यू जी सी के बहाने बड़े बदलाव का मौका

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सुरेंद्र चतुर्वेदी

जयपुर : केंद्र सरकार के अति उत्साह ने समाज को आंदोलित कर दिया है। यह दूसरा अवसर है जब केंद्र सरकार के निर्णय से आम जनता में ना केवल आक्रोश है अपितु गहरी निराशा भी। यू जी सी दिशा निर्देशों के आने से पहले भाजपा के चार सौ पार के नारे पर समाज का समर्थन नहीं मिला। इसके अलावा किसान सुधार बिल पर जनता में मिश्रित प्रतिक्रिया थी लेकिन किसी ने भी केंद्र सरकार की नीयत पर सवाल नहीं उठाए। किसान आंदोलन को लोगों ने राजनीतिक हताशा में उपजा आंदोलन माना, और इस प्रमाण को भी स्वीकारा कि किसान आंदोलन के बहाने मोदी के पक्ष में आए जनमत को ठुकराने की वह विदेशी चाल थी, जिसे भारत के कुछ अवसरवादी राजनीतिक दल हवा दे रहे थे ! लेकिन इस बार बात अलग है। समाज के सभी वर्गों में यू जी सी दिशा निर्देशों को लेकर तीखी प्रतिक्रिया है। आश्चर्यजनक तथ्य तो ये है कि समाज के जिस वर्ग को आश्वस्त करने के लिए ये दिशा निर्देश जारी किए गए, उसमें ही काफ़ी अंतर्विरोध उभर आया है। सर्वोच्च न्यायालय की रोक के बावजूद समाज में यह विषय तेजी से अपनी जगह बनाता जा रहा है।

राजनीतिक समीक्षक मानते हैं कि भाजपा के मातृ संगठन *राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष में आए इन दिशा निर्देशों ने संघ के सामाजिक सौहार्द के प्रयासों को बहुत अंदर तक चोट पहुंचाई है। संघ हिंदू समाज को जातिगत भेदभाव से ऊपर उठाकर हिंदू होने के स्वाभिमान के साथ देश में एकात्मता का वातावरण बना रहा है लेकिन मानव संसाधन विकास मंत्रालय के इस आदेश ने संघ की एकात्मक विचारधारा को ही खोखला करने की शुरुआत कर दी है।* हिंदू समाज को जातियों में बांटने का जो काम विपक्ष के नेता राहुल गांधी नहीं कर पाए, इसे एक सरकारी आदेश ने कर दिखाया।

यह सही है कि 2014 के लोकसभा चुनावों के बाद भाजपा ने समाज कई उपेक्षित वर्गों को राजनीतिक रूप से नेतृत्व देने में सफलता पाई है जो आजादी के बाद से अपनी पहचान को तरस रहे थे। पूरे देश में राजनीति के माध्यम से परिवर्तन दिख भी रहा है। लेकिन *यह भी उतना ही कड़वा सच है कि अनुसूचित जाति और जनजाति का बड़ा वर्ग भाजपा की बजाय अन्य दलों के साथ अपनी सहजता महसूस करता है, इनके साथ मुस्लिम मतदाताओं के आ जाने से भाजपा के विरोध में वातावरण बनाने में मदद मिलती है जिस पर ग़ैर भाजपाई दलों की गिद्ध दृष्टि बनी रहती है।* इसलिए वो कोई भी ऐसा मौका नहीं चूकते जिससे समाज के इन वर्गों को बरगलाया जा सके। कांग्रेस द्वारा 2024 के आम चुनावों में संविधान को बदल देने का कथानक इसका सबसे बड़ा प्रमाण है।

*सबसे बड़ी समस्या यह है कि यू जी सी दिशा निर्देशों ने भाजपा के परंपरागत मतदाताओं को बहुत नाराज कर दिया है। उनकी नाराज़गी को दूर करने का उपाय आसान भी नहीं है। दूसरी तरफ़ सरकार के पास यह मौक़ा भी है कि वो सम्पूर्ण शिक्षा प्रणाली, मूल्यांकन और अन्वेषण के पुराने और सड चुके सिस्टम को बदल कर एक ऐसी प्रणाली को सामने लाए जो प्रतिभावान की प्रतिभा को जातीय द्वेष से दूर कर उसकी क्षमता और प्रतिभा के अनुसार अवसर उपलब्ध कराये।* ऐसी व्यवस्था का निर्माण देश से प्रतिभा पलायन को रोकने में भी मददगार साबित होगा। यह ऐसा अवसर भी है जब कि केंद्र सरकार पूरे देश के विश्वविद्यालयों अभिव्यक्ति के नाम पर देश विरोधी गतिविधियों की विषबेल का उन्मूलन कर सकती है।

लेकिन मुद्दा यह है कि क्या मोदी सरकार समाज को बांटने वाले इस तरह के कुत्सित प्रयासों को रोकने के लिए कृत संकल्पित है या वो जातीय वैमनस्यता की नर्सरी बन चुके इन शिक्षा परिसरों को राजनीतिक विचारधारा की प्रयोगशाला बने रहना देना चाहती है ?

(लेखक सेंटर फॉर मीडिया रिसर्च एंड डेवलपमेंट से संबद्ध है)

थिरकती परंपरा या चमकता बाज़ार? भारतीय नृत्य शैलियां दोराहे पर!!

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हैदराबाद : भारत में नृत्य केवल मनोरंजन नहीं रहा। यह आत्मा की ज़बान रहा है। मंदिरों की देहरी से लेकर राजदरबारों तक, गांव की चौपाल से लेकर बड़े रंगमंच तक, नृत्य ने भाव, राग और रस की परंपरा को ज़िंदा रखा।

भारत नाट्यम की मुद्राएँ हों या Kathak की चक्करदार चाल, Odissi की त्रिभंगी हो या Manipuri की कोमलता, हर शैली में अनुशासन था, साधना थी, एक ख़ामोश समर्पण था।मगर अब मंजर बदल रहा है।

वैश्वीकरण और लोकतंत्रीकरण के इस दौर में कला भी “सबकी” हो गई है। मंच अब घरानों और गुरुकुलों तक सीमित नहीं रहा। सोशल मीडिया ने दरवाज़े खोल दिए हैं। रील्स, रियलिटी शो, यूट्यूब चैनल, हर हाथ में कैमरा है, हर कोई कलाकार है।

पॉप, हिप-हॉप, कंटेम्परेरी और बॉलीवुड की धुनों पर अब शास्त्रीय मुद्राएँ थिरकती हैं। इसे “फ्यूज़न” कहा जा रहा है। Creativity के नाम पर प्रयोगों की बाढ़ है। सवाल उठता है, यह प्रयोग है या बिगाड़?

उड़ान है या प्रदूषण?
कुछ पुरोधाओं को यह बदलाव रास नहीं आ रहा। उनका कहना है कि शास्त्रीय नृत्य की रूह, उसकी पवित्रता, उसकी तहज़ीब, सब कुछ बाज़ार की चमक में धुंधला हो रहा है। अब मक़सद साधना नहीं, “मास अपील” है। भाव की जगह बाहरी ग्लैमर ने ले ली है।

पहले एक मुद्रा सीखने में सालों का नियमित अभ्यास लगता था। आज कुछ सेकंड की रील में तालियाँ मिल जाती हैं। यह रफ्तार दिलकश है, मगर कहीं गहराई कम तो नहीं हो रही?

लोकप्रियता बढ़ी है, इसमें शक नहीं। हर गली में डांस स्टूडियो है। बच्चे छोटी उम्र से मंच पर हैं। यह लोकतंत्रीकरण एक हद तक सुखद है। कला अब किसी ख़ास वर्ग की मिल्कियत नहीं। पर इसके साथ एक डर भी है, सतहीपन का।

योग का उदाहरण सामने है। कभी वह ध्यान और आत्म-अनुशासन की साधना था। आज फिटनेस उद्योग का हिस्सा है। बुरा नहीं है, मगर मक़सद बदल गया। ठीक वैसा ही नृत्य के साथ हो रहा है। देह की चपलता ज़्यादा दिख रही है, मन की तल्लीनता कम।

तकनीक ने बदलाव को तेज़ कर दिया है। ऑटो-ट्यून, साउंड मिक्सिंग, डिजिटल इफेक्ट्स, संगीत का चेहरा बदल गया। डांस वीडियो में कैमरा एंगल, स्लो मोशन, एडिटिंग, सब मिलकर प्रस्तुति को नया रंग देते हैं। स्टेज की सीमाएँ टूट गईं। इंस्टाग्राम और यूट्यूब नए रंगमंच बन गए हैं।

भाषा का मेल-जोल भी बढ़ा है। हिंदी गानों में अंग्रेज़ी लाइनें, पंजाबी बीट्स पर कथक की घूम, भरतनाट्यम की मुद्राओं में हिप-हॉप का तड़का, यह सिर्फ शब्दों का नहीं, शैलियों का भी मेल, एकता है।

बॉलीवुड ने इस फ्यूज़न को बड़े परदे पर चमकाया है। Devdas के गीत “Dola Re Dola” में Madhuri Dixit की कथक की चक्करें और Aishwarya Rai की भरतनाट्यम-प्रेरित मुद्राएँ दोस्ती और भावनाओं की गहराई दिखाती हैं।

इसी तरह Bajirao Mastani के “Pinga” में Deepika Padukone और Priyanka Chopra ने लावणी और कथक का संगम पेश किया। “Mohe Rang Do Laal” में भाव-रस की गहराई बनी रही।

ये मिसालें बताती हैं, जब फ्यूज़न जड़ों से जुड़ा हो, तो नया सौंदर्य जन्म लेता है। नई पीढ़ी की अपनी रुचि है। उनका अपना अंदाज़ है। वे तेज़ हैं, प्रयोगधर्मी हैं, बेख़ौफ़ हैं। बदलाव हर दौर में हुआ है। कला ने हमेशा समय से गुफ़्तगू की है।

पर परिवर्तन और प्रदूषण के बीच एक नाज़ुक रेखा है। जब मूल तत्व खो जाएँ, जब व्याकरण टूट जाए, तब एहतियात ज़रूरी है।
फ्यूज़न तभी सार्थक है जब उसमें परंपरा के प्रति सम्मान हो, जब रियाज़ की खुशबू बनी रहे।

शास्त्रीय नृत्य केवल स्टेप्स का समूह नहीं। वह दर्शन है। कथा है। आध्यात्म है। उसमें शरीर के साथ मन और आत्मा भी नाचते हैं।
अगर फ्यूज़न इस रूह को साथ लेकर चले, तो यह उड़ान है। अगर उसे पीछे छोड़ दे, तो यह प्रदूषण है।

फैसला हमारे हाथ में है: हम चमक चुनते हैं या गहराई। या फिर दोनों का एक ख़ूबसूरत संतुलन।

ढाका में सत्ता परिवर्तन: BNP की सरकार और भारत–बांग्लादेश रिश्तों की नई परीक्षण

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नव ठाकुरीया

गुवाहाटी । बांग्लादेश में 12 फरवरी 2026 को हुए काफी हद तक निष्पक्ष और शांतिपूर्ण राष्ट्रीय चुनावों के बाद बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) के नेतृत्व में नई सरकार का गठन हुआ है। लंबे समय बाद बांग्लादेश में चुनावी माहौल उत्सवपूर्ण दिखा, जो वहां की राजनीति में असामान्य माना जाता है। लगभग 60 प्रतिशत मतदान के साथ 300 सदस्यीय संसद में BNP ने 212 सीटें हासिल कीं, जबकि महिला सदस्यों की 50 सीटें अलग से जोड़ी जानी हैं।

170 मिलियन से अधिक आबादी वाले इस मुस्लिम-बहुल देश में सत्ता परिवर्तन को केवल आंतरिक राजनीतिक बदलाव नहीं माना जा रहा, बल्कि इसके दूरगामी क्षेत्रीय प्रभाव भी देखे जा रहे हैं। भारत के लिए—खासकर उसके पूर्वी और उत्तर-पूर्वी भूभाग के संदर्भ में—यह बदलाव कई नई संभावनाओं के साथ-साथ जटिल चुनौतियाँ भी लेकर आया है। अवैध प्रव्रजन, सीमा सुरक्षा और कट्टरपंथी गतिविधियाँ पहले से ही भारत–बांग्लादेश संबंधों के संवेदनशील बिंदु रहे हैं।

पूर्वी भारत की भौगोलिक स्थिति को लेकर अक्सर सिलीगुड़ी कॉरिडोर, जिसे ‘चिकन नेक’ कहा जाता है, का हवाला दिया जाता है। कुछ बांग्लादेशी कट्टरपंथी समूह समय-समय पर इस रणनीतिक गलियारे को भारत की कमजोरी बताने की कोशिश करते रहे हैं। यहां तक कि ‘ग्रेटर बांग्लादेश’ जैसी अवधारणाओं को हवा देने वाले तत्व भी सक्रिय रहे हैं, जिनमें पूर्वी भारत के बड़े हिस्से को मिलाकर एक विस्तारित बांग्लादेश की कल्पना की जाती है। भाषाई पहचान (बंगाली) को एकधर्मी राज्य की अवधारणा से जोड़ने की बहस भी इसी पृष्ठभूमि में उभरती रही है।

BNP की इस चुनावी जीत का चेहरा बने 60 वर्षीय तारिक रहमान—पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा ज़िया और पूर्व राष्ट्रपति ज़ियाउर रहमान के पुत्र—ने पूरे चुनाव अभियान के दौरान भारत-विरोधी बयानबाज़ी से दूरी बनाए रखी। बांग्लादेशी राजनीति में भारत-विरोध अक्सर त्वरित लोकप्रियता का साधन रहा है, लेकिन तारिक रहमान ने इस रास्ते से परहेज़ किया। प्रधानमंत्री के रूप में शपथ लेने के बाद भी उन्होंने भारत सहित सभी पड़ोसी देशों के साथ संबंधों की समीक्षा और संतुलन की बात कही।

भारत के खिलाफ बयानबाज़ी उस समय तेज़ हुई थी, जब अपदस्थ प्रधानमंत्री शेख हसीना 5 अगस्त 2024 को अचानक बांग्लादेश छोड़कर नई दिल्ली पहुँचीं और अपनी पार्टी अवामी लीग के कई नेताओं के साथ राजनीतिक शरण की मांग की। नोबेल पुरस्कार विजेता डॉ. मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व में बनी अंतरिम सरकार ने हसीना के प्रत्यर्पण की मांग उठाई, क्योंकि बांग्लादेशी ट्रिब्यूनल में उन्हें मृत्युदंड का सामना करना पड़ सकता था। भारत की ओर से इस पर कोई सकारात्मक संकेत नहीं मिला। इसके बावजूद प्रधानमंत्री तारिक रहमान ने हसीना के खिलाफ आक्रामक सार्वजनिक बयान देने से परहेज़ किया और इसे कानूनी प्रक्रिया का विषय बताया।

धार्मिक अल्पसंख्यकों के मुद्दे पर बांग्लादेश लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय आलोचना झेलता रहा है। हाल के वर्षों में अल्पसंख्यक परिवारों पर हमलों की घटनाओं ने वैश्विक मीडिया का ध्यान खींचा। ऐसे माहौल में इस चुनाव में चार गैर-मुस्लिम उम्मीदवारों की जीत को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इनमें दो हिंदू उम्मीदवार—गोयेश्वर चंद्र रॉय और निताई रॉय चौधरी—BNP के टिकट पर विजयी हुए और उन्होंने जमात समर्थित प्रत्याशियों को पराजित किया। इसके अलावा सचिन प्रू और दीपेन दीवान भी जीतकर संसद पहुँचे। प्रधानमंत्री रहमान ने रॉय चौधरी और दीवान को मंत्रिमंडल में शामिल कर अल्पसंख्यकों के प्रति एक प्रतीकात्मक लेकिन अहम संदेश दिया।

यह तथ्य भी उल्लेखनीय है कि बांग्लादेश में हिंदुओं की आबादी आज लगभग 13 मिलियन, यानी कुल जनसंख्या का करीब 8 प्रतिशत है, जबकि विभाजन के समय यह 22 प्रतिशत से अधिक थी। अल्पसंख्यकों पर दबाव और पलायन का सिलसिला दशकों से चला आ रहा है और इसमें केवल हालिया सरकारों को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।

भारत की प्रतिक्रिया इस पूरे घटनाक्रम में तेज़ और संतुलित रही। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने BNP की जीत पर तुरंत बधाई दी और तारिक रहमान को फोन करने वाले पहले वैश्विक नेता बने। दोनों देशों के पारस्परिक हितों, क्षेत्रीय शांति और सहयोग को आगे बढ़ाने की इच्छा सार्वजनिक रूप से जताई गई। हालांकि 17 फरवरी को ढाका में हुए शपथ ग्रहण समारोह में मोदी शामिल नहीं हो सके, लेकिन भारत की ओर से लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने प्रतिनिधित्व किया, जिसे एक सकारात्मक कूटनीतिक संकेत के रूप में देखा गया।

अंतरिम सरकार के प्रमुख के रूप में अपने अंतिम टेलीविज़न संबोधन में डॉ. यूनुस ने इस चुनाव को “सिर्फ सत्ता का हस्तांतरण नहीं, बल्कि बांग्लादेशी लोकतंत्र के नए अध्याय की शुरुआत” बताया। उन्होंने नेपाल, भूटान और उत्तर-पूर्वी भारत के साथ क्षेत्रीय सहयोग की संभावनाओं पर भी ज़ोर दिया। ढाका के राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा तेज़ है कि डॉ. यूनुस को देश का अगला राष्ट्रपति बनाया जा सकता है। हाल ही में हुए ‘नेशनल जुलाई चार्टर’ पर जनमत संग्रह में 70 प्रतिशत से अधिक मतदाताओं ने राष्ट्रपति की शक्तियां बढ़ाने के प्रस्ताव का समर्थन किया है, जिससे सत्ता संतुलन को लेकर नए सवाल खड़े हो गए हैं।

भारत के लिए सबसे बड़ी चिंता हालांकि जमात-ए-इस्लामी का उभार है। 1971 के मुक्ति संग्राम का विरोध करने वाली यह इस्लामी पार्टी पहली बार संसद में मुख्य विपक्ष के रूप में उभरी है। 11-दलीय गठबंधन के साथ 77 सीटें जीतने में जमात की निर्णायक भूमिका रही, जिनमें से 68 सीटें उसने अकेले जीतीं—खासकर भारत की सीमा से सटे इलाकों में। इसके साथ ही नई बनी नेशनल सिटिजन पार्टी ने भी जमात के साथ गठजोड़ कर छह सीटें हासिल की हैं।

कुल मिलाकर, ढाका में BNP की सरकार भारत के लिए एक नई अग्निपरीक्षा है। एक ओर संयमित नेतृत्व, संवाद की इच्छा और अल्पसंख्यकों को सीमित ही सही, प्रतिनिधित्व देने के संकेत हैं; दूसरी ओर कट्टरपंथी ताकतों का मज़बूत विपक्ष और क्षेत्रीय सुरक्षा की जटिल चुनौतियाँ भी सामने हैं। ऐसे में भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वह बदले राजनीतिक परिदृश्य में ढाका के साथ संबंधों को सतर्कता, संतुलन और दूरदृष्टि के साथ आगे बढ़ाए।

(लेखक उत्तर पूर्वी भारत के वरिष्ठ पत्रकार और दक्षिण एशिया की राजनीति पर लंबे समय से लिखते हैं)

पत्रकारिता में किस जाति के लोग सबसे ज्यादा है

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रवि मिश्रा

फिल्म सिटी (नोएडा)। इस कुतर्क का कोई उत्तर नहीं कि पत्रकारिता में फलां लोग क्यों हैं, फलां लोग क्यों नहीं …पत्रकारिता की पढ़ाई को चुनने का अवसर 12वीं के बाद से सबके लिए खुल जाता है। भारत के सरकारी और गैर सरकारी संस्थानों में दाखिले कि जो प्रक्रिया है यहां भी वैसी ही है। मेरा अपना अनुभव एक छात्र के रूप में ये कहता है कि दाखिला लेने से लेकर पढ़ाई तक इस पेशे को अपने जीवन के रूप में चुनने वाले किसी भी छात्र के दिमाग में कम से कम ये बात कहीं नहीं आती कि वो पत्रकारिता की पढ़ाई इसलिए करेगा क्योंकि उसकी जाति, या धर्म, या राज्य या समाज के लोग इसमें ज्यादा हैं । मुझे नहीं पता कि ये किसी और पेशे में होता है या नहीं पर जर्नलिज्म के चुनाव में कोई भी छात्र ये बात तो कहीं से भी नहीं सोचता ।

पढ़ाई के खत्म होते होते सबको पता चल जाता है कि ये पेशा निर्दयता की हद तक मेहनत करवाने वाला, लगातार सीखने की कभी न खत्म होने वाली यात्रा से भरा , भारी शारीरिक जोखिम, आर्थिक जोखिम, अनपेड से शुरू होकर अंडर पेड रह जाने , ऑफिस और ऑफिस से बाहर की जटिल राजनीति में सदा उलझे रहने और उसपर हर दिन नौकरी के आखिरी दिन की तरह एक्यूरेसी को मैच करने की टाइम के खिलाफ एक अनवरत रेस है ।
नींद, भूख, प्यास परिवार, त्योहार को जो कुर्बान करने में सबसे पहले हाथ उठा कर आगे आता है वही पत्रकार बना रह पाता है। विश्वास कीजिए कि इस हालात को भांप लेने वाले, व्यावहारिक ज्ञान वाले कई छात्र शुरू में ही ये पेशा छोड़ देते हैं।

फिर भी कुछ हम जैसे लोग आगे बढ़ते हैं इसलिए नहीं कि हमारी जाति या धर्म या समाज के लोग यहां हमें हाथों हाथ लेने को तैयार बैठे हैं। बल्कि इसलिए कि हम इन हालात में भी इस पेशे से प्यार करते हैं और बिना सैलेरी, आधी सैलेरी और कभी 18 तो कभी 20 घंटे या उससे भी ज्यादा देर तक दुनिया के सुख – दुख में डूबे रहने का एक पागलपन होता हैं जो इस करियर से शुरू होता है , जैसे – जैसे हम आगे बढ़ते हैं इसका दबाव खुद पर बढ़ता ही जाता है। छोटी शुरुआत से एक अच्छे संस्थान तक पहुंचना सपना होता तो है पर हमारे काम के प्रेशर वाला नेचर कभी और कहीं नहीं बदलता। ये हम सभी जानते भी है और मनाते भी है।

ये कहने में मुझे गर्व है कि करियर शुरू करने से लेकर आजतक मै या मेरे सभी साथी, जितने लोग काम करते रहे हैं किसी को व्यक्तिगत त्याग या मेहनत में कोई आरक्षण नहीं है। ये शायद इकलौता पेशा है जहाँ मेहनत हर विपरीत परिस्थिति में आपको मजबूत बनाए रखती है।

हम में से न जाने कितने पत्रकारों ने अपने सिद्धांतों, आदर्श और उसूल की वजह से नौकरियां छोड़ी, इस्तीफे दिये, लम्बी नाइट शिफ्ट सजा के रूप में काटी, सस्पेंड हुए और अपमानित भी हुए । अगर किसी को लगता है कि जाति या धर्म देखकर ये सब होता होगा तो मुझे ये सोचने वालों पर तरस आता है क्योंकि 90 प्रतिशत लोग वही हैं जो आपके लिए स्टैंड लेने की वजह नौकरियों से इस्तीफा दे रहे होते हैं या संस्थान में संघर्ष कर रहे होते हैं।
जमीन से लेकर स्टूडियो तक खड़ा हर पेशेवर पत्रकार जो बरसों से यहां कठिन हालात में टिका हुआ है कम से कम उसकी तपस्या का उपहास मत कीजिए । आपकी पसंद या नापसंद वाला कोई एक या दो anchor या पत्रकार इन हजारों पत्रकारों की मेहनत , बलिदान और सेवा के उपहास का कारण नहीं बनने चाहिए । अगर आप ये कर रहे हैं तो आप आपके लिए ही देश के कोने कोने में खड़े सिपाहियों को खत्म कर रहे हैं।

जिसे भी लगता है कि ये काम बहुत सरल, प्रभुत्व, एकाधिकार, बहुत पैसे वाला और बहुत सुरक्षित है , मेरी तरफ से उनका स्वागत है कि वो आएं और सिर्फ एक महीने एक पेशेवर माहौल में अपने उसी ज्ञान के साथ काम कर के दिखाएं जो दिन रात फ्री के सोशल मीडिया पर फ्री में देते रहते हैं ।

और जब मैं आप सभी मित्रों और समाज के लोगों को ये बात कह रहा हूं तो मेरा आशय न तो अभिमान का है, न किसी को कमतर बताने जताने का है और न ही खुद को महान बताने का । मेरा आग्रह ये है मेरे हजारों पत्रकार भाई और साथी बहुत मेहनत करते हैं आपके लिए । कुछ कम या कुछ ज्यादा , कुछ सहमति और असहमति के साथ। पर उनकी इस संघर्ष की यात्रा को ये कह कर अपमानित न किया जाए कि जाति, धर्म या समाज को देखकर लोग यहां भीड़ लगा रहे हैं। इस काम में एक ही जाति सबसे ज्यादा और बड़ी है वो है कड़ी मेहनत। जो धैर्य के साथ, लगन के साथ , विपरीत हालत में मान और अपमान सहते हुए जनता के लिए मेहनत करता है वो यहां लंबा चलता है।

आपकी पसंद या नापसंद के एक दो लोगों से ये मेहनती लोग परिभाषित नहीं होने चाहिए। पत्रकारिता में एक ही जाति के लोग सबसे ज्यादा हैं, और ये वही हैं जिनके अंदर कॉलेज में कदम रखने के समय से ही ये आग घर कर जाती है कि आराम नहीं , हमें मेहनत का रास्ता चुनना है ताकि हम किसी की आवाज बन सके ।

हमारी जाति कठिन मेहनत की जाति है और इस जाति में सबका स्वागत है।

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