सारी सड़कें रोम जाती हैं, मगर दिल भारत के लिए तड़पता है जहाँ साम्राज्य खत्म हुए, मगर दोस्तियाँ शुरू हो गईं

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बृज खंडेलवाल

रोम (इटली): रोम को सिर्फ इतिहास पढ़ना नहीं आता। वह इतिहास को पहनता है, पुरानी दीवारों, खंडहरों, फव्वारों, सड़कों और इमारतों पर ऐसे, जैसे कोई बुजुर्ग नवाब अपना थोड़ा घिसा मगर बेहद महँगा शेरवानी पहनकर बैठा हो।
कुछ दिन रोम की वास्तुकला और पुरानी इमारतों के बीच घूमने के बाद एक बात साफ हो जाती है, रोम एक दिन में तो नहीं बन सकता था। इसे बनाने में सदियाँ लगीं। युद्ध हुए, फतहें हुईं, बादशाह आए और गए, साजिशें हुईं, हत्याएँ हुईं, वीरगाथाएँ लिखी गईं और न जाने कितने इतालवी लोगों ने बहस करते-करते शायद Forum की दीवारें भी हिला दी होंगी।
कहावत है, सारी सड़कें रोम जाती हैं।
इस कहावत ने मुझे ताज नगरी के एक भुला दिए गए किस्से की याद दिला दी।
कहते हैं, कभी दूर किसी धूल भरे गाँव में लोला नाम का एक खुशमिजाज, मगर थोड़ा कम-अक्ल आदमी रहता था। सपने बड़े थे, जेब छोटी थी और मुँह दोनों से बड़ा।
एक सुबह उसने ऐलान कर दिया,
“मैं दुनिया घूमने निकल रहा हूँ! जिसके पास ज़बान है, वह रोम जा सकता है। और मेरी ज़बान तो रुकने का नाम ही नहीं लेती!”
गाँव वाले हँस पड़े।
बूढ़े नत्थू ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा,
“बेटा, रोम भी कदम-कदम चलकर ही पहुँचा जाता है। अपनी बकबक के सहारे उड़ने की कोशिश मत करना।”
लोला चल पड़ा।
ऊँची सड़क ली, नीची सड़क ली, कीचड़ वाली सड़क ली और आखिर में बकरियों की पगडंडी भी पकड़ ली। कोई पूछता, “कहाँ जा रहे हो?”
लोला छाती फुलाकर कहता,
“रोम! आखिर सारी सड़कें रोम जाती हैं!”
हफ्ते बीत गए। जूते घिस गए। पेट ने धरना दे दिया। जेब ऐसी हल्की हुई जैसे चुनाव के बाद नेता का वादा।
लेकिन लोला चलता रहा।
“रोम एक दिन में नहीं बना था,” वह खुद को समझाता। “तो पहुँचना भी एक दिन में जरूरी नहीं।”
आखिर एक दिन रोम सामने था।
धूप में चमकता हुआ शाश्वत शहर।
लोला सीधे एक रेस्तराँ में घुसा और सबसे बड़ी प्लेट पास्ता मँगाई। वेटर ने उसके कीचड़ से सने जूते और खुशी-खुशी गाते चेहरे को देखकर शक की निगाह डाली।
लोला ने आँख मारी,
“जब रोम में हो तो रोम वालों जैसा ही करो!”
एक प्लेट और मँगाई। फिर तीसरी।
यहीं लोला को रोम का सबसे बड़ा राज समझ आया।
रोम ने कभी दुनिया पर राज किया था, लेकिन अब वह पर्यटकों की जेब पर राज करता है।
रेस्तराँ हो, दुकान हो, गाइड हो या कोई मुस्कुराता हुआ अजनबी, सबकी जुबान पर एक ही प्राचीन रोमन शब्द था, यूरो!
लोला की जेब घंटे-दर-घंटे हल्की होती गई।
उसने आह भरकर कहा,
“पहले रोम ने दुनिया जीती। अब रोम मुझे जीत रहा है!”
बाद में वह सेंट पीटर स्क्वायर पहुँच गया। वहाँ एक भव्य धार्मिक जुलूस चल रहा था।
लोला ने पूछा,
“पोप साहब आसपास हैं क्या?”
एक गंभीर कार्डिनल ने उसे घूरकर देखा।
लोला तुरंत संभल गया,
“अच्छा-अच्छा, समझ गया। रोम में रहना है तो पोप से पंगा नहीं लेना चाहिए।”
फिर बोला,
“वैसे रोम का पोप बनना तो सबके बस की बात नहीं। मैं तो ऐसा आदमी बनूँगा जो सस्ता पास्ता बेचता हो।”
शाम तक लोला थककर चूर हो गया और लगभग खाली जेब लेकर कोलोसियम के पास जा बैठा।
एक सड़क कलाकार वायलिन बजा रहा था और पर्यटक उसके सामने सेल्फी खींच रहे थे।
लोला हँस पड़ा।
“नीरो ने रोम में आग लगने के समय वायलिन बजाया था। आज यह भाई साहब पर्यटकों के क्रेडिट कार्ड जलते समय वायलिन बजा रहे हैं!”
कलाकार मुस्कुराया।
“शायद यही रोमन तरीका है।”
पास ही कुछ पर्यटक Trevi Fountain का रास्ता खोज रहे थे। एक नक्शे पर भरोसा कर रहा था, दूसरा GPS पर और तीसरा दावा कर रहा था कि उसे रोम की रहस्यमयी आत्मिक दिशा का ज्ञान है।
लोला अचानक उठ खड़ा हुआ।
“अरे भाई, झगड़ क्यों रहे हो? सारी सड़कें रोम आती हैं और हम पहले से रोम में हैं!”
पास खड़ा एक Swiss Guard, जो न जाने किस रहस्यमय वेटिकन काम से वहाँ आया था, गंभीर आवाज में बोला:७
“Roma locuta est, causa finita est.”
यानी, रोम बोल चुका। मामला खत्म।
लोला ने काल्पनिक टोपी उतारी।
“संदेश समझ लिया, हुजूर!”
और इस तरह लोला ने रोम को जीत लिया, बिना किसी जंग के, बिना किसी सेना के और बिना कुछ जीते हुए भी सबका ध्यान जरूर जीत लिया।
हमारा भी अपना रोम था
हमारा Global Family समूह भी लोला से ज्यादा पीछे नहीं था।
हमने भी इटली को अपने देसी अंदाज़ में फतह किया। रेस्तराँ जीते, होटल जीते, हाईवे जीते, हरी-भरी घाटियाँ देखीं और पहाड़ों की चोटियों तक पहुँचे।
थकान को गीतों से हराया। भूख को खाने से। और लंबी बस यात्राओं को बातचीत से।
हमारी बस अब सिर्फ बस नहीं रही थी। वह चलता-फिरता मोहल्ला बन चुकी थी।
किसी न किसी को गाना था। कोई गपशप कर रहा था। कोई खाने की तलाश में था। कोई बाथरूम पूछ रहा था। और कोई हर आधे घंटे बाद वही सनातन सवाल दाग रहा था:
“और कितनी देर है?”
रोम की घुमावदार सड़कों पर बस की सवारी भी किसी रोमांच से कम नहीं थी। हर मोड़ के बाद इतिहास का एक नया पन्ना खुल जाता था।
हमारी रोमन सिटी-टूर गाइड भी पूरी शान से अपना फर्ज निभा रही थीं। हाँ, कभी-कभी उनका विवरण हमारी समझ से किसी दूसरी सड़क पर निकल जाता था।
लेकिन इसमें भी रोम की खूबसूरती थी।
रोम में सड़कें ही नहीं, कमेंट्री भी भटकने की आज़ादी रखती है।
लेकिन इस पूरे सफर का सबसे बड़ा आकर्षण फिर भी कोई स्मारक नहीं था।
वह थी प‍द्मिनी।
कोलोसियम में प‍द्मिनी अय्यर का पैर बुरी तरह मुड़ गया। अचानक रोमन साम्राज्य, ग्लैडिएटर, बादशाह और प्राचीन युद्ध सब पीछे छूट गए।
उस वक्त हमारे लिए दुनिया का सबसे बड़ा था: दर्द का साम्राज्य।
प‍द्मिनी दर्द से परेशान बैठी थीं और मदद का इंतजार कर रही थीं। तभी पूनम जी एक छोटी मगर बेहद कीमती मरहम की ट्यूब लेकर सामने आईं।
और यहीं कहानी में असली रोमन ट्विस्ट आया।
एक दिन पहले तक प‍द्मिनी पूनम जी को गले और खाँसी के लिए आयुर्वेदिक गोलियाँ दे रही थीं।
कल प‍द्मिनी थीं फार्मासिस्ट।
आज पूनम जी बन गईं डॉक्टर।
यात्रा में कर्म का हिसाब-किताब किसी अदालत में नहीं होता। वक्त आते ही हिसाब बराबर हो जाता है।
न कोई अपॉइंटमेंट। न पर्ची। न फीस।
बस इंसानियत।
फिर आया विदाई का वक्त
वेटिकन सिटी, विशाल बेसिलिका, नदी और रोम के बाकी नज़ारे देखने के बाद आखिर वह घड़ी भी आ गई, जिससे हर यात्री बचना चाहता है:
सामान बाँधने की घड़ी।
सूटकेस भी जैसे बंद होने से इंकार कर रहे थे। जूते किसी कोने में ठूँसे गए। स्मृति-चिह्न उन बैगों में घुसाए गए जो पहले ही अतिरिक्त सामान के खिलाफ बगावत कर चुके थे।
और अचानक हँसी कुछ धीमी पड़ गई।
क्योंकि हर सफर की एक मंज़िल होती है।
शेक्सपीयर ने विदाई को “मीठा दुख” कहा था। लगता है, वह भी कभी ग्रुप टूर पर गया होगा।
कई दिनों तक हम देशों, पहाड़ों, नदियों, हवाई अड्डों, होटलों और सड़कों से गुजरते रहे।
साथ खाया। साथ हँसे। साथ रास्ता भूले। फिर एक-दूसरे को ढूँढ़ निकाला। और कभी-कभी यह भी पता लगाया कि बस में कौन गायब है!
पेरिस और रोम के बीच कहीं अजनबी साथी बन गए।
पहाड़ों और खाने की मेज के बीच साथी दोस्त बन गए।
और मजाक, गीतों, थके पैरों और साझा भोजन के बीच Global Family सिर्फ एक ट्रैवल कंपनी का नाम नहीं रहा।
वह सचमुच एक छोटा-सा चलता-फिरता परिवार बन गया।
विदाई के समय Lady Martha भी अपने जज़्बात छिपा नहीं सकीं। हममें से कई लोग भी नहीं छिपा पाए।
फोन नंबर फिर से सेव हुए। “संपर्क में रहना” कई बार दोहराया गया। कुछ वादे किए गए। कुछ मुस्कानें दी गईं। कुछ आँखें भीगीं।
हम जानते थे कि कुछ ही दिनों में जिंदगी सबको वापस अपनी पुरानी पटरी पर खींच ले जाएगी।
लेकिन कुछ बदल चुका था।
हम इस यात्रा पर पर्यटक बनकर आए थे।
अब लौट रहे थे तो अपने साथ एक साझा कहानी लेकर।
रोम ने हमें कोलोसियम दिया।
वेनिस ने गोंडोला दिया।
आल्प्स ने पहाड़ दिए।
पेरिस ने एफिल टावर दिया।
लेकिन इस सफर ने हमें वह चीज दी, जो दुनिया का कोई स्मारक नहीं दे सकता—
लोगों की यादें।
बसें रुक जाएँगी।
पासपोर्ट वापस दराज में चले जाएँगे।
सूटकेस किसी कोने में धूल खाएँगे।
यात्रा की तस्वीरें हजारों WhatsApp तस्वीरों के बीच धीरे-धीरे दब जाएँगी।
लेकिन हँसी बची रहेगी।
गीत बचेंगे।
वह छोटा-सा मरहम बचा रहेगा।
वह एक-दूसरे का हाथ थामना बचा रहेगा।
और शायद कई साल बाद कोई अचानक पूछेगा:
“याद है वह Europe trip?”
और देखते ही देखते सबके चेहरे पर मुस्कान आ जाएगी।
यही तो सफर का अजब करिश्मा है।
हम सोचते हैं कि हम जगहों को देखने जा रहे हैं।
लेकिन आखिर में हम जगहों से ज्यादा लोगों को अपने साथ घर ले आते हैं।
अलविदा रोम
तो अलविदा रोम।
तुम्हारी सदियों पुरानी ईंटों को सलाम।
तुम्हारे भव्य गिरजाघरों को सलाम।
तुम्हारी शोरभरी सड़कों को सलाम।
तुम्हारे बेहिसाब ट्रैफिक को भी सलाम—हालाँकि उससे सलाम करने का मन कम और बचकर निकलने का मन ज्यादा करता है!
अलविदा उस शहर को, जहाँ बादशाहों ने अमर होने के सपने देखे।
हमारी यात्रा ने मगर हमें एक और सादा सच सिखाया।
साम्राज्य मिट जाते हैं।
स्मारक बूढ़े हो जाते हैं।
सड़कें बदल जाती हैं।
लेकिन एक छोटी-सी मेहरबानी, एक साझा ठहाका और मुश्किल वक्त में बढ़ा हुआ दोस्त का हाथ , इनकी उम्र बहुत लंबी होती है।
सड़कें हमें रोम तक ले आईं।
लेकिन दोस्ती हमें घर तक ले जाएगी।
शायद यही सबसे खूबसूरत सड़क है।
Arrivederci, Global Family!
सफर यहाँ खत्म हो रहा है।
कहानी नहीं।
और न ही वे यादें, जो अब हमारे दिल के किसी कोने में हमेशा के लिए अपना सामान जमा चुकी हैं।

वेनिस: गोंडोला, गलियाँ, गपशप और हिंदुस्तानियों से 

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वेनिस (इटली) : गोंडोला पानी पर ऐसे खामोशी से सरक रही थी, जैसे वेनिस के पुराने राज़ों को जगाना नहीं चाहती हो। संकरी नहर के दोनों ओर सदियों पुरानी इमारतें खड़ी थीं। नाव कभी दीवारों को छूती-छूती निकलती, तो कभी किसी पुराने पुल के नीचे से ऐसे गुजरती, जैसे इतिहास की किसी गुप्त सुरंग में दाखिल हो रही हो।
नाविक अपने लंबे चप्पू को बड़े इत्मीनान से चलाता रहा। लगता था, बरसों से इन नहरों से बहस करता आया है और हर बार जीतकर निकला है।
वेनिस अपनी उम्र छिपाने की कोई कोशिश नहीं करता। पुरानी दीवारों पर सीलन के निशान थे। जंग लगे पाइप इमारतों से ऐसे चिपके थे, जैसे किसी पुराने रिश्ते को छोड़ने को तैयार न हों। कुछ दीवारें ऐसी लगती थीं, मानो सदियों से रो रही हों। पानी की लकीरें इमारतों के चेहरे पर नीचे तक उतर आई थीं। बालकनियाँ नहर के ऊपर झुकी हुई थीं, जैसे पानी के पार चल रही गपशप सुनने को बेताब हों।
पद्मिनी अय्यर ने खूबसूरती पर अपनी टिप्पणी की, “इस बूढ़ी होती सुंदरता में भी गजब का आकर्षण है। वाकई, वेनिस अपनी झुर्रियाँ छिपाता नहीं है, बल्कि उन्हें शान से दिखा रहा है।”
सचमुच, वेनिस की खूबसूरती किसी मेकअप की मोहताज नहीं। यहाँ उम्र भी एक आभूषण है और जर्जरता (टूट-फूट की हालत) भी कला का हिस्सा लगती है।
गोंडोला कभी तीखे मोड़ लेती, कभी छत वाले पुलों के नीचे से गुजरती। कहीं दो इमारतें इतनी करीब दिखतीं, जैसे पानी के ऊपर एक-दूसरे के कान में कोई राज़ फुसफुसा रही हों। हर मोड़ पर एक नया नज़ारा सामने आ जाता, पुरानी खिड़की, छोटी-सी बालकनी, चर्च का गुंबद या नहर के बिल्कुल किनारे खुलता कोई रहस्यमय दरवाज़ा।
यह सिर्फ नाव की सैर नहीं थी। यह इतिहास के पन्नों पर धीरे-धीरे चलने जैसा अनुभव था।
और फिर शुरू हुआ हिंदुस्तानी प्रतिक्रियाओं का सिलसिला!
कैमरे बाहर आ गए। बातचीत शुरू हो गई। किसी ने किसी इमारत की ओर उंगली उठाई। दूसरे ने उसकी जानकारी दी। तीसरे ने दोनों की तस्वीर खींच ली।
आखिर हम हिंदुस्तानी हैं। हम केवल जगहों को देखने नहीं जाते। उनसे रिश्ता बनाते हैं, एक-दूसरे से बातचीत करते हैं और जरूरत पड़े तो बिल्कुल अनजान लोगों से भी दोस्ती कर लेते हैं।
पदोवा से वेनिस का सफर फेरी (यात्री नाव) से शुरू हुआ था। वेनिस के करीब पहुँचते ही नज़ारा जादुई हो गया। सड़कें पीछे छूट गईं और पानी ने उनकी जगह ले ली। बसों की जगह नावें दिखाई देने लगीं। पूरा शहर ऐसा लग रहा था, जैसे आसमान और समंदर के बीच तैर रहा हो।
हमारी टूर मैनेजर मार्था हमें वेनिस के मशहूर चौक तक ले गईं। चारों तरफ शानदार वास्तुकला, पुरानी इमारतें और हजारों पर्यटक थे। वेनिस खूबसूरत भी था, व्यस्त भी और इस बात का आदी भी कि लोग उसे लगातार घूरते रहें।
लेकिन हमारे लिए एक और सवाल अहम था।
खाना कहाँ मिलेगा?
वेनिस की खूबसूरती अपनी जगह, मगर पेट की पुकार भी कोई मामूली चीज़ नहीं!
भारतीय रेस्तराँ गांधी वन ने हमारी मुश्किल आसान कर दी। शाकाहारी खाना, जाने-पहचाने स्वाद और सबसे बढ़कर: छाछ!
कई दिनों की यूरोपीय भोजन-यात्रा के बाद छाछ का एक गिलास ऐसा लगा, जैसे किसी दूर देश में अचानक परिवार का कोई सदस्य मिल गया हो। एक घूंट में घर, आँगन और भारतीय रसोई की याद लौट आई।
शाम को पदोवा के रेस्तराँ में खाना मेजों पर परोसा गया। हमारी टोली के बाराती खुश हो गए। चेहरे खिल उठे और खाने के साथ-साथ बातचीत का दौर भी जम गया।
असली मनोरंजन तो बस की यात्रा के दौरान शुरू हुआ।
पद्मिनी ने बिल्कुल सही कहा, “भारतीय पर्यटकों का समूह ज्यादा देर तक सिर्फ पर्यटकों का समूह नहीं रह सकता। हमें एक बस और कुछ घंटे साथ दे दीजिए, वह बारात बन जाती है। लोग बातें करने लगते हैं, खाना बाँटते हैं, अपने अनुभव सुनाते हैं और एक-दूसरे का हाल पूछते हैं।”
फिर शुरू होते हैं भजन और अंताक्षरी।
बस यूरोप से गुजर रही होती है, लेकिन माहौल ऐसा बन जाता है जैसे वह सीधे भारत की किसी शादी में जा रही हो। कोई भजन छेड़ता है, कोई अंताक्षरी में सुर लगाता है और कोई पीछे से अपनी टिप्पणी कर देता है।
खुशकिस्मती से हमारी बारात में कोई रूठे हुए फूफाजी नहीं थे। वरना उनका मनाना भी यात्रा कार्यक्रम का हिस्सा बन जाता!
भारतीय समाज की यह गर्मजोशी हमारी सांस्कृतिक पहचान का अहम हिस्सा है। दिल्ली हो, मुंबई, आगरा या लंदन: पता बदल जाए, पासपोर्ट बदल जाए, पेशा बदल जाए, लेकिन देसी दिल की कुछ आदतें आसानी से नहीं बदलतीं।
मसलन, एक सवाल हर जगह जीवित रहता है:
“खाना खा लिया?”
यह सिर्फ सवाल नहीं, अपनापन है। कई बार तो यह भारतीय प्रेम की सबसे सरल और सबसे भरोसेमंद भाषा बन जाता है।
हमारी यात्रा में बुजुर्ग यात्रियों का ख्याल रखने की परंपरा भी साफ दिखाई दी। कोई सामान उठाने में मदद करता। कोई बैठने के लिए जगह देता। कोई पूछता कि पानी चाहिए या कुछ खाने को।
यह छोटी-छोटी मददें यात्रा को आसान बनाती हैं और दिल में एक भरोसा पैदा करती हैं कि हम अकेले नहीं हैं।
हमारी अथक (बिना थके काम करने वाली) गाइड मार्था ने इस जिम्मेदारी को एक अलग ही स्तर पर पहुँचा दिया। वह हमें उत्साहित करतीं, हौसला बढ़ातीं और पूरी टोली को साथ रखने में जुटी रहतीं।
उनकी कोशिश रहती कि कोई भी यात्री उनकी जीपीएस सीमा से बाहर न निकल जाए।
वेनिस के पास नहरें, गोंडोला और पुल थे। मार्था के पास अपना नेविगेशन सिस्टम था: भारतीय पर्यटकों को नियंत्रण में रखना!
कहना पड़ेगा, हमारी टोली भी कम चुनौतीपूर्ण नहीं थी।
पदोवा में हमारे रात के ठहराव, ब्लू ड्रीम होटल, ने यूरोपीय आतिथ्य का एक दूसरा पहलू सामने रखा।
कमरा काफी बड़ा था। जगह की कोई कमी नहीं थी। लेकिन जरूरी सुविधाओं और व्यक्तिगत सेवा की कमी महसूस हुई। बड़ा कमरा हमेशा बेहतर अनुभव की गारंटी नहीं देता। कभी-कभी एक छोटी-सी मदद, एक मुस्कान और किसी का पूछ लेना कि “आपको कुछ चाहिए?” ज्यादा मायने रखता है।
यहीं भारतीय और यूरोपीय आतिथ्य के बीच एक दिलचस्प फर्क दिखाई देता है।
भारत में सेवा का मतलब अक्सर यह होता है कि कोई आपके माँगने से पहले ही आपकी जरूरत समझ ले। यूरोप में कई बार आपसे उम्मीद की जाती है कि आप अपना काम खुद करें।
इसे वे स्वतंत्रता, आत्मनिर्भरता और मानवीय गरिमा कहते हैं।
ठीक है, अपनी जगह सही है।
लेकिन किसी बुजुर्ग यात्री से पूछिए, जो भारी सामान लेकर चल रहा हो, कि मदद का एक हाथ उसकी गरिमा को चोट पहुँचाता है क्या? हो सकता है, उसका दर्शन कुछ अलग हो।
गरिमा सिर्फ अपने काम खुद करने में नहीं, बल्कि जरूरत के समय मदद स्वीकार करने में भी हो सकती है।
यूरोप ने अपनी सेवा व्यवस्था में ऑटोमेशन (मशीनों से काम करवाने की व्यवस्था) को तेजी से अपनाया है। मशीनें चेक-इन करती हैं, मशीनें भुगतान लेती हैं और मशीनें जानकारी देती हैं।
कभी-कभी ऐसा लगता है कि जल्द ही मशीनें हमसे यह भी पूछ लेंगी, “आपका ठहराव कैसा रहा? कृपया पाँच सितारा रेटिंग देना न भूलें!”
कई भारतीय यात्रियों को यह कार्यकुशलता थोड़ी बेजान लग सकती है। हम बातचीत, व्यक्तिगत ध्यान और इंसानी स्पर्श के आदी हैं।
भारत में होटल का कर्मचारी कभी-कभी सिर्फ सेवा नहीं देता, बल्कि बातचीत भी कर लेता है। वह पूछ लेता है कि सफर कैसा रहा, खाना ठीक था या नहीं और अगली यात्रा के लिए कुछ चाहिए क्या।
यूरोप में व्यवस्था अधिक स्वचालित और व्यवस्थित हो सकती है। भारत में कई बार सेवा के साथ रिश्ते की गर्माहट भी जुड़ जाती है।
दोनों व्यवस्थाओं के अपने फायदे और अपनी सीमाएँ हैं।
वेनिस खुद एक अद्भुत विरोधाभास है।
शहर की वास्तुकला सदियों पुरानी है, लेकिन उसे जीवित रखने वाला आधुनिक ढाँचा लगातार काम करता रहता है। पुराने पत्थर और आधुनिक इंजीनियरिंग एक साथ दिखाई देते हैं। सदियों पुरानी इमारतों के बीच आज की व्यवस्थाएँ इस तैरती दुनिया को संभालती हैं।
गोंडोला की सैर ने इस विरोधाभास को और स्पष्ट कर दिया।
खूबसूरती और जर्जरता साथ-साथ मौजूद थीं। भव्य महलों के पास टूटती दीवारें खड़ी थीं। खूबसूरत अग्रभागों (इमारत के सामने के हिस्से) के बगल में जंग लगे पाइप दिखाई देते थे। पानी का रिसाव शानदार वास्तुकला से जैसे मुकाबला कर रहा था।
लेकिन वेनिस की खासियत यही है कि वह अपनी कमियों को भी खूबसूरत बना देता है।
शायद यही इस शहर का सबसे बड़ा हुनर है।
उसे संपूर्ण होने की जरूरत नहीं।
उसे बस वेनिस होना है।
जब हमारी गोंडोला धीरे-धीरे आगे बढ़ी और वेनिस की पुरानी इमारतें पीछे छूटने लगीं, तो हमारे साथ सिर्फ तस्वीरें नहीं थीं।
हम हँसी लेकर लौटे। गीत लेकर लौटे। साझा भोजन की यादें लेकर लौटे। एक-दूसरे की चिंता और मदद का एहसास लेकर लौटे।
और सबसे बढ़कर, वह पहचान साथ रही कि हिंदुस्तानी जहाँ भी जाते हैं, अपने साथ थोड़ा-सा हिंदुस्तान जरूर ले जाते हैं।
हमारे पास अलग-अलग शहरों के पते हो सकते हैं। हमारे पास अलग-अलग पासपोर्ट हो सकते हैं। लेकिन साथ बैठकर गाना गाने, खाना बाँटने और किसी बुजुर्ग साथी का हाल पूछने की आदतें हमें जोड़ती रहती हैं।
वेनिस ने हमें गोंडोला दी।
हमने उसे अपनी बारात दे दी!

कभी भारत सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य नहीं बनेगा!

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डॉ. मयंक चतुर्वेदी

भोपाल। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) में सुधारों को लेकर आज पूरी दुनिया में चर्चाएं तेज हैं। न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र महासभा (यूएनजीए) के उच्च स्तरीय सप्ताह के दौरान 100 से अधिक वैश्विक नेताओं ने खुलकर माना कि इस 15 सदस्यीय निकाय का वर्तमान स्वरूप आउटडेटेड हो चुका है। भारत आज दुनिया की सबसे बड़ी जनसंख्‍यावाला देश है, एक अग्रणी आर्थिक महाशक्ति है और वैश्विक शांति अभियानों का सबसे मजबूत स्तंभ है। इसके बावजूद, यह कड़वी और अपरिवर्तनीय सच्चाई हमारे सामने है कि वर्तमान व्यवस्था के रहते भारत कभी भी सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य नहीं बन सकता।

अब भले ही मॉरीशस, पुर्तगाल और रूस जैसे देश वैश्विक मंचों पर भारत का कितना भी समर्थन कर लें, यूएन का कानूनी और रणनीतिक ढांचा इस तरह तैयार किया गया है कि भारत की राह हमेशा के लिए बंद दिखाई देती है। हो सकता है कि इस कथन एवं तथ्‍य के प्रकाश में कुछ लोग आलोचना भी कर सकते हैं कि इस नकारात्‍मक बातें आखिर करना ही क्‍यों चाहिए ? किंतु किसी के कहने या नहीं कहने से सत्‍य नहीं बदलनेवाला है, इसलिए यह अपरिहार्य हो जाता है कि हम सभी सत्‍य का साक्षात्‍कार करें और आगे की प्रभावी रणनीति बनाएं ताकि कोई रास्‍ता निकल सके।

भारत के प्रति समर्थन का दिखावा और छिपे हुए पेंच

हाल ही में संयुक्त राष्ट्र महासभा के सत्र के दौरान भारत की स्थायी सदस्यता को लेकर कई देशों ने बड़े-बड़े बयान दिए, लेकिन इन बयानों के पीछे छिपी कूटनीति इस बात पर मुहर लगाती है कि स्थायी सीट मिलना एक असंभव सपना है। वस्‍तुत: रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने स्थायी सीट के लिए भारत और ब्राजील की उम्मीदवारी का समर्थन तो किया, किंतु साथ ही उन्होंने एक बड़ा अड़ंगा भी लगा दिया। रूस ने जर्मनी और जापान जैसे पश्चिमी देशों को कोई भी अतिरिक्त स्थायी सीट देने का कड़ा विरोध किया और उन्हें “सैन्यवाद और प्रतिशोध की राह पर चलने वाला” बताया। चूंकि भारत, जर्मनी और जापान के साथ मिलकर ‘जी-4’ समूह के तहत सामूहिक दावेदारी कर रहा है, इसलिए रूस के इस रुख ने भारत की संयुक्त रणनीति को बड़ा झटका दिया है।

यहां यह भी ध्‍यान देने योग्‍य है कि मॉरीशस के विदेश मंत्री धनंजय रामफुल और पुर्तगाल के प्रधानमंत्री लुइस मोंटेनेग्रो ने भारत के पक्ष में आवाज उठाई। मार्शल द्वीप समूह की राष्ट्रपति हिल्डा हेइन ने भी समर्थन दोहराया। जापान की प्रधानमंत्री सनाए ताकाइची और घाना के राष्ट्रपति जॉन ड्रामानी महामा ने यूएन की विश्वसनीयता के लिए सुधारों को जरूरी बताया। सिएरा लियोन के राष्ट्रपति जूलियस माडा बायो ने भी दर्द बयां किया कि 1.6 अरब से अधिक लोगों का घर होने के बावजूद पूरे अफ्रीका को कोई स्थायी सीट नहीं मिली है, पर सच्चाई यह है कि ये सभी देश मिलकर भी भारत को सुरक्षा परिषद की दहलीज पार नहीं करा सकते।

यह दावा क्यों सच है कि भारत कभी स्थायी सदस्य नहीं बन सकता?

वस्‍तुत: इस निराशाजनक निष्कर्ष के पीछे कोई कयास नहीं लगाए जा रहे हैं, इसके पीछे के जो सत्‍य तथ्‍य हैं उसी के आधार पर यह कहा जा रहा है, क्‍योंकि संयुक्त राष्ट्र चार्टर के कइ्र अचूक नियम हैं जिन्हें तोड़ना किसी के वश में नहीं है। सुरक्षा परिषद का विस्तार करने के लिए संयुक्त राष्ट्र के मूल संविधान (यूएन चार्टर) को बदलना होगा। अनुच्छेद 108 के तहत इस संशोधन को लागू करने के लिए दो ऐसी शर्तें हैं जो भारत कभी पूरी नहीं कर पाएगा। एक- महासभा के दो-तिहाई देशों (129 देश) का बहुमत और दो- वर्तमान के सभी पांच स्थायी सदस्यों (पी5- अमेरिका, रूस, चीन, ब्रिटेन और फ्रांस) की अनिवार्य और व्यक्तिगत सहमति। इन पांचों देशों को अपनी-अपनी संसदों से इस कानून को पास कराना होगा।

फिर एक बार को माल भी लिया जाए कि अमेरिका, रूस, ब्रिटेन और फ्रांस को भारत ने अपने पक्ष में मना भी लिया, तब भी चीन हमेशा की तरह आगे भी भारत की स्‍थायी सीट का विरोध करेगा ही। जैसा कि उसका अब तक का चरित्र हमेशा से रहता आया है। एक तरह से देखा जाए तो भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने उचित ही कहा है कि “संयुक्त राष्ट्र सुधारों का विरोध करने वाले लोग इस वैश्विक संस्था का इस्तेमाल कर रहे हैं, उन्हें इसकी परवाह नहीं है।” यहाँ सीधा निशाना चीन पर है।

यानी कि यदि भारत दुनिया के 190 देशों को अपने पक्ष में कर ले और अमेरिका, रूस, फ्रांस तथा ब्रिटेन भी भारत के पक्ष में दस्तखत कर दें, तब भी अकेले चीन के पास यह ताकत है कि वह इस पर वीटो कर दे। चीन सुरक्षा परिषद में एशिया का एकमात्र स्थायी सदस्य है और वह कभी नहीं चाहेगा कि उसका पड़ोसी और प्रतिद्वंदी भारत उसके बराबर की कुर्सी पर बैठे। चीन का एक अकेला ‘ना’ बाकी पूरी दुनिया के ‘हां’ को कचरे के डिब्बे में डाल देता है।

पी5 देशों का दोहरा खेल

अंतरराष्ट्रीय राजनीति में कोई किसी का सगा नहीं होता। अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस जैसे देश जानते हैं कि चीन कभी भी भारत के नाम पर सहमति नहीं देगा, इसलिए वे भारत को खुश रखने और भारत के बड़े बाजार के साथ अरबों डॉलर के रक्षा सौदे करने के लिए खुलकर भारत का समर्थन करने का नाटक करते हैं। वे जानते हैं कि उन्हें अपनी जेब से कुछ नहीं देना है, क्योंकि अंत में चीन अपने वीटो से इस प्रस्ताव को रोक ही देगा। यहां विचारणीय है कि अब ऐसी परिस्‍थ‍िति में भारत को आखिर क्‍या करना चाहिए, स्‍वभाविक है कि इस कड़वे सच के बावजूद भारत को कुछ रणनीतिक कदम उठाने चाहिए, जिसमें कि अगर भारत को यह मान भी लेना पड़े कि मौजूदा नियमों के तहत वह कभी स्थायी सदस्य नहीं बन सकता, तो भी हाथ पर हाथ धरकर बैठने के बजाय भारत को वैश्विक व्यवस्था को चुनौती देने वाले निम्न आक्रामक कदम उठाने चाहिए-

जी-4 समूह की बैसाखी छोड़ना

भारत अब तक जापान, जर्मनी और ब्राजील के साथ मिलकर सामूहिक लड़ाई लड़ रहा था। लेकिन रूस द्वारा जर्मनी और जापान का कड़ा विरोध करने के बाद यह स्पष्ट है कि इस समूह के साथ रहने से भारत का नुकसान हो रहा है। भारत को जी-4 से अलग होकर केवल अपनी “स्वतंत्र दावेदारी” पेश करनी चाहिए और दुनिया को बताना चाहिए कि भारत का मामला बाकी देशों से बिल्कुल अलग और ऐतिहासिक रूप से न्यायसंगत है।

‘एज़ुलविनी सर्वसम्मति’ के जरिए अफ्रीका का नेतृत्व करना

अफ्रीका महाद्वीप के 54 देश मिलकर यूएन में सबसे बड़ा वोट बैंक हैं। वे ‘एज़ुलविनी सर्वसम्मति’ के तहत अपने लिए दो स्थायी सीटें मांग रहे हैं। भारत को खुद को ‘ग्लोबल साउथ’ का मसीहा साबित करते हुए अफ्रीकी देशों के साथ एक मजबूत मोर्चा बनाना चाहिए। जब 54 अफ्रीकी देश और भारत मिलकर संयुक्त राष्ट्र के भीतर एक समानांतर ब्लॉक खड़े करेंगे, तो पी5 देशों के लिए वैश्विक शासन चलाना असंभव हो जाएगा।

वीटो रहित स्थायी सदस्यता का अंतरिम विकल्प स्वीकार करना

यदि चीन के वीटो के कारण पूर्ण अधिकारों के साथ स्थायी सीट मिलना नामुमकिन है, तो भारत को ‘बिना वीटो पावर की स्थायी सदस्यता’ या ‘लंबे कार्यकाल वाली नवीकरणीय सीटों’ (लॉन्ग-टर्म रिन्यूएबल सीट्स) के प्रस्ताव का समर्थन कर देना चाहिए। एक बार जब भारत सुरक्षा परिषद के भीतर स्थायी रूप से प्रवेश कर जाएगा, तो उसकी वैश्विक स्वीकार्यता इतनी बढ़ जाएगी कि आने वाले दशकों में वीटो का अधिकार भी स्वतः मिल जाएगा।

बहुपक्षीय मंचों से यूएन को अप्रासंगिक बनाना

यदि संयुक्त राष्ट्र भारत को उसका हक नहीं दे सकता, तो भारत को संयुक्त राष्ट्र को ही कमजोर करने की रणनीति अपनानी चाहिए। भारत को ब्रिक्स और जी-20 जैसे वैकल्पिक मंचों को इतना शक्तिशाली बना देना चाहिए कि दुनिया के बड़े फैसले सुरक्षा परिषद के बजाय इन मंचों पर होने लगें। जब चीन और अन्य पी5 देशों को लगेगा कि यूएनएससी अपनी ताकत खो रहा है, तब वे भारत को रोकने की जिद छोड़ सकते हैं।

वस्‍तुत: यहां कहना यही है कि कभी भारत सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य नहीं बनेगा का मतलब सीधा एवं साफ है, वह यही है कि भले ही किसी को ऐसा कहना निराशाजनक लगे, किंतु यह आज की निर्दयी वैश्विक राजनीति का सबसे बड़ा सच है। 1945 में महाशक्तियों ने जो वीटो का चक्रव्यूह रचा था, उसकी चाबी आज चीन जैसे देशों के हाथों में सुरक्षित है। भारत आज एक ऐसी वैश्विक शक्ति है जिसे किसी बैज या सुरक्षा परिषद की मुहर की जरूरत नहीं है। भारत को अब सुरक्षा परिषद की सदस्यता की तरफ टकटकी लगाकर देखने के बजाय, विश्‍व की अर्थव्यवस्था और सैन्य शक्ति पर अपना ऐसा नियंत्रण स्थापित करने पर ध्‍यान केंद्रित करना चाहिए जोकि संयुक्त राष्ट्र को खुद घुटनों के बल चलकर भारत को शामिल करने की भीख मांगने पर मजबूर कर सके।

Nationalist Authors Need Intellectuals, Not Just Politicians

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Sushant Jha

Delhi : A friend has raised a good question on social media: When RSS-BJP minded authors write a book and a launch is scheduled ; mostly politicians are made the chief guest! Intellectuals are sidelined. Even contributors or editors of the books are not invited on the dais. Sometimes it is a compulsion if the politician or minister is your department head but otherwise it should not be the norm. While so called secular launches are well organised. They rarely invite Netas or even if they do, that Neta has some relation with the subject.

These days writing a book on the subject close to the RSS-BJP ideology is a passport to reach out to the powers that matter—maybe you get some appointment or assignment in the future. Every third worker at the BJP headquarters is a mobile author these days!
One reason maybe the dearth of the intellectual firepower and availability of scholars in the nationalistic camp but available intellectuals are also not being reached out. Maybe, BJP authors are new in the game and don’t want to loose their time with the intellectuals who don’t have financially established empire, trusts or foundations. Better, they directly reach out to Netas. On the other hand, Seculars have good networks of rich trusts, foundations and awards. They don’t need Netas. Their intellectuals are almost a parallel power centers.
Anyway, the current nationalistic regime would do good to promote an intellectual battery that can stand and counter the liberal secular narrative. That will also discourage their start up authors to not to do Ganesh Parikrama of the  politicians.
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