धुरंधर है या बवंडर! प्रोपेगेंडा या सच?

Dhurandhar-2.avif

विष्णु शर्मा

दिल्ली। धुरंधर 2 को लेकर उसके विरोधी भी इस एक बात पर तो सहमत हैं कि ये मूवी नहीं बवंडर है, बॉक्स ऑफिस पर सुनामी ला रही है और कई सारे रिकॉर्ड्स तोड़ने वाली है. वैसे इसमें जितना इसके कलाकारों, लेखक, निर्देशक और प्रशंसकों को श्रेय जाएगा, इसके विरोधियों को भी मिलेगा क्योंकि बिना फ़िल्म समीक्षकों और प्रमोशन के गालियाँ दे देकर उन्होंने इस मूवी को घर घर की चर्चा बना दिया है.

पहले जान लेते हैं कि लोग इस मूवी से क्यों दुखी हैं? क्योंकि एक तो इसमें मोदी जी हैं, नोटबंदी का ऐलान कर रहे हैं. फिर इसमें नोटबंदी क्यों की गई, उसका कनेक्शन ISI की नकली नोटों की साजिश को नेस्तनाबूद करने से जोड़ा गया है. हालांकि फ़िल्म में नोटबंदी से हुई परेशानियों और बैंक मैनेजर्स के गोलमाल के चलते सरकार द्वारा उसे उपलब्धि ना मानने का ज़िक्र नहीं. सो उनके इस दुख में कुछ मोदी जी के प्रशंसक भी हैं.

दूसरा दुख जिसे ढंग से व्यक्त नहीं कर पा रहे, वो है माफिया अतीक अहमद का कनेक्शन ISI से दिखाना और रॉ द्वारा उसे मरवाना. ‘सदियों तलक कोई अतीक अहमद नहीं होगा’ गाने वाले सांसद शायर तो शॉक में ग़ायब ही हो गए हैं. लेकिन ‘धुरंधर 2’ ने ऐसे इंतज़ाम कर दिए हैं कि दोबारा हो भी नहीं. ईद से पहले कुछ लोग इस बात से भी नाराज हैं कि एंटी मुस्लिम फ़िल्म दिखायी गई और इसमें दाऊद इब्राहिम यानी बड़े साहब और अतीक अहमद के किरदार दो मुस्लिम कलाकारों ने ही किए हैं. सब पर भारी पड़ते दिखे हैं अतीक का रोल करने वाले सलीम सिद्दीकी, जितनी देर स्क्रीन पर रहे, लोगों के चेहरे पर मुस्कान थी और पलक यहीं झपकाईं. हालांकि पुलिस की चार्जशीट में अतीक का कुबूलनामा ISI से रिश्तों का खुलासा करता है.

एक और आरोप है कि काल्पनिक घटनाओं को भी सच्चे की तरह प्रस्तुत किया गया. जबकि सच ये है कि एक काल्पनिक किरदार जसकीरत सिंह रांगी यानी हमजा अली मदारी )रणवीर सिंह) के बहाने कई सारी सच्ची घटनाओं को जोड़कर ये मूवी बनाई गई है. हालांकि कुछ शरारतें भी हैं, जैसे जमील जमाली (राकेश बेदी) के किरदार का क्लाइमेक्स में जबरदस्त खुलासा . इससे पाकिस्तान में असली वाले नेताजी परेशान हो गए हैं कि अब बड़े साहब भी उन पर शक करने लगेंगे.

अब जानिये मूवी में ऐसा क्या है कि ये पहली वाली से भी बेहतर होने जा रही है. पहली मूवी में अक्षय खन्ना और काफ़ी हद तक संजय दत्त भी लोगों को पसंद आए थे, इस चक्कर में रणवीर का किरदार दबता सा लगा था, हालांकि वो स्क्रिप्ट की माँग थी. ‘धुरंधर 2’ रणवीर के रोल को ‘लार्जर देन लाइफ’ बना देती है. पहले सीन से ही रणवीर ‘एनिमल’ के रणबीर को मात देते दिखते हैं. इमोशनल से लेकर रोमांटिक और फाइट सीन्स तक रणवीर सिंह में आप फिर से ‘बाजीराव’ को देखते हैं.

मूवी का एक बेहतरीन हिस्सा है गुमनाम बंदूकधारियों का पाकिस्तान में आतंक, एक एक करके उन सारी आतंकी हरकतों के बदले लिए गए जो उन्होंने भारत में अंजाम दी थीं. रुपेन कात्याल के हत्यारे के मुंह से जिस तरह अजीत डोभाल बने अजय सान्याल (माधवन) ने लाइव चैट पर ‘भारत माता की जय’ कहलवाया, थिएटर तालियों से गूंज गया. बलूचों का जो इस्तेमाल इस मूवी में दिखा है, वो रियल से कम नहीं लगता. लियारी की गैंगवार का लाइव वीडियो कई साल से वायरल था, वो भी पर्दे पर दिखी. ऐसे में आम देशभक्त भारतीयों को पाकिस्तान की राजनीति, गैंगवार को इतनी बारीकी से समझने का मौक़ा पहली बार मिला है. इसके लिए आदित्य राज कौल की रिसर्च और आदित्य धर के निर्देशन जॉय स्टैंडिंग ओविएशन बनता ही है. ख़ास तौर पर जस्सी के पहले जीवन को शानदार तरीके से दिखाना. रणवीर का किरदार जितना रियल दिखाया गया था, उससे वो इसी दुनिया का लगा. उसके अलावा पिंडा के रोल में उदयवीर संधू और दाऊद के रोल में दानिश इकबाल प्रभावित करते हैं. आलम के रोल में गौरव गेरा का रोल तो पहली के मुक़ाबले और भी बढ़िया था.

पाकिस्तान पर जब भी कोई मूवी बनती है, तो भारत में एक बड़ा तबका रहा है जो उसे आतंकी अड्डे वाला देश दिखाने से बचता है, बल्कि मैं हूँ ना, बजरंगी भाईजान या टाइगर सीरीज की तरह अमन पसंद और आतंक का भुक्तभोगी दिखाने में ज़्यादा दिलचस्पी रखता है. ऐसे में ये पाकिस्तान की ये ठेठ आतंकी तस्वीर उन्हें विचलित करती है.

ये सही है कि इस दूसरी मूवी में अक्षय खन्ना के एंट्री सॉंग जैसा कोई गाना नहीं बन पाया लेकिन ये भी सच है कि ये मूवी पहली वाली से बेहतर है. बावजूद उसके मूवी कई बड़े मुद्दों-घटनाओं को छोड़ती हुई आगे बढ़ती है. अतीक अहमद तो लिया लेकिन मुख्तार अंसारी, इंडियन मुजाहिदीन बनाकर देश भर में बम धमाके करने वाले भटकल भाइयों को छोड़ दिया. देश की उस अजेंडख़ोर विद्वान जमात का भी कुछ नहीं दिखाया जो पाकिस्तान परस्ती में अपने देश की हर अच्छी बात का विरोध करती है. मूवी कश्मीर भी नहीं जाती जबकि उसी समय जमशेद ख़ान के स्टिंग ऑपरेशन से पूरी हुर्रियत के कारनामों के खुलासे के बाद उसका बोरिया बिस्तर बांध गया था. फ़िल्म ऐसे लोगों के बारे में भी कुछ नहीं कहती जो देश के हर संवेदनशील ठिकाने पर सीसीटीवी कैमरा लगाकर उसकी लाइव फीड पाकिस्तान में दे रहे है.

Star Rating: 4.5

बावजूद इसके मूवी आपको 3 घंटे 40 मिनट तक पलकें भी झपकाने नहीं देती. रही बात म्यूजिक की तो कई पुराने गाने जैसे हम प्यार करने वाले.., ओये ओये, बाजीगर ओ बाजीगर जैसे गाने आनंद देते हैं. संजय दत्त (एसपी असलम) की मैयत पर बजा उनका ही गाना तम्मा तम्मा लोगे.. लोगों के चेहरों पर दिलचस्प मुस्कान लाता है. महिला किरदार थोड़ी थोड़ी देर के लिए आयीं लेकिन दमदारी के साथ. गोरी भाभी ने इस बार हमजा के थप्पड़ लगाया, तो निर्देशक आदित्य की पत्नी याम्मी गौतम धर आरके आतंकी को सजा देने आयीं और सारा अर्जुन पर हमजा की असलियत खुलने के बाद की प्रतिक्रिया देखने लायक थी. अंत में मूवी के विलेन अर्जुन रामपाल का जिक्र जरूरी है, क्योंकि उन्हीं हीरो के कद के बराबर ही विलेन को खतरनाक बनाये रखा. सो उनकी मौत का सीन भी काफ़ी खतरनाक रखा गया है. हालाकि क्लाइमेक्स में राकेश बेदी सब पर भारी पड़ते हैं.

कांग्रेसी होने की मेरी इच्छा

images-2.png

आचार्य श्रीहरि

दिल्ली । घोर आश्चर्य ,भीषण आश्चर्य, आत्मघाती आश्चर्य, समर्पण कारी आश्चर्य, विश्वास घात का आश्चर्य, वैचारिक पतंग का आश्चर्य, नैतिक पतन का आश्चर्य, रंगबदलू दलबदलू, विश्वास घाती आदि यही सब मेरे खिलाफ बका जा रहा है, बोला जा रहा है , प्रचारित किया जा रहा है। इतना ही नहीं बल्कि मुझे धमकियां भी मिल रही हैं कि बर्बाद हो जाओगे, कीड़े मकोड़े की तरह मारे जाओगे, हाशिए पर फेक दिए जाएंगे, बात करने वाला भी कोई नहीं मिलेगा, कुत्ते बिल्ली की मौत होगी। इसके अलावा मुझ पर हिंदुत्व से गद्दारी करने, घुसपैठिए होकर राष्ट्रवादी हिंदूवादी होने का ढोंग रचने का भी आरोप लग रहा है। इन सभी नकारात्मक भावनाओं और प्रतिक्रियाओं से मेरा अटल विचार और सक्रियताए न तो प्रभावित होती हैं और न हीं रुकती है, खतरों से खेलना, आग के ऊपर चलना, बिल्ली के गले में घंटी बांधना, दुश्मन के दांव में जाकर मार करना, मेरा प्रिय स्वभाव और कर्म है, चट्टानों , समुद्र के लहरों से टकरा टकरा कर जितना या फिर टकरा टकरा कर चूर चूर हो जाना मेरी नियति रही है।

मेरा अपराध क्या है? मेरा दोष क्या है? मेरा कर्म क्या है? क्या मैं सही में इस तरह के आरोपों का पात्र हूं? क्या सही में मैं इस तरह लांछनों का अभियुक्त हूं? मेरा अपराध, मेरा दोष, मेरा कर्म भी देख लीजिए, मेरा अपराध, मेरा दोष, मेरा कर्म सिर्फ इतना है कि मैने कांग्रेस से चुनाव लड़ने का आत्म फैसला ले लिया, आत्म निर्णय ले लिया। अब यहां यह प्रश्न उठता है कि हमने कांग्रेस से चुनाव लड़ने का फैसला और निर्णय क्यों लिया? मुझसे वजहें पूछी जा रही है, कारण पूछा जा रहा है। व्यक्ति की स्वतंत्रता अच्छुन्न होती है, दबाव रहित होती है और नैसर्गिक होती है। कोई भी व्यक्ति इस तरह का आत्म निर्णय लेने पात्र होता है, अपना राज और अपनी नीति हमेशा गोपनीय होती है। मै बाध्य नहीं हूं कि यह बताऊं कि हमने कांग्रेस से चुनाव लड़ने का निर्णय क्यों लिया? मुझे कोई बाध्य भी नहीं कर सकता है।

मैं कौन हूं ? यह मुझे भी नहीं मालूम है। मै सिर्फ इतना जानता हूं कि मैं एक साधारण मनुष्य हूं, मै कोई हैसियत वाला मनुष्य नहीं हूं, मै अपने परिश्रम का भी उचित मजदूरी लेने में नाकाम रहा, अपने परिश्रम का सम्मान लेने से भी वंचित रहा। सब कुछ सीखा हमने ना सीखी होशियारी

सच है दुनियावालों कि हम हैं अनाड़ी, बस इसी मंत्र के साथ दौड़ता चला गया, न मुड़कर देखा और ना ही आराम किया।कालनेमियो की धमाचौकड़ी के मकड़जाल को तोड़ा, उनकी लालच, उनकी सहानुभूति, उनके शब्दजाल के बहकावे मे नहीं फसा, अकेला था, अकेला ही लड़ा, ना कोई दोस्त बना और ना ही कोई हितैषी बना, जब आप किसी के हित को संरक्षित नहीं करते हैं, किसी के लालच को तुष्ट नहीं करते हैं, किसी के लिए चांद सितारे की मानसिकता की सवारी नहीं कराते हैं तो फिर आप बेकार मनुष्य हैं, निरर्थक मनुष्य हैं, धरती के बोझ है, मनुष्य के नाम पर कलंक है, ऐसे चरित्र और कर्म के मनुष्य का कोई दोस्त या हितैषी हो ही नहीं सकते हैं, ऐसे चरित्र और कर्म के मनुष्य सिर्फ और सिर्फ अपमान, तिरस्कार, उपेक्षा और कलंक के पात्र बना दिए जाते हैं। मैने अपनी जिंदगी ना जाने कितने बार, कसूरहीन,बेवजह अपमान, तिरस्कार, उपेक्षा, कलंक का दंश झेला, इसकी कोई गिनती नहीं है, फिर भी मै डिगा नहीं , कोई चिंता या अवसाद नहीं, क्योंकि मैने ऐसी जिंदगी खुद चुनी थी, मैने राष्ट्र और सनातन के प्रहरी बनना, संरक्षक बनना स्वयं चुना था, ब्रह्मचर्य रहकर जिंदगी का बलिदान कर देना मेरा खुद लक्ष्य था तो फिर मलाल कैसा?

कांग्रेस मुझे अपनी पार्टी में शामिल क्यों करेगी, मुझे चुनाव का टिकट कांग्रेस क्यों देगी, मैने तो जिंदगी भर कांग्रेस की कब्र खोदी है , कांग्रेस को नंगा किया है, कांग्रेस के सनातन विरोधी नीतियों को उजागर किया है, जाने अनजाने में संघ और बीजेपी के एजेंडे को आगे बढ़ाने का काम किया है। ये सभी बातें सौ आने सही हैं, दुरुस्त हैं, मै जन्मजात कांग्रेस विरोधी रहा हूँ, कांग्रेस विरोध का खून मेरे रगो में दौड़ता रहा है, मेरा पूरा खानदान ही कांग्रेस विरोधी रहा है, कांग्रेस विरोध का ज्ञान हमने परिवार से ही सीखा है। मैने इमरजेंसी देखी थी, सिख दंगा देखा था, कश्मीर में सनातनियों का संहार देखा है, उनका कत्लेआम देखा है, मैने गोधरा नरसंहार को देखा है, कारसेवकों की वीभत्स और छत विक्षत शवों को देखा था, मैने गोधरा कारसेवकों के नरसंहार पर सोनिया गांधी और अन्य कांग्रेसियों का अतिरंजित और अपमान जनक बयानबाजी देखी है, हिंदू कारसेवक मरने लायक थे और मर गए, ऐसी कांग्रेसी मानसिकता देखी है, गुजरात दंगों को लेकर हिंदुओं को दंगाई कहने, हिन्दुओं को मौत का सौदागर कहने वाली बयानबाजी देखी है, देश को हिंदुओं से खतरे की राहुल गांधी की बात मैने सुनी है, मैने भारत विखंडन की कांग्रेसी करतूत पढ़ी है, मैने भारत विखंडन में दस लाख से अधिक हिंदुओं के कत्लेआम को पढ़ा है, मैने डायरेक्ट एक्शन को पढ़ा है, मैने हिंदू विरोधी संविधान को पढ़ा है, फिर मै कांग्रेस विरोधी क्यों नहीं होता, कांग्रेस विरोधी होने के पीछे की मेरी कहानी यही है।

हिंदू कौन हैं? इस पर मेरी समझ अपनी अलग है और बनी बनाई अवधारणा से बहुत भिन्न है। मात्र भगवा रंग पहनने वाले हिंदू कदापि नहीं है,मंदिर जाने वाले सभी लोग हिंदू नहीं होते हैं, प्रति दिन करोड़ों लोग मंदिर जाते हैं पर वे लालची, ढोंगी, मनोरंजन कारी होते हैं, आप इन्हें उसी मंदिर की सुरक्षा के लिए आमन्त्रित कीजिए, पांच लोग भी सामने नहीं आयेंगे। इसीलिए मैं मंदिर जाकर नाचने गाने वाले लोगों को हिंदू नहीं मानता हूं। हिंदू तो वीर शिवाजी थे, जिन्होंने मुगलों की ताकत तलवारों पर तोली थी, हिंदू तो वीर सावरकर थे, जिन्होंने हिंदुओं को चिरवायु होने, सुरक्षित होने का मंत्र दिया था, हिंदुओं का सैन्यीकरण और राजनीति का हिंदूकरण का सिद्धांत दिया था, हिंदू सिर्फ इसी सिद्धांत पर चलकर बच सकते हैं, मै इसी सिद्धांत का सारथी हूं। हिंदू तो बिरसा मुंडा थे, जिन्होंने अंग्रेजों और ईसाई मिशनरियों को भगाने के लिए हूलगुलान शुरू किया था। शेष सभी नाममात्र के कालनेमी हिंदू हैं।

कांग्रेस एक अंग्रेज ए यू ह्यूम के वीर्य से पैदा लेकर अपने आप को भारत के विरासत होने का दावा कर सकती है? क्या यह सही नहीं है कि कांग्रेस की स्थापना एक अंग्रेज ए यू ह्यूम ने अंग्रेजी शासन की दलाली के लिए की थी। एक ढोंगी, हिंसक और मुस्लिम परस्ती के लिए कुख्यात महात्मा गांधी को राष्ट्रपिता घोषित कांग्रेस कर सकती है। क्या महात्मा गांधी ने खिलाफत आंदोलन को समर्थन नहीं दिया था, क्या महात्मा गांधी ने दूसरे विश्व युद्ध में अंग्रेजों की सुरक्षा के लिए भारतीय सैनिकों को भेजने का समर्थन नहीं किया था? कांग्रेस उस मुस्लिम लीग से दोस्ती कर चुनाव लड़ सकती हैं, मुस्लिम लीग की चरण वंदना कर सकती है जिस मुस्लिम लीग ने भारत विभाजन कराई थी। कश्मीर में सनातनियों का संहार और कत्लेआम करने वाले मुस्लिम आतंकियों को कांग्रेस में शामिल करा सकती है , उनकी चरण वंदना कर सकती है, तमाम तरह के हिंदू विरोधी मुसलमानों और ईसाइयों के लिए कांग्रेस अपने घर में जगह बना सकती है और सम्मान दे सकती है, हिन्दुओं के अस्तित्व संहार के लिए कुख्यात और हिंसक गिरोहों को साथ रख सकती हैं, उन्हें मंत्री बना सकती है, सांसद बना सकती है, कांग्रेस को हिंदुओं की पार्टी कहने वाले जिन्ना के औलादों को कांग्रेस गले लगा सकती है तो फिर सिर्फ हिंदुओं से ही कांग्रेस को दुश्मनी क्यों रखनी चाहिए? कांग्रेस को मेरे जैसे पक्के हिंदूवादी, राष्ट्रवादी शख्सियत को गले लगाने में झिझक नहीं होनी चाहिए।

कांग्रेस को लाभ क्या है? स्वतंत्र भारत में कांग्रेस ने आज तक एक भी पक्के, निडर हिंदू को जगह नहीं दी है, हिंदुत्व के नाम पर सेक्युलर और कालनेमी हिंदुओं को स्थापित किया है जो सिर्फ हिंदुओं की कब्र ही खोदी है, मुस्लिम और ईसाई अस्मिताओं का ही संरक्षण किया है। कांग्रेस को मै एक दृष्टि देता हूं। नरेंद्र मोदी ने हिंदू विरोधियों को भी गले लगाया, कांग्रेसियों को तोड़ तोड़ कर अपनी पार्टी समृद्ध की है। हेमंता शर्मा को मुख्यमंत्री बनाया, जगदीप धनकड़ को उप राष्ट्रपति बनाया, आज की तारीख में बीजेपी के 60 प्रतिशत सांसद घुसपैठिए, दलबदलू, हिंदू विरोधी है। ठीक इसी प्रकार मेरे जैसे पक्के निडर हिंदू वादी, राष्ट्रवादी को स्थापित कर कांग्रेस अपना हिंदू विरोधी पाप, कलंक धो सकती है, अपनी खोई हुई खानदानी सत्ता हासिल कर सकती है, अब हिंदू समर्थन के बिना कांग्रेस को सत्ता कदापि नहीं मिल मिलेगी, इसलिए कांग्रेस को हिंदुओं के साथ दुश्मनी समाप्त करनी ही होगी। इस प्रश्न पर कांग्रेस मेरे साथ वार्ता रणनीति की रहा पर चल रही है।

शिवाजी कॉलेज में शतावरी: भारत की आयुर्वेदिक विरासत का पुनर्जीवन विषयक राष्ट्रीय सम्मेलन का भव्य उद्घाटन

2-1-6.jpeg

दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रतिष्ठित शिवाजी कॉलेज में 16 मार्च को *शतावरी भारत की आयुर्वेदिक विरासत का पुनर्जीवन* विषयक दो दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन एवं कार्यशाला का भव्य उद्घाटन हुआ।यह सम्मेलन राष्ट्रीय औषधीय पादप बोर्ड आयुष मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा प्रायोजित है। सम्मेलन की मुख्य थीम आयुष मंत्रालय की ही राष्ट्रीय पहल शतावरी बेहतर स्वास्थ्य के लिए के साथ जुड़ी है जिसका लक्ष्य है शतावरी औषधीय पौधे के संबंध में जागरूकता, वैज्ञानिक शोध और सतत कृषि को बढ़ावा देना। जो भारतीय पारंपरिक चिकित्सा प्रणाली के रूप में बड़े पैमाने पर उपयोग होती है।

सम्मेलन में विशिष्ट अतिथि एवं मुख्य अतिथि का स्वागत करते हुए शिवाजी कॉलेज के प्राचार्य प्रोफेसर वीरेंद्र भारद्वाज ने इस कार्यक्रम की सफलता, महत्व एवं संभावनाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि इस तरह के सम्मेलन न केवल किसी एक औषधीय पौधे शतावरी के माध्यम से भारत की उन्नत और समृद्ध औषधीय एवं आयुर्वेदिक परंपरा को स्थापित करते हैं बल्कि भारतीय ज्ञान परंपरा की वर्तमान और समकालीन प्रासंगिकता को भी दर्शाते हैं। इस संगोष्ठी और कार्यशाला की महत्ता इस बात में भी निहित है कि यह अकादमिक अभियान से अधिक एक सामाजिक जागरूकता अभियान बने। सम्मेलन के उद्घाटन सत्र में बतौर मुख्य अतिथि के रूप में अपनी बात रखते हुए राष्ट्रीय औषधीय पादप बोर्ड के मुख्य कार्यकारी अधिकारी प्रोफेसर महेश कुमार दाधीच ने कहा कि हमने हमेशा दवा के साथ खान पान और रहन सहन पर बल दिया है। उन्होंने आगे कहा कि लोग कहते हैं नाम में कुछ नहीं रखा लेकिन हमारे शास्त्रों में किसी भी शब्द को निरर्थक नहीं माना गया है। हमने आंवला, मोरिंगा, अश्वगंधा और अब शतावरी के औषधीय गुणों को जन जन तक पहुंचाने के लिए अभियान चलाया है। आने वाला समय प्राकृतिक चिकित्सा का होगा। इसलिए आयुर्वेद और प्राकृतिक चिकित्सा पद्धति की ओर लौटने की जरूरत है।

सम्मेलन में बतौर विशिष्ट अतिथि एवं अखिल भारतीय आयुर्वेद संस्थान के निदेशक प्रदीप कुमार प्रजापति ने छत्रपति शिवाजी महाराज की महान परंपरा और विरासत का उल्लेख करते हुए शतावरी को एक सदाबहार पौधा बताया जो बारह महीने हरा रहता है।

इस दो दिवसीय कार्यशाला एवं सम्मेलन में अलग-अलग क्षेत्र से विशेषज्ञ, शोधार्थी, विद्यार्थी एकेडमिक और औद्योगिक जगत के जाने माने एंटरप्रेन्योर्स एवं छात्रों ने भागीदारी की। शतावरी एवं औषधीय पौधों से संबंधित लगभग अस्सी पोस्टर प्रस्तुती हुई। यह सम्मेलन अपनी वैज्ञानिक कृषि और व्यावसायिक पहलुओं पर बातचीत करने के लिए एक महत्वपूर्ण मंच के रूप में स्थापित हुआ जहां आयुर्वेद, फार्मा, कृषि विज्ञान जीव विज्ञान, वनस्पति विज्ञान, स्वास्थ्य विज्ञान जैसे अलग-अलग क्षेत्र के विशिष्ट विद्वानों ने अपने ज्ञान और शोध का आदान प्रदान किया। प्राचार्य एवं अतिथियों द्वारा कॉलेज के हर्बल गार्डन में शतावरी पौधों का रोपण किया गया। सम्मेलन में स्वागत उद्बोधन सम्मेलन की संयोजक डॉ. स्मिता त्रिपाठी ने एवं धन्यवाद ज्ञापन आयोजन सचिव डॉ. अनुराग द्वारा किया गया।

पानी का हक: सांस जितना जरूरी, अब कानून में भी दर्ज हो!

Delhi-The-water-level-in-the-Yamuna-river-crossed-the-danger-mark-of-205.33-metres-jpg.webp

दिल्ली । विश्व जल दिवस है, 22 मार्च 2026 को। इस बार का मुद्दा है जल और लैंगिक समानता, Water and Gender।
मतलब साफ है, पानी की कमी सबसे ज्यादा औरतों और लड़कियों पर भारी पड़ती है।

दुनिया भर में जहां साफ पानी और शौचालय की कमी है, वहां असमानता और बढ़ती है, और सबसे ज्यादा बोझ महिलाओं पर।
लेकिन भारत में यह सिर्फ एक दिन की बात नहीं, यह रोज की जंग है। एक दिन भाषण, फोटो, पोस्टर, और फिर वही खामोशी। अब वक्त आ गया है कि हम चुप न रहें। सवाल सीधा है, पानी भीख है या हक?

हवा पर कोई मीटर नहीं, कोई टैक्स नहीं, कोई ताला नहीं। क्योंकि बिना हवा के जीवन खत्म। पानी भी तो उतना ही जरूरी है। बिना पानी के जीवन नहीं चलता। फिर क्यों पानी को बाजार में बेचा जा रहा है? बोतल में बंद, दाम लगाकर। जो अमीर है, वह खरीद लेता है। जो गरीब है, वह गंदा पानी पीकर बीमार पड़ता है, मौत के मुंह में जाता है। यह इंसानियत के खिलाफ है। पानी सार्वजनिक संपत्ति है, जन-धन है। इसे मुनाफे की चीज नहीं बनाया जा सकता।

सच कड़वा है। भारत में 18 प्रतिशत दुनिया की आबादी है, लेकिन सिर्फ 4 प्रतिशत मीठा पानी हमारे पास। करीब 60 करोड़ लोग उच्च से अत्यधिक जल-तनाव में जी रहे हैं। भूजल तेजी से खत्म हो रहा है।

हम दुनिया में सबसे ज्यादा भूजल निकालने वाले देश हैं। पानी की प्रति व्यक्ति उपलब्धता गिरकर 1400 घन मीटर के आसपास पहुंच गई है, जो जल-तनाव की सीमा से नीचे है। नदियां नाले बन चुकी हैं। हैंडपंप जहर उगलते हैं। शहरों में टैंकर माफिया राज करता है।

दिल्ली हो या लखनऊ, आगरा हो या मुरादाबाद, कहानी एक जैसी है। 40 प्रतिशत पानी पाइपलाइनों में लीक हो जाता है। मौसम बेकाबू, बेमौसम बारिश, झुलसाती गर्मी, कमजोर मानसून। यह सिर्फ पर्यावरण का मुद्दा नहीं रहा। यह अर्थव्यवस्था का संकट है, स्वास्थ्य का विस्फोट है, सामाजिक अस्थिरता का संकेत है।

सबसे ज्यादा चोट किसे लगती है? गरीब को, औरत को, बच्चे को, हाशिए पर खड़े समाज को। गांवों में औरतें आज भी मटके सिर पर रखकर मीलों चलती हैं। समय गंवाती हैं, स्वास्थ्य गंवाती हैं, स्कूल जाने वाली लड़कियां पढ़ाई छोड़ देती हैं। गंदा पानी दस्त, हैजा, टाइफाइड लाता है। हर साल लाखों बच्चे ऐसी बीमारियों से मरते हैं, जिन्हें एक गिलास साफ पानी रोक सकता था। यह त्रासदी नहीं, अपराध है। और यह अपराध रोका जा सकता है।
अब एक उम्मीद की किरण है, जल जीवन मिशन। 2019 में शुरू हुआ था। टैप तो लग गए, लेकिन फंक्शनल? नियमित पानी? साफ पानी? कई जगहों पर अभी कमी है। भूजल गिर रहा है, प्रदूषण बढ़ रहा है। मिशन 2028 तक बढ़ा दिया गया है, बजट भी बढ़ा है। लेकिन अब जरूरत है कि सिर्फ कनेक्शन नहीं, असली जल सुरक्षा हो, हर बूंद का हिसाब, हर घर में नियमित, साफ पानी।

समाधान भावना में नहीं, डेटा और तकनीक में है। कल्पना कीजिए, हर पाइप पर स्मार्ट मीटर। रियल-टाइम डैशबोर्ड बताए कि कहां पानी खत्म होने वाला है। एआई अवैध बोरवेल पकड़े। एल्गोरिदम तय करे कि किसे कितना पानी मिले, ताकि कोई प्यासा न रहे। सिंगापुर ने करके दिखाया, केप टाउन ने घबराहट को प्रबंधन में बदला। हम क्यों नहीं?

लेकिन असली लड़ाई शासन की है। बांध-नहर की पुरानी राजनीति बंद हो। मांग को काबू करना होगा। पानी की असली कीमत तय करनी होगी, कड़वी लेकिन जरूरी। प्रदूषण पर सख्त सजा। स्थानीय निकायों को डेटा, अधिकार, संसाधन दो। समुदाय को ताकत दो।

वरना क्या होगा? अमीर टैंकर मंगाएंगे। गरीब कतार में खड़े रहेंगे। बीमारियां फैलेंगी। उद्योग ठप होंगे। समाज दरक जाएगा। समय भाग रहा है। सलाहें मरहम हैं, जख्म गहरा है। 60 करोड़ लोग इंतजार नहीं कर सकते।

पानी अब दया नहीं, अधिकार है। सांस जितना जरूरी हक। विश्व जल दिवस सिर्फ याद दिलाने का नहीं, फैसला लेने का दिन है। सरकारें मजबूत नीतियां बनाएं। बजट लगे। जवाबदेही तय हो। हर घर तक साफ पानी पहुंचे। जल स्रोत सुरक्षित हों। वितरण बराबरी से हो। औरतों की आवाज सुनी जाए, उनकी अगुवाई हो।

यह कोई योजना नहीं, यह अधिकार है। इसे कानून में, नीति में, जमीन पर सच बनाओ। वरना अगली बार नल नहीं सूखेंगे, पूरी व्यवस्था सूख जाएगी। पानी का हक बनाओ कानून। अब वक्त है। कल बहुत देर हो जाएगी।

scroll to top