हिंदी पत्रकारिता में महिलाएं : 200 साल बाद भी अधूरी यात्रा

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लखनऊ। जब 1826 में पंडित जुगल किशोर शुक्ल ने कलकत्ता से ‘उदंत मार्तंड’ का प्रकाशन किया, तो यह सिर्फ एक अखबार की शुरुआत नहीं थी। यह हिंदी भाषी समाज के लिए आधुनिकता की खिड़की खुलने का क्षण था। लेकिन इस खिड़की से समाज के आधे हिस्से – महिलाओं – को बाहर का नजारा देखने में दो सदी से अधिक का समय लग गया। आज जब हम हिंदी पत्रकारिता के 200 वर्षों का उत्सव मनाते हैं, तो यह पूछना जरूरी है: क्या महिलाओं के लिए यह उत्सव मनाने का समय है, या फिर यह आत्ममंथन का क्षण है?

आंकड़े कभी झूठ नहीं बोलते। और हिंदी पत्रकारिता में महिलाओं की स्थिति के आंकड़े एक ऐसी सच्चाई बयान करते हैं जिसे हम अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं। नवभारत टाइम्स – जो हिंदी समाचार पत्रों में सबसे बेहतर माना जाता है – में महिला पत्रकारों का प्रतिशत महज 23.8% है। पंजाब केसरी में यह आंकड़ा गिरकर 7.7% पर आ जाता है। यानी 100 में से मात्र 8 पत्रकार महिलाएं हैं। क्या यह स्थिति किसी लोकतांत्रिक समाज के चौथे स्तंभ के लिए स्वीकार्य है?

लेकिन असली त्रासदी तो तब सामने आती है जब हम मुख्य पृष्ठ के लेखों को देखते हैं। हिंदी समाचार पत्रों में केवल 5% मुख्य पृष्ठ के लेख महिलाओं द्वारा लिखे जाते हैं। प्रभात खबर में तो यह स्थिति और भी भयावह है – 99% लेख पुरुषों द्वारा लिखे जाते हैं। इसका मतलब है कि जो खबरें समाज की दिशा तय करती हैं, जो मुद्दे राष्ट्रीय बहस का हिस्सा बनते हैं, उनमें महिलाओं की आवाज लगभग गायब है। यह सिर्फ संख्या का सवाल नहीं है, यह प्रतिनिधित्व का, दृष्टिकोण का और अंततः न्याय का सवाल है।

यदि संख्या की कमी चिंताजनक है, तो नेतृत्व में महिलाओं की अनुपस्थिति विचलित करने वाली है। भारत के शीर्ष हिंदी समाचार पत्रों में 87% संपादक और मालिक पुरुष हैं। यह महज एक आंकड़ा नहीं है – यह एक पूरी व्यवस्था की तस्वीर है जहां निर्णय लेने की शक्ति केवल पुरुषों के हाथों में है। मृणाल पांडे को हिंदी दैनिक की पहली महिला मुख्य संपादक बनने में हिंदी पत्रकारिता की शुरुआत के 180 साल लग गए। और उनके बाद? अपवाद ही नियम बने रहे।

समाचार संगठनों में नेतृत्व के पदों पर महिलाओं का प्रतिशत चौंकाने वाला है – समाचार पत्रों में शून्य, समाचार चैनलों में 20.9% और डिजिटल मीडिया में 26.3%। इसका सीधा मतलब है कि संपादकीय निर्णय, खबरों का चयन, रिपोर्टिंग की दिशा – सब कुछ पुरुष दृष्टिकोण से तय हो रहा है। महिलाओं के मुद्दे, उनकी चिंताएं, उनके अनुभव – सब कुछ पुरुषों की नजर से फिल्टर होकर समाज तक पहुंच रहा है। यह स्थिति न केवल अन्यायपूर्ण है, बल्कि पत्रकारिता की गुणवत्ता के लिए भी हानिकारक है।

टेलीविजन पर महिला एंकरों की संख्या देखकर लगता है कि शायद यहां स्थिति बेहतर है। लेकिन यह केवल सतही समानता है। जब हम प्रमुख समय की बहसों में पैनलिस्ट के रूप में महिलाओं की भागीदारी देखते हैं, तो तस्वीर साफ हो जाती है। हिंदी समाचार चैनलों पर 52% से अधिक बहसें केवल पुरुष पैनलिस्टों के साथ होती हैं। 981 बहसों में कुल 1,400 पैनलिस्टों में से केवल 232 महिलाएं थीं – यानी मात्र 16%।

और जब महिलाएं पैनल में होती भी हैं, तो उन्हें कौन से विषय दिए जाते हैं? मानवीय रुचि, संस्कृति और मनोरंजन। गंभीर विषय जैसे रक्षा, राष्ट्रीय सुरक्षा, अर्थव्यवस्था – ये सब पुरुषों के लिए आरक्षित हैं। मानो महिलाओं को इन विषयों की समझ ही नहीं है। यह रूढ़िवादिता 21वीं सदी में भी जारी है और हम इसे सामान्य मानकर चल रहे हैं।

समस्या केवल संख्या की नहीं है। यह एक पूरी संरचनात्मक व्यवस्था है जो महिलाओं को पत्रकारिता से दूर रखती है। यौन उत्पीड्रण की शिकायत समिति के बारे में 27% पत्रकार अनजान हैं। मातृत्व अवकाश की सुविधाएं अपर्याप्त हैं। वेतन में भेदभाव सामान्य बात है। पदोन्नति में लैंगिक पूर्वाग्रह स्पष्ट है।

छोटे शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों से आने वाली महिलाओं के लिए चुनौतियां दोगुनी हैं। परिवार की अनुमति, सामाजिक दबाव, सुरक्षा की चिंताएं – ये सब मिलकर एक अदृश्य दीवार खड़ी कर देते हैं। और जब वे किसी तरह इस क्षेत्र में प्रवेश कर भी लेती हैं, तो उन्हें ‘गंभीर’ बीट नहीं दी जातीं। राजनीति, वित्त, अपराध – ये सब पुरुषों का इलाका है। महिलाओं को शिक्षा, स्वास्थ्य, समाज के पन्ने मिलते हैं, जैसे कि ये कम महत्वपूर्ण हों।

लेकिन अंधकार में भी रोशनी की किरणें हैं। खबर लहरिया ने साबित किया है कि जब महिलाओं को अवसर और संसाधन मिलते हैं, तो वे क्या कर सकती हैं। उत्तर प्रदेश के चित्रकूट से शुरू हुई यह पत्रिका आज पांच मिलियन लोगों तक पहुंचती है। दलित, आदिवासी और मुस्लिम समुदाय की ग्रामीण महिलाएं – जिन्हें समाज ने हमेशा हाशिए पर रखा – आज मुख्यधारा की पत्रकारिता को चुनौती दे रही हैं।

खबर लहरिया की सफलता यह दिखाती है कि समस्या महिलाओं की क्षमता में नहीं, बल्कि व्यवस्था में है। जब मीरा जाटव जैसी महिलाएं, जो कभी निरक्षर थीं, वरिष्ठ रिपोर्टर बन सकती हैं, तो यह साबित करता है कि केवल इच्छाशक्ति और अवसर की जरूरत है। लेकिन खबर लहरिया एक अपवाद है, नियम नहीं। और अपवाद पर व्यवस्था नहीं बदलती, संरचनात्मक परिवर्तनों की जरूरत होती है।

एक और चिंताजनक पहलू यह है कि हिंदी पत्रकारिता में महिलाओं की स्थिति अंग्रेजी पत्रकारिता से काफी खराब है। अंग्रेजी समाचार पत्रों में मुख्य पृष्ठ के 31% लेख महिलाओं द्वारा लिखे जाते हैं, जबकि हिंदी में यह आंकड़ा मात्र 5.5% है। यह अंतर क्यों है? क्या हिंदी भाषी समाज में लैंगिक रूढ़िवादिता अधिक गहरी है? क्या हिंदी पत्रकारिता संस्थान अधिक पितृसत्तात्मक हैं?

यह दोहरा भेदभाव है – पहला लैंगिक, दूसरा भाषाई। हिंदी की महिला पत्रकारों को न केवल लैंगिक पूर्वाग्रहों का सामना करना पड़ता है, बल्कि उन्हें यह भी साबित करना पड़ता है कि वे अंग्रेजी पत्रकारिता की महिलाओं से कम सक्षम नहीं हैं। यह दोहरा बोझ उनकी प्रगति को और धीमा कर देता है।

हिंदी पत्रकारिता में महिलाओं की स्थिति सुधारने के लिए केवल अच्छी नीयत काफी नहीं है। हमें ठोस कदम उठाने होंगे। सबसे पहले, संपादकीय नेतृत्व में महिलाओं की संख्या बढ़ानी होगी। जब तक निर्णय लेने वाली मेजों पर महिलाएं नहीं बैठेंगी, तब तक वास्तविक परिवर्तन नहीं आएगा। हर हिंदी समाचार संगठन को लक्ष्य तय करना होगा – अगले पांच साल में नेतृत्व में कम से कम 30% महिलाएं।

दूसरा, यौन उत्पीड़न के खिलाफ सख्त नीतियां और उनका कड़ाई से पालन। हर संगठन में सक्रिय शिकायत समिति होनी चाहिए और सभी कर्मचारियों को इसके बारे में जागरूक होना चाहिए। तीसरा, मातृत्व अवकाश और लचीले कार्य घंटों की बेहतर सुविधाएं। चौथा, समान कार्य के लिए समान वेतन – कोई अपवाद नहीं।

लेकिन सबसे महत्वपूर्ण बात है मानसिकता में बदलाव। जब तक हम यह मानते रहेंगे कि कुछ बीट ‘महिलाओं के लिए नहीं हैं’, जब तक हम यह सोचते रहेंगे कि नेतृत्व ‘स्वाभाविक रूप से’ पुरुषों का क्षेत्र है, तब तक कोई नीति सफल नहीं होगी। हमें यह स्वीकार करना होगा कि विविधता केवल नैतिक रूप से सही नहीं है, बल्कि पत्रकारिता की गुणवत्ता के लिए आवश्यक है।

हेमंत कुमारी देवी ने 1888 में जो यात्रा शुरू की थी, वह 136 साल बाद भी अधूरी है। हमने प्रगति की है – इसमें कोई संदेह नहीं। मृणाल पांडे ने कांच की छत तोड़ी, खबर लहरिया ने नए रास्ते खोले। लेकिन यह काफी नहीं है। जब तक हिंदी पत्रकारिता में महिलाओं का प्रतिनिधित्व उनकी जनसंख्या के अनुपात में नहीं होगा, जब तक नेतृत्व के आधे पद महिलाओं के पास नहीं होंगे, जब तक हर बीट में महिलाएं समान रूप से मौजूद नहीं होंगी – तब तक यह लड़ाई जारी रहनी चाहिए।

हिंदी पत्रकारिता के 200 वर्षों का जश्न मनाते हुए, हमें यह याद रखना होगा कि यह उत्सव तभी सार्थक होगा जब समाज का आधा हिस्सा भी इसमें पूर्ण भागीदार होगा। महिलाओं को पत्रकारिता में जगह नहीं ‘दी’ जानी चाहिए – यह उनका अधिकार है। और अधिकार मांगने नहीं पड़ते, उन्हें छीनना पड़ता है।

अब समय आ गया है कि हम केवल बात करना बंद करें और कार्य शुरू करें। हिंदी पत्रकारिता के अगले 200 वर्षों की कहानी अलग लिखनी होगी – एक ऐसी कहानी जहां महिलाएं हाशिए पर नहीं, बल्कि केंद्र में हों। यह केवल महिलाओं की लड़ाई नहीं है – यह हिंदी पत्रकारिता की गुणवत्ता, विश्वसनीयता और प्रासंगिकता की लड़ाई है। और इस लड़ाई में हम सबको साथ आना होगा।

सम्पूर्ण विश्व को पर्यावरण केंद्रित नए विकास मॉडल की आवश्यकता

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लखनऊ। मानव सभ्यता आज जिस मोड़ पर खड़ी है, वहां से पीछे मुड़कर देखने पर विकास की चमक दिखाई देती है, लेकिन आगे देखने पर विनाश की भयावह छाया भी स्पष्ट दिखाई देने लगी है। विज्ञान, तकनीक, उद्योग, शहरीकरण और उपभोग की संस्कृति ने मनुष्य को अभूतपूर्व सुविधाएं दीं, परंतु इसी तथाकथित विकास ने पृथ्वी के पर्यावरणीय संतुलन को गहराई से घायल भी किया। आज पूरी दुनिया जलवायु परिवर्तन, ग्लोबल वार्मिंग, जल संकट, वायु प्रदूषण, जैव विविधता के विनाश, जंगलों की कटाई और प्राकृतिक आपदाओं के बढ़ते खतरे से जूझ रही है। यह केवल पर्यावरणीय समस्या नहीं, बल्कि मानव अस्तित्व का संकट बन चुकी है।

24 मई 2026 तक की परिस्थितियों को देखें तो स्पष्ट हो जाता है कि पृथ्वी लगातार चेतावनी दे रही है। कहीं तापमान 50 डिग्री सेल्सियस के करीब पहुंच रहा है, कहीं जंगलों में आग लग रही है, कहीं बाढ़ शहरों को डुबो रही है, तो कहीं सूखे से जीवन ठहरता जा रहा है। भारत सहित दुनिया के अनेक देशों में मौसम का स्वभाव तेजी से बदल रहा है। गर्मी की अवधि लंबी होती जा रही है, वर्षा अनिश्चित होती जा रही है और प्राकृतिक आपदाएं अधिक विनाशकारी बनती जा रही हैं।

सबसे चिंताजनक बात यह है कि यह संकट अचानक पैदा नहीं हुआ। यह दशकों से अपनाए जा रहे उस विकास मॉडल का परिणाम है, जिसने प्रकृति को केवल संसाधन माना, साझेदार नहीं। आधुनिक विकास की पूरी अवधारणा अत्यधिक उत्पादन, अत्यधिक उपभोग और निरंतर आर्थिक विस्तार पर आधारित रही। विकास को मापने के लिए सकल घरेलू उत्पाद, औद्योगिक वृद्धि और उपभोग क्षमता को प्राथमिक मानक बना दिया गया, जबकि पर्यावरणीय संतुलन, प्राकृतिक संसाधनों की सीमाएं और आने वाली पीढ़ियों के अधिकारों को गंभीरता से नहीं लिया गया।

आज दुनिया का बड़ा हिस्सा कंक्रीट के जंगलों में बदलता जा रहा है। प्राकृतिक जंगलों को काटकर शहर बसाए गए। नदियों को मोड़ा गया। पहाड़ों को विस्फोटों से तोड़ा गया। समुद्र तटों पर अंधाधुंध निर्माण हुआ। खनिजों और जीवाश्म ईंधनों का अत्यधिक दोहन किया गया। परिणामस्वरूप पृथ्वी का तापमान लगातार बढ़ता गया।

ग्लोबल वार्मिंग अब केवल वैज्ञानिक रिपोर्टों का विषय नहीं रह गया है। इसका प्रभाव सामान्य जीवन में स्पष्ट दिखाई देने लगा है। यूरोप में असामान्य गर्मी, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया में जंगलों की आग, अमेरिका में चक्रवात और तूफान, अफ्रीका में जल संकट और एशिया में बाढ़ तथा लू की घटनाएं इस बात का प्रमाण हैं कि जलवायु असंतुलन पूरी दुनिया को प्रभावित कर रहा है।

भारत की स्थिति भी अत्यंत गंभीर होती जा रही है। दिल्ली, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र के कई क्षेत्रों में लगातार बढ़ता तापमान जीवन को कठिन बना रहा है। हिमालय क्षेत्र में ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं। नदियों का प्राकृतिक प्रवाह प्रभावित हो रहा है। कई राज्यों में जल संकट गहराता जा रहा है। खेती पर मौसम परिवर्तन का सीधा प्रभाव पड़ रहा है।

विडंबना यह है कि विकास का लाभ सीमित वर्ग तक पहुंचा, लेकिन पर्यावरणीय संकट का बोझ पूरी मानवता उठा रही है। अमीर देशों और बड़े उद्योगों ने पृथ्वी के संसाधनों का सबसे अधिक दोहन किया, लेकिन जलवायु परिवर्तन का सबसे गंभीर प्रभाव गरीब देशों और कमजोर वर्गों पर पड़ रहा है। गरीब किसान, मजदूर, मछुआरे और आदिवासी समुदाय सबसे पहले और सबसे अधिक प्रभावित होते हैं।

आज आवश्यकता केवल पर्यावरण संरक्षण की नहीं, बल्कि विकास की पूरी अवधारणा को पुनर्परिभाषित करने की है। दुनिया को ऐसे नए विकास मॉडल की आवश्यकता है जो प्रकृति विरोधी नहीं, बल्कि प्रकृति सहयोगी हो। ऐसा मॉडल जिसमें आर्थिक प्रगति और पर्यावरणीय संतुलन साथ-साथ चलें।

वर्तमान विकास मॉडल की सबसे बड़ी समस्या यह है कि यह “अनंत विकास” की कल्पना पर आधारित है, जबकि पृथ्वी के संसाधन सीमित हैं। यदि पूरी दुनिया उसी उपभोग स्तर को अपनाने लगे जो विकसित देशों में है, तो पृथ्वी के संसाधन बहुत जल्दी समाप्त हो जाएंगे। इसलिए विकास का अर्थ केवल अधिक उत्पादन और अधिक उपभोग नहीं हो सकता।

पर्यावरण केंद्रित विकास मॉडल का पहला आधार “सतत विकास” होना चाहिए। अर्थात ऐसा विकास जो वर्तमान आवश्यकताओं को पूरा करे, लेकिन भविष्य की पीढ़ियों के अधिकारों को नुकसान न पहुंचाए। इसके लिए ऊर्जा, उद्योग, परिवहन, कृषि और शहरीकरण की नीतियों में व्यापक परिवर्तन आवश्यक हैं।

ऊर्जा क्षेत्र में जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता कम करनी होगी। कोयला, पेट्रोलियम और गैस का अत्यधिक उपयोग पृथ्वी के तापमान को बढ़ा रहा है। सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, जल ऊर्जा और अन्य नवीकरणीय स्रोतों को प्राथमिकता देना समय की मांग है।

शहरी विकास को भी नए दृष्टिकोण से देखना होगा। आज अधिकांश शहर बिना पर्यावरणीय योजना के फैलते जा रहे हैं। पेड़ों की कटाई, जलाशयों का अतिक्रमण और अत्यधिक कंक्रीटीकरण शहरों को “हीट आइलैंड” में बदल रहे हैं। हरित क्षेत्र बढ़ाने, वर्षा जल संरक्षण, सार्वजनिक परिवहन और ऊर्जा दक्ष भवनों को बढ़ावा देना आवश्यक है।

कृषि क्षेत्र में भी परिवर्तन की आवश्यकता है। रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के अत्यधिक उपयोग ने मिट्टी की उर्वरता और जल स्रोतों को प्रभावित किया है। जैविक खेती, जल संरक्षण आधारित खेती और स्थानीय कृषि प्रणालियों को प्रोत्साहित करना होगा।

विश्व स्तर पर पर्यावरणीय न्याय की अवधारणा को भी मजबूत करना होगा। विकसित देशों की ऐतिहासिक जिम्मेदारी अधिक है, क्योंकि औद्योगिक क्रांति के बाद सबसे अधिक प्रदूषण उन्हीं देशों ने फैलाया। इसलिए जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए आर्थिक और तकनीकी सहयोग में उनकी भूमिका अधिक महत्वपूर्ण होनी चाहिए।

लेकिन केवल सरकारें और अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं ही पर्याप्त नहीं होंगी। समाज और व्यक्ति की भूमिका भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। आज उपभोग आधारित जीवनशैली पृथ्वी पर सबसे बड़ा दबाव बना रही है। आवश्यकता से अधिक खरीदना, अत्यधिक ऊर्जा उपयोग, प्लास्टिक पर निर्भरता और दिखावटी उपभोग पर्यावरण संकट को बढ़ा रहे हैं।

हमें अपनी जीवनशैली में संयम लाना होगा। “कम संसाधनों में बेहतर जीवन” की अवधारणा को स्वीकार करना होगा। यह केवल आर्थिक नहीं, बल्कि नैतिक प्रश्न भी है। प्रकृति के संसाधनों पर केवल वर्तमान पीढ़ी का अधिकार नहीं है। आने वाली पीढ़ियों का भी समान अधिकार है।

शिक्षा व्यवस्था में भी व्यापक परिवर्तन की आवश्यकता है। पर्यावरण शिक्षा को केवल पाठ्यक्रम का विषय बनाकर नहीं छोड़ा जा सकता। बच्चों और युवाओं को प्रकृति के साथ भावनात्मक और व्यावहारिक रूप से जोड़ना होगा। उन्हें यह समझाना होगा कि पर्यावरण संरक्षण कोई अतिरिक्त कार्य नहीं, बल्कि जीवन रक्षा का आधार है।

मीडिया की भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। दुर्भाग्य से पर्यावरणीय मुद्दों को अक्सर उतनी प्राथमिकता नहीं मिलती जितनी राजनीति, मनोरंजन या बाजार को मिलती है। जबकि सच यह है कि यदि पर्यावरण संकट गहराता गया, तो बाकी सभी मुद्दे गौण हो जाएंगे।

धार्मिक और सांस्कृतिक संस्थाओं की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो सकती है। दुनिया की लगभग सभी प्राचीन सभ्यताओं ने प्रकृति को सम्मान दिया। भारतीय परंपरा में नदियों, पर्वतों, वृक्षों और पृथ्वी को पूजनीय माना गया। यदि इन मूल्यों को आधुनिक जीवन में पुनर्स्थापित किया जाए, तो पर्यावरण संरक्षण सामाजिक आंदोलन बन सकता है।

आज पूरी दुनिया को यह समझना होगा कि पृथ्वी केवल आर्थिक गतिविधियों का मंच नहीं, बल्कि जीवन का आधार है। यदि जल, वायु, मिट्टी और जैव विविधता नष्ट हो जाएंगे, तो मानव सभ्यता की सारी उपलब्धियां भी टिक नहीं पाएंगी।

एक समय था जब मनुष्य प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर जीवन जीता था। लेकिन आधुनिक उपभोक्तावादी संस्कृति ने मनुष्य को प्रकृति से अलग कर दिया। आज विकास का अर्थ अधिक उपभोग और अधिक संसाधन दोहन बन गया है। यही सोच पर्यावरणीय संकट की जड़ है।

दुनिया को अब “लाभ केंद्रित विकास” से “जीवन केंद्रित विकास” की ओर बढ़ना होगा। ऐसा विकास जिसमें प्रकृति, मानवता और भविष्य तीनों सुरक्षित रहें। अन्यथा वह दिन दूर नहीं जब पृथ्वी पर जीवन की परिस्थितियां अत्यंत कठिन हो जाएंगी।

कल्पना कीजिए उस भविष्य की, जहां स्वच्छ हवा खरीदनी पड़े, पीने योग्य पानी सबसे महंगी वस्तु बन जाए, खेती योग्य भूमि कम हो जाए और सामान्य तापमान में बाहर निकलना कठिन हो जाए। यदि आज भी मानवता नहीं चेती, तो यह कल्पना वास्तविकता बन सकती है।

इसलिए आज का सबसे बड़ा वैश्विक प्रश्न यही है—क्या मानव सभ्यता अपने विकास मॉडल को बदलने के लिए तैयार है?
यदि नहीं, तो आने वाले दशकों में पर्यावरणीय संकट केवल प्राकृतिक नहीं रहेगा; वह आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक अस्थिरता का भी कारण बनेगा।

अब समय केवल सम्मेलनों और घोषणाओं का नहीं, बल्कि वास्तविक परिवर्तन का है। पृथ्वी को बचाने के लिए पूरी दुनिया को मिलकर एक ऐसे विकास मॉडल की ओर बढ़ना होगा जिसमें प्रकृति को नुकसान पहुंचाकर प्रगति हासिल करने की मानसिकता समाप्त हो।

क्योंकि अंततः सबसे बड़ा सत्य यही है—
यदि पर्यावरण सुरक्षित नहीं रहेगा, तो मानव सभ्यता का कोई भी विकास स्थायी नहीं रह पाएगा।
धरती बचेगी, तभी विकास बचेगा।
प्रकृति बचेगी, तभी मानवता बचेगी।

कृत्रिम मेधा और भारत की भाषाई संप्रभुता के विविध आयाम

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लखनऊ। मानव सभ्यता एक ऐसे दौर में प्रवेश कर चुकी है जहां कृत्रिम मेधा केवल तकनीकी उपकरण नहीं रह गई, बल्कि ज्ञान, शासन, शिक्षा, अर्थव्यवस्था, संचार और संस्कृति की दिशा तय करने वाली निर्णायक शक्ति बनती जा रही है। दुनिया के अनेक देशों में कृत्रिम मेधा आधारित प्रणालियां प्रशासन, चिकित्सा, शिक्षा, न्याय, सुरक्षा, उद्योग और मीडिया के क्षेत्रों में तेजी से उपयोग की जा रही हैं। भारत भी इस परिवर्तन के केंद्र में खड़ा है। लेकिन भारत के सामने चुनौती केवल तकनीकी विकास की नहीं है; उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण प्रश्न उसकी भाषाई संप्रभुता का है।

भारत विश्व का सबसे बड़ा भाषाई लोकतंत्र है। यहां संविधान की आठवीं अनुसूची में 22 भाषाओं को मान्यता प्राप्त है, जबकि जनगणना और भाषावैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार देश में सैकड़ों भाषाएं और हजारों बोलियां जीवित हैं। हिंदी, बंगाली, तमिल, तेलुगु, मराठी, गुजराती, पंजाबी, उर्दू, मलयालम, कन्नड़, उड़िया, असमिया, संस्कृत, मैथिली, कोंकणी, संथाली और अन्य भाषाएं केवल संचार का माध्यम नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता की सांस्कृतिक चेतना की वाहक हैं।

ऐसे समय में जब कृत्रिम मेधा आधारित प्रणालियां वैश्विक ज्ञान संरचना का निर्माण कर रही हैं, यह प्रश्न अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है कि क्या भारतीय भाषाएं इस नई डिजिटल दुनिया में सम्मानजनक स्थान प्राप्त कर पाएंगी, या फिर अंग्रेजी केंद्रित कृत्रिम मेधा मॉडल भारत की भाषाई विविधता को धीरे-धीरे हाशिए पर धकेल देंगे।

आज विश्व की अधिकांश बड़ी कृत्रिम मेधा प्रणालियां अंग्रेजी आधारित डेटा पर प्रशिक्षित हैं। इन प्रणालियों की संरचना, भाषा-समझ, सांस्कृतिक संदर्भ और निर्णय प्रक्रिया पर पश्चिमी भाषाई व वैचारिक प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है। यदि भारत केवल विदेशी कृत्रिम मेधा प्रणालियों पर निर्भर रहता है, तो भविष्य में भारतीय भाषाएं तकनीकी रूप से निर्भर और कमजोर हो सकती हैं। यही कारण है कि “भाषाई संप्रभुता” का प्रश्न राष्ट्रीय संप्रभुता से जुड़ा विषय बनता जा रहा है।

भाषाई संप्रभुता का अर्थ केवल यह नहीं कि कोई भाषा जीवित रहे, बल्कि यह भी है कि वह आधुनिक ज्ञान, विज्ञान, प्रशासन और डिजिटल संरचनाओं में प्रभावी रूप से उपस्थित हो। यदि किसी भाषा की उपस्थिति कृत्रिम मेधा आधारित मंचों पर कमजोर होगी, तो धीरे-धीरे उस भाषा की सामाजिक और आर्थिक उपयोगिता भी प्रभावित होने लगेगी।

भारत में पिछले कुछ वर्षों में इस दिशा में महत्वपूर्ण प्रयास हुए हैं। भारत सरकार के इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के अंतर्गत विकसित “भाषिणी” पहल भारतीय भाषाओं के लिए कृत्रिम मेधा आधारित भाषा अवसंरचना तैयार करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है। इस पहल का उद्देश्य भारतीय भाषाओं में वाणी पहचान, अनुवाद, वाणी संश्लेषण और बहुभाषीय संवाद प्रणाली विकसित करना है। हाल में “वॉइस एआई स्टैक” जैसे बहुभाषीय तकनीकी मंच भी प्रस्तुत किए गए, जिनका लक्ष्य भारतीय भाषाओं में संवाद आधारित कृत्रिम मेधा प्रणालियों को मजबूत करना है।

फरवरी 2026 में भारत में आयोजित कृत्रिम मेधा प्रभाव सम्मेलन में प्रधानमंत्री के भाषण का 11 भारतीय भाषाओं में तत्काल अनुवाद और सांकेतिक भाषा में प्रस्तुतीकरण यह दर्शाता है कि भारतीय भाषाओं को कृत्रिम मेधा से जोड़ने की दिशा में तकनीकी क्षमता विकसित हो रही है।

इसके अतिरिक्त भारत में स्वदेशी कृत्रिम मेधा मॉडल विकसित करने के प्रयास भी तेज हुए हैं। “भारत जेनएआई” और अन्य स्वदेशी मॉडल 22 भारतीय भाषाओं में संवाद क्षमता विकसित करने की दिशा में कार्यरत बताए गए हैं। इसी प्रकार “इंडियन एआई रिसर्च ऑर्गनाइजेशन” जैसी पहलों का उद्देश्य कृत्रिम मेधा के क्षेत्र में भारत की तकनीकी आत्मनिर्भरता को मजबूत करना है। लेकिन केवल तकनीकी घोषणाएं पर्याप्त नहीं हैं। भारत के सामने वास्तविक चुनौती कहीं अधिक जटिल है।

सबसे पहली चुनौती डेटा की है। कृत्रिम मेधा प्रणालियां जितने बड़े और गुणवत्तापूर्ण डेटा पर प्रशिक्षित होती हैं, उनकी भाषा क्षमता उतनी ही मजबूत होती है। अंग्रेजी भाषा के लिए विशाल डिजिटल सामग्री उपलब्ध है, जबकि अधिकांश भारतीय भाषाओं में उच्च गुणवत्ता वाले डिजिटल कॉर्पस की कमी है। अनेक भारतीय भाषाओं में वैज्ञानिक, तकनीकी और प्रशासनिक शब्दावली का पर्याप्त डिजिटलीकरण अब भी नहीं हुआ है।

इसके अतिरिक्त भारतीय भाषाओं की विविध लिपियां, उच्चारण, क्षेत्रीय बोलियां और सांस्कृतिक संदर्भ कृत्रिम मेधा प्रशिक्षण को और जटिल बनाते हैं। हिंदी का प्रयोग उत्तर भारत के अलग-अलग क्षेत्रों में अलग रूपों में होता है। तमिल, बंगाली, मराठी, उड़िया या कश्मीरी जैसी भाषाओं की अपनी विशिष्ट व्याकरणिक संरचनाएं हैं। यदि कृत्रिम मेधा प्रणालियां इन भाषाई विविधताओं को सही ढंग से नहीं समझेंगी, तो वे सतही और त्रुटिपूर्ण परिणाम देंगी।

भारतीय भाषाओं के संदर्भ में एक गंभीर खतरा “डिजिटल उपनिवेशवाद” का भी है। यदि भारतीय समाज पूरी तरह विदेशी कृत्रिम मेधा मंचों पर निर्भर हो जाता है, तो भारतीय भाषाओं का डेटा, सांस्कृतिक व्यवहार, सामाजिक अभिव्यक्तियां और ज्ञान संसाधन विदेशी तकनीकी कंपनियों के नियंत्रण में जा सकते हैं। इससे केवल आर्थिक निर्भरता ही नहीं बढ़ेगी, बल्कि भाषाई और सांस्कृतिक स्वायत्तता भी प्रभावित हो सकती है।

कृत्रिम मेधा केवल भाषा का अनुवाद नहीं करती; वह विचारों की संरचना भी प्रभावित करती है। यदि किसी भाषा में उपलब्ध कृत्रिम मेधा सामग्री सीमित या पक्षपातपूर्ण होगी, तो उस भाषा में ज्ञान निर्माण भी प्रभावित होगा। इसलिए भाषाई संप्रभुता का अर्थ ज्ञान संप्रभुता से भी जुड़ा हुआ है। कृत्रिम मेधा आधारित सेवाएं केवल अंग्रेजी केंद्रित रहेंगी, तो डिजिटल असमानता और बढ़ सकती है।

दूसरी ओर यदि भारतीय भाषाओं में मजबूत कृत्रिम मेधा प्रणाली विकसित होती है, तो शिक्षा, स्वास्थ्य, न्याय और प्रशासनिक सेवाओं तक पहुंच व्यापक हो सकती है। भारतीय भाषाओं के लिए मशीन अनुवाद प्रणाली विकसित करने की दिशा में भी महत्वपूर्ण शोध हुए हैं। “इंडिकट्रांस” जैसे शोध मॉडल 22 भारतीय भाषाओं के बीच अनुवाद क्षमता विकसित करने का प्रयास कर रहे हैं। इसी प्रकार भारतीय भाषाओं के लिए भाषण पहचान और वाणी आधारित प्रणालियों पर भी अनुसंधान बढ़ा है।

एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू सांस्कृतिक संदर्भों की समझ का है। यदि कृत्रिम मेधा प्रणालियां भारतीय सामाजिक-सांस्कृतिक संदर्भों को ठीक से नहीं समझेंगी, तो वे गलत निष्कर्ष या अनुचित प्रतिक्रियाएं दे सकती हैं। इसी कारण भारतीय सांस्कृतिक ज्ञान पर आधारित मूल्यांकन तंत्र विकसित करने के प्रयास भी किए जा रहे हैं।

भाषाई संप्रभुता का एक और आयाम शिक्षा से जुड़ा है। नई शिक्षा नीति में मातृभाषा आधारित शिक्षा पर जोर दिया गया है। लेकिन यदि कृत्रिम मेधा आधारित शिक्षा मंच अंग्रेजी प्रधान बने रहे, तो मातृभाषा आधारित शिक्षा की अवधारणा कमजोर पड़ सकती है। इसलिए आवश्यक है कि भारतीय भाषाओं में गुणवत्तापूर्ण डिजिटल शैक्षिक सामग्री और कृत्रिम मेधा आधारित शिक्षण प्रणालियां विकसित की जाएं।

मीडिया और पत्रकारिता के क्षेत्र में भी कृत्रिम मेधा का प्रभाव तेजी से बढ़ रहा है। समाचार लेखन, अनुवाद, वीडियो निर्माण और सामग्री वितरण में कृत्रिम मेधा का प्रयोग बढ़ रहा है। यदि भारतीय भाषाओं के मीडिया संस्थान तकनीकी रूप से सक्षम नहीं हुए, तो वैश्विक मंचों का वर्चस्व बढ़ सकता है। इससे स्थानीय भाषाई पत्रकारिता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।

न्याय व्यवस्था में भी भाषाई संप्रभुता का प्रश्न महत्वपूर्ण है। भारत में करोड़ों लोग न्यायिक प्रक्रियाओं को इसलिए ठीक से नहीं समझ पाते क्योंकि अधिकांश कानूनी दस्तावेज अंग्रेजी में होते हैं। यदि कृत्रिम मेधा आधारित अनुवाद और वाणी प्रणालियां भारतीय भाषाओं में प्रभावी रूप से विकसित होती हैं, तो न्याय तक पहुंच अधिक लोकतांत्रिक हो सकती है।

स्वास्थ्य क्षेत्र में भी मातृभाषा आधारित कृत्रिम मेधा प्रणालियां अत्यंत उपयोगी सिद्ध हो सकती हैं। भारत जैसे बहुभाषीय देश में मरीजों और डॉक्टरों के बीच भाषा संबंधी बाधाएं उपचार को प्रभावित करती हैं। बहुभाषीय कृत्रिम मेधा प्रणाली स्वास्थ्य सेवाओं को अधिक समावेशी बना सकती है।

लेकिन इन संभावनाओं के साथ अनेक नैतिक प्रश्न भी जुड़े हुए हैं। कृत्रिम मेधा प्रणालियां यदि पक्षपातपूर्ण डेटा पर आधारित होंगी, तो वे भाषाई और सामाजिक भेदभाव को बढ़ा सकती हैं। कुछ भाषाओं को अधिक प्राथमिकता और कुछ को उपेक्षा मिलने का खतरा भी बना रहेगा।

इसलिए भारत को केवल तकनीकी विकास नहीं, बल्कि भाषाई न्याय आधारित कृत्रिम मेधा नीति विकसित करनी होगी। ऐसी नीति जिसमें सभी भारतीय भाषाओं को समान अवसर मिले। केवल बड़ी भाषाओं पर केंद्रित मॉडल पर्याप्त नहीं होंगे। छोटी और जनजातीय भाषाओं को भी डिजिटल संरचना में स्थान देना आवश्यक है।

भाषाई संप्रभुता का संबंध साइबर सुरक्षा और डेटा सुरक्षा से भी है। यदि भारतीय भाषाओं का विशाल डेटा विदेशी सर्वरों और कंपनियों के नियंत्रण में रहेगा, तो राष्ट्रीय सुरक्षा और सांस्कृतिक स्वायत्तता से जुड़े प्रश्न उत्पन्न हो सकते हैं। इसलिए स्वदेशी डेटा अवसंरचना और भारतीय नियंत्रण वाले कृत्रिम मेधा मंचों का विकास रणनीतिक दृष्टि से आवश्यक है।

आज विश्व स्तर पर कृत्रिम मेधा की प्रतिस्पर्धा केवल तकनीकी नहीं, बल्कि भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा भी बन चुकी है। अमेरिका, चीन, यूरोप और अन्य शक्तियां कृत्रिम मेधा को भविष्य की निर्णायक शक्ति मान रही हैं। ऐसे समय में भारत के लिए केवल उपभोक्ता बनकर रह जाना पर्याप्त नहीं होगा। भारत को अपनी भाषाओं, संस्कृति और सामाजिक संरचना के अनुरूप स्वतंत्र कृत्रिम मेधा पारिस्थितिकी विकसित करनी होगी।

भारतीय भाषाओं की शक्ति केवल संख्या में नहीं, बल्कि उनकी सांस्कृतिक गहराई में भी है। संस्कृत से लेकर तमिल और हिंदी से लेकर बंगाली तक भारतीय भाषाओं में विशाल साहित्य, दर्शन, इतिहास और ज्ञान परंपरा मौजूद है। यदि कृत्रिम मेधा इन भाषाओं से जुड़ती है, तो भारत विश्व को एक वैकल्पिक ज्ञान दृष्टि भी दे सकता है।

अंततः कृत्रिम मेधा और भाषाई संप्रभुता का प्रश्न केवल तकनीक का प्रश्न नहीं है। यह भारत की सांस्कृतिक स्वतंत्रता, ज्ञान स्वायत्तता और लोकतांत्रिक समावेशन का प्रश्न है।

यदि भारत अपनी भाषाओं को कृत्रिम मेधा युग में मजबूत स्थान दिलाने में सफल होता है, तो वह केवल तकनीकी महाशक्ति ही नहीं, बल्कि सांस्कृतिक रूप से आत्मनिर्भर राष्ट्र भी बन सकेगा। लेकिन यदि भारतीय भाषाएं डिजिटल संरचना में पीछे रह गईं, तो भविष्य की ज्ञान व्यवस्था में उनका स्थान कमजोर हो सकता है।

इसलिए समय की मांग यही है कि भारत कृत्रिम मेधा को केवल बाजार और उद्योग की दृष्टि से न देखे, बल्कि उसे भाषाई और सांस्कृतिक संप्रभुता के राष्ट्रीय अभियान के रूप में विकसित करे।

क्योंकि भविष्य में वही राष्ट्र वास्तविक रूप से शक्तिशाली होगा जिसकी भाषाएं कृत्रिम मेधा की दुनिया में जीवित, सक्रिय और प्रभावशाली होंगी।

युद्धविराम की यथार्थवादी याचना: क्या ईरान-अमेरिका समझौते से सचमुच टल गया ऊर्जा संकट?

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लखनऊ। पश्चिम एशिया एक बार फिर वैश्विक राजनीति और विश्व अर्थव्यवस्था के केंद्र में है। पिछले कुछ महीनों से ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ते सैन्य तनाव, होर्मुज जलडमरूमध्य पर नियंत्रण को लेकर पैदा हुई अस्थिरता, तेल टैंकरों पर खतरे, गैस आपूर्ति में व्यवधान और वैश्विक बाजारों में कच्चे तेल की कीमतों में उछाल ने दुनिया को 1970 के दशक के तेल संकट की याद दिला दी। मार्च 2026 में स्थिति इतनी गंभीर हो गई थी कि अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी ने इसे “वैश्विक तेल बाजार के इतिहास का सबसे बड़ा आपूर्ति व्यवधान” तक बताया।

अब जब अमेरिका और ईरान के बीच संभावित युद्धविराम और होर्मुज जलडमरूमध्य को फिर से पूरी तरह खोलने के संकेत सामने आए हैं, तो विश्व बाजारों में कुछ राहत अवश्य दिखाई दे रही है। तेल की कीमतों में नरमी आई है, समुद्री व्यापार धीरे-धीरे सामान्य होने लगा है और कई देशों ने राहत की साँस ली है। लेकिन असली प्रश्न यह है कि क्या यह युद्धविराम वास्तव में ऊर्जा संकट का स्थायी समाधान है, या केवल एक अस्थायी विराम? क्या दुनिया फिर से उसी ऊर्जा असुरक्षा की ओर लौट सकती है, जहाँ एक क्षेत्रीय संघर्ष पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था को हिला देता है?

दरअसल, वर्तमान संकट केवल ईरान और अमेरिका के बीच सैन्य तनाव का परिणाम नहीं था। यह उस वैश्विक ऊर्जा संरचना की कमजोरी को भी उजागर करता है, जो आज भी अत्यधिक रूप से तेल और गैस पर निर्भर है। दुनिया की लगभग 20 प्रतिशत तेल आपूर्ति होर्मुज जलडमरूमध्य से होकर गुजरती है। यही कारण है कि जैसे ही ईरान ने इस समुद्री मार्ग को सीमित करने के संकेत दिए, अंतरराष्ट्रीय बाजारों में घबराहट फैल गई। भारत सहित एशियाई देशों की चिंता सबसे अधिक बढ़ी, क्योंकि चीन, भारत, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे देश खाड़ी क्षेत्र से भारी मात्रा में तेल और गैस आयात करते हैं।

युद्धविराम के बाद यह उम्मीद अवश्य जगी है कि तेल आपूर्ति फिर से सामान्य हो जाएगी और ऊर्जा बाजार स्थिर होंगे। रिपोर्टों के अनुसार होर्मुज जलडमरूमध्य को पुनः पूरी तरह खोलने के लिए अमेरिका और ईरान के बीच एक प्रारंभिक ड्राफ्ट समझौते पर चर्चा हुई है। लेकिन केवल समुद्री मार्ग खुल जाने भर से संकट समाप्त नहीं हो जाता। ऊर्जा बाजार केवल वास्तविक आपूर्ति पर नहीं चलते; वे आशंका, मनोविज्ञान, सट्टेबाजी और भू-राजनीतिक जोखिमों से भी प्रभावित होते हैं।

युद्धविराम की घोषणा के बाद भी तेल बाजारों में अस्थिरता बनी हुई है। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि निवेशकों और ऊर्जा कंपनियों को इस समझौते की स्थिरता पर पूर्ण भरोसा नहीं है। हाल के दिनों में ही ईरान द्वारा अमेरिकी ठिकानों को निशाना बनाने और अमेरिका द्वारा होर्मुज क्षेत्र के पास सैन्य कार्रवाई की खबरें सामने आईं। इससे स्पष्ट है कि तनाव की जड़ें अब भी मौजूद हैं। युद्धविराम हुआ है, लेकिन अविश्वास समाप्त नहीं हुआ।

ऊर्जा संकट के समाधान को समझने के लिए यह भी देखना होगा कि इस संघर्ष ने वैश्विक अर्थव्यवस्था को कितना गहरा झटका दिया। कई अंतरराष्ट्रीय विश्लेषणों के अनुसार इस युद्ध ने प्रतिदिन लाखों बैरल तेल आपूर्ति को प्रभावित किया। कुछ अनुमानों में यह बाधा 10 से 11 मिलियन बैरल प्रतिदिन तक बताई गई। परिणामस्वरूप ब्रेंट क्रूड के दाम 100 डॉलर प्रति बैरल के आसपास पहुँच गए, जबकि कुछ समय के लिए यह 120 डॉलर के पार जाने की आशंका तक व्यक्त की गई। इसका असर केवल पेट्रोल और डीजल तक सीमित नहीं रहा। खाद्य पदार्थों, उर्वरकों, परिवहन और बिजली उत्पादन की लागत भी बढ़ी। ऊर्जा संकट धीरे-धीरे महँगाई संकट में बदलने लगा।

भारत जैसे देशों के लिए यह स्थिति विशेष रूप से चुनौतीपूर्ण रही। भारत अपनी तेल आवश्यकताओं का लगभग 85 प्रतिशत आयात करता है। ऐसे में पश्चिम एशिया में कोई भी सैन्य तनाव सीधे भारतीय अर्थव्यवस्था को प्रभावित करता है। यदि तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊँची रहतीं, तो भारत का आयात बिल तेजी से बढ़ता, रुपया दबाव में आता और महँगाई बढ़ती। यही कारण है कि भारत ने इस पूरे संकट के दौरान संतुलित कूटनीतिक रुख अपनाया। भारत ने न तो खुलकर किसी पक्ष का समर्थन किया और न ही पश्चिम एशिया से अपने ऊर्जा संबंध कमजोर होने दिए।

लेकिन यहाँ सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या युद्धविराम से ऊर्जा सुरक्षा की मूल समस्या समाप्त हो गई? उत्तर है — नहीं। क्योंकि यह संकट केवल युद्ध का परिणाम नहीं था; यह दुनिया की ऊर्जा निर्भरता का संकट भी था।

वास्तव में इस युद्ध ने तीन बड़ी सच्चाइयाँ उजागर की हैं। पहली — दुनिया अब भी तेल पर अत्यधिक निर्भर है। दूसरी — वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति कुछ सीमित भौगोलिक क्षेत्रों पर केंद्रित है। तीसरी — ऊर्जा बाजार भू-राजनीतिक घटनाओं के सामने अत्यंत संवेदनशील हैं।

युद्धविराम से तात्कालिक राहत मिल सकती है, लेकिन दीर्घकालिक समाधान नहीं। यदि कल फिर कोई नया संघर्ष शुरू होता है, होर्मुज जलडमरूमध्य दोबारा बाधित होता है, या ईरान पर नए प्रतिबंध लगते हैं, तो दुनिया फिर उसी संकट में लौट सकती है। यही कारण है कि कई ऊर्जा विशेषज्ञ इस युद्धविराम को “स्थायी समाधान” नहीं बल्कि “रणनीतिक विराम” मान रहे हैं।

यह भी ध्यान देने योग्य है कि ऊर्जा संकट केवल तेल की उपलब्धता तक सीमित नहीं है। प्राकृतिक गैस और एलएनजी बाजार भी इस संघर्ष से प्रभावित हुए। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी ने स्वीकार किया कि पश्चिम एशिया की अस्थिरता ने वैश्विक गैस बाजारों को भी झकझोर दिया है। यूरोप पहले ही रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद गैस संकट झेल चुका है। ऐसे में यदि खाड़ी क्षेत्र भी अस्थिर हो जाए, तो वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति का संतुलन पूरी तरह बिगड़ सकता है।

इस पूरे घटनाक्रम ने अक्षय ऊर्जा की आवश्यकता को भी पुनः केंद्र में ला दिया है। दुनिया अब समझने लगी है कि केवल तेल और गैस आधारित अर्थव्यवस्था दीर्घकाल में असुरक्षित है। अमेरिका, यूरोप, चीन और भारत अब ऊर्जा विविधीकरण की दिशा में अधिक गंभीर दिखाई दे रहे हैं। इलेक्ट्रिक वाहन, ग्रीन हाइड्रोजन, सौर ऊर्जा और बैटरी भंडारण जैसी तकनीकों को अब केवल पर्यावरणीय विकल्प नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा के साधन के रूप में देखा जा रहा है।

फिर भी यथार्थ यह है कि दुनिया अभी पूरी तरह हरित ऊर्जा पर निर्भर होने की स्थिति में नहीं पहुँची है। उद्योग, विमानन, समुद्री परिवहन और भारी विनिर्माण अब भी तेल और गैस पर निर्भर हैं। इसलिए आने वाले कई वर्षों तक पश्चिम एशिया की स्थिरता वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए निर्णायक बनी रहेगी।

युद्धविराम के बावजूद एक और चिंता बनी हुई है — राजनीतिक नेतृत्व की अनिश्चितता। अमेरिका में चुनावी राजनीति और ईरान में वैचारिक सत्ता संरचना दोनों ही इस संघर्ष को स्थायी रूप से समाप्त करने में बाधा बन सकती हैं। हाल के बयानों में अमेरिकी नेतृत्व और ईरानी सैन्य प्रतिष्ठान दोनों की ओर से कठोर भाषा का प्रयोग जारी है। इससे संकेत मिलता है कि तनाव पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है।

ऊर्जा संकट का वास्तविक समाधान केवल युद्ध रोकने से नहीं आएगा। इसके लिए बहुस्तरीय रणनीति की आवश्यकता होगी। दुनिया को ऊर्जा स्रोतों का विविधीकरण करना होगा। तेल आपूर्ति के वैकल्पिक मार्ग विकसित करने होंगे। सामरिक तेल भंडार को मजबूत करना होगा। अक्षय ऊर्जा और ऊर्जा भंडारण तकनीकों में भारी निवेश करना होगा। साथ ही पश्चिम एशिया में स्थायी कूटनीतिक व्यवस्था स्थापित करनी होगी।

भारत के लिए यह संकट एक चेतावनी भी है और अवसर भी। चेतावनी इसलिए कि अत्यधिक आयात निर्भरता आर्थिक जोखिम बढ़ाती है। अवसर इसलिए कि भारत अब सौर ऊर्जा, हरित हाइड्रोजन और जैव ईंधन के क्षेत्र में वैश्विक नेतृत्व स्थापित कर सकता है। यदि भारत ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा में गंभीर निवेश करता है, तो भविष्य के ऐसे संकटों का प्रभाव कम किया जा सकता है।

यह भी उल्लेखनीय है कि ऊर्जा संकट केवल आर्थिक नहीं, सामाजिक और राजनीतिक संकट भी बन जाता है। जब ईंधन महँगा होता है, तो परिवहन महँगा होता है, खाद्य पदार्थ महँगे होते हैं, उद्योगों की लागत बढ़ती है और अंततः आम नागरिक का जीवन प्रभावित होता है। यही कारण है कि ऊर्जा सुरक्षा अब केवल ऊर्जा मंत्रालयों का विषय नहीं रह गया; यह राष्ट्रीय सुरक्षा, विदेश नीति और सामाजिक स्थिरता का प्रश्न बन चुका है।

अतः यह कहना जल्दबाजी होगी कि ईरान-अमेरिका युद्धविराम से ऊर्जा संकट पूरी तरह समाप्त हो गया है। हाँ, तत्काल दबाव कुछ कम हुआ है, बाजारों को अस्थायी राहत मिली है और वैश्विक अर्थव्यवस्था ने एक बड़े झटके से फिलहाल खुद को बचा लिया है। लेकिन संकट की जड़ें अब भी मौजूद हैं। दुनिया अब भी तेल राजनीति की कैद में है और पश्चिम एशिया अब भी वैश्विक ऊर्जा तंत्र की धड़कन बना हुआ है। वास्तविक समाधान तब होगा जब विश्व अर्थव्यवस्था किसी एक जलडमरूमध्य, किसी एक क्षेत्र या किसी एक संघर्ष पर इतनी निर्भर न रहे। युद्धविराम ने दुनिया को थोड़ा समय दिया है, लेकिन यह समय आत्ममंथन का है, आत्मसंतोष का नहीं।

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