यमुना का रुदन: एक नदी की त्रासदी, एक वादे का विश्वासघात

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आगरा के मौनी और बहरे जन प्रतिनिधि कब नींद से जागेंगे और सुनेंगे यमुना का करुण क्रंदन? हद दर्जे की बेपरवाही के चलते यह गर्मी का मौसम भी निकल जाएगा, न सफाई होगी, न रिवर फ्रंट योजना पर काम शुरू होगा, न ही नगला प्रेमा में रबर चेक डैम की नींव रखी जा सकेगी। पिछले चार महीनों में पचासों छोटे-बड़े धंधे की जुगाड़ वाले प्रोजेक्ट्स सेक्शन हो गए। मेट्रो का भी कार्य द्रुत गति से चल रहा है, एयरपोर्ट टर्मिनल भी मिल जाएगा, लेकिन पचास वर्षों से लटके यमुना और सहायक नदियों के शुद्धिकरण और संरक्षण के सभी कार्यक्रम फाइल बंद हैं। आगरा की धरोहर यमुना नदी, जो कभी जीवनस्रोत थी, अब तपती गर्मी की धूप में तड़प रही है, एक ठहरी हुई, जहरीली नाली में तब्दील हो चुकी है। लेकिन निर्वाचित नेता खामोश हैं।

एक दशक से अधिक समय पहले, 2014 के चुनावी जोश में आगरा और मथुरा-वृंदावन की सभाओं में, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसके खोए वैभव को लौटाने का वचन दिया था। मगर 2025 में, यह नदी टूटी आशाओं का दुखद स्मारक बनी हुई है। इसके पवित्र जल की जगह अब काला, गंदा कीचड़ बहता है, जो उपेक्षा की बदबू से भरा है। पर्यटक, जो शांत नदी किनारे के सपने लेकर आते हैं, घृणा से मुंह मोड़ लेते हैं। उनके सपने इस बदबूदार हकीकत से चकनाचूर हो जाते हैं। सरकार के बड़े-बड़े दावे खोखले साबित होते हैं। केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने कभी दिल्ली से आगरा तक स्टीमर सेवाओं की बात की थी, लेकिन यमुना की हकीकत ऐसी कल्पनाओं का मजाक उड़ाती है। साल के ज्यादातर समय इसका तल सूखा और बंजर पड़ा रहता है, जहां सपने भी नहीं पनपते। “नावें? एक बूंद पानी मिल जाए तो गनीमत है,” एक स्थानीय कार्यकर्ता तंज कसते हुए कहता है, सूखे तल की ओर इशारा करते हुए। “शायद अब यहां नदी की जगह ऊंट की सवारी का पैकेज, डेजर्ट सफारी के नाम से बेचें।”

प्रगति के सरकारी दावे—40 से ज्यादा नालों को बंद करना, सात सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट का संचालन—जांच के सामने ढह जाते हैं। एत्माद-उद-दौला पार्क के पास भैरों नाला और ताजमहल के खतरनाक रूप से करीब मंटोला नाला अब भी नदी में अशुद्ध गंदगी उगल रहे हैं। “ताज के पास एक कदम चलिए, सच अपने आप सामने आ जाता है,” एक निवासी कहता है। “यमुना मरी नहीं, यह तो जहर का गड्ढा है, जहां कीटाणु भी दम तोड़ देते हैं।”

संकट दोहरा है: पानी की कमी और उसकी गुणवत्ता। मॉनसून की बारिश कुछ हफ्तों के लिए नदी को जीवन देती है, मगर जल्द ही यह फिर सूख जाती है। दिल्ली से जो थोड़ा-बहुत बहकर आता है, वह नदी नहीं—उद्योगों का जहरीला कचरा, भारी धातुएं और अशुद्ध सीवेज का घातक मिश्रण है। यह विषैला प्रवाह बदबूदार गैसें छोड़ता है, आगरा की धरोहरों की नींव को खा जाता है, और नदी का तल बीमारी फैलाने वाले कीड़ों का अड्डा बन जाता है।

ताजमहल देखने आए पर्यटकों के लिए यमुना की दुर्दशा एक झटका देती है। “ऐसा स्मारक इस कचरे के पास कैसे बन सकता है?” एक हैरान पर्यटक नाक दबाते हुए पूछता है। नदी का क्षय सिर्फ आंखों को चुभने वाला नहीं—यह ताज के लिए भी खतरा है। नमी के अभाव में स्मारक की नींव को खतरा है; वहीं, प्रदूषित कीचड़ में पनपने वाले कीड़े इसके संगमरमर पर हरी गंदगी छोड़ते हैं, जिसे बार-बार साफ करना पड़ता है।

तीस साल से कार्यकर्ता ताज के नीचे एक बैराज या चेक डैम की मांग कर रहे हैं ताकि न्यूनतम जल स्तर बना रहे। मगर, सरकारों ने सिर्फ खोखले वादे दिए—कई बार बैराज की नींव रखी गई, और फिर परियोजना को भुला दिया गया। “अब तो वे पत्थर भी गायब हैं।” आजकल नगला पेमा में एक रबर डैम की चर्चा चल रही है, जिसकी आखिरी NOC एक साल से लटकी हुई है। सारे विधायक, सांसद लखनऊ जाकर प्रेशर बनाएं तो एक हफ्ते में क्लियरेंस मिल सकता है। पहले की सरकारें—कांग्रेस की निष्क्रियता, अखिलेश यादव का साइकिल ट्रैक का जुनून, मायावती का ताज हेरिटेज कॉरिडोर का असफल प्रयास—सब यमुना के साथ नाकाम रहीं।

आज, बीजेपी के क्षेत्र में दबदबे (10 विधायक, 2 सांसद) के बावजूद, नदी उनके “विकास” के एजेंडे से गायब है। विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं: अगर तत्काल कदम नहीं उठाए गए, तो यमुना पूरी तरह मर जाएगी, और इसके साथ आगरा का पारिस्थितिकी तंत्र और ताजमहल का भविष्य भी दांव पर लग जाएगा। एक जीवित नदी प्रदूषण को सोख सकती है, धूल को कम कर सकती है, और शहर के स्मारकों की रक्षा कर सकती है, साथ ही पर्यटकों को आकर्षित कर सकती है। मगर, इसकी सड़ी-गली हालत पर्यटकों को भगाती है, निवासियों को बीमार करती है, और पुनर्जनन के हर वादे का मजाक उड़ाती है।

यमुना का संकट अब संभावना का नहीं, इच्छाशक्ति का सवाल है। क्या सत्ता में बैठे लोगों को इसकी फिक्र भी है—या भारत की धरोहर को खोखले वादों की छाया में सड़ने के लिए छोड़ दिया जाएगा?

बॉलीवुड की बत्ती गुल क्यों? कहां गुम हो गई सिल्वर स्क्रीन की वो दीवानगी?

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कभी दिलों पर राज करने वाला बॉलीवुड सिनेमा आज क्यों ढूंढ रहा है अपना खोया हुआ जादू? रचनात्मकता की सूख, सितारों की फीकी चमक और दर्शकों से टूटे कनेक्शन की ये कसक कब थमेगी?

“ये जो मोहब्बत है, ये तो दीवानगी है…” गुलज़ार साहब का ये शेर कभी बॉलीवुड की धड़कन हुआ करता था। पर्दे पर प्यार उमड़ता था, जज़्बात हिलोरें मारते थे, और सिनेमाघरों में एक अलग ही जुनून छाया रहता था। आज? आलम ये है कि “दिल में तू है, लेकिन दूर-सा है…”।

साल 2025 में हिंदी सिनेमा एक अजीब सी खामोशी से घिरा हुआ है – न वो कहानियों का दम है, न सितारों में वो कशिश, और न ही दर्शकों का वो बेइंतहा प्यार। वो सुनहरा दौर कहां चला गया, जब फिल्में महीनों तक सिनेमाघरों में झंडे गाड़ती थीं? ‘शोले’ (1975) सिर्फ एक फिल्म नहीं, एक तूफान था, जिसने पीढ़ियों को अपना दीवाना बनाया। ‘दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे’ (1995) रोमांस का ऐसा जादू था, जिसने युवाओं के दिलों पर बरसों राज किया। ‘लगान’ (2001) सिर्फ एक कहानी नहीं, बल्कि उम्मीद और हौसले का एक ऐसा जज़्बाती जलसा था, जिसमें पूरा देश शरीक हुआ। उन दिनों दर्शक सिनेमाघरों में महीनों जमे रहते थे, हर किरदार को जीते थे, हर गाने को गुनगुनाते थे। अब? ऐसा लगता है जैसे भव्य सेट हैं, महंगे सितारे हैं, तकनीक का कमाल है, पर वो रूह कहीं गुम हो गई है। सब कुछ होते हुए भी, कुछ अधूरा सा है।

हाल के वर्षों की ही बात करें तो ‘आदिपुरुष’ (2023) ने भले ही वीएफएक्स का दम दिखाया, ‘बड़े मियां छोटे मियां’ (2024) में सितारों की चमक थी, लेकिन कमजोर कहानियों और दर्शकों की ऊब ने इन फिल्मों को बॉक्स ऑफिस पर धूल चटा दी। साल 2024 में तो ‘स्त्री 2’ जैसी इक्का-दुक्का फिल्मों ने ही ₹500 करोड़ का आंकड़ा पार किया, जबकि 2000 के दशक में ये एक आम बात थी। क्या वाकई सितारों का सूरज डूब रहा है? ये कैसा मंज़र है, “ये कहां आ गए हम, यूं ही साथ चलते-चलते…”?

एक ज़माना था जब अमिताभ बच्चन का ‘एंग्री यंग मैन’ पर्दे पर उतरता था, तो वो सिर्फ एक किरदार नहीं, बल्कि आपातकाल के दौर की दबी हुई आवाज़ बनता था। शाहरुख खान का ‘राज’ जब बाहें फैलाता था, तो रोमांस का एक नया बादशाह जन्म लेता था। आमिर खान का ‘रंग दे बसंती’ युवाओं की बेचैनी और बदलाव की चाहत की बुलंद आवाज़ थी। आज? सलमान खान की ‘टाइगर 3’ (2023) बॉक्स ऑफिस पर हांफ गई। रणबीर कपूर (‘एनिमल’) और रणवीर सिंह (‘रॉकी और रानी की प्रेम कहानी’) जैसे सितारे दर्शकों को दो खेमों में बांट देते हैं। वो जादू, वो सम्मोहन, जो कभी इन सितारों की पहचान हुआ करता था, अब कहीं खो गया है।

और कहानियों का क्या? “कहानी तो बस एक बहाना है, दिल की जुबां तो देख…” 1950 और 60 के दशक में राज कपूर (‘आवारा’) और गुरु दत्त (‘प्यासा’) ने समाज के हाशिए पर खड़े लोगों की, उम्मीद और संघर्ष की ऐसी कहानियाँ सुनाईं, जो आज भी दिलों को छू जाती हैं। 2000 के दशक में भी ‘रंग दे बसंती’ (2006) ने युवाओं के दिल की धड़कन को पकड़ा था। आज? ‘एनिमल’ (2023) जैसी फिल्में जहरीली मर्दानगी को महिमामंडित करती हैं। नायक अब समाज के लिए नहीं लड़ते, बल्कि अपनी निजी जंग में उलझे हुए हैं। ग्रामीण भारत की वो सच्ची कहानियाँ पर्दे से गायब हो गई हैं, सब कुछ महानगरीय चकाचौंध और बनावटी ग्लैमर में सिमट गया है।

बॉलीवुड का संगीत तो कभी उसकी रूह हुआ करता था। “प्यार हुआ इकरार हुआ” (‘श्री 420’), “तुझे देखा तो ये जाना सनम” (‘दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे’), “कजरा रे” (‘बंटी और बबली’) – ये गाने सिर्फ धुनें नहीं थीं, ये हमारी यादों का हिस्सा थे, हमारी भावनाओं की अभिव्यक्ति थे। आज के गाने? ‘केसरिया’ (‘ब्रह्मास्त्र’) जैसे ट्रैक्स भले ही कुछ समय के लिए वायरल हो जाएं, लेकिन उनमें वो गहराई कहां, वो शायरी कहां, जो साहिर, गुलज़ार, जावेद अख्तर के गीतों में होती थी? तेज़ बीट्स और खोखले लिरिक्स ने संगीत की उस मिठास को छीन लिया है, जो कभी बॉलीवुड की पहचान थी।

और इस बदलते परिदृश्य में ओटीटी प्लेटफॉर्म और दक्षिण भारतीय सिनेमा का बढ़ता दबदबा भी एक बड़ा कारण है। नेटफ्लिक्स (‘सेक्रेड गेम्स’) और अमेज़ॅन प्राइम वीडियो (‘पंचायत’) जैसे प्लेटफॉर्म ने दर्शकों की आदतें बदल दी हैं। अब उन्हें घर बैठे ही बेहतरीन कंटेंट देखने को मिल रहा है। वहीं, दक्षिण की डब की हुई फिल्में (‘पुष्पा’, ‘आरआरआर’) अपनी दमदार कहानियों और ज़बरदस्त एक्शन के दम पर बॉलीवुड को कड़ी टक्कर दे रही हैं, कई बार तो उसे पीछे भी छोड़ रही हैं।

लेकिन क्या उम्मीद की कोई किरण बाकी नहीं? “हार के जीतने वाले को, बाज़ीगर कहते हैं…” अभी भी ’12वीं फेल’ (2023) जैसी फिल्में साबित करती हैं कि अगर कहानी में दम हो, किरदारों में सच्चाई हो, तो दर्शक आज भी सिनेमाघरों का रुख करते हैं और दिल खोलकर प्यार लुटाते हैं। बॉलीवुड को उस दौर की कहानी कहने की कला को फिर से अपनाना होगा, सलीम-जावेद की धारदार स्क्रिप्ट, गुलज़ार की शायरी की गहराई और यश चोपड़ा के रोमांस की जादूगरी को वापस लाना होगा। बॉलीवुड को खुद से लड़ना होगा – सितारों के अहंकार से, खोखले विजुअल्स के दिखावे से और दर्शकों से बढ़ती हुई दूरी के खिलाफ। अगर ऐसा हुआ, तो शायद… “फिर वही रात हो, वही बात हो, वही रौनक़, वही चाहत हो…”

लेकिन कड़वी सच्चाई यही है कि बॉलीवुड, जो कभी भारतीय कहानियों का दिल हुआ करता था, आज रचनात्मकता, प्रासंगिकता और दर्शकों से जुड़ाव के एक गहरे संकट से जूझ रहा है। साल 2025 में हिंदी फिल्म इंडस्ट्री एक धुंधली और निराशाजनक तस्वीर पेश करती है। वो जुबली का दौर तो कब का खत्म हो चुका है। स्टार सिस्टम, जो कभी अमिताभ बच्चन, राजेश खन्ना, धर्मेंद्र, जितेंद्र और फिर शाहरुख खान, आमिर खान जैसे आइकनों से जगमगाता था, अब कमजोर पड़ चुका है। स्क्रिप्ट में औसत दर्जे का काम और दर्शकों की आकांक्षाओं से दूरी बॉलीवुड को महंगी पड़ रही है। 1950 और 60 के दशक में, राज कपूर और गुरु दत्त जैसे दूरदर्शी फिल्म निर्माताओं ने ‘आवारा’ (1951) और ‘प्यासा’ (1957) जैसी फिल्में बनाकर समाज के सपनों और संघर्षों को पर्दे पर उतारा था। 2000 के दशक में भी ‘रंग दे बसंती’ (2006) ने युवा विद्रोह और देशभक्ति की भावना को नई आवाज दी थी। आज, ज़्यादातर स्क्रिप्ट घिसी-पिटी फॉर्मूलों पर टिकी होती हैं – अपराध, हिंसा या बदले की कहानियां। ‘एनिमल’ (2023) जैसी फिल्में जहरीली मर्दानगी और प्रतिशोध को महिमामंडित करती हैं। नायक अब समाज की सेवा करने वाले नहीं रहे। पहले, ‘नया दौर’ (1957) जैसी फिल्में नायकों को बांध या सड़कें बनाते हुए या समुदायों को ऊपर उठाते हुए दिखाती थीं।

इस बीच, अभिनेताओं का सोशल मीडिया पर ज़रूरत से ज़्यादा ध्यान और अभिनय कौशल पर कम ज़ोर देना भी साफ नज़र आता है। दिलीप कुमार जैसे दिग्गजों ने थिएटर के मंच पर अपनी कला को निखारा था, लेकिन कई आधुनिक सितारे सिर्फ़ अपनी चमक-दमक और पीआर पर निर्भर हैं। उच्चारण और संवाद अदायगी, जिसे कभी देव आनंद जैसे सितारों ने एक अलग पहचान दी थी, अब उपेक्षित है। जहां मधुबाला या श्रीदेवी जैसी अभिनेत्रियों ने सुंदरता और प्रतिभा का अद्भुत संतुलन बनाए रखा, वहीं आज की अभिनेत्रियों को अक्सर सिर्फ़ ग्लैमरस भूमिकाओं तक सीमित कर दिया जाता है।

इतना ही नहीं, मल्टीप्लेक्स टिकटों की आसमान छूती कीमतें – अक्सर ₹300 से ₹1000 तक – सिनेमा को आम आदमी की पहुंच से दूर एक विलासिता की चीज़ बना देती हैं। सिंगल-स्क्रीन थिएटर, जो कभी बॉलीवुड की रीढ़ थे, मुंबई और दिल्ली जैसे बड़े शहरों से भी गायब होते जा रहे हैं। 2024 तक पूरे देश में सिर्फ़ 6,000 के करीब ही बचे हैं। यह बदलाव उस आम दर्शक को सिनेमा से दूर कर रहा है, जो कभी ₹50 के टिकट पर भी फिल्में देखने के लिए उमड़ पड़ता था।

और संगीत और कविता? वो तो अब लुप्त होती हुई श्रेणी में आ चुके हैं। बॉलीवुड की आत्मा – उसका संगीत – अपनी मधुरता खो चुका है। ‘मुग़ल-ए-आज़म’ (1960) या ‘हम आपके हैं कौन’ (1994) के गाने आज भी हमारी यादों में ताज़ा हैं, लेकिन आज के गाने, जैसे ‘ब्रह्मास्त्र’ (2022) के, रिलीज़ होते ही भुला दिए जाते हैं। तेज़, इलेक्ट्रॉनिक बीट्स का शोर है, लेकिन साहिर लुधियानवी या गुलज़ार की कविता की गहराई गायब है। गानों और फिल्मों की शेल्फ लाइफ कम हो गई है, और कुछ ही सांस्कृतिक छाप छोड़ पाते हैं। रही सही कसर मोबाइल वॉचिंग एडिक्शन, लत ने खत्म कर दी है।

अपनी पहचान के लिए संघर्षरत आगरा को कब मिलेगा विरासत का ताज?

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आगरा, केवल एक शहर नहीं, बल्कि सदियों की मुहब्बत की जीती-जागती निशानी है। यह वह धरती है जिसने ताजमहल को अपनी गोद में पाला है, जो हिंदुस्तान की मिश्रित संस्कृति की अद्वितीय गाथा कहता है। यहाँ सिर्फ़ एक अजूबा नहीं बसता, बल्कि आगरा किला और फतेहपुर सीकरी जैसे तीन-तीन यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल इसकी ऐतिहासिक गहराई को बयान करते हैं। और इनके अलावा? हेरिटेज रेलवे स्टेशन, अनगिनत प्राचीन इमारतें, शिव मंदिरों की पवित्र श्रृंखला, ऐतिहासिक गुरुद्वारे, ईसाई समुदाय के गिरिजाघर और शांत कब्रिस्तान, राधा स्वामी धर्म का आध्यात्मिक केंद्र, विश्व प्रसिद्ध पैठे की मिठास और मेहनतकश हाथों से तैयार होते जूतों का उद्योग, हुनरमंदों का पच्चीकारी कौशल – इतनी विविधता और विशिष्टता भला किस शहर में एक साथ मिलेगी?

फिर भी, एक प्रश्न दिल में कांटे की तरह चुभता है, एक पीड़ा बनकर उभरता है: आगरा को अब तक “वैश्विक विरासत शहर” की प्रतिष्ठित पहचान क्यों नहीं मिल पाई? क्या हमारी अनमोल धरोहरें इतनी उपेक्षित रहने की हकदार हैं?

आगरा की नैसर्गिक सुंदरता और ऐतिहासिक महत्व किसी से छिपा नहीं है। मुग़ल काल में यह शहर दुनिया के सबसे वैभवशाली नगरों में गिना जाता था, जिसकी भव्यता लंदन और पेरिस जैसे महानगरों को भी मात देती थी। मगर आज? आज यह शहर बेलगाम शहरीकरण के बोझ तले कराह रहा है, अतिक्रमण के मकड़जाल में फँसता जा रहा है, और सबसे दुखद यह है कि अपने ही शहर के प्रति स्थानीय लोगों की उदासीनता इसे और गहरा घाव दे रही है।

टूरिज्म सेक्टर के डॉ मुकुल पांड्या कहते हैं, “ताजमहल, प्रेम का अमर प्रतीक, हर साल लाखों पर्यटकों को अपनी ओर खींचता है। आगरा किला और फतेहपुर सीकरी मुग़ल बादशाहों की शानदार जीवनशैली और हुकूमत की कहानियाँ सुनाते हैं। लेकिन, क्या इन शानदार विरासतों का यही नसीब है कि इनके चारों ओर अतिक्रमण का क्रूर घेरा बढ़ता जाए? दिल्ली गेट हो या ताजगंज, सिकंदरा हो या एत्मादुद्दौला – हर ऐतिहासिक ढाँचा खतरे की घंटी बजा रहा है। मानो हमारी विरासतें दम तोड़ रही हैं और हम बेबस होकर तमाशा देख रहे हैं।”

यमुना, जिसे कभी आगरा की आत्मा कहा जाता था, आज एक बीमार और बेजान शरीर बनकर रह गई है। कभी कलकल करती बहती नदी अब सूखी रेत और गाद का ढेर बन चुकी है, जो हवा में उड़कर शहर की साँसों में ज़हर घोल रही है। शहर का वायु गुणवत्ता सूचकांक (Air Quality Index) खतरनाक स्तरों को पार कर गया है। क्या हमारी आने वाली पीढ़ियाँ इस प्रदूषित हवा में साँस लेंगी? क्या हम उन्हें एक स्वस्थ और सुंदर आगरा सौंप नहीं सकते?

यह देखकर हैरानी और पीड़ा होती है कि करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद हालात सुधरने के बजाय और बिगड़ते जा रहे हैं। माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने 2018 में ताज ट्रेपेज़ियम ज़ोन (TTZ) के लिए एक दूरदर्शी दस्तावेज़ की बात की थी, मगर वह आज भी फाइलों की धूल चाट रहा है। क्या हमारी न्यायपालिका के आदेशों का भी कोई मोल नहीं? क्या हमारी धरोहरों का भविष्य सिर्फ कागज़ों में सिमट कर रह जाएगा?

आगरा हेरिटेज लवर्स ग्रुप के कनवीनर गोपाल सिंह के मुताबिक, “अगर आगरा को “विरासत शहर” का बहुमूल्य दर्जा मिल जाए, तो न केवल यहाँ की ऐतिहासिक इमारतों की बेहतर देखभाल सुनिश्चित की जा सकेगी, बल्कि छोटी-बड़ी हवेलियाँ, पुराने जीवंत बाज़ार, लोक संस्कृति की समृद्ध परंपरा और खानपान की विशिष्ट पहचान भी सुरक्षित रह पाएगी। यह स्मार्ट सिटी की तरह केवल कंक्रीट के जंगल और बुनियादी ढांचे पर ध्यान केंद्रित नहीं करेगा, बल्कि शहर की आत्मा, उसकी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत को भी जीवित रखेगा। यह हमारे अतीत को वर्तमान से जोड़ेगा और भविष्य के लिए एक मजबूत नींव रखेगा।”

लेकिन, इस सपने को साकार करने में सबसे बड़ी बाधा है – आगरा के लोगों में अपने शहर के प्रति उस गहरे जुड़ाव और गर्व की कमी, जो किसी भी विरासत को बचाने के लिए पहली शर्त होती है। जहाँ जयपुर, उदयपुर, मैसूर और वाराणसी जैसे शहर अपनी विरासत को एक उत्सव की तरह मनाते हैं, वहीं आगरा में हमारे शानदार स्मारक और सदियों पुराना इतिहास आम ज़िंदगी की पृष्ठभूमि बनकर रह गए हैं, मानो वे हमारी रोज़मर्रा की आपाधापी में कहीं खो गए हों। क्या हम अपनी जड़ों को भूल गए हैं? क्या हमें अपनी विरासत की महानता का एहसास नहीं है?

टूरिस्ट गाइड वेद गौतम कहते हैं, “भारतीय पुरातत्व विभाग (ASI) की तरफ से कुछ प्रयास ज़रूर होते हैं – जैसे फोटो प्रदर्शनियाँ आयोजित करना या स्मारकों में मुफ्त प्रवेश देना – मगर ये प्रयास उस विशाल चुनौती के सामने बहुत छोटे और अपर्याप्त हैं। इतिहासकार सही कहते हैं कि अब विभाग में वह जुनून और समझदारी नहीं रही, जो जॉन मार्शल जैसे दूरदर्शी अधिकारियों के समय में हुआ करती थी। क्या हम अपनी संस्थाओं को इतना कमज़ोर होने देंगे कि वे हमारी अनमोल धरोहरों की रक्षा भी न कर सकें?”

सैलानी तो आते हैं, दूर-दूर से खिंचे चले आते हैं, लेकिन शहर की बदहाल स्थिति देखकर निराश और हताश होकर लौटते हैं। न ढंग की सड़कें हैं, न सुगम हवाई संपर्क, और न ही एक स्वच्छ और स्वस्थ वातावरण। अगर आगरा की संकरी गलियों में विरासत वॉक टूर शुरू किए जाएं, तो शहर की असली ज़िंदगी, इसकी सदियों पुरानी संस्कृति और इसकी आत्मा दुनिया के सामने आ सकेगी। लेकिन इसके लिए इच्छाशक्ति और समर्पण की आवश्यकता है, ये कहना है श्री राजीव गुप्ता का।

कुछ विशेषज्ञ यह बहुमूल्य सुझाव देते हैं कि आगरा को तीन विशिष्ट हिस्सों में बाँटकर – मुग़ल काल, ब्रिटिश काल और आधुनिक काल – संरक्षण और विकास की योजनाएं बनाई जाएं। यह एक दूरदर्शी विचार है जो शहर की बहुस्तरीय पहचान को सुरक्षित रख सकता है। मगर अफ़सोस की बात यह है कि स्थानीय प्रशासन की सुस्ती और लोगों की उदासीनता के कारण यह विचार भी फाइलों में कैद होकर रह गया है। क्या हम अपनी निष्क्रियता के कारण इस सुनहरे अवसर को भी खो देंगे?

रिवर कनेक्ट कैंपेन के सदस्यों के मुताबिक, हक़ीक़त तो यह है कि “विरासत शहर” का प्रतिष्ठित दर्जा आगरा के लिए सिर्फ एक तमगा या अलंकरण नहीं होगा, बल्कि यह इस ऐतिहासिक शहर के लिए एक नई ज़िंदगी का रास्ता खोल सकता है। इससे शहर को पर्यावरणीय सुरक्षा मिलेगी, बेहतर बुनियादी ढांचा विकसित होगा, और सबसे बढ़कर, इसे एक नई वैश्विक पहचान मिलेगी, जो इसकी खोई हुई गरिमा को वापस लाएगी। यह हमारी अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देगा, पर्यटन को नई ऊंचाइयाँ देगा और स्थानीय लोगों के लिए रोजगार के नए अवसर पैदा करेगा।

अब फैसला सरकार को करना है – क्या वह ताज के इस ऐतिहासिक शहर को वाकई उसकी असली शान वापस लौटाएगी? क्या वह हमारी अनमोल विरासत को बचाने के लिए ठोस कदम उठाएगी? या इतिहास, विरासत और संस्कृति यूँ ही सिसकती रहेगी, हमारी आँखों के सामने धीरे-धीरे दम तोड़ती रहेगी?

विश्व संवाद केन्द्र में बाबा साहेब को अर्पित की गयीं पुष्पांजलि

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लखनऊ। भारत रत्न डा. भीमराव आम्बेडकर की जयंती के अवसर पर सोमवार को जियामऊ स्थित विश्व संवाद केन्द्र में बाबा साहेब के चित्र पर पुष्पांजलि अर्पित कर कृतज्ञतापूर्वक उन्हें नमन किया गया। सामाजिक समरसता गतिविधि की ओर से आयोजित कार्यक्रम में बोलते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पूर्वी उत्तर प्रदेश के क्षेत्र सम्पर्क प्रमुख मनोज ने कहा कि भारत रत्न बाबा साहेब डा. भीमराव आम्बेडकर विलक्षण क्षमता और प्रतिभा के धनी थे। उन्हें अधिकांश लोग केवल संविधान निर्माता के रूप में जानते हैं। बाबा साहेब ने वंचित समाज को अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करने के लिए प्रेरित किया। अनेक प्रलोभनों के बावजूद उन्होंने ईसाई व इस्लाम नहीं अपनाया।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रान्त प्रचारक प्रमुख यशोदानंदन ने कहा कि संघ के वरिष्ठ प्रचारक दत्तोपंत ठेंगड़ी से बाबा साहब का बहुत ही घनिष्ठ संबंध था। बाबा साहेब के चुनाव में दत्तोपंत ने काम किया था। संघ के प्रति बाबा साहब निष्ठा रखते थे।

सामाजिक समरसता गतिविधि की प्रान्तीय टोली के सदस्य व मीडिया प्रमुख बृजनन्दन राजू ने कहा कि बाबा साहेब का जीवन सबके लिए अनुकरणीय है। उन्होंने बताया कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ सामाजिक समरसता गतिविधि के माध्यम से देशभर में अस्पृश्यता उन्मूलन के लिए कार्य कर रहा है।

इस अवसर पर विश्व संवाद केन्द्र के कार्यालय प्रमुख सनी सिंह,सह नगर संघचालक विजय विश्वकर्मा, सह नगर कार्यवाह शशिकांत,नगर बौद्धिक प्रमुख अवधेश पाण्डेय एडवोकेट,नगर सम्पर्क प्रमुख डा. मदन मोहन मिश्रा, सायं कार्यवाह अर्जुन,शाखा कार्यवाह डा.उमेश कुमार राय, आशीष कुमार श्रीवास्तव एडवोकेट,सुधांश एडवोकेट व विकास पाठक एडवोकेट प्रमुख रूप से उपस्थित रहे।

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