

लोकार्पण के बाद हेमंत शर्मा ने एक लंबे आलेख में यही समझाने की कोशिश की कि राय साहब पर किताब क्यों जरूरी थी। उन्होंने लिखा कि राय साहब इस दौर में बेमिसाल हैं, उनका जीवन 1965 के बाद की भारतीय राजनीति का इतिहास है और वे पत्रकारिता की ‘प्रभाष परंपरा’ के वारिस हैं। सवाल यही है कि विवाद किताब की जरूरत पर नहीं, उसके पेश किए जाने के तरीके पर है।

प्रस्तुति ऐसी रही जैसे पुस्तक का केंद्र राय साहब कम और संपादकीय स्वामित्व अधिक हो। मंच पर राजनाथ सिंह, भूपेंद्र यादव और बनवारी जैसे नाम थे। कार्यक्रम का वर्णन प्रज्ञा संस्थान ने भी किया। हेमंत शर्मा के आलेख में पाठकों को किताब की जरूरत समझाई गई, लेकिन असली प्रश्न वहीं से शुरू होता है जहाँ उनका यह उत्तर खत्म होता है।
किताब की तैयारी पहले से चल रही थी। फिर उसे इस अंदाज में क्यों पेश किया गया जैसे हेमंत शर्मा न होते तो पुस्तक छपती ही नहीं? राम बहादुर राय पर यह पहली पुस्तक भी नहीं है। कॉमरेड कृपाशंकर चौबे की पुस्तक ‘रामबहादुर राय: चिंतन के आयाम’ पहले आ चुकी है। प्रो. संजय द्विवेदी ने उसके बारे में लिखा था कि यह किताब रामबहादुर राय होने का अर्थ समझाती है। स्पष्ट है कि राय साहब पर पहले किताब लिखी जा चुकी है। यह बात राय साहब के सज्ञान में भी है।
हेमंत शर्मा टीवी9 में बड़ी जिम्मेदारी निभाते हैं। करीबी हलकों में यह बात भी कही गई कि वे चाहते थे प्रधानमंत्री या गृहमंत्री का समय इस किताब के लिए मिले। अपनी व्यस्त दिनचर्या के बीच उन्होंने स्वयं इस किताब के लिए कितना समय निकाला होगा, यह ‘अनुमान’ का विषय है। एक किताब के लिए चार संपादकों की आवश्यकता हेमंतजी को क्यों पड़ी? मतलब कि व्यवहार में वही दिल्ली वाला चलन दिखता है-मेहनत संपादक मंडल करे, मंच पर एक बड़ा नाम बैठे। कई बार इससे किसी को फर्क नहीं पड़ता। इस बार फर्क पड़ा। क्योंकि किताब के साथ राम बहादुर राय का नाम जुड़ा था। उन्होंने कैसे यह सब होने दिया?

लेखक गुंजन अग्रवाल का कहना है कि पुस्तक की मूल संकल्पना उनकी थी। जून 2025 में उन्होंने राय साहब के करीबियों से प्रारंभिक चर्चा शुरू की, लेखकों के लिए अनुरोध-पत्र का मसौदा तैयार किया, लगभग पचास लेखकों की सूची तैयार की और छह लेख संजीव जी को भेजे। उनका उपलब्ध कराया गया विजेंद्र गुप्ता का लेख संग्रह में शामिल हुआ। इसके बाद भी, उनके अनुसार, प्रधान संपादक/संपादक मंडल ने उनका अपना लेख हटा दिया। संपादन, संक्षेपण या पुनर्लेखन का विकल्प था। पूर्ण बहिष्कार का कारण नहीं बताया गया। आरोप का उत्तर, गुंजन अग्रवाल के दावे के अनुसार, संवाद से नहीं, ब्लॉक से मिला।
हेमंत शर्मा लिखते हैं कि कुछ लोगों ने कहा-“मैं जो लिखूँगा आप छाप नहीं पाओगे।” फिर उन लेखकों को यह विश्वास क्यों नहीं दिलाया गया कि भाषा अमर्यादित न हो तो लेख छपेगा? राय साहब जैसी असहमति-भरी जिंदगी जीने वाली शख्सियत पर किताब को महज प्रशंसा का पुलिंदा न बनाना ही उनके स्वभाव के अनुकूल होता।
संपादक का काम चयन भी है, मिटाना भी है। लेकिन जब दावा यह हो कि संकल्पना और प्रारंभिक श्रम किसी और का था, तो चयन का आधार भी बताया जाना चाहिए। किताब राय साहब पर है। विवाद यह है कि उसे पेश करते समय श्रेय, श्रम और स्वामित्व का संतुलन कहाँ रह गया?

प्रदर्शनी के समापन समारोह में श्री अशोक पोरवाल, मुख्य कार्यालय प्रभारी, केशव कुंज, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ मुख्यालय, झंडेवाला, नई दिल्ली, की गरिमामयी उपस्थिति रही। प्रदर्शनी में विधायक श्री सिद्धार्थ तिवारी (मध्य प्रदेश), श्री जितेंद्र कुमार (कला विभाग संयोजक संस्कार भारती, दिल्ली) प्रसिद्ध कलाकार श्री अशोक भौमिक ,श्री राजेश शर्मा, श्री राजेश कुमार, श्रीमती अनुराधा गुप्ता,डॉ राखी। इसके अतिरिक्त सिद्धांत सचदेवा,श्रीमती रोमिला सचदेवा,श्री वरिंदर शर्मा एवं श्री मृत्युंजय कुमार जी की उपस्थिति से भी कार्यक्रम की शोभा बढ़ी I
‘ETERNAL ECHOES’ में पंकज सचदेवा ने भारतीय संस्कृति, आध्यात्मिकता और जीवन-मूल्यों को प्रतीकात्मक चित्रों के माध्यम से प्रस्तुत किया। उनकी कलाकृतियों में रामायण, महाभारत, शिव-शक्ति, सिख इतिहास एवं दर्शन, सूफीवाद, जैन धर्म, बौद्ध चिंतन तथा सामाजिक मूल्यों से जुड़े विभिन्न प्रसंगों और विचारों को समकालीन प्रतीकात्मक शैली में अभिव्यक्त किया गया।
पंकज सचदेवा पिछले कई वर्षों से भारतीय ज्ञान-परंपरा और आध्यात्मिक चिंतन को कला के माध्यम से नई पीढ़ी तक पहुँचाने के प्रयास में सक्रिय रहे हैं। उनका मानना रहा है कि भारतीय महाकाव्यों, संत परंपरा और आध्यात्मिक दर्शन में निहित जीवन-मूल्य आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं और कला इन विचारों को सहज एवं प्रभावी ढंग से समाज तक पहुँचाने का सशक्त माध्यम बन सकती है।
उनकी चित्रकला में गणेश, शिव-शक्ति, भगवान बुद्ध, महावीर, श्री गुरु नानक देव जी, श्री गुरु गोबिंद सिंह जी, रामायण और महाभारत जैसे विषयों के माध्यम से त्याग, संतुलन, करुणा, धर्म, सेवा, समानता, आत्मचिंतन और मानवीय मूल्यों को प्रतीकों के रूप में प्रस्तुत किया गया।
पंकज सचदेवा ने देश के विभिन्न प्रतिष्ठित कला एवं सांस्कृतिक संस्थानों में अपनी कलाकृतियों का प्रदर्शन किया है।
पंकज सचदेवा संस्कार भारती, दिल्ली प्रांत के दृश्य कला विभाग में सह-संयोजक के रूप में भी कला एवं सांस्कृतिक गतिविधियों से जुड़े रहे हैं।
‘ETERNAL ECHOES’ के माध्यम से कलाकार ने भारतीय परंपरा की उन शाश्वत प्रतिध्वनियों को चित्रों में अभिव्यक्त करने का प्रयास किया, जो समय के साथ बदलते हुए भी मानव जीवन को निरंतर दिशा और प्रेरणा देती रही हैं।
दिल्ली। किताब का लोकार्पण ज्ञान का उत्सव होना चाहिए। लेखक वर्षों की साधना, शोध और एकांत के बाद कोई कृति लेकर आता है। मंच पर उसी कृति और उसी लेखक को केंद्र में होना चाहिए। पर राष्ट्रीय विचार परिवार के कई कार्यक्रमों में यह दृश्य उलटा दिखता है। लोकार्पण के नाम पर नेताओं की कतार खड़ी कर दी जाती है। लेखक किनारे खिसक जाता है और मंच राजनीतिक उपस्थिति का मंच बन जाता है।
नेताओं का सम्मान आवश्यक है। वे पुस्तकें पुस्तकालयों तक पहुँचाने, वितरण बढ़ाने और संसाधन जुटाने में सहायक हो सकते हैं। नेटवर्किंग से संगठन भी मजबूत होता है। पर किताब के लोकार्पण का अर्थ यही नहीं हो सकता। जब कार्यक्रम में आए अधिकांश लोग लेखक या विषय से कम और संपर्क साधने से अधिक जुड़े दिखते हैं, तो साहित्यिक आयोजन की आत्मा कमजोर पड़ जाती है।
यह नेताओं के विरोध का विषय नहीं है। यह अपने लेखकों और विद्वानों को उचित स्थान देने का विषय है। यदि परिवार बार-बार दावा करता है कि उसके पास विद्वान हैं, तो उन विद्वानों को मंच का केंद्र बनाना चाहिए। जिसे आप राष्ट्रीय विचार परिवार का लेखक कहते हैं, उनमें सत्तर से अस्सी प्रतिशत विद्वानों का शाखा से सीधा संबंध न होना कोई अपमान की बात नहीं, बल्कि एक तथ्य है। इसे स्वीकार कर सुधार की दिशा में सोचना चाहिए।
किताब तब जीवित रहती है जब लेखक का शब्द सबसे आगे रहता है। नेता सहायक बनें, अधिष्ठाता न बनें। यदि यह भूल सुधार ली जाए तो लोकार्पण सही अर्थ में ज्ञान का उत्सव बनेगा और विचार परिवार की बौद्धिक गहराई भी अधिक विश्वसनीय लगेगी। सम्मान नेताओं का भी रहे, पर लेखक का स्थान पहले हो। यही संतुलन परिवार की परंपरा को और समृद्ध करेगा।