सेंसर बोर्ड: सनातन विरोधी साजिश का अड्डा या नौकरशाही की नाकामी?

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केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (सेंसर बोर्ड) एक बार फिर विवादों के घेरे में है। ताजा मामला योगी आदित्यनाथ की बायोपिक से जुड़ा है, जिसे सेंसर बोर्ड ने कथित तौर पर मंजूरी देने में आनाकानी की। यह कोई नई कहानी नहीं है। ‘कश्मीर फाइल्स’, ‘द केरल स्टोरी’, ‘उदयपुर फाइल्स’, ‘इमरजेंसी’ और ‘हिज स्टोरी ऑफ इतिहास’ जैसी फिल्में, जो सनातन धर्म और राष्ट्रीय हितों को मजबूत करने वाली कहानियां पेश करती हैं, सेंसर बोर्ड के जाल में फंसती रही हैं। दूसरी ओर, सनातन विरोधी या विवादास्पद कथानकों वाली फिल्मों को हरी झंडी मिलने में देरी नहीं होती। क्या सेंसर बोर्ड के भीतर सनातन विरोधी ताकतों का कब्जा है, या यह महज नौकरशाही की काहिली है? यह सवाल आज हर देशभक्त के मन में कौंध रहा है।
सेंसर बोर्ड का इतिहास रहा है सत्ता के इशारों पर नाचने का। लेकिन जब केंद्र में भाजपा की सरकार है, तब भी सनातन के पक्ष में बनने वाली फिल्मों को रोका जाना चौंकाने वाला है। ‘कश्मीर फाइल्स’ को सेंसर बोर्ड ने महीनों लटकाए रखा। ‘द केरल स्टोरी’ को भी तमाम आपत्तियों का सामना करना पड़ा। ‘उदयपुर फाइल्स’ और ‘इमरजेंसी’ जैसी फिल्में, जो भारत के कड़वे सच को सामने लाती हैं, सेंसर बोर्ड की कैंची से बच नहीं पाईं। अब योगी आदित्यनाथ की बायोपिक का लटकना इस बात का सबूत है कि सेंसर बोर्ड में कुछ लोग सनातन और राष्ट्रवादी नैरेटिव को दबाने की कोशिश में लगे हैं।
सवाल उठता है कि आखिर सेंसर बोर्ड में बैठे ये लोग कौन हैं? क्या ये वही पुराने सिस्टम के दलाल हैं, जो वामपंथी और सनातन विरोधी ताकतों के इशारों पर काम करते हैं? सूत्रों की मानें तो बोर्ड के कई सदस्यों का चयन अभी भी पुरानी व्यवस्था के तहत हुआ है, जहां वामपंथी विचारधारा और बॉलीवुड के कुछ खास गिरोहों का दबदबा है। यह वही गिरोह है, जो शाहरुख खान और आमिर खान जैसे सितारों को राष्ट्रीय पुरस्कार और ब्रैंड एम्बेसडर जैसे सम्मान दिलवाने में कामयाब रहा है।
भाजपा सरकार पर सवाल उठ रहे हैं कि वह सत्ता में होने के बावजूद सेंसर बोर्ड जैसे महत्वपूर्ण संस्थानों को नियंत्रित क्यों नहीं कर पा रही? क्या यह नौकरशाही की चालाकी है या सरकार की उदासीनता? केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के तहत काम करने वाला सेंसर बोर्ड आज भी उन लोगों के चंगुल में है, जो सनातन संस्कृति और राष्ट्रवादी विचारधारा को कमजोर करने में जुटे हैं। यह विडंबना है कि एक तरफ सरकार ‘सनातन संस्कृति’ की बात करती है, वहीं दूसरी ओर उसका अपना तंत्र उसी संस्कृति के खिलाफ काम कर रहा है।
सेंसर बोर्ड की इस हरकत का असर केवल फिल्मों तक सीमित नहीं है। यह एक बड़े सांस्कृतिक युद्ध का हिस्सा है, जहां सनातन और राष्ट्रवादी नैरेटिव को दबाने की कोशिश हो रही है। अगर सरकार को इस साजिश को तोड़ना है, तो सेंसर बोर्ड में व्यापक सुधार की जरूरत है। इसके लिए पारदर्शी चयन प्रक्रिया, राष्ट्रवादी सोच वाले सदस्यों की नियुक्ति और सख्त निगरानी जरूरी है। अन्यथा, यह धारणा और मजबूत होगी कि भाजपा सिर्फ सरकार में है, सत्ता में नहीं।

कांग्रेस विधायक के भ्रष्टाचार पर सवाल, वोट चोरी के शोर में नोट चोरी छिपाने की कोशिश?

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बेंगलुरु: कर्नाटक के चित्रदुर्ग से कांग्रेस विधायक केसी वीरेंद्र उर्फ ‘पप्पी’ की प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) द्वारा गिरफ्तारी ने कांग्रेस पार्टी को एक बार फिर विवादों के घेरे में ला दिया है। ईडी ने ऑनलाइन और ऑफलाइन सट्टेबाजी से जुड़े मनी लॉन्डरिंग मामले में वीरेंद्र को गंगटोक से गिरफ्तार किया। छापेमारी में 12 करोड़ रुपये नकद (जिनमें 1 करोड़ की विदेशी मुद्रा शामिल), 6 करोड़ का सोना, 10 किलो चांदी, चार लग्जरी गाड़ियां, 17 बैंक खाते, और दो लॉकर जब्त किए गए। जांच में पता चला कि वीरेंद्र King567 और Raja567 जैसे ऑनलाइन बेटिंग साइट्स संचालित कर रहे थे, जिसमें उनके भाई केसी थिप्पेस्वामी और केसी नागराज भी शामिल थे।
यह मामला तब और गंभीर हो गया जब पता चला कि 2016 में भी आयकर विभाग ने वीरेंद्र के घर से 5 करोड़ नकद और 30 किलो सोना बरामद किया था। यह सवाल उठता है कि इतने बड़े पैमाने पर अवैध धन का संचय कैसे संभव हुआ, और क्या यह कांग्रेस के भीतर भ्रष्टाचार की गहरी जड़ों को दर्शाता है?इसी बीच, कांग्रेस नेता राहुल गांधी ‘वोट चोरी’ का मुद्दा उठाकर चुनाव आयोग पर हमला बोल रहे हैं। उन्होंने कर्नाटक के महादेवपुरा में 1,00,250 वोटों की कथित चोरी का दावा किया, जिसमें डुप्लिकेट वोटर और फर्जी पते शामिल हैं। हालांकि, विपक्षी नेताओं और सोशल मीडिया पर यह सवाल उठ रहा है कि क्या यह ‘वोट चोरी’ का शोर पार्टी के भीतर ‘नोट चोरी’ जैसे भ्रष्टाचार के मामलों को दबाने की रणनीति है?
कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने वोट चोरी की जांच का ऐलान किया है, लेकिन वीरेंद्र जैसे नेताओं के भ्रष्टाचार पर उनकी चुप्पी सवाल उठाती है। सोशल मीडिया पर लोग कह रहे हैं, “कांग्रेस पहले नोट चोरी का हिसाब दे, फिर वोट चोरी की बात करे।”
यह घोटाला कांग्रेस की विश्वसनीयता पर सवाल उठाता है। जनता पूछ रही है कि क्या पार्टी भ्रष्टाचार पर पर्दा डालने के लिए ‘वोट चोरी’ जैसे मुद्दों का सहारा ले रही है?

पटना में इंजीनियर की काली कमाई की कहानी: रातभर जले नोट, फिर भी बचे 39 लाख

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पटना : बिहार की राजधानी पटना में एक ऐसी घटना सामने आई है, जो न केवल चौंकाने वाली है, बल्कि गहरी विडंबनाओं को भी उजागर करती है। आर्थिक अपराध इकाई (EOU) ने ग्रामीण कार्य विभाग के अधीक्षण अभियंता विनोद राय के घर पर छापेमारी की, जिसमें करोड़ों रुपये की काली कमाई का खुलासा हुआ। छापेमारी में नकदी, जले हुए नोट, आभूषण, और करोड़ों की संपत्ति के दस्तावेज बरामद हुए। खबरों के अनुसार, विनोद राय और उनकी पत्नी ने सबूत मिटाने के लिए रातभर नोट जलाए, जिससे उनके घर की नालियां जाम हो गईं। फिर भी, 39 लाख रुपये की नकदी और अन्य संपत्तियां जांच एजेंसी के हाथ लगीं। यह कहानी बिहार की उस त्रासदी को दर्शाती है, जहां एक ओर भयंकर गरीबी है, तो दूसरी ओर कुछ लोग काले धन के पहाड़ पर बैठे हैं। इस कहानी में एक अजीब ट्विस्ट यह है कि ‘विनोद राय’ नाम जो कभी पूरे भारत में भ्रष्टाचारियों के लिए भय का पर्याय बन गया था, वही नाम आज पटना में सबसे बड़े भ्रष्टाचारी के रूप में सामने आया है। जिनसे भ्रष्टाचारी डरते थे, वे सीएजी थे। पटना में जो गिरफ्तार हुआ है, वह भ्रष्टाचारी है।

विनोद राय: दो चेहरों का ट्विस्ट
“विनोद राय” नाम सुनते ही भारत में लोगों के दिमाग में एक ईमानदार और निष्पक्ष छवि उभरती है। पूर्व नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (CAG) विनोद राय ने अपने कार्यकाल में 2G और कोयला घोटाले जैसे बड़े भ्रष्टाचार के मामलों को उजागर कर भ्रष्टाचारियों के लिए खौफ का प्रतीक बनाया था। उनकी रिपोर्ट्स ने सरकार को हिलाकर रख दिया और भ्रष्टाचार के खिलाफ एक नई लड़ाई छेड़ी। लेकिन पटना के इस विनोद राय ने इस नाम की साख को तार-तार कर दिया। यह विनोद राय, जो ग्रामीण कार्य विभाग का इंजीनियर है, बिहार का नंबर वन भ्रष्टाचारी निकला। यह ट्विस्ट न केवल हैरान करने वाला है, बल्कि यह भी दिखाता है कि एक ही नाम दो विपरीत छवियों को कैसे जन्म दे सकता है—एक भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ने वाला, तो दूसरा भ्रष्टाचार का प्रतीक।

छापेमारी की कहानी: काले धन का साम्राज्य
पटना के भूतनाथ रोड पर स्थित विनोद राय के चार मंजिला आलीशान घर पर EOU की टीम ने गुरुवार रात छापा मारा। सूत्रों के मुताबिक, विनोद राय को छापेमारी की भनक पहले ही लग चुकी थी। जब EOU की टीम उनके घर पहुंची, तो घर बंद मिला। रात 11 बजे से सुबह 5 बजे तक टीम बाहर इंतजार करती रही। इस दौरान विनोद राय और उनकी पत्नी बबली राय छत पर जाकर 2 से 3 करोड़ रुपये की नकदी को कथित तौर पर आग के हवाले करते रहे। जले हुए नोटों की राख ने घर की नालियों को जाम कर दिया, जिसके लिए नगर निगम की टीम को बुलाना पड़ा। फोरेंसिक साइंस लैब (FSL) की टीम ने जले हुए नोटों की जांच की ताकि नष्ट की गई राशि का अनुमान लगाया जा सके।

छापेमारी में EOU ने 39 से 55 लाख रुपये की नकदी, 20 लाख रुपये के जले हुए नोट, 10 से 26 लाख रुपये के सोने-चांदी के आभूषण, और करोड़ों रुपये की संपत्ति के दस्तावेज बरामद किए। इसके अलावा, विनोद राय के पास 12 से अधिक बैंक खाते, राडो और रोलेक्स जैसी महंगी घड़ियां, और लगभग 100 करोड़ रुपये की चल-अचल संपत्ति होने का अनुमान है। यह संपत्ति एक सरकारी इंजीनियर की वैध आय से कहीं अधिक है, जो भ्रष्टाचार के जरिए काले धन का साम्राज्य खड़ा करने का सबूत है।

बिहार की आर्थिक विडंबना
यह घटना बिहार की उस कटु सच्चाई को उजागर करती है, जहां एक तरफ गरीबी और बेरोजगारी का आलम है, तो दूसरी ओर कुछ लोग काले धन के दम पर ऐशो-आराम की जिंदगी जी रहे हैं। बिहार में रियल एस्टेट की कीमतें आसमान छू रही हैं, और इसका बड़ा कारण काले धन का प्रवाह है। विनोद राय जैसे लोग इस काले धन को रियल एस्टेट और अन्य व्यवसायों में निवेश करते हैं, जिससे आम लोगों के लिए घर खरीदना लगभग असंभव हो गया है। इस ट्विस्ट में विडंबना यह है कि जिस नाम ने कभी भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई लड़ी, वही अब उसी भ्रष्टाचार का प्रतीक बन गया।

रेस्टोरेंट और होटल का काला खेल
पटना में रेस्टोरेंट और होटल व्यवसाय भी काले धन के खेल का हिस्सा बन चुके हैं। कई रेस्टोरेंट की कीमतें मेट्रो सिटी से भी अधिक हैं, लेकिन गुणवत्ता बेहद खराब है। इसका कारण यह है कि ये व्यवसाय अक्सर काले धन को सफेद करने के लिए खोले जाते हैं। इनके मालिकों का उद्देश्य ग्राहक संतुष्टि या प्रोफेशनलिज्म नहीं, बल्कि पैसे को वैध बनाना होता है। ऐसे व्यवसाय ग्राहकों को ठगने का जरिया बन जाते हैं, जहां न स्वाद होता है, न सेवा। फिर भी, काले धन के दम पर ये धंधे फलते-फूलते हैं।

भ्रष्टाचार का गहरा जाल
विनोद राय का मामला बिहार में भ्रष्टाचार की गहरी जड़ों को उजागर करता है। उन्होंने सीतामढ़ी और मधुबनी में अपने कार्यकाल के दौरान टेंडर पास करने और बिलों को मंजूरी देने के लिए करोड़ों रुपये की रिश्वत ली। गुरुवार को वह मधुबनी से 4 करोड़ रुपये लेकर अपनी इनोवा कार से पटना आए थे, जिसका एक हिस्सा किसी “व्हाइट-कॉलर” व्यक्ति को देना था। EOU को इसकी सूचना मिली, जिसके बाद छापेमारी हुई। विनोद राय के खिलाफ आय से अधिक संपत्ति, सबूत नष्ट करने, और सरकारी काम में बाधा डालने के आरोप में मामला दर्ज किया गया है। इस मामले को प्रवर्तन निदेशालय (ED) को भी भेजा जा सकता है।

बिहार का दुर्भाग्य
विनोद राय की कहानी बिहार के उस दुर्भाग्य को दर्शाती है, जहां लोग दो वक्त की रोटी के लिए तरस रहे हैं, और कोई रातभर नोट जला रहा है। यह विडंबना तब और गहरी हो जाती है, जब हम इस विनोद राय को उस विनोद राय से जोड़ते हैं, जिन्होंने भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई लड़ी थी। यह ट्विस्ट बिहार की सामाजिक और आर्थिक असमानता को उजागर करता है, जहां एक ओर गरीबी है, तो दूसरी ओर भ्रष्टाचार का बोलबाला। यह कहानी न केवल एक इंजीनियर की भ्रष्टाचार की कहानी है, बल्कि उस बिहार की सच्चाई है, जहां अमीरी और गरीबी की खाई दिन-ब-दिन बढ़ रही है।

धर्मस्थला सामूहिक दफन कांड: सत्य की खोज में पावर और पैसे का खेल

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धर्मस्थला। कर्नाटक के मंगलुरु जिले में स्थित धर्मस्थला, एक पवित्र तीर्थस्थल के रूप में जाना जाता है, जहां हर साल लाखों श्रद्धालु आस्था और शांति की तलाश में आते हैं। लेकिन जुलाई 2025 में एक सनसनीखेज खुलासे ने इस तीर्थस्थल की पवित्रता पर सवालिया निशान लगा दिया। एक पूर्व सफाई कर्मचारी, जिसे अब नकाबपोश गवाह के रूप में जाना जाता था, ने दावा किया कि उसने 1995 से 2014 तक धर्मस्थला मंदिर प्रशासन के निर्देश पर सैकड़ों शवों को दफनाया या जलाया, जिनमें ज्यादातर महिलाएं और नाबालिग लड़कियां थीं। इन शवों पर यौन उत्पीड़न और हिंसक हमलों के निशान होने का दावा किया गया। इस खुलासे ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया, लेकिन जैसे-जैसे जांच आगे बढ़ी, यह मामला रहस्य, साजिश और ताकतवर लोगों के प्रभाव का शिकार होता नजर आ रहा है। अब इस पूरे मामले को दबाने की कोशिशें, गवाह की गिरफ्तारी, गायब होती फाइलें और सत्य को दबाने की साजिश ने इसे और जटिल बना दिया है। क्या धर्मस्थला का यह कांड हमेशा के लिए रहस्य बनकर रह जाएगा, या सत्य सामने आएगा? यह न्यूज रिपोर्ट इस मामले की पूरी कहानी को उजागर करती है।कहानी की शुरुआत: नकाबपोश गवाह का सनसनीखेज खुलासा3 जुलाई 2025 को दक्षिण कन्नड़ जिले के धर्मस्थला पुलिस स्टेशन में एक शिकायत दर्ज की गई, जिसमें एक पूर्व सफाई कर्मचारी ने दावा किया कि उसने 19 साल (1995-2014) तक धर्मस्थला मंदिर प्रशासन के लिए काम किया और इस दौरान सैकड़ों शवों को दफनाने या जलाने के लिए मजबूर किया गया। उसने दावा किया कि इन शवों में ज्यादातर महिलाएं और नाबालिग लड़कियां थीं, जिनका बलात्कार और हत्या के बाद शव ठिकाने लगाए गए। यह गवाह, जिसकी पहचान शुरू में गुप्त रखी गई थी, 11 जुलाई 2025 को बेलथांगडी कोर्ट में भारी सुरक्षा के बीच नकाब पहनकर पेश हुआ और भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 183 के तहत अपना बयान दर्ज कराया। उसने 15 संदिग्ध स्थानों की पहचान की, जहां शव दफनाए गए थे, और एक मानव खोपड़ी को सबूत के तौर पर पुलिस को सौंपा।

इस गवाह ने दावा किया कि वह 2014 में अपने परिवार के साथ धर्मस्थला से इसलिए भाग गया था, क्योंकि उसकी एक रिश्तेदार लड़की के साथ भी ऐसी ही घटना हुई थी। डर और पछतावे ने उसे 10 साल बाद वापस लौटने और सच सामने लाने के लिए प्रेरित किया। उसने यह भी कहा कि उसे सपनों में हड्डियां दिखाई देती थीं, जिसके कारण वह सत्य को उजागर करने के लिए सामने आया।SIT का गठन और जांच की शुरुआतइस खुलासे के बाद कर्नाटक सरकार पर दबाव बढ़ा, और 19 जुलाई 2025 को मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के निर्देश पर एक विशेष जांच दल (SIT) का गठन किया गया। इसकी अगुवाई डीजीपी (आंतरिक सुरक्षा) प्रणब मोहंती को सौंपी गई, जिसमें डीआईजी एमएन अनुचेथ, डीसीपी सौम्यलता, और एसपी जितेंद्र कुमार दयामा सहित 20 पुलिस अधिकारी शामिल थे। SIT को धर्मस्थला और पूरे राज्य में इससे जुड़े सभी अपराधों, लापता मामलों और यौन उत्पीड़न की घटनाओं की जांच का जिम्मा दिया गया।28 जुलाई 2025 से SIT ने नेत्रावती नदी के किनारे और अन्य संदिग्ध स्थानों पर खुदाई शुरू की।

गवाह ने 15 स्थानों की पहचान की थी, जिनमें से 8 नेत्रावती नदी के किनारे, 4 हाईवे के पास, और 2 कण्याडी इलाके में थे। शुरूआती खुदाई में कोई खास सफलता नहीं मिली। 29 और 30 जुलाई को साइट नंबर 1, 2, 3, 4 और 5 पर खुदाई हुई, लेकिन कोई मानव अवशेष नहीं मिले। हालांकि, गवाह के वकील मंजूनाथ एम ने दावा किया कि साइट नंबर 2 पर एक लाल ब्लाउज का टुकड़ा, एक पैन कार्ड, और एक एटीएम कार्ड (लक्ष्मी नाम की महिला के नाम पर) मिला, जिसे SIT ने नकार दिया।

31 जुलाई 2025 को साइट नंबर 6 पर एक बड़ी सफलता मिली, जहां 4 फीट की गहराई पर आंशिक मानव कंकाल बरामद हुए। इन अवशेषों को फोरेंसिक जांच के लिए भेजा गया। इसके बाद साइट नंबर 11-ए पर भी कंकाल मिले, जिसने जांच को नया मोड़ दिया। गवाह ने दावा किया कि साइट नंबर 13 पर सबसे ज्यादा शव दफनाए गए हैं, और वहां की खुदाई अभी बाकी है।गवाह की गिरफ्तारी: सत्य पर सवालजांच के दौरान गवाह की पहचान को गवाह संरक्षण योजना (Witness Protection Act) के तहत गुप्त रखा गया था। उसे मास्क और सूट पहनाकर जांच स्थलों पर ले जाया जाता था। लेकिन अगस्त 2025 में एक चौंकाने वाला मोड़ आया, जब इस गवाह को गिरफ्तार कर लिया गया। उसकी पहचान और तस्वीरें, जो गोपनीय रखी जानी थीं, सार्वजनिक हो गईं। यह एक गंभीर उल्लंघन था, क्योंकि गवाह ने अपनी और अपने परिवार की जान को खतरे की बात कही थी।

गवाह की गिरफ्तारी के कारण स्पष्ट नहीं किए गए, लेकिन सूत्रों का कहना है कि उस पर झूठे दावे करने और सबूतों के साथ छेड़छाड़ का आरोप लगाया गया। यह कदम जांच की विश्वसनीयता पर सवाल उठाता है। गवाह ने पहले ही दावा किया था कि वह ताकतवर लोगों के निशाने पर है, और उसकी गिरफ्तारी ने इन आशंकाओं को और बल दिया। क्या यह सत्य को दबाने की साजिश का हिस्सा था?गायब फाइलें और ताकतवर लोगों का संदेहधर्मस्थला पुलिस और बेलथांगडी थाने से 1995 से 2014 तक के लापता लोगों और हत्याओं की फाइलें मांगी गईं, लेकिन चौंकाने वाला खुलासा हुआ कि ये फाइलें थोक के भाव में गायब हैं। सौजन्या (2012), अनन्या भट, पद्मलता, और अन्य कई लापता मामलों की फाइलें गायब होने से जांच में रुकावट आई। यह संदेह पैदा करता है कि क्या इन फाइलों को जानबूझकर गायब किया गया ताकि पुराने अपराधों का सच सामने न आए।

सौजन्या बलात्कार और हत्या मामले (2012) ने पहले ही धर्मस्थला को सुर्खियों में ला दिया था। सौजन्या की मां कुसुमावती ने SIT से इस मामले को भी जांच में शामिल करने की मांग की। कई स्थानीय लोग और सामाजिक संगठन, जैसे सौजन्या न्याय समिति, पुराने मामलों को दोबारा खोलने की मांग कर रहे हैं। लेकिन इन मांगों को अनसुना किया जा रहा है, और जांच को कमजोर करने के लिए ताकतवर लोगों का हाथ होने का संदेह गहरा रहा है।
सोशल मीडिया पर वायरल एक पोस्ट ने और सनसनी मचा दी, जिसमें हासन के एसडीएम कॉलेज ऑफ आयुर्वेद के एक छात्र ने दावा किया कि उन्हें SIT जांच के खिलाफ विरोध मार्च में शामिल होने के लिए मजबूर किया जा रहा है। इस पोस्ट को कुछ घंटों बाद डिलीट कर दिया गया, लेकिन इसने सवाल उठाया कि क्या कुछ प्रभावशाली लोग जांच को प्रभावित करने की कोशिश कर रहे हैं।जांच में बाधाएं और CBI की मांगSIT की जांच को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। नेत्रावती नदी के किनारे और रिजर्व फॉरेस्ट में खुदाई मुश्किल रही, क्योंकि भारी बारिश और जंगल की परिस्थितियों ने काम को प्रभावित किया। जेसीबी मशीनों का सीमित उपयोग हुआ, और ज्यादातर खुदाई मैन्युअल करनी पड़ी। इसके अलावा, SIT प्रमुख प्रणब मोहंती को केंद्र सरकार की प्रतिनियुक्ति के कारण हटाए जाने की अफवाहों ने भी जांच की पारदर्शिता पर सवाल उठाए।

स्थानीय लोग और मानवाधिकार संगठन अब इस मामले की CBI जांच की मांग कर रहे हैं। उनका मानना है कि SIT पर स्थानीय और राजनीतिक दबाव है, जिसके कारण सत्य को दबाने की कोशिश हो रही है। गवाह की गिरफ्तारी, गायब फाइलें, और जांच में देरी ने इस मांग को और मजबूत किया है। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने भी इस मामले पर नजर रखना शुरू कर दिया है, और कई लापता लोगों के परिवार आयोग से संपर्क कर चुके हैं।सत्य को दबाने की साजिश?धर्मस्थला मामले में कई सवाल अनुत्तरित हैं। गवाह ने दावा किया कि उसने मंदिर प्रशासन के सूचना केंद्र से शव दफनाने के आदेश प्राप्त किए, लेकिन कोई ठोस सबूत सामने नहीं आया कि ये आदेश किसने दिए। ग्राम पंचायत या मंदिर प्रशासन के पास शवों का कोई रिकॉर्ड नहीं है। गवाह के वकील मंजूनाथ एम ने यह भी दावा किया कि साइट नंबर 13 पर सबसे ज्यादा शव दफनाए गए हैं, और वहां की खुदाई से बड़े खुलासे हो सकते हैं। लेकिन इस साइट की जांच अभी तक शुरू नहीं हुई है, जिससे संदेह और गहरा रहा है।

14 अगस्त 2025 को आजतक के साथ एक विशेष साक्षात्कार में गवाह ने कहा, “मुझे सपनों में हड्डियां दिखती थीं। मैंने 70-80 शव दफनाए, जिनमें 90% महिलाएं थीं।” उसने यह भी बताया कि शवों को जंगल में बेतरतीब दफनाया जाता था, और उसे मंदिर के सूचना केंद्र से आदेश मिलते थे। लेकिन SIT का दावा है कि अब तक मिले अवशेष ज्यादातर पुरुषों के हैं, जो गवाह के दावों से मेल नहीं खाते। यह विसंगति सवाल उठाती है कि क्या गवाह के दावों को जानबूझकर कमजोर किया जा रहा है?क्या सत्य सामने आएगा?धर्मस्थला सामूहिक दफन कांड भारत के सबसे दहला देने वाले अपराधों में से एक हो सकता है, लेकिन सत्य को उजागर करने की राह में कई रुकावटें हैं। गवाह की गिरफ्तारी, उसकी पहचान का खुलासा, गायब फाइलें, और जांच में देरी यह संकेत देती हैं कि ताकतवर लोग इस मामले को रफा-दफा करने की कोशिश में हैं। पैसे और पावर का यह खेल न केवल जांच को प्रभावित कर रहा है, बल्कि उन परिवारों की उम्मीदों को भी तोड़ रहा है, जो अपने लापता प्रिय जनों का सच जानना चाहते हैं।
CBI जांच की मांग अब और तेज हो रही है, क्योंकि स्थानीय जांच पर भरोसा कम होता जा रहा है। गवाह संरक्षण योजना का उल्लंघन और पत्रकारों व यूट्यूबर्स पर हमले इस मामले की गंभीरता को दर्शाते हैं। धर्मस्थला, जो कभी आस्था का प्रतीक था, अब एक भयावह रहस्य का केंद्र बन चुका है। सवाल यह है कि क्या सत्य कभी सामने आएगा, या यह कांड हमेशा के लिए अंधेरे में दफन हो जाएगा?

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