100 Years of Sangh Journey – New Horizons मुंबई व्याख्यानमाला – 8 फरवरी, 2026 (Day-2, 1stSession)

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मुंबई : परिस्थितियां आती-जाती रहती हैं। उस परिस्थिति में कैसे कार्य करना, संघ स्वयंसेवक इसका ही विचार करते हैं।

भ्रम की सत्ता तब तक चलती है, जब तक सत्य सामने नहीं आता। संघ के बारे में भी बहुत सारे भ्रम फैलाए जाते हैं। हम इसीलिए संघ का विचार सब तक पहुंचाने में लगे हैं।

प्रसिद्धि के लिए नहीं, प्रचार के लिए नहीं, अपना विचार आप तक पहुंचाने के लिए ही इस तरह के कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।

अँग्रेजी से हमारा बैर नहीं है। जहां अँग्रेजी के बिना काम नहीं चलता, वहां हम अँग्रेजी भाषा का उपयोग करते हैं। पर हमारा प्रयास रहता है कि अपनी भारतीय भाषा या फिर हिंदी भाषा का ही प्रयोग करें। हम अंग्रेजी को अपनी प्रमुख भाषा के रूप में स्वीकार नहीं करेंगे।

मैंने अपनी इच्छा जताई कि 75 वर्ष की आयु के बाद पद से मुक्त होकर कार्य करना चाहिए, लेकिन यह केवल मैं तय नहीं कर सकता। संघ के स्वयंसेवकों ने कहा कि आप ठीक ठाक हैं, इसलिए कार्य करते रहिए।

संघ का सरसंघचालक कोई ब्राह्मण नहीं बन सकता, कोई क्षत्रिय नहीं बन सकता, कोई अन्य जाति का नहीं बन सकता।जो कोई भी बनेगा वह हिंदू ही होगा।

एससी/एसटी होना डिसक्वालिफिकेशन नहीं है, ब्राह्मण होना कोई क्वालिफिकेशन नहीं है। भविष्य में कोई एससी/एसटी भी संघ प्रमुख हो सकता है। हमारी सोच होती है कि सबसे योग्य कौन है।

इतने अन्याय होने के बाद भी प्रतिबंध हटने के बाद पूजनीय श्री गुरुजी ने एक बात कही थी—जो हुआ, सो हुआ, अपना समाज है। आपातकाल के बाद बालासाहब ने कहा—“फॉरगेट एंड फॉरगिव”।

तथागत बुद्ध को कोई कोस रहा था, पर तथागत शांत रहे। कोसने वाले ने चकित होकर पूछा, “ऐसा कैसे?” तथागत का उत्तर था, “आपने किसी को कुछ देना चाहा, पर उसने नहीं लिया, तो क्या होता है? वह वस्तु आपके पास ही पड़ी रहती है।” संघ स्वयंसेवक भी प्रतिकूल व्यक्ति, स्थिति, संस्थाओं से ऐसा ही व्यवहार करता है।

समाज में भाषा के आधार पर भेदभाव नहीं है।

भ्रष्टाचार के विरुद्ध आंदोलन चलते हैं। संघ के स्वयंसेवकों को बताया गया है कि इसमें आपको पूरा समर्थन देना है।

विवाह एक संस्कार है। जिम्मेदारी के साथ विवाह निभाना चाहिए।

जनसंख्या संतुलन के लिए 2.1 बच्चे होना आवश्यक है। .1 कुछ होता नहीं। इसलिए तीन बच्चे होना एक आदर्श स्थिति है। ऐसा चिकित्सक, समाज विज्ञानी आदि सभी मानते हैं।जनसंख्या असंतुलन के दो प्रमुख कारण हैं—मतांतरण और कन्वर्शन। ‘बर्थ रेट’ तो तीसरा विषय है।

स्वेच्छा से कोई मतांतरण करे तो कोई हर्ज नहीं, पर जोर जबरदस्ती से, लालच से अपना झुंड बढ़ाने के लिए जो मतांतरण कराया जाता है, वह बंद होना चाहिए। घर वापसी उसका उपाय है।

जनसंख्या असंतुलन एक अन्य कारण है घुसपैठ। ऐसे लोगों को बाहर निकालना चाहिए। पहले यह होता नहीं था। अब कुछ मात्रा में होने लगा है।

घुसपैठ के मामले में सरकार को बहुत कुछ करना है। सेंसेस होगा, SIR होगा, उसमें बहुत लोग सामने आते हैं। हम डिटेक्शन का काम कर सकते हैं। जो आते हैं, उनकी भाषा से सामने आता है। योग्य अधिकारियों, पुलिस को बताएं कि आप जांच-पड़ताल कीजिए। हम किसी विदेशी को रोजगार नहीं देंगे।

हमारा जोर Mass Production की बजाय Production by Mass पर होना चाहिए। अपने यहाँ हाथ ज़्यादा हैं, उन्हें काम चाहिए। खाली दिमाग शैतान का घर होता है। इसलिए नक्सलवाद होता है। हिंसा बढ़ती है और महिलाओं के प्रति अत्याचार बढ़ता है। अर्थव्यवस्था के विकेंद्रीकरण की आवश्यकता है।

जैविक आधार पर खेती करने से लागत कम होती है। खुद का बीज, खुद की खाद यानि पूरी खेती के मालिक खुद। ऐसे बहुत से उदाहरण देशभर में हैं। हमें खेती की लागत कम करनी चाहिए।

खेती की उपज के लिए भंडारण और उसका प्रसंस्करण होने से किसान को उसकी उपज के बेहतर दाम मिलेंगे। यह काम सरकार को करना चाहिए। जब खेती में खर्चा कम होता है तो किसान को कर्ज नहीं लेना पड़ता है।

संघ स्वयंसेवकों के प्रयासों से पूरे भारतवर्ष में 5000 गाँवों में विकास की बात शुरू हुई है। लगभग 350 गाँव दिखाने लायक हो गए हैं। यहाँ लोगों ने इकट्ठा होकर भेदभावों को मिटाया और अपने अपने बलबूते गाँवों को ऊपर उठाया है। आर्थिक दृष्टि से, कृषि की दृष्टि से, संस्कारों की दृष्टि से, व्यसन मुक्ति की दृष्टि से, समरसता की दृष्टि से ऐसे अनेक पहलू हैं।

पारंपरिक व्यवसाय और महिला सशक्तिकरण के लिए ‘एक जिला एक उत्पाद’ जैसे अभियान कारगर सिद्ध हो रहे हैं।

जीडीपी देश की आर्थिक स्थिति नापने का कारगर तरीका नहीं है। वह इंपरफेक्ट है।

समाज की सजगता से विघातक गतिविधियों पर नियंत्रण में सहायता मिलती है।

सरकार को जो लोग सरकार में हैं वे चलाते हैं। संघ बैकसीट ड्राइविंग नहीं करता।

2047 में अखंड भारत की कल्पना करो। अब हम बहुत आगे बढ़ गए हैं। भारत को तोड़ने वाले टूट जाएंगे।

हिंद की चादर बने नवम गुरु जी। कश्मीर के पंडितों की सुरक्षा के लिए; यही एकता है। सिख समाज से हमारा खून का रिश्ता है। हमारे बीच रोटी-बेटी का रिश्ता है। केशधारी और सहजधारियों के बीच वैवाहिक संबंध होते ही हैं। श्री गुरू ग्रंथ साहिब में केवल सिख संतों की नहीं, पूरे देश के संतों की वाणी है।

वंसत महोत्सव में हमारे तीसरे सरसंघचालक बालासाहब देवरस के भाषण पर आधारित पुस्तक सामाजिक समरसता और हिन्दुत्व में हमारा विचार पूरी तरह से स्पष्ट है। जातिगत भेदभाव के बारे में संघ की भूमिका स्पष्ट और ठोस है।

जिन लोगों ने 2 हजार साल तक विषमता झेली, उन भाइयों के लिए अगर 200 साल तक 100 Years of Sangh Journey –New Horizons

100 Years of Sangh Journey – New Horizons

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मुंबई व्याख्यानमाला – 8 फरवरी, 2026 (Day-2, 2ndSession)

डॉ. मोहन भागवत जी, सरसंघचालक

मुंबई : अपनी आय का 1/6 खुद के लिए रखना, 1/6 अपने परिवार के लिए, 1/6 भगवान के लिए रखना, 1/6 आड़े वक्त के लिए बचत करके रखना, 1/6 धर्म-समाज के लिए रखना और 1/6 राजा [सरकार] को देना। अपनी आय में ये छह हिस्से रहते हैं।

बुद्ध ने अपने धर्म को भी सनातन धर्म ही कहा है।

हिंदू अपने आप में कोई धर्म नहीं है। सनातन धर्म की दो शाखाएँ हैं—वैदिक धर्म और बौद्ध धर्म।

इस्लाम और ईसाईयत के मानने वालों को समझाने से पहले दोस्ती कीजिए। आज का इस्लाम और ईसाइयत पैगंबर और क्राइस्ट के नहीं हैं। अब इनमें राजनीति का वर्चस्व है।

आज का इस्लाम और ईसाइयत उनकी आध्यात्मिक अवधारणा को छोड़कर राजनीतिक वर्चस्व के रास्ते पर चल निकले हैं। वे सच्चे इस्लाम और सच्ची ईसाइयत की ओर लौटें, इसकी आवश्यकता है।

हिंदू को सबको अपनेपन और शांति की बात करनी है। हिंदू के बारे में बस इतना हो जाए कि इनका कोई बाल-बाँका नहीं कर सकता।

आज के दौर में कोई एकाकी नहीं रह सकता. अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर डील करनी ही पड़ती है। उसमें कुछ लेना पड़ता है तो कुछ छोड़ना भी पड़ता है। अपने हित में क्या है, इसका ध्यान रखना ही चाहिए। हमें विश्वास है कि वर्तमान समय में उसका ध्यान रखा ही गया होगा। पिछले 10 वर्षों का जो एडमिनिस्ट्रेशन है, वह अडने वाला और तन कर खड़ा रहने वाला है।

ज्ञान तो सारी दुनिया से आना चाहिए, परंतु जो लेना है, परीक्षण करके लेना चाहिए। बिना अपने देश की आकांक्षा, परंपरा और किसानों के हित को जाने, नया है इसलिए बराबर स्वीकार कर लेना ठीक नहीं। इसलिए हमारा संवेदनशील होना ठीक है।

सावरकर जी को ‘भारतरत्न’ सम्मान मिला तो उस सम्मान का गौरव बढ़ेगा।

भारत को अपनी मातृभूमि मानने वाला एक भी हिंदू इस भारत भूमि पर है तब तक यह हिन्दूराष्ट्र है – ऐसा डॉ. हेडगेवार कहा करते थे।

भाजपा के सत्ता में आने से हमारे अच्छे दिन शुरू नहीं हुए, ऐसा उल्टा है। हम एक विचार और नीति लेकर चलते हैं। जैसे-जैसे हमारी शक्ति बढ़ती है, हम उसका प्रचार और प्रतिपादन करते हैं, लोग उसे मानने लगते हैं। जो चुनावी राजनीति में इस नीति का पुरस्कार करते हैं, उन्हें उसका लाभ मिलता है। हम राम मंदिर के पक्ष में थे, तो जो लोग उसके पक्ष में आए, उन्हें उसका लाभ मिला।

आपातकाल, गुरूजी जन्मशती, राम मंदिर आंदोलन आदि के माध्यम से आप सभी के सहयोग और स्वयंसेवकों के पुरूषार्थ से ही हमारे अच्छे दिन आए हैं। उसका लाभ हमारा समर्थन करने वालों को मिला है।

कम्युनिस्ट पार्टी का 100 वर्षों में विस्तार नहीं हुआ, यह प्रश्न उनसे पूछना चाहिए। अगर वे हमसे आकर पूछते हैं, तो हम उनका मार्गदर्शन करने को तैयार हैं।

सिद्धांतहीन राजनीति चल जाती है, इसलिए चलाते हैं। जब पता चलेगा कि नहीं चलेगी तो वे करना बंद कर देंगे।

राजनीति पर संघ का नहीं, मतदाताओं का दबाव होता है।

समान नागरिक संहिता का विचार अच्छा है।

विविधता में भी हमारा कोई विरोध नहीं है। पर यदि समानता से देश की एकता मजबूत होती है तो हमारा उसे समर्थन है। उसके लिए संघर्ष की स्थिति पैदा न हो। उत्तराखंड राज्य ने समान नागरिक संहिता के संबंध में पहले प्रस्ताव किया, फिर लोगों के सुझाव मांगे, तीन लाख सुझाव आए। उसके बाद उन्होंने कानून बनाया। कानून बन जाना पर्याप्त नहीं है। कानून का पालन होना चाहिए। इस सबके बावजूद हम विविधता में एकता के पक्षधर हैं।

हम एक समाज हैं. अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक मानकर विचार नहीं करना चाहिए। अलग-अलग होने पर हम सब अल्पसंख्यक ही हैं।

फास्डफूड खाने के लिए कोई कानून नहीं लाया गया, तो उसे बैन करने के लिए कानून क्यों लाना चाहिए? फास्डफूड लालच के चलते आया। खुद पर संयम रखकर उससे दूर रहना ही उससे बचने का उपाय है।

हर काम संघ को ही करना चाहिए, ऐसा नहीं है। चरित्रवान समाज के निर्माण का हमारा काम हम पूरा समय देकर भी पूरा नहीं कर पा रहे हैं।

पेरिस समझौते के वादों को सबसे पहले पूरा करने में भारत सर्वप्रथम है।

पर्यावरण के बारे में केवल संघ को विचार नहीं करना है। सारे समाज को विचार करना चाहिए। हालांकि पर्यावरण संरक्षण हमारी गतिविधियों में से एक है।

संघ चिरतरुण संगठन है, उसमें सभी पीढ़ियाँ काम करती हैं, और नई पीढ़ी को जल्दी आगे लाने का काम होता है। इसलिए पुरानी पीढ़ी जगह बना देती है। यह काम पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलता है।

संघ की औसत आयु आज की तारीख में 28 साल है। हम चाहते हैं कि यह 25 साल के भीतर आ जाए।

रेव पार्टी के स्थान पर सत्संग पार्टी का चलन शुरू हुआ, यह हमने नहीं किया, सहजता से यह परिवर्तन हुआ है।

संस्कृत बोलनी चाहिए. भाषा वही जीवित रहती है जो चलन में रहती है।

संघ केवल शाखा चलाने का कार्य करता है। संघ कोई गुरूकुल नहीं चलाता, चलाएगा भी नहीं। संघ के स्वयंसेवक गुरुकुल चलाते हैं, समाज के लोग गुरूकुल चलाते हैं तो संघ उनकी सहायता करता है। भारतीय शिक्षण मंडल के माध्यम से देशभर में गुरूकुल आदि का संचालन किया जाता है।

मातृभाषा में उत्तम शिक्षा देने का कार्य विद्या भारती के माध्यम से किया जा रहा है।

सरकार के माध्यम से भी शिक्षा क्षेत्र में परिवर्तन के प्रयास किए जा रहे हैं। वैचारिक और राजनीतिक विरोध के चलते राज्य स्तर पर उसमें अवरोध पैदा नहीं किये जाने चाहिए।

कला के क्षेत्र में संस्कार भारती और खेल के क्षेत्र में क्रीड़ा भारती के माध्यम से बहुत सारे कार्यक्रम चल रहे हैं।

ध्येय के लिए आत्मीयतापूर्ण वातावरण से स्व अनुशासन ही संघ के कार्य का आधार है।

संघ का कार्य पहुंचाने के लिए संघ के स्वयंसेवक को ही वहां पहुंचना होता है।

संघ को समझना है तो परसेप्शन या प्रोपेगेंडा से नहीं, खुद के अनुभव के आधार पर समझिए।

साम्यवादी लेखिका रजनी पामदत्त ने अपनी पुस्तक में ब्रिटिशों को सुनाया है कि भारत में आपकी वजह से नहीं, बल्कि भारत की परंपरा से राष्ट्र संकल्पना स्थापित हुई है।

अपने बारे में, अपनी पहचान के बारे में, अपने देश के बारे में स्पष्ट कल्पना कर सक्रिय हो जाइए, यही मेरा आप सभी से आह्वान है।

मन में 2047 में देश विभाजन का डर नहीं, अखंड भारत का संकल्प मजबूत बनाओ

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मुंबई : देश विरोधी शक्तियों के देश विभाजन के मंसूबों पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक जी ने कहा कि आप 2047 में देश विभाजन का डर पालने की बजाय, अखंड भारत के उदय की कल्पना करो। जो 500 साल में सुल्तान बादशाह यहां रहकर नहीं कर सके, 200 साल में अंग्रेज नहीं कर सके। वह स्वतंत्र भारत में क्यों व कैसे होगा, यह 1947 नहीं है। हम बहुत आगे बढ़ गए हैं, अब भारत को तोड़ने वाले टूट जाएंगे। भारत जुड़ जाएगा, और यह होगा। यह संकल्प मन में मजबूत बनाओ। तो ये जो कुछ लोग दुस्वप्न देख रहे हैं, उनके मंसूबे कभी सफल नहीं होंगे। हम सब लोग हैं, हम होने नहीं देंगे।

संघ शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में आयोजित ‘संघ यात्रा के १०० वर्ष : नए क्षितिज’ दो दिवसीय संवाद कार्यक्रम में मुंबई के ९०० से अधिक प्रतिष्ठित मान्यवरों को संबोधित किया। नेहरू सेंटर सभागार, वरळी में रविवार, ०८ फरवरी को संपन्न प्रश्नोत्तर सत्र में डॉ. मोहन भागवत जी ने उपस्थित सदस्यों द्वारा विभिन्न राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय, सामाजिक तथा सांस्कृतिक विषयों पर पूछे गए प्रश्नों के उत्तर दिए। इस अवसर पर मंच पर पश्चिम क्षेत्र संघचालक डॉ. जयंतीभाई भाडेसिया, कोंकण प्रांत संघचालक अर्जुन चांदेकर, मुंबई महानगर संघचालक सुरेश भगेरिया उपस्थित थे। पूछे गए कुल १४३ प्रश्नों को १४ श्रेणियों में वर्गीकृत किया गया। इनमें संघ नीति, हिन्दुत्व, राष्ट्रीय परिदृश्य, शिक्षा, अर्थव्यवस्था, राजनीति, विदेश नीति, राष्ट्रीय सुरक्षा, संस्कृति, कला, खेल व भाषा, जीवनशैली, पर्यावरण आदि विभिन्न विषयों से जुड़े प्रश्न शामिल रहे।

बांग्लादेश में हिन्दुओं पर हो रहे अत्याचार पर सरसंघचालक जी ने बांग्लादेश के सवा करोड़ हिन्दुओं से संगठित होने का आह्वान किया। ऐसा होने पर अत्याचार पर स्वतः ही रोक लग जाएगी।

ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य या शूद्र इनमें से कोई नहीं, बल्कि हिन्दू ही संघ का सरसंघचालक होगा। उन्होंने कहा कि संघ का सरसंघचालक बनने के लिए किसी भी जाति का होना न तो बाधा है और न ही कोई अनिवार्य योग्यता। भविष्य में अनुसूचित जाति या जनजाति के कार्यकर्ता भी सरसंघचालक बन सकते हैं।

जिन पर पीढ़ी दर पीढ़ी अन्याय या अत्याचार हुआ है, उनके सर्वांगीण उत्थान होने तक तथा उनके मन में सुरक्षा की भावना उत्पन्न होने तक संविधान सम्मत आरक्षण जारी रहना चाहिए, यह संघ की स्पष्ट भूमिका है।

संघ के स्वयंसेवकों को भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलनों तथा सभी प्रकार के प्रयासों में सहभागी होना चाहिए, यह संघ की भूमिका है। किंतु केवल कानून बनाकर भ्रष्टाचार पर नियंत्रण करना कठिन है, इसके लिए संस्कारित समाज मन का निर्माण उतना ही महत्वपूर्ण है। साथ ही कोई भी व्यवस्था मूल रूप से भ्रष्ट नहीं होती, बल्कि उस व्यवस्था में कार्य करने वाले व्यक्तियों का मन भ्रष्ट होता है और उसी कारण व्यवस्था भ्रष्ट होती है।

जबरदस्ती या लालच देकर धर्मांतरण किया जाता है तो वह निंदनीय है और उसका प्रत्युत्तर घर वापसी होगा, यह स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा कि यदि कोई व्यक्ति स्वेच्छा या स्वप्रेरणा से धर्म परिवर्तन करता है तो उसका विरोध नहीं किया जाना चाहिए। जनसंख्या का अनुपात केवल जन्मदर में कमी से नहीं बदलता, बल्कि धर्मांतरण और अवैध घुसपैठ के कारण भी बदलता है, इस ओर ध्यान दिलाते हुए अवैध घुसपैठ के संदर्भ में ‘डिटेक्ट एंड डिपोर्ट’ नीति को कठोरता से लागू करने का आह्वान किया।

हिन्दू और सिक्ख पहले से ही एक थे और आज भी उनके बीच रोटी-बेटी के संबंध हैं। उनका रक्त संबंध है। पूजा पद्धति अलग मानी जा सकती है, उनकी विशिष्टता को मान्यता दी जानी चाहिए, लेकिन वे अलग नहीं हैं। हम सभी धर्म एक ही परंपरा से आए हैं। गुरु ग्रंथ साहिब में केवल सिक्ख गुरुओं की ही नहीं, बल्कि संपूर्ण भारत के संतों की वाणी संकलित की गई है। ‘हिंद की चादर’ के रूप में पहचानी जाने वाली यह प्राचीन एकता पुनः स्थापित करनी है। समाज के नाते हम सभी एक हैं, यह ध्यान में रखना चाहिए। हिन्दू नाम से कोई अलग धर्म अस्तित्व में नहीं है। आज जिसे हिन्दू धर्म कहा जाता है, वही प्राचीन सनातन धर्म है। तथागत बुद्ध ने अपने उपदेशों के माध्यम से इसी सनातन धर्म में समयानुकूल सुधार किए। आधुनिक काल में डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर ने भी इस ओर इंगित किया।

ईसा मसीह द्वारा प्रतिपादित ईसाईयत और पैगंबर मोहम्मद द्वारा बताए गए इस्लाम का स्वरूप आज उसी रूप में दिखाई नहीं देता। इसका कारण यह है कि उनके बाद इन दोनों पंथों पर तत्कालीन राजनीति का प्रभाव बढ़ गया। परिणामस्वरूप इन पंथों की आध्यात्मिकता पीछे रह गई और राजनीतिक हित अधिक प्रभावी हो गए। इन पंथों के मूल आध्यात्मिक तत्वों को प्रोत्साहन दिया जाए तो विश्वभर के राजनीतिक संघर्ष कम हो सकते हैं।

भारत रत्न सम्मान प्राप्त न होने पर भी स्वातंत्र्यवीर सावरकर करोड़ों भारतीयों के हृदय पर राज कर रहे हैं। किंतु यदि उन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया जाता है, तो इस सम्मान की प्रतिष्ठा बढ़ेगी।

भाजपा के सत्ता में आने से संघ को कोई प्रत्यक्ष लाभ हुआ ऐसा नहीं है, बल्कि समाज में संघ की बढ़ती शक्ति और स्वीकार्यता का लाभ समान विचारधारा और भारतीय नीतियों का पालन करने वाले दलों को मिला है। संघ के स्वयंसेवकों के निरंतर परिश्रम तथा समाज द्वारा संघ को मिले स्नेह और विश्वास के कारण ही संघ का कार्य बढ़ा है। संघ से संबंधित संस्थाओं, संगठनों या दलों पर संघ दबाव नहीं डालता। यहां कार्य करने वाले स्वयंसेवकों को पर्याप्त स्वतंत्रता होती है, जिससे वे अपने क्षेत्र में आवश्यक निर्णय और प्रयोग जिम्मेदारी से कर सकते हैं। वे जो अच्छे कार्य करते हैं, उसका श्रेय उन्हीं को जाता है, लेकिन जहां कमियां रह जाती हैं, उसके प्रश्न अभिभावक के नाते हमारे पास आते हैं और उसकी नैतिक जिम्मेदारी हम लेते हैं। संघ का कार्य केवल व्यक्ति निर्माण का कार्य है। किसी विशेष क्षेत्र में कार्य करना संघ का कार्य नहीं है।

समान नागरिक संहिता पर अपनी भूमिका स्पष्ट करते हुए सरसंघचालक जी ने कहा कि समाज की मानसिकता तैयार करके तथा सभी समाज घटकों को विश्वास में लेकर इस प्रकार का कानून लागू किया जाना चाहिए। उत्तराखंड तथा अन्य कुछ राज्यों में ऐसे प्रयोग हो रहे हैं, इसलिए हम उसका स्वागत करते हैं। भारत विविधता में एकता को बनाए रखने वाला देश है, यह सिद्धांत ऐसे कानून बनाते समय प्राथमिकता से ध्यान में रखना चाहिए।

संघ के कार्यकर्ताओं की औसत आयु २८ वर्ष है और इसे २५ वर्ष से नीचे लाने का प्रयास चल रहा है। देश का युवा देशभक्त और नैतिक आचरण करने वाला है। यदि उन्हें उनकी भाषा में विषय समझाए जाएं, तो वे उन्हें स्वीकार करते हैं और उसका आचरण भी करते हैं। इसलिए तार्किक पद्धति से उन्हें अपने मूल विचारों तक पहुंचाया जाना चाहिए। उन्हें प्रयोग करने की स्वतंत्रता और अवसर देना चाहिए तथा यदि प्रयोग में कोई त्रुटि हो जाए तो उनके पीछे दृढ़ता से खड़ा रहना चाहिए। यदि वर्तमान पीढ़ी युवाओं की जिज्ञासा शांत करने की क्षमता विकसित करे, तो युवा पीढ़ी और वर्तमान पीढ़ी के समन्वय से भविष्य का सशक्त भारत निर्माण होगा। भारतीय दर्शन का प्रभाव अंतरात्मा तक पहुंचता है, जबकि पाश्चात्य प्रभाव बाहरी स्तर तक सीमित रहता है।

बांग्लादेश: नरसिंगदी में पत्रकारों पर हमला, PEC ने अंतरिम सरकार से सख्त कार्रवाई की मांग

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नवा ठाकुरिया

जिनेवा (स्विट्ज़रलैंड): बांग्लादेश के नरसिंगदी ज़िले में 26 जनवरी को रंगदारों और आतंकवादी तत्वों के एक समूह ने कम से कम 12 बांग्लादेशी पत्रकारों पर हमला कर उन्हें घायल कर दिया। ये सभी पत्रकार बांग्लादेश क्राइम रिपोर्टर्स एसोसिएशन के एक कार्यक्रम में भाग लेने के बाद बस से ढाका लौट रहे थे। सरकारी समाचार एजेंसी बांग्लादेश संवाद संस्था (Bangladesh Sangbad Sangstha—BSS) के अनुसार, घायल पत्रकारों को नरसिंगदी सदर अस्पताल में भर्ती कराया गया है।

रिपोर्ट के मुताबिक, पत्रकारों को ले जा रही बस सड़क किनारे खड़ी थी, तभी स्थानीय रंगदारों के एक समूह ने टोल के नाम पर अवैध वसूली की मांग की। पत्रकारों द्वारा विरोध किए जाने पर हमलावरों ने हथियारों से उन पर हमला कर दिया। BSS ने यह भी बताया कि हमलावरों ने पत्रकारों के साथ मौजूद उनकी पत्नियों और बच्चों को जान से मारने की धमकी दी।

इस हमले की कड़ी निंदा करते हुए वैश्विक मीडिया सुरक्षा और अधिकार संगठन प्रेस एम्बलम कैंपेन (Press Emblem Campaign-PEC) ने बांग्लादेश की अंतरिम सरकार से दोषियों को न्याय के कटघरे में लाने की मांग की है। PEC के अध्यक्ष ब्लेज़ लेम्पेन ने कहा, “यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है कि चुनाव की तैयारी कर रहा बांग्लादेश बीते कुछ हफ्तों में मीडिया पर हमलों की कई घटनाओं के कारण अंतरराष्ट्रीय सुर्खियों में है। नरसिंगदी में पत्रकारों ने जबरन वसूली की कोशिश का विरोध किया और इसके जवाब में उन्हें हिंसा का सामना करना पड़ा, जो किसी भी सूरत में स्वीकार्य नहीं है।”

PEC के दक्षिण एशिया प्रतिनिधि नव ठाकुरीया ने बताया कि बांग्लादेश पुलिस ने अब तक दो आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया है, जबकि शेष गिरोह की तलाश के लिए अभियान जारी है। 170 मिलियन से अधिक आबादी वाले मुस्लिम-बहुल देश बांग्लादेश में मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार की निगरानी में 12 फरवरी को 13वें राष्ट्रीय चुनाव कराए जाने हैं। हाल ही में, कार्यवाहक सरकार के प्रमुख और नोबेल पुरस्कार विजेता यूनुस ने देशवासियों को स्वतंत्र, निष्पक्ष और लोकतांत्रिक भावना से परिपूर्ण चुनाव कराने का आश्वासन दिया था। उल्लेखनीय है कि इसी महीने 5 जनवरी को बांग्लादेश में पत्रकार राणा प्रताप बैरागी (45) की हत्या की खबर सामने आई थी, जो संयोगवश इस वर्ष दुनिया भर में पत्रकारों के खिलाफ हिंसा का पहला दर्ज मामला बताया गया।

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