जब हनुमान चालीसा कॉकपिट में पहुँची

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खालीद उमर

भोपाल: मैंने नरेंद्र मोदी जी और कैप्टन स्मित मच्छर के बीच हुई फोन पर बातचीत सुनी। फ्लाइट FZ1073 के दौरान संकट की स्थिति में हनुमान चालीसा का पाठ करने के उनके अनुभव ने धर्म, मनोविज्ञान, तंत्रिका-विज्ञान और दर्शन के संगम पर एक बड़े प्रश्न को जन्म दिया।
“क्या कोई आध्यात्मिक साधना उस व्यक्ति की चेतना की अवस्था को बदलकर घटनाओं की दिशा बदल सकती है, जो स्वयं उन घटनाओं के बीच फँसा हुआ है?”
स्मित ने बताया कि कॉकपिट के भीतर चल रहे हिंसक संघर्ष के दौरान वे हनुमान चालीसा का पाठ कर रहे थे। घायल और रक्तरंजित अवस्था में फर्श पर दबे हुए उन्हें एहसास हुआ कि यदि वे वहीं पड़े रहे, तो उनकी और विमान में सवार सभी लोगों की जान जा सकती थी। उन्होंने खुद को उठने के लिए मजबूर किया, कॉकपिट के दरवाजे तक पहुँचे और उसे खोलने में सफल रहे, जिससे दूसरे लोग भीतर आकर हस्तक्षेप कर सके।
मेरे लिए, वही निर्णायक क्षण था। कोई यह कह सकता है कि कॉकपिट का दरवाज़ा खोलने से बचाव संभव हुआ; वहीं एक श्रद्धालु यह भी कह सकता है कि एक घायल व्यक्ति का स्वयं को उठाकर दरवाज़ा खोल पाने की क्षमता ही अपने आप में वह चमत्कारी क्षण था।
स्मित ने अपने अनुभव को धार्मिक शब्दों में व्यक्त किया: हनुमान ने उन्हें साहस दिया। एक भक्त इसे दैवी कृपा के रूप में देख सकता है। एक मनोवैज्ञानिक यह मान सकता है कि मंत्रोच्चार ने भय को नियंत्रित करने और एकाग्रता बनाए रखने में सहायता की। एक तंत्रिका-विज्ञानी यह विचार कर सकता है कि अत्यधिक तनाव की स्थिति में लयबद्ध दोहराव, स्मृति और मस्तिष्क में गहराई से अंकित धार्मिक प्रतीक किस प्रकार मस्तिष्क को प्रभावित करते हैं। वहीं एक दार्शनिक यह प्रश्न उठा सकता है कि प्रार्थना या विचार जैसी अमूर्त और अदृश्य चीज़ भौतिक कारण-श्रृंखला में प्रवेश करके आगे होने वाली घटनाओं की दिशा को कैसे बदल सकती है।
इन व्याख्याओं का एक-दूसरे को खारिज करना आवश्यक नहीं है। संभव है कि वास्तविकता उन विभिन्न श्रेणियों से कहीं अधिक समग्र और एकीकृत हो, जिनके माध्यम से हम उसे समझने का प्रयास करते हैं।

वह क्षण जब भविष्य की राहें अलग हो गईं
किसी भी निर्णायक क्षण में घटनाओं के एक से अधिक रास्ते संभव हो सकते हैं, यद्यपि अंततः केवल एक ही वह इतिहास बनता है, जिसे हम अनुभव करते हैं।
कभी-कभी कोई देखने में मामूली-सी हरकत, एक सेकंड पहले या बाद में लिया गया कोई निर्णय, या किसी अप्रत्याशित प्रतिक्रिया का होना—आगे घटने वाली पूरी घटनाओं की दिशा बदल देता है। ऐसे क्षण हमें कार्य-कारण, संयोग और उस अवधारणा के बारे में सोचने पर विवश करते हैं, जिसे कार्ल युंग ने “सिंक्रोनिसिटी” (Synchronicity) कहा था—ऐसी घटनाएँ जो किसी स्पष्ट कारणात्मक संबंध के प्रमाण के बिना भी अर्थपूर्ण रूप से एक-दूसरे से जुड़ी हुई प्रतीत होती हैं।
मेरे लिए, सिंक्रोनिसिटी (Synchronicity) यह संभावना सामने रखती है कि वास्तविकता में ऐसे संबंध मौजूद हो सकते हैं, जिन्हें हम अभी पूरी तरह समझ नहीं पाए हैं। एक आस्तिक के रूप में मैं इसे ब्रह्म या परम चेतना के संदर्भ में देख सकता हूँ। विज्ञान इस निष्कर्ष को प्रमाणित नहीं करता, लेकिन विज्ञान ने बार-बार यह अवश्य दिखाया है कि वास्तविकता हमारी सामान्य मानवीय सहज-बुद्धि की अपेक्षा कहीं अधिक रहस्यमय और विचित्र हो सकती है। कम-से-कम यह हमें बौद्धिक विनम्रता अवश्य सिखाना चाहिए।
लेकिन कॉकपिट के भीतर संभावनाएँ बिल्कुल तत्काल और वास्तविक थीं। स्मित फर्श पर पड़े रह सकते थे, बेहोश हो सकते थे, उठने में असफल हो सकते थे, या फिर किसी तरह अपने भीतर इतनी शक्ति खोज सकते थे कि कार्रवाई कर सकें। इन सभी संभावनाओं में से केवल एक ही वास्तविकता बनी।
भविष्य केवल उसके आसपास घटित नहीं हो रहा था। उसकी चेतना स्वयं आगे घटने वाली घटनाओं का हिस्सा बन गई थी। उसे समझ में आया कि उसे उठना होगा। समझ ने संकल्प का रूप लिया, संकल्प शारीरिक प्रयास में बदला और उस प्रयास ने उसे कॉकपिट के दरवाज़े तक पहुँचकर उसे खोलने में सक्षम बनाया। जैसे ही दरवाज़ा खुला, दूसरे लोग हस्तक्षेप कर सके और घटनाओं की दिशा बदल गई।
इस पूरे क्रम में आवश्यक रूप से कुछ भी अलौकिक नहीं है। फिर भी यह हमें एक गहरी बात दिखाता है: चेतना केवल एक मूक दर्शक नहीं है।
विचार संकल्प बन सकता है, संकल्प गति में बदल सकता है और गति भौतिक वास्तविकता को बदल सकती है।
यहाँ हनुमान चालीसा की भूमिका सामने आती है
हनुमान चालीसा की एक प्रसिद्ध पंक्ति है:
“संकट तें हनुमान छुड़ावै,
मन क्रम बचन ध्यान जो लावै।”
इसका सामान्य अर्थ यह समझा जाता है कि जब मन, कर्म, वचन और ध्यान हनुमान में केंद्रित होते हैं, तब हनुमान व्यक्ति को संकट से मुक्त करते हैं।
मुझे इन तत्वों की एकता विशेष रूप से महत्वपूर्ण लगती है। यह चौपाई केवल पवित्र शब्दों को दोहराने की बात नहीं करती। इसमें विचार, वाणी, एकाग्र चेतना और कर्म—इन सभी को एक साथ जोड़ा गया है।
इस दृष्टि से देखें तो स्मित का अनुभव अत्यंत प्रभावशाली हो जाता है। उनकी वाणी हनुमान चालीसा में लगी थी, उनका मन हनुमान में था, उनका ध्यान सामने उपस्थित खतरे पर केंद्रित था और उनका शरीर कार्रवाई करने की आवश्यकता के लिए तैयार था। प्रार्थना केवल किसी आंतरिक आध्यात्मिक क्षेत्र तक सीमित नहीं रही; वह उस चेतना की अवस्था का हिस्सा बन गई, जिससे कार्रवाई उत्पन्न हुई।
यह हनुमान को “संकटमोचन” — कठिनाइयों को दूर करने वाले के रूप में समझने का एक गहरा दृष्टिकोण प्रस्तुत कर सकता है। बाधा का हमेशा समाप्त हो जाना आवश्यक नहीं है। कभी-कभी परिवर्तन उस व्यक्ति के भीतर होता है, जिसे उस बाधा का सामना करना होता है।
हनुमान और असंभव का मनोविज्ञान
हनुमान की आराधना केवल उनकी शारीरिक शक्ति के कारण नहीं की जाती, बल्कि वे साहस, बुद्धिमत्ता, विनम्रता, भक्ति और अनुशासित कर्म के भी प्रतीक हैं। उनकी कथाएँ बार-बार उन्हें ऐसी परिस्थितियों के सामने खड़ा करती हैं, जो असंभव प्रतीत होती हैं। उनके सामने समुद्र है और वे उसे पार कर जाते हैं। सीता तक पहुँचना असंभव-सा लगता है और वे उन्हें खोज लेते हैं। लक्ष्मण गंभीर रूप से घायल पड़े हैं और हनुमान पूरा पर्वत ही उठा लाते हैं।
इसका संदेश यह नहीं है कि बाधाओं का अस्तित्व समाप्त हो जाता है। संदेश यह है कि किसी बाधा का अस्तित्व आवश्यक रूप से यह तय नहीं करता कि मनुष्य क्या कर सकता है और क्या नहीं।
मनोवैज्ञानिक दृष्टि से, ऐसे व्यक्तित्व और प्रतीक का बार-बार चिंतन मन में शक्तिशाली संबंध स्थापित कर सकता है। हनुमान साहस, कर्तव्य, धैर्य और हार न मानने की भावना से जुड़ जाते हैं। सामान्य परिस्थितियों में यह केवल भक्ति की भावना के रूप में रह सकता है; लेकिन संकट की घड़ी में यही भावना व्यवहार में बदल सकती है।
आधुनिक मनोविज्ञान इसे सीखे हुए मानसिक संबंधों (learned associations) और मानसिक प्रतिरूपों (mental schemas) के माध्यम से समझा सकता है। युंग शायद इसे आर्केटाइप (archetype) कहते। शब्दावली अलग हो सकती है, लेकिन मूल बात एक ही है:
मनुष्य संकट में एक खाली मन लेकर प्रवेश नहीं करता।
वह अपने साथ स्मृतियाँ, प्रशिक्षण, संस्कृति, अनुभव, विश्वास और प्रतीक लेकर जाता है। अत्यधिक दबाव की स्थिति में जो कुछ उसके भीतर गहराई से आत्मसात हो चुका होता है, वही निर्णायक बन सकता है।
आध्यात्मिक साधना एक तैयारी के रूप में
इसीलिए शायद सबसे महत्वपूर्ण जप वह नहीं है जो संकट के समय किया जाए। सबसे महत्वपूर्ण जप वह हो सकता है, जिसका अभ्यास संकट आने से बहुत पहले, वर्षों तक बार-बार किया जाता रहा हो।
पायलट आपातकालीन परिस्थितियों का अभ्यास सिम्युलेटर में करते हैं, ताकि दबाव की स्थिति में भी सही प्रतिक्रिया उनके भीतर उपलब्ध रहे। सैनिक तब तक अभ्यास करते हैं, जब तक उनकी गतिविधियाँ सहज और स्वाभाविक न हो जाएँ। सर्जन किसी प्रक्रिया को बार-बार दोहराते हैं, ताकि तनाव के बीच भी उनका कौशल बना रहे। आध्यात्मिक अनुशासन भी शायद कुछ ऐसा ही करता है—चरित्र, भावनाओं और जीवन के अर्थ के स्तर पर।
कोई व्यक्ति हजारों बार हनुमान चालीसा का पाठ कर सकता है, बिना यह जाने कि उसके जीवन में कभी ऐसा क्षण आएगा भी या नहीं, जब उसके अर्थ की वास्तविक आवश्यकता पड़ेगी। लेकिन निरंतर दोहराव शायद संकट और साहस, भय और स्मरण, तथा असंभव दिखाई देने वाली परिस्थिति और कर्म के बीच एक गहरा संबंध स्थापित कर देता है।
प्रार्थना को भविष्य की भविष्यवाणी करने की आवश्यकता नहीं है। वह उस चेतना को तैयार कर सकती है, जिसे एक दिन उस भविष्य का सामना करना होगा।
@क्या हनुमान चालीसा ने भविष्य बदल दिया?@
मैं यह नहीं कह रहा कि हनुमान चालीसा की ध्वनि ने विमान को भौतिक रूप से बदल दिया या प्रकृति के नियमों को निलंबित कर दिया। मेरा तर्क सरल है और मेरे लिए अधिक दिलचस्प है।
यदि जप ने स्मित की चेतना की अवस्था को बदल दिया, और उस अवस्था ने उसे वह कार्य करने में सहायता की जिसने आगे घटित होने वाली बात को बदल दिया, तो चालीसा उस घटना के कारणात्मक इतिहास का हिस्सा बन गई।
यह विज्ञान से पराया नहीं है। मानसिक अवस्थाएँ तंत्रिका गतिविधि के अनुरूप होती हैं; तंत्रिका गतिविधि मांसपेशियों की गति उत्पन्न कर सकती है; गति भौतिक वातावरण को बदलती है, और बदला हुआ वातावरण आगे के परिणाम उत्पन्न करता है। जीवित मानव शरीर के माध्यम से चेतना क्रिया की दुनिया में प्रवेश करती है।
हम इस सिद्धांत को अन्य जगहों पर बिना किसी कठिनाई के स्वीकार करते हैं। एक डॉक्टर का निर्णय रोगी के उपचार को बदल देता है। एक टेलीफोन कॉल किसी रिश्ते को बचा सकता है या समाप्त कर सकता है। एक आदेश व्यवहार बदल देता है। बोर्डरूम में लिया गया निर्णय अरबों पाउंड को स्थानांतरित कर सकता है। ये घटनाएँ विचार या इरादे के रूप में आरंभ होती हैं, परंतु क्रिया के माध्यम से भौतिक परिणाम प्राप्त कर लेती हैं।
कॉकपिट की घटना इस संबंध को असामान्य रूप से दृश्यमान बना देती है, क्योंकि परिणाम कुछ सेकंडों के भीतर सामने आ गए।
प्रार्थना, कृपा और तंत्र
विज्ञान और धर्म के बीच चर्चाओं में एक आम गलती यह मान लेना है कि किसी तंत्र की व्याख्या आध्यात्मिक अर्थ को मिटा देती है।
मान लीजिए कि तंत्रिकाविज्ञान यह ठीक-ठीक बता सके कि चालीसा का पाठ करते समय स्मित के मस्तिष्क में क्या हुआ। वह स्मृति, ध्यान, भय-नियंत्रण, तनाव-प्रतिक्रिया और गति-योजना से जुड़ी प्रक्रियाओं की पहचान कर सकता है। इससे हमें यह पता चलेगा कि वह अनुभव शरीर-क्रिया की दृष्टि से कैसे संचालित हुआ, परंतु इससे यह भिन्न प्रश्न अनिवार्य रूप से हल नहीं होगा कि उस अनुभव का अर्थ क्या था।
एक विश्वास करने वाले के रूप में मैं एक कदम और आगे जाकर कहूँगा कि दैवी कृपा उन्हीं तंत्रों के माध्यम से कार्य कर सकती है।
कृपा के लिए प्रकृति का उल्लंघन करना अनिवार्य नहीं है। वह कार्य-कारण के माध्यम से भी कार्य कर सकती है: सही क्षण पर सही विचार, शक्ति का अप्रत्याशित भंडार, समर्पण करने से इनकार, या ऐसे लोगों की उपस्थिति जो दरवाज़ा खुलते ही कार्य करने में सक्षम हों।
एक धर्मनिरपेक्ष प्रेक्षक इन बातों को लचीलापन, प्रशिक्षण और परिस्थितियों के रूप में वर्णित कर सकता है। एक धार्मिक प्रेक्षक इनमेंprovidence देख सकता है। विज्ञान तंत्रों की जाँच कर सकता है, परंतु वह किसी अनुभव के अध्यात्म-मीमांसीय अर्थ का अंतिम निर्धारण नहीं कर सकता।
चेतना और भविष्य
भविष्य न तो पूरी तरह हमारे द्वारा रचा जाता है और न ही हमसे पूर्णतः स्वतंत्र होता है। वह उन परिस्थितियों के बीच की अंतःक्रिया से उभरता है जो हमारे नियंत्रण से परे हैं, और उन प्रतिक्रियाओं से जो कम से कम आंशिक रूप से हमारी ही रहती हैं।
चेतना केवल वास्तविकता को आदेश नहीं देती कि वह जो हम चाहें वही उत्पन्न करे। प्रार्थना कोई जादुई सूत्र नहीं है, और केवल विचार ब्रह्मांड को हमारी आज्ञा मानने के लिए बाध्य नहीं करता। फिर भी चेतना अप्रासंगिक कतई नहीं है। वह घटनाओं की व्याख्या करती है, इरादे बनाती है, निर्णय लेती है और संसार पर कार्य करती है। उन्हीं क्रियाओं के माध्यम से हम आगे जो घटित होगा उसे आकार देने में भागीदार बनते हैं।
उड़ान FZ1073 एक नाटकीय उदाहरण प्रस्तुत करती है। खतरे को मात्र इच्छा से दूर नहीं किया गया। बल्कि, आध्यात्मिक साधना ने संभवतः उस व्यक्ति की चेतना को आकार दिया जिसे उसका सामना करना था।
मेरे लिए यह प्रार्थना को जादू मानने की अपेक्षा अधिक विश्वसनीय भी है और अधिक गहन भी।
जब चेतना क्रिया बन गई
उड़ान FZ1073 में जो हुआ, उसकी सबसे प्रभावशाली व्याख्या सहज चमत्कार और सहज खारिज करने के बीच कहीं स्थित है।
हनुमान चालीसा स्मित की चेतना में उस क्षण उपस्थित थी जब भय, चोट और खतरा उसकी कार्य करने की क्षमता को अभिभूत कर सकते थे। उसके अपने कथन के अनुसार, हनुमान का स्मरण उसे साहस प्रदान किया। वह साहस दृढ़ संकल्प बना, दृढ़ संकल्प शारीरिक क्रिया बना, और उस क्रिया ने विमान के भीतर जो घटित हो रहा था उसे बदल दिया।
कुछ अमूर्त परिणामकारी बन गया।
कैप्टन स्मित के लिए एक स्मृत प्रार्थना मन की अवस्था बन गई; वह मन की अवस्था संकल्प का कार्य बन गई; और वह संकल्प का कार्य गति बन गया। उस गति ने आगे जो हुआ उसे बदल दिया।
शायद यही संकट मोचन का एक सबसे गहरा अर्थ है।
हनुमान हमेशा हमारे मार्ग से पर्वत नहीं हटाते। कभी-कभी रूपांतरण उसके सामने खड़े व्यक्ति की चेतना में होता है।
सागर ठीक वहीं रह सकता है जहाँ वह है। जो बदलता है, वह व्यक्ति है जो यह खोज लेता है कि उसे पार किया जा सकता है।
जय हनुमान।
(Khalid Umar का अंग्रेजी में लिखा यह एक लम्बा लेख है, जिससे पढ़ने वाले की अंतरात्मा तृप्त हो जाएगी। लेख का हिंदी अनुवाद, यहां प्रस्तुत है)

संघ का सबसे प्रभावी कार्य कहाँ है…?

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जयपुर । कुछ हद तक केरलम यह इस प्रश्न का उत्तर निश्चित रूप से दिया जा सकता है। विरोधी जब शब्दशः जान के पीछे पड़े हों, तब जिस मजबूती के साथ संघ वहाँ खड़ा रहा, वह अपने आप में उल्लेखनीय है। केवल खड़ा ही नहीं रहा, बल्कि सर्वांगीण विस्तार करते हुए संघ ने सभी क्षेत्रों में अपना प्रभाव स्थापित किया। फिर चाहे वह समाज निर्माण हो, सेवा कार्य हो या कार्यकर्ता निर्माण—इन सभी दृष्टियों से आज केरल जैसे छोटे से राज्य ने संघकार्य की दृष्टि से अद्भुत आदर्श प्रस्तुत किया है।

विचारधारा की दृष्टि से 60-70 प्रतिशत से अधिक विरोधी शक्तियों वाले केरल में पिछले 84 वर्षों में जिस दृढ़ता और अत्यंत प्रभावी ढंग से संघ का कार्य खड़ा हुआ, उसका श्रेय यदि किसी एक व्यक्ति को देना हो तो उनका नाम है—भास्करराव कळंबी…! हालांकि संघकार्य में किसी एक व्यक्ति को श्रेय देने की परंपरा नहीं है, फिर भी…!

दादर जैसे विशुद्ध मराठी क्षेत्र से प्रचारक निकलकर 38 वर्षों से भी अधिक समय तक केरलम में प्रचारक के रूप में अपने शरीर का कण-कण और जीवन का क्षण-क्षण खपाने वाले भास्करराव कळंबी ने केवल संघ को ही नहीं, बल्कि केरलम के निद्रिस्त और हताश हिंदू समाज को भी जागृत और संगठित किया। आगे चलकर वे के. भास्करन के नाम से पहचाने जाने लगे और अपने जीवन की अंतिम सांस भी उन्होंने इसी केरल की धरती पर ली।

केरल में संघ को कम्युनिस्ट, इस्लाम और ईसाई—इन कट्टर विरोधी शक्तियों के साथ अत्यंत भीषण संघर्ष करना पड़ा। आज भी यह संघर्ष जारी है। लेकिन एक-एक व्यक्ति को जोड़ते हुए, उसके भीतर हिंदुत्व की ज्योति प्रज्वलित करते हुए जिस प्रभावी ढंग से भास्करराव ने केरलम में हिंदू समाज को संगठित किया, वह एक प्रेरणादायी इतिहास है।

कम्युनिस्टों के साथ तो संघ को रक्तरंजित संघर्ष का सामना करना पड़ा। इस संघर्ष में अब तक 78 से अधिक स्वयंसेवकों को अपने प्राणों का बलिदान देना पड़ा है, जबकि कई लोगों के हिस्से में जीवनभर का अपंगत्व आया है। लेकिन इतना संघर्ष होने के बावजूद और कई कार्यकर्ताओं के जेल में रहकर सजा भुगतने के बावजूद किसी भी स्वयंसेवक की संघ के प्रति भक्ति और प्रतिबद्धता में किंचित भी कमी नहीं आई। ऐसे कर्मठ, निःस्वार्थी और समर्पित कार्यकर्ता भास्करराव ने अपने कार्यकाल में तैयार किए।

कम्युनिस्टों के साथ हुए रक्तरंजित संघर्ष में अपना प्रचारक पुत्र खोने वाले एक पिता थे—भरतन। भास्करराव की प्रेरणा से संघ के लिए अत्यंत समय देने वाले और व्यापक जनसंपर्क रखने वाले इस कार्यकर्ता की कार्यकर्ता के रूप में समझ उच्च कोटि की थी।

भरतन जी के पुत्र दुर्गादास कॉलेज की शिक्षा पूरी करने के बाद संघ के प्रचारक के रूप में बाहर निकले। कॉलेज में उन्होंने संघ का इतना प्रभावी कार्य खड़ा किया कि स्वाभाविक रूप से दहशत के बल पर वहाँ सक्रिय एस.एफ.आई. के गुंडों को उनका यह कार्य खटकना ही था। उसका रास्ता रोकने के उद्देश्य से एस.एफ.आई. के बाहर से आए गुंडों ने कॉलेज परिसर में उन पर प्राणघातक हमला किया। तलवारों और कोयतों से उन पर लगातार वार करते हुए वे उन्हें रक्त के तालाब में छोड़कर चले गए। दुर्भाग्य से इस घटना में दुर्गादास की मृत्यु हो गई।

उस समय स्वास्थ्य खराब होने के कारण विश्राम कर रहे भास्करराव के कानों तक जब यह समाचार पहुँचा तो वे इस घटना से अत्यंत व्यथित हुए। क्योंकि केवल दो दिन पहले ही यह युवा प्रचारक उनसे मिलकर गया था। उस समय अत्यधिक अशक्तता के कारण भास्करराव को बहुत अधिक ग्लानि हो रही थी, फिर भी उन्होंने उससे पूछा था—“तू भरतन का ही बेटा है न…?”

ऐसे युवा प्रचारक की हत्या से भास्करराव भीतर से पूरी तरह टूट गए थे। इसलिए डॉक्टरों की अनुमति न होने के बावजूद दुर्गादास को श्रद्धांजलि देने के लिए जाने का भास्करराव ने आग्रह किया और उसी के अनुसार अत्यंत खराब स्वास्थ्य के बावजूद वे उसके घर गए।

लेकिन कर्मठ स्वयंसेवक भरतन ने विचार किया कि मेरा पुत्र तो संघ का प्रचारक था। इसलिए उस पर अधिकार केवल संघ का है और संघ में उसके पालक कौन हैं? तो वे हैं—भास्करन जी! एक अर्थ में संघ ने, अर्थात भास्करन जी ने, अपना पुत्र खोया है। फिर उनको सांत्वना कौन देगा…?

इसलिए एक-दो दिन के भीतर ही अपने पुत्र को खोने का दुःख एक ओर रखकर भरतन जी भास्करराव को सांत्वना देने के लिए कार्यालय पहुँच गए।

कल्पना कीजिए, अथवा इस प्रसंग को अपनी आँखों के सामने घटित होते हुए देखिए…

कितना अद्भुत और हृदय को झकझोर देने वाला वह प्रसंग रहा होगा…?

एक स्वयंसेवक पिता ने राष्ट्रकार्य के लिए समर्पित अपना युवा पुत्र खोया है और वही जन्मदाता पिता अपने पुत्र के पालक—अर्थात प्रांत प्रचारक—का सांत्वना देने के लिए कार्यालय में आ रहा है।

उस समय उस पिता के मन में कैसी भावनाएँ रही होंगी…?

निश्चित रूप से उसके पीछे एक ही विचार था—

जिस दिन मेरा पुत्र प्रचारक बनकर घर से बाहर निकला, उसी दिन से उस पर मेरा अधिकार समाप्त हो गया। अब उस पर अधिकार केवल संघ का है और संघ में सर्वोच्च दायित्व संभालने वाले प्रांत प्रचारक का है…!

वास्तव में केरल का यह केवल एक प्रतिनिधिक उदाहरण है। ऐसे असंख्य कर्मठ, निष्ठावान कार्यकर्ताओं और परिवारों को भास्करराव ने जोड़ा। इसी शक्ति के आधार पर केरल जैसे छोटे से राज्य का हिंदू समाज सभी राष्ट्रविरोधी और असामाजिक गतिविधियों से संघर्ष करते हुए तनी हुई गर्दन के साथ खड़ा है।

इसका पूरा श्रेय निश्चित रूप से संघ को है और उसमें भी 38 वर्षों तक प्रचारक के रूप में कार्य करने वाले भास्करन जी का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण है।

साभार – फेसबुक से

पत्रकारिता ट्रेनिंग की सबसे बेसिक बातें बतानी पड़ रहीं हैं कथित पत्रकारों को

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दिल्ली। दिल्ली पुलिस की गाइडलाइन कोई नया सेंसरशिप कानून नहीं है। वह यह नहीं कहती कि कंटेंट क्रिएटर कैमरा नहीं उठा सकता, वीडियो नहीं बना सकता या अपनी राय नहीं रख सकता। वह सिर्फ इतना कहती है कि भीड़, तनाव और पुलिस कार्रवाई के बीच जो व्यक्ति पत्रकार के रूप में पहचान, दूरी और पहुंच मांगे, उसे संगठन या पीआईबी/डीआईपी का वैध पहचान पत्र दिखाना होगा, उसे प्रदर्शनकारियों से अलग खड़ा होना होगा और पुलिस के काम में शारीरिक बाधा नहीं डालनी होगी। यह अभिव्यक्ति की आजादी पर रोक नहीं, ऑपरेशनल सावधानी है।

सवाल यही है कि कंटेंट क्रिएटर पत्रकार का चोला क्यों ओढ़े। ऑरेंज इकोनॉमी और एक करोड़ युवाओं को क्रिएटर इकोसिस्टम से जोड़ने की बात कवरेज की आजादी से अलग है। सरकार क्रिएटर्स को आर्थिक अवसर दे रही है, उन्हें कानून से ऊपर का दर्जा नहीं। कोई भी व्यक्ति सार्वजनिक जगह पर फोन से रिकॉर्डिंग कर सकता है। लेकिन जब कोई समूह खुद को ‘मीडिया’ बताकर कांस्टेबल को वरिष्ठ अधिकारी समझकर घेर ले, सवालों की बौछार करे और टकराव का क्लिप बनाए, तो वह रिपोर्टिंग नहीं, मंचन है। ऐसे में पुलिस को यह तय करना पड़ता है कि कौन कवर कर रहा है और कौन भीड़ का हिस्सा बनकर ऑपरेशन रोक रहा है।

अभिव्यक्ति की आजादी पत्रकारों का एकाधिकार नहीं है। फर्क पहचान और उद्देश्य का है। पत्रकार संस्थागत जवाबदेही, संपादकीय प्रक्रिया और पहचान पत्र के साथ आता है। कंटेंट क्रिएटर अपने दर्शक और एल्गोरिदम के प्रति जवाबदेह होता है। दोनों काम कर सकते हैं, पर दोनों एक नहीं हैं। जब एक्टिविस्ट समूह के मीडिया हैंडल वाले लोग-जैसे रोज़ी, जो रिपोर्टर नहीं बल्कि अभिजीत दिपके के आंतरिक समूह से जुड़ी हैं और गजेंद्र सिंह के साथ मीडिया संभालती हैं-खुद को स्वतंत्र पत्रकार बताकर मैदान में आते हैं, तो पुलिस के लिए सीमा खींचना मजबूरी हो जाती है। कवरेज का नाम लेकर संघर्ष पैदा करना और फिर उसी संघर्ष को कंटेंट बनाना, वह काम नहीं है जिसके लिए पहचान की छूट मांगी जा रही है।

मेनस्ट्रीम ब्लैकआउट का आरोप अलग बहस है। कानून-व्यवस्था की जिम्मेदारी पुलिस की है। अगर हर मोबाइल वाला व्यक्ति पत्रकार की प्रतिरक्षा और पहुंच मांगे, तो भीड़ और मीडिया में फर्क मिट जाएगा। जो क्रिएटर ईमानदारी से कवर करना चाहता है, वह अपनी पहचान साफ कहे, दूरी रखे और बाधा न डाले। पत्रकार का वेश पहनकर अराजकता फैलाना न ऑरेंज इकोनॉमी है, न पत्रकारिता। पुलिस की सावधानी इसी फर्क को बचाने के लिए है।

अभद्र पटनायक: आज का पोस्ट मार्टम डॉ. पवन विजय

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पटना। आज अभद्र पटनायक ने कृष्ण को भैंसे का मांस खाने वाला बताया, भैंस मांस को भी अंग्रेजी में बीफ कहते हैं, उसका मकसद इस बीफ का सामान्यीकरण करना है। वह साइमन ब्रॉडबैक के हवाले से बड़ी महीन बात कर रहा है। वह निरक्त, पुराण, संदर्भ, विद्वानों के नाम लिख कर माहौल ऐसा बनाता है कि मानों उसका कहा हर शब्द शोध की अंतिम सीमा छूकर आया हो।
खैर आज के पोल खोल पर चलते हैं।
मामला गोवर्धन उत्सव में मांस के पहाड़ का है जिसमें अभद्र पटनायक कृष्ण को मांस खिलाते हुए दिखा कर वही जाति का जहर अंत में फैलाता है।
गोवर्धन पर मांस की थाली परोसने वाले इस मिथ्याचारी का संस्कृत उतना ही है जितना जोमैटो वाले का हवाई जहाज उड़ाने का ज्ञान। हरिवंश पुराण में विष्णु पर्व अध्याय पंद्रह से उन्नीस में गोवर्धन की कथा का उल्लेख करता है, झूठा पटनायक साठवें अध्याय का हवाला देता हैं, भविष्य पर्व के कुबेर युद्ध को गोवर्धन बताता है। जब अध्याय ही गलत तो पाठ क्या पढ़ा होगा। जिस श्लोक में अन्नबलि लिखा है उसे पशुबलि पढ़ता है।
इसी से इसकी मूर्खता और एजेंडेबाज होने का पता चल जाता है।
बलि माने भेंट, तुलसी भी बलि है, अन्न भी बलि है, पर इन्हें हर बलि में खून ही दिखता है क्योंकि इनकी दृष्टि ही खूनी है। हरिवंश में आता है मांसराशयः पायसराशयः दधिह्रदाः। यह कवि की अतिशयोक्ति है, इतना खाना कि पहाड़ लग गए, झीलें भर गईं। इसका अर्थ यह नहीं कि कृष्ण बैठकर मांस चबा रहे थे, अर्थ यह है कि पूरा बृज खा रहा था, ब्राह्मण से लेकर चांडाल और कुत्ते तक। भागवत ने इसी को साफ किया, अन्नकूट माने अन्न का पहाड़। पर अभद्र पटनायक तो कृष्ण को भी शूद्र-भोजन और बनिया-भोजन में बांटना है। कृष्ण गोपाल हैं, न तुम्हारी लैब का शूद्र न तुम्हारे मॉल का बनिया। जो गाय के लिए इंद्र से लड़ जाए वो अपनी गायों के सामने भैंसा कटवाएंगे, इतनी भी पटनायक के पास बुद्धि नहीं।
इसके बाद पटनायक निरुक्त का नंगा नाच करता है, मांस को फल सिद्ध करना है। यास्क को भी हंसी आ जाए। निरुक्त में मांस का अर्थ है माम् सः खादति इति मांसम्, जो मुझे खाता है मैं उसे खाऊंगा, यह शरीर है।अब जो इसका असली मकसद है उस पर आते हैं, इसका खेल सनातन को ही सनातन से काटना है। यह कहता है कि देखो तुम्हारे कृष्ण मांसाहारी थे, तुम पाखंडी हो, आज का हिंदू अपराधबोध में रहे। हजार साल से बृज में गोवर्धन पर अन्न का पहाड़ लगता है, छप्पन भोग लगता है, मांस का ढेर नहीं लगता लेकिन अभद्र पटनायक गोवर्धन पर मांस का पहाड़ लेकर आया है।
शाकाहार मांसाहार पर फिर कभी विमर्श करूंगा, इसलिए एडिट कर रहा । दूध माखन दही कृष्ण की पहचान है, गोपाल होने के नाते और वामपंथियों को इसी छवि को तोड़ना होता है क्योंकि यह छवि भक्त वत्सल की छवि है।
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