकारी कहता है, जो उनकी राजनीतिक रणनीति का हिस्सा प्रतीत होता है।

निष्कर्षडॉ. मोहन भागवत के 23-25 सितंबर 2025 के व्याख्यानों ने संघ की विचारधारा, कार्यप्रणाली, और भविष्य की दृष्टि को स्पष्ट करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। मीडिया का एक हिस्सा, जैसे पाञ्चजन्य, NDTV, और VSK भारत, ने इसकी समावेशी और पारदर्शी दृष्टिकोण की सराहना की, जबकि कुछ आलोचकों ने इसे विभाजनकारी और रणनीतिक करार दिया। आलोचनाएं ज्यादातर पुराने नैरेटिव्स और राजनीतिक पूर्वाग्रहों पर आधारित थीं, जिनका जवाब संघ की कार्यप्रणाली और तथ्यों से आसानी से दिया जा सकता है। संघ की यह व्याख्यानमाला न केवल इसके शताब्दी वर्ष का उत्सव थी, बल्कि समाज के साथ संवाद और गलतफहमियों को दूर करने

बांध के पानी पर अहंकार, बाढ़ में डूबा पंजाब

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चंडीगढ़। पंजाब में आई भयंकर बाढ़ ने पंजाब सरकार के एक गलत फैसले को उजागर किया है, जो उसकी अदूरदर्शिता और राजनीतिक हठ को दर्शाता है। भाखड़ा बांध प्रबंधन बोर्ड (बीबीएमबी) ने अप्रैल 2025 में बांध से पानी छोड़ने की सलाह दी थी ताकि बाढ़ का खतरा टाला जा सके। विशेषज्ञों ने चेतावनी दी थी कि बांध में पानी का स्तर खतरनाक हो सकता है। लेकिन पंजाब सरकार ने इस सलाह को ठुकराते हुए पानी को सिर्फ अपने राज्य के लिए इस्तेमाल करने की मांग की और हरियाणा व राजस्थान के साथ साझा करने से इनकार कर दिया। एक मंत्री ने तो बांध पर कब्जे की धमकी तक दे डाली।
इस गलत फैसले का नतीजा अब सामने है। भारी बारिश के बाद बांध से 20,000 क्यूसेक से अधिक पानी छोड़ना पड़ा, जिससे पंजाब के कई इलाके बाढ़ की चपेट में आ गए। अप्रैल में बीबीएमबी ने केवल 4,300 क्यूसेक पानी छोड़ने का सुझाव दिया था, लेकिन सरकार के दबाव में यह नहीं हुआ। अब बाढ़ ने फसलों को तबाह कर दिया, घर डूब गए, और लोग विस्थापन का दर्द झेल रहे हैं। अनुमान के मुताबिक, अकेले फसलों का नुकसान 50,000 करोड़ रुपये से अधिक का है।
पंजाब सरकार का यह रवैया उसके दोहरे चरित्र को दर्शाता है। एक तरफ वह किसानों और जनता की भलाई की बात करती है, दूसरी तरफ विशेषज्ञों की सलाह को नजरअंदाज कर अपने ही लोगों को संकट में डाल दिया। यह फैसला न केवल तकनीकी भूल थी, बल्कि राजनीतिक अहंकार का भी परिणाम था। भगवंत मान सरकार की यह नादानी पंजाब की जनता को भारी पड़ रही है।
यह घटना सिखाती है कि प्रशासन को भावनाओं और राजनीति से ऊपर उठकर तर्क और विज्ञान पर आधारित फैसले लेने चाहिए। यदि सरकार समय पर विशेषज्ञों की सलाह मान लेती, तो शायद यह तबाही टाली जा सकती थी। अब, जब हालात बेकाबू हो चुके हैं, सरकार को अपनी गलती का एहसास हो रहा होगा, लेकिन इसका खामियाजा जनता भुगत रही है। भविष्य में ऐसे फैसलों से बचने के लिए दूरदर्शिता और जिम्मेदारी जरूरी है।

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