बांग्लादेश में मंदिर निर्माण पर रोक और चयनात्मक वैश्विक विमर्श

Bangladesh_Hindu_Attack_1723394593214_1723394593537.JPG.webp
अखिलेश चौधरी

सिलचर (असम) : दक्षिण एशिया में राजनीतिक परिवर्तन और बढ़ती कट्टरता के बीच बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों, विशेषकर हिन्दू समाज की स्थिति एक बार फिर गम्भीर चिन्ता का विषय बन गई है। हाल ही में बांग्लादेश के गाइबांधा जिले के पलाशबाड़ी क्षेत्र में निर्माणाधीन श्री श्री राधा गोविन्द एवं काली मन्दिर परिसर में भगवान राम की विशाल प्रतिमा और एक सांस्कृतिक परिसर के निर्माण कार्य को रोक दिया गया। इस घटनाक्रम ने धार्मिक स्वतंत्रता, प्रशासन की भूमिका और वैश्विक मानवाधिकार विमर्श की निष्पक्षता पर अनेक प्रश्न खड़े कर दिए हैं।

️ *क्या है पूरा विवाद?*

गाइबांधा के पलाशबाड़ी उपजिला में स्थित श्री श्री राधा गोविन्द एवं काली मन्दिर परिसर में एक विशाल धार्मिक-सांस्कृतिक केंद्र का निर्माण किया जा रहा था। इस परियोजना का उद्देश्य सनातन संस्कृति की झलक प्रस्तुत करना था। परिसर में भगवान राम, भगवान कृष्ण, भगवान शिव सहित लगभग 144 देवी-देवताओं की प्रतिमाओं की स्थापना की योजना थी।

सामाजिक माध्यमों पर निर्माणाधीन विशाल राम प्रतिमा के चित्र सामने आने के बाद कुछ कट्टरपन्थी संगठनों ने इसका विरोध प्रारम्भ कर दिया और कानून-व्यवस्था बिगड़ने की चेतावनियाँ दीं। उपलब्ध समाचार रिपोर्टों के अनुसार, विरोध कर रहे तत्वों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई करने के बजाय स्थानीय प्रशासन ने मन्दिर परिसर में चल रहे मूर्तिनिर्माण कार्य को ही रोकने का निर्देश दे दिया। प्रशासन के इस आदेश के बाद मन्दिर समिति को निर्माण कार्य स्थगित करना पड़ा। मन्दिर के सलाहकार श्यामल कुमार महन्त ने पुष्टि की कि प्रशासनिक निर्देशों और सुरक्षा सम्बंधी परिस्थितियों के कारण कार्य रोक दिया गया है।

लोकतांत्रिक व्यवस्था में राज्य का दायित्व कानून-व्यवस्था बनाए रखना और सभी नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा करना है। ऐसे में यदि विरोध और धमकियों के दबाव के बीच प्रशासन विरोध करने वाले तत्वों के विरुद्ध कार्रवाई करने के बजाय पीड़ित पक्ष की वैध गतिविधियों पर ही रोक लगा दे, तो यह स्वाभाविक रूप से राज्य की निष्पक्षता और उसकी क्षमता पर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है।

*संवैधानिक आदर्श और व्यवहारिक वास्तविकता*

बांग्लादेश का संविधान धर्मनिरपेक्षता और सभी नागरिकों के लिए धार्मिक स्वतंत्रता की गारंटी देता है। प्रत्येक नागरिक को अपने धर्म का पालन करने, उसका प्रचार करने तथा धार्मिक संस्थानों की स्थापना करने का अधिकार प्राप्त है।

ऐसी स्थिति में यदि हिन्दू समाज को अपनी निजी भूमि पर धार्मिक प्रतीकों और पूजा स्थलों के निर्माण के लिए भी बहुसंख्यक स्वीकृति या सामाजिक दबाव से जूझना पड़े, तो यह केवल एक स्थानीय विवाद नहीं, बल्कि संवैधानिक मूल्यों की परीक्षा का विषय बन जाता है। प्रश्न यह भी है कि क्या कानून-व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी राज्य की है या फिर धार्मिक स्वतंत्रता का निर्धारण भीड़ और धमकियों के आधार पर होगा?

*सिकुड़ती अल्पसंख्यक आबादी*

बांग्लादेश में हिन्दू समाज की जनसंख्या में पिछले सात दशकों में निरन्तर गिरावट दर्ज की गई है। 1951 में तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान में हिन्दुओं की आबादी लगभग 22 प्रतिशत थी। 1971 में बांग्लादेश की स्वतंत्रता के समय यह घटकर लगभग 13.5 प्रतिशत रह गई और वर्तमान जनगणना के अनुसार देश में हिन्दुओं की आबादी लगभग 7.95 प्रतिशत रह गई है।

जनसंख्या में यह गिरावट लम्बे समय से शोधकर्ताओं और मानवाधिकार संगठनों के लिए चिन्ता का विषय रही है। भूमि सम्बंधी विवाद, साम्प्रदायिक हिंसा, असुरक्षा की भावना और पलायन को इसके प्रमुख कारणों में गिना जाता है।

 *बढ़ती सांप्रदायिक घटनाएँ*

यह विवाद कोई अकेली घटना नहीं है। पिछले कुछ वर्षों में बांग्लादेश में मन्दिरों, मूर्तियों और हिन्दू समाज पर हमलों की अनेक घटनाएँ सामने आई हैं। विभिन्न रिपोर्टों में मन्दिरों में तोड़फोड़, देवी-देवताओं की प्रतिमाओं के विखण्डन और धार्मिक स्थलों को निशाना बनाए जाने का उल्लेख मिलता है।

अल्पसंख्यक अधिकार संगठनों के अनुसार, हालिया राजनीतिक घटनाक्रमों के बाद देश में साम्प्रदायिक तनाव और अल्पसंख्यकों के विरुद्ध हिंसा की घटनाओं में वृद्धि हुई है। ठाकुरगांव में कई मन्दिरों पर हमले, फरीदपुर में मूर्तियों का विखण्डन और अब गाइबांधा में वैधानिक रूप से निर्मित हो रहे मंदिर परिसर के कार्य पर रोक जैसी घटनाओं ने चिन्ता को और बढ़ाया है।

*तस्लीमा नसरीन की प्रतिक्रिया*

निर्वासित बांग्लादेशी लेखिका तस्लीमा नसरीन ने इस घटनाक्रम पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की। उन्होंने प्रश्न उठाया कि जब देश में हजारों मस्जिदें हैं और नए धार्मिक स्थलों के निर्माण पर कोई आपत्ति नहीं होती, तो एक हिन्दू मन्दिर और भगवान राम की प्रतिमा के निर्माण का विरोध क्यों किया जा रहा है?

उन्होंने कहा कि धार्मिक स्वतंत्रता यदि वास्तव में सभी के लिए है, तो उसका लाभ अल्पसंख्यकों को भी समान रूप से मिलना चाहिए। किसी समुदाय की धार्मिक मान्यताओं के कारण दूसरे समुदाय की आस्था और पूजा स्थलों को बाधित करना लोकतांत्रिक मूल्यों के विपरीत है।

 *वैश्विक विमर्श और दोहरे मानदंड*

मानवाधिकारों और धार्मिक स्वतंत्रता के प्रश्न पर अन्तरराष्ट्रीय संस्थाएँ सामान्यतः सक्रिय दिखाई देती हैं। किन्तु यथार्थ यह है कि विभिन्न देशों और समुदायों के सन्दर्भ में प्रतिक्रियाओं का स्तर समान नहीं होता। यही कारण है कि बांग्लादेश में हिन्दू अल्पसंख्यकों से जुड़ी घटनाओं पर अपेक्षाकृत सीमित अन्तरराष्ट्रीय चर्चा को लेकर प्रश्न उठाए जा रहे हैं।

यद्यपि यह कहना उचित नहीं होगा कि अन्तरराष्ट्रीय मंच पूरी तरह मौन हैं, लेकिन यह अवश्य कहा जा सकता है कि जिस प्रकार की व्यापक प्रतिक्रिया अन्य मामलों में देखने को मिलती है, वैसी तीव्रता यहाँ दिखाई नहीं देती। यही स्थिति चयनात्मक मानवाधिकार विमर्श की बहस को जन्म देती है।

*भारत के बुद्धिजीवियों की प्रतिक्रिया पर प्रश्न*

भारत में भी इस विषय पर अपेक्षित स्तर की व्यापक सार्वजनिक बहस देखने को नहीं मिली। यह भी ध्यान देने योग्य है कि पड़ोसी देशों में अल्पसंख्यकों के प्रश्नों पर अपेक्षित स्तर की सार्वजनिक बहस अपेक्षाकृत सीमित दिखाई देती है।

हालाँकि किसी भी विचारधारा या वर्ग के सभी लोगों को एक समान मान लेना उचित नहीं होगा, फिर भी यह प्रश्न स्वाभाविक है कि यदि मानवाधिकार सार्वभौमिक हैं, तो उनकी रक्षा और समर्थन के मानदण्ड भी सार्वभौमिक होने चाहिए। धार्मिक या वैचारिक पहचान के आधार पर अलग-अलग मापदण्ड अपनाना अन्ततः मानवाधिकारों की विश्वसनीयता को ही कमजोर करता है।

*क्षेत्रीय प्रभाव*

बांग्लादेश में इस्लामी कट्टरता और अल्पसंख्यकों के विरुद्ध बढ़ती असुरक्षा केवल एक देश का आन्तरिक विषय नहीं है। इसका प्रभाव भारत-बांग्लादेश सम्बंधों, सीमा क्षेत्रों की स्थिरता और दक्षिण एशिया की सामाजिक-सामरिक परिस्थितियों पर भी पड़ सकता है।

यदि अल्पसंख्यकों में असुरक्षा और पलायन की प्रवृत्ति बढ़ती है, तो उसके दूरगामी परिणाम पूरे क्षेत्र को प्रभावित कर सकते हैं। इसलिए यह विषय केवल मानवाधिकारों का नहीं, बल्कि क्षेत्रीय स्थिरता और सामाजिक समरसता का भी प्रश्न है।

*आगे का रास्ता*

आवश्यक है कि बांग्लादेश सरकार धार्मिक स्थलों और अल्पसंख्यकों की सुरक्षा सुनिश्चित करे। साम्प्रदायिक हिंसा और धमकियों के मामलों में कठोर कार्रवाई हो तथा संवैधानिक अधिकारों की प्रभावी रक्षा की जाए।

साथ ही, अन्तरराष्ट्रीय समुदाय को भी सभी मामलों में समान मानदण्ड अपनाने चाहिए। मानवाधिकारों और धार्मिक स्वतंत्रता के प्रश्न पर चयनात्मक दृष्टिकोण अन्ततः इन मूल्यों की सार्वभौमिकता को कमजोर करता है।

पलाशबाड़ी में मन्दिर निर्माण पर लगी रोक केवल एक प्रशासनिक निर्णय नहीं, बल्कि धार्मिक स्वतंत्रता, संवैधानिक मूल्यों और राज्य की निष्पक्षता की वास्तविक परीक्षा है। किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की विश्वसनीयता इस बात से तय होती है कि वह बहुसंख्यक दबाव के बीच अपने अल्पसंख्यकों के अधिकारों की कितनी दृढ़ता से रक्षा करती है।

धार्मिक स्वतंत्रता किसी एक समुदाय का विशेषाधिकार नहीं, बल्कि एक सार्वभौमिक मानवाधिकार है। यदि किसी भी देश में किसी समाज को भय, दबाव या हिंसा की आशंका के कारण अपनी आस्था और सांस्कृतिक अभिव्यक्ति को सीमित करने के लिए विवश होना पड़े, तो यह केवल पीड़ित समाज का नहीं, बल्कि सम्पूर्ण मानवता और लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए चिन्ता का विषय है। मानवाधिकारों की विश्वसनीयता भी तभी बनी रह सकती है, जब उनके मानदण्ड व्यक्ति, देश या धर्म देखकर नहीं, बल्कि समान रूप से लागू किए जाएँ।

राम मंदिर चंदा चोरी: आस्था के साथ खिलवाड़ पर अब तक एफआई क्यों नहीं

1-3-1.jpeg

अयोध्या (उत्तर प्रदेश): श्री राम मंदिर करोड़ों हिंदू भक्तों की आस्था का केंद्र है। लाखों-करोड़ों लोगों ने अपनी श्रद्धा से दान दिया—किसी ने अपनी कमाई का हिस्सा, किसी ने आभूषण, किसी ने वर्षों की बचत। यह धन रामलला के निर्माण और मंदिर की गरिमा के लिए था, न कि किसी की जेब भरने के लिए। यदि इस चंदे में गबन या अनियमितताओं के आरोप सही साबित होते हैं, तो इसे मात्र प्रशासनिक लापरवाही नहीं माना जा सकता। यह आस्था के साथ सीधा विश्वासघात है। ऐसे में गोपनीय जांच या आंतरिक पूछताछ पर्याप्त नहीं। पूर्ण पारदर्शिता, एफआईआर और सख्त कानूनी कार्रवाई अनिवार्य है।

श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट ने मामले को गोपनीय तरीके से संभालते हुए उत्तर प्रदेश सरकार से निष्पक्ष जांच की मांग की है लेकिन बिना परदर्शिता के निष्पक्षता अक्सर संदेहास्पद होती है।

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने ट्रस्ट के पत्र पर तुरंत संज्ञान लिया और तीन सदस्यीय विशेष जांच दल (SIT) गठित कर दिया। इस टीम में लखनऊ मंडलायुक्त विजय विश्वास पंत, आईजी किरण एस और विशेष सचिव वित्त नील रतन शामिल हैं। एसआईटी को प्रारंभिक रिपोर्ट सात दिनों में और अंतिम रिपोर्ट 15 दिनों में सौंपनी है। कुछ कर्मचारियों से पूछताछ हुई है, अचानक बढ़ी संपत्ति और दान पेटियों में गड़बड़ी के संकेत मिले हैं। एक कर्मचारी के घर से गाय के गोबर में छिपाकर रखी लाखों रुपये की नकदी बरामद हुई। ये तथ्य गंभीर हैं, लेकिन ये छोटे कर्मचारियों तक सीमित नहीं रहने चाहिए।

समस्या यह है कि गोपनीय या उच्च-स्तरीय जांच में अक्सर बड़े नाम सामने नहीं आते। छोटे-मोटे चोर पकड़े जाते हैं, उन्हें नौकरी से निकाल दिया जाता है और मामला शांत हो जाता है। लेकिन जब बात करोड़ों भक्तों की आस्था की हो, तो यह पर्याप्त नहीं। एफआईआर दर्ज होनी चाहिए ताकि जांच सीआरपीसी के तहत चले, सबूत संरक्षित हों, गवाह सुरक्षित हों और दोषी—चाहे कोई भी हो—पर कानूनी शिकंजा कसे जा सके। एसआईटी अच्छा कदम है, लेकिन इसे पूर्ण स्वायत्तता और समयबद्धता के साथ पारदर्शी बनाना होगा। रिपोर्ट सार्वजनिक होनी चाहिए, ऑडिट रिपोर्ट्स खुली हों और मंदिर के वित्तीय लेन-देन की पूरी जानकारी भक्तों को उपलब्ध हो। सीसीटीवी को लगाते समय वे कौन से लोग थे, जिन्होंने बाधा उत्पन्न की थी। उनके नाम सार्वजनिक होने चाहिए।

उत्तर प्रदेश में यह साल चुनाव का साल है। श्रीराम मंदिर करोड़ों हिन्दुओं की आस्था से सीधा जुड़ने वाला विषय है। गोपनीय जांच के नाम यदि चंदा चोरी मामले को ठंडे बस्ते में डालने का प्रयास किया जाएगा तो इस बार विपक्ष को बैठे बिठाए एक मुद्दा मिलेगा। बिना किसी सहानुभूति के इस पूरे मामले की पारदर्शी और निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। एफआईआर हो और बड़े छोटे कैसे भी चोर हों, उनके साथ रियायत नहीं की जाए।

यदि इस चंदा चोरी मामले में चोरों को बड़े—छोटे का भेद किए बिना लटकाने की मिसाल उत्तर प्रदेश की सरकार पेश कर पाती है तो पूरे देश में महाराज जी की जय—जयकार होगी।

राम मंदिर केवल ईंट-गारे का ढांचा नहीं, बल्कि राष्ट्रीय चेतना और सांस्कृतिक पुनर्जागरण का प्रतीक है। यदि यहां चंदा चोरी साबित होने के बाद चोरो पर यूपी स्टाइल में कार्रवाई नहीं हुई तो न केवल विश्वास टूटेगा, बल्कि विरोधी ताकतें इसे हिंदू समाज पर हमला करने का हथियार बनाएंगी। इसलिए न्याय सिर्फ छोटे कर्मचारियों की बर्खास्तगी से नहीं, बल्कि पूरी सच्चाई उजागर करने, दोषियों पर सख्त कार्रवाई और भविष्य में ऐसे गबन को रोकने वाले मजबूत तंत्र से मिलेगा। ट्रस्ट, सरकार और समाज को मिलकर सुनिश्चित करना चाहिए कि रामलला के चरणों में चढ़े एक एक पैसे का हिसाब सार्वजनिक हो और वह पैसा सुरक्षित हाथों में रहे।

आस्था पर कोई समझौता नहीं हो सकता। पारदर्शिता ही सबसे बड़ा बलिदान और सच्ची श्रद्धा है।

एफटीआईआई है या left orientation का प्रचार केंद्र: एक छात्रा का अनुभव

1-1-5.jpeg

प्रिया

पुणे : जून 2024 में मैंने पुणे के प्रतिष्ठित फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (एफटीआईआई) से फिल्म एप्रिसिएशन कोर्स पूरा किया। कोर्स कोऑर्डिनेटर पंकज सक्सेना थे। कोर्स की अवधि में कई दिग्गज वक्ताओं ने व्याख्यान दिए, जिनमें अरुणा राजे पाटिल जैसी नामचीन हस्तियां भी शामिल थीं। हालांकि, इन सत्रों में वर्तमान सरकार और उसके नैरेटिव की आलोचना बार-बार दबे स्वर में सुनाई दी।

मेरे अनुभव के अनुसार, कोर्स में राष्ट्रवादी दृष्टिकोण वाली किसी भी फिल्म या वक्ता को जगह नहीं दी गई। अधिकांश चयनित फिल्में और वक्ता वामपंथी विचारधारा से गहराई से प्रभावित दिखे। भारतीय संस्कृति, सभ्यता, ऐतिहासिक गौरव और राष्ट्रवादी मूल्यों को दर्शाती फिल्मों पर ना के बराबर चर्चा हुई। उलटे, कुछ फिल्मों को सीधे ‘प्रोपेगेंडा’ का ठप्पा लगाकर खारिज कर दिया गया। ऐसा लगता था जैसे संस्थान का पूरा सिलेबस और चयन प्रक्रिया एक खास विचारधारा को ही बढ़ावा देने के लिए तैयार किया गया हो।

फिल्म अध्ययन जैसा विषय, जो दृश्य माध्यम के माध्यम से समाज, संस्कृति और इतिहास को समझने का माध्यम है, वहां वैचारिक विविधता की अपेक्षा स्वाभाविक रूप से की जाती है। दुर्भाग्यवश, यहां केवल एक तरफा विमर्श ही प्रमुखता से रखा गया। छात्रों को भारतीय सिनेमा की समृद्ध विरासत—चाहे वह स्वतंत्रता संग्राम की फिल्में हों, सांस्कृतिक पुनर्जागरण की कहानियां हों या समकालीन राष्ट्रवादी कथाएं—उनसे परिचित कराने का कोई प्रयास नहीं दिखा।

मेरा दृढ़ मानना है कि किसी भी शैक्षणिक संस्थान, खासकर सरकारी समर्थन वाले संस्थान में, वैचारिक विविधता अनिवार्य होनी चाहिए। वामपंथी, दक्षिणपंथी, राष्ट्रवादी या उदारवादी—सभी दृष्टिकोणों को समान अवसर मिलना चाहिए। छात्रों को केवल एक विचारधारा का पाठ नहीं, बल्कि बहुआयामी चिंतन सिखाया जाना चाहिए ताकि वे स्वतंत्र रूप से सोच सकें और अपनी समझ विकसित कर सकें।

एफटीआईआई जैसे संस्थानों की जिम्मेदारी है कि वे सच्चे अर्थों में रचनात्मक और बौद्धिक स्वतंत्रता का वातावरण बनाएं, न कि left orientation का प्रचार केंद्र। जब तक वैचारिक संतुलन नहीं होगा, छात्रों का समग्र विकास अधूरा रहेगा। मुझे आशा है कि संस्थान प्रबंधन इस ओर ध्यान देगा और भविष्य के कोर्स में वास्तविक विविधता सुनिश्चित करेगा।

(लेखिका के आग्रह पर नाम परिवर्तित किया गया है)

आईजीएनसीए में योग, स्वास्थ्य और भारतीय जीवन-दृष्टि पर केन्द्रित पुस्तक “पावरिंग हेल्थ” पर परिचर्चा का आयोजन

1-8.jpeg

 

नई दिल्ली: अंतरराष्ट्रीय योग दिवस 2026 के उपलक्ष्य में इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र (आईजीएनसीए) के कलानिधि विभाग द्वारा आयोजित “पावरिंग हेल्थ” पुस्तक के लोकार्पण एवं परिचर्चा कार्यक्रम में स्वास्थ्य, योग और भारतीय जीवन-पद्धति के विविध आयामों पर गंभीर विमर्श हुआ। परिचर्चा की अध्यक्षता की आईजीएनसीए के अध्यक्ष पद्म भूषण रामबहादुर राय ने, जबकि मुख्य अतिथि थीं पूर्व न्यूज एंकर एवं बीजेपी की राष्ट्रीय प्रवक्ता सुश्री शाजिया इल्मी। इस अवसर पर लेखक सुनील कुमार सिन्हा ने पुस्तक पावरिंग हेल्थ के बारे में विस्तार से जानकारी दी। पुस्तक में डाइट कैप्सूल, योग कैप्सूल, शरीर एवं मन के डिटॉक्सिफिकेशन तथा सर्कैडियन रिद्म (जैविक दिनचर्या चक्र) जैसे विषयों को भारतीय दृष्टि और आधुनिक जीवन-शैली के संदर्भ में प्रस्तुत किया गया है।

इस परिचर्चा में इंडिया फ़ाउंडेशन के कार्यकारी उपाध्यक्ष कैप्टन आलोक बंसल, आईजीएनसीए के डीन एवं कलानिधि विभाग के प्रमुख प्रो. (डॉ.) रमेश सी. गौड़, पुस्तक के लेखक सुनील कुमार सिन्हा, स्तंभकार, लेखक एवं योग विशेषज्ञ कौशल किशोर, सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता एवं विश्व योगासन चैम्पियन तेजस्वी कुमार शर्मा तथा अंतरराष्ट्रीय योग विशेषज्ञ एवं माइंडफुलनेस कोच डॉ. शिवादित्य पुरोहित भी शामिल थे।

अध्यक्षीय उद्बोधन में राम बहादुर राय ने कहा कि इस पुस्तक को केवल योग के दृष्टिकोण से नहीं देखा जाना चाहिए। यह स्वास्थ्य तथा संतुलित आहार और योगाभ्यास के माध्यम से संतुलित जीवन विकसित करने के उपायों पर आधारित पुस्तक है। योग की विविध धाराओं और परम्पराओं का उल्लेख करते हुए उन्होंने पावरिंग हेल्थ को एक व्यावहारिक मार्गदर्शिका बताया, जो दैनिक जीवन में स्वास्थ्य-सम्बंधी सार्थक दृष्टिकोण प्रस्तुत करती है। उन्होंने कहा कि पुस्तक अच्छे स्वास्थ्य के महत्त्व पर बात करती है तथा शरीर के डिटॉक्सिफिकेशन में आहार की भूमिका को रेखांकित करती है।

विशिष्ट अतिथि शाज़िया इल्मी ने कहा कि यह पुस्तक उन सिद्धांतों को समाहित करती है, जो सम्पूर्ण ब्रह्मांड का संचालन करते हैं। उन्होंने कहा कि अधिकांशतः जीवन मन को जीतने का नाम है, क्योंकि मन ही अनेक चुनौतियों और संघर्षों का कारण बन जाता है। प्रत्येक व्यक्ति के भीतर निरंतर संघर्ष चलते रहते हैं, और इसी संदर्भ में यह पुस्तक योग की दिशा में प्रेरित करने वाले एक मार्गदर्शक सिद्धांत के रूप में उभरती है। भारत की दीर्घकालिक परम्पराओं का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि भारत सदियों से स्वास्थ्य और योग के प्राचीन विज्ञान का धनी रहा है। योग को स्वयं से जुड़ने का माध्यम बताते हुए उन्होंने कहा कि यह व्यक्ति को अपने भीतर लौटने और आंतरिक संतुलन प्राप्त करने में सक्षम बनाता है।

कैप्टन आलोक बंसल ने भारतीय ज्ञान-परम्परा और आधुनिक विज्ञान के समन्वय पर बल दिया। प्रो. (डॉ.) रमेश चन्द्र गौड़ ने सभी वक्ताओं का स्वागत करते हुए कहा कि यह पुस्तक सबको पढ़नी चाहिए। उन्होंने कहा कि आईजीएनसीए भारतीय परम्पराओं और ज्ञान-विज्ञान के संरक्षण एवं प्रसार के लिए निरंतर कार्य कर रहा है। तेजस्वी कुमार शर्मा ने कहा कि यह एक भ्रांति है कि योग केवल आसन और प्राणायाम है। वास्तव में योग मनुष्य के संपूर्ण कल्याण का विज्ञान है। इस अवसर पर कौशल किशोर तथा डॉ. शिवादित्य पुरोहित ने भी अपने विचार व्यक्त किए। वक्ताओं ने योग को केवल शारीरिक व्यायाम नहीं, बल्कि मानसिक और आध्यात्मिक अनुशासन बताया।

इस कार्यक्रम में विद्वानों, योग साधकों, स्वास्थ्य विशेषज्ञों तथा आम जनों ने भाग लिया और समकालीन समाज में स्वास्थ्य एवं कल्याण के समग्र दृष्टिकोणों के महत्त्व पर संवाद किया। नई दिल्ली स्थित आईजीएनसीए के समवेत सभागार में आयोजित इस कार्यक्रम ने शारीरिक, मानसिक एवं भावनात्मक स्वास्थ्य के संवर्धन में योग तथा उससे संबद्ध विधाओं की स्थायी प्रासंगिकता को रेखांकित किया।

scroll to top