चुनाव आयोग के विरुद्ध अभियान, लोकतंत्र के विरुद्ध षड्यंत्र है

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दिल्ली । सात राज्यों के आगामी विधानसभा चुनावों तथा केंद्र सरकार द्वारा एक देश – एक चुनाव तथा परिसीमन की तैयारियों के मध्य संपूर्ण विपक्ष चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के विरुद्ध लामबंद होकर उग्र रूप से हमलावर है। चुनाव आयुक्तों के मध्य एसआईआर व अन्य मुद्दों पर विगत 10 माह में लिए गए निर्णयों को लेकर उनमें परस्पर मतभेद को लेकर इंयिन एक्सप्रेस अंग्रेजी समाचार पत्र में एक रिपेार्ट प्रकाशित हुई। रिपोर्ट के अनुसार चुनाव आयोग में 10 महीने में 14 बार दो चुनाव आयुक्तों ने ज्ञानेश कुमार को असहमति का पत्र लिखा, बस इसी असहमति को विवाद का नाम देकर इंडी ब्लॉक के दल इतना आगे बढ़ चुके हैं कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ महाभियोग लाने के लिए तैयार हैं। विरोध का पागलपन यहाँ तक बढ़ गया है कि कुछ लोग उन्हें फांसी देने तथा गोली तक मारने के बयान दे रहे हैं। इंडी ब्लॉक के दल यह भी मांग कर रहे हैं कि मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाकर एसआईआर प्रक्रिया को रद्द किया जाए और दोबारा चुनाव कराये जाएं। इस विवाद में आप की प्रॉक्सी सहयोगी सीजेपी भी कूद पड़ी है और जंतर-मंतर 2.0 की धमकी दे रही है।

कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने अपनी पत्रकार वार्ता मे एक पोस्टर चिपकाया, जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर गृहमंत्री अमित शाह, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सर संघचालक डॉ. मोहन भागवत, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल सहित उद्योगपति गौतम अडानी की भी तस्वीरे थी। राहुल गांधी ने इन सभी को ग़द्दार कहा है। अब तक 94 चुनाव हार चुके राहुल गांधी को कहना है कि वह चुनाव हारे नही उन्हें साजिश के तहत हराया जाता रहा। राहुल गांधी व विपक्ष का आरोप है कि 2024 के चुनावों के बाद हरियाणा, दिल्ली और महाराष्ट्र के चुनावों मे वोट चोरी हुईं जबकि कि बिहार और बंगाल में एसआईआर के माध्यम से विपक्ष को चुनाव हरवा दिया गया। कांग्रेस पार्टी ने चुनाव आयोग के खिलाफ देशभर में प्रदर्शन किए हैं। पूरा विवाद सुप्रीम कोर्ट की दहलीज पर भी पहुंच गया है और बॉम्बे हाईकोर्ट में भी याचिका दायर कर दी गई है।
वर्ष 2014 से लेकर अभी राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस ने लगभग हर चुनाव में पराजय का मुंह देखा है। 2024 के बाद हुए चुनावों हरियाणा, दिल्ली, बिहार और महाराष्ट्र में भी कांग्रेस और इंडी गठबंधन का लगभग सफाया हो गया। बिहार से आरम्भ हुए एसआईआर के खिलाफ राहुल तथा तेजस्वी ने यात्रा भी निकाली थी किंतु बिहार की जनता ने विपक्ष को स्पष्ट रूप से हरा दिया था। तब से राहुल गांधी बार बार यह मुद्दा उठाकर देश में संशय और अराजकता का वातावरण बना रहे हैं।
इंडियन एक्सप्रेस समाचार पत्र लगातार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व व केंद्र सरकार के खिलाफ तथ्यहीन समाचार प्रकाशित कर रहा है। चुनाव आयोग में मतभेद को लेकर प्रकाशित समाचार उसी अभियान का एक अंग है। इससे पूर्व इस अखबार ने एथेनॉल को लेकर झूठी खबरें प्रकाशित की थी।
इस बीच चुनाव आयोग ने कहा है कि वह एक बहु सदस्यीय संवैधानिक निकाय है। लिखित नोट्स, सुझाव, तकनीकी राय ओैर आंतरिक मतभेद उसकी सामान्य कार्यशैली का हिस्सा हैं। भिन्न मत और अवलोकन किसी भी संस्था में विचार विमर्श का हिस्सा होते हैं किन्तु अंतिम निर्णय पूरे आयोग की सर्वसम्मत या बहुमत से लिए जाते हैं। चुनाव आयोग ने व्यापक रूप से बता दिया है कि सभी फैसले वैधानिक प्रक्रियाओं और सर्वसम्मति के अंतर्गत ही हुए हैं। लोकतंत्र में किसी भी संस्था में आतंरिक मतभेद होना स्वाभाविक ही है किन्तु उन मतभेदों को आधार बनाकर जिस प्रकार की राजनीति की जा रही और जिस शब्दावली का प्रयोग किया जा रहा है जैसे कि फांसी दो, गोली मार दो, सड़क पर घसीटकर पटक कर मारो आदि यह न केवल असंवैधानिक वरन आपराधिक कृत्य है।
राहुल गांधी आजकल एंटी इनकंबेंसी पर भी अपने विचार व्यक्त कर रहे हैं कि सभी प्रधानमंत्रियों और राज्य मुख्यमंत्रियों के खिलाफ एंटी इनकंबेंसी का दौर आया किंतु यह दौर बीजेपी के लिए क्यों नहीं आ रहा? इस बात को वो वोट चोरी से जोड़कर भाजपा पर वोट चोरी का आरोप लगा रहे हैं साथ ही वह यह भी आरोप लगा रहे हैं कि सभी संस्थाओं पर भाजपा व संघ का नियंत्रण हो गया। सत्ता में आने के लिए बेचैन कांग्रेस पार्टी ने तमिलनाडु विधानसभा चुनाव -2026 में जिस त्वरित गति से अपने पुराने सहयोगी द्रमुक का साथ छोड़ा और उसकी बिना अनुमति लिए थलपति विजय की सरकारी में सहयोगी बन गई उसमें कांग्रेस की अवसरवादिता को सभी ने देखा है।
भारतीय जनता पार्टी ने भी कमर कस ली है और विपक्ष को तथ्यों के साथ उत्तर दे रही है। कांग्रेस के शासनकाल में चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति और कांग्रेस से उनकी नजदीकियों को लेकर सदा सवाल उठते रहे हैं। कांग्रेस को उन पुराने सवालों का उत्तर तो देना ही पडे़गा। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट चुनाव आयुक्तों के मध्य मतभेद की खबरों को ही उजागर कर रही है और केवल मतभेदों को ही वोट चोरी का सबूत नहीं माना जा सकता है।
भारत में अभी तक कुल 25 चुनाव आयुक्त नियुक्त हुए हैं और अधिकांश चुनाव आयुक्तों का कांग्रेस के प्रति लगाव रहा है। कई चुनाव आयुक्त बाद में कांग्रेस द्वारा राज्यसभा सांसद और मंत्री तक बनाए गए। इनमें सबसे चर्चित नाम टी. एन. शेषन का रहा। चुनाव आयोग में दो आयुक्तों की नियुक्ति भी उन्हीं के समय में प्रारंभ हुई थी । तब कहा गया था कि टी. एन. शेषन तानाशाह थे। शेषन ने डॉ. एम.एस. गिल तथा जी वी जी कृष्णमूर्ति की नियुक्ति का कड़ा विरोध किया था और सुप्रीम कोर्ट तक चले गए गये थे । शेषन का कहना था कि सरकार ने उनकी शक्तियों को कमजोर करने के लिए ही दो आयुक्तों की नियुक्ति की है। सुप्रीम कोर्ट ने उनकी याचिका को खारिज करते हुए कहा था कि चुनाव आयोग बहुमत के आधार पर ही चलेगा। बाद में वही टी एन शेषन कांग्रेस में शामिल हो गए थे और गांधीनगर से लालकृष्ण आडवाणी के खिलाफ चुनाव भी लड़े थे। चुनाव आयुक्त नवीन चावला के लिए स्वयं सोनिया गांधी अड़ गई थीं । बाद में एम. एस. गिल भी कांग्रेस में शामिल हो गए थे, वह दो बार राज्यसभा में गए और कैबिनेट मंत्री भी बने। जहाँ तक ज्ञानेश कुमार जी की बात है तो तो 2014, 2019 और 2024 के चुनावों के समय वह चुनाव आयुक्त नहीं थे और उस समय भी भाजपा लगातार चुनाव जीत रही थी।
कांग्रेस व इंडी गठबंधन के लिए सबसे बड़ी समस्या यह है कि आज देश के सभी चुनाव हिंसा रहित हो रहे हैं और दोबारा मतदान की आवश्यकता नहीं पड़ रही है। एक समय था जब बैलेट बॉक्स लूट लिए जाते थे और मतगणना केन्द्रों से विरोधी दलों के कार्यकर्ताओं का भगा दिया जाता था। कांग्रेस व इंडी गठबंधन के दल किस प्रकार सत्ता का दुरुपयोग कर चुनाव जीतते रहे हैं यह किसी से छुपा नहीं है और न ही जनता इसको भूली है। ऐसे लोग आज ज्ञानेश कुमार पर संदेह व्यक्त कर रहे हैं।
आज जम्मू कश्मीर से लेकर मणिपुर और बंगाल तक भारी मतदान होता है और निष्पक्ष चुनाव होते हैं। एसआईआर के माध्यम से मतदाता सूचियों का शुद्वीकरण हो रहा है। वस्तुतः चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार तो बहाना है जिसकी आड़ में विपक्षी दल बांग्लादेशी व रोहिंग्या घुसपैठियों का समर्थन कर रहे हैं। विपक्षी दलों का यह अभियान देश विरोधी षड्यंत्र है जिसका खुलासा होना चाहिए। भारत का विपक्ष भारत को बांग्लादेश, श्रीलंका और नेपाल बनाना चाहता और चुनाव आयोग के विरुद्ध अभियान उसी का एक हिस्सा मात्र है।

भारत चल पड़ा है नई औद्योगिक क्रांति के पथ पर 

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ग्वालियर : भारत में आज एक नई औद्योगिक क्रांति प्रारम्भ हो चुकी है, यह विचार अमेरिका की एक जानी मानी निवेश बैंक – जेफ्रीज ने व्यक्त किये हैं। भारत में, विशेष रूप से डाटा केंद्र स्थापित करने के उद्देश्य से करोड़ों अमेरिकी डॉलर का निवेश होता हुआ दिखाई दे रहा है। भारत में डाटा केंद्र स्थापित करने पर केंद्र सरकार की ओर से टैक्स में भारी भरकम छूट भी प्रदान की जा रही है। अतः भारत में डाटा केंद्र स्थापित करने की तो जैसे होड़ सी मच गई है। पिछले 5 वर्षों के दौरान भारत में डाटा केंद्रों की क्षमता दोगुनी हो चुकी है एवं आगे आने वाले 5 वर्षों के दौरान यह क्षमता बढ़कर 10 GW हो जाने की सम्भावना व्यक्त की जा रही है। वैश्विक स्तर पर डाटा केंद्र अब एक महत्वपूर्ण क्षेत्र के रूप में उभर रहा है।

साथ ही, भारत में सेमीकंडक्टर उत्पादन इकाईयों को उत्पादन आधारित प्रोत्साहन योजना के अंतर्गत लाभ प्रदान किया जा रहा है, इसके लिए 1,300 करोड़ अमेरिकी डॉलर की राशि निर्धारित की गई है। इसका परिणाम यह है कि सेमीकंडक्टर के क्षेत्र में विनिर्माण इकाईयों की स्थापना हेतु भारत में 2,000 करोड़ अमेरिकी डॉलर का निवेश किया जा चुका है, और यह आगे भी जारी हैं।

भारत आज उन चुनिंदा देशों में से एक है, जिनके पास स्पेस क्षेत्र से सम्बंधित नवीनतम तकनीकी उपलब्ध है। भारत में स्पेस क्षेत्र की अर्थव्यवस्था वर्ष 2030 तक 5 गुना तक बढ़ सकती है। वैश्विक स्तर पर एयरो स्पेस के क्षेत्र में मांग एवं आपूर्ति में असंतुलन के चलते भारत लाभ की स्थिति में पहुंच गया है क्योंकि कम लागत और कुशल इंजीनीयरिंग टैलेंट आज भारत में ही सम्भव है।

इलेक्ट्रॉनिक्स के क्षेत्र में भारत आज केवल पुर्जों को इकट्ठा कर उत्पाद बनाने का कार्य करने तक सीमित नहीं है बल्कि इस क्षेत्र में उच्चस्तरीय उत्पादों का निर्माण भी करने लगा है। 6 वर्षों में मोबाइल कम्पोनेंट में घरेलू वैल्यू एडीशन लगभग 20 प्रतिशत से बढ़कर 50 प्रतिशत तक होने की सम्भावना व्यक्त की जा रही है।

सोलर के क्षेत्र में भारत आज वैश्विक स्तर पर दूसरा सबसे बड़ा सोलर पीवी का उत्पादक देश बन गया है। इसका परिणाम यह है कि वर्तमान में भारत की 35 GW की सोलर क्षमता चालू है एवं 100 GW की क्षमता पर निर्माण कार्य चालू है।

एशिया की सबसे बड़ी 100 कम्पनियों की सूची में आज भारत की 34 कम्पनियां शामिल हो चुकी हैं। कुल मिलाकर, पूर्व में भारत केवल फार्मा, टेक्स्टायल, चमड़ा उत्पाद, कृषि उत्पाद (मसाला, आदि) स्टील, ऑटोमोबील एवं सूचना प्रौद्योगिकी जैसे क्षेत्रों में ही वैश्विक स्तर पर उक्त उत्पादों का निर्यात करने में सफल हो रहा था परंतु आज स्थितियां बदल गई हैं एवं अन्य महत्वपूर्ण क्षेत्रों जैसे डाटा केंद्र, सेमीकंडक्टर उत्पादन, स्पेस क्षेत्र, इलेक्ट्रॉनिक्स क्षेत्र, सोलर क्षेत्र, सुरक्षा क्षेत्र में भी वैश्विक स्तर पर भारत तेजी से आगे बढ़ रहा है।

भारत में उपलब्ध टैलेंट एवं श्रम के भरोसे विश्व की कई बड़ी कम्पनियों के बीच आज भारत में विशाल वैश्विक योग्यता केंद्रों (जीसीसी) की स्थापना करने की होड़ सी लग गई है। ब्रिटेन में फार्मा के क्षेत्र में कार्य करने वाली कम्पनी – एस्ट्रा जेनेका ने चेन्नई में एक विशाल वैश्विक योग्यता केंद्र की स्थापना की है। बैंक ओफ अमेरिका ने अपना सबसे बड़ा बैक ऑफिस कार्यालय पुणे में स्थापित किया है, इस बैंक के पूरे विश्व में बैक ऑफिस में कार्य कर रहे 11,000 कर्मचारी इस केंद्र का ब्रेन बन गए हैं। अमेरिका के सबसे पुराने वित्तीय संस्थानों में से एक बैंक ओफ न्यूयॉर्क, मेलोन ने पुणे एवं चेन्नई में वैश्विक योग्यता केंद्रों की स्थापना की है। आरटीफिशीयल इंटेलिजेन्स के क्षेत्र में कार्य करने वाली बोस्टन की एक कम्पनी ने फरवरी 2026 में हैदराबाद में विशाल स्तर पर अपने एक अंतरराष्ट्रीय कार्यालय की स्थापना की है।

बेंगलुरु, हैदराबाद, चेन्नई एवं पुणे में आज 1,700 से अधिक वैश्विक योग्यता केंद्र स्थापित किए जा चुके हैं, इन केंद्रों में 19 लाख से अधिक कर्मचारी कार्यरत हैं। भारत आज आउटसोर्सिंग हब से आगे बढ़कर उच्च स्तरीय टैलेंट केंद्र के रूप में स्थापित हो रहा है। भारत में स्थापित किए गए कुल वैश्विक योग्यता केंद्रों में से लगभग 65 प्रतिशत केंद्र अमेरिकी कम्पनियों द्वारा स्थापित किए गए हैं। इन कम्पनियों द्वारा विभिन्न क्षेत्रों में की जा रही रीसर्च का कार्य इन केंद्रों पर सम्पन्न हो रहा है एवं टेक्नॉलजी के क्षेत्र में नए नए उत्पादों का निर्माण भी इन्हीं केंद्रों में किया जा रहा है। स्वास्थ्य के क्षेत्र में कार्य कर रही अमेरिका की ही एक कम्पनी ट्रूब्रिज ने भी फरवरी 2026 में मुंबई में वैश्विक योग्यता केंद्र की स्थापना की है, इस केंद्र को आगे आने वाले समय में और अधिक विस्तार दिया जाने वाला है। इसी प्रकार, बीमा, बैंकिंग, स्वास्थ्य, साइबर सिक्युरिटी, फार्मा एवं सुरक्षा के क्षेत्रों में कार्यरत अनेक कंपनियां भारत में अपने वैश्विक योग्यता केंद्रों की स्थापना कर रही हैं।

पूर्व में, अमेरिका एवं अन्य विकसित देशों को भारत से ब्रेन ड्रेन हो रहा था, परंतु अब परिस्थितियां तेजी से बदल रही हैं एवं अब विशेष रूप से अमेरिका से भारत को रिवर्स ब्रैन ड्रेन होने लगा है क्योंकि ट्रम्प प्रशासन की नीतियों के चलते अन्य देशों से अमेरिका में जाने वाले टैलेंट का अमेरिका में रहना अब मुश्किल हो रहा है। अमेरिका एवं अन्य यूरोपीयन देशों में पूंजीवाद एवं साम्यवाद की नीतियों के चलते इन देशों में जन्म दर भी लगातार कम हो रही है। इन देशों में समाज में प्रत्येक व्यक्ति केवल अपने आप पर ध्यान केंद्रित किए हुए है। विवाह जैसी अति पवित्र संस्था को पश्चिमी देशों ने केवल मौज मस्ती का माध्यम बना दिया गया है। केवल कामुकता के लिए विवाह नहीं किया जाता है जबकि यह एक सामाजिक जिम्मेदारी है। भारतीय दर्शन में अपने कुल को आगे बढ़ाने के लिए विवाह को एक पवित्र संस्था माना गया है। जबकि, पश्चिमी देशों में आज विवाह को आवश्यक ही नहीं माना जा रहा है बल्कि वहां के नागरिक लिव इन रिलेशनशिप में भी रहने लगे हैं। इन देशों में तलाक की दर में अतुलनीय वृद्धि दर्ज हो रही है। इन देशों में सामान्य जीवन यापन की लागत बहुत अधिक महंगी हो रही है। साथ ही, पश्चिमी दर्शन में पुनर्जन्म में विश्वास नहीं किया जाता है, जो कुछ भी भोगना है केवल इसी जन्म में सम्पन्न करना है। अतः इन देशों में अपनी पीढ़ी को आगे बढ़ाने के लिए बच्चे पैदा करना आवश्यक नहीं समझा जा रहा है। इन देशों में समाज की जीवन शैली ही इस प्रकार की बन गई है कि केवल अपने आप पर ध्यान केंद्रित करें एवं अपनी काया को किसी प्रकार का कष्ट नहीं होना चाहिए, परिवार पर एवं समाज पर किसी नागरिक का ध्यान बहुत कम है। पश्चिमी देशों में नागरिक, “मैं और केवल मैं” किस प्रकार अधिक से अधिक सुखी रह सकता हूं, इस विषय पर अपना पूरा ध्यान केंद्रित किए हुए हैं। यह विशेषताएं पूंजीवाद एवं साम्यवाद पर आधारित अर्थव्यवस्थाओं में बहुत मुखर रूप से उभर का सामने आती है। बच्चे पैदा करने का निर्णय भी बचत एवं खर्च की दृष्टि को सामने रखकर लिया जा रहा है। चूंकि मैं अपने बच्चे पर होने वाले खर्च को वहन नहीं कर सकता हूं अतः मुझे बच्चे पैदा ही नहीं करना है। पश्चिमी देशों में सामान्य परिवार चलाने की लागतें बढ़ती जा रही है अतः परिवार में “डबल इनकम नो किड्ज़” (डिंक) का विचार भी जोर पकड़ता जा रहा है। इन देशों में पूंजीवाद एवं साम्यवाद पर आधारित आर्थिक नीतियों ने नागरिकों को दिमागी तौर पर दिवालिया बना दिया है। इन देशों में नागरिकों का पूरा ध्यान केवल भौतिकवादी विकास पर ही केंद्रित हो गया है। परिवार एवं समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी का एहसास समाप्त सा हो गया है।

आज पश्चिमी देशों के नागरिक, विशेष रूप से प्रौढ़ नागरिक, जीवन के अपने अंतिम पलों को सहज बनाने के उद्देश्य से भारत में शिफ्ट हो रहे हैं। भारत की अध्यात्म नगरी ऋषिकेश, हरिद्वार, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड आदि स्थानों पर विकसित देशों के नागरिकों की जैसे बाढ़ सी आ गई है। कुछ देशों के नागरिक गोवा जैसे राज्यों में भी आकर बस रहे हैं। क्योंकि, भारत के इन स्थलों पर उन्हें मानसिक शांति प्राप्त हो रही है। पहिले तो ये विदेशी नागरिक योगा एवं आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करने के उद्देश्य से भारत आते हैं परंतु यहां आने के उपरांत उन्हें जो आत्मिक शांति प्राप्त होती है, उसके चलते ये लोग भारत में ही बस जाते हैं।

जातीय तराजुओं में विखण्डन का षड्यन्त्र..!

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कृष्णमुरारी त्रिपाठी अटल

दिल्ली । वर्तमान समय में देश-समाज में एक विकृतिपूर्ण चलन हमारी सभ्यता, संस्कृति और सामाजिकता को ग्रसने के लिए अपने उफान पर देखने को मिल रहा है। इसके भविष्यगत संकट को जाने-पहचाने, सोचे-समझे बिना समूचा समाज उसे प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तरीके से बढ़ावा दे रहा है। आजकल महापुरुषों, ईश्वरीय अवतारों—सबकी जाति देखी जाने लगी है। उन्हें जातियों से नत्थी किया जाने लगा है। और विध्वंसक समूह अपनी-अपनी जाति व समुदाय के आधार पर महापुरुषों और भगवानों का बँटवारा कर, उन्हें सर्वश्रेष्ठ बताने में जुटे हुए हैं।

जहाँ इन सबके पीछे एक ओर दूषित और घृणित राजनीति दिख रही है, जो अपने वोट बैंक के लिए समाज को किसी भी स्तर तक बाँटकर अपना राजनीतिक वर्चस्व स्थापित करना चाहती है, तो दूसरी ओर भारत की महान संस्कृति को खण्डित करने का षड्यन्त्र भी प्रतीत हो रहा है।

अचानक से ही एक नई तरह की धारा और नए लोगों का प्रादुर्भाव होने लगा है, जो राष्ट्र की सभ्यता एवं संस्कृति के आधारस्तंभ मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम और कृष्ण सहित धार्मिक-पौराणिक ग्रन्थों तथा सनातन संस्कृति के आराध्यों की भी जाति ढूँढ़ने के अभियान में जुटे हैं। आराध्य देवताओं को अपनी जाति का भगवान बताकर मिथ्यादम्भ का परचम लहरा रहे हैं।

ऐसी धारा के लोगों का मानना है कि भगवान राम क्षत्रियों के, भगवान कृष्ण अहीरों के, भगवान परशुराम ब्राह्मणों के, भगवान चित्रगुप्त कायस्थों-बनियों के, भगवान विश्वकर्मा लुहारों-बढ़इयों के हैं और ऐसा ही वे समस्त देवी-देवताओं को लेकर अपनी-अपनी धारणाएँ बनाते हैं। देवी-देवताओं को अपनी-अपनी जाति या वर्ग का बताने व स्थापित करने की ख़तरनाक मुहिम चल रही है। जिन आराध्य देवताओं को समूचा समाज अपनी संस्कृति का मूल मानकर पूजता था। अब उन्हें जातीय खाँचे में ढालकर अपनी-अपनी जाति के अहं के रूप में प्रदर्शित करने का घोर पाप किया जाने लगा है।

समाज में यह चलन कहाँ से और कैसे आया? इसका किसी को भी अता-पता नहीं है। लेकिन सब अपने-अपने आपको सर्वेसर्वा व वर्चस्ववादी दिखाने के प्रयास में अपनी पूरी संस्कृति के विरोध में खड़े होते दिखाई दे रहे हैं।

यहाँ तक तो बात ठीक मानी जाती है कि आप उनका पूजन करिए। उनके अवतरण पर्व में हर्षोल्लास मनाइए; किन्तु जब इसके इतर अपने अहं को सिद्ध करने के प्रयास में परस्पर आराध्य देवी-देवताओं को एक-दूसरे के विरुद्ध व श्रेष्ठ दिखाने का पाखण्ड किया जाता है । उन्हें जाति के तराजुओं में देखा व तौला जाता है, तब इसे किसी भी दृष्टिकोण से सही नहीं माना जाना चाहिए।

लेकिन समाज के बीच से इन विकृतियों के विरोध में आवाज़ का न उठना भी समाज के सुप्त पड़े होने और पतनोन्मुखी होने की ओर संकेत कर रहा है। समाज को इस विषय पर गम्भीर विचार-विमर्श ही नहीं, अपितु अचानक बन रही इस बीमारी को जड़ से ख़त्म करने का साहस दिखाना पड़ेगा।

इतना ही नहीं, षड्यन्त्र के तहत समूचे देश में महापुरुषों, स्वतन्त्रता सेनानियों, चिन्तकों-विचारकों को भी जातीय अस्मिता से जोड़कर उन्हें सिर्फ अपनी जाति का महापुरुष या महान नेता बताने-सिद्ध करने का अभियान भी जोरों-शोरों से चल रहा है। जबकि कोई भी महापुरुष किसी जाति, समुदाय या वर्ग विशेष का नहीं होता। यह अलग बात है कि किसका जन्म किस जाति, समुदाय या वर्ग में हुआ।

हाँ, इसके लिए अवश्य गर्व करना चाहिए। लेकिन जिन महापुरुषों, वीर पुरोधाओं ने समूचे राष्ट्र के लिए अपने महान व्यक्तित्व एवं कृतित्व से अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत किए। यदि उन्हें सिर्फ अपनी जाति, वर्ग या समुदाय से जोड़कर दिखाने का कार्य किया जाता है तो यह उनका घोर अपमान है। यह संकीर्ण सोच की मदान्धता व उच्छृंखलता के अलावा और कुछ नहीं है।

देखिए, यह कितनी घृणित बात है कि – महात्मा गांधी, राजेन्द्र बाबू, लालबहादुर शास्त्री जी को बनिया तो सरदार वल्लभभाई पटेल को कुर्मी, पाटीदार या पटेल; चन्द्रशेखर आजाद, मंगल पाण्डेय को ब्राह्मण या इन सभी को सवर्ण घोषित करना। वहीं इनके बरक्स बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर को दलितों की जाति से जोड़ना। ऐसे ही महात्मा बुद्ध, महावीर स्वामी, दशम गुरुओं सहित भारतवर्ष के सभी महान आदर्शों के ऊपर अब जातीय विमर्श होने शुरू हो गए हैं।

सन्त रविदास को चर्मकार, महर्षि वाल्मीकि को वाल्मीकि, गोस्वामी तुलसीदास, आचार्य चाणक्य इत्यादि को ब्राह्मणों का शिरोमणि घोषित किया जा रहा है। तो वहीं महाराणा प्रताप, राजा भोज सहित अनेकानेक क्षत्रिय वीरों को केवल क्षत्रियों का महानायक बताने की मुहिम भी चल रही है।

इससे बिल्कुल भी इनकार नहीं किया जा सकता है कि जाति सत्य नहीं है। भारत की सनातनी व्यवस्था की प्रत्येक जाति मूलतः ऋषि-महर्षियों की सन्तानें हैं। प्रत्येक व्यक्ति का जन्म किसी न किसी कुल, वंश, जाति में अवश्य होता है। किन्तु जब वह व्यक्ति अपने कृतित्व से इतना बड़ा बन जाता है कि उसे समूचा देश अपना आदर्श-पथप्रदर्शक मानने लगता है, तब वह केवल अपने घर-परिवार, गाँव-समाज, जाति, धर्म या विशेष समाज का नहीं, अपितु वह सामाजिक जीवन की राष्ट्रीय पूँजी या विरासत बन जाता है।

ऐसे में उन्हें किसी भी संकीर्ण दायरे में खींचकर लाने या अपने क्षुद्र स्वार्थों, राजनीतिक अभिमान को तुष्ट या पुष्ट करने का यत्न-प्रयत्न करना सभ्य समाज के लिए किसी भी तरह से सही नहीं है।

इन उदाहरणों को प्रस्तुत करने के पीछे का मन्तव्य यह है कि समाज का पतन या सोचने का दायरा कितने निचले स्तर तक आता जा रहा है? जहाँ सन्तों-महापुरुषों, क्रान्तिकारियों, स्वातन्त्र्य सेनानियों, ऋषि-महर्षियों की जाति को खोदकर उन्हें अपने जातीय स्वाभिमान से जोड़कर केवल अपनी जाति-वर्ग या सम्प्रदाय के घेरे में प्रस्तुत कर, गर्व के मारे लोग फूले नहीं समा रहे हैं।

किसी के भी अवदान को अपने-अपने पैमाने से सिर्फ इसलिए स्वीकार या अस्वीकार कर देना कि फलाँ महापुरुष दूसरी जाति का है, इसलिए उसे स्वीकार नहीं किया जाएगा? वहीं किसी महापुरुष का सिर्फ इसलिए अभिनन्दन-महिमामण्डन करना कि उसे हमने अपनी जाति से नत्थी कर लिया है ; इसी आधार पर उनके अवदानों को कम या अधिक आँकने की दुष्प्रवृत्ति का चलन भी चल रहा है।

ऐसे विचार महापुरुषों व राष्ट्र के आदर्शों का अपमान तो हैं ही, साथ-साथ यह प्रवृत्ति राष्ट्रीयता के लिए घातक व विखण्डनकारी वातावरण को तैयार करने की मंशा लेकर समाज को अपना ग्रास बनाने की ओर उद्यत है। यह सब हमारी संस्कृति पर आक्रमण के प्रयोग हैं, जो धीरे-धीरे समाज में विषाक्तता उत्पन्न कर रहे हैं।

ऐसा करने वाले राष्ट्र-समाज की विविधता में एकता की अद्वितीय समरसता को कहाँ ले जाकर डुबाना चाहते हैं? जब राष्ट्र के आदर्शों, महापुरुषों का जातीय आधार पर आकलन और उसी आधार पर उन्हें आदर्श मानने या न मानने, या किसी को सशक्त-महान तो किसी को छोटा बताने-सिद्ध करने का अभियान चलाया जाएगा, तब राष्ट्र किस ओर जाएगा?

जरा सोचिए, जब हमारे पास दिशाबोध के लिए संस्कृति के ये तत्व, विरासत, महापुरुष नहीं होंगे, तब हम किस ओर जाएँगे?

स्वामी विवेकानन्द कहते थे कि—“हमारी इस पवित्र भूमि का मेरुदण्ड, मूलभित्ति या जीवन-केन्द्र एक मात्र धर्म ही है।”

और फिर वे चेतावनी देते हुए एक स्थान पर यह भी कहते हैं—“यदि कोई राष्ट्र अपनी स्वाभाविक जीवनी-शक्ति को दूर करने का प्रयास करे—शताब्दियों से जिस दिशा की ओर उसकी विशेष गति हुई है, उससे मुड़ जाने का प्रयत्न करे—और यदि वह इसमें सफल हो जाए, तो वह राष्ट्र मर जाता है। अतः यदि तुम धर्म को फेंककर राजनीति, समाज-नीति या किसी अन्य नीति को अपनी जीवन-शक्ति का केन्द्र बनाने में सफल हो जाओ, तो इसके फलस्वरूप तुम्हारा अस्तित्व तक मिट जाएगा।”

हम स्वामी विवेकानन्द की चेतावनी और उनके उपदेशों के आलोक में जब विचार करते हैं, तो क्या इन सब घटनाक्रमों, विमर्शों के पीछे भारत को विखण्डित करने का षड्यन्त्र समझ नहीं आता है?

जब हमारे पास धार्मिकता, संस्कृति, एकता-समरसता की महान विरासत नहीं होगी; जब समाज केवल इस बात को लेकर लड़ता-झगड़ता रहेगा कि मैं श्रेष्ठ—तुम हेय, तब कैसा देश व समाज आगामी पीढ़ी के समक्ष छोड़कर जाएँगे?

क्या अपने-अपने क्षुद्र स्वार्थों के लिए इस तरह के अपराधों को जायज ठहराया जा सकता है? सोचिए, समझिए और इन बिन्दुओं पर कठोरतापूर्वक कार्य करिए। क्योंकि हमारे ईश्वरीय अवतार, आदर्श-राष्ट्रनायक, सन्त-महात्मा, ऋषि-महर्षि, विचारक, स्वातन्त्र्य सेनानी, महान राजनेता किसी के भी जातीय दम्भ का विषय नहीं हैं, बल्कि वे हमारे राष्ट्र की नीति व नियति के पथप्रदर्शक हैं।

The youth should take inspiration from the life of Shri Ashok Singhal Ji: Shri Amit Shah, Union Home Minister

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New Delhi: The Birth Centenary Year of revered Shri Ashok Singhal ji was inaugurated today at a grand ceremony held at Bharat Mandapam, New Delhi, organised by the Vishwa Hindu Parishad (VHP) and the Ashok Singhal Foundation. Union Home Minister Shri Amit Shah, as Chief Guest, led the nation in paying tribute to the visionary leader whose life was devoted to Bharatiya culture, spiritual awakening, the organisation of Hindu society, and the Shri Ram Janmabhoomi movement. The ceremony honoured his inspiring life, far-sighted thought, and unparalleled contribution to the nation and society.

Addressing the houseful of Ram bhakts, Amit Shah, Union Home Minister, said, “Shri Ashok Singhal ji dedicated his life to the nation, society and the preservation of India’s cultural heritage. His contribution to the Ram Janmabhoomi movement and his lifelong commitment to the cause of cultural resurgence will continue to be remembered.

“The Vishva Hindu Parishad and Ashok Singhal Foundation is doing commendable work by commemorating his birth centenary and bringing his life, values and contributions to a wider audience, particularly the youth. These celebrations are an important opportunity for the younger generation to understand the ideals that guided Shri Ashok Singhal ji and draw inspiration from a life devoted to the nation and society. I am confident that this initiative will help carry his legacy and message to generations to come.”

Param Pujya Yugpurush Mahamandaleshwar Swami Paramanand Giri ji Maharaj said, “This is our country, and it is our responsibility to protect all that belongs to it. We must remain vigilant towards our society and our Dharma, continue to work hard, and contribute towards making our nation stronger and more progressive, as was the ideology of Shri Ashok Singhal Ji.”

The ceremony opened with a conch invocation (shankhnaad) and the chanting of Vedic mantras by 100 ritwiks, reflecting Shri Singhal ji’s deep faith in the Vedic tradition, Indian knowledge systems and spiritual consciousness.

A central highlight of the evening was the release of the coffee table book “Maryada Purushottam Shri Ram Ke Divya Padchinh” (The Divine Footprints of Lord Ram), a publication that presents the life-values, ideals and enduring cultural influence of Lord Ram on Indian society. On the occasion, a replica of the ‘Shri Ram Stambh’ was also unveiled and put on display.

On this auspicious occasion, Dattatreya Hosabale, Sarkaryavah, Rashtriya Swayamsevak Sangh, said, “Shri Ashok Singhal ji possessed a rare combination of firmness in conviction and sensitivity towards the suffering of others. Once he took a decision, he remained steadfast and would focus not on whether a task was difficult, but on finding the path to accomplish it. His contribution extended across several spheres, from the work of the Sangh and the Vishwa Hindu Parishad to initiatives concerning India’s cultural heritage, social service and the preservation of our traditions. He was not merely a person who held strong convictions; he had the ability to translate those convictions into organised and sustained action.”

The gathering witnessed the digital launch (lokarpan) of the Shri Ram Stambhs to be installed along the Ram Van-gaman Path in Ayodhya district, an effort to connect the public with the memory of Lord Ram’s journey and the cultural and spiritual sites associated with it. A special exhibition on Shri Singhal ji’s life, spiritual values, organizational work, and role in the Ram Janmabhoomi movement was also presented through photographs, documents, and related material.

“Revered Ashok Singhal ji’s life remains a living source of inspiration for Indian culture, spiritual consciousness and selfless devotion to the nation. This centenary is not merely an occasion to remember him; it is a year of resolve to carry his ideals, his spirit of service and his love for Bharat to the coming generations,” said Shri Alok Kumar, International President, Vishva Hindu Parishad

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