ट्रम्प के चक्कर में पूरी दुनिया में हड़कंप

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लखनऊ : डॉनल्ड ट्रम्प के दूसरे कार्यकाल ने विश्व राजनीति को ऐसे मोड़ पर ला खड़ा किया है, जहाँ हर दिन नई आशंका, नया तनाव और नई अनिश्चितता जन्म ले रही है। कभी व्यापार युद्ध, कभी आयात शुल्क, कभी चीन को चेतावनी, कभी यूरोप पर दबाव और अब ईरान युद्ध तथा होरमुज़ जलडमरूमध्य का संकट—इन सबने मिलकर पूरी दुनिया को बेचैन कर दिया है। वर्तमान परिस्थितियों को देखें तो स्पष्ट दिखाई देता है कि आज वैश्विक अर्थव्यवस्था, ऊर्जा सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति का बड़ा हिस्सा ट्रम्प की नीतियों और निर्णयों के इर्द-गिर्द घूमने लगा है।

सबसे बड़ा संकट इस समय पश्चिम एशिया में चल रहे ईरान संघर्ष और होरमुज़ जलडमरूमध्य को लेकर उत्पन्न हुआ है। दुनिया के लगभग पाँचवें हिस्से का तेल और गैस इसी समुद्री मार्ग से होकर गुजरता है। लेकिन ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ते टकराव ने इस महत्वपूर्ण समुद्री रास्ते को लगभग युद्धक्षेत्र में बदल दिया है। Iran ने होरमुज़ जलडमरूमध्य पर अपने प्रभाव को बढ़ाते हुए जहाजों की आवाजाही पर नियंत्रण कड़ा कर दिया है, जबकि अमेरिका ने इसके जवाब में नौसैनिक दबाव और नाकेबंदी की नीति अपनाई है। परिणाम यह हुआ कि विश्व ऊर्जा आपूर्ति पर गहरा संकट मंडराने लगा।

स्थिति इतनी गंभीर हो चुकी है कि अनेक अंतरराष्ट्रीय जहाज सप्ताहों से खाड़ी क्षेत्र में फँसे हुए हैं। समाचार एजेंसियों के अनुसार युद्ध शुरू होने से पहले प्रतिदिन एक सौ पच्चीस से एक सौ चालीस जहाज इस मार्ग से गुजरते थे, लेकिन अब यह संख्या घटकर लगभग दस के आसपास पहुँच गई है। हजारों नाविक समुद्र में फँसे हुए हैं और तेल आपूर्ति बाधित होने के कारण पूरी दुनिया में ऊर्जा संकट गहराने लगा है।

ट्रम्प ने इस संकट को केवल क्षेत्रीय समस्या नहीं रहने दिया, बल्कि इसे अमेरिकी शक्ति प्रदर्शन का विषय बना दिया। उन्होंने बार-बार कहा कि अमेरिका होरमुज़ जलडमरूमध्य पर “पूर्ण नियंत्रण” स्थापित कर सकता है। हाल ही में ट्रम्प ने दावा किया कि अमेरिकी नौसैनिक शक्ति इस समुद्री मार्ग को किसी भी कीमत पर खुलवाएगी और यदि आवश्यकता पड़ी तो ईरान पर फिर हमला भी किया जा सकता है।

ईरान भी पीछे हटने को तैयार नहीं दिखाई दे रहा। ईरानी नेतृत्व ने स्पष्ट संकेत दिए हैं कि यदि अमेरिका और उसके सहयोगी दबाव बढ़ाते हैं, तो होरमुज़ जलडमरूमध्य पर और कठोर नियंत्रण लगाया जा सकता है। यही कारण है कि पूरी दुनिया में तेल की कीमतों में उछाल आ गया है। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसियों ने चेतावनी दी है कि यदि यह संकट लंबा चला, तो वैश्विक अर्थव्यवस्था गहरे संकट में फँस सकती है। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के प्रमुख ने तो यहाँ तक कहा कि विश्व तेल बाजार “लाल क्षेत्र” में प्रवेश करने की स्थिति में पहुँच चुका है।

सबसे चिंताजनक बात यह है कि ट्रम्प की राजनीति में स्थिरता और पूर्वानुमान का अभाव दिखाई देता है। एक दिन वे युद्ध की धमकी देते हैं, अगले दिन शांति वार्ता की बात करने लगते हैं। कभी वे ईरान पर बड़े हमले की चेतावनी देते हैं, तो कभी कहते हैं कि समझौते की संभावना बनी हुई है। हाल ही में ट्रम्प ने स्वीकार किया कि वे ईरान पर एक बड़े हमले से केवल एक घंटे पहले पीछे हटे थे क्योंकि उन्हें नई शांति पहल का संकेत मिला था।

इस अनिश्चितता ने पूरी दुनिया के बाजारों को अस्थिर कर दिया है। तेल की कीमतें लगातार ऊपर जा रही हैं। परिवहन लागत बढ़ रही है। खाद्य पदार्थों और उर्वरकों के दाम प्रभावित हो रहे हैं। यूरोप में महँगाई को लेकर चिंता बढ़ गई है। एशियाई देशों को ऊर्जा आपूर्ति की सुरक्षा को लेकर नए विकल्प तलाशने पड़ रहे हैं। कई देश अब डॉलर आधारित तेल व्यापार से हटकर वैकल्पिक मुद्रा व्यवस्थाओं की ओर बढ़ रहे हैं। भारत, चीन, पाकिस्तान और अन्य एशियाई देशों ने खाड़ी क्षेत्र के साथ वैकल्पिक व्यापारिक समझौतों पर चर्चा तेज कर दी है।

चीन और अमेरिका के बीच प्रतिस्पर्धा ने भी इस संकट को और जटिल बना दिया है। ट्रम्प ने दावा किया कि चीन के राष्ट्रपति ने भी ईरान से होरमुज़ जलडमरूमध्य खोलने की आवश्यकता पर सहमति जताई है। लेकिन चीन खुलकर अमेरिकी रणनीति के साथ खड़ा दिखाई नहीं दे रहा। चीन स्वयं ईरानी तेल का बड़ा खरीदार है और वह इस संकट को अपने आर्थिक हितों के अनुसार देख रहा है।

यूरोप की स्थिति भी असहज है। एक ओर वह अमेरिका का सहयोगी है, दूसरी ओर वह युद्ध और ऊर्जा संकट से सबसे अधिक प्रभावित क्षेत्रों में शामिल है। यूरोपीय देशों को भय है कि यदि होरमुज़ संकट और बढ़ा, तो उनकी अर्थव्यवस्था पर गहरा असर पड़ेगा। इसी कारण यूरोप अब अमेरिका पर पूर्ण निर्भरता की नीति पर पुनर्विचार करने लगा है।

भारत के लिए यह संकट अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं का बड़ा हिस्सा खाड़ी क्षेत्र से प्राप्त करता है। यदि होरमुज़ जलडमरूमध्य में संकट लंबा चलता है, तो भारत में पेट्रोल, डीज़ल, गैस और परिवहन लागत पर व्यापक प्रभाव पड़ सकता है। महँगाई बढ़ सकती है और आर्थिक विकास की गति प्रभावित हो सकती है। दूसरी ओर, वैश्विक शक्ति संतुलन में हो रहे बदलाव भारत के लिए कुछ नए रणनीतिक अवसर भी पैदा कर सकते हैं।

वास्तव में, आज की दुनिया एक ऐसे दौर से गुजर रही है जहाँ किसी एक नेता की राजनीतिक शैली पूरी वैश्विक व्यवस्था को प्रभावित कर रही है। ट्रम्प की राजनीति केवल अमेरिका की घरेलू राजनीति नहीं रह गई है; वह अंतरराष्ट्रीय व्यापार, ऊर्जा सुरक्षा, समुद्री मार्गों, युद्ध और शांति—सब पर असर डाल रही है। यही कारण है कि “ट्रम्प के चक्कर में पूरी दुनिया में हड़कंप” केवल एक आकर्षक शीर्षक नहीं, बल्कि आज की वास्तविकता बन चुका है।
इतिहास गवाह है कि जब विश्व राजनीति संवाद और सहयोग से हटकर शक्ति प्रदर्शन, धमकी और आर्थिक युद्धों की ओर बढ़ती है, तब वैश्विक अस्थिरता गहराती जाती है। आज पूरी दुनिया इसी अस्थिरता के दौर से गुजर रही है। होरमुज़ का संकट, ईरान युद्ध, बढ़ती महँगाई, ऊर्जा संकट और महाशक्तियों की प्रतिस्पर्धा यह संकेत दे रही है कि यदि समय रहते संतुलित और शांतिपूर्ण समाधान नहीं निकाला गया, तो आने वाले वर्षों में दुनिया और बड़े संकटों का सामना कर सकती है।

(डॉ. शैलेश शुक्ला, नईदुनिया एवं गौड़सन्स टाइम्स के सलाहकार संपादक हैं और सृजन संसार अंतरराष्ट्रीय पत्रिका समूह के संपादक की भी भूमिका निभा रहे हैं)

वीर सावरकर और महात्मा गाँधी

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मुंबई । वीर सावरकर की जीवनी लिखने वाले प्रख्यात लेखक धनंजय कीर लिखते है, “समाज की भलाई के लिए कई बार दो महान लोग एक समय में अलग-अलग कार्य कर रहे होते हैं। इसमें एक व्यक्ति वह होता है, जोकि समाज के भलाई के लिए कष्ट सहन करता है और दूसरा उसकी बेहतरी का बीड़ा उठता है। गाँधी पहली तरह के व्यक्तियों में शामिल थे जबकि सावरकर दूसरी तरह के लोगों का नेतृत्व करते है।” वीर सावरकर के अलावा लोकमान्य तिलक, डॉ. भीमराव आंबेडकर और ज्योतिराव फुले के भी जीवनीकार हैं।

महात्मा गाँधी का वीर सावरकर से रिश्ता बहुत पुराना था। वे एक-दूसरे से साल 1909 में विजयादशमी के दिन लंदन में पहली बार मिले थे। गाँधी ने उस दिन वहां एक भाषण दिया और कहा कि “उन्हें सावरकर के साथ बैठने का सम्मान मिलने पर बहुत गर्व है। भारत को सावरकर के त्याग और देशभक्ति का बहुत जल्दी फायदा मिलेगा।”

इसके बाद, गाँधी और सावरकर की अगली प्रत्यक्ष मुलाकात 1927 में रत्नागिरी में हुई। तब गाँधी रत्नागिरी के दौरे पर थे, और सावरकर को वहां ब्रिटिश सरकार ने नजरबंद कर रखा था। दोनों ने अस्पृश्यता और शुद्धि के सम्बन्ध में बातचीत की। इस विषय को लेकर उनकेबीच मतभेद भी थे, लेकिन किसी ने एक-दूसरे से बैर नहीं रखा।सावरकर को लेकर गाँधी लिखते है, “सत्यप्रेमी तथा सत्य के लिए प्राणतक न्योछावर कर सकने वाले व्यक्ति के रूप में आपके लिए मेरे मन में कितना आदर है। इसके अतिरिक्त अंततः हम दोनों का ध्येय भी एक है और मैं चाहूँगा कि उन सभी बातों के सम्बन्ध में आप मुझसे पत्र-व्यवहार करें जिनमे आपका मुझसे मतभेद है। और दूसरी बातों के बारे में भी लिखे। मैं जानता हूँ कि आप रत्नागिरी से बाहर नहीं जा सकते, इसलिए यदि जरुरी हो तो इन बातों पर जी भरकर बातचीत करने के लिए मुझे दो-तीन दिन का समय निकालकर आपके पास आकर रहना भी नहीं अखरेगा।“

इससे पहले भी एकबार और गाँधी ने सावरकर की तारीफ की थी,तब सावरकर बंधु कालेपानी की सजा भुगत रहे थे। गाँधी लिखते है,“सावरकर बंधुओं की प्रतिभा का उपयोग जन-कल्याण के लिए होना चाहिए। अगर भारत इसी तरह सोया पड़ा रहा तो मुझे डर है कि उसके ये दो निष्ठावान पुत्र सदा के लिए हाथ से चले जाएँगे। एक सावरकर भाई को मैं अच्छे से जानता हूँ। मुझे लंदन में उनसे भेंट का सौभाग्य मिला था। वे बहादुर हैं, चतुर हैं, देशभक्त हैं। वे क्रन्तिकारी हैं और इसे छुपाते नहीं हैं। मौजूदा शासन प्रणाली की बुराई का सबसे भीषण रूप उन्होंने बहुत पहले, मुझे से काफी पहले, देख लिया था। आज भारत को, अपने देश को, दिलोजान से प्यार करने के अपराध में कालापानी भोग रहे हैं। अगर सच्ची और न्यायी सरकार होती तो वे किसी ऊँचे शासकीय पद को सुशोभित कर रहे होते। मुझे उनके और उनके भाई के लिए बड़ा दुःख है।”

गाँधी और सावरकर में कार्यशैली को लेकर मतभेद हो सकते है मगरयह कोई विवादित मुद्दा नहीं है। राजनैतिक विचारधारा को लेकर दोनों की अपनी-अपनी समझ थी लेकिन व्यक्तिगत रूप से कभी एक-दूसरे का अनादर नहीं किया। इसका एक उदाहरण यह भी है कि जब सावरकर को रत्नागिरी में नजरबंद करने के आदेश मिला तो वे कुछ दिनों तक शहर के एक प्रसिद्ध परिवार – पटवर्धन के यहाँ रुके थे। धनंजय कीर इस सन्दर्भ में लिखते हैं कि इस परिवार के एक सदस्य अप्पासाहेब पटवर्धन जोकि गाँधी के अनुयायी थे,लेकिन सावरकर को भी अपनी प्रेरणा मानते थे। वे आगे लिखते हैं कि गाँधी ने कभी अप्पासाहेब का सावरकर के साथ काम करने पर ऐतराज नहीं जताया।

वैसे भी, यह ध्यान में रखना चाहिए कि कई मौकों पर गाँधी के कांग्रेस और उनके नेताओं के साथ भी मतभेद एवं विवाद रहे हैं। सबसे बड़ा उदाहरण तो भारत के विभाजन का है। उस दौरान गाँधी पूरी कांग्रेस से ही नाराज हो गए थे। मनु गाँधी को 1 जून 1947 को लिखे एक पत्र में उन्होंने खुलकर अपने मन की बात करते हुए कहाहै, “आज मैं अपने को अकेला पाता हूँ। लोगों को लगता है कि मैं जो सोच रहा हूँ वह एक भूल है… भले ही मैं कांग्रेस का चवन्नी का सदस्य नहीं हूँ लेकिन वे सब लोग मुझे पूछते हैं, मेरी सलाह लेते हैं… आजादी के कदम उलटे पड़ रहे हैं, ऐसा मुझे लगता है। हो सकता है आज इसके परिणाम तत्काल दिखाई न दें, लेकिन हिन्दुस्तान का भविष्य मुझे अच्छा नहीं दिखाई देता… हिन्दुस्तान की भावी पीढ़ी की आह मुझे न लगे कि हिंदुस्तान के विभाजन में गाँधी ने भी साथ दिया था।”

ऐसा भी नहीं है कि लंदन और रत्नागिरी की इन दो मुलाकातों के बीच सावरकर और गाँधी का आपसी संपर्क न रहा हो। सावरकर की नजरबंदी के दौरान गाँधी ने शंकरराव देव को 20 जुलाई 1937 को एक पत्र लिखकर कहा, “जब मैं यह कहूँगा कि मेरी ताकत में जो कुछ भी था, वह सब मैंने रिहाई के लिए अपने ढंग से किया तो शायद डॉ. सावरकर भी मेरी बात का अनुमोदन करेंगे।” इसी पत्र में उन्होंने यह भी लिखा कि “सावरकर बन्धु कम-से-कम यह तो जानते हैं कि हममें चाहे कुछ सिद्धांतों को लेकर जो भी मतभेद रहे हो, लेकिन मेरी कभी यह इच्छा नहीं हो सकती थी कि वे जेल में ही पड़े रहें।”

जब 16 मार्च 1945 को वीर सावरकर के भाई गणेश दामोदर सावरकर का निधन हुआ, तो शोक संवेदनाओं वाले पत्रों में से एक पत्र गाँधी का भी शामिल था। उन्होंने वह पत्र सेवाग्राम से 22 मार्च को वीर सावरकर को संबोधित करते हुए लिखा, “आपके भाई के निधन का समाचार सुनकर यह पत्र लिख रहा हूँ। उनकी रिहाई के बारे में मैंने कुछ किया था, तब से उनके बारे में मेरी रूचि बनी हुई है।”

जहाँ एक तरफ गाँधी, सावरकर बंधुओं की रिहाई के अपने प्रयासों का उल्लेख करते हैं तो दूसरी तरफ एक अन्य पत्र में वे उनकी रिहाई के लिए दया याचिका का मार्ग तक सुझाते हैं। लाहौर से 25 जनवरी 1920 को वीर सावरकर के भाई नारायण दामोदर सावरकर को लिखे एक पत्र में वे लिखते हैं, “मेरा सुझाव है कि आप एक संक्षिप्त याचिका तैयार करें जिसमें तथ्यों को इस प्रकार प्रस्तुत करें ताकि यह बात बिलकुल स्पष्ट रुप से उभर आए कि आपके भाई ने जो अपराध किया था, उसका स्वरुप बिलकुल राजनीतिक था। मैं यह सुझाव इसलिए दे रहा हूँ कि तब जनता का ध्यान उस ओर केन्द्रित करना संभव हो जाएगा। इस बीच, जैसा कि मैं अपने एक पहले पत्र में आपसे कह चुका हूँ, मैं अपने ढंग से इस मामले में कदम उठा रहा हूँ।”

महात्मा गाँधी द्वारा वीर सावरकर को क्षमा/दया याचना लिखने का सुझाव नया नहीं था। उन्होंने अली बंधुओं – शौकत अली और मोहम्मद अली को भी ब्रिटिश सरकार से क्षमा याचना करने की राय दी थी। यही नहीं, उनकी रिहाई के लिए वे स्वयं वायसराय रीडिंग से भी मिले थे। हालाँकि, बाद में उन्होंने अपने ही प्रयास अथवा सुझाव को राजनीतिक दृष्टि से बहुत बड़ी भूल माना था।

इसी प्रकार, सावरकर बंधुओं के लिए उनके प्रयास ज्यादा सफल नहीं रहे क्योंकि सावरकर की कालेपानी की सजा के दौरान असहयोग आन्दोलन अपने चरम पर था। इस आन्दोलन के चलते सावरकर बंधुओं की रिहाई में बाधा पैदा हुई थी। इसकास्पष्टीकरण भी स्वयं गाँधी ने दिया है, “अगर असहयोग आन्दोलन न होता तो दोनों सावरकर बंधु भी कालेपानी से बहुत पहले छूट कर आ जाते लेकिन अभी तो असहयोग बाधक है।”

असहयोग आन्दोलन का स्वरुप ही ऐसा था कि पूर्ण स्वराज्य की माँग के दौरान स्वतंत्रता सेनानियों को जेलों में भरा जा रहा था और ऐसे में महात्मा गाँधी चाहते हुए भी उनकी रिहाई के प्रयासों को अधिक बल नहीं दे सकते थे। जब आन्दोलन 1922 में समाप्त हुआतो एकबार फिर कांग्रेस द्वारा सावरकर की रिहाई के प्रयास शुरू किये गए। इस बार गाँधी के करीबी माने जाने वाले मौलाना मोहम्मद अली ने सावरकर का खुल कर समर्थन किया। साल 1923 में वेकांग्रेस के अध्यक्ष बने तो उन्होंने अधिवेशन के पांचवें दिन सावरकर की रिहाई का एक प्रस्ताव पेश किया, जिसे पूरी कांग्रेस नेसर्वसम्मति से पारित किया। मौलाना ने कहा था, “विनायक दामोदर सावरकर को सर्वाधिक तिरस्कारपूर्वक जेल में रखा जा रहा है, जबकि वे रिहा होने के हकदार हैं।” इस प्रस्ताव का जिक्र ‘गाँधी और गाँधीवाद’ जैसी पुस्तक लिखने वाले पट्टाभि सीतारमैया ने साल 1935 में प्रकाशित अपनी अन्य पुस्तक ‘द हिस्ट्री ऑफ़ द इंडियन नेशनल कॉन्ग्रेस’ के प्रथम खंड में भी किया है।

अभी तक तो कांग्रेस और गाँधी द्वारा सावरकर बंधुओं की रिहाई के सन्दर्भों का जिक्र पढ़ने को मिलता है लेकिन एक अवसर ऐसा भी है जब सावरकर ने गाँधी की रिहाई की माँग की थी। दरअसल, 7 अक्टूबर 1908 को दक्षिण अफ्रीका में गाँधी को गिरफ्तार कर लिया गया था। 16 अक्तूबर को लन्दन में सावरकर सहित लाला लाजपत राय, बिपिन चन्द्र पाल, आनंद के. कुमारस्वामी, और जी.एस.खारपड़े ने गाँधी के समर्थन में एक सभा का आयोजन किया था।

यह बात ठीक है कि सावरकर ने दया याचिकाएँ लिखी, जो एक कैदी के रूप में उनका अधिकार भी था। मगर इसके साथ उस पत्र का भी जिक्र होना चाहिए जो उन्होंने अपने भाई को अंडमान जेल से 9 मार्च 1915 को लिखा था। वे लिखते है, “राजा या राष्ट्र क्षमा के अधिकार का उपयोग, तब तक नहीं कर सकता, जब तक स्वयं जनता ही कैदी को वापिस लाने, स्वतंत्र करने के लिए जोर न लगाए। यदि हिंदुस्तानवासी इस बात को चाहे और इस आशय के प्रार्थना पत्र लड़ाई (विश्व युद्ध) के अंत में जाए तो संभव है कि हम लोग मुक्त कर दिए जाए। परन्तु यदि हिंदुस्तानवासी ही हमें वापस नहीं चाहते हो तो न तो सरकार हमें छोड़ सकती है और न ही अन्य प्रकारों से मुक्ति का पाना हमें ही श्रेयस्कर है।”

आमतौर पर दया याचिकाओं को लेकर सावरकर का विरोध किया जाता है। जबकि उस दौर में कांग्रेस के कई नेताओं के ब्रिटिश वायसरॉय एवं अधिकारियों से बहुत ही अच्छे संबंध हुआ करते थे। यह आपसी मेलजोल इतना गहरा होता था कि कई बार जैसा ब्रिटिश सरकार चाहती थी, कांग्रेस के नेता वैसा कर भी दिया करते थे। जैसे जब कर्जन के बाद मिंटो को भारत का गवर्नर जनरल बनाया गया तो उस समय बंगाल विभाजन के चलते स्वदेशी एवं विदेशी सामान के बहिष्कार का आन्दोलन अपने चरम पर था। मिंटो पर ब्रिटेन से ही दवाब था कि वह इस मामले में जल्दी-से-जल्दी कोई समाधान निकाले। इसलिए उसने कलकत्ता स्थित अपने निवास पर गोपाल कृष्ण गोखले को मिलने के लिए बुलाया। उस मुलाकात में मिंटो ने गोखले से कहा, “मेरे भूतपूर्व वायसराय की नीतियों के चलते लोगों में असंतोष पैदा हो गया है। हालाँकि, मैंने अभी कुछ सोचा नहीं है। मुझे उम्मीद है कि तब तक आन्दोलन के नेता मेरे लिए कोई समस्या पैदा नहीं करेंगे।” गोखले ने वायसराय के कमरे में निजी सचिव, कर्नल डनलप स्मिथ की तरफ मुड़ते हुए कहा, “हिज एक्सेलेंसी ने सहानुभूति और समझदारी दिखाई है। मैं बहिष्कार को रोक दूँगा।”

आखिर, गोखले को मिंटो से मिलने की आखिर क्या जरुरत थी? जबकि इस स्वदेशी एवं बहिष्कार के आन्दोलन ने ब्रिटिश सरकार के भारत में अस्तित्व पर लगभग प्रश्न खड़ा कर दिया था। एक अन्य तथ्य तो यह भी है कि कांग्रेस के कई अधिवेशनों की शुरुआत ब्रिटेन के महाराजा के गुणगान से शुरू होती थी। जैसे जलियांवाला नरसंहार के कुछ दिनों बाद ही कांग्रेस का 34वाँ अधिवेशन अमृतसर में बुलाया गया था। इसके पहले दिन यानी 27 दिसंबर 1919 को मोतीलाल नेहरू ने अध्यक्षीय भाषण दिया और उन्होंने ब्रिटिश शासन की शान में खूब तारीफ की। उस दौरान जॉर्ज फ्रेडेरिक (V) यूनाइटेड किंगडम के राजा और भारत के कथित सम्राट थे। उनके उत्तराधिकारी प्रिंस ऑफ़ वेल्स, एडवर्ड अल्बर्ट (VIII) का 1921 में भारत का दौरा प्रस्तावित था। अधिवेशन में मोतीलाल ने ‘सर्वशक्तिमान भगवान से प्रार्थना करते हुए भारत की समृद्धि और संतोष के लिए एडवर्ड की बुद्धिमानी और नेतृत्व की सराहना की थी।’

जवाहरलाल नेहरू के पिता मोतीलाल नेहरू ऐसा कैसे कह सकते है जबकि कुछ दिनों पहले ही जलियांवाला नरसंहार उसी शहर में घटित हुआ था। इन घटनाओं के जिक्र का यह मतलब नहीं है कि गोखले और मोतीलाल कोई देशद्रोही अथवा ब्रिटिश एजेंट थे। वे दोनों सच्चे राष्ट्रभक्त थे, जिनका स्वतंत्रता के आन्दोलन में अभूतपूर्व योगदान था। स्वाभाविक रूप से उस दौरान सभी नेता एवं क्रन्तिकारी अपनी-अपनी सोच अथवा विचारों के अनुसार स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ रहे थे। वास्तव में, इसी सच्चाई को समझने की जरुरत है। अतः अपनी राजनैतिक इच्छाओं की पूर्ति के लिए स्वतंत्रता सेनानियों को घसीटने का कोई अर्थ नहीं है।

1947 में स्वतंत्रता के बाद, अखिल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने एक समिति का गठन किया, जिसमें डॉ. राजेंद्र प्रसाद, डॉ. पट्टाभि सीतारामय्या, डॉ. एस. राधाकृष्णन, जय प्रकाश नारायण और विजयलक्ष्मी पंडित जैसे नाम शामिल थे। इन सभी को भारत के स्वाधीनता आंदोलन पर एक पुस्तक – ‘To The Gates of Liberty’ के प्रकाशन की जिम्मेदारी दी गयी थी। पुस्तक कीप्रस्तावना प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने लिखी और सावरकर के भी दो लेखों – ‘Ideology of the War Independence’ और ‘The Rani of Jhansi’ को भी इसमें प्रकाशित किया गया था। इस पुस्तक की एक और विशेष बात यह थी कि इस समिति ने सावरकर के नाम के आगे ‘वीर’ लगाया था।

वीर सावरकर के कांग्रेस, समाजवादी, और वामपंथी दलों सहितसमाज के प्रबुद्ध वर्गों में भी समर्थक मौजूद थे। साल 1957 में राजा महेंद्र प्रताप सिंह ने एक निजी विधेयक पेश कर वीर सावरकर सहितवीरेन्द्र कुमार घोष (श्री अरविन्द के भाई), डॉ. भूपेंद्र नाथ दत्ता (स्वामी विवेकानंद के भाई) के बलिदान को मान्यता देने का प्रस्ताव रखा। दुर्भाग्यवश, यह विधेयक पारित न हो सका, क्योंकि मतदान में 48 सासंद पक्ष में और 75 ने विरोध किया। हालाँकि, फरवरी 1966 में वीर सावरकर के निधन के बाद उन्हें यह सम्मान दे दिया गया।जिसका सन्दर्भ संसदीय कार्यवाही में ही मिलता है। साल 1973 में लोकसभा में जनता पार्टी के सदस्य, मुख्तियार सिंह मलिक ने तत्कालीन गृह मंत्री से प्रश्न किया, “क्या भारत सरकार ने दिवंगत स्वातंत्र्यवीर सावरकर को स्वतंत्रता सेनानी के रूप में मान्यता देने का कोई निर्णय लिया है?” जवाब में गृह मंत्री, उमाशंकर दीक्षित ने कहा,“जी महोदय।”

कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया के ए.के. गोपालन और एच.एन.मुखर्जी जैसे वरिष्ठ संसद सदस्य हमेशा वीर सावरकर के पक्ष में खड़े रहते थे। जब फरवरी 1966 में वीर सावरकर का निधन हुआ तो एच. एन. मुखर्जी ने ही सबसे पहले संसद द्वारा एक शोक संदेशजारी करने का सुझाव दिया था। उन्होंने कहा, “वीर सावरकर का निधन राष्ट्रीय महत्व का विषय है, संसद सदस्यों को उनकी संवेदनाएं पेश करने देना चाहिए। मगर ऐसा नहीं होने दिया, जोकि अनसुनाएवं अकल्पनीय है।“ प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के सुरेन्द्रनाथ द्विवेदी नेभी उनकी बातों का समर्थन किया।

28 मई 1883 : स्वत्ववोध पुनर्जागरण केलिये समर्पित स्वातंत्र्यवीर सावरकरजी का जन्म : संपूर्ण जीवन संघर्ष में बीता

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भोपाल । स्वातंत्र्यवीर सावरकर जी ऐसे ही महान विभूति थे जिनके जीवन का प्रतिक्षण राष्ट्र और स्वत्व बोध कराने के लिये समर्पित रहा। वे संसार के एक मात्र ऐसे कैदी थे जिन्हें एक ही जीवन में दो आजीवन कारावास का दंड मिला। यह उनके संघर्ष और अंग्रेज सरकार द्वारा दी गई यातनाओं का ही कारण था कि उन्हें समाज ने “स्वातंत्र्यवीर” जैसे गौरवमयी उपाख्य से सम्मानित किया। लेकिन उनका संघर्ष स्वतंत्रता के बाद भी कम न हुआ। उन्हें गाँधीजी की हत्या के झूठे आरोप में बंदी बनाया गया। यद्यपि फरवरी 49 में अदालत ने उन्हें सम्मान दोषमुक्त कर दिया था लेकिन षड्यंत्र के अंतर्गत उन्हें पूरे जीवन प्रताड़ित किया गया।

भारतीय स्वाभिमान और स्वातंत्र्य वोध जागरण केलिए यूँ तो करोड़ों महापुरुषों के जीवन का बलिदान हुआ है किन्तु उनमें कुछ ऐसे हैं जिनके जीवन की प्रत्येक श्वाँस राष्ट्र के लिये समर्पित रही। सावरकरजी पहले ऐसे क्रांतिकारी थे जिन्होंने 1901 में ब्रिटेन की रानी विक्टोरिया की मृत्यु पर नासिक में शोक सभा का विरोध किया था। उन्होंने कहा कि वो हमारे शत्रु देश की रानी थी, हम शोक व्यक्त क्यों करें? सावरकरजी पहले देशभक्त थे जिन्होंने एडवर्ड सप्तम के राज्याभिषेक समारोह का उत्सव मनाने वालों को त्र्यम्बकेश्वर में बड़े बड़े पोस्टर लगाकर कहा था कि गुलामी का उत्सव मत मनाओ..! 7 अक्टूबर 1905 को पूना में सावरकर जी ने ही विदेशी वस्त्रों की पहली होली जलाई थी…! उनके द्वारा विदेशी वस्त्रों का दहन करने पर तिलक जी ने अपने पत्र केसरी में उनको शिवाजी के समान बताकर उनकी प्रशंसा की थी सावरकरजी द्वारा आरंभ की गई विदेशी वस्त्र दहन के इसी मार्ग पर गाँधीजी भी चले और 11 जुलाई 1921 को मुंबई के परेल में विदेशी वस्त्रों का बहिष्कार किया गया। उनके द्वारा आरंभ स्वत्व जागरण अभियान से क्रोधित होकर 1905 में उन्हें पुणे के फर्म्युसन कॉलेज से निकाल दिया गया था। इसके विरोध में हड़ताल हुई। इस घटना पर भी तिलकजी ने अपने समाचार पत्र ‘केसरी’ में सम्पादकीय लिखा था। स्वातंत्र्यवीर सावरकर पहले ऐसे विचारक थे जिन्होंने 1857 की क्राँति को पहला स्वातंत्र्य समर माना और एक ग्रंथ की रचना की। उनसे पहले सब इसे एक विद्रोह लिखा करते थे। यह पहला ऐसा ग्रंथ था जिसपर प्रकाशन से पहले प्रतिबंध लगा दिया गया था। स्वातंत्र्यवीर सावरकर पहले क्रान्तिकारी थे जो समुद्री जहाज में बंदी बनाकर ब्रिटेन से भारत लाते समय आठ जुलाई 1910 को समुद्र में कूद पड़े थे। उन्होंने तैरकर इंग्लिश चैनल पार किया और फ्रांस पहुँच गए थे। वे पहले ऐसे राजनैतिक बंदी थे जिन्होंने अंडमान की काला पानी जेल में 10 साल से भी अधिक समय यातनाएँ सहीं। उन्हें कोल्हू में प्रतिदिन 30 पोंड तेल निकालना होता था। उन्होंने काल कोठरी की दीवारों पर कंकर कोयले से कवितायें लिखीं और 6000 पंक्तियाँ याद कीं। उनकी कोठरी 7 X 11 आकार की थी। मौसम गर्मी का हो या सर्दी का उन्हें जमीन पर ही सोना होता था । इसी कोठरी कोने में शौच और पेशाब करना होती । और इसी में भोजन करना होता था । हाथ में हथकड़ी और पैरों में बेड़ियाँ लगी होती थीं। उसी स्थिति में जो और जैसा मिले, वही भोजन करना होता था । उन्हें प्रतिदिन बैल की भाँति कोल्हू में जोता जाता था। यदि तेल निकालने की मात्रा कम हो तो पिटाई होती थी। भोजन नहीं दिया जाता था। उसी जेल में उनके भाई भी थे पर दोनों भाई एक दूसरे से मिलना तो दूर देख भी नहीं सकते थे। पूरी जेल में सावरकर जी एकमात्र ऐसे कैदी थे, जिनके गले में अंग्रेजों ने एक पट्टी लटका रखी थी । इस पर “D” लिखा था । “D” अर्थात डेंजरस। यातनाएँ देने का यह चक्र चला लगभग ग्यारह वर्ष चला । इतनी यातनाएँ देने का कारण यह था कि पूना से लेकर लंदन तक उनके जीवन का कोई क्षण ऐसा नहीं बीता जब उन्होंने अंग्रेजों से भारत की मुक्ति का कोई उपक्रम न किया हो । स्वातंत्र्यवीर सावरकर पहले क्रांतिकारी थे जिन्होंने 1901 में ब्रिटेन की रानी विक्टोरिया की मृत्यु पर नासिक में आयोजित शोक सभा का विरोध किया था और कहा कि वो हमारे शत्रु देश की रानी थी, हम शोक क्यूँ करें? वीर सावरकर पहले देशभक्त थे जिन्होंने एडवर्ड सप्तम के राज्याभिषेक समारोह का उत्सव मनाने वालों को त्र्यम्बकेश्वर में बड़े बड़े पोस्टर लगाकर कहा था कि दासता का उत्सव मत मनाओ..!

उन्होंने 7 अक्टूबर 1905 को पूना में स्वदेशी अपनाओ आंदोलन छेड़ा और विदेशी वस्त्रों की होली जलाई थी । यह सावरकर जी द्वारा स्वाभिमान और स्वतव जागरण केलिए किये जाने वाले कार्यों का ही प्रभाव था कि तिलक जी ने अपने समाचार पत्र “केसरी” में सावरकर जी को छत्रपति शिवाजी महाराज के समान बताकर प्रशंसा की थी । सावरकर जी द्वारा विदेशी वस्त्रों की होली जलाने के कारण उन्हे फर्म्युसन कॉलेज पुणे से निकाल दिया गया था । इसके विरोध में छात्रों ने हड़ताल की । इस समूची घटना पर तिलक जी ने ‘केसरी’ पत्र में सावरकर जी के पक्ष में सम्पादकीय लिखा । वे पहले ऐसे बैरिस्टर थे जिन्होंने ब्रिटेन में परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद ब्रिटेन के राजा के प्रति वफ़ादार होने की शपथ लेने से इंकार कर दिया था । इस कारण उन्हें बैरिस्टर होने की उपाधि का पत्र कभी नहीं मिला । यह घटना 1909 की है । वीर सावरकर पहले ऐसे लेखक थे जिनकी पुस्तक “1857 का स्वातंत्र्य समर’ पर प्रकाशन के पहले ही प्रतिबंध लगा । वीर सावरकर पहले क्रान्तिकारी थे जो समुद्री जहाज में बंदी बनाकर ब्रिटेन से भारत लाते समय आठ जुलाई 1910 को समुद्र में कूद पड़े थे और तैरकर फ्रांस पहुँच गए थे । लेकिन तट पर बंदी बना लिये गये । सावरकर जी पहले ऐसे क्रान्तिकारी थे जिनका मुकद्दमा अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय हेग में चला। वे भारत के पहले क्राँतिकारी थे जिन्हें अंग्रेजी काल में दो आजन्म कारावास की सजा सुनाई गई। दो जन्म कारावास की सजा सुनते ही हंसकर बोले, “चलो, ईसाई सत्ता ने हिन्दू धर्म के पुनर्जन्म सिद्धांत को मान लिया” ।

वे अंग्रेजी सत्ता काल में लगभग 30 वर्षों तक विभिन्न जेलों में रहे और स्वतंत्रता के बाद भी 1948 में गाँधीजी की हत्या के आक्षेप में पुनः गिरफ्तार हुये और न्यायालय द्वारा आरोप झूठे पाए जाने के बाद ससम्मान रिहा हुये लेकिन 4 अप्रैल 1950 को पाकिस्तानी प्रधानमन्त्री लियाक़त अली ख़ान के दिल्ली आगमन पर पुनः उन्हें बेलगाम जेल में रोका गया। मई 1952 में पुणे की एक विशाल सभा में उन्होंने अभिनव भारत संगठन को भंग किया गया। 10 नवम्बर 1957 को नई दिल्ली में आयोजित भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम समारोह में वे मुख्य वक्ता रहे। 8 अक्टूबर 1949 को उन्हें पुणे विश्वविद्यालय ने डी०लिट० की मानद उपाधि से अलंकृत किया। 8 नवम्बर 1963 को उनकी पत्नी यमुनाबाई का निधन हुआ। सितम्बर, 1965 से उन्हें तेज ज्वर ने आ घेरा, जिसके बाद इनका स्वास्थ्य गिरने लगा। एक फरवरी 1966 को उन्होंने मृत्युपर्यन्त उपवास करने का निर्णय लिया और 26 फरवरी 1966 को बम्बई में प्रातः 10 बजे पार्थिव शरीर त्यागकर परमधाम को प्रस्थान किया ।

सावरकर जी ने भारत की आज की सभी राष्ट्रीय सुरक्षा सम्बन्धी समस्याओं को बहुत पहले ही भाँप लिया था। 1962 में चीन द्वारा आक्रमण करने के लगभग दस वर्ष पहले ही उन्होंने देश को सतर्क कर दिया था कि चीन भारत पर आक्रमण करने वाला है। भारत के स्वतंत्र हो जाने के बाद गोवा की मुक्ति की आवाज सबसे पहले सावरकर जी ने ही उठायी थी।

Urban Naxals from streets to screens have now taken a new disguise

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Mayank K ‘Morningstar’

There’s a new bizarre trend sweeping across the internet. Gen Z, while often vocally reserved, is increasingly projecting itself as a supporter of the left’s latest toolkit initiative, the “Cockroach Janata Party.” Social media is being flooded with countless posts and AI-generated slop surrounding the trend.

But is reality really as simple and obvious as it appears? Probably not. The answer seems far more ambiguous and also far more difficult to uncover.

Delhi : Since its advent in 2014, the incumbent government at the center has been rigid and uncompromising toward all forms of Naxalism, and Urban Naxalism has been no exception. The Prime Minister made this stance very clear when he said, “We will have to defeat all forms of Naxalism, be it gun-toting or pen-wielding.” However, the term “Urban Naxal” was not widely used in mainstream political discourse during the early 2010s. At that time, Maoist insurgency was operating strongly across several Indian states. Nationalist circles were already discussing the existence of urban support systems for Maoists. Their attempts at “political education” and “student mobilization” in universities (ref: Urban Perspective: Our Work in Urban Areas, a document by CPI Maoist), along with the role of intellectual circles and civil society networks, were not hidden from the public. It was during this period that Indian national politics began undergoing a transition, leading to several new developments; a nationwide shift from the left to right wing politics.

Among the most notable was the India Against Corruption (IAC) movement of 2011, which led to the emergence of a new leader, Arvind Kejriwal. Almost overnight, his name was on everyone’s lips, especially within the progressive urban circles of New Delhi. He quickly gained traction in Delhi by projecting anti-corruption politics, subsidized utilities, and an anti-VIP culture. This rise culminated in his emergence as one of the most prominent leaders during the 2013 Delhi Assembly elections. For the first time, this may have presented an opportunity for alleged Urban Naxal circles to engage with this new political phenomenon in Delhi, though they had initially remained skeptical of this emerging political force. Initially, the bond was not very clearly evident or visible at first, it kept appearing recurrently until it became distinctly noticeable in 2018. A series of events that followed vigorously established this bond. During the anti-CAA protests, while AAP maintained a cautious public position, it allegedly gained indirect electoral benefits by encouraging and inciting sections of the protesters during the Covid-19 pandemic. Student involvement was also significant, particularly at the university level, with support from its student wing, Chhatra Yuva Sangharsh Samiti (CYSS).

What followed next were the Farmers’ Protests of 2020–21, where a set of economically significant amendments introduced during the Covid-19 period was strongly opposed by farmers, particularly from Punjab — another major bastion of AAP, where the party eventually came to power in 2022. The protests also caused massive traffic congestion and public inconvenience at the time.

After establishing a substantial presence through these civil society mobilizations, it was time for Arvind Kejriwal to rise to prominence, and he seemingly did so on the support structure allegedly nurtured by the academic ecosystem associated with so-called “urban naxals.” This was also the phase when the Aam Aadmi Party invested heavily in PR and social media campaigns. For the first time, YouTubers and influencers were seen working for the party round the clock, often from foreign soil and, allegedly, with foreign funding.

It was during this period that a YouTuber, allegedly an offshoot of the AAP IT Cell, launched his channel and gained considerable traction among left-leaning youth. However, it was later observed that a large section of his followers were not even Indian, and consequently, his influence reportedly had a negligible impact on the voters’ mindset, especially among the youth.

More recently, the so-called “Cockroach Janata Party” (CJP) has emerged as yet another social media gimmick. That’s trending everywhere. The modus operandi appears to involve seeding an ex-AAP IT cell worker, based and trained in the US, operating from the US. The obvious question that follows is: is he also funded by the US? Looking at previous records and the so-called deep state’s interest in the South Asian region, it is not a very difficult conclusion to draw.

The left faction has realized that making its presence felt among the internet using Gen Z is only possible by either keeping up with or initiating trends that are unique and stand apart. Guess what? A new toolkit, present for quite some time, has recently been activated. A new outfit, the Cockroach Janata Party has gained prominence among the youth. Headed by Abhijeet Dipke, a former AAP IT cell worker, it is now making headlines.

The page, which boasts more followers than the BJP, reportedly has almost half of its followers from Pakistan. Ironically, the same faction that raised concerns over privacy issues with the Sanchar Saathi app has willingly provided personal data to a US-based platform through Google Sheets. In an era of social media and AI slop, this appears to be nothing more than momentary hype.

However, another interesting observation is the behaviour of the toolkit; the way it constantly adapts to trends and searches for new ways to regain its lost grip. At the moment, though, it seems as distant as a cockroach is from a HIT spray.

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