पहचान गई तो जनजातीय दर्जे का आधार भी गया!संदर्भ- न्‍यायालयीन निर्णय

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– डॉ. मयंक चतुर्वेदी

भोपाल । जनजातीय समाज की पहचान क्या है? क्या वह जन्म के साथ मिली एक ऐसी स्थायी मुहर है, जिसका व्यक्ति के बाद के सामाजिक जीवन से कोई संबंध आवश्यक नहीं? क्या किसी जनजाति में जन्म लेने के बाद व्यक्ति दशकों तक उस समुदाय से दूर रहकर, उसकी सामाजिक-सांस्कृतिक व्यवस्था से अलग जीवन जीकर भी उसी समुदाय का सदस्य बना रह सकता है? और यदि ऐसा हो सकता है, तो फिर जनजातीय पहचान का अर्थ क्या रह जाएगा?

वस्‍तुत: सोनभद्र की नन्हकी उर्फ नैमुन्निशा से जुड़े इलाहाबाद हाईकोर्ट के 14 सितंबर 2026 के फैसले ने इन प्रश्नों को बेहद गंभीर कानूनी विमर्श में बदल दिया है। न्‍यायालय ने धर्म परिवर्तन को अनुसूचित जनजाति की सदस्यता समाप्त करने का स्वतः आधार नहीं माना। साथ ही उसने यह भी स्पष्ट किया कि जन्म से किसी जनजाति में होना हर परिस्थिति में वर्तमान एसटी स्थिति का अंतिम प्रमाण नहीं बन सकता। व्यक्ति का जनजातीय जीवन, सामाजिक संगठन, परंपराओं से संबंध, सामुदायिक सहभागिता और मूल जनजातीय समुदाय की स्वीकृति भी महत्वपूर्ण कसौटियां हैं।

यदि हम गहराई से देखें तो भारत में जनजातीय समाज की पहचान उसकी विशिष्ट जीवन-पद्धति से बनी है। उसकी अपनी सामाजिक संरचना है, सामुदायिक संस्थाएं हैं, परंपराएं हैं, लोकाचार हैं, सांस्कृतिक स्मृतियां हैं और पीढ़ियों से चली आ रही सामुदायिक चेतना है। जन्म इस पहचान का आरंभिक आधार है। परिवार इसे आगे बढ़ाता है। समाज इसे स्वीकार करता है। परंपरा इसे जीवित रखती है और समुदाय व्यक्ति को अपनी सामाजिक संरचना में स्थान देता है, इसलिए जनजातीय पहचान को महज एक प्रमाण-पत्र में बंद कर देना उस पहचान की वास्तविक प्रकृति को छोटा करना होगा।

आज इलाहाबाद हाईकोर्ट ने नन्हकी के मामले में इसी व्यापक दृष्टि को अपनाया है। कोर्ट के सामने यह प्रश्न था कि जन्म से भुइयां अनुसूचित जनजाति से संबंधित होने का दावा और तहसीलदार द्वारा जारी एसटी प्रमाण-पत्र क्या बाद की परिस्थितियों के सामने भी पर्याप्त हैं। न्‍यायालय ने पूरे सामाजिक और दस्तावेजी साक्ष्य को साथ रखकर स्थिति का परीक्षण किया। इस फैसले को इस्लाम या ईसाई धर्म अपनाने वाले हर जनजातीय व्यक्ति पर लागू होने वाले किसी स्वतः नियम के रूप में पढ़ना कानूनी रूप से सही नहीं होगा।

वस्‍तुत: यहां असली सवाल धर्म से आगे का है, जिसमें कि किसी व्यक्ति ने अपना धर्म बदला, यह एक तथ्य है, किंतु इसी के साथ यह दूसरा तथ्‍य भी जुड़ा हुआ है कि उसके बाद उसका सामाजिक जीवन कैसा रहा। मूल जनजातीय समुदाय से उसके संबंध बने रहे या समाप्त हो गए, यह तीसरा और कहीं अधिक महत्वपूर्ण प्रश्न है। नन्हकी के मामले में राज्य की ओर से जिन परिस्थितियों पर भरोसा किया गया, उनमें इस्लामी रीति से विवाह, नैमुन्निशा नाम से लंबे समय तक जीवन, बच्चों के मुस्लिम नाम, परिवार रजिस्टर में मुस्लिम मजहब (धर्म) का उल्लेख और भुइयां समुदाय की परंपराओं, सामाजिक जीवन तथा सामुदायिक स्वीकृति के निरंतर संबंध का पर्याप्त प्रमाण प्रस्तुत न होना शामिल था।

इस आधार पर न्‍यायालय ने इन तथ्यों को अलग-अलग निर्णायक मानने के स्थान पर समग्र परिस्थितियों के रूप में देखा। यहां समझ लें कि धर्म परिवर्तन एक तथ्य है, पहचान का सामाजिक विच्छेद उससे आगे की स्थिति है। यह बात समझने की आवश्यकता है कि अनुसूचित जनजातियों के लिए संवैधानिक और वैधानिक संरक्षण क्यों बनाया गया है। आरक्षण, भूमि-सुरक्षा और अन्य विशेष व्यवस्थाएं उन समुदायों की ऐतिहासिक सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक परिस्थितियों को ध्यान में रखकर बनाई गई हैं।

इनका उद्देश्य उन समुदायों को संरक्षण देना है, जिनकी विशिष्ट परिस्थितियां उन्हें व्यापक समाज से अलग संवेदनशील स्थिति में रखती रही हैं। ऐसे में संरक्षण का आधार जिस जनजातीय पहचान को बनाया गया है, उस पहचान का वास्तविक अस्तित्व भी महत्वपूर्ण होगा। यदि कोई व्यक्ति अपने जनजातीय समाज के साथ जुड़ा हुआ है, उसी समुदाय के सामाजिक जीवन में भाग लेता है, उसकी परंपराओं और सामाजिक संस्थाओं से संबंध रखता है तथा समुदाय उसे अपना सदस्य मानता है, तो पहचान की निरंतरता का सामाजिक आधार सामने रहता है।

दूसरी ओर, यदि लंबे समय में व्यक्ति का जनजातीय समाज से संपर्क टूट चुका है, उसकी सामाजिक पहचान पूरी तरह बदल चुकी है, सामुदायिक जीवन से दूरी बन चुकी है और मूल समुदाय की स्वीकृति का प्रमाण भी उपलब्ध नहीं है, तो यह पूछना कानून का स्वाभाविक अधिकार है कि वर्तमान जनजातीय पहचान का आधार क्या है।

एसटी प्रमाण-पत्र का महत्व अपनी जगह है। सरकारी प्रमाण-पत्र किसी व्यक्ति की जनजातीय स्थिति का महत्वपूर्ण साक्ष्य है। मगर प्रमाण-पत्र को ऐसी ढाल मानना, जिसके आगे बाद के सभी तथ्य अप्रासंगिक हो जाएं, न्यायिक परीक्षण की दृष्टि से उचित नहीं होगा। नन्हकी के मामले में भी अदालत ने यही दृष्टिकोण अपनाया। परिवार रजिस्टर में मुस्लिम धर्म की प्रविष्टि को उसने अकेले निर्णायक आधार नहीं माना। विवाह, बदली हुई सामाजिक पहचान, लंबे समय तक उसी सामाजिक परिवेश में जीवन और मूल भुइयां समुदाय से निरंतर संबंध का पर्याप्त प्रमाण न होना, इन सभी परिस्थितियों को एक साथ देखा गया।

अतत: यह माना कि संबंधित तारीखों पर भुइयां जनजाति की सदस्यता की निरंतरता पर्याप्त रूप से स्थापित नहीं हुई। यह दृष्टिकोण प्रमाण-पत्र और वास्तविक सामाजिक स्थिति के बीच संबंध को रेखांकित करता है। मामला तीन कृषि भूमि सौदों से जुड़ा था। अनुसूचित जनजाति की भूमि के हस्तांतरण को लेकर उत्तर प्रदेश के भूमि कानूनों में विशेष प्रतिबंध रहे हैं। ऐसी स्थिति में यह तय करना जरूरी था कि संबंधित व्यक्ति उस समय वास्तव में एसटी की श्रेणी में आता था या नहीं।

यहीं जनजातीय पहचान का प्रश्न सीधे भूमि-सुरक्षा से जुड़ जाता है। यदि कानून जनजातीय भूमि की रक्षा करता है, तो उस सुरक्षा का लाभ किसे मिलेगा, यह प्रश्न भी उतना ही महत्वपूर्ण है। जमीन का पंजीकरण, राजस्व रिकॉर्ड में नाम और लंबे समय तक कब्जा जैसे तथ्य अपनी जगह हैं। मूल प्रश्न उस वैधानिक पात्रता का रहता है जिसके आधार पर विशेष संरक्षण उपलब्ध है।

मार्च 2026 में सुप्रीम कोर्ट के चिंताड़ा आनंद बनाम आंध्र प्रदेश राज्य फैसले ने अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की संवैधानिक व्यवस्थाओं के बीच महत्वपूर्ण अंतर स्पष्ट किया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अनुसूचित जनजातियों के संबंध में संविधान (अनुसूचित जनजाति) आदेश, 1950 धर्म आधारित बहिष्कार निर्धारित नहीं करता। इसलिए जनजातीय स्थिति का निर्धारण धर्म परिवर्तन मात्र से नहीं किया जा सकता। अदालत ने जनजातीय पहचान के आवश्यक तत्वों में कस्टमरी प्रैक्टिसेज, सोशल ऑर्गनाइजेशन, कम्युनिटी लाइफ और संबंधित जनजातीय समुदाय की अक्सेप्टेंस को महत्वपूर्ण माना। यानी सर्वोच्च न्यायालय के सामने भी पहचान का प्रश्न जन्म से आगे जाकर सामाजिक जीवन तक पहुंचा है।

आज जनजातीय समाज के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में भूमि, संस्कृति, भाषा और सामुदायिक संरचना की सुरक्षा शामिल है। ऐसे समय में जनजातीय पहचान को सिर्फ सरकारी रिकॉर्ड की श्रेणी मानना गंभीर भूल होगी। जनजातीय समाज का अस्तित्व उसकी सामूहिकता में है। उसकी शक्ति उसके समुदाय में है। उसकी पहचान उसके जीवन में है। यदि कोई व्यक्ति अपने मूल समुदाय के साथ संबंध बनाए रखता है, तो बदलती परिस्थितियों में भी उसकी जनजातीय पहचान के बने रहने की पूरी गुंजाइश है।

शहर में रहना, आधुनिक शिक्षा लेना, नौकरी करना या जीवनशैली में परिवर्तन करना अपने आप जनजातीय पहचान समाप्त नहीं करता। मगर बात तब बदलती है जब सामाजिक परिवर्तन इतना गहरा हो जाए कि व्यक्ति का अपने मूल समुदाय से वास्तविक संबंध ही समाप्त हो जाए। जहां समुदाय से रिश्ता नहीं, वहां समुदाय की सदस्यता का सामाजिक आधार क्या है? यही वह प्रश्न है जिससे बचा नहीं जा सकता।

यदि धर्म परिवर्तन के साथ व्यक्ति की संपूर्ण सामाजिक पहचान बदल जाती है, मूल समुदाय से लंबे समय का विच्छेद हो जाता है और जनजातीय जीवन से उसका वास्तविक संबंध समाप्त हो जाता है, तो जन्म का पुराना प्रमाण अपने आप वर्तमान सामाजिक पहचान का अंतिम उत्तर कैसे बन सकता है? वास्‍तव में किसी समुदाय की पहचान का संरक्षण तभी संभव है जब उस समुदाय की वास्तविक सदस्यता का अर्थ भी सुरक्षित रहे। जन्म से जनजातीय होना एक ऐतिहासिक तथ्य है। जनजातीय समाज का सदस्य बने रहना एक सामाजिक वास्तविकता है। दोनों के बीच अंतर समझना होगा।

व्यक्ति का जन्म बदला नहीं जा सकता। मगर उसका सामाजिक जीवन बदल सकता है। वह अपने मूल समुदाय के साथ संबंध कायम रखता है या उनसे पूरी तरह दूर हो गया है। इसी वास्तविकता को कानून के सामने आने पर जांचा जा सकता है। वास्‍तव‍िकता यही है कि जनजातीय पहचान का अर्थ उस समाज के जीवन में है।

आखिर जिस समाज की पहचान, संस्कृति और जीवन-पद्धति की रक्षा के लिए संविधान ने विशेष संरक्षण दिया है, उस समाज से वास्तविक संबंध समाप्त होने के बाद उस संरक्षण की पात्रता पर प्रश्न उठाना संविधान की भावना के विरुद्ध कैसे माना जा सकता है? जनजातीय पहचान जन्म से मिल सकती है, मगर उसका सामाजिक अर्थ समुदाय से संबंध में जीवित रहता है। जब वह संबंध ही समाप्त हो जाए, तब जनजातीय होने का दावा भी अपने मूल आधार की परीक्षा के सामने खड़ा होगा। यही सोनभद्र के फैसले का सबसे बड़ा संदेश है।

वास्‍तव में इस निर्णय ने देश भर में उन तमाम लोगों को भी पूरी तरह से जनजाति वर्ग से बाहर का रास्‍ता दिखाने का मार्ग प्रशस्‍त किया है, जोकि इस्‍लाम या ईसाइयत को पूरी तरह से अपना चुके हैं, किंतु आरक्षण का भरपूर लाभ जनजाति प्रमाण-पत्र के आधार पर उठा रहे हैं। अब समय आ गया है कि ऐसे सभी लोगों को चिन्‍हित किया जाए और मिलनेवाले सभी एसटी लाभों से उन्‍हें बाहर किया जाए, ताकि अन्‍य वास्‍तविक जनजाति बन्‍धु उसका पूर्ण लाभ ले सकें।

26 से 30 सितंबर तक सरकारी बैंक शाखाओं में नहीं होगा काम

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लखनऊ। देश के सरकारी बैंकों में 26 से 30 सितंबर तक लगातार पाँच दिन शाखा सेवाएँ प्रभावित रहने की स्थिति बन रही है। 26 सितंबर को चौथा शनिवार है, 27 को रविवार है और 28, 29, 30 सितंबर को यूनाइटेड फोरम ऑफ बैंक यूनियंस ने तीन दिन की राष्ट्रव्यापी हड़ताल का नोटिस दिया है। स्टेट बैंक ऑफ इंडिया ने एडवाइजरी में कहा है कि यूनाइटेड फोरम ऑफ बैंक यूनियंस ने 28 सितंबर से 30 सितंबर 2026 तक हड़ताल प्रस्तावित की है और ग्राहक जरूरी लेनदेन पहले निपटा लें। इंडियन बैंक और यूनियन बैंक ने भी इसी तरह सूचना दी है। यह हड़ताल 11 सितंबर की एक दिन की हड़ताल के बाद हो रही है और 26 अक्टूबर से अनिश्चितकालीन हड़ताल की चेतावनी भी दी गई है।

यह तारीख बहुत संवेदनशील है। 30 सितंबर बैंकों का अर्धवार्षिक समापन है। इस दिन छह महीने का हिसाब मिलान, प्रावधान, ट्रेजरी और मार्केट ऑपरेशन पूरे होते हैं। वित्त मंत्रालय ने 22 सितंबर को अपील जारी कर कहा कि 28 से 30 की हड़ताल और उससे पहले के सप्ताहांत को मिलाकर प्रभावी रूप से पाँच दिन बैंक सेवाएँ बंद रहेंगी और इससे ग्राहकों, कारोबारियों, सरकारी भुगतान और अंतरराष्ट्रीय लेनदेन में असुविधा होगी। मंत्रालय ने इसे वित्तीय कैलेंडर के लिए विशेष रूप से संवेदनशील बिंदु बताया है।

बातचीत क्यों टूटी। उप मुख्य श्रम आयुक्त ने 22 सितंबर को नई दिल्ली में सुलह बैठक बुलाई। इंडियन बैंक्स एसोसिएशन और वित्तीय सेवा विभाग ने कहा कि पाँच दिन के बैंकिंग सप्ताह की माँग सरकार के विचार में है और हड़ताल टाली जाए। ऑल इंडिया बैंक एम्प्लाइज एसोसिएशन के महासचिव ने कहा कि कोई नई प्रगति नहीं हुई। यूनियन का कहना है कि द्विपक्षीय समझौते में पाँच दिन पर सहमति बने ढाई साल हो गए, लेकिन अधिसूचना जारी नहीं हुई। यूनियन तभी हड़ताल पर पुनर्विचार करेगी जब ठोस प्रगति दिखेगी।

सरकार ने बताया कि दो प्रमुख माँगों में से एक पर कार्रवाई हो चुकी है। नवंबर 2024 में जारी परफॉर्मेंस लिंक्ड इंसेंटिव योजना को 2025-26 के लिए स्थगित रखा गया है। सरकार का कहना है कि वेतन, भत्ते, कल्याण निधि में 56 प्रतिशत वृद्धि, पदोन्नति और तबादला प्रक्रिया में सुधार और महिला कर्मचारियों के लिए विशेष छुट्टी जैसे कदम उठाए गए हैं। 2015 से 2026 के बीच लगभग 4.83 लाख भर्तियाँ हुई हैं और जुलाई 2026 तक अधिकारी पदों के 95.84 प्रतिशत और अधीनस्थ स्टाफ के 92 प्रतिशत पद भरे हैं। फिर भी काम का दबाव बना हुआ है क्योंकि योजनाएँ और ग्राहक संख्या तेजी से बढ़ी है।

क्या पाँच दिन का सप्ताह जायज है। दुनिया के अनुभव देखें। ब्रिटेन में 61 कंपनियों में लगभग 2900 कर्मचारियों पर चार दिन के कार्य सप्ताह का बड़ा ट्रायल हुआ और अधिकांश ने इसे जारी रखा। एक अध्ययन में 141 कंपनियों के 2896 कर्मचारियों को छह देशों ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, आयरलैंड, न्यूजीलैंड, ब्रिटेन और अमेरिका में छह महीने तक वेतन कटौती के बिना कम घंटे काम कराया गया। बेल्जियम में कर्मचारियों को समान घंटे चार दिन में पूरा करने का अधिकार मिला है। आइसलैंड में सार्वजनिक क्षेत्र के घंटे कम किए गए हैं। जापान में टोक्यो सरकार ने अप्रैल 2025 से चार दिन की व्यवस्था लागू की ताकि अधिक काम से मृत्यु और घटती जन्म दर की समस्या कम हो। संयुक्त अरब अमीरात, स्पेन, जर्मनी, पुर्तगाल और न्यूजीलैंड में भी प्रयोग हुए हैं। निष्कर्ष रहा कि कम दिन काम से तनाव घटता है और उत्पादकता बढ़ती है।

भारत में बैंककर्मी की हकीकत अलग है। जनधन खाता खोलना, आधार लिंक, केवाईसी, मुद्रा लोन, फसल बीमा, सरकारी सब्सिडी, रिकवरी, ऑडिट और रोज शाम लक्ष्य का दबाव एक ही कर्मचारी झेलता है। कई शाखाओं में सुबह से शाम तक कतार रहती है और लंच तक नहीं मिलता। ट्रांसफर और प्रमोशन की चिंता अलग है। लंबे समय तक बैठने और लक्ष्य के तनाव से स्वास्थ्य पर असर पड़ता है। यूनियन का कहना है कि इंटरनेट बैंकिंग और मोबाइल बैंकिंग चलती रहेंगी, लेकिन नकद जमा निकासी और चेक क्लियरिंग जैसी शाखा सेवाएँ प्रभावित होंगी।

दूसरी तरफ जनता की परेशानी बड़ी है। छोटे व्यापारी को 30 सितंबर को चेक क्लियर कराना है। किसान को किसान क्रेडिट कार्ड का पैसा निकालना है। पेंशनर को जीवन प्रमाण पत्र देना है। छात्र को फीस का ड्राफ्ट बनवाना है। गृहिणी को लॉकर से सामान निकालना है। अगर 26 से 30 तक शाखा बंद रही तो ऐसे सब अटकेंगे। एसबीआई ने कहा है कि एटीएम, कैश मशीन, ग्राहक सेवा केंद्र, योनो, मोबाइल बैंकिंग और यूपीआई का उपयोग करें। लेकिन बुजुर्ग, ग्रामीण और कम डिजिटल साक्षर ग्राहक आज भी शाखा पर ही निर्भर हैं। एटीएम में दो तीन दिन बाद नकदी की कमी भी हो सकती है।

अर्थव्यवस्था पर असर भी है। अर्धवार्षिक समापन पर सरकारी भुगतान, जीएसटी संग्रह, वेतन पेंशन, छोटे उद्योगों के चेक और बड़े व्यापारिक सौदों का निपटान होता है। समाशोधन धीमा हुआ तो चेक अटकेंगे और ब्याज का नुकसान होगा। आयात निर्यात के दस्तावेजों में देरी हो सकती है। इसलिए यह समय हड़ताल के लिए सबसे संवेदनशील माना जा रहा है। साथ ही ग्राहक सेवा बिंदुओं और बिजनेस कॉरेस्पोंडेंट नेटवर्क पर अतिरिक्त भार आएगा।

भरोसे का पहलू भी जरूरी है। बैंक और ग्राहक का रिश्ता भरोसे पर चलता है। बार-बार हड़ताल के नोटिस से घबराहट फैलती है और अफवाहें उड़ती हैं। जबकि पैसा सुरक्षित है, केवल सेवा में देरी है। इसलिए बैंकों को साफ बताना चाहिए कि कौन सी सेवा चलेगी और कौन सी नहीं। प्राइवेट बैंकों का खुला रहना राहत दे सकता है, पर पूरी भरपाई नहीं कर सकता क्योंकि सरकारी समाशोधन पर निर्भरता रहती है।

क्या बीच का रास्ता है। कई देशों ने पाँच दिन लागू किया है और साथ में ग्राहक सेवा के लिए उपाय भी किए हैं। जैसे रोज के घंटे आधा घंटा बढ़ा देना, शनिवार को रोस्टर से कुछ शाखाएँ खुली रखना, या डिजिटल शाखा बनाना। भारत में भी आरबीआई और आईबीए मिलकर ऐसा मॉडल बना सकते हैं जिसमें कर्मचारी को दो दिन की छुट्टी मिले और ग्राहक को लंबा इंतजार न करना पड़े। सभी सरकारी बैंकों में स्वीकृत पदों की संख्या बढ़ाई जा सकती है ताकि बैंक कर्मचारियों पर काम का दबाव कम हो सके। अगली द्विपक्षीय वार्ता पहले शुरू हुई है, इसे जल्द नतीजे तक ले जाना चाहिए।

आम जनता के लिए कुछ आसान सुझाव हैं। पहला, 25 सितंबर तक सभी जरूरी शाखा वाले काम निपटा लें। चेक जमा, नकद निकासी, ड्राफ्ट, जीवन प्रमाण, लोन किस्त जैसे काम पहले कर लें। दूसरा, थोड़ी नकदी घर में रखें। तीसरा, इंटरनेट बैंकिंग और यूपीआई की सीमा और पासवर्ड जाँच लें। चौथा, बड़ा भुगतान 30 को होना है तो उसे 25या 26 को करने की कोशिश करें। पाँचवाँ, बैंक की वेबसाइट और शाखा के नोटिस पर ही भरोसा करें, अफवाहों पर नहीं।

अंत में पाँच दिन के कार्य सप्ताह की माँग समय की माँग है। दुनिया चार दिन की ओर जा रही है, भारत में पाँच दिन की बात हो रही है, यह जायज है। बैंककर्मी भी इंसान हैं, उन्हें भी परिवार और स्वास्थ्य के लिए समय चाहिए। लेकिन इस माँग को मनवाने के लिए पाँच दिन बैंक बंद करना उसी जनता को सजा देना है जिसके भरोसे पर बैंक चलते हैं। बेहतर होगा कि सरकार समय सीमा के साथ अधिसूचना की दिशा में बढ़े और यूनियन त्योहार और समापन को देखते हुए हड़ताल पर पुनर्विचार करे। बातचीत से ही स्थायी रास्ता निकलेगा, बंद से नहीं। समझदारी है।

 

राजनीति में कु-संस्कार को बढ़ावा देती कांग्रेस  

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लखनऊ। कांग्रेस पार्टी चुनावों में लगातार पराजय का सामना कर रही है जिसने पार्टी युवराज राहुल गांधी को हताश कर दिया है। उनको इस हताशा से उबारने के लिए कांग्रेस ने पेपर लीक तथा  छात्रों की अन्य समस्याओं को आधार बनाकर “छात्रों की गूंज” नाम का अभियान अभियान आरंभ किया जिससे कांग्रेस तथा राहुल गाँधी को छात्रों व युवाओं के एकमात्र हितैषी के रूप में स्थापित किया जा सके। जेन ज़ी के जोर शोर और सोशल मीडिया पर तमाम हल्ले गुल्ले के साथ शुरू हुआ राहुल गांधी का छात्रों की गूंज कार्यक्रम पहले झूठे तथा गलत तथ्यों के कारण चर्चा में रहा और फिर अर्मादित,अनुशासनहीन व्यवहार  के कारण । पहले चरण में मनुस्मृति के अपमान से आरम्भ हुआ ये कार्यक्रम अगले चरण में राहुल और संदीप दीक्षित ने द्वारा प्रधानमंत्री पर अशालीन कटाक्ष तक पहुंचा जिसमें एक विदेशी महिला राष्ट्राध्यक्ष पर अपमानजनक टिप्पणी की गयी, उसका विवाद अभी शांत भी नहीं हुआ था कि ये लोग इंदौर पहुँच गए ।

मध्य प्रदेश के इंदौर शहर में 19 सितंबर 2026 को छात्रों की गूँज का आयोजन किया गया । यहाँ  एक बार फिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मिमिक्री की गई उनकी विदेश नीति का मजाक बनाया गया। सोशल मीडिया इन्फ़्लुएन्सर पुलकित मणि ने उनकी मां का भी उपहास उड़ाया और राहुल गांधी ने उनका इस कुकृत्य में साथ दिया। इंदौर में जो कुछ हुआ उसकी निंदा केवल भारतीय जनता पार्टी ही नहीं अपितु कांग्रेस के सहयोगी समाजवादी पार्टी व शिवसेना का उद्धव गुट भी कर रहा है। मुंबई में शिवसेना नेता आनंद दुबे ने कहा कि मंच से किसी के परिवार के बारे में आपत्तिजनक बात करना उचित नहीं है। आने वाले समय में सभी राजनैतिक दलों को इस बात का ध्यान रखना चाहिए। मर्यादा नहीं टूटनी  चाहिए। भारतीय जनता पार्टी ने कांग्रेस के इस कृत्य को सर्कस व राहुल गांधी को “असंस्कारी नाराज फूफा“ करार दिया है।

कांग्रेस के मंच पर जिस प्रकार पुलकित मणि से मिमिक्री कराई गयी वह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के निकृष्टतम उपयोग का उदाहरण है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने राहुल गाँधी पर निशाना साधते हुए कहा कि मैं एक वीडियो देख रहा था जिसमें उन्होंने नारी शक्ति का अपमान किया है। लोगों में संस्कार नहीं है। हमारी परंपरा कहती है – पहले आप। रास्ते में  बुजुर्ग, महिला, दिव्यांग को पहले जाने देना हमारा संस्कार है लेकिन जो भारत को अपमानित करने का लक्ष्य मान लेते हैं वे कुटुम्बकम भाव को नहीं समझ सकते। सत्य ,असत्य और अर्धसत्य होता है और कुछ लोग अर्धसत्य कहकर ही भारत की छवि धूमिल करना चाहते हैं । राहुल के मंच से मोदी जी की मां का उपहास भारत माता का उपहास है, भारत की समस्त मातृशक्ति का उपहास है। मां के उपहास को भारत की मूल आत्मा कतई स्वीकार नहीं करेगी और न ही कभी माफ करने वाली है।

यह सत्य है भारत की सनातन आस्था वाली आम जनता इस प्रकार से किए जाने वाले स्त्री अपमान को सहन नहीं करती और समय आने पर उत्तर देती है। बिहार विधान सभा चुनाव में  कांग्रेस के मंच से पीएम मोदी की मां को गाली दी गई और बिहार में कांग्रेस का सफाया हो गया । इसी प्रकार राहुल गांधी अपने बयान, “लोग मंदिरों में  लड़कियां छेड़ने के लिए जाते हैं” के बाद हुस अपना हश्र भी देख सकते हैं।

राहुल गांधी पूरी तरह से भ्रम फ़ैलाने की राजनीति कर रहे हैं और विकृत मानसिकता से ग्रस्त हो चुके हैं । उनका एकमात्र लक्ष्य प्रधानमंत्री मोदी की छवि को धूमिल करना, सनातन संस्कृति  को बदनाम करना तथा अंतरराष्ट्रीय स्तर भरत की बदलती हुई तस्वीर की विकृत छवि प्रस्तुत करना है। किंतु हो इसका विपरीत रहा है राहुल गांधी अपने  ही बुने जाल में फंसते जा रहे हैं। इससे उनका निकल पाना या सुधर जाना बहुत कठिन हो गया है । राहुल गांधी के असभ्य व्यवहार  के कारण युवा वर्ग उनसे नहीं जुड़ पा रहा है। कांग्रेस का सबसे दुर्भाग्यूपर्ण पहलू यह है कि कोई भी वरिष्ठ नेता राहुल को समझाने के लिए आगे नहीं आता, उनको युवराज का दर्जा हासिल है इसके चाटुकार लोग इंदौर जैसी घटनाओं का समर्थन करने के लिए उतर पड़ते हैं।

देश के युवाओं में आक्रोश है जिसके कारण कामेडियन पुलकित मणि के शो एक के बाद एक रद्द हो रहे हैं। राहुल गांधी के मंच से पर हुई मिमिक्री को  हिंदुस्तान की हर मां और संपूर्ण मातृशक्ति का अपमान बताया जा रहा है लेकिन कांग्रेस के प्रवक्ता और आई टी सेल ण केवल इसके बचाव में लगे हैं वरन इसको मास्टर स्ट्रोक बता रहे हैं। उधर दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्रों ने छात्रसंघ के चुनाव परिणामों में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद को  3- 1 से विजयी बनाकर बता दिया कि देश का युवा क्या पसंद करता है।

वो गाने जिनके बिना अधूरा प्यार कभी पूरा नहीं हो सकता…

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विवेक गुप्ता

लखनऊ। बॉलीवुड ने अनगिनत ऐसे गाने दिए हैं जिन्हें सुनकर आप हंसते हुए रो देंगे या रो रहे होंगे तो किसी और दुनिया में खो जाएंगे. उस दुनिया में जहां आप और आपकी महबूबा के अलावा कोई तीसरा होगा ही नहीं.

मोहब्बत में टूटे हुए लोगों के लिए ये गाने किसी सौगात से कम नहीं हैं या यूं कहे ऐसे लोगों के लिए ये गाने उनके जीने का सहारा होते हैं,एकमात्र सहारा. इन गानों को ना सुनो तो बेचैनी होती है और अगर सुनो तो बेचैनी और भी बढ़ जाती है. वो कहते है कि खाए तो मरे ना खाए तो मरे इससे तो खाकर,स्वाद लेकर मरना ही ठीक है.
ये गाने एक तरफ आपको असहनीय पीड़ा से राहत देते हैं और दूसरी तरफ बेहिसाब तड़प भी. किशोर कुमार,मुकेश,मोहम्मद रफी के गाए गानों में बेतहाशा दर्द झलकता है. अभी आप दर्द भरे ऑल टाइम टॉप 5 गानों के बारें में जानिए.
इस लिस्ट में पुराने गानों को जगह दी गई है क्योंकि पुराने गाने और पुरानी शराब एक जैसी होती है,चढ़ने में समय तो लग सकता है लेकिन अगर एक बार चढ़ गई तो नशा आसानी से उतरता नहीं है. अक्सर जो पीते नहीं हैं उन्हें इश्क के दर्द का घूंट पीना पड़ता है. जब आप कोई नशा नहीं करते तब आपको हर पल दर्द,तड़प,तरस से लड़ना पड़ता है.
टॉप 5 की लिस्ट में सबसे कठिन था किसी गाने को पहली रैंक देना. यहां कई गानों में जबरदस्त टक्कर थी. मेरी इस लिस्ट में भी कई गाने थे जो पहली रैंक पर आ सकते थे. जो नहीं आए वो भी किसी नजरिए से पहली रैंक वाले से कम नहीं हैं.
आखिरकार काफी सोचने,महसूस करने के बाद मैंने किशोर और राजेश खन्ना की सुपरहिट जोड़ी के गाने को शीर्ष रैंक दी. ये गाना था “दो रास्ते” फिल्म का ”खिजा के फूल पे आती कभी बहार नहीं,मेरे नसीब में ऐ दोस्त तेरा प्यार नहीं…” इस गाने का संगीत लक्ष्मीकांत प्यारेलाल ने दिया था और किशोर कुमार की जादुई आवाज के साथ-साथ राजेश खन्ना और मुमताज के अभिनय ने इस गाने में चार चांद लगा दिए थे. इस गाने को आनंद बख्शी ने लिखा था,1969 में रिलीज हुई “दो रास्ते” उस वक्त काफी हिट रही थी. इस फिल्म के सारे गाने सुपरहिट रहे थे.
इस गाने और इस फिल्म में राजेश खन्ना एक ऐसे प्रेमी की भूमिका में थे जो अपनी प्रेमिका से हैसियत में काफी छोटा होता है. आज के दौर से अलग इस फिल्म की हीरोइन मुमताज अपने गरीब प्रेमी को दिल से प्यार करती है. आज के दौर से इतर उनके लिए रुतबा, रुपया,पद,पैसा,गाड़ी,बंगला,हैसियत से ज्यादा प्यार मायने रखता है. किशोर कुमार की आवाज में जब ”गरीब कैसे मोहब्बत करें अमीरों से,बिछड़ गए हैं कई रांझे अपनी हीरों से,किसी को अपने मुकद्दर पे इख्तियार नहीं…” सुनाई पड़ता है तो यकीन करिए ऐसा लगता है कि वो गरीब प्रेमी राजेश खन्ना हम ही हैं और मुमताज जो प्यार,जो तड़प राजेश खन्ना के लिए दिखा रही हैं वो हमारे लिए ही है.
किशोर कुमार ने इस गाने में दिखा दिया है कि वो कितने वर्सटाइल हैं और कभी-कभी तो लगता है कि राजेश खन्ना की आवाज किशोर कुमार ही हैं. जैसे मुकेश को राज कपूर की आवाज माना जाता था.
इस गाने के दिलकश बोल ”मैं रोज लब पे नई एक आह तकता हूं,मैं रोज एक नए गम की राह तकता हूं,किसी खुशी का मेरे दिल को इंतजार नहीं…” आपकी आंखों को झरना बनाने के लिए काफी हैं. अगर आप जैसे तैसे अपने आप को संभाल भी लें तो अगली कड़ी ”गरीब कैसे मोहब्बत करें अमीरों से,बिछड़ गए हैं कई रांझें अपनी हीर से,किसी को अपने मुकद्दर पे इख्तियार नहीं ” गारंटी के साथ आपकी आंखों को नम कर देगी. इस लाइन के साथ लगता है कि मर्सिडीज की कार और सच्चा प्यार गरीबों की किस्मत में नहीं होता. इस गाने को सुनकर समझ में आता है प्यार अपनी अंतिम मंजिल के लिए वफादारी,ईमानदारी और सच से ज्यादा नसीब पर निर्भर करता है.
रैंक एक के लिए काफी कशमकश थी लेकिन इन दो कड़ियों के बाद साफ था कि ये गाना मेरी लिस्ट में नंबर एक ही होना था. इस गाने में किशोर कुमार ने अपनी आवाज से हिला कर रख दिया है. इसे कितनी बार भी सुन लो हर बार दुबारा सुनने का मन करता है. राजेश खन्ना का इस गाने में लुक और नेचुरल एक्टिंग इस गाने को यादगार बना देती है.
इस फिल्म में ‘बिंदिया चमकेगी चूड़ी खनकेगी…’और ‘ये रेशमी जुल्फे,ये शरबती आंखें,इन्हें देखकर जी रहे हैं सभी…’ जैसे गाने भी थे. राजेश खन्ना और मुमताज की सुपरहिट जोड़ी की ये फिल्म भी काफी जबरदस्त हिट रही थी. अगर आप की मोहब्बत साजिश,झूठ, गलतफहमी,कम्युनिकेशन गैप की शिकार हुई है तो ये गाना आपकी दिनचर्या का एक अहम,अनिवार्य और अपरिहार्य हिस्सा बन जाता है.
दूसरे नंबर पर आता है एक बार फिर ऐसी जोड़ी का गाना जो लगता है एक-दूसरे के लिए ही बने थे. जी हां आप सही समझे इस बार भी किशोर कुमार और राजेश खन्ना की जोड़ी इस लिस्ट में है. नंबर एक के बाद नंबर दो पर भी इनका ही कब्जा है. फिल्म का नाम है “आप की कसम” और इस गाने में संगीत दिया आर डी बर्मन ने. गाने के बोल हैं, ”जिंदगी के सफर में गुजर जाते है जो मुकाम वो फिर नहीं आते…” आनंद बक्शी का लिखा ये गाना 1974 में आई “आप की कसम” का एक गाना ही नहीं लगता बल्कि ये जिंदगी की असली सच्चाई बताने वाला एक फलसफा लगता है.
ये गाना जीवन का एक बड़ा हिस्सा दिखाई पड़ता है जो या तो आपकी जिंदगी में चल रहा है या कहीं ना कहीं पीछे छूट गया है. ये हिस्सा वो होता है जो आपके लिए अनमोल और कभी ना भूलने वाला होता है.
चलती हुई ट्रेन में फिल्माया गाया ये गाना आपको रोने और अपने जिंदगी के उस दौर को याद करने पर मजबूर कर देता है जो आप काफी पीछे छोड़ आए हैं. अगर आपने किसी से गलतफहमी,दूसरों के बहकाने पर अपना रिश्ता खराब किया है और बाद में आपको सच पता चलता है या आपके साथ ऐसा हुआ है तो इस गाने को सुनकर आपकी आंख से आंसू जरूर निकल आएंगे,कुछ पत्थर दिल यहां अपवाद हो सकते हैं.
इस गाने के बैकग्राउंड में राजेश खन्ना अपनी पत्नी जिसकी भूमिका मुमताज ने निभाई है,के ऊपर गलतफहमी में शक करने लगते हैं जिससे मुमताज उनसे दूर चली जाती हैं. बाद में जब उन्हें सच्चाई का पता चलता है और अपनी प्रचंड गलती का अहसास होता है तब उनके पास पछताने के लिए भी कुछ नहीं बचता.
ये गाना एक सबक भी देता है कि अगर आपको किसी भी चीज का शक है या किसी ने किसी के बारे में कुछ गलत कहा है तो उसकी तह तक जाना जरूरी है वरना एक समय के बाद आपके पास पछताने के लिए भी कुछ नहीं बचता. दूसरा तो विरह की अग्नि में जलता ही है सच जानने के बाद आप भी आत्मग्लानि की अग्नि में जल जाओगे. इससे अच्छा है विश्वास करो और एक मौका दो,कम से कम गलती तो बताओ साथ ही अपनी बात रखने,सफाई देने के लिए 5 मिनट तो दे दो.
पहली बात तो यहां जलने वाली स्वार्थी दुनिया का काम होगा भड़काने और आग लगाने का लेकिन अगर वाकई कोई गलती की भी है तो उसे सुधारा जा सकता है. क्योंकि जो सच्चा प्यार करते हैं वो कुछ भी पॉजिटिव कर सकते हैं अपने प्यार के लिए,अपने प्यार को पाने के लिए.
जब किसी के लिए दिल दीवाना होता है तो जिसके लिए दीवानगी होती है उसे देखकर सामान्य रहा ही नहीं जा सकता. यही तो प्यार है जहां अपने इश्क के सिवा कुछ दिखाई ही नहीं देता. इसी का फायदा स्वार्थी,जलनखोर दुनिया उठाकर इश्क की असामान्यता,खूबसूरत गलतियों को अक्षम्य अपराध बना देती है. समझना चाहिए इस मतलब की दुनिया में सभी को हाथ सेंकने में मजा आता है,किसी का घर बसाने से ज्यादा उजाड़ने में दुनिया आगे रहती है.
इस गाने के ये बोल पछताने की पूरी कहानी बयां करते हैं, ”आंख धोखा है क्या भरोसा है सुनो,दोस्तों शक दोस्ती का दुश्मन है,अपने दिल में इसे घर बनाने ना दो,कल तड़पना पड़े याद में जिनकी रोक लो रूठकर उनको जाने ना दो,बाद में प्यार के चाहे भेजो हजारों सलाम, वो फिर नहीं आते,वो फिर नहीं आते…” इस लाइन को सुनकर तो सबके आंसू निकलने तय हैं और यकीन करिए यहां कोई अपवाद भी नहीं है.
अगर आप ने किसी गलतफहमी,किसी के बहकावे में आकर किसी को खोया है,नफरत की है,उसे वो जगह नहीं दी जिसका वो हकदार है या आपके साथ ऐसा हुआ है कि आपको किसी के बहकाने की वजह से मासूम,निर्दोष होने के बाद भी बहुत बड़ी सजा मिली है. तो ये पूरा गाना आपको रुलाता ही रहेगा. आपसे विनम्र निवेदन है कि अगर आपके शरीर में पानी की कमी है तो ये गाना पूरा ना सुनिए. क्योंकि आगे के बोल ”सुबह आती है,रात जाती है,सुबह आती है, रात जाती है,यूं ही,वक्त चलता ही रहता है रुकता नहीं,एक पल में ये आगे निकल जाता है,आदमी ठीक से देख पाता नहीं और पर्दे पे मंजर बदल जाता है…”आपको हिलाकर रख देंगे. और आप इतना रोएंगे कि आप डिहाइड्रेशन के शिकार भी हो सकते हैं. आपको पता ही नहीं चलता आपकी दुनिया का मंजर कब बदल गया और आप इस दुनिया की भीड़ में भी अकेले हो गए हैं.
इस गाने की शुरुआत ही बड़ी शानदार होती है. जब किशोर कुमार की जादुई आवाज में सुनने को मिलता है, ”फूल खिलते हैं,लोग मिलते हैं,फूल खिलते हैं,लोग मिलते हैं मगर,पतझड़ में जो फूल मुरझा जाते हैं,वो बहारों के आने से खिलते नहीं,कुछ लोग एक रोज जो बिछड़ जाते हैं वो हजारों के आने से मिलते नहीं…” इस गाने की शुरुआत की ये लाइने आपको एक ऐसा मीठा दर्द देती हैं जिसे मैं भी शब्दों में बयां नहीं कर सकता. इस गाने को सुनने के बाद आपको लगेगा कि अगर आपकी प्लेलिस्ट में ये गाना अकेला भी हो तो बहुत है.
तीसरे नंबर पर भी किशोर कुमार का गाया हुआ गाना ही है. यानी दादा की हैट्रिक हो गई लेकिन राजेश खन्ना की हैट्रिक बॉलीवुड के हीमैन कहे जाने वाले धर्मेंद्र ने तोड़ दी. मेरे फेवरेट हीरो धर्मेंद्र पर फिल्माए गए इस गाने के बोल हैं, ”हम बेवफा हरगिज ना थे पर हम वफा कर ना सके…” 1978 में आई शालीमार फिल्म के इस गाने को शायद ही कोई हो जिसने इसे सुना ना हो. अधूरी प्रेम कहानी इस गाने के बिना कभी पूरी नहीं होती. धर्मेंद्र और जीनत अमान के अभिनय से ये गाना और शानदार बन जाता है. किशोर कुमार ने इस गाने में सारा दर्द निकालकर रख दिया है.
धर्मेंद्र प्यार में अपनी वफादारी,अपनी बेगुनाही का सबूत इस गाने के माध्यम से बखूबी देने की कोशिश करते हैं. रील लाइफ में कामयाब भी हो जाते होंगे लेकिन रियल लाइफ में क्या ये संभव है? साजिश करने झूठ बोलकर भड़काने में एक्सपर्ट ज़माने के सामने तो ये मुश्किल ही लगता है.
पंचम दा का शानदार म्यूजिक इस गाने को अलग बना देता है. इस गाने में जब ”तुमने जो देखा सुना सच था मगर,कितना था सच ये किसको पता,जाने तुम्हें मैंने कोई धोखा दिया,जाने तुम्हें कोई धोखा हुआ,इस प्यार में सच झूठ का तुम फैसला कर ना सके…” लाइन आती है तब बड़े से बड़े पत्थर दिल इंसान की आखों में नमी आ जाती है. अक्सर होता भी ऐसा ही है कि प्रेमी या प्रेमिका किसी के बहकाने और बरगलाने में बड़ी जल्दी आ जाते हैं (वैसे भी जमाना तो प्यार का दुश्मन होता ही है) और जो उनसे बेपनाह प्यार करते हैं उनसे ही नफरत करने लग जाते हैं. गलतफहमी की दीवार इतनी मजबूत हो जाती है कि एक-दूसरे को सफाई देने या सच बताने का मौका भी नहीं देते. “जाने तुम्हें कोई धोखा हुआ..” सुनकर लगता है,हां जरूर यही हुआ होगा.
ये गाना मासूम बेगुनाह लोगों के लिए ही बना है,इसे सुने और अपने बेतहाशा दर्द का एहसास करें वो बात अलग है इस गाने को सुनने के बाद दर्द और बढ़ता ही है. मेरी लिस्ट में ये गाना तीसरे नंबर पर है. इस एवरग्रीन गाने को कई बार सुना जा सकता है. हां इस गाने को सुनकर ये लगता है बदलते ज़माने के साथ बेवफाई के तरीके भी बदल गए हैं.
इस लिस्ट में चौथे नंबर पर किशोर कुमार का गाना नहीं है. अब बारी आती है मोहम्मद रफी साहब की. चौथे नंबर पर उनका गाया गाना ”बर्बादे मोहब्बत की दुआ साथ लिए जा…” आता है. ये गाना सुपर डुपर हिट फिल्म ‘लैला मजनू’ का है. 1976 में दर्शकों के सामने आई इस फिल्म से ऋषि कपूर ने अलग ही शोहरत हासिल की थी.
इस फिल्म से वो अरब कंट्रीज के चहेते बन गए थे. इंडिया के साथ-साथ इस फिल्म ने अरब कंट्रीज में भी काफी धूम मचाई थी. इस गाने का संगीत मदन मोहन और जयदेव ने दिया,वहीं साहिर लुधियानवी ने इस फिल्म के अमर गीतों को लिखा था.
इस गाने को इसके बोल के साथ मोहम्मद रफी की आवाज ने अमर बना दिया था. आज भी ये गाना बहुत पसंद किया जाता है. जिन लोगों को प्यार में दर्द मिलता है या किसी भी वजह से अपने साथी से दूर हो जाते हैं. जिनको अपने साथी को पाने की कोई उम्मीद नहीं बचती,उनके पास इस गाने को सुनने के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं बचता.
”ये जान भी ऐ जाने अदा साथ लिए जा और तपती हुई राहों से तुझे आंच ना पहुंचे,दीवाने के अश्कों की घटा साथ लिए जा…” मोहम्मद रफी की आवाज में ये लाइनें किसी भी पत्थर दिल इंसान को रोने के लिए मजबूर कर देंगी,हां कोई सबके सामने रोने लगेगा तो कोई अकेले में रोएगा लेकिन जो सुनेगा वो रोएगा जरूर ये तय है.
ये गाना रेगिस्तान में फिल्माया गया है. जिसे देखकर याद आता है कि ऐसा एक रेगिस्तान तो हमारे दिल में भी है,सूना-सूना वीरान और सूखा…हां दुख इस बात का ज्यादा है कि कभी यहां एक घना जंगल होता था,जिसे अविश्वास,झूठ और साजिश ने उजाड़कर रेगिस्तान बना दिया.
“बर्बाद मोहब्बत की दुआ साथ लिए जा…” पहली लाइन ही दिखा देती है कि सच्ची मोहब्बत करने वाला हमेशा,मरते दम तक अपने सच्चे इश्क को दुआ ही देगा. चाहे उसके साथ कितना भी बुरा सुलूक किया जाए,उसकी जान ही क्यों न ले ली जाए. वो दिल से अपने नासमझ,नादान ना होने वाले साथी के लिए हमेशा भर भरकर दुआ ही देगा. यही तो सच्ची मोहब्बत है. मोहब्बत कहीं गलत हाथों में तो नहीं फंस रही इसकी चिंता भी की जाएगी और इसके लिए उसे बार-बार आगाह भी किया जाएगा. वो खुश तो आप खुश चाहे वो आपसे कितनी भी दूर हो.
इस फिल्म के कई गाने हिट रहे जिसमें से ”लिखकर तेरा नाम जमीं पर उसको सजदा करता है…” मुझे काफी पसंद है.
मुझे मुकेश के गाने काफी पसंद है लेकिन अभी तक इस लिस्ट में उनका कोई भी गाना नहीं है और चौंकाने वाली बात है कि पांचवें नंबर पर भी उनका गाना नहीं है. यहां पर एक बार फिर किशोर कुमार आ गए हैं वो भी एक बार फिर राजेश खन्ना के साथ. ”ये लाल रंग कब मुझे छोड़ेगा,मेरा गम कब तलक मेरा दिल तोड़ेगा…” मुझे ये कहना ही पड़ेगा कि किशोर कुमार और राजेश खन्ना ही दर्द के असली साथी हैं. प्रेम दीवानों के असली पालनहार हैं.
1974 में आई “प्रेम नगर” के इस गाने में एक अजीब सा दर्द है जिसे बयां नहीं किया जा सकता. इस दर्द को सिर्फ महसूस ही किया जा सकता है. “ये लाल रंग कब मुझे छोड़ेगा…” इस गाने को सुनकर आपको सुन्न दर्द का अहसास होता है जिसकी झनझनाहट इस गाने के खत्म होने के बाद भी आपके साथ ही रहती है.
इस फिल्म में म्यूजिक दिया है मशहूर संगीतकार सचिन देव वर्मन ने और इस गाने के बोल लिखे हैं आनंद बख्शी ने. इस गाने में आपको ड्रीम गर्ल हेमा मालिनी भी दिखाई देंगी. गाने की शुरुआत में शराब के आदी हो चुके राजेश खन्ना शराब की बोतल उठाकर फेंक देते हैं. जैसा कि अक्सर होता है नाकाम इश्क में शराब या कोई और नशे की लत लग ही जाती है. जो पूरी जिंदगी शराब,सिगरेट से दूर भागते हैं एक नाकाम इश्क उन्हें इसका आदी बना देता है.
आजकल के युवाओं को इससे बचना चाहिए और जिंदगी से लड़ना चाहिए. अंतिम सांस तक अपने सच्चे इश्क को पाने के लिए संघर्ष करना चाहिए. ध्यान रहे संघर्ष के लिए शरीर और दिमाग जानदार होना चाहिए और इसके लिए नशे से दूरी बहुत ही जरूरी है. वैसे भी अगर किसी को किसी से सच्चा बेपनाह इश्क है तो उसे किसी और नशे की क्या जरूरत. किसी के सच्चे इश्क से बड़ा कोई नशा हो ही नहीं सकता.
इस गाने के बोल “किसी का भी लिया नाम तो आई याद तू ही तू…”
क्या शानदार और सही बोल हैं. जिससे प्यार होता है उसके सिवा कुछ याद ही नहीं रहता.
इस गाने को बड़ी हवेली में फिल्माया गया है. ”पीने की कसम डाल दी पियूंगा किस तरह,ये ना सोचा तूने यार मैं जिऊंगा किस तरह,चला जाऊं कहीं छोड़कर मैं तेरा ये शहर,ना तो यहां अमृत मिले,पीने को ना जहर…” किशोर कुमार की दर्द भरी आवाज में गाया गाना आपको दर्द की सुपर डोज देता है. वैसे अगर आपको ना पीने की कसम देने वाला कोई है तो आपके पास बहुत कुछ है,सदमा तो वहां है जहां आपके पीने,ना पीने,जीने या मरने से किसी को कोई फर्क ही नहीं पड़ता. जिसके चक्कर में आपने सिगरेट पीनी शुरू की थीं,वो आपकी तड़प/पीड़ा/तरस को सिगरेट के धुएं की तरह हवा में उड़ा रहा है,अपनी जिंदगी में मस्त है.
इस गाने में राजेश खन्ना ने बड़ी ही नेचुरल एक्टिंग की है. किशोर कुमार की आवाज में जो दर्द दिखता है वैसे ही दर्द में डूबे आशिक का शानदार अभिनय किया है काका ने. किसी ने तब सही कहा था कि ऊपर आका नीचे काका. इस गाने को सुनिए और खो जाइए.
जो लोग पीते हैं और प्यार के गम में है वो राजेश खन्ना के रूप में अपने आप को महसूस कर सकते हैं. जो लोग पीते नहीं हैं और अथाह दर्द/पीड़ा में हैं वो “मेरे पसंदीदा 5 दर्द भरे गाने” की पोस्ट लिखकर सोशल मीडिया पर डाल सकते हैं.
ये गाना काफी पसंद किया जाता है और दर्द भरे गानों में इसे एक्सट्रीम लेवल का माना जाता है. ये गाना अगर आप भीड़ में भी सुनेंगे तो आपको एक अकेलेपन का एहसास होगा.
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