बांग्लादेश में तारीक़ रहमान सत्ता में, अधर में शेख़ हसीना का भविष्य!

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नव ठाकुरीया

गुवाहाटी : स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव की विस्तृत तैयारियों के बाद, उत्सवधर्मी माहौल में बांग्लादेश में 12 फरवरी को आम चुनाव संपन्न हुआ। इस चुनाव में बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) ने प्रचंड जीत दर्ज करते हुए सत्ता में वापसी की। पार्टी नेता तारीक़ रहमान के नेतृत्व में BNP ने 300 सदस्यीय राष्ट्रीय संसद (जातीय संसद) की 200 से अधिक सीटों पर विजय हासिल की। वहीं जमात-ए-इस्लामी बांग्लादेश को लगभग 70 सीटें मिलीं।

दक्षिण एशिया की सबसे पुरानी और प्रभावशाली राजनीतिक पार्टियों में शामिल आवामी लीग इस चुनावी प्रक्रिया से बाहर रही। ढाका में गठित अंतरिम सरकार ने उसकी गतिविधियों पर प्रतिबंध लगा दिया था। पार्टी अध्यक्ष और पूर्व प्रधानमंत्री शेख़ हसीना 5 अगस्त 2024 को भारत चली गई थीं। 17 करोड़ की आबादी वाले मुस्लिम बहुल बांग्लादेश का शासन 8 अगस्त से नोबेल पुरस्कार विजेता डॉ. मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार संभाल रही थी।

13वीं जातीय संसद के चुनाव कड़े सुरक्षा इंतज़ामों और उन्नत तकनीकी निगरानी के बीच कराए गए। कुल 12.7 करोड़ मतदाताओं में से लगभग 60 प्रतिशत ने मतदान किया। यह बांग्लादेश के हालिया चुनावी इतिहास में एक असामान्य लेकिन सकारात्मक संकेत माना जा रहा है, क्योंकि इससे पहले के कई चुनाव बेहद कम मतदान और विवादों से घिरे रहे थे। इस बार 51 राजनीतिक दलों और निर्दलीय उम्मीदवारों समेत करीब 2000 प्रत्याशी चुनाव मैदान में थे।

चुनाव की एक उल्लेखनीय विशेषता यह रही कि पिछले 35 वर्षों में पहली बार मतदान के दिन चुनावी हिंसा में किसी की मौत नहीं हुई। हालांकि देश के विभिन्न मतदान केंद्रों के आसपास प्राकृतिक कारणों से सात लोगों की मृत्यु दर्ज की गई। ब्राह्मणबरिया में एक मतदान अधिकारी ड्यूटी के दौरान गिर पड़े, जबकि खुलना में एक पूर्व BNP नेता और ढाका, चटगांव, गाइबांधा, किशोरगंज तथा मानिकगंज में पाँच मतदाताओं की बीमारी के कारण मृत्यु हुई।

मतदान समाप्त होने के बाद कई भारतीय मीडिया संस्थानों ने बांग्लादेशी मतदाताओं की सराहना की, जिन्होंने कट्टर इस्लामी रुख रखने वाले उम्मीदवारों की तुलना में अपेक्षाकृत धर्मनिरपेक्ष BNP को प्राथमिकता दी। उल्लेखनीय है कि जुलाई–अगस्त 2024 के जनउभार के दौरान शेख़ हसीना विरोधी आंदोलन का नेतृत्व करने वाले युवाओं द्वारा गठित नेशनल सिटिजन पार्टी ने इस चुनाव में जमात-ए-इस्लामी के साथ गठबंधन किया था, लेकिन उसका प्रदर्शन एकल अंक तक ही सीमित रहा।
नई दिल्ली की केंद्र सरकार ने भी बांग्लादेश की इस ‘उदार और लोकतांत्रिक’ छवि वाली पार्टी के साथ संतुलित और सौहार्दपूर्ण संबंध बनाए रखे। जब तारीक़ रहमान की मां और पूर्व प्रधानमंत्री ख़ालिदा ज़िया गंभीर रूप से बीमार थीं, तब भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सार्वजनिक रूप से चिंता व्यक्त करते हुए हरसंभव सहयोग की पेशकश की, जिस पर BNP ने औपचारिक रूप से आभार जताया।

ख़ालिदा ज़िया के निधन के बाद भारत ने अपने विदेश मंत्री एस. जयशंकर को ढाका भेजा। अपने संक्षिप्त दौरे में उन्होंने शोक संतप्त परिवार से मुलाकात की और प्रधानमंत्री मोदी का व्यक्तिगत शोक संदेश तारीक़ रहमान को सौंपा। इसके बाद नरेंद्र मोदी तारीक़ रहमान को उनकी निर्णायक चुनावी जीत पर बधाई देने वाले पहले वैश्विक नेता बने और दोनों पड़ोसी देशों के बीच बहुआयामी संबंधों को मज़बूत करने की इच्छा जताई। ज़मीनी स्तर पर तारीक़ रहमान ने भी भारत के प्रति संयमित रुख बनाए रखा और किसी भी तरह के भारत-विरोधी बयान या संदेश से परहेज़ किया।

आलोचकों का तर्क है कि यह चुनाव पूरी तरह समावेशी नहीं था, क्योंकि 1971 से पहले देश की प्रमुख राजनीतिक ताकत रही आवामी लीग को इसमें भाग लेने से रोका गया। हालांकि 2014, 2018 और 2024 के आम चुनावों में BNP द्वारा बहिष्कार और आवामी लीग कार्यकर्ताओं पर कथित धांधली के आरोप लगे थे, जिनमें मतदान प्रतिशत बेहद कम रहा। कभी BNP की सहयोगी रही जमात-ए-इस्लामी अब संसद में प्रमुख विपक्षी दल के रूप में उभरी है, जिससे इस्लामी राजनीतिक ताकतों के मुख्यधारा में प्रवेश का रास्ता खुल गया है।

बांग्लादेश निर्वाचन आयोग और प्रो. यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार ने शांतिपूर्ण और उत्सवधर्मी माहौल में चुनाव संपन्न कराने के लिए मतदाताओं और आम जनता का धन्यवाद किया। प्रो. यूनुस ने कहा कि मतदाताओं की स्वस्फूर्त भागीदारी, राजनीतिक दलों का जिम्मेदार आचरण, उम्मीदवारों का संयम और चुनावी प्रक्रिया से जुड़ी संस्थाओं की पेशेवर भूमिका यह दर्शाती है कि बांग्लादेश में लोकतंत्र के प्रति प्रतिबद्धता अब भी मजबूत है। इसके विपरीत, अपदस्थ प्रधानमंत्री शेख़ हसीना ने चुनाव को “प्रहसन” बताते हुए अंतरिम सरकार से इस्तीफ़ा देने और नए, निष्पक्ष व समावेशी चुनाव कराने की मांग की।
हिंदू बहुल भारत मुस्लिम-बहुल बांग्लादेश में धार्मिक अल्पसंख्यकों की तेज़ी से घटती जनसंख्या को लेकर चिंतित है। 1947 में जहाँ सनातनी हिंदू आबादी लगभग 23 प्रतिशत थी, वह अब घटकर 8 प्रतिशत से भी कम रह गई है। लगातार हिंसा, जबरन धर्मांतरण और धार्मिक उत्पीड़न शासकों के बदलने के बावजूद जारी रहे हैं। शेख़ हसीना के 2009 से 2024 तक के दूसरे कार्यकाल में भी हिंदू परिवारों और उनके पूजा स्थलों पर अत्याचार पूरी तरह नहीं रुक सके, जिससे अनेक लोगों को धीरे-धीरे अपना जन्मदेश छोड़ना पड़ा। इसके बावजूद, भारत में उन्होंने स्वयं को पीड़ित के रूप में प्रस्तुत किया, जबकि वास्तविक पीड़ित बांग्लादेश के हिंदू ही रहे।

प्रधानमंत्री मोदी की बधाई भरी फोन कॉल ने भारत में बांग्लादेश को लेकर धारणा को प्रभावित किया और देश के मीडिया जगत पर भी इसका असर पड़ा। फिलहाल यह समय तारीक़ रहमान के लिए निर्णायक है—उन्हें ऐसे देश का नेतृत्व करना है जहाँ हिंदू-विरोधी भावनाएँ मौजूद हैं। उधर, शेख़ हसीना भारत में अस्थायी शरण लेकर लगातार राजनीतिक बयान दे रही हैं, जबकि उनके देश में उन्हें मृत्युदंड का सामना करना पड़ा है। यह स्थिति पड़ोसी देश की नई सरकार के प्रति भारत की सद्भावना पहल की भावना को चुनौती देती प्रतीत होती है। शेख़ हसीना साहसी नेता हैं या भारत के लिए एक असहज और अवांछित अतिथि—इसका निर्णय समय करेगा।

(लेखक पूर्वोत्तर भारत के वरिष्ठ पत्रकार हैं)

प्रिय वेलेन्टाइनियों एंड जेंज़ीगणों!

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सुरेंद्र बांसल

चंडीगढ़ । अपना भारत वसंत और होली जैसे मदनोत्सवों का देश है। देश और समाज की स्मृतियां भले क्षीण हुई हों , लेकिन हमारी संस्कृति और परंपराएं आज भी अनेक फूहड़ताओं से दूर हैं। बीते कुछ वर्षों से जब से दुनिया मुट्ठी में आनी शुरू हुई है तो वैश्विक फूहड़ताओं का दायरा भी तेजी से बढ़ा है। वेलेंटाइन सप्ताह भी उसी बाज़ार में सजी फूहड़ मोहब्बत की दुकान का प्रसार और पसारा ही है।

इसी बाज़ार के नियंताओं ने शोशा छोड़ा कि, प्यार अंधा होता है’, जबकि हमारे देश की मान्यताएं कहती हैं कि अगर प्यार ही अंधा हो, तो आंख जीवन का कौनसा तत्व देता है ? जैसे कहा जाता है कि सच कड़वा होता है, अगर सच ही कड़वा होता है, तो फिर जगत में मीठा क्या होगा? जब दिल लगा गधी से तो परी क्या चीज़ है’ प्रेम की ऐसी ही फूहड़ और बेहूदी परिभाषा को लेकर ही प्रेम सिर्फ एक ऑब्जेक्ट में बदल गया है.जिसने प्रेम की समझ को अर्थहीन बना दिया है। वेलेंटाइन जैसे फूहड़ सप्ताहों के बाज़ार ने लोगों को समझा दिया है कि प्यार अंधा होता है, जबकि सच यह है कि सिर्फ प्यार ही इंसान को असली आँख देता है। प्यार के बिना इंसान मात्र एक शरीर भर है, वैसे ही जैसे बिना देवता के मंदिर। प्रेम के कारण ही कोई इंसान जीवन के बड़े लक्ष्य तय करता है, प्रेम के कारण ही जीवन में करुणा और सौंदर्यबोध उत्पन्न होता है और वही सौंदर्यबोध जीवन में बहुत कुछ रचने की प्रेरणा बनता है, जिसे फैज़ ने कहा है,” और भी ग़म हैं ज़माने में मोहबत के सिवा ”. प्रेम की भावना ही जीवन में सकारात्मक सफलता की राह पर ले जाती है। सिर्फ छपरीपंथी और रीलबाज़ी के लिए बने संबंध न ईमानदार होते हैं, न प्रामाणिक और न ही प्रेमपूर्ण हो पाते हैं।

ऐसे संबंध सिर्फ भीतर और बाहर उजाड़ ही रचते हैं,और भीतरी उजाड़ बहुत घातक होते हैं। हमारे आसपास घटने वाली दुर्घटनाओं के बारे में छपने वाली ख़बरों में आज वही उजाड़ साफ़ दीखते हैं. और जिन लोगों के भीतर उजाड़ होते हैं, वे सब फिर और अधिक नकली विकल्पों की ओर भागने लगते हैं। नकली ब्यूटी प्रोडक्टस की ओर, सोशल मीडिया पर अपनी ही सेल्फियां चेंपने की चुल्ल और बे मक़सद रीलबाज़ी के प्रपंच उसी उजाड़ का परिणाम और साक्षात् प्रमाण हैं।

इसके विपरीत सच्चा प्रेम अपने घर से लेकर अपना परिवेश और देश रचने की व्यापक दृष्टि देता है, क्योंकि प्रेमियों को लगने लगता है कि हमारा परिवेश चारों ओर प्रेयसी या प्रेमी की तरह सुंदर,सुरम्य और प्रेम के आत्मीय आभास सा होना चाहिए।

प्रेम केवल प्रेमी-प्रेमिका की छीया-छी नहीं , बल्कि अपना परिवेश अधिकाधिक आत्मीयता की सीख है।

लेकिन आसपास देखिये तो वेलेंटाइन सप्ताहों से निकले साप्ताहिक प्रेमी अचानक कहां खो जाते हैं, पता ही नहीं चलता ? अगर वे सच में प्रेमी होते तो वे नित्यप्रति कटती श्रद्धाएं कैसे देख सकते हैं ? प्रेम के कारण उनके भीतर उगी करुणा मांसाहार और भांति भांति के परफ्यूमों के लिए प्रतिदिन कटते जीव-जंतु कैसे बर्दाश्त कर सकते हैं ? हर रोज़ कटते पेड़, पट रहे तालाब, मिटती हरियाली सच्चे प्रेमी कैसे बर्दाश्त कर लेते हैं ? सच्चा प्रेम अपनी देह से लेकर प्रकृति के समस्त इकोसिस्टम के लिए सर्वे भवंतु सुखिना ‘ की प्रार्थना बनता है। क्या वेलेंटाइनी ऐसे बनते दिखे कभी ?

अगर हर साल वेलेंटाइन सप्ताह के कारण समाज में करोड़ों प्रेमी तैयार होते हैं, तो इतनी बेटियां रोज़ क्यों काटी जा रही हैं? अगर हर साल वेलेंटाइन सप्ताह के कारण समाज में करोड़ों प्रेमी तैयार हो रहे हैं, तो लाखों युवा नशे की लत में गर्क़ क्यों हो रहे हैं ? अगर वेलेंटाइन सप्ताहों से उपजे प्रेमी हमारे आसपास के घरों में ही रहते हैं तो धरती पर इतने वृद्धाश्रम और अनाथालय क्यों बढ़ रहे हैं, बलात्कारियों की बाढ़ कहां से आ रही है ? ज़मीन जायदाद और दहेज के लिए अदालतों में इतने मुकदमे क्यों लड़े जा रहे हैं ? क्या ये प्रेम के अभाव से उपजे वही उजाड़ नहीं हैं, जो हमने रच लिए ? निस्संदेह ये सब वही उजाड़ हैं जो मात्र बाज़ार में खुली नकली मोहब्बत की दुकानों से खरीदे गए हैं. इसलिए हे प्रिय वेलेंटाइनियों एंड जेंज़ीगणों संक्रमण काल से गुज़रते देश को रचने की ज़िम्मेदारी अब आपकी ही है, और रचनाएं मौलिक और प्रमाणिक होकर ही संभव होती हैं. और ध्यान रहे कि अपना परिवेश और देश मोहब्बत की दुकानों से खरीदे टुच्चे और छिछोरे सप्ताहिक प्रेम से समृद्ध नहीं होते।

ईश्वर मुझे इतना शक्ति दें कि मैं जीवन पर्यंत इस संगठन में कार्य करता रहूँ

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भूपेन्द्र सिंह

लखनऊ। UGC गाइडलाइन कोई कानून नहीं है, यह लागू भी नहीं हुआ है, इसका ज़मीन कर कोई भी अस्तित्व जीरो है। लेकिन अचानक सवर्ण समाज के ऊपर अत्याचार बढ़ चुका है, वह समाप्त होने के कगार पर पहुँच चुके हैं, देश में बाक़ी जातियां उनके विनाश के लिए लालायित हो उठी हैं। उनका ओपिनियन मेकिंग और डिसिजन मेकिंग में अस्तित्व समाप्त हो चुका है। ये सब चार सप्ताह में हो चुका है, पता नहीं अगले चार सप्ताह में क्या होगा। बच बचाकर रहिए, ऐसे कई कहानी मार्केट में आने वाला है जो “भेड़िया आया” के तर्ज़ पर होगा।

नरेन्द्र मोदी से लगाये, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ तक सब सवर्ण विरोधी हो चुके हैं। कहीं दूर दूर तक सवर्ण समाज को पूछने वाला नहीं है, ऐसा कब हो गया, कैसे हो गया, किसी को पता नहीं चल पा रहा है। हिंदुत्व अब तमाम लोगों को चूरन लग रहा है। कुछ लोगों को राम मंदिर में अब दिव्यता नहीं दिखाई पड़ रही है। कुछ लोगों को राष्ट्रवाद अब अफीम नज़र आ रहा है। लगातार भाजपा, मोदी, अमित शाह, योगी, संघ सबके ख़िलाफ़ खड़े हैं। इनको पता है कांग्रेस, सपा, राजद सबकी सच्चाई, लेकिन इनको लग रहा है कि मंडल के बाद राजनीति ने जो करवट ली है उसे हम लगातार विरोध करके पलट देंगे। संघ, मोदी, योगी, शाह, भाजपा को वापस मंडल से पहले वाले मोड में रिसेट कर देंगे। किसी को यदि कांस्टीपेशन भी हो गया तो अब गलती मोदी की है। जो वामपंथी और कांग्रेस कर रहे हैं उसकी गलती मोदी जी की है, इसलिए ये नाराज़ है और बदले में वामपंथ और कांग्रेस की वापसी करायेंगे।

जातियों में प्रेम इस कदर है कि पूछिये नहीं, ठाकुर को ब्राह्मण नहीं पच रहा, भूमिहार को ब्राह्मण ठाकुर नहीं पच रहे, ठाकुर को ब्राह्मण नहीं पच रहा। हद तो उत्तर प्रदेश में देखने को मिली कि कुर्मी को प्रदेश अध्यक्ष बना दिया गया तो समकक्ष लोधी बिरादरी के नेता लखनऊ में जमावड़ा किए और प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष नाराज़गी दिखा रहे हैं। कुर्मी कोइरी लोधी तीनों यादवों को नहीं देखना चाहते। अभी एक साल तक तमाम जातियां एक के बाद एक कष्ट में आती रहेंगी। उत्तर प्रदेश चुनाव से पहले यह कष्ट जारी रहेगा।

सच बात ये है की इस देश में हिंदुत्व के अतिरिक्त सब कुछ फ्रॉड है, सब केवल तोड़ने वाली, लड़ाने वाली पहचान है। मूर्ख आदमी, असफल आदमी जिसकी अपनी कोई पहचान नहीं, जिसकी अपनी कोई उपलब्धि नहीं, वह पुरानी कहानियाँ सुन सुनकर उसी कहानियों में जी रहा है। अपनी वास्तविक स्थिति से इतर एक कल्पना लोक में जी रहा है। मानसिक रोगियों जैसी स्थिति बनी हुई है। मैंने एक रील देखा जिसमें ब्रजेश पाठक जी राजनाथ सिंह जी का पैर छूते नज़र आ रहे हैं, मैंने उसे अपने मित्र ऋषिकांत पांडे जी को भेजा। उसमें नए नए बीस बीस साल के लड़के ब्रजेश पाठक जी को गाली दे रहे हैं कि ब्राह्मण होकर ठाकुर का पैर छू रहे हैं। राजनाथ जी उम्र मे, अनुभव में हर प्रकार से श्रेष्ठ हैं लेकिन ये बीस बीस साल के लड़के जो दस बीस हज़ार के नौकरी के मोहताज हैं, वह दुखी हैं कि पाठक जी ने सिंह साहब का पैर क्यों छुआ?

कुछ दिन पहले कुर्मी समाज में पैदा हुए रीलबाज़ों के बारे में लिखा तो कई लोग दुखी हो गए। कहने लगे कि समाज में कुछ लोग तेज तर्रार निकल रहे हैं तो आप अनावश्यक उनका विरोध क्यों कर रहे हैं? अब मैं कैसे समझाउ कि ये जो बीस बीस गाड़ी लेकर अनावश्यक रील बना रहे हो, फ़र्ज़ी साउंड इफ़ेक्ट्स डाल रहे हो, यह सब कम आईक्यू वालो के लिए ठीक है लेकिन एक औसत आदमी ये पूछेगा की भाई तुम समाज का नेतृत्व करना चाहते हो तो तुम्हारा काम लोगों को शांत, सहज और समझदार बनाना है या फिर ये सब बेवक़ूफ़ी सिखाना है? दूसरे तुमसे क्या सीखें? खेत बेचकर ब्लैक स्कॉर्पियो ख़रीदो?

मनोरोगियों की संख्या बढ़ रही है, व्यक्ति केवल दूसरे से गंदगी सीख रहा है। घर घर मनोरोगी पैदा करने की फैक्ट्री लगी हुई है। ब्राह्मण ही ब्राह्मणवाद से आज़ादी के नारे लगा और लगवा रहे हैं। उन्हीं से भरे संस्थानों में ब्राह्मणों को यूरेशिया भेजा जा रहा है। यादव समाज के नेता गाय गोबर जैसे हमारे सभ्यता के आधारभूत पूंजी से घृणा फैलाते नज़र आ रहे हैं। इन सबके पीछे एकमात्र मनोरोग है जाति। लोग मुझसे कहते हैं कि इसके आधार पर गौरव का भाव जाग्रत हो, यह मार्ग निकालना चाहिए। मुझे यह फ्रॉड समझ में आता है। इससे गौरव का बोध तो पनपता मुझे नहीं दिखता, केवल एक दूसरे को नीचा दिखाने का भाव ही दिखाई पड़ता है। इसलिए मैं बार बार लिखता हूँ कि अपने जातीय पहचान को लेकर सहज रहना चाहिए और हिंदुत्व को लेकर गौरव का भाव उत्पन्न करना चाहिए। जाति के नाते न हमारी नैतिकता तय होती है, न हमारा चिंतन, यह दोनों और सबसे महत्वपूर्ण बात स्वतंत्र चिंतन की प्रक्रिया, यह दुनिया की सबसे बड़ी थाती है, जो हिंदुत्व के नाते हमारे पास है। इसी पर गर्व करना होगा।

ऐसे में जब मैं सुदूर से सुदूर क्षेत्रों में संघ के कार्यकर्ताओं को काम करते देखता हूँ, छोटे से लेकर बड़े तक, तमाम लोगों को बिना प्रतिक्रिया भाव के समाज के प्रति सकारात्मक होकर काम करते देखता हूँ तो इस संगठन के प्रति विश्वास बढ़ता जाता है। ये वो लोग हैं जो हवा के झोके के साथ बहते नहीं हैं, इनका वैचारिक आधार मज़बूत है। ये वो लोग नहीं है जो दस साल पहले तक बाबरी के पक्ष में थे, सेक्युलरज़ीम की अफ़ीम पिला रहे थे और आज़ अचानक हवा बदली तो हिंदुत्व के साथ खड़े हो गए। फिर कोई मुद्दा आया तो भावनाओं में बह गए। वह स्थिर चित्त हैं, विचार को लेकर दृढ़ हैं, नेतृत्व को लेकर विश्वास है। मैं चाहता हूँ कि ईश्वर मुझे इतना शक्ति दें कि मैं इस संगठन में जीवन पर्यंत कार्य करता रहूँ ताकि इस धारा में जुड़कर शांत मन, स्थिर चित्त, गहरी समझ, सकारात्मक ऊर्जा और वास्तविक जमीनी कार्य कर सकूँ। मेरे मन में किसी भी हिंदू जाति, समाज, परिवार के प्रति ख़राब विचार कभी न आए।

निशिकांत दुबे और धर्मेंद्र प्रधान उस समुदाय को गुमराह कर रहे हैं जो परंपरागत रूप से ज्ञानवान है

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बक्सर , बिहार : अब समय तेजी से बीत रहा है और यूजीसी विधेयक के प्रति मतदाताओं की नापसंदगी भाजपा सरकार के खिलाफ आक्रोश में तब्दील होती जा रही है। निशिकांत दुबे अब राहुल गांधी के लिए नहीं, नरेंद्र मोदी के लिए मुसीबत बनते दिख रहे हैं। धर्मेंद्र प्रधान ने तो भाजपा की नाव ही डुबो दी है। अगर सामान्य वर्ग के मतदाता अगले होनेवाले जनरल इलेक्शन में सभी संसदीय क्षेत्रों में केवल “नोटा” का बटन दबा दें तो बीजेपी अगले लोकसभा में 50 के अंदर सिमट जाएगी।

धर्मेंद्र प्रधान ओडिशा के संबलपुर संसदीय क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते हैं। वे 2024 में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के उम्मीदवार के रूप में चुने गए थे और भारत के शिक्षा मंत्री भी हैं। निशिकांत दुबे झारखंड के गोड्डा संसदीय क्षेत्र से भारतीय जनता पार्टी के सांसद हैं। निशिकांत दुबे संसद में अक्सर कांग्रेस की नीतियों पर हमला करते हैं और भाजपा के चहेते हैं। इन दोनों ने मीडिया में यूजीसी के नियमों के मुद्दे पर आम जनता को गुमराह करने की कोशिश की और अब आम जनता आगामी चुनावों में उनके संसदीय क्षेत्र में नोटा (NOTA) बटन दबा करके उन्हें सबक सिखाने की सोच रही है। अगर सामान्य वर्ग के मतदाता अगले होनेवाले जनरल इलेक्शन में सभी संसदीय क्षेत्रों में केवल नोटा का बटन दबा दें तो बीजेपी अगले लोकसभा में 50 के अंदर सिमट जाएगी।

शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान और भाजपा सांसद निशिकांत दुबे को विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के नए नियमों को लेकर सामान्य वर्ग के प्रति पक्षपातपूर्ण होने के कारण कड़ी आलोचना का सामना करना पड़ा है। छात्रों और विभिन्न टिप्पणीकारों सहित आलोचकों ने उन पर जनता को गुमराह करने का आरोप लगाया है, क्योंकि उनका दावा है कि नियम संतुलित हैं, जबकि ये नियम केवल विशिष्ट समूहों (Sc, ST, OBC) को ही सुरक्षा प्रदान करते हैं।

निशिकांत दुबे ने X (पूर्व में ट्विटर) पर कहा कि नियम सामान्य वर्ग सहित सभी पर समान रूप से लागू होते हैं और लोगों से “गलतफहमियों” को नजरअंदाज करने का आग्रह किया। X पर समुदाय की टिप्पणियों और विभिन्न आलोचकों ने बताया कि यह तथ्यात्मक रूप से गलत था, क्योंकि नियमों में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि भेदभाव की शिकायतें अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति/अन्य पिछड़ा वर्ग/महिला/दिव्यांग वर्ग द्वारा दर्ज की जानी चाहिए, न कि सामान्य वर्ग द्वारा। शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने आश्वासन दिया कि “किसी को भी किसी प्रकार की परेशानी का सामना नहीं करना पड़ेगा” और कानून का दुरुपयोग नहीं किया जाएगा। आलोचकों ने तर्क दिया कि उनके आश्वासन खोखले थे क्योंकि उन्होंने लिखित नियम में मौजूद संरचनात्मक पूर्वाग्रह को संबोधित नहीं किया।

“गुमराह करने” के आरोप इसलिए लगे क्योंकि प्रधान और दुबे ने इन नियमों को सार्वभौमिक “समानता” के साधन के रूप में प्रचारित किया, जबकि नियमों का वास्तविक पाठ और संरचना—जैसा कि सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया—एकतरफा दृष्टिकोण का संकेत देती है जिससे जातिगत संघर्ष को बढ़ावा मिल सकता है। असल में, निशिकांत दुबे और धर्मेंद्र प्रधान ने नुकसान को कम करने के बहाने और भी अधिक नुकसान पहुंचाया।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बार-बार कहा है कि उनके अनुसार भारत में केवल चार ही “जातियाँ” हैं, और उनका ध्यान पारंपरिक जातिगत पहचानों के बजाय सामाजिक-आर्थिक समूहों पर केंद्रित है। प्रधानमंत्री मोदी द्वारा परिभाषित चार “जातियाँ” हैं: 1) गरीब, 2) महिलाएँ, 3) युवा और 4) अन्नदाता। विडंबना यह है कि इनमें से कोई भी जाति यूजीसी के नियमों या किसी अन्य सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज नहीं है। मोदी ने नवंबर 2023 के अंत में सरकारी योजनाओं के लाभार्थियों से बातचीत के दौरान पहली बार इस मुद्दे को उठाया था, जिससे विपक्ष द्वारा राष्ट्रव्यापी जाति जनगणना की मांग के बीच उन्हें काफी समर्थन मिला। उन्होंने तर्क दिया कि इन चार समूहों का उत्थान देश की प्रगति के लिए आवश्यक है और उनका सशक्तिकरण उनकी सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता है। इसके विपरीत, राजनीतिक विश्लेषकों का मानना ​​है कि वे किसी भी कीमत पर अनुसूचित जाति, अनुसूचित जाति और अन्य पिछड़ा वर्ग को बढ़ावा देने पर तुले हुए हैं। लोग अब उनके द्वारा उल्लिखित जाति और लिखित रूप में जिस जाति की वे बात कर रहे हैं, उस पर उनकी रहस्यमय चुप्पी पर सवाल उठा रहे हैं।

इस बयान को व्यापक रूप से जाति-आधारित राजनीति के प्रतिवाद के रूप में देखा जा रहा है, जो पारंपरिक विभाजनों के बजाय विकास-उन्मुख पहचान पर जोर देता है। उन्होंने इन चार समूहों को विकसित भारत के “अमृतस्तंभ” कहा है। अब लोग जानना चाहते हैं कि क्या उन्होंने धर्मेंद्र प्रधान और निशिकांत दुबे की सलाह पर जाति की अपनी पूर्व परिभाषा पर अपना रुख बदल दिया है।

भाजपा खुद को दुनिया की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी बताती है और सुधांशु त्रिवेदी और संबित पात्रा जैसे उसके प्रवक्ता मीडिया में हर विषय पर ज्ञान बांटते रहे हैं, लेकिन यूजीसी विवाद के बाद से वे रहस्यमय तरीके से गायब हो गए हैं। ऐसा लगता है कि वे एक चीनी उत्पाद की तरह काम कर रहे हैं जो जरूरत पड़ने पर विफल हो जाता है। भाजपा अपने मूल मतदाताओं को भूल गई है। अगर वे तटस्थ होकर NOTA पर जोर देते हैं, तो भी भाजपा को चुनाव में हार का सामना करना पड़ेगा। उनके पास 2018 के मध्य प्रदेश चुनाव का विश्लेषण करने के सभी कारण हैं कि कैसे NOTA ने भाजपा को मध्य प्रदेश में 11 सीटें, सत्ता और मुख्यमंत्री की कुर्सी गंवा दी। इस बार निशिकांत दुबे और धर्मेंद्र प्रधान की बेतुकी व्याख्या NOTA के पक्ष को और बढ़ाएगी। अगर सामान्य वर्ग के मतदाता अगले होनेवाले जनरल इलेक्शन में सभी संसदीय क्षेत्रों में केवल नोटा का बटन दबा दें तो बीजेपी अगले लोकसभा में 50 के अंदर सिमट जाएगी।

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग विनियम 2026 से जुड़े हालिया विवादों के बाद भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को वाकई गंभीर राजनीतिक चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। जाति आधारित भेदभाव को रोकने के उद्देश्य से बनाए गए ये विनियम वास्तव में जाति आधारित पूर्वाग्रह को बढ़ावा देते हैं। इसका उल्टा असर हुआ है और पार्टी एक ऐसी दुविधा में फंस गई है जिससे उसके मूल मतदाता आधार को खतरा है। निशिकांत दुबे और धर्मेंद्र प्रधान द्वारा मामले को दबाने की कोशिश ने स्थिति को और भी बदतर बना दिया है, क्योंकि पार्टी के मूल मतदाताओं को इसकी जानकारी है और वे मोदी और भाजपा द्वारा अक्षरशः और भावना से ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं।

यूजीसी मुद्दे ने भाजपा के “हिंदू एकता” के फार्मूले में दरारें उजागर कर दी हैं। इसने भाजपा की राजनीतिक संरचना के मूलभूत घटकों को आपस में भिड़ा दिया है, जिससे पार्टी के सामाजिक गठबंधन प्रबंधन के लिए दीर्घकालिक चुनौती खड़ी हो गई है। और यह सब इसलिए हो रहा है क्योंकि “मोदी हैं तो मुमकिन है”।

धर्मेंद्र प्रधान का शिक्षा मंत्री के रूप में कार्यकाल (2021-वर्तमान) कई विवादों से घिरा रहा है, जिनमें मुख्य रूप से 2024 के NEET-UG परीक्षा के प्रश्नपत्र लीक होने और अनियमितताओं के आरोप शामिल हैं। इन विवादों के चलते देशव्यापी विरोध प्रदर्शन हुए और उनके इस्तीफे की मांग उठी। अन्य विवाद के मुद्दों में तमिलनाडु के साथ तीन-भाषा नीति का विवाद, NTA सुधार और पाठ्यपुस्तक संशोधन विवाद शामिल हैं। NEET-UG 2024 परीक्षा में प्रश्नपत्र लीक होने, रियायती अंक देने और कुप्रबंधन के आरोप लगे। विपक्षी दलों ने राष्ट्रीय परीक्षण एजेंसी (NTA) की “व्यवस्थित विफलता” का हवाला देते हुए उनके इस्तीफे की मांग की। धर्मेंद्र प्रधान को UGC विनियम 2026 में सामान्य वर्ग के खिलाफ जातिगत भेदभाव से संबंधित मुद्दों का सामना करना पड़ रहा है। वे खुलेआम जनता को गुमराह करने की कोशिश कर रहे हैं, जबकि उनके मंत्रालय के अंतर्गत UGC विनियम में उल्लिखित आपत्तिजनक प्रावधान प्रथम दृष्टया भेदभावपूर्ण हैं।

यहां यह उल्लेख करना अनुचित नहीं होगा कि धर्मेंद्र प्रधान इतने विवादों से घिरे होने के बावजूद नरेंद्र मोदी ने उन्हें दूसरी बार शिक्षा मंत्रालय की कमान क्यों सौंपी? भारत के लोग पूछ रहे हैं।

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