बांग्लादेश में प्रेस फ्रीडम पर संकट: नाज़नीन मुन्नी को हटाने की धमकी, मीडिया हाउसों पर हमले

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ढाका। बांग्लादेश में पत्रकारिता के गले घोंटे जाने का एक और मामला सामने आया है। ग्लोबल टीवी बांग्लादेश की हेड ऑफ न्यूज़ और प्रमुख एंकर नाज़नीन मुन्नी को कुछ युवकों ने हटाने की धमकी दी है। 21 दिसंबर को ढाका के तेजगांव स्थित चैनल ऑफिस पहुंचे इन युवकों ने आरोप लगाया कि मुन्नी पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना की समर्थक हैं और आवामी लीग से जुड़ी हुई हैं। उन्होंने चैनल के मैनेजिंग डायरेक्टर से मुन्नी को तुरंत हटाने की मांग की, वरना ऑफिस को प्रथम आलो और डेली स्टार की तरह जला देने की धमकी दी।

युवकों ने पहले शरीफ ओसमान हादी की मौत की कवरेज पर सवाल उठाए, जिसे अपर्याप्त बताया। हादी, जो 2024 के छात्र आंदोलन के प्रमुख नेता थे और अंतरिम सरकार के आलोचक, की सिंगापुर में इलाज के दौरान मौत हो गई थी। उनकी मौत के बाद देशभर में हिंसा भड़की, जिसमें प्रथम आलो और डेली स्टार के ऑफिसों पर हमला कर आग लगा दी गई। कई पत्रकार घंटों तक इमारतों में फंसकर जान जोखिम में डालकर बचाए गए।

नाज़नीन मुन्नी ने फेसबुक पोस्ट में इस धमकी की पुष्टि की और कहा कि यह मीडिया पर लगातार हमलों का हिस्सा है। उन्होंने किसी राजनीतिक दल से जुड़े होने से इनकार किया। चैनल प्रबंधन ने सुरक्षा कारणों से उन्हें कुछ दिनों तक ऑफिस न आने की सलाह दी है। मुन्नी ने इंडिया टुडे को बताया कि पिछले 15 दिनों में धमकियां बढ़ गई हैं।

एंटी-डिस्क्रिमिनेशन स्टूडेंट मूवमेंट ने खुद को इस घटना से अलग कर लिया है। उनका कहना है कि एक सदस्य ने बिना निर्देश के मेमोरैंडम दिया था, जिसमें आग लगाने का जिक्र नहीं था।

मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार के कार्यकाल में मीडिया पर हमले बढ़े हैं। अंतरराष्ट्रीय संगठनों जैसे ह्यूमन राइट्स वॉच और सीपीजे ने इन हमलों की निंदा की है। प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में बांग्लादेश पहले से ही निचले पायदान पर है। फरवरी 2026 के चुनाव से पहले यह हिंसा लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए गंभीर खतरा पैदा कर रही है। दुनिया भर में मीडिया पर दबाव की निंदा होती है, बांग्लादेश में हो रहे ये कृत्य भी निंदनीय हैं।

मिथिला पाग का अपमान और सांस्कृतिक लाचारी

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पटना। बिहार की राजनीति में सांस्कृतिक प्रतीकों का उपयोग हमेशा से चुनावी हथियार रहा है। हाल के दिनों में मिथिला की पहचान माने जाने वाले ‘पाग’ को लेकर एक नया विवाद सामने आया है। मिथिला क्षेत्र में पाग सिर्फ एक सिर ढकने वाली वस्तु नहीं, बल्कि सम्मान, गौरव और अस्मिता का प्रतीक है। इसे विशेष अवसरों पर मेहमानों का स्वागत करने या सम्मानित करने के लिए पहनाया जाता है। हर किसी को पाग नहीं पहनाई जाती; यह परंपरा सदियों पुरानी है और मैथिल समाज की सामाजिक गरिमा से जुड़ी हुई है।

इसी पृष्ठभूमि में बिहार के पूर्व उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव का मिथिला पाग पहनना कई लोगों को खटक रहा है। तेजस्वी यादव राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव के पुत्र हैं, और कुछ मैथिल कार्यकर्ता उन्हें उस विचारधारा का प्रतिनिधि मानते हैं जिसने मैथिली संस्कृति को नुकसान पहुंचाया। लोग सवाल उठा रहे हैं कि जिस परिवार पर मैथिली भाषा और संस्कृति की उपेक्षा के आरोप हैं, उसके वारिस को पाग पहनाने का हक किसने दिया? क्या यह वोट बैंक की राजनीति है या सांस्कृतिक पहचान को मजबूत करने की कोशिश?

दरअसल, मिथिला आज भारत की सांस्कृतिक धरोहर बन चुका है। मधुबनी पेंटिंग विश्व प्रसिद्ध है, मैथिली साहित्य विद्यापति जैसे कवियों से समृद्ध है, और पुनौरा धाम जैसे प्रोजेक्ट इसे नई ऊंचाई देने वाले हैं। लेकिन स्थानीय नेता चुनावी लाभ के लिए इन प्रतीकों का उपयोग कर रहे हैं। एक तरफ एनडीए इसे विकास से जोड़ रहा है, तो दूसरी तरफ महागठबंधन इसे भावनात्मक मुद्दा बना रहा है। यह बिहार के नेताओं की नई लाचारी है- अपनी सांस्कृतिक विरासत को बचाने की लड़ाई में वे खुद ही उसे राजनीतिक औजार बना रहे हैं।

मिथिला की जनता अब जागरूक है। वह जानती है कि पाग का सम्मान सिर्फ पहनने से नहीं, बल्कि संस्कृति की रक्षा से होता है। आने वाले समय में पुनौरा धाम बिहार की नई पहचान बनेगा, लेकिन सवाल यह है कि क्या नेता इसे सच्चे मन से अपनाएंगे या सिर्फ चुनावी स्वार्थ के लिए?

चुनावी विसात पर प्रभावी होता बेदख़ली अभियान

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आचार्य श्रीहरि
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गुवाहाटी: असम दोरे के दौरान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कांग्रेस पर जोरदार हमला बोलते हुए कहा कि कांग्रेस असम को घुसपैठियों का राज्य बनाना चाहती है और घसुपैठियों को संरक्षण देती है। असम की भाजपा सरकार घुसपैठियों को नियंत्रित करने के लिए मियां मुस्लिम बेदखली अभियान चला रही है। मियां मुस्लिम उन लोगों को कहा जाता है जो बाग्लादेशी मूल के हैं और अवैध रूप से भारत में आकर बसे हुए हैं। ऐसे इस तरह के लोगों को अन्य नाम से भी पुकारा जाता है, पहचान किया जाता है, अन्य नामों में बांग्लादेशी, रोहिंग्या शामिल है। खासकर असम में मियां मुस्लिम एक अपमानजनक पदवि है और पहचान है। मियां मुस्लिम‘ समूह पर आरोप है कि इन लोगों ने बांग्लादेश, म्यांमार और पाकिस्तान से आकर असम की डेमोग्राफी को बदला है, सरकारी जमीन को कब्जा किया है, जंगलांें का सफाया किया है, पहाडों को तोडा है, इस प्रकार से इन लोगों ने असमियां समाज के संतुलन रेखा बिगाडी है और असम के पर्यावरण को भी नुकसान पहुंचाया है, दफन किया है। आमतौर पर यह धारणा असम के अंदर मजबूत है और इसी के ईद-गिर्द असम की राजनीति भी धूमती-फिरती है, सतारूढ दल की भी सोच यही है, सत्ता रूढ दल जहां मियां मुस्लिम बेदखली अभियान से लाभार्थी होने की रणनीतियां बिछाता है वहीं विपक्ष कांग्रेस और अन्य मुस्लिम राजनीतिक पार्टियां मियां मुस्लिम बेदखली अभियान को मुसलमानों को अपमानित करने और मुसलमानों को प्रताड़ित करने के साथ ही साथ उन्हें घेर-बार से वंचित करने के तौर पर देखता है, प्रचालित करता है और अपना जनाधार विकसित करता है। इसलिए यह कहना कि फायदे की राजनीति, तनाव की राजनीति, नफरत की राजनीति सिर्फ सत्ताधारी पार्टी भाजपा ही करती है, पूरी तरह से सच नहीं है। मियां मुस्लिम, रोहिंग्याओं और बांग्लादेशियों के संरक्षण देकर बसाने और रोजगार उपलब्ध करा कर अपना जनाधार संरक्षित करने का काम कांग्रेस और मुस्लिम पार्टियां भी करती हैं। लेकिन सच को दबाया नहीं जा सकता है, छुपाया नहीं जा सकता है। मियां मुस्लिम,रोहिंग्या और बांग्लादेशियों की अवैध घुसपैठ एक सच है जो चाकचैबंद है और प्रमाणित है। मियां मुस्लिम, रोहिंग्याओं और बांग्लादेशियों की अवैध घुसपैइ के कारण न सिर्फ असम की डेमोग्राफी बदली हैं, खतरनाक हुई है, हिंसक हुई है बल्कि देश के अन्य भागों में इसकी एक झलक देखने को मिलती है। मियां मुस्लिम, रोहिंग्याओं और बांग्लादेशियों की अवैध घुसपैठ को राष्ट्रीय सुरक्षा का प्रतीक और सनातन सहंार का विषय और कारण मान लिया गया है।

ऐलानिया तौर पर असम में मियां मुस्लिम बेदखली अभियान जोरों पर है। इसको लेकर असम की भाजपा सरकार भी गंभीर है और सक्रिय है तथा आक्रामक है। असम भाजपा सरकार कोई कोताही बरतने के लिए तैयार नहीं है। अभियान को जोरशोर से चलाया जा रहा है। अभी तक हजारो घरों को दफन कर दिया गया, उस पर बुलडोजर चला दिया गया, खेती की जमीन पर अतिक्रमण हटा दिया गया। बुलडोजर किस आधार पर चलता है? बुलडोजर चलने का आधार यह है कि सरकारी जमीन है जिस पर अवैध कब्जा है। सरकारी जमीन पर कभी जंगल था, सरकारी जमीन पर कभी पहाड था, कभी पेड-पौधे थे जिसे काटकर घर बनाये गये और खेती के लिए जमीन बनायी गयी। यह बात सही है कि निजी संपत्ति पर इस तरह के कब्जे नहीं होते हैं। इस तरह के अवैध कब्जे सरकारी जमीन पर होते हैं, जंगल की जमीन और पहाड की जमीन के साथ ही साथ नदियों के किनारे की जमीन ही निशाने पर होती है। अवैध घूसपैठियों के पास धन-दौलत तो होता नहीं, उनके पास सिर्फ और सिर्फ लक्ष्य होता है। लक्ष्य भी हिंसक और खतरनाक होता है और नफरत भरा होता है। लक्ष्य इनका इस्लाम के प्रचार-प्रसार और विस्तार होता है, सनातन का संहार और भारत को मुस्लिम राष्ट्र के रूप में तब्दील करने की इनकी मानसिकता भी होती है। अगर इनकी ऐसी मानसिकता और लक्ष्य नहीं होते तो फिर इनकी घुसपैठ के खिलाफ इतना आक्रोश भी नहीं होते और बेदखली अभियान भी मानवीय अवधारणा से प्रेरित होते। अवैध घुसपैठिये अपनी गुंडागर्दी और हिंसा पर कुछ ज्यादा ही निर्भर रहते हैं और स्थानीय मुस्लिम विसात भी उन्हें हिंसक और खतरनाक बनाने की भूमिका निभाते हैं और डरने की बात को खारिज करने की सीख देते हैं। इसलिए मूल निवासियों और घुसपैठियों के बीच में नफरत की एक दीवार खींच जाती है, एक हिंसक लक्ष्मण रेखा भी खींच होती है।

असम में मियां मुस्लिम बेदखली अभियान के खिलाफ आक्रोश भी कम नहीं है, राजनीतिक तनाव भी कम नहीं है और आमने-सामने की स्थिति भी उत्पन्न हुई है। मानवाधिकार कार्यकर्ता और प्रसिद्ध वकील एआर भुइयां कहते हैं कि कब और कौन कहां से आया है? इसका निर्धारण करना मुश्किल है, रंग रूप और कपडों का आधार बना कर किसी को मियां मुस्लिम घोषित कर देना अन्याय है, जनसंख्या नियंत्रण के नाम पर और डेमोग्राफी चेंज का हौवा खडा कर हम एक बडे समूह को बेदखल नहीं कर सकते हैं, उन्हें हाशिये पर खडा नहीं कर सकते हैं। हम कानून के राज में गतिशील होते हैं जबकि भावनाओं के आधार पर पूरा बेदखली अभियान जारी है, भावनाओं का राज बनाना लोकतंत्र की हत्या है। भुइयां की यह बात तो सही है कि मानवाधिकारी अवधारणा की जरूरत होनी चाहिए। पर कानून की बात को भी हमें भूलना चाहिए या नहीं? इस पर व्यापक चर्चा होनी चाहिए। अब यहां प्रश्न यह उठता है कि बेदखली अभियान को लेकर असम के नियम-कानून क्या कहते हैं?े वन कानून 1891 और 1995 बेदखली अभियान को मजबूत बनाते हैं। ये कानून सरकार को वन विभाग और सरकारी जमीन को वापस लेने के अधिकार सरकार को देते हैं। बेदखली के लिए सुनावाई और नोटिस की अनिवार्यता होती है। इस साल के अगस्त महीने में गुवाहाटी हाई कोर्ट का फैसला भी उल्लेखनीय है। हाईकोर्ट ने एक याचिका पर फैसला देकर बेदखली अभियान को सही ठहराया था और सात्त दिनों के अंदर कब्जाधारियों को जमीन मुक्त करने का आदेश दिया था। लेकिन आदिवासी समूह को बेदखली अभियान से मुक्त रखा गया है। आखिर क्यों? इसलिए कि वन अधिकार कानून 2006 के अनुसार उन्हें सुरक्षा मिली हुई है। मूल आदिवासियों को जंगल पर परमपरागत अधिकार हासिल हैं।

अगले वर्ष असम में चुनाव है। चुनाव के दृष्टिकोण से ही बेदखली अभियान प्रभावी है। पर भाजपा का आरोप और भी है। भाजपा का आरोप है कि मियां मुस्लिम ग्रेटर राज के लिए घुसपैठ जारी है। हिन्दुओं को बलपूर्वक भयभीत किया जा रहा है और उन्हें अपने मूल स्थान से भागने के लिए विवश किया जा रहा है। सही तो यही है कि असम के कई जिले देखते-देखते मुस्लिम बहुल हो गये, कई विघान सभा क्षेत्र मुस्लिम बहुल हो गये, जहां पर मुस्लिम उम्मीदवार की ही जीत अनिवार्य हो गयी है। असम में मुसलमानों की एक नयी पार्टी भी बन गयी है जो न केवल प्रभावी है बल्कि अपना दखल भी विशेष रखती है। असम यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट नाम की मुस्लिम पार्टी पर विदेशी घुसपैठियों को संरक्षण देने के आरोप लगते रहे हैं। असम यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फं्रट का मुखिया मौलाना बदरूउदीन हैं जो मुसलमानों के नेता के तौर पर स्थापित हैं और अपने मुस्लिम भडकाउ बयानों के लिए कुख्यात है। असम यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फंट का कांग्रेस के साथ समझौता है। कांग्रेस स्वयं के बल पर असम में सरकार नहीं बना सकती है, कांग्रेस के लिए मुस्लिम समर्थन की अनिवार्यता होगी। इसी कारण कांग्रेस मौलाना बदरूउदीन के शर्तो के सामने झुकती रही है। बदखली अभियान से भाजपा अपने हिन्दुत्व वोटों को संतुष्ट रखना चाहती है और असम में लगातार तीसरी बार सरकार बनाना चाहती है। असम में भाजपा सरकार का मियां मुस्लिम बेदखली अभियान का अर्थ और लक्ष्य यही है।

आईजीएनसीए में ‘भारतीय जनजातीय समाज’ पुस्तक का हुआ लोकार्पण

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नई दिल्ली: इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र (आईजीएनसीए) के जनपद सम्पदा विभाग ने ‘ज्ञानपथ शृंखला’ के अंतर्गत एक महत्त्वपूर्ण पुस्तक ‘भारतीय जनजातीय समाज (शिक्षित एवं सशक्त भूमिका में आत्मनिर्भरता की ओर)’ के लोकार्पण एवं चर्चा सत्र का आयोजन किया। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि केन्द्रीय संसदीय कार्य एवं अल्पसंख्यक कार्य मंत्री श्री किरन रिजिजू थे। वहीं विशिष्ट अतिथि थे राष्ट्रीय अनुसूचित जनजातीय आयोग के अध्यक्ष श्री अंतर सिंह आर्य। उन्होंने जनजातीय समाज से जुड़े समकालीन विमर्श, नीतिगत प्रयासों तथा सांस्कृतिक संरक्षण की आवश्यकता पर प्रकाश डाला। विशेष अतिथि के रूप में राष्ट्रीय अनुसूचित जनजातीय आयोग की सदस्य डॉ. आशा लकड़ा उपस्थित रहीं, जिन्होंने पुस्तक की विषयवस्तु को सामाजिक न्याय और समावेशी विकास के व्यापक परिप्रेक्ष्य में रेखांकित किया। पुस्तक की लेखिका हैं समाजशास्त्री एवं शिक्षिका डॉ. स्वीटी तिवारी। कार्यक्रम का स्वागत वक्तव्य आईजीएनसीए के जनपद सम्पदा विभाग के अध्यक्ष प्रो. के. अनिल कुमार ने दिया। उन्होंने ‘ज्ञानपथ शृंखला’ की अवधारणा पर प्रकाश डालते हुए इसे समकालीन बौद्धिक संवाद का एक सशक्त मंच बताया। इस अवसर वनवासी कल्याण आश्रम के श्री सुरेश कुलकर्णी की भी गरिमामय उपस्थिति रही।
मुख्य अतिथि किरन रिजिजू ने कहा कि जनजातीय समुदायों को जो सम्मान मिलना चाहिए था, आज़ादी के 60-70 सालों तक नहीं मिला। बस उनका प्रतिनिधित्व सांकेतिक ही रहा। जब मैं दिल्ली यूनिवर्सिटी में पढ़ता था तो मुझे लगा कि आदिवासी क्षेत्र में काम करने वाले और आदिवासियों को समझने वाले कुछ लोग और कुछ संगठन ही हैं। जैसे वनवासी कल्याण आश्रम और कुछ दूसरे संगठन हैं। वे सेवा भाव के साथ, उनके बीच में रहकर काम करते हैं। उन्होंने कहा कि अगर आप आदिवासियों के बीच में जाकर उनकी सेवा का नाम पर उनका धर्मांतरण करेंगे, तो उनका आइडेंटिटी बदल जाएगी। उनके सशक्तिकरण के नाम पर आप उनके कल्चर को डाइल्यूट कर देंगे। मूल रूप से, आदिवासी की पहचान अगर आप खत्म कर देंगे तो फिर सेवा का कोई मतलब नहीं होता है। आदिवासियों के लिए उनकी पहचान, उनका सम्मान दोनों बहुत महत्वपूर्ण है।

उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जनजातीय समुदायों के सशक्तिकरण के लिए महत्त्वपूर्ण काम किया है। उन्होंने अपने मंत्रिमंडल में जनजातीय समुदाय के तीन लोगों को मंत्री बनाया। पहली बार किसी सरकार में जनजातीय समुदाय से तीन लोगों को मंत्री बनाया गया है। उन्होंने अपने मंत्रियों से कहा कि जनजातीय समुदाय के लोगों के स्वतंत्रता संग्राम में योगदान को रेखांकित कीजिए। प्रधानमंत्री ने भगवान बिरसा मुंडा के जन्मदिन 15 नवंबर को ‘जनजातीय गौरव दिवस’ के रूप में मनाने की शुरुआत की। यह बिरसा मुंडा का जन्म दिवस ही नहीं, बल्कि पूरे आदिवासियों को सम्मान देने का कार्यक्रम है।

उन्होंने कहा, भारत में जनजातीय समुदाय का बहुत बड़ा योगदान है। लेकिन हम जनजातीय लोग खुद नहीं जानते कि हमारा योगदान क्या है। अपनी क्षमता को नहीं पहचानते कि हम क्या कर सकते हैं! ऐसे समय में एकेडमिक सेक्टर में इस तरह की पुस्तक आना बहुत महत्त्वपूर्ण है। उन्होंने लेखिका की प्रशंसा करते हुए कहा, मैं भी अपनी तरफ से किताब को आगे बढ़ाने, इसके प्रचार-प्रसार की कोशिश करूंगा।

लेखिका स्वीटी तिवारी ने पुस्तक के बारे में बताते हुए जनजातीय समुदायों की ऐतिहासिक, सामाजिक और सांस्कृतिक यात्रा पर विचार प्रस्तुत किए। उन्होंने कहा कि घोर अंधकार में भी जनजातीय समाज की लौ क्षीण नहीं हुई। जनजातीय समाज के प्रति उपेक्षा के भाव को रेखांकित करते हुए उन्होंने कहा कि हम ‘गंगा-जमुनी तहज़ीब’ की बात करते हैं, लेकिन ‘गंगा-दामोदर तहज़ीब’ बात नहीं करते। ग़ौरतलब है कि दामोदर जनजातीय बहुलता वाले राज्य झारखंड की एक प्रमुख नदी है। उन्होंने यह भी कहा कि शिक्षा केवल साक्षरता नहीं है, बल्कि अधिकार बोध है।

यह कार्यक्रम विद्वानों, शोधार्थियों, विद्यार्थियों तथा संस्कृति-अध्ययन से जुड़े प्रबुद्ध श्रोताओं की उल्लेखनीय उपस्थिति के बीच सम्पन्न हुआ। यह आयोजन भारतीय जनजातीय समाज की बहुआयामी समझ को गहराई प्रदान करने वाला तथा अकादमिक दृष्टि से अत्यंत सार्थक सिद्ध हुआ।

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