सत्ता के नशे में प्याज और जूते दोनों खाने की लत

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दयानंद पांडेय

लखनऊ। सहमति और असहमति की अंत्याक्षरी में देश झुलस रहा है l तो भी चुनाव आयुक्तों के बीच असहमति कोई पहली बार नहीं हुई है l मुंडे-मुंडे मतिर्भिन्ना की अवधारणा प्राचीन है l चुनाव आयोग में पहले के भी असहमति के अनेक किस्से हैं l सुप्रीम कोर्ट , हाई कोर्ट की बेंच में भी निरंतर असहमति आम बात है l कोई भी फ़ैसला बहुमत या सर्वसम्मत से होता रहता है l देखिए न सुप्रीम कोर्ट में भी अभी इसी चुनाव आयोग के मुद्दे पर मतभेद की ख़बर आ गई है l दो जज इस मसले को सुन रहे थे l आपसी सहमति न होने पर मामला पाँच जजों की संविधान पीठ को सौंप दिया गया है l यह एक प्रक्रिया है l पुरानी है , नई नहीं l

लेकिन विपक्ष और मीडिया की रोजी रोटी भी एक तत्व है l आनंद लीजिए इस रोज़ी रोज़गार का l चिंतित नहीं l बिल्कुल नहीं l लोकतंत्र ख़तरे में नहीं है l ख़तरे में तो हमारा समाज है l जाति, आरक्षण , दलित की ब्लैकमेलिंग में है l

अब देखिए न बिहार के जमुई में नाबालिग लड़की के साथ अभद्रता की बात बहुत ज़ोर शोर से उठी l आरोपियों के भगवा गमछे ने आग लगा दी l लेकिन जैसे ही पता चला कि आरोपी यादव और मुस्लिम हैं , आग बुझ गई l प्रतिपक्ष और उस का पालतू मीडिया ख़ामोश हो गया l तेजस्वी यादव को साँप सूंघ गया है l

मुंबई में आई आई टी मामले में भी असहमति का आनंद देखिए l जिस लड़के ने आत्महत्या की , उस के पिता और माता शोक में नहीं , आंदोलन के मूड में है l अव्वल तो उन्हें मुआवजा तुरंत चाहिए l बाक़ी उन के तेवर बता रहे हैं कि वह चुनाव लड़ने की तैयारी में है l बेटे की लाश पर वह नेता बनने की तैयारी में है l पिता जाँच हुए बिना वह प्रोफ़ेसर की गिरफ़्तारी का पहाड़ा पढ़ रहा है l उपदेश दे रहा है l प्रोफ़ेसर को एकतरफा दोषी बता देने की बात पर असहमतियों का सागर हिलोरें मार रहा है l ग़नीमत बस यही है कि प्रोफ़ेसर गुल्ला भी ओ बी सी हैं l खुदा न खास्ता अगर सवर्ण होते तो ? उस में भी अगर ब्राह्मण होते तो ?

मुंबई आग के हवाले हो गई होती l आई आई टी ही जला देते l धुआँ-धुआँ हो गई होती l अभी तो देश की लगभग सभी आई आई टी की फैकल्टी प्रोफेसर को नैतिक समर्थन दे कर साथ खड़ी हैं l यह बहुत बड़ी बात है l पर दलित एक्ट को इसी तरह सभी राजनीतिक पार्टियां वोट बैंक के चक्कर में तलवार बना कर चमकाती रहीं तो देश और समाज किस मोड़ पर खड़ा मिलेगा , सोच कर एक बार देख लीजिए l मेडिकल की सीटों पर माइनस चालीस का बुखार चढ़ा ही है अब आई आई टी को भी इस में झुलसाने की तैयारी हो गई है l

आरक्षण के भिखारी और कोढ़ी एडमिशन तो आरक्षण से पा जाते हैं l फ़ीस मुफ़्त हो जाती है और हास्टल भी l पर पढ़ाई के लिए अपेक्षित बुद्धि और मेहनत तो आरक्षण से नहीं मिल पाता l अर्जित करनी पड़ती है l नहीं मिलती तो नकल करते हैं l पकड़े जाते हैं l दलित फलित का ड्रामा करते हैं l लांछन लगाते हैं l आत्महत्या कर लेते हैं l अभी-अभी मेडिकल के एक यादव छात्र की आत्महत्या की ख़बर आ रही है l

करेला और नीम चढ़ा पहले ही सा था पर मोदी सरकार ने लाखों के मुआवजे का विष पिला कर दलितों को भस्मासुर बना दिया है l यू जी सी रोल बैक पर अगर धर्मेंद्र प्रधान हटा दिए गए होते तो काकरोचों से इस तरह अपमानित न होना पड़ता l लेकिन मोदी और उन की सरकार को सत्ता के नशे में प्याज और जूते दोनों खाने की लत लग गई है l संसद में फ़ैसला बदल कर सुप्रीम कोर्ट के हाथ बांध दिए हैं l संसद और सुप्रीम कोर्ट की इस असहमति का क्या करेंगे ?

संविधान में ही तमाम असहमतियां और अंतर्विरोध के बीज भरे पड़े हैं l

तो क्या देश में जातीय आग लगा देने के बाद ही सभी राजनीतिक पार्टियों का सत्ता सुख लेना फ़ार्मूला बन गया है l जातियों की सहमति और असहमति की यह अंत्याक्षरी देश को किस तरह खोखला और निर्जीव बना गई है , देखना दुर्भाग्यपूर्ण है l

एक अपराधी की सजा पूरे समाज पर शक नहीं बननी चाहिए

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गाजियाबाद:  गाजियाबाद के अजय भाटी ने एक बच्ची को गोद लिया और उसके साथ दुष्कर्म किया। ऐसे बाप पर लानत भेजना चाहिए। अदालत ने उसे उम्रकैद की सजा सुनाई। यह फैसला अपराध की गंभीरता को दिखाता है। लेकिन एक-दो भयानक घटनाओं से पूरे समाज को एक तराजू पर तौलना गलत है। इससे यह निष्कर्ष निकालना कि जो आदमी बेटी गोद लेता है, वह संदेह के घेरे में आ जाता है, पूरी तरह अनुचित है। ऐसे सोच वाले लोगों को अपनी सोच बदलनी चाहिए।

गोद लेना करुणा है, संदेह नहीं

गोद लेना करुणा, जिम्मेदारी और परिवार बनाने का फैसला होता है। देशभर में हजारों पिता अनाथ या असहाय बच्चियों को घर देते हैं, उन्हें पढ़ाते-लिखाते हैं, उनकी सुरक्षा का ख्याल रखते हैं और उन्हें अपनी संतान की तरह पालते हैं। ये संवेदनशील पिता होते हैं। एक अपराधी की हरकत से इन सभी पिताओं पर शक करना न सिर्फ अन्याय है, बल्कि गोद लेने की प्रक्रिया को भी नुकसान पहुँचाता है। समाज में पहले से ही गोद लेने को लेकर कई सामाजिक और कानूनी जटिलताएँ हैं। यदि हर गोद लिए गए बच्चे के पिता को संदेह की नजर से देखा जाने लगे, तो कई परिवार इस नेक काम से पीछे हट सकते हैं। अपराध की निंदा होनी चाहिए, अपराधी को सजा मिलनी चाहिए, लेकिन निर्दोष पिताओं को एक साथ खड़ा करके आरोपित नहीं किया जा सकता।

एक आरोपी से पूरी कांवड़ यात्रा को मत नापिए

इसी तरह कुछ पत्रकारों ने खोज निकाला कि बिहार के जमुई मामले का आरोपी कांवड़ लेकर जाता था। कितनी नीची सोच है ऐसी पत्रकारिता की, जो एक-दो घटनाओं को सामने रखकर कांवड़ ले जाने वाले हर व्यक्ति को संदेह के घेरे में डाल देती है। ऐसे ही कुछ लोग अजय भाटी का उदाहरण देकर हर उस बाप पर सवाल उठाते फिरेंगे जिसने बेटी गोद ली है। किसी एक अपराधी को कांवड़ यात्रा से जोड़कर लाखों श्रद्धालु यात्रियों का अपमान नहीं किया जा सकता। ये यात्री पूरी आस्था और अनुशासन के साथ यह यात्रा करते हैं। एक व्यक्ति का अपराध पूरी परंपरा या पूरे समुदाय का चरित्र नहीं बन जाता।

पत्रकारिता बड़ी जिम्मेदारी का काम है। पत्रकार हो या यूट्यूबर, हर शब्द संभालकर खर्च करना चाहिए। सनसनी फैलाने से पहले सोचना चाहिए कि कहीं निर्दोष लोगों की छवि तो नहीं बिगाड़ रहे। अपराध की खबर हो, सजा की खबर हो, लेकिन सामान्यीकरण से बचना चाहिए। समाज तभी मजबूत रहता है जब वह अपराधी को अलग करके देखे, पूरे समाज को अपराधी बनाकर नहीं।

जब कवि ने कहा

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दिल्ली। कस्तूरी द्वारा आयोजित साहित्यिक श्रृंखला “जब कवि ने कहा” के अंतर्गत 20 सितंबर 2026 को इंडियन इंटरनेशनल सेंटर, नई दिल्ली में रचनाकार मनोज सिंह के ‘खंडकाव्य ’ चंद्रिकोत्सव पर पुस्तक–परिचर्चा का आयोजन किया गया।
पुस्तक परिचर्चा की शुरुआत डॉ. चैताली सिन्हा जी ने चंद्रिकोत्सव खंड काव्य के अंश का पाठ करके किया।
पुस्तक परिचर्चा के क्रम में मुख्य वक्ता के रूप में निशा नाग पुरोहित जी ने अपने वक्तव्य की शुरुआत सभी श्रोताओं के अभिवादन और अभिनंदन से की। उन्होंने आयोजकों को मंच पर आमंत्रित करने के लिए आभार व्यक्त किया। उन्होंने विनम्रता से कहा कि वे कभी-कभी अपनी पद्धति से चलती हैं – “पीछे का पहले और पहले का बाद” और फिर वक्ता ने बताया कि उन्होंने मनोज जी की दो पुस्तकों को देखा है। पहली पुस्तक: मैं रामवंशी हूँ – जिसे उन्होंने भली-भाँति पढ़ा है। दूसरी पुस्तक: मैं आर्यपुत्र हूँ – जिसे वे अभी पढ़ने की ओर अग्रसर हैं। वक्ता ने पुस्तक आर्यपुत्र की गहनता पर प्रकाश डाला। और आर्यपुत्र में मनोज जी वेदों, पुराणों, उपनिषदों, ब्राह्मण ग्रंथों और अनेकानेक इतिहास ग्रंथों को भी खंगालते हैं, टटोलते हैं और बड़ी खूबसूरती से अपनी बात को रखते हैं। उनके अनुसार लेखक ने केवल कथा नहीं कही, बल्कि प्राचीन भारतीय ज्ञान परंपरा के मूल स्रोतों का गहन अध्ययन कर तथ्यों को सुंदरता से प्रस्तुत किया है।
मुख्य अतिथि भारती गोरे जी ने अपने वक्तव्य की शुरुआत कार्यक्रम के सूत्रधार विशाल जी, उपस्थित बच्चों, छात्रों और सभी सुधीजनों का अभिवादन करते हुए की, उन्होंने बताया कि उन्होंने ‘चंद्रिकोत्सव’ को एक बार नहीं, बल्कि कई बार और अलग-अलग दृष्टिकोणों से पढ़ा है। यह पुस्तक एक बार पढ़कर समझने वाली नहीं है। संयोग की बात बताते हुए उन्होंने कहा कि जैसे अभी निशा जी को ‘कामायनी’ याद आ रही थी, वैसे ही उन्हें भी ‘चंद्रिकोत्सव’ पढ़ते हुए लगातार जयशंकर प्रसाद की ‘कामायनी’ का स्मरण होता रहा। उन्होंने कहा कि ‘चंद्रिकोत्सव’ और ‘कामायनी’ के मार्गक्रमण और साधारणीकरण में गहरा साम्य है। इस साम्य को स्पष्ट करने के लिए उन्होंने ‘कामायनी’ के कई उद्धरणों का उदाहरण दिये।
रचनाकार एवं साहित्यकार मनोज सिंह जी ने अपने वक्तव्य में सभी का आभार व्यक्त किया। वक्ता ने कहा कि अगर हम प्राचीन काल के साहित्यिक इतिहास को देखें तो इतिहास का प्रारंभ ही पद से होता है।
रामायण और महाभारत आज भी पद्य के रूप में ही गाई जाती हैं, पढ़ी नहीं जाती। वक्ता ने शोधकर्ताओं को संबोधित करते हुए कहा कि-
मिस्र में पूजा स्थलों पर मिली प्राचीनतम रचनाएँ भी पद्य में हैं। मेसोपोटामिया और ईरान की आर्य परम्परा में भी आरंभिक रचनाएँ पद्य में ही मिलती हैं। यानी यह केवल भारतीय नहीं, वैश्विक सत्य है। वक्ता ने अपने अनुज विद्वान से हुई चर्चा का जिक्र करते हुए 8वीं शताब्दी के कश्मीर के महान राजा जयापीड का उदाहरण दिया।जयापीड कर्कोट वंश का इतना प्रतापी राजा था इतना बड़ा सम्राट होने के बावजूद उसे ‘कवि’ कहलाने पर गर्व था। उसके अभिलेखों में उसे कवि कहा गया है। वक्ता ने एक अनूठी रचना का जिक्र किया जिस पर वह अध्ययन कर रहे हैं – महाकवि दामोदर भट्ट कृत ‘कुट्टनीमतम्’। और अंत में वक्ता ने विनम्रता से कहा कि वह रोज़ पढ़ने का प्रयास करते हैं और विद्वानों के सामने बोलते हुए उन्हें स्वयं विश्वास नहीं हो रहा कि उन्होंने ऐसा गहन चिंतन किया है।
अध्यक्षीय उद्बोधन में प्रेरणा मल्होत्रा जी कहते हैं वक्ता ने सबसे पहले आयोजकों का आभार व्यक्त किया कि उन्हें इस कार्यक्रम में बुलाया गया। उन्होंने अपने से पूर्व बोलीं निशा जी, भारती जी और स्वयं रचनाकार को सुनने के बाद अपनी बात रखी। वक्ता ने कहा कि पुस्तक को पढ़ने से पहले उसे देखना होता है। इस पुस्तक को देखते ही – नीला रंग: समुद्र जैसा गंभीर, शांत, सहजता का प्रतीक। चांदनी की शीतलता, समुद्र पर चाँद की परछाई। पुस्तक पर प्रभात प्रकाशन का नाम देखकर वक्ता ने आश्चर्य व्यक्त किया। प्रभात प्रकाशन आमतौर पर कविता प्रकाशित नहीं करता, वह नॉन-फिक्शन और राष्ट्रवादी विषयों के लिए जाना जाता है। वक्ता ने कहा – “प्रभात ने किया तो कुछ विशेष होगा” – इससे पुस्तक के महत्व का अंदाजा लगता है। यह वक्तव्य केवल पुस्तक समीक्षा नहीं था, बल्कि पुस्तक के बाह्य सौंदर्य, रंगों के मनोविज्ञान और प्रकाशन परंपरा को तोड़कर कविता को स्थान देने के साहस की सराहना थी। वक्ता ने बहुत ही साहित्यिक और सहज भाषा में श्रोताओं को पुस्तक से जोड़ा।
इस अवसर पर प्रसिद्ध कथाकार आलोचक, संपादक ,वक्ताओं और विद्यार्थी उपस्थित रहे। कार्यक्रम का संचालन साहित्य एवं कला अध्येता विशाल पाण्डेय जी ने किया और अंत में धन्यवाद ज्ञापन आदित्य नाथ तिवारी जी ने किया ।
परिचर्चा का समापन वंदे मातरम द्वारा किया गया।

वंदेमातरम् : धर्मनिरपेक्षता की आड़ में भारत को बर्बाद करने का षड्यंत्र?

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डॉ. मयंक चतुर्वेदी

दिल्ली । वंदेमातरम् को लेकर सर्वोच्च न्यायालय में चल रही सुनवाई ने भारत की धर्मनिरपेक्षता की उस बहस को फिर सामने ला दिया है, जिसे अक्सर सुविधा के अनुसार अलग-अलग अर्थों में प्रस्तुत किया जाता है। प्रश्न सिर्फ यह नहीं है कि कोई व्यक्ति वंदेमातरम् गाए या न गाए। प्रश्न यह है कि भारत में धर्मनिरपेक्षता का अर्थ क्या है? क्या धर्मनिरपेक्षता अकेले धार्मिक असहमति के अधिकार की रक्षा करती है या फिर राज्य की नीतियों में सभी धार्मिक समुदायों के साथ समान संवैधानिक व्यवहार की मांग भी करती है?

जब किसी राष्ट्र की मूल चेतना और उसके राष्ट्रीय प्रतीकों पर ही सवाल खड़े किए जाने लगें, तो नागरिकों के एक बड़े वर्ग में यह संशय गहराने लगता है कि क्या धर्मनिरपेक्षता का इस्तेमाल देश को वैचारिक रूप से बांटने के लिए किया जा रहा है। इस लेख में हम इस विवाद के हर उस पहलू को तथ्यात्मक रूप से उजागर करेंगे जो सीधे तौर पर देश की कानूनी, सामाजिक और प्रशासनिक व्यवस्था से जुड़े हैं।

समकालीन कानूनी परिदृश्य: सर्वोच्च न्यायालय की सुनवाई (2026)

22 सितंबर 2026 को सर्वोच्च न्यायालय ने कर्नाटक संगीतकार टी.एम. कृष्णा की याचिका पर केंद्र सरकार से जवाब मांगा। याचिका में 2026 में किए गए उस संशोधन को चुनौती दी गई है, जिसके माध्यम से वंदेमातरम् को राष्ट्रगान के समान राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण कानून के दायरे में लाया गया। सुनवाई के दौरान न्यायालय ने संकेत दिया कि धार्मिक अथवा वास्तविक अंतरात्मा संबंधी आपत्ति के कारण वंदेमातरम् न गाने वाले व्यक्ति को आपराधिक परिणाम नहीं भुगतने चाहिए और 1986 के बिजो इमैनुएल निर्णय में स्थापित सिद्धांत लागू रहेंगे।

वस्‍तुत: इस कानूनी लड़ाई ने एक बार फिर राष्ट्रीय अस्मिता को न्यायालय के कटघरे में खड़ा कर दिया है, विचार करें कि क्या राष्ट्रीय प्रतीकों का सम्मान भी व्यक्ति की व्यक्तिगत पसंद पर निर्भर होना चाहिए? यहां एक महत्वपूर्ण तथ्य स्पष्ट होना चाहिए कि 2026 का संशोधन यह नहीं कहता कि प्रत्येक नागरिक को वंदेमातरम् गाना ही होगा और न गाने पर उसे जेल होगी। संशोधित कानून जानबूझकर राष्ट्रीय गीत के गायन को रोकने या उसके गायन में लगी सभा में व्यवधान उत्पन्न करने को दंडनीय बनाता है, इसके लिए अधिकतम तीन वर्ष तक की जेल, जुर्माना या दोनों का प्रावधान है।

दोबारा दोषसिद्धि की स्थिति में न्यूनतम एक वर्ष के कारावास का प्रावधान भी लागू होता है। अर्थात किसी व्यक्ति के शांतिपूर्ण तरीके से गीत न गाने और किसी सार्वजनिक आयोजन में जानबूझकर व्यवधान डालने के बीच कानूनी अंतर है। सर्वोच्च न्यायालय की वर्तमान सुनवाई इसी संवैधानिक सीमा की परीक्षा कर रही है।

24 जनवरी 1950 का ऐतिहासिक निर्णय

वंदेमातरम् की संवैधानिक और राष्ट्रीय स्थिति पर चर्चा करते समय 24 जनवरी 1950 की संविधान सभा की कार्यवाही को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने कहा था कि जन गण मन राष्ट्रगान होगा और स्वतंत्रता संघर्ष में ऐतिहासिक भूमिका निभाने वाले वंदेमातरम् को उसके समान सम्मान और समान दर्जा दिया जाएगा। संविधान सभा की मूल कार्यवाही इसका आधिकारिक प्रमाण है।

नए कानूनी आधिकारिक तथ्य-पत्र में भी वंदेमातरम् के स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े ऐतिहासिक महत्व को रेखांकित किया गया है। यह गीत बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने रचा था, 1875 में प्रकाशित हुआ और बाद में आनंदमठ में शामिल हुआ। 1896 के कांग्रेस अधिवेशन में रवींद्रनाथ ठाकुर ने इसे संगीतबद्ध कर गाया था। 1905 के स्वदेशी आंदोलन में यह राष्ट्रीय प्रतिरोध के एक महत्वपूर्ण प्रतीक के रूप में सामने आया। इसका इतना श्रेष्‍ठ इतिहास होने की स्‍थ‍िति में वंदेमातरम् को बिल्‍कुल भी धार्मिक चश्मे से नहीं देखा जा सकता है।

संवैधानिक दृष्टिकोण: अनुच्छेद 25, 26 और 27 की वास्तविक व्याख्या

संविधान का अनुच्छेद 25 प्रत्येक व्यक्ति को अंत:करण की स्वतंत्रता और धर्म मानने, आचरण करने तथा प्रचार करने का अधिकार देता है। अनुच्छेद 26 धार्मिक संप्रदायों को धार्मिक और धर्मार्थ संस्थाएं स्थापित करने, धार्मिक मामलों का प्रबंधन करने तथा कानून के अनुसार संपत्ति रखने और उसका प्रशासन करने का अधिकार देता है। अनुच्छेद 27 किसी विशेष धर्म के प्रचार या संरक्षण के लिए विशेष रूप से लगाए गए कर के संबंध में सुरक्षा प्रदान करता है।

इसका अर्थ यह हुआ कि धर्मनिरपेक्षता किसी धर्म को मिटाने की व्यवस्था नहीं है। यह राज्य को किसी विशेष धर्म का पक्षकार बनने से रोकते हुए नागरिकों की धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा करती है, इसलिए जब वंदेमातरम् के संदर्भ में धर्मनिरपेक्षता की दुहाई दी जाती है तो यही कसौटी अन्य मामलों में भी लागू होनी चाहिए। यदि किसी धार्मिक समुदाय की आस्था, संस्था या संपत्ति से जुड़ा प्रश्न उठता है तो निर्णय समान संवैधानिक सिद्धांतों, कानून और पारदर्शिता के आधार पर होना चाहिए। आज क्‍या यह भारत में समानता के आधार पर कहीं होता दिख रहा है?

मंदिर, वक्फ और चर्च की संपत्ति पर समान कसौटी का प्रश्न

यहीं हिंदू समाज से जुड़ा एक महत्वपूर्ण प्रश्न सामने आता है। यदि धर्मनिरपेक्षता का अर्थ धार्मिक संस्थाओं के मामलों में राज्य की समान और निष्पक्ष भूमिका है तो मंदिरों, वक्फ संपत्तियों, चर्च संस्थाओं और अन्य धार्मिक न्यासों से जुड़े प्रशासन और संपत्ति संबंधी प्रश्नों पर भी समान संवैधानिक कसौटी लागू होनी चाहिए। वह अब तक क्‍यों नहीं की गई है?

यह प्रश्न अवश्य पूछा जाना चाहिए कि धार्मिक संस्थाओं के प्रशासन में राज्य की भूमिका का आधार सभी समुदायों के लिए समान क्यों नहीं रखा गया है? यही बात मदरसा, चर्च या मिशनरी संस्थाओं की संपत्ति पर भी लागू होती है। क्‍यों उन्‍हें छूट दी गई है? क्‍यों वक्‍फ बोर्ड बनाया गया है? वे भारत में हलाल सर्टिफिकेट कैसे चला सकते हैं?

अल्पसंख्यक आयोग और चयनित धर्मनिरपेक्षता की राजनीति

इसी प्रकार अल्पसंख्यक आयोग या अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय आखिर भारत में कर क्‍या रहे हैं? जब सभी धर्म समान होने चाहिए, राज्‍य की नजर में, फिर यह धर्मनिरपेक्षता की आड़ लेकर क्‍यों इन पर बहुसंख्‍यक हिन्‍दू समाज का धन इन अल्‍पसंख्‍यक संस्‍थानों पर खर्च किया जा रहा है?

जिसमें कि फिर संविधान के अनुच्छेद 29 और 30 सांस्कृतिक अधिकारों तथा धार्मिक और भाषायी अल्पसंख्यकों को अपने शैक्षणिक संस्थान स्थापित और संचालित करने के अधिकार की रक्षा करने की जो दुहाई अक्‍सर दी जाती है, वह भी बंद होना चाहिए।

क्‍योंकि देश के प्रत्‍येक बच्‍चे को समान शिक्षा का अधिकार है, इसलिए वह अल्‍पसंख्‍यक बनाम बहुसंख्‍यक नहीं हो सकती है, पर व्‍यवहार में क्‍या हो रहा है, वह आज सामने है। अल्‍पसंख्‍यक स्‍कूल, कॉलेज उनकी अपनी व्‍यवस्‍था जिसमें कि वे आरटीई के बच्‍चों के प्रवेश भी नहीं लेते हैं! क्‍या यही चयनित धर्मनिरपेक्षता होनी चाहिए? जिसमें सिर्फ बहुसंख्‍यक होने के कारण से उस समाज के साथ दोयम दर्जे का व्‍यवहार किया जाएगा!

अरे, जन्‍म लेनेवाले बच्‍चे को तो पता ही नहीं होता कि वह कहां जन्‍म ले रहा है, लेकिन यहां तो बहुसंख्‍यक समाज में जन्‍म लेने के कारण वह उन तमाम सुविधाओं से वंचित किया जा रहा है जोकि एक राज्‍य के नागरिक के रूप में उसके अन्‍य किसी दूसरे नागरिक के समान ही बराबर के अधिकार होने चाहिए थे। ऐसे में जो धर्मनिरपेक्षता के नाम पर वन्‍देमातरम् का विरोध कर रहे हैं, फिर तो उनके लिए भारत सरकार का अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय वर्तमान में मुस्लिम, ईसाई, सिख, बौद्ध, जैन और पारसी समुदायों को अधिसूचित अल्पसंख्यक समुदायों के रूप में लेकर विभिन्न योजनाएं संचालित करता है, इस व्यवस्था को खत्म कर देना चाहिए।

हिंदू समाज के अधिकारों पर भी उतनी ही चर्चा क्यों नहीं?

वास्‍तविकता तो यही है कि भारत की सभ्यता, संस्कृति और सार्वजनिक जीवन में हिंदू परंपरा की ऐतिहासिक भूमिका को आज संपूर्ण विश्‍व स्‍वीकार्य कर रहा है। भारत की सांस्कृतिक विरासत में हिंदू दर्शन, परंपराओं, तीर्थों, साहित्य, कला और सामाजिक संस्थाओं का अत्यंत व्यापक योगदान है, इसलिए हिंदू समाज के सांस्कृतिक अधिकारों की रक्षा और अन्य समुदायों के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा को एक-दूसरे के विरोध में खड़ा करना समस्या का समाधान नहीं है। समानता का अर्थ यही है कि बहुसंख्यक नागरिक के अधिकार भी उतने ही वास्तविक माने जाएं जितने अल्पसंख्यक नागरिक के भारत में 1950 से संविधान लागू होने के समय से माने जा रहे हैं।

वस्‍तुत: जब नीति-निर्माता सिर्फ एक वर्ग के अधिकारों के संरक्षण के प्रति अति-संवेदनशील दिखाई देते हैं और बहुसंख्यक समाज की ऐतिहासिक धरोहर व उसके मौलिक नागरिक अधिकारों की बात पर मौन साध लेते हैं, तब सामाजिक असंतोष का उत्पन्न होना स्वाभाविक है।

जनजातीय समाज और समाजशास्त्र का यथार्थ

जनजातीय समाज को लेकर भी राजनीतिक नारों के बजाय इतिहास और समाजशास्त्र के प्रमाणों के आधार पर चर्चा होनी चाहिए। अनेक जनजातीय समुदायों की अपनी विशिष्ट आस्थाएं और सांस्कृतिक परंपराएं हैं, जोकि हिन्‍दू समाज की तरह ही हैं। फिर भी उन्हें भारत का संविधान विशेष रियायतें देता है। लेकिन वन्‍देमातरम् गान के मामले में उन्‍हें भी कोई आपत्‍त‍ि नहीं है। यह इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि देश की मिट्टी और उसके गौरव गीत के प्रति निष्ठा का विरोध कतई स्वाभाविक या सामाजिक नहीं है, बल्कि इसके पीछे शुद्ध रूप से निहित राजनैतिक स्वार्थ और विदेशी नैरेटिव काम कर रहे हैं।

एक राष्ट्र, समान नागरिक अधिकार और पूर्ण सिद्धांत

ऐसे में कहना यही है कि वंदेमातरम् के नाम पर धर्मनिरपेक्षता को चयनात्मक ढंग से इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है। यदि धार्मिक स्वतंत्रता महत्वपूर्ण है तो वह हिंदू, मुस्लिम, ईसाई, सिख, बौद्ध, जैन और हर दूसरे नागरिक के लिए समान रूप से महत्वपूर्ण है। यदि राष्ट्रीय प्रतीकों का सम्मान आवश्यक है तो उसकी अपेक्षा भी सभी से समान होनी चाहिए। यदि धार्मिक संस्थाओं को कानून के अनुसार अपने मामलों का संचालन करने का अधिकार है तो राज्य का नियमन भी समान संवैधानिक कसौटी पर होना चाहिए।

भारत को किसी एक समुदाय की धार्मिक श्रेष्ठता या किसी दूसरे समुदाय की राजनीतिक विशेषाधिकार व्यवस्था से नहीं चलाने का प्रयास किया जाना चाहिए। जोर समान नागरिक अधिकारों और समान कानून से मजबूती पर होना चाहिए। धर्मनिरपेक्षता यदि वास्तव में संविधान का मूल्य है तो उसे आधी-अधूरी सुविधा के रूप में नहीं, पूर्ण संवैधानिक सिद्धांत के रूप में स्वीकार करना सभी के लिए समान रूप से अनिवार्य है।

किसी नागरिक की धार्मिक स्वतंत्रता सुरक्षित रहे, किसी समुदाय के साथ धर्म के आधार पर भेदभाव न हो और साथ ही राष्ट्रीय प्रतीकों के सम्मान तथा कानून के शासन की रक्षा हो, यही वह संतुलन है जिसकी भारत जैसे बहुधार्मिक लोकतंत्र को आवश्यकता है। इसमें कोई हिन्‍दू, मुस्‍लिम या अन्‍य मत,पंथ, रिलीजन, धर्म की बात नहीं है। इतना तो काश, वन्‍देमातरम् का विरोध कर रहे भारत के नागरिक समझ ही सकते हैं!

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