नकली खाद, घटिया बीज व कीटनाशकों पर ‘जीरो टॉलरेंस’; कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान बोले- ‘किसानों से धोखाधड़ी राष्ट्र के प्रति अपराध’

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नई दिल्ली:  राष्ट्रीय कृषि सम्मेलन- रबी अभियान-2026 के दूसरे दिन केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण तथा ग्रामीण विकास मंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान की अध्यक्षता में विभिन्न राज्यों के कृषि मंत्रियों और वरिष्ठ अधिकारियों ने सहभागिता की। इन्हें संबोधित करते हुए केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह ने कहा कि प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व और मार्गदर्शन में देश की खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने और किसानों की आजीविका को बेहतर बनाने के लिए केंद्र और राज्यों को दलगत राजनीति से ऊपर उठकर ‘टीम एग्रीकल्चर’ की भावना से काम करना होगा। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि सरकारें और पार्टियां आती-जाती रहती हैं, पार्टियां बनती और बिगड़ती हैं, लेकिन देश और किसान शाश्वत हैं। इस मंच पर कोई राजनीति नहीं है, बल्कि लक्ष्य सिर्फ यह है कि खेती कैसे बेहतर हो और किसान कैसे आगे बढ़े। उन्होंने गर्व के साथ रेखांकित किया कि प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में देश के हर नीतिगत फैसले और अंतरराष्ट्रीय समझौतों में किसानों के हितों को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई है। इस अवसर पर केंद्रीय मंत्री श्री चौहान ने प्रधानमंत्री राष्ट्रीय कृषि विकास योजना (पीएम-आरकेवीवाई) के तहत 10 राज्यों के कृषि मंत्रियों को मंच पर ही 1082 करोड़ रुपये के वित्तीय स्वीकृति पत्र प्रदान किए।

सम्मेलन में केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण राज्य मंत्री श्री रामनाथ ठाकुर और श्री भागीरथ चौधरी, केंद्रीय कृषि सचिव श्री अतीश चंद्रा तथा भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के महानिदेशक डॉ. एम. एल. जाट सहित केंद्र व राज्यों के वरिष्ठ अधिकारी, वैज्ञानिक और विभिन्न कृषि संस्थानों के प्रतिनिधि उपस्थित रहे।

केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने मंच से ही पीएम-आरकेवीवाई के अंतर्गत पश्चिम बंगाल को 290 करोड़ रु., हरियाणा को 198 करोड़ रु., छत्तीसगढ़ को 181 करोड़ रु., अरुणाचल प्रदेश को 154 करोड़ रु., बिहार को 114 करोड़ रु., कर्नाटक को 104 करोड़ रु., मिजोरम को 75 करोड़ रु., हिमाचल प्रदेश को 64 करोड़ रु., झारखंड को 58 करोड़ रु. और पंजाब को 43 करोड़ रु. के स्वीकृति पत्र वितरित किए। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार केवल नीतियां बनाने तक सीमित नहीं है, बल्कि राज्यों को समय पर संसाधन भी उपलब्ध करा रही है ताकि योजनाओं का क्रियान्वयन जमीन पर तुरंत शुरू हो सके।

देश की कृषि उपलब्धियों का ब्योरा देते हुए उन्होंने बताया कि वर्ष 2015 के बाद देश की कृषि विकास दर 3 प्रतिशत से बढ़कर 4.5 प्रतिशत तक पहुंच गई है। वार्षिक खाद्यान्न उत्पादन में औसत बढ़ोतरी पहले के 40 लाख टन के मुकाबले अब दोगुनी से अधिक होकर 84 लाख टन प्रतिवर्ष तक पहुंच चुकी है। इसके अलावा, वर्ष 2023-24 से 2025-26 के दो वर्षों में ही रबी खाद्यान्न उत्पादन में 205 लाख टन का अभूतपूर्व इजाफा दर्ज किया गया है। उन्होंने इस ऐतिहासिक वृद्धि का श्रेय राज्यों के कृषि विभागों, वैज्ञानिकों और अन्नदाताओं के साझा परिश्रम को दिया।

सहकारी संघवाद को सुदृढ़ करने के उद्देश्य से नई कार्यप्रणाली की घोषणा करते हुए केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि केंद्र में होने वाली साप्ताहिक समीक्षा की तर्ज पर अब हर महीने राज्यों के साथ नियमित वर्चुअल समीक्षा बैठकें की जाएंगी, जिसमें प्रगति की निरंतर समीक्षा होगी। राज्य स्तर पर कृषि मंत्री, कृषि सचिव, राज्य के कृषि विश्वविद्यालयों, आईसीएआर संस्थानों, केवीके, आत्मा, एफपीओ, प्रगतिशील किसानों, प्रोसेसर्स, एक्सपोर्टर्स और भारत सरकार के नोडल अधिकारियों को जोड़कर एक सशक्त राज्य कृषि टीम बनाई जाएगी। वहीं, जिला स्तर पर कलेक्टर, डीडीए, आत्मा, केवीके, आईसीएआर वैज्ञानिकों, बैंकर्स और किसानों की मासिक बैठकें होंगी।

कृषि अभियानों की पूर्व तैयारी के लिए इंटरफेस बैठकों का वार्षिक कैलेंडर तय करते हुए उन्होंने निर्देश दिया कि हर साल खरीफ के लिए 10 मई को जिला स्तरीय और 17 मई को राज्य स्तरीय बैठक होगी। इसी प्रकार रबी अभियान के लिए 10 सितंबर को जिला स्तरीय और 17 सितंबर को राज्य स्तरीय बैठकें अनिवार्य रूप से आयोजित की जाएंगी। इसके साथ ही, देश भर में एक ही दिन एकदिवसीय विशेष बैठक भी होगी, जिसमें पूरे देश में एक साथ कृषि मंत्री, अधिकारी और कृषि वैज्ञानिक किसानों के हित में जुड़ेंगे।

मिट्टी के स्वास्थ्य और पर्यावरण संरक्षण को लेकर केंद्रीय मंत्री श्री चौहान ने इस साल 22 अक्टूबर से 30 नवंबर तक पूरे देश में व्यापक ‘खेत बचाओ अभियान’ चलाने का आह्वान किया। इस अभियान के तहत वैज्ञानिकों सहित सभी प्रमुख स्टेकहोल्डर्स सक्रिय भागीदारी निभाएंगे। अभियान में सॉइल हेल्थ कार्ड के आधार पर संतुलित उर्वरक उपयोग पर जोर दिया जाएगा ताकि जमीन की उर्वरा शक्ति और मित्र कीट सुरक्षित रहें। साथ ही, पूर्वी भारत के राज्यों- झारखंड, बिहार, ओडिशा और पश्चिम बंगाल में धान कटाई के बाद खाली रहने वाले खेतों (राइस फेलो) में दलहन की खेती को व्यापक स्तर पर प्रोत्साहित किया जाएगा।

इस साल की रबी तैयारियों के तहत उन्होंने मिट्टी में नमी और पानी की उपलब्धता के आधार पर ही फसलों और उन्नत बीजों की बुवाई की सलाह देने पर बल दिया। उन्होंने फसलों को बीमारियों व कीटों से बचाने की पुख्ता व्यवस्था करने, सभी पात्र किसानों को किसान क्रेडिट कार्ड (केसीसी) से संतृप्त करने और फसल बीमा योजना के अंतर्गत पारदर्शी क्रॉप कटिंग एक्सपेरिमेंट (CCE) कराने के निर्देश दिए। उन्होंने जोर देकर कहा कि राज्य के मंत्री स्वयं सभी विभागीय योजनाओं के क्रियान्वयन की नियमित समीक्षा करें।

देश में बीज और उर्वरक की उपलब्धता को पर्याप्त बताते हुए शिवराज सिंह ने राज्यों को नकली खाद, नकली बीज और अमानक कीटनाशकों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई करने तथा जबरन टैगिंग को पूरी तरह समाप्त करने के निर्देश दिए। खेती को टिकाऊ और लाभकारी बनाने के लिए उन्होंने प्राकृतिक खेती, इंटीग्रेटेड फार्मिंग (एकीकृत कृषि प्रणाली) और फसल विविधीकरण (Crop Diversification) को मिशन मोड में अपनाने का आह्वान किया।

शिवराज सिंह ने कहा कि किसानों को उनकी उपज का सही और लाभकारी दाम दिलाने के लिए सरकार बहुआयामी रणनीति पर काम कर रही है। इसमें पोस्ट हार्वेस्ट प्रबंधन, वैज्ञानिक भंडारण (वेयरहाउसिंग) और बिक्री की सुदृढ़ व्यवस्था शामिल है। उन्होंने कहा कि तुअर, उड़द और मसूर की एमएसपी पर 100% सुनिश्चित सरकारी खरीद की जाएगी और 48 घंटे में भुगतान की व्यवस्था होगी। इसके साथ ही प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के विजन के अनुरूप अंतरराष्ट्रीय मुक्त व्यापार समझौतों (एफटीए) की नई बाजार नीति का लाभ उठाकर भारतीय कृषि उत्पादों, फलों, सब्जियों और अनाज को वैश्विक निर्यात से जोड़ा जाएगा, जिससे किसानों को उपज के बेहतरीन दाम मिल सकें और भारत दुनिया का प्रमुख ‘फूड बास्केट’ बन सके।

मोदी के उत्तराधिकारी को चुनने में अभी समय है

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सुरेंद्र चतुर्वेदी
जयपुर: देश के अभिजात्य वर्ग में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उत्तराधिकारी को लेकर चर्चा शुरू हो गई है। *ऐसा नहीं है कि प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता में कोई कमी आई है या जनता में उनके प्रति निराशा है लेकिन अधिकांश वर्ग में यह धारणा है कि 2029 के बाद मोदी किसी और राजनेता को अपना उत्तराधिकारी बना कर जा सकते हैं।* भाजपा के लिए आज भी मोदी बड़ा और विश्वसनीय चेहरा हैं। लेकिन मोदी को भी ऐसे उत्तराधिकारी की तलाश होगी जो उनके 2047 में महाशक्ति और विकसित भारत बनाने के उनके संकल्प को साकार कर सके।

*ये भी आश्चर्यजनक है कि ये चर्चा भी भाजपा को लेकर ही है, कांग्रेस या अन्य क्षेत्रिय दलों में तो ये प्रश्न भी नहीं उठता।* तो अब प्रश्न यह उठता है कि ऐसे कौन कौन से भाजपा नेता हैं जिनमें मोदी के बाद की संभावनाएं देखी जा रही हैं। 2013 में जब मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाया था, उस समय भाजपा के पास सुषमा स्वराज, राजनाथ सिंह, नितिन गडकरी, शिवराज सिंह और वसुंधरा राजे जैसे जननेता थे जिनके प्रति कार्यकर्ताओं और मतदाताओं का प्रबल आकर्षण था। हालांकि उस समय अरुण जेटली, वैंकय्या नायडू और अनंत कुमार जैसे नेता भी थे लेकिन वो चुनाव और पार्टी प्रबंधन में माहिर खिलाड़ी थे। इसीलिए लंबी ऊहापोह और मंथन के बीच भाजपा ने मोदी को प्रधानमंत्री पद का दावेदार घोषित कर दिया।

तेरह साल बाद अब स्थिति बदल चुकी है। *भाजपा का नया नेतृत्व तैयार है। गृह मंत्री अमित शाह, योगी आदित्यनाथ और महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़नवीस पर सबकी निगाहें हैं। इनके अलावा राजनाथ सिंह और शिवराज सिंह को भी अनदेखा नहीं किया जा सकता परंतु उनकी उम्र उनको थका रही है।* इसके अलावा अभी कोई और नजर नहीं आता। तो अब प्रश्न उठता है कि क्या मोदी के बाद का निर्णय सहजता से हो जाएगा ?

दरअसल *मोदी के बाद के चुनाव में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की भूमिका बड़ी महत्वपूर्ण है। इसके बाद ही भाजपा संगठन या अन्य वर्ग की भूमिका तय होती है। इसलिए ये देखना महत्वपूर्ण होगा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ किसके साथ खड़ा है। उत्तर प्रदेश का चुनाव इस दिशा में पहला पड़ाव है।* जहाँ योगी आदित्यनाथ के साथ संघ मजबूती से खड़ा है। यह चुनाव दोनों आपसी तालमेल के साथ ही लड़ रहे हैं। *यदि भाजपा को उत्तरप्रदेश में विशाल अंतर वाली जीत मिलती है तो योगी की संभावनाएं दिल्ली में मजबूत होंगी। लेकिन यदि भाजपा की सरकार मामूली बहुमत के साथ बनती है तो योगी की दिल्ली की दावेदारी कमजोर हो जाएगी।*

इसी प्रकार *महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़नवीस भी भाजपा में उभरते नए चेहरों में से हैं। लेकिन अभी तक उनकी चमक वैसी नहीं बनी है जैसी योगी आदित्यनाथ की है। उनका अंदाज़ शहरी है। अभी देश में अपनी पहचान बनाने के लिए उनको कम से कम पाँच साल महाराष्ट्र छोड़ दिल्ली में टिकना पड़ेगा, जिसके लिए वो स्वयं तैयार नहीं दिखते हैं। केवल संघ के आशीर्वाद से मोदी के उत्तराधिकारी बन पाना उनके लिए संभव नहीं होगा।* ऐसा ही प्रयोग नितिन गडकरी के साथ हो चुका है, जिनकी स्थिति सबके सामने ही है।

तीसरे व्यक्ति *गृह मंत्री अमित शाह हैं। ये कहना ग़लत नहीं होगा कि पिछले तेरह वर्षों से भाजपा को वो ही चला रहे हैं। वर्तमान भाजपा की उभरते हुए नेतृत्व को उन्होंने ही तराशा और सम्हाला है। योगी आदित्यनाथ हों, देवेंद्र फड़नवीस, हेमंत बिस्वा सरमा, शुभेंदु अधिकारी जैसे राजनेता हों या विनोद तावड़े, सुनील बंसल जैसे संगठकर्ता सब अमित शाह की ही देन हैं।* गृह मंत्री के रूप में वे अपनी कार्यकुशलता का लोहा मनवा चुके हैं। संसद में उनका प्रदर्शन विपक्षी नेताओं को मौन कर देता है, लेकिन दिक्कत यह है कि उनको राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में उतनी स्वीकार्यता नहीं है जितनी मोदी, योगी या फड़नवीस को है। इसका कारण भी स्पष्ट है कि शाह ने भाजपा को संघ की परिपाटी से उलट आक्रमक राजनीतिक दल में बदल दिया।

इसलिए अभी इस प्रश्न का जवाब दूर है कि मोदी के बाद कौन ? लेकिन ये जरूर है कि उत्तरप्रदेश चुनाव के परिणाम इस बहस में तेजी लाएंगे कि मोदी का उत्तराधिकारी योगी आदित्यनाथ होने जा रहे हैं या अमित शाह।

किसानों के हित में बड़ा फैसला: खरीफ 2026-27 के लिए 5547.99 करोड़ रु. की उपज खरीद को मंजूरी

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नई दिल्ली:  केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण तथा ग्रामीण विकास मंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान ने देश के अन्नदाताओं के आर्थिक हितों की रक्षा करते हुए खरीफ विपणन सीजन 2026-27 के लिए एक बड़ा और किसान-हितैषी फैसला लिया है। केंद्र सरकार ने मूल्य समर्थन योजना (Price Support Scheme – PSS) के अंतर्गत उत्तर प्रदेश, तेलंगाना और कर्नाटक राज्यों में प्रमुख दलहन और तिलहन फसलों की खरीद के लिए कुल 5,547.99 करोड़ रुपए की न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) राशि की खरीददारी का अनुमोदन प्रदान किया है। इस निर्णय का सीधा उद्देश्य बाजार में फसलों की कीमतों में गिरावट से किसानों का बचाव करना और उन्हें उनकी उपज का लाभकारी मूल्य सुनिश्चित कराना है।

​केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने इस संबंध में जानकारी देते हुए कहा कि प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार किसानों के कल्याण, उनकी आय में वृद्धि और कृषि क्षेत्र को आत्मनिर्भर बनाने के लिए पूरी निष्ठा से काम कर रही है। सरकार का स्पष्ट संकल्प है कि अन्नदाता को उसकी उपज का उचित दाम मिले और इसके लिए खरीद तंत्र को पहले से अधिक पारदर्शी एवं सुगम बनाया जा रहा है। ​इस अनुमोदन के तहत तीन प्रमुख राज्यों के किसानों से विभिन्न फसलों की बड़े पैमाने पर खरीद की जाएगी।

उत्तर प्रदेश के किसानों के लिए सबसे बड़ा हिस्सा तय करते हुए कुल 3,992.57 करोड़ रु. की खरीद को शिवराज सिंह चौहान द्वारा हरी झंडी दी गई है। इसके तहत राज्य में 3,937.70 करोड़ रु. मूल्य की 4,66,000 मीट्रिक टन तुअर और 54.87 करोड़ रु. मूल्य की 6,250 मीट्रिक टन मूंग की खरीद समर्थन मूल्य पर की जाएगी।
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कर्नाटक के दलहन और तिलहन उत्पादक किसानों के लिए 1,107 करोड़ रु. की उपज खरीद का अनुमोदन किया गया है। केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह द्वारा दी गई मंजूरी से कर्नाटक में 659.27 करोड़ रु. मूल्य की 1,15,500 मीट्रिक टन सोयाबीन, 335.83 करोड़ रु. मूल्य की 38,250 मीट्रिक टन मूंग तथा 111.90 करोड़ रु. मूल्य की 13,413 मीट्रिक टन सूरजमुखी (सनफ्लावर) की खरीद PSS के तहत की जाएगी।

​इसके साथ ही, तेलंगाना के किसानों के हित में कुल 448.42 करोड़ रु. की खरीद को केंद्रीय मंत्री श्री चौहान द्वारा स्वीकृति दी गई है। इसमें 353.90 करोड़ रु. मूल्य की 62,000 मीट्रिक टन सोयाबीन और 94.52 करोड़ रु. मूल्य की 10,766 मीट्रिक टन मूंग की समर्थन मूल्य पर खरीद शामिल है।

​केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह ने कहा कि केंद्र सरकार द्वारा उठाया गया यह कदम न केवल किसानों को आर्थिक सुरक्षा प्रदान करेगा, बल्कि देश में दलहन और तिलहन के उत्पादन को बढ़ावा देकर भारत को खाद्य तेलों और दालों के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने में भी मील का पत्थर साबित होगा। उन्होंने आश्वस्त किया कि सभी उपार्जन केंद्रों पर खरीद की व्यवस्थाएं पारदर्शी रहेंगी और किसानों को उनकी उपज की राशि का भुगतान सीधे उनके बैंक खातों में समयबद्ध तरीके से किया जाएगा।

फुले के बहाने इतिहास की पाठशाला में किसका नैरेटिव?

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– डॉ. मयंक चतुर्वेदीएनसीईआरटी के ‘अंतरा’ पाठ पर बड़ा सवाल: समाज सुधार की कहानी या ब्राह्मण, धर्म और परंपरा को कठघरे में खड़ा करने वाला एकतरफा आख्यान?

दिल्ली । एक बच्चा जब स्कूल की पाठ्यपुस्तक खोलता है तो उसके सामने सिर्फ शब्द नहीं होते, उसके सामने इतिहास का एक अधिकृत संस्करण होता है। वह वहां लिखी पंक्तियों को सामान्यतः किसी लेखक की निजी राय न मानते हुए उसे ज्ञान का प्रमाण मानकर पढ़ता है। ऐसे में सवाल तब गंभीर हो जाता है, जब किसी समाज सुधारक के संघर्ष को समझाते हुए भाषा ऐसी हो जाए जिसमें एक सामाजिक वर्ग, धार्मिक परंपरा और सांस्कृतिक व्यवस्था एक साथ कठघरे में दिखाई देने लगें। एनसीईआरटी की हिंदी पाठ्यपुस्तक ‘अंतरा’ में ज्योतिबा फुले पर प्रकाशित पाठ को लेकर उठे सवाल आज इसी ओर ध्‍यान आकर्ष‍ित कर रहे हैं।

मामला ज्योतिराव फुले के योगदान को कमतर आंकने का नहीं है। स्त्री शिक्षा, वंचित वर्गों की शिक्षा, सामाजिक सुधार और सत्यशोधक समाज की स्थापना में फुले दंपति का योगदान भारतीय सामाजिक इतिहास का महत्वपूर्ण अध्याय है। प्रश्न यह है कि क्या उनके संघर्ष को पढ़ाते समय इतिहास का पूरा परिदृश्य सामने रखा गया है? क्या तत्कालीन सामाजिक कुरीतियों और पूरे हिंदू समाज, ब्राह्मण परंपरा तथा धर्म के बीच आवश्यक अंतर स्पष्ट किया गया है? और क्या विद्यार्थी को स्वयं निष्कर्ष निकालने का अवसर दिया गया है? सीधे तौर पर ब्राह्मणों को कटघरे में एकतरफा खड़ा कर दिया गया है! दरअसल, यहीं से ‘अंतरा’ का यह पाठ एक बड़े पाठ्यक्रमीय विमर्श में बदल जाता है।

‘पांच समाज सुधारक’ कौन थे? पाठ में स्रोत कहां है?

पाठ के आरंभ में कहा गया है कि भारत के सामाजिक विकास और बदलाव के आंदोलन में जिन पांच समाज सुधारकों के नाम लिए जाते हैं, उनमें महात्मा ज्योतिबा फुले का नाम शामिल नहीं है और इस सूची को बनाने वाले ‘उच्चवर्णीय समाज के प्रतिनिधि’ हैं। यह वाक्य ही अपने आप में पहला बड़ा प्रश्न खड़ा करता है। अब वे पांच समाज सुधारक कौन थे? सूची किसने बनाई थी? किस संस्था या विद्वान ने उसे तैयार किया? उसका प्रकाशन कब हुआ? क्या कोई मूल दस्तावेज, पुस्तक या ऐतिहासिक संदर्भ उपलब्ध है?

स्कूली पाठ्यपुस्तक में यदि किसी कथन को ऐतिहासिक तथ्य के रूप में रखा जाता है तो विद्यार्थी को उसका स्रोत जानने का अधिकार है। उपलब्ध सामग्री में इस कथन के साथ ऐसा कोई विस्तृत संदर्भ नहीं दिया गया है। यह सीधे रूप में एक पूर्वनिर्धारित व्याख्यान है। इतिहास में किसी व्यक्ति की उपेक्षा हुई थी तो उसका दस्तावेजी प्रमाण सामने रखा जाना चाहिए। यह बताया जाना चाहिए कि किस कालखंड में, किन संस्थानों में और किन लेखकों ने ऐसा किया। इससे विद्यार्थी इतिहास-लेखन की प्रक्रिया समझता है। अन्यथा एक सामान्यीकृत आरोप पीढ़ी के सामने प्रमाण की तरह स्थापित होता है कि ब्राह्मण दोषी हैं।

फुले की तीखी भाषा, बच्चे के सामने कितना संदर्भ?

पाठ में फुले के हवाले से लिखा गया है कि जब ब्राह्मणों ने कहा, ‘विद्या शूद्रों के घर चली गई’, तो फुले ने उत्तर दिया, “सच का सवेरा होते ही वेद डूब गए, विद्या शूद्रों के घर चली गई, भू-देव (ब्राह्मण) शरमा गए।” फुले के समर्थकों के लिए यह तत्कालीन सामाजिक व्यवस्था के विरुद्ध संघर्ष की तीखी भाषा हो सकती है, पर आज समस्या यह है कि स्कूली विद्यार्थी के सामने यह भाषा किस संदर्भ में रखी जानी चाहिए थी?

क्या विद्यार्थी को यह बताया जाता है कि यह 19वीं सदी के सामाजिक संघर्ष की भाषा थी? क्या उसे यह समझाया जाता है कि फुले का निशाना वेदों का दार्शनिक ज्ञान था अथवा उस समय वेदों के नाम पर कायम सामाजिक व्यवस्था? क्या ‘भू-देव’ शब्द पूरे ब्राह्मण समुदाय के लिए है या उस समय के किसी विशिष्ट सामाजिक व्यवहार पर व्यंग्य? उपलब्ध सामग्री में दोनों दृष्टिकोण सामने आते हैं। फुले के समर्थकों के अनुसार यह व्यवस्था पर प्रहार था, जबकि इसका सामने से जो दृष्‍य दिखता है, वह यही है कि ऐसे कथनों को बिना संदर्भ के रखना आज के विद्यार्थियों में किसी समुदाय के प्रति सामान्यीकृत धारणा बनाता है। वह यही है कि ब्राह्मण और ब्राह्मण ग्रंथ, वेद आदि समाज में विभेद पैदा करते हैं, जबकि यह झूठ है।

‘ब्राह्मणवादी’ से ‘ब्राह्मण’ तक पहुंचता अर्थ

पाठ में ब्राह्मण वर्चस्व, पुरोहितवादी मानसिकता और धर्मवादी सत्ता जैसे शब्द आते हैं। इन शब्दों के बीच स्पष्ट वैचारिक और ऐतिहासिक अंतर विद्यार्थियों के सामने नहीं रखा गया। ‘ब्राह्मण’ एक सामाजिक पहचान भी है, भारतीय ज्ञान परंपरा में एक विशिष्ट साधनात्मक अवधारणा भी रही है और आधुनिक राजनीतिक विमर्श में ‘ब्राह्मणवाद’ एक अलग आलोचनात्मक अवधारणा के रूप में प्रयुक्त होता है। इन तीनों को एक-दूसरे का पर्याय बना देना अकादमिक रूप से सावधानी मांगता है।

इसी तरह ‘पुरोहित’ और ‘पुरोहितवाद’ को एक ही अर्थ में देखना भी समस्या पैदा कर सकता है। किसी कालखंड के कुछ पुरोहितों की सामाजिक भूमिका की आलोचना और पूरे पुरोहित वर्ग को शोषण के पर्याय के रूप में प्रस्तुत करना दो अलग बातें हैं। स्कूली शिक्षा में यही अंतर सबसे महत्वपूर्ण है। ‘धर्मवादी सत्ता’ या धर्म के नाम पर बनी सत्ता? पाठ में फुले के विचारों के संदर्भ में राजसत्ता और ब्राह्मण आधिपत्य के साथ ‘धर्मवादी सत्ता’ की बात आती है। जोकि यहां पाठ में सीधे-सीधे हिंदू धर्म पर आक्षेप के रूप में देखा जा सकता है।

दूसरी ओर, फुले के विचारों की समर्थक व्याख्या यह कहती है कि उनका विरोध धर्म के आध्यात्मिक सिद्धांत से अधिक धर्म के नाम पर चलने वाली सामाजिक संस्थागत व्यवस्था से था। वे जन्म आधारित विशेषाधिकार, शिक्षा से वंचित रखने और सामाजिक भेदभाव जैसी व्यवस्थाओं पर प्रहार कर रहे थे। यहां फिर वही सवाल लौटता है- क्या पाठ विद्यार्थी को दोनों अर्थों के बीच अंतर समझाता है? यदि नहीं, तो ‘धर्म’ और ‘धर्म के नाम पर बनी सामाजिक व्यवस्था’ एक ही अर्थ में पढ़े जाएंगे।

विवाह पद्धति पर सबसे बड़ा सवाल

पाठ में ज्योतिबा फुले द्वारा पारंपरिक विवाह पद्धति को चुनौती देने, ब्राह्मण पुरोहित की भूमिका हटाने और नए मंगलाष्टक तैयार करने को सामाजिक सुधार के रूप में प्रस्तुत किया गया है। यहां आलोचना का दूसरा बड़ा अध्याय शुरू होता है। यदि फुले का उद्देश्य विवाह में स्त्री की समानता स्थापित करना था, तो विद्यार्थियों को यह भी बताया जाना चाहिए कि वैदिक विवाह परंपरा में स्त्री की स्थिति को लेकर मूल ग्रंथ क्या कहते हैं।

उपलब्ध सामग्री ऋग्वेद के विवाह सूक्त के उस मंत्र की ओर ध्यान दिलाती है जिसमें नववधू को ‘साम्राज्ञी’ कहकर संबोधित किया गया है। वहां वह ससुर, सास, ननद और देवर के बीच सम्मानित स्थान प्राप्त करने की कामना से संबोधित होती है। जब पाठ पारंपरिक विवाह मंत्रों को स्त्री की ‘गुलामगिरी’ से जोड़ता है, तब वैदिक मंत्रों के मूल अर्थों को भी विद्यार्थियों के सामने रखा जाना चाहिए।

यदि भारतीय विवाह व्यवस्था में इतिहास के किसी दौर में स्त्री के साथ अन्याय हुआ है तो उसका अध्ययन भी होना चाहिए और उसके तथ्‍य भी सामने आने चाहिए थे। पर यहां तो किसी कालखंड की कोई सामाजिक विकृति को पूरी परंपरा का मूल चरित्र मान लिया जाकर प्रस्‍तुत किया गया है।

जब सुधारक की नई विधि और पुरानी परंपरा आमने-सामने रखी जाए

पाठ फुले की नई विवाह विधि में स्त्री को अधिकार देने की बात करता है, जबकि सच यह भी है कि सप्तपदी के वैदिक मंत्रों में भी वर-वधू के पारस्परिक दायित्व, सहजीवन, परिवार, संतान, समृद्धि और जीवनभर साथ निभाने की प्रतिज्ञाएं मौजूद हैं। यदि दोनों परंपराओं को साथ पढ़ाया जाए तो विद्यार्थी यह स्वयं देख सकता है कि फुले किस सामाजिक व्यवहार का विरोध कर रहे थे, उनकी नई विवाह विधि में क्या नया था और पारंपरिक वैदिक विवाह के मूल मंत्र क्या कहते हैं।

‘आदर्श परिवार’ में हिंदू कहां है?

पाठ में फुले की आदर्श परिवार की अवधारणा के रूप में पिता को बौद्ध, माता को ईसाई, बेटी को मुस्लिम और बेटे को सत्यधर्मी बताया गया है।यह पंक्ति भी बहस का विषय है। एक दृष्टिकोण इसे धार्मिक सद्भाव और बहुधार्मिक सह-अस्तित्व की आदर्श कल्पना मानता है। दूसरा दृष्टिकोण पूछता है कि यदि भारत की सामाजिक संरचना समझाई जा रही है तो इस उदाहरण में देश के बहुसंख्‍यक हिंदू समाज की अनुपस्थिति का अर्थ क्या है?

यहां भी पाठ्यपुस्तक विद्यार्थी को संदर्भ दे सकती थी। फुले किस सामाजिक परिस्थिति में यह विचार रखते थे? वे किन धार्मिक संघर्षों से चिंतित थे? उनके विचारों को उनके जीवन, समय और सामाजिक संघर्ष से कैसे जोड़कर पढ़ा जाना चाहिए? इससे ऐसा लगता है कि फुले सामाजिक संदर्भों में तत्‍कालीन समय में भारत में हो रहे कन्‍वर्जन यानी कि हिन्‍दू से जो ईसाई एवं इस्‍लामिक बनाए जा रहे थे, वे इस धर्मपरिवर्तन के समर्थक थे, हिन्‍दू शब्‍द नहीं लिखना बता रहा है कि वे किसी के नास्‍तिक होने को तो पसंद करते हैं, पर हिन्‍दुओं से उन्‍हें नफरत है, जबकि वे स्‍वयं एक हिन्‍दू थे!

फुले को लेकर आज समाज में तस्वीर अलग है

पाठ में यह स्थापना भी है कि तथाकथित संभ्रांत या उच्चवर्णीय समाज के प्रतिनिधियों ने फुले को समाज सुधारकों की सूची में स्थान नहीं दिया। इसके विपरीत उपलब्ध सामग्री यह तथ्य सामने रखती है कि आज भारत के विभिन्न सामाजिक वर्गों में ज्योतिबा फुले को व्यापक रूप से समाज सुधारक के रूप में सम्मान प्राप्त है। उनकी प्रतिमाएं विभिन्न राज्यों में स्थापित हैं और राजनीतिक-सामाजिक जीवन के अलग-अलग वर्ग उनके योगदान को स्वीकार करते हैं। सबसे बड़ी इसमें विरोधावासी बातें यह हैं कि आज जिन्‍होंने ज्‍योतिबाफुले को समाज सुधारक के रूप में स्‍थापित किया है, उनमें अधिकांश उच्‍च जातियां ही आगे रही हैं। यदि अतीत में किसी विचारधारा या वर्ग ने उन्हें पर्याप्त स्थान नहीं दिया, तो उसके प्रमाण दीजिए। यदि बाद के भारत ने उन्हें स्वीकार किया, तो वह भी बताइए।

सवाल फुले के नहीं, पाठ्यपुस्तक के तरीके का है

इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष यही है कि सवाल ज्योतिबा फुले को पढ़ाने का नहीं है। सवाल यह है कि फुले को कैसे पढ़ाया जा रहा है। उनकी स्त्री शिक्षा की लड़ाई पढ़ाइए। सत्यशोधक समाज पढ़ाइए। वंचित वर्गों की शिक्षा का संघर्ष पढ़ाइए।‘गुलामगिरी’ और उनके अन्य लेखन पढ़ाइए।उनकी तीखी भाषा भी पढ़ाइए। और बताएं कि कैसे ज्‍योतिबाफुले के मन में हिन्‍दुओं की उच्‍च जातियों के प्रति एवं किसी हद तक हिन्‍दू के प्रति भी नफरत भरी हुई थी। साथ में यह भी बताइए कि वे किस ऐतिहासिक परिस्थिति में बोल रहे थे, उनके आरोपों के पीछे कौन से सामाजिक अनुभव थे, उनके विचारों की आलोचना क्या रही और बाद के भारत ने उन्हें किस प्रकार देखा।

इसी तरह ब्राह्मण परंपरा की आलोचना पढ़ाइए, पर भारतीय ज्ञान परंपरा में ब्राह्मण विद्वानों के योगदान को भी पाठ्यक्रम से गायब मत कीजिए। धर्म के नाम पर हुई सामाजिक रूढ़ियों को पढ़ाइए, पर ‘धर्म’ के दार्शनिक अर्थ को भी समझाइए। स्त्री पर हुए अन्याय को पढ़ाइए, पर वैदिक साहित्य में स्त्री की विद्वत्ता और गरिमा के प्रमाण भी सामने रखिए। पाठ्यपुस्तक का काम फैसला सुनाना नहीं, सवाल पैदा करना है। वस्‍तुत: शिक्षा की सबसे बड़ी शक्ति यही है कि वह विद्यार्थी को तैयार उत्तर देने के बजाय प्रश्न करने की क्षमता देती है।

यदि बच्चा पूछता है कि फुले ब्राह्मण वर्चस्व के विरोध में क्यों थे, तो उसे उस दौर का इतिहास बताइए। यदि वह पूछता है कि क्या पूरा ब्राह्मण समाज उस व्यवस्था के लिए जिम्मेदार था, तो उसे अलग-अलग ऐतिहासिक प्रमाण देखने दीजिए। यदि वह पूछता है कि क्या वैदिक परंपरा में स्त्री को कोई अधिकार था, तो उसे मूल ग्रंथों के संदर्भ दीजिए। यदि वह पूछता है कि ‘धर्मवादी सत्ता’ से क्या आशय है, तो ‘धर्म’ और ‘रूढ़िवादिता’ के बीच अंतर समझाइए और यदि वह पूछता है कि फुले आज इतने व्यापक रूप से सम्मानित क्यों हैं, तो उसे वर्तमान भारत की सामाजिक स्मृति भी दिखाइए। यही वास्‍तव में सत्‍य शिक्षा है।

पांच सवाल, जिनसे शुरू होनी चाहिए पाठ्यपुस्तक की समीक्षा

पहला: किसी ऐतिहासिक दावे के साथ उसका प्राथमिक स्रोत क्यों न दिया जाए? दूसरा: किसी समाज सुधारक की तीखी भाषा के साथ उसका ऐतिहासिक संदर्भ क्यों न समझाया जाए? तीसरा: ‘ब्राह्मण’, ‘ब्राह्मणवाद’, ‘पुरोहित’, ‘पुरोहितवाद’ और ‘धर्मवादी सत्ता’ जैसे शब्दों की अलग-अलग परिभाषाएं विद्यार्थियों को क्यों न दी जाएं? चौथा: सामाजिक कुरीतियों की आलोचना के साथ भारतीय ज्ञान परंपरा के मूल ग्रंथों और उनके सकारात्मक पक्षों को तुलनात्मक रूप से क्यों न पढ़ाया जाए? पांचवां: क्या पाठ्यपुस्तक विद्यार्थी को निष्कर्ष देती है या निष्कर्ष तक पहुंचने के लिए पर्याप्त सामग्री देती है?

अंतिम बात : इतिहास किसका लिखा जाए?

ज्योतिबा फुले का इतिहास भी भारत का इतिहास है। सावित्रीबाई फुले का संघर्ष भी भारत का इतिहास है। वैदिक ऋषिकाओं की परंपरा भी भारत का इतिहास है। भारतीय ज्ञान परंपरा में योगदान देने वाले विद्वानों का इतिहास भी भारत का इतिहास है। सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध संघर्ष भी भारत का इतिहास है और उन कुरीतियों के विरुद्ध हुए सुधार आंदोलनों का विरोध और समर्थन भी इतिहास का हिस्सा है। अत: इनमें से किसी एक को हटाकर दूसरा स्थापित करने से इतिहास पूरा नहीं होता।

वास्‍तव में इतिहास तब पूरा होता है जब विद्यार्थी को संघर्ष भी दिखे, संदर्भ भी, आलोचना भी मिले, प्रमाण भी,सुधारक भी दिखाई दे और जिस समाज को उन्होंने बदलने का प्रयास किया, उसकी जटिलता भी। एनसीईआरटी जैसी राष्ट्रीय संस्था के सामने चुनौती इसलिए बड़ी है कि उसकी पुस्तक का एक वाक्य हजारों विद्यार्थियों की ऐतिहासिक स्मृति का हिस्सा बनता है, इसलिए प्रश्न सिर्फ यह नहीं कि ‘अंतरा’ में ज्योतिबा फुले के बारे में क्या लिखा गया है। बड़ा प्रश्न यह है कि क्या उस पाठ को पढ़ने वाला बच्चा इतिहास को समझकर निकलेगा या इतिहास के बारे में पहले से तय एक धारणा लेकर?

कुल मिलाकर कहना यही है कि शिक्षा का लक्ष्य किसी जाति को अपराधबोध देना, किसी समुदाय को कटघरे में खड़ा करना या किसी परंपरा को महिमामंडित करना नहीं होना चाहिए। उसका लक्ष्य विद्यार्थी को इतना सक्षम बनाना होना चाहिए कि वह प्रमाण देखे, प्रश्न करे, मतभेद समझे और अपना निष्कर्ष स्वयं निकाले।

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