गर्मी की छुट्टियों का वो मज़ा, जो अब गुम है

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दिल्ली । भारतीय मूल के गायक क्लिफ रिचर्ड्स के गाने, समर हॉलीडेज, और द यंग वन्स, गर्मी की छुट्टियों की आजादी और मौज को बखूबी बयान करते हैं। 1960 और 70 के दशक तक गर्मी की छुट्टियाँ जादू-सी होती थीं—सालभर की पढ़ाई और परीक्षाओं के बाद आज़ादी का सुनहरा मौसम। उस ज़माने में ज़िंदगी सादगी भरी थी, बिना मोबाइल, एसी और टेक्नोलॉजी के शोर के।

उस समय हमारे पास ख़ास चीज़ें तो नहीं थीं, लेकिन जो था वो अनमोल था—वक़्त, कल्पना और गर्मी से तपती गलियाँ। वो दो महीने सिर्फ़ मस्ती, खेल और बेफ़िक्र ज़िंदगी के थे। सालाना इम्तिहान के आखिरी दिन, कॉपी किताबों से मुक्ति और आजादी का गोल्डन ऐरा शुरू हो जाता था। छुट्टियों का मतलब अपना घर ही नहीं, पूरे मोहल्ले की शांति गायब!

सुबह साइकिलों की खनखनाहट से शुरू होती। हम बिना किसी डर के पूरे मोहल्ले में घूमते, पसीने से लथपथ और धूल से सने। चप्पलें फटी हुई, कपड़े मैले—पर किसे परवाह? हमारी दुनिया तो साइकिल की सीट पर बैठकर ही बन जाती थी। कुछ बच्चे गिलहरी पालते, कुछ चिड़िया, लड़कियां गुटके खेलती या लंगड़ी टांग। चोर सिपाही, आइस पायस या कुछ घरों में कैरम बोर्ड पर जमावड़ा बना रहता था।
चाय की दुकान पर इकट्ठा होकर थम्स अप या गोल्ड स्पॉट की बोतल शेयर करते। खाली प्लॉट में कब्ज़ा जमाकर खजाने ढूंढने का खेल खेलते। कोई चोट लग जाए, धूप से त्वचा जल जाए—तो क्या हुआ? ये तो उस दिन की कामयाबी का निशान था!

किताबें हमारी सबसे अच्छी दोस्त थीं। पत्रिकाएं, उपन्यास, अमर चित्र कथा, या सुपरमैन के कॉमिक्स—गांव में आम के पेड़ की छाँव और शहर में सीढ़ियों के नीचे बैठकर पढ़ते और कहानियों में खो जाते थे।
पेंटिंग करते वक़्त हाथ रंग से सने रहते, और हमें लगता कि हमने कोई महान कृति बना दी है। शौक भी क्या-क्या थे—बोतल के ढक्कन इकट्ठे करना, लकड़ी से तीर-कमान बनाना, अख़बार और बाँस से पतंग उड़ाना, टिकट या सिक्के कलेक्ट करना, शाम को छत पर पतंगे उड़ाना। रात को छतों की धुलाई तरावट के लिए, सुराही भरकर रखना, खरबूजे, आम के साथ ब्यालू करना, फिर किस्से कहानियों का दौर, सुबह देर से उठना, वो भी क्या दिन थे!
जब बारिश की पहली फुहार गिरती, तो हम छत के नीचे नहीं छुपते—बल्कि खुले आसमान के नीचे नाचते! कीचड़ में कागज़ की नावें चलाते, और मिट्टी की ख़ुशबू हमारे लिए इत्र से कम नहीं होती थी।

जिनके घरवाले पहाड़ों पर नहीं ले जा सकते थे, वो दादा-दादी के घर ट्रेन में या सरकारी बस में भरकर चले जाते। वहाँ मिलने वाले घर के बने लड्डू, इमरती और बुज़ुर्गों के किस्से—सब कुछ यादगार होता। छत पर सोते, तारों को गिनते, और रेडियो पर गाने सुनते। ” गर्मी की छुट्टियां शुरू होते ही हमारे बाबा सबको पकड़ कर गोवर्धन की परिक्रमा लगाने ले जाते, उधर मानसी गंगा में दिन भर नहाते थे, धर्मशाला में रहते थे, सब मिलकर परांठे सब्जी बनाते थे,” रिटायर्ड मास्टर गोपी चंद ने बताया। उन दिनों गर्मियों में ही देहात की शादियां होती थीं। छुट्टियों में दो तीन दावतें तो पक्की रहती थीं। दुकानदार भोला बाबू को याद है, अखंड रामायण पाठ जो छुट्टियों में ही ज्यादा होते थे, क्यों कि पढ़ने वाले मिल जाते थे। बेलनगंज के दीन दयाल को सुबह शाम यमुना जी जाकर घंटों नहाना याद है, शाम को कछुओं को आटे की गोली खिलाते थे। उन दिनों भांग ठंडाई का रिवाज था, कभी फाल्से की, कभी आम की या कोई और फल। कभी कभी बच्चों को बर्फ के साथ आम रबड़ी भी मिल जाती थी।

हम ऐसे खेल खेलते जिनमें पैसे नहीं, बस दिल लगता था—गिल्ली-डंडा, कंचे, लट्टू घुमाना, पिट्ठू। लुका-छिपी तो ऐसी कि शाम हो जाती, पर खेल ख़त्म नहीं होता।

क्रिकेट खेलने के लिए ईंटें विकेट बन जातीं, और टेनिस बॉल पर पट्टी बाँधकर उसे “स्विंग” कराया जाता। अगर गेंद किसी रिक्शे से टकरा जाए, तो “आउट!” का ऐलान होता। अंपायर का पिटना नॉर्मल था।

हमारे पास वक़्त था बस बैठकर देखने का—चींटियों की कतार, बादलों का बदलता आकार, या धूप में सूखते आम के अचार की महक। ज़िंदगी धीमी थी, और बचपन कोई रेस नहीं था।

लेकिन अब सब कुछ बदल गया है। घर छोटे हो गए हैं, और बच्चों पर हमेशा कुछ न कुछ सीखने का दबाव रहता है। गर्मियाँ अब कोचिंग क्लासेस और एक्टिविटी शेड्यूल में कैद हो गई हैं।
मोबाइल और गैजेट्स ने किताबों और साइकिल की सवारी की जगह ले ली है। फास्ट फूड और आलसी आदतों ने सेहत बिगाड़ दी है। तनाव इतना कि छोटी-छोटी बात पर गुस्सा आ जाता है।
हमारी वो आज़ादी—बिना वजह घूमना, बारिश में नाचना, और बेफ़िक्र होकर सपने देखना—अब सिर्फ़ याद बनकर रह गई है। बचपन, जो कभी खेल और मस्ती का नाम था, अब स्क्रीन्स और टाइमटेबल में कैद हो गया है।
शायद वो दिन वापस न आएँ, लेकिन हम उनकी यादों को ज़िंदा रख सकते हैं—बेफ़िक्र खेलने का मज़ा, बोर होने की ख़ूबसूरती, और उस दुनिया की जादूगरी, जहाँ सबसे बड़ा सुख सिर्फ़ कल्पना में था।

पति की हत्या! पत्नी का बदला! ससुराल में सनसनी! असल मसला क्या है

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दिल्ली । आजकल ये बहुत हो रहा है! जब कोई महिला किसी अपराध में लिप्त पाई जाती है, मीडिया हेडलाइनों में जैसे भूचाल आ जाता है। टीवी स्क्रीन पर चिल्लाते एंकर, सोशल मीडिया पर उबलती भावनाएं और फिर वो परिचित सा नैरेटिव—”औरतें अब डराने लगी हैं!” मेघालय की घटना ने तो झकझोर ही दिया है।

क्या वाकई ऐसा हो रहा है? क्या नई पीढ़ी की महिला वास्तव में भूतनी, वैंपायर बन रही हैं? या ये सिर्फ एक और चाल है उस आवाज़ को दबाने की, जो सदियों के अन्याय के खिलाफ अब उठने लगी है?

पुरुष प्रधान मीडिया, भारत में औरतों की आज़ादी, बराबरी और इंसाफ की जो लड़ाई है, उसे हाल के कुछ सनसनीखेज मामलों से जोड़कर बदनाम करने की कोशिश क्यों कर रहा है? खासकर कुछ घटनाएं, जहां महिलाओं ने पतियों के साथ क्रूरता की या हत्या जैसा कोई चरम कदम उठाया, उन्हें इस तरह पेश किया गया जैसे यह कोई आम चलन बनता जा रहा हो। जबकि हकीकत इससे कोसों दूर है।

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (2023) के आंकड़े खुद गवाही देते हैं—महिलाओं द्वारा किए गए अपराध कुल अपराधों का सिर्फ 5% से भी कम हैं। और इनमें से हत्या जैसे मामलों की संख्या और भी कम है।

दूसरी तरफ, हर साल 4.5 लाख से ज़्यादा महिलाओं पर हिंसा के मामले दर्ज होते हैं। दहेज के लिए हर साल 6,700 औरतें मारी जाती हैं। बलात्कार, घरेलू हिंसा, एसिड अटैक और यौन उत्पीड़न जैसे अपराधों का आंकड़ा हर साल और डरावना होता जा रहा है।

2024 के बेंगलुरु की घटना को लें, जहां एक महिला ने कथित तौर पर पति की हत्या की। मीडिया ने इसे कुछ यूं परोसा जैसे ‘पत्नी’ अब ‘हत्यारी’ बनने लगी है। सोशल मीडिया पर बहसें छिड़ गईं—”अब मर्दों को भी डरना चाहिए!”

लेकिन कोई ये नहीं पूछता कि इस महिला ने ये कदम क्यों उठाया? क्या वह लगातार प्रताड़ना से जूझ रही थी? क्या उसके पास कोई विकल्प था?

उत्तर प्रदेश के एक मामले में 2025 में एक महिला ने अपने पति की हत्या की साजिश में हिस्सा लिया। जांच में सामने आया कि वह सालों से दहेज और घरेलू हिंसा की शिकार थी। क्या यह हत्या उसका पहला अपराध था, या एक लंबे सिलसिले की अंतिम चीख?

मैसूर की पत्रकार और सोशल एक्टिविस्ट, मुक्ता गुप्ता कहती हैं, “ये घटनाएं बगावत नहीं हैं, ये वे चीखें हैं जो समाज ने वर्षों तक अनसुनी कीं। ये नारी के प्रतिरोध की आखिरी सीमा हैं, जिन्हें हमें समझने की ज़रूरत है, न कि sensational headlines में कैद करने की। औरतों की तरक्की से इतना डर क्यों? पढ़ी-लिखी महिलाएं अब अपने लिए सोच रही हैं, सवाल पूछ रही हैं, फैसले ले रही हैं। 2020 में महिलाओं की साक्षरता दर 70.3% थी, और शहरी भारत में 32% महिलाएं कामकाजी थीं। ये बदलाव परिवार की पुरानी संरचना और सामाजिक ताने-बाने को चुनौती दे रहे हैं।”

सामाजिक कार्यकर्ता पद्मिनी अय्यर कहती हैं, “यही तो बदलाव है, जिससे कुछ लोग घबराए हुए हैं। वे हर ऐसी घटना को औरतों के ‘बिगड़ने’ का सबूत बताकर असल मुद्दों से ध्यान हटाते हैं—दहेज, बाल विवाह, कन्या भ्रूण हत्या, और लैंगिक भेदभाव। 2011 की जनगणना के अनुसार, 1.09 करोड़ बाल विवाह, जिनमें ज़्यादातर लड़कियां थीं। एक अध्ययन के अनुसार, 2000 से 2019 तक 68 लाख कन्याओं का गर्भपात। मुस्लिम और दलित महिलाएं अब भी शिक्षा, स्वास्थ्य और नौकरियों से वंचित हैं।”

इन हकीकतों को भुलाकर अगर कोई महिला अपराध करे तो उसे एक सामाजिक विद्रोह बना देना कहां तक जायज़ है? हमें यह तय करना होगा कि क्या हम महिलाओं की आवाज़ को दबाना चाहते हैं, या उनकी तकलीफों को सुनना और समझना। अगर कोई महिला हिंसा का रास्ता अपनाती है, तो हमें उसके पीछे छिपे दर्द और अन्याय को भी देखना होगा।

समाज बदल रहा है, और यह बदलाव जरूरी भी है। महिलाएं सिर्फ अपने लिए नहीं, पूरे समाज के लिए बदलाव ला रही हैं—शिक्षा में, कामकाज में, अपने हकों की लड़ाई में।

दिल्ली यूनिवर्सिटी की शिक्षाविद डॉ मांडवी कहती हैं, “औरतों की आज़ादी के खिलाफ जो यह नफरत की मुहिम चल रही है, वह दरअसल डर की उपज है—एक बराबरी वाले समाज के आने का डर। हर महिला अपराध को एक पूरी जेंडर के खिलाफ प्रमाण मान लेना न केवल गलत है, बल्कि खतरनाक भी।”

कोयंबटूर की भारती गोपाल कृष्णन कहती हैं, “हमें औरतों को खलनायिका बनाना बंद करना होगा। समझदारी से, सहानुभूति से, और तथ्यों के आधार पर सोचना होगा—तभी एक न्यायपूर्ण समाज बन पाएगा। औरतों की आवाज़, उनकी आज़ादी—इन पर शक नहीं, समर्थन होना चाहिए।”

बिहार में सियासी हवा का रुख बदल रहा है, लेकिन दिशा बिगड़ी दिख रही है…..

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पटना: बिहार में मानसून की बारिश के बाद विधानसभा चुनाव की तैयारियां जोरों पर होंगी लेकिन इस वक्त सियासी हवा का रुख तेजी से बदल रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ऑपरेशन सिंदूर के बाद बिहार में रैलियां करके अपनी मुहिम की शुरुआत कर दी है।

राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA), जिसमें भारतीय जनता पार्टी (BJP), जनता दल यूनाइटेड (JDU), और लोक जनशक्ति पार्टी (LJP) शामिल हैं, एकजुट और आत्मविश्वास से भरा नजर आता है। NDA को लगता है कि वो फिर से सत्ता में आएगा, लेकिन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का भविष्य अभी अनिश्चित है।

दूसरी तरफ, लालू प्रसाद यादव की राष्ट्रीय जनता दल (RJD) और उसका INDIA गठबंधन बिखरा हुआ दिखता है। इनके पास कोई साफ सियासी कहानी नहीं है, सिवाय मुस्लिम-यादव (MY) वोटों पर फोकस करने के। NDA को ध्रुवीकरण की सियासत से वैचारिक बढ़त मिल रही है। चिराग पासवान इस बार खास नजर में हैं, जो तेजस्वी यादव के खिलाफ मजबूत दावेदार दिखते हैं। BJP ने अपनी होमवर्क पूरी कर ली है, और खबर है कि उनके उम्मीदवारों की लिस्ट लगभग तैयार है। लेकिन हिंदुस्तानी चुनाव हमेशा अनिश्चित होते हैं, और ये साफ नहीं है कि सत्ता विरोधी लहर (anti-incumbency) का कितना असर होगा।

बिहार के मामलों के जानकार प्रोफेसर पारस नाथ चौधरी और पटना के एक न्यूज़मैन, जो बिहार की सियासत पर नजर रखते हैं, का कहना है कि NDA की स्थिति मजबूत है। न्यूज़मैन के मुताबिक, लालू यादव का असर अब खत्म हो चुका है। उनकी सेहत और वक्त के साथ उनकी बातें अब लोगों को प्रेरित नहीं करतीं। उनके बेटे तेजस्वी यादव को कुछ न्यूज़ चैनल्स भले ही पॉपुलर बताएं, लेकिन ये दावा बेबुनियाद है। तेजस्वी सिर्फ MY वोटों तक सीमित हैं। हैरानी की बात है कि यादव समुदाय का एक बड़ा हिस्सा NDA की तरफ झुक रहा है। अगर RJD दूसरे सामाजिक समूहों को साथ नहीं ले पाया, तो उसकी हार तय है।

तेजस्वी की बातों में संस्कार की कमी और गैरजरूरी तीखी बयानबाजी उनकी कमजोरी है। वो अभी तक लालू की छाया से बाहर नहीं निकल पाए हैं, और मुख्यमंत्री जैसे बड़े पद के लिए उनमें वो गंभीरता नहीं दिखती। इसके अलावा, INDIA गठबंधन के बाकी साथी, जैसे कांग्रेस, बिहार में कोई खास ताकत नहीं रखते।

वहीं, NDA में BJP, JDU, और LJP का गठजोड़ इतना मजबूत है कि उसे हराना मुश्किल लगता है। ऑपरेशन सिंदूर के बाद मोदी की लोकप्रियता और बढ़ी है, जिससे NDA की स्थिति और पक्की हो रही है। लोग ज्यादातर NDA को ही पसंद कर रहे हैं। चिराग पासवान की ताजा अपील, खासकर युवाओं और दलित वोटरों के बीच, उन्हें तेजस्वी के खिलाफ मजबूत बना रही है। उनकी करिश्माई शख्सियत और मोदी के विजन के साथ जुड़ाव NDA को और ताकत देगा।

लेकिन बिहार के चुनाव आसान नहीं हैं। सत्ता विरोधी लहर अब भी एक बड़ा सवाल है। बिहार में बेरोजगारी, बुनियादी ढांचा, और बाढ़ जैसी समस्याएं लोगों को नाराज कर सकती हैं। अगर NDA उम्मीदवारों के चयन में गलती करता है या स्थानीय मुद्दों को नजरअंदाज करता है, तो उसकी बढ़त कम हो सकती है। नीतीश कुमार का भविष्य भी एक सवाल है—क्या वो CM बने रहेंगे या उनकी जगह कोई और लेगा? हालांकि, BJP का गठबंधन ये रिस्क लेने को तैयार नहीं है।

प्रोफेसर चौधरी कहते हैं कि “मोदी का गठबंधन जीत की ओर बढ़ रहा है।” पटना का मीडिया भी यही मानता है कि लालू का जादू खत्म हो चुका है, और तेजस्वी के पास NDA को टक्कर देने की ताकत नहीं है। NDA की एकजुटता, ध्रुवीकरण की सियासत, और मोदी की लोकप्रियता उसे मजबूती दे रही है। अगर RJD कोई नई रणनीति या बड़ा सामाजिक गठजोड़ नहीं बना पाया, तो उसका रास्ता मुश्किल है। फिलहाल, बिहार की सियासी हवा NDA के पक्ष में जोरों से बह रही है।

अहमदाबाद में हुए विमान हादसे पर शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास की ओर से संवेदना

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अहमदाबाद: गुजरात की राजधानी अहमदाबाद में आज घटित हुए विमान हादसे की दुखद और पीड़ादायक घटना ने पूरे देश को शोक-संतप्त कर दिया है। इस गंभीर त्रासदी में कई निर्दोष नागरिकों के असमय निधन और कई अन्य के घायल होने की खबर अत्यंत व्यथित करने वाली है। शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास इस भीषण दुर्घटना पर गहरा शोक व्यक्त करता है और दिवंगतों को श्रद्धांजलि अर्पित करता है।

न्यास उनके परिजनों के प्रति गहन संवेदना प्रकट करता है जिन्होंने इस दुर्घटना में अपने प्रियजनों को खोया है। यह क्षति केवल उनके परिवारों की नहीं, अपितु सम्पूर्ण राष्ट्र की है। हम इस कठिन घड़ी में पीड़ित परिवारों के साथ हैं और प्रार्थना करते हैं कि ईश्वर उन्हें यह दुःख सहने की शक्ति दे। साथ ही, न्यास यह भी प्रार्थना करता है कि सभी घायलजन शीघ्र स्वस्थ हों तथा प्रशासन द्वारा उन्हें यथासंभव चिकित्सा व सहायता प्रदान की जाए।

– शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास
(राष्ट्रीय प्रचार प्रमुख – अथर्व शर्मा)

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