युग-ऋषि, महंत अवेद्यनाथ: समरसता के महानाद और सनातन के संबल

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​प्रणय विक्रम सिंह

​दिल्ली । काल के अनंत प्रवाह में कुछ महापुरुषों का जीवन किसी एकांत निर्जन में ठहरा हुआ सरोवर नहीं होता, बल्कि वह पर्वतों की छाती चीरकर बहने वाले उस पावन झरने की तरह होता है, जो जब आगे बढ़ता है, तो सदियों की सूखी माटी में भी प्राण फूंक देता है।

भारतीय संस्कृति के इतिहास में गोरक्षपीठ केवल एक आध्यात्मिक पीठ नहीं, अध्यात्म, राष्ट्रनिष्ठा और समरसता की एक ऐसी ही अविरल जलधारा है, जिसने हर युग में समाज के पराभव और निराशा के कुहासे को धोया है। जब-जब समाज के आकाश में छुआछूत और ऊंच-नीच के काले बादल गहराए, जब-जब मानवीय संवेदनाओं पर असमानता का असहनीय आघात हुआ, तब-तब इसी पीठ की पावन धरा से लोक-कल्याण का एक दिव्य प्रकाश प्रस्फुटित हुआ।

राष्ट्रसंत, परमपूज्य ब्रह्मलीन महंत अवेद्यनाथ जी महाराज उसी पावन परंपरा के एक ऐसे दैदीप्यमान नक्षत्र और ऋषि थे, जिन्होंने अपने तप और त्याग से समूचे राष्ट्र की चेतना को आलोकित किया।

​वे एक ऐसे विराट युग-पुरुष थे, जिनकी करुणा और संकल्प का प्रवाह सीमाओं में नहीं बंधा। वे उस पावन गंगा-धारा की तरह बहे, जिसने वर्ग-भेद की शताब्दियों पुरानी कठोर शिलाओं को बहुत सहजता से काट दिया और समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति को गले लगाकर समरसता का एक अद्भुत समतल रच दिया। वे जहां एक ओर अंतर्मन की गहराइयों में डूबे शांत तपस्वी थे, वहीं दूसरी ओर श्रीरामजन्मभूमि आंदोलन के महासमर में कोटि-कोटि सनातनी हृदयों को एक सूत्र में पिरोने वाले वज्र-संकल्प के साक्षात सारथी थे।

हिमालय की उपत्यकाओं में 28 मई, 1921 में जन्मे और सत्य, साहस एवं शुचिता की त्रिवेणी समेटे महंतश्री का संपूर्ण जीवन राष्ट्र-आराधना की एक ऐसी ही जीवंत, संगीतमय और अविरल साधना है, जिसका प्रत्येक बिंदु समाज के कल्याण और राष्ट्र के उत्थान के लिए ही समर्पित रहा।

उनके संकल्पों की यही पावन ऊष्मा आज उनके सुयोग्य और प्रखर शिष्य के रूप में संपूर्ण उत्तर प्रदेश को सुशासन और सुरक्षा से आलोकित कर रही है। आइए, राष्ट्रवाद की इस अप्रतिम और कालजयी चेतना के पावन जीवन-वृत्त को अपने भीतर अनुभूत करें और इस वैचारिक यात्रा में डूब जाएं…

*सामाजिक समरसता के साधक : भेदभाव के विरुद्ध भव्य पुकार*

महंत अवेद्यनाथ जी ने गोरक्षपीठ को केवल साधना और उपासना का केंद्र नहीं रहने दिया, बल्कि उसे सेवा, संस्कार और समरसता का सशक्त सेतु बना दिया। मीनाक्षीपुरम में हुए सामूहिक धर्मांतरण ने उनके अंतर्मन को गहराई तक उद्वेलित किया। यह आघात केवल आस्था पर आक्रमण नहीं था, बल्कि समाज की संवेदना पर असमानता का असहनीय आघात था। उसी क्षण उन्होंने प्रण किया कि भेदभाव की दीवार ढहाना और भाईचारे की बुनियाद गढ़ना ही उनकी तपस्या होगी।

उन्होंने समाज को यह स्मरण कराया कि सनातन की मूल आत्मा ही समरसता है। वह संस्कृति, जो प्राणि मात्र से प्रेम का संदेश देती है, और वह जीवन-पद्धति, जो नर-सेवा को नारायण-सेवा के समतुल्य मानती है, उसमें छुआछूत और ऊंच-नीच का कोई स्थान नहीं हो सकता। इसी दृष्टि से आरंभ हुआ सहभोज का समरस अभियान।

वे स्वयं दलित बस्तियों में पहुंचे, संतों और आचार्यों को साथ लेकर वंचित समाज के बीच बैठे, और थालियों में प्रेम परोसकर समानता का संदेश दिया। काशी में डोमराजा के घर संत-महात्माओं के संग भोजन करना केवल परंपरा को चुनौती देना नहीं था, बल्कि यह शताब्दियों से जमी विषमता पर वज्राघात और समानता की संजीवनी, समरसता की सरस्वती का सजीव उद्घोष था। गोरखपुर और पूर्वांचल के गांवों में जब उन्होंने सहभोज किया, तो वह भोजन नहीं रहा, वह बंधुत्व का बिगुल और भाईचारे का ब्रह्मनाद बन गया।

वे बार-बार स्मरण कराते थे कि “श्रीराम ने शबरी के बेर स्वीकारे, निषादराज को गले लगाया और जटायु का संस्कार किया, यही है समरस समाज का सनातन संदेश।”

उनकी दृष्टि में दुर्गा की आठ भुजाएं केवल दैवीय आयुध नहीं थीं, बल्कि समाज के चारों वर्णों की संयुक्त शक्ति का प्रतीक थीं। वे कहा करते थे कि “जब वर्ण मिलेंगे, वर्ग संगठित होंगे और समाज एक सूत्र में बंधेगा, तभी वह दुर्गा-शक्ति की भांति दुर्जेय और अजेय बनेगा।”

इस प्रकार महंत अवेद्यनाथ जी का प्रत्येक कार्य भेदभाव के विरुद्ध भव्य पुकार, प्रत्येक अभियान समरसता का सशक्त संदेश और प्रत्येक संकल्प समानता के संग्राम का साक्षी था।

*छुआछूत की जड़ें जलाकर,*
*समरसता का दीप जलाया।*
*भेद मिटाकर, भक्ति मिलाकर,*
*बंधुत्व का बिगुल बजाया॥*

*नर-सेवा में नारायण देखा,*
*प्राणि-मात्र में परमात्मा पाया।*
*महंत अवेद्यनाथ ने जीवनभर,*
*सनातन का सन्देश सुनाया॥*

*राम मंदिर आंदोलन के अग्रदूत : आस्था के अरुणोदय*

महंत दिग्विजयनाथ जी से मिली परंपरा को महंत अवेद्यनाथ जी ने संकल्प की सरिता और संघर्ष की सरस्वती में रूपांतरित कर दिया। यह केवल विरासत का निर्वाह नहीं था, बल्कि उसे जन-जन की चेतना और राष्ट्र की धड़कन में बदल देने का संकल्प था। उनका योगदान संगठनात्मक कौशल से कहीं आगे, समाज की आत्मा को जाग्रत करने का अभियान था।

सन 1984 में जब श्रीराम जन्मभूमि मुक्ति यज्ञ समिति का गठन हुआ, तो महंत अवेद्यनाथ सर्वसम्मति से अध्यक्ष चुने गए। उद्घाटन सभा में उनका उद्घोष गूंजा “राम केवल अयोध्या के राजा नहीं, वे भारत की आत्मा हैं। जब तक जन्मभूमि बंधनमुक्त नहीं होगी, तब तक यह आत्मा चैन से नहीं बैठ सकती।”

उनकी पुकार पर शैव और वैष्णव, संत और महात्मा, धर्माचार्य और तपस्वी सभी एक मंच पर संगठित हुए। यह दृश्य ऐसा था, मानो विभिन्न नदियां मिलकर गंगा का रूप ले रही हों।

1986 में जब अदालत के आदेश से रामलला का ताला खुला, तो यह केवल एक ताले का खुलना नहीं था, बल्कि शताब्दियों से जकड़ी आस्था का कपाट खुलना था। महंतश्री ने उसी समय घोषणा की “आज अयोध्या में केवल द्वार नहीं खुले हैं, आज हिंदू समाज की आत्मा के बंधन टूटे हैं।” उनका स्वर उस क्षण आस्था का आलोक बनकर पूरे राष्ट्र में फैल गया।

9 नवंबर 1989 को शिलान्यास का शुभक्षण आया। महंत अवेद्यनाथ जी ने पहली शिला रखने का सम्मान अनुसूचित जाति के साधक कामेश्वर चौपाल को दिया। यह केवल शिलान्यास नहीं, बल्कि समरसता का शंखनाद था। उन्होंने घोषणा की “राममंदिर जाति-भेद का नहीं, समरसता और समर्पण का प्रतीक होगा। यह शिला हिंदू समाज की एकता की नींव बनेगी।”

उस दिन की शिला ईंट नहीं, एकता की आधारशिला थी। पत्थर नहीं, परस्पर प्रेम का प्रतीक थी।

1990 की कारसेवा में अयोध्या को सैनिक छावनी में बदलकर जब मुलायम सिंह यादव ने कहा कि “यहां परिंदा भी पर नहीं मार सकता” तो उस परिंदे के पंखों में प्राण-शक्ति फूंकने वाले महंत अवेद्यनाथ जी ही थे। जब पुलिस की गोलियां कारसेवकों पर बरसीं, तब भी महंतश्री का संकल्प अडिग रहा। 30 अक्टूबर 1991 को कारसेवकों को श्रद्धांजलि देते हुए उनका उद्घोष गूंजा कि “राम मंदिर किसी की दया से नहीं, हिंदुओं के शौर्य से बनेगा।” उनके इस वचन ने आंदोलन को अमराग्नि की ज्वाला में बदल दिया।

और फिर 6 दिसंबर 1992 का दिन आया। जब विवादित ढांचा गिरा, तो यह केवल पत्थरों का ढेर नहीं टूटा, बल्कि युगों का बोझ ढहकर गिर पड़ा। भारत की आत्मा ने शताब्दियों बाद स्वाभिमान की सांस ली। उस क्षण का अग्रदूत भी यही गोरक्षपीठ और उसके महंतश्री थे। महंत अवेद्यनाथ जी ने उस ऐतिहासिक क्षण पर कहा कि “आज अन्याय का प्रतीक टूटा है। कल इसी भूमि पर न्याय का मंदिर खड़ा होगा। रामलला का भव्य मंदिर बनकर रहेगा। यह इतिहास की नहीं, आस्था की प्रतिज्ञा है।”

महंत अवेद्यनाथ जी का यह संघर्ष केवल ईंट और पत्थर का नहीं था। यह आस्था का आंदोलन था, समरसता का संग्राम था, सनातन का स्वाभिमान था। उनके शब्दों में “राममंदिर का निर्माण केवल अयोध्या का नहीं, भारत की आत्मा का पुनर्जन्म है।”

*अवेद्यनाथ अडिग रहे,*
*टूटी ताले की रोक।*
*राममंदिर की ज्योति से,*
*जगमग भारत लोक।।*

*शिक्षा में संस्कार : बीज से वटवृक्ष तक*

महंत दिग्विजयनाथ जी ने जिस महाराणा प्रताप शिक्षा परिषद का बीज रोपा था, उसे महंत अवेद्यनाथ जी ने अपने परिश्रम, दूरदृष्टि और दृढ़ संकल्प से वटवृक्ष में परिणत कर दिया। उनके लिए शिक्षा केवल रोजगार प्राप्त करने का साधन नहीं थी, बल्कि राष्ट्रनिर्माण की आधारशिला थी। वे मानते थे कि पुस्तकों में बंद ज्ञान अधूरा है, जब तक उसमें भारतीयता का भाव, राष्ट्रवाद की चेतना और संस्कारों की सुगंध न मिले। इसीलिए उन्होंने शिक्षा को केवल कक्षा और पाठ्यक्रम तक सीमित न रखकर उसमें सेवा, अनुशासन और संस्कृति का समावेश किया।

आज उनके प्रयत्नों का परिणाम है कि गोरक्षपीठ से संचालित पांच दर्जन से अधिक विद्यालय, महाविद्यालय, तकनीकी और चिकित्सा संस्थान पूर्वी उत्तर प्रदेश की शिक्षा का मेरुदंड बने हुए हैं। इन संस्थानों से हर वर्ष हजारों छात्र- छात्राएं केवल डिग्रियां लेकर नहीं निकलते, बल्कि जीवन-मूल्यों, राष्ट्रप्रेम और सामाजिक उत्तरदायित्व की भावना लेकर आगे बढ़ते हैं।

इन संस्थानों में शिक्षा का वातावरण केवल आधुनिक विषयों का अध्यापन नहीं करता, बल्कि भारतीय ज्ञान परंपरा से भी जोड़ता है। तकनीकी और चिकित्सा महाविद्यालयों में जहां विज्ञान और शोध की साधना होती है, वहीं प्राथमिक और माध्यमिक विद्यालयों में प्रार्थना, योग, अनुशासन और राष्ट्रगान से बच्चों के भीतर ‘नैतिकता और राष्ट्रीयता’ का बीजारोपण किया जाता है।

ग्रामीण परिवेश से आए हजारों विद्यार्थियों ने यहां से शिक्षा पाकर प्रशासन, सेना, शिक्षा और समाज सेवा के क्षेत्र में देश का गौरव बढ़ाया है। इसी तरह गोरखपुर का महाराणा प्रताप इंजीनियरिंग कॉलेज और गोरखपुर मेडिकल कॉलेज उत्तर भारत की उस शिक्षा-धारा के प्रतीक हैं, जहां आधुनिक विज्ञान और भारतीय संस्कार का संगम होता है।

महंत अवेद्यनाथ जी का यह प्रयास केवल संस्थानों की संख्या बढ़ाने का नहीं था, बल्कि शिक्षा को ‘संस्कार और समर्पण की संजीवनी’ बनाने का था। उनके लिए शिक्षा वही है, जो विद्या के साथ विनय और ज्ञान के साथ सेवा भी सिखाए।

*राजनीति में साधुता : सत्ता नहीं, साधना का संकल्प*

महंत अवेद्यनाथ जी का राजनीति में प्रवेश सत्ता की सीढ़ियां चढ़ने के लिए नहीं था, बल्कि समाज को समरस और राष्ट्र को सशक्त करने के लिए था। वे मानते थे कि साधुता यदि समाज तक न पहुंचे और समाज-सुधार राजनीति में न बहे, तो धर्म अधूरा रह जाता है।

उनकी राजनीति का लक्ष्य सिंहासन नहीं, सेवा थी। कुर्सी नहीं, कर्तव्य था। और शासन नहीं, शुचिता थी। इसीलिए वे कहते थे “राजनीति यदि समाज-सुधार का साधन न बने, तो वह केवल स्वार्थ का साधन रह जाती है।”

उन्होंने पांच बार उत्तर प्रदेश विधानसभा और चार बार लोकसभा में जनता का प्रतिनिधित्व किया। लेकिन उनका स्वर हमेशा सत्ता के गलियारों की गूंज से परे, जनसाधारण की वेदना का व्याख्यान रहा। वे संसद और विधानमंडल की बहसों में केवल क्षेत्रीय प्रश्न नहीं उठाते थे, बल्कि राष्ट्रीय एकता, सांस्कृतिक चेतना और समाज-सुधार का स्वर मुखर करते थे।

अखिल भारतीय हिंदू महासभा में उपाध्यक्ष और महासचिव के रूप में उनका योगदान विशेष उल्लेखनीय रहा। उन्होंने संगठन को केवल राजनीतिक मंच नहीं रहने दिया, बल्कि उसे एक राष्ट्रधर्मी आंदोलन का रूप दिया। उनके नेतृत्व में महासभा ने शिक्षा के पुनर्जागरण, सांस्कृतिक स्वाभिमान और राष्ट्रीय अखंडता को अपनी प्राथमिकताओं का केंद्र बनाया।

उनकी राजनीति में साधुता का संतुलन और संघर्ष की सजगता का अनूठा संगम था। वे न कभी स्वार्थ के लिए झुके, न कभी दबाव के लिए रुके। वे राजनीति को तपस्या मानते थे, जिसमें ईमानदारी धूप की तरह तपाती है और जनता का विश्वास गंगाजल की तरह पवित्र करता है।

उनकी छवि केवल संत-नेता की नहीं थी, बल्कि ‘संत-सैनिक’ की थी, जो लोकसभा के मंच पर भी उसी साहस से बोलते थे, जिस साहस से समाज की जटिलताओं का सामना करते थे।

महंत अवेद्यनाथ जी ने सिद्ध कर दिया कि संत राजनीति को भी साधना बना सकता है। उन्होंने गोरक्षपीठ की परंपरा को संसद और विधानमंडल तक पहुंचाकर यह दिखा दिया कि जब नेतृत्व में सत्य, तप और सेवा हो, तो सत्ता भी साधना का साधन बन जाती है।

*शिष्य निर्माण : योगी के रूप में युग-उपहार*

यही आंदोलन, यही जनजागरण, यही संघर्ष वह भूमि थी जहां नियति ने नया इतिहास गढ़ा।

महंत अवेद्यनाथ जी का सबसे बड़ा योगदान केवल अपने युग का नेतृत्व करना नहीं था, बल्कि आने वाले युग का नेतृत्व गढ़ना था। उन्होंने समझ लिया था कि संस्था, समाज और राष्ट्र का वैभव केवल वर्तमान पर निर्भर नहीं करता, उसका भविष्य भी उतना ही महत्वपूर्ण है। इसी दूरदृष्टि से उन्होंने अजय सिंह बिष्ट को अपना शिष्य बनाया।

यह शिष्यत्व केवल धार्मिक संस्कार तक सीमित नहीं था, बल्कि उसमें सामाजिक सेवा की संवेदना और राजनीतिक नेतृत्व की सजगता भी थी। महंत अवेद्यनाथ जी ने उन्हें तप और त्याग की शिक्षा दी, संघर्ष और समरसता की साधना कराई, और साथ ही समाज व राष्ट्र के व्यापक नेतृत्व के लिए तैयार किया।

आज वही शिष्य योगी आदित्यनाथ उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री हैं। वे गुरु के आदर्शों को केवल मठ की परंपरा में नहीं, बल्कि शासन और समाज की नीतियों में साकार कर रहे हैं। कानून-व्यवस्था से लेकर शिक्षा, संस्कृति और विकास की योजनाओं में गुरु का मार्गदर्शन उनकी कार्यशैली में स्पष्ट दिखाई देता है।

यह गुरु-शिष्य परंपरा का एक अद्वितीय उदाहरण है, जहां गुरु ने केवल शिष्य को नहीं गढ़ा, बल्कि आने वाले समय के लिए संपूर्ण युग का उपहार दिया।

महंत अवेद्यनाथ जी का ब्रह्मलीन होना कोई सामान्य घटना नहीं था, यह तो मानो एक संत की इच्छा-मृत्यु थी। उनके शिष्य योगी आदित्यनाथ के शब्दों में “मेरे गुरुदेव की इच्छा थी कि वे अपने गुरु महंत दिग्विजयनाथ जी की पुण्यतिथि पर ही मंदिर में ब्रह्मलीन हों और हुआ भी वही।”

योगी आदित्यनाथ जी ने अपने पूज्य गुरु जी के कान में कहा कि “आप मंदिर में आ चुके हैं।” और बड़े महाराज जी के चेहरे पर संतुष्टि की आभा झलक आई। आश्विन कृष्ण चतुर्थी (12 सितंबर 2014) को गोरखनाथ मंदिर में गुरु की स्मृति के दिन ही उन्होंने अंतिम श्वास ली।

विस्मृत करने वाली बात है कि 2001 में कैंसर से घिरे होने पर भी वे चौदह वर्षों तक जीवित रहे। यह केवल चिकित्सा का परिणाम नहीं, बल्कि साधना की सिद्धि और इच्छाशक्ति का चमत्कार था। राममंदिर आंदोलन को निर्णायक मोड़ देने वाले इस ‘राष्ट्रसंत’ को स्मरण करते हुए अशोक सिंघल जी ने कहा था कि “वह श्रीराम जन्मभूमि के प्राण थे। उनमें सबको साथ लेकर चलने की विलक्षण प्रतिभा थी।”

जब महंत अवेद्यनाथ जी ने अपने नश्वर शरीर का परित्याग किया, तो यह केवल एक संत का अवसान नहीं था, यह एक युग का विराम था। उनकी आंखे भव्य राम मंदिर देखने की प्रतीक्षा में थीं।

नियति ने यह स्वप्न उनके शिष्य योगी आदित्यनाथ जी के माध्यम से साकार किया। 2017 में योगी जी मुख्यमंत्री बने और उनके ही कार्यकाल में अयोध्या की धरती पर श्रीराम मंदिर का भव्य निर्माण आरंभ हुआ। यह उस गुरु के अधूरे स्वप्न की पूर्ति थी, जिसने अपना जीवन राम के नाम, समाज के काम और राष्ट्र के उत्थान में अर्पित कर दिया था।

महंत अवेद्यनाथ जी का जीवन साधु की साधना, सैनिक के साहस और समाज सुधारक की संवेदना की त्रिवेणी था। वे उस दीपक की तरह थे, जो स्वयं जलकर भी समाज को आलोकित करता रहा।

उन्होंने अस्पृश्यता की दीवारें तोड़ीं, दलितों और वंचितों के घर सहभोज कर सामाजिक समरसता की राह दिखाई। उन्होंने श्रीराममंदिर आंदोलन को केवल आस्था का नहीं, बल्कि राष्ट्रीय अस्मिता का आंदोलन बनाया।

उनकी स्मृति हमें यह सिखाती है कि संत का संकल्प समाज की दिशा बदल सकता है। त्याग की तपिश राष्ट्र की आत्मा को गरिमा देती है। और शिष्य का निर्माण ही गुरु की सबसे बड़ी उपलब्धि होती है।

उनकी विरासत आज उनके शिष्य योगी आदित्यनाथ के माध्यम से आगे बढ़ रही है। जहां धर्म-साधना और राज्य-साधना एकाकार होकर समाज और राष्ट्र के कल्याण का पथ प्रशस्त कर रही है।

राष्ट्रसंत, ब्रह्मलीन महंत अवेद्यनाथ जी महाराज समूचे राष्ट्र के सनातनियों के लिए आस्था का आलोक, समाज के समरस स्तंभ और सेवा के संकल्प बनकर युग-युगांतर तक स्मरणीय रहेंगे।

सकल हंस में ‘गूँजे देश राग’

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डॉ. अमरेन्द्र कुमार आर्य

दिल्ली । डॉ. सच्चिदानंद जोशी समकालीन भारत के उन विरल सांस्कृतिकव्यक्तित्वों में हैं जिन्होंने साहित्य, लोकजीवन, रंगमंच, मीडिया तथाभारतीय ज्ञान परंपरा को एक सूत्र में पिरोने का कार्य किया है। वे केवललेखक नहीं हैं। वे भारतीय सांस्कृतिक चेतना के सजग संवाहक भी हैं।उनके चिंतन में भारत किसी मानचित्र का नाम नहीं बनता। वह स्मृतियों, परंपराओं, लोकध्वनियों और मानवीय संवेदनाओं से निर्मित एक जीवितअनुभूति के रूप में सामने आता है। डॉ. जोशी संस्कृति को स्थिर विषयनहीं मानते। उनके लिए संस्कृति जीवन की प्रवहमान धारा है। वहलोकगीतों में बहती है। यात्राओं में धड़कती है। गाँवों की मिट्टी में महकतीहै। मंदिरों की घंटियों में गूँजती है। मनुष्य के व्यवहार में अपना स्वर पातीहै। यही कारण है कि उनके लेखन में विद्वत्ता के साथ आत्मीयता भीदिखाई देती है। उनकी इसी सांस्कृतिक दृष्टि का सुंदर विस्तार गूँजे देशराग में दिखाई देता है। यह पुस्तक केवल यात्रा वृत्तांत नहीं है। यह भारतकी सांस्कृतिक आत्मा को सुनने और महसूस करने की एक भावयात्रा है।पुस्तक पढ़ते समय बार-बार लगता है कि लेखक जनजीवन की सहजतामें भारतीयता का आलोक खोज रहे हैं। इस कृति में देश और विदेश कीयात्राएँ केवल स्थानों का परिचय नहीं करातीं। वे सभ्यताओं, संस्कृतियों, लोकस्मृतियों और मनुष्य के भीतर बसे राष्ट्रबोध का परिचय भी देती हैं।लेखक जहाँ भी जाते हैं वहाँ की मिट्टी, भाषा, स्थापत्य, भोजन, संगीतऔर लोकधुनों को आत्मीय दृष्टि से देखते हैं। इसीलिए उनके यात्रा वर्णनदृश्य नहीं रचते, अनुभव रचते हैं। वर्ष 2026 में इस पुस्तक का लोकार्पणसाहित्य अकादेमी में हुआ। तभी से इसे भारतीय संस्कृति और यात्रासाहित्य की महत्त्वपूर्ण कृति के रूप में देखा जा रहा है। पुस्तक की भाषाइसकी सबसे बड़ी शक्ति है। उसमें अद्भुत लालित्य है। शब्दों में आत्मीयऊष्मा है। वर्णनों में चित्रात्मक सौंदर्य है। कई स्थानों पर लगता है मानोलेखक शब्दों से दृश्य उकेर रहे हों। किसी शहर का वर्णन आता है तोउसकी सड़कें, हवा, लोग, संगीत और वातावरण एक साथ जीवंत होउठते हैं। पाठक केवल पढ़ता नहीं। वह उन यात्राओं के साथ चलने लगताहै।

सच्चिदानंद जोशी यात्रा को केवल स्थान परिवर्तन नहीं मानते। वे उसेमनुष्य, समाज और संस्कृति को समझने की प्रक्रिया के रूप में देखते हैं।किसी स्थान का वर्णन करते समय वे वहाँ की मिट्टी, लोकधुन, बोली, स्थापत्य, भोजन, लोगों की संवेदना और सांस्कृतिक स्मृतियों को साथलेकर चलते हैं। यही कारण है कि पाठक को बार-बार यह अनुभव होताहै मानो वह स्वयं उन रास्तों से होकर गुजर रहा हो। यात्रा-वृत्तांतों में भीउनका सांस्कृतिक दृष्टिकोण स्पष्ट दिखाई देता है। वे किसी देश याशहर को केवल पर्यटक की दृष्टि से नहीं देखते। वे वहाँ की सभ्यता, सांस्कृतिक इतिहास और मानवीय संवेदनाओं को समझने का प्रयासकरते हैं। इसी कारण उनकी यात्राएँ केवल स्थानों का विवरण नहीं रहजातीं, बल्कि सांस्कृतिक संवाद बन जाती हैं। पुस्तक पढ़ते समय उनकीभाषा अत्यंत सहज, लालित्यपूर्ण और संवादधर्मी लगती है। वे जटिलसांस्कृतिक विमर्श को भी सरल शब्दों में प्रस्तुत कर देते हैं। कहीं-कहींउनका व्यंग्य पाठक को मुस्कुराने पर विवश करता है, तो कहीं उनकीभावुकता मन को छू लेती है। पुस्तक ‘गूँजे देश राग’ का मूल स्वरभारतीय सांस्कृतिक चेतना है। लेखक आधुनिकता के बीच भी भारतीयपरंपरा की जीवंतता को खोजते हैं। वे महानगरों की चमक से अधिक उनछोटे सांस्कृतिक बिंदुओं पर दृष्टि डालते हैं जहाँ भारत अपनी वास्तविकपहचान के साथ उपस्थित दिखाई देता है। पुस्तक में यात्रा-वर्णन के साथइतिहास-बोध, कला-दृष्टि और सांस्कृतिक विमर्श भी सहज रूप मेंउपस्थित हैं। यही कारण है कि यह कृति सामान्य यात्रा-वृत्तांत से आगेबढ़कर सांस्कृतिक दस्तावेज का रूप ले लेती है। यह अनुभव इसलिए भीहोता है कि इस पुस्तक के सृजक डॉ. सच्चिदानंद जोशी भारतीय परंपराऔर आधुनिकता के बीच संतुलन स्थापित करने वाले चिंतकों में भी गिनेजाते हैं। वे आधुनिक दृष्टि को स्वीकार करते हैं, पर अपनी सांस्कृतिकजड़ों से कटने के पक्षधर नहीं हैं। उनके विचारों में भारतीय ज्ञान-परंपरा केप्रति सम्मान और समकालीन समाज के प्रति सजगता दोनों साथ दिखाईदेते हैं। लेखक की शैली अत्यंत प्रवाहपूर्ण और साहित्यिक है। कहींपत्रकारिता की स्पष्टता दिखाई देती है तो कहीं संस्मरणात्मकआत्मीयता। कई स्थानों पर वर्णन इतना चित्रात्मक हो उठता है कि दृश्यआँखों के सामने सजीव हो जाता है। पुस्तक में भावुकता है, पर वहकृत्रिम नहीं लगती। उसमें अनुभव की सच्चाई और संवेदना की गरिमा है।यह पुस्तक भारतीय यात्रा-साहित्य की उस परंपरा को आगे बढ़ाती हैजिसमें यात्रा केवल पर्यटन नहीं होती, बल्कि समाज और संस्कृति कोसमझने का माध्यम बनती है। इस दृष्टि से यह कृति राहुल सांकृत्यायनऔर अज्ञेय की यात्रा-दृष्टि की आधुनिक प्रतिध्वनि प्रतीत होती है।हालांकि सच्चिदानंद जोशी का स्वर अधिक सांस्कृतिक और आत्मपरकहै। पुस्तक का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष यह भी है कि इसमें राष्ट्रवाद किसीराजनीतिक आग्रह के रूप में नहीं आता। वह सांस्कृतिक आत्मीयता केरूप में उपस्थित होता है। लेखक भारत को उसकी विविधताओं, लोकपरंपराओं और सांस्कृतिक निरंतरता में देखते हैं। इसलिए पुस्तक पढ़तेहुए पाठक के भीतर अपने देश के प्रति आत्मीय गर्व का भाव जागृत होताहै।

पुस्तक के आरंभिक आलेखों में लेखक ने अपनी पहली यात्रा के प्रसंगको अत्यंत रोचक ढंग से लिखा है। कैसे कई बार यात्रा होते-होते रह गई।कैसे एक छोटी-सी लापरवाही किसी व्यक्ति के सपनों का रंग फीका करदेती है। वे लिखते हैं की “सुबह ही बताने वाला था। लेकिन किसी कार्यमें फँस गया। सॉरी।” यह छोटा-सा वाक्य पूरी स्थिति की विडंबना कोसामने ला देता है। इसके बाद उनका सहज हास्य सामने आता है। वेलिखते हैं कि “अपना-सा मुँह लेकर वापस लौटे। दो-चार दिन तक दफ्तरमें और दोस्तों से मुँह छिपाए घूमते रहे गोया कोई बड़ा अपराध कर दियाहो।” इस पूरे प्रसंग में लेखक की विनोदप्रियता और आत्मीय शैली दोनोंदिखाई देती हैं। पेरिस प्रवास के वर्णन में भी लेखक का भावुक औरमानवीय पक्ष उभरकर सामने आता है। विशेषकर डायना के संदर्भ मेंलिखते समय उनकी संवेदना पाठक को भीतर तक छूती है। वहाँ भाषा मेंएक मासूम आत्मीयता दिखाई देती है। मानो लेखक अपने अनुभवों कोनहीं, अपने मन को पाठक के सामने खोल रहा हो।

रूस यात्रा का चित्रण पुस्तक के सबसे प्रभावशाली अंशों में से एक है।भारतीय यात्रियों की मनोदशा को लेखक ने अत्यंत चुटीले ढंग से प्रस्तुतकिया है। पाठ को पढ़ते समय लगता है की हम भारतीयों की मनोदशा हीहोती है कि “हम ट्रेन से नहीं चलते, बल्कि ट्रेन हमारे कारण चल रहीहोती है।” यह पंक्ति भारतीय स्वभाव की सहज व्याख्या बन जाती है।वहीं “रूस में वेद” जैसा आलेख भारतीय सांस्कृतिक जड़ों की व्यापकताका बोध कराता है। यह पाठ हमें याद दिलाता है कि हमारी सांस्कृतिकस्मृतियाँ सीमाओं से बड़ी होती हैं। कंबोडिया यात्रा का “अंडे अनुभव” पढ़ते समय लेखक का व्यंग्य अपने पूरे प्रभाव में दिखाई देता है। यहकेवल यात्रा की कठिनाई नहीं है। यह उन लोगों की सामूहिक समस्या हैजो भाषा और खानपान के कारण विदेशों में असहज स्थितियों से गुजरतेहैं। लेखक इस अनुभव को हास्य और संवेदना दोनों के साथ प्रस्तुत करतेहैं। “कहाँ तक फैले हैं हमारे निशाँ” पाठ विशेष रूप से उल्लेखनीय है।इसमें अजरबैजान की राजधानी बाकू में स्थित आतेशगाह फायर टेम्पलका वर्णन है। लेखक बताते हैं कि यह स्थान भारतीय व्यापारियों औरसंस्कृति के विस्तार का जीवंत प्रमाण है। मंदिर की संरचना भलेपारंपरिक भारतीय मंदिर जैसी न हो, पर उसके ऊपर देवनागरी में “श्रीगणेशाय नमः”, “ज्वाला देवी” और “शंकर भगवान” की स्तुतियाँ दिखाईदेती हैं। यह प्रसंग पाठक को अपने सांस्कृतिक अतीत से जोड़ देता है।“मी गुड फोटो” आलेख भी अत्यंत रोचक है। रमणीय स्थलों पर फोटोखिंचवाने की मानवीय प्रवृत्ति को लेखक ने बड़े सहज ढंग से पकड़ा है।यह केवल तस्वीरें लेने की आदत नहीं, बल्कि स्मृतियों को जीवित रखनेकी मानवीय इच्छा है। “कोबुस्तान के अनोखे नज़ारे”, “साहित्य सम्मानको सलाम” और “हम तो ऐसे हैं भैया” जैसे आलेख भी पुस्तक को विशेषबनाते हैं। “साहित्य सम्मान को सलाम” में लेखक बताते हैं कि किसप्रकार एक देश दूसरे देश के साहित्यकार को भी सम्मान देता है। वहीं“हम तो ऐसे हैं भैया” में भारतीय स्वभाव की सहजता, अव्यवस्था औरआत्मीयता दोनों दिखाई देती हैं। दो मातृशक्तियों का झगड़ा हो याहोटल में पंजाबी लॉबी का भारीपन, सब कुछ इतना जीवंत है कि पाठकमुस्कुराए बिना नहीं रह पाता।

“तन्हा गुजरते हुए” आलेख में लंदन का वर्णन अत्यंत सकारात्मक दृष्टिसे किया गया है। वहीं “संग्रहण की सीख देता संग्रहालय” पाठसंग्रहालयों के माध्यम से सभ्यता की स्मृति-संरक्षा का महत्त्व समझाताहै। वियना में तान्या की कार-राइड के बहाने लेखक ने शहर को पैदलघूमने के आनंद को बड़ी सुंदरता से प्रस्तुत किया है। थाईलैंड पर लिखागया आलेख विशेष रूप से उल्लेखनीय है। आम भारतीय मानस मेंथाईलैंड की जो छवि है, उससे बिल्कुल अलग लेखक उसे एक धार्मिकऔर सांस्कृतिक देश के रूप में प्रस्तुत करते हैं। यहाँ स्पष्ट होता है कियात्रा-वृत्तांत केवल पर्यटन-विवरण नहीं होता, बल्कि दृष्टि का विस्तार भीहोता है। जापान के अनुशासन पर बहुत कुछ लिखा गया है, पर लेखक नेएक छोटे-से प्रसंग के माध्यम से उसे मानवीय आदर्श के रूप में प्रस्तुतकिया है। “सुशी रे सुशी” आलेख भोजन-संस्कृति के बहाने मनुष्य कीजिज्ञासा और असहजता दोनों को सामने लाता है। मध्य वियतनाम मूलहिंदू, मंगोलिया की ठंड, आप्रवासी घाट, विदेश में हिंदी का अनुभव औरएथेंस का विचित्र चरित्र जैसे सभी यात्रा-वृत्तांत अत्यंत करीने से लिखे गएहैं। चीन में शाकाहारी भोजन की दुविधा का वर्णन पढ़ते समय हरभारतीय शाकाहारी स्वयं को लेखक के साथ खड़ा महसूस करता है।“पुराने ओलंपिक में नया मेडल” पढ़ते समय लेखक के भीतर छिपीपुरानी आकांक्षाओं की हल्की कसक सामने आती है। वे असली उपलब्धिन होने पर भी स्मृतियों को अपने ढंग से सहेज लेते हैं। बिना मेडल वालीतस्वीर भी वहाँ इच्छाशक्ति और आत्मीयता का प्रतीक बन जाती है।कोपेनहेगन को लेखक ने साइकिलों की राजधानी कहा है। इसके माध्यमसे वे सस्ती, सहज और पर्यावरण-अनुकूल यात्रा पद्धति की आवश्यकताको बड़ी सादगी से सामने रखते हैं। पुस्तक का समापन स्वामी विवेकानंदसे जुड़े शिकागो के प्रसंग से होता है। उस स्थान को देखने की लेखक कीउत्कंठा पाठक को भी भावुक कर देती है। इस तरह से देखें तो भारतीयकला, साहित्य और संस्कृति के संरक्षण तथा प्रसार में इस पुस्तक केबहाने डॉ. सच्चिदानंद जोशी का योगदान उल्लेखनीय रहा है। वे उनव्यक्तित्वों में हैं जिन्होंने संस्कृति को केवल बौद्धिक विमर्श तक सीमितनहीं रहने दिया, बल्कि उसे समाज और नई पीढ़ी से जोड़ने का प्रयासकिया।

यश प्रकाशन द्वारा प्रकाशित गूँजे देश राग में कुल तीस आलेख संकलितहैं। आकार में सहज और मूल्य में साधारण दिखाई देने वाली यह पुस्तकअपने भीतर अनुभवों, संस्कृतियों, स्मृतियों और संवेदनाओं का एकविस्तृत संसार समेटे हुए है। मात्र 250 रुपये मूल्य की यह कृति अपनेसाहित्यिक और सांस्कृतिक वैभव के कारण कहीं अधिक मूल्यवान प्रतीतहोती है। यह उन पुस्तकों में है जिन्हें केवल पढ़ा नहीं जाता, बल्किमहसूस किया जाता है। डॉ. सच्चिदानंद जोशी ने इस पुस्तक में यात्रा कोकेवल भौगोलिक दूरी तय करने की प्रक्रिया नहीं रहने दिया। उन्होंनेयात्राओं को मनुष्य, समाज, संस्कृति और स्मृतियों से जोड़ दिया है।इसीलिए पुस्तक का प्रत्येक आलेख पाठक को किसी नए देश, नए नगरया नए दृश्य तक ही नहीं ले जाता, बल्कि उसे अपने भीतर भी झाँकने केलिए प्रेरित करता है। कहीं लोकजीवन की आत्मीयता है, कहीं इतिहासकी धड़कन, कहीं सभ्यताओं के पदचिह्न, तो कहीं भारतीयता का मौनसंगीत।इस पुस्तक की विशेषता यह भी है कि इसमें यात्रा के बहानेभारतीय सांस्कृतिक चेतना का विस्तार दिखाई देता है। लेखक जबविदेशों में भारतीय संस्कृति के चिह्न खोजते हैं तो पाठक के भीतर भीअपनी सभ्यता के प्रति एक आत्मीय गर्व का भाव जागृत होता है।अजरबैजान के मंदिरों में अंकित देवनागरी हो, रूस में वेदों की स्मृति हो, या शिकागो में स्वामी विवेकानंद के पदचिह्न। हर प्रसंग भारतीय संस्कृतिकी व्यापकता का अनुभव कराता है। पुस्तक में हास्य भी है, व्यंग्य भी, भावुकता भी और चिंतन भी। कहीं लेखक अपने अनुभवों पर मुस्कुरातेदिखाई देते हैं, तो कहीं किसी स्मृति के सामने ठहर जाते हैं। यही बहुरंगीस्वर इस कृति को जीवंत बनाते हैं। लेखक का विनोदबोध यात्रा के तनावको सहज बना देता है, जबकि उनकी संवेदनशीलता पाठक के मन कोभीतर तक छू जाती है। आज जब यात्रा-वृत्तांतों का बड़ा हिस्सा केवलपर्यटन और उपभोग तक सीमित होता जा रहा है, ऐसे समय में गूँजे देशराग जैसी पुस्तक यह विश्वास जगाती है कि यात्रा मनुष्य को भीतर सेसमृद्ध भी कर सकती है। यह कृति बताती है कि किसी देश को समझनेके लिए केवल उसकी इमारतें देखना पर्याप्त नहीं, उसकी संस्कृति, उसकी स्मृतियाँ, उसकी भाषा और उसके लोगों की आत्मा को महसूसकरना भी आवश्यक है। समग्रतः कहा जाए तो गूँजे देश राग यात्रा, संस्कृति और साहित्य का सुंदर संगम है। यह पुस्तक केवल स्थानों कापरिचय नहीं कराती, बल्कि भारत की आत्मा के उस संगीत को सुनने काअवसर देती है जो लोकधुनों, स्मृतियों, परंपराओं और मानवीयसंवेदनाओं में निरंतर गूँजता रहता है। संवेदनशील पाठकों, संस्कृति-अध्येताओं और यात्रा-साहित्य के प्रेमियों के लिए यह निस्संदेहएक संग्रहणीय, पठनीय और बार-बार लौटकर पढ़ी जाने वाली कृति है।

स्वदेशी का स्वाद: पारले-जी से मेलोडी तक

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दिल्ली। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के दौरान स्वदेशी आंदोलन ने न केवल विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार किया, बल्कि स्वदेशी उत्पादों को बढ़ावा देकर आत्मनिर्भर भारत की नींव रखी। ठीक इसी भावना से 1929 में ब्रिटिश शासन के दौर में मोहनलाल दयाल चौहान ने मुंबई के विले पारले इलाके में एक छोटी सी फैक्ट्री स्थापित की। इसका उद्देश्य ब्रिटिश कंपनियों जैसे हंटली एंड पाल्मर्स और ब्रिटानिया के महंगे बिस्कुटों के मुकाबले सस्ता, गुणवत्तापूर्ण और भारतीय स्वाद वाला विकल्प उपलब्ध कराना था। शुरू में ऑरेंज कैंडीज से शुरुआत हुई, फिर 1939 में पारले ग्लूको बिस्कुट लॉन्च हुआ, जो बाद में पारले-जी बना।

यह आंदोलन की मिसाल था – विदेशी माल की जगह घरेलू उत्पाद। पारले ने आम भारतीयों को सस्ते दाम पर पौष्टिक बिस्कुट उपलब्ध कराया, जो पीढ़ियों से बच्चों की पहली पसंद बना रहा। आज यह दुनिया का सबसे ज्यादा बिकने वाला बिस्कुट ब्रांड है।

‘G’ का असली मतलब और ब्रांडिंग की मास्टरस्ट्रोक

शुरुआत में ‘पारले ग्लूको’ कहलाने वाला यह ब्रांड 1980 के दशक में पारले-जी बना। ‘G’ का मतलब ग्लूकोज था, जिसे मार्केटिंग में ‘जी फॉर जीनियस’ में बदल दिया गया। पैकेट पर छपी प्यारी बच्ची कोई रियल मॉडल नहीं, बल्कि 1960 के दशक में मगनलाल दाहिया द्वारा बनाई गई काल्पनिक इलस्ट्रेशन है।

कंपनी ने कीमत-वजन की अनोखी रणनीति अपनाई। 25-30 साल तक ₹5 पैकेट की कीमत नहीं बढ़ाई, बल्कि श्रिंकफ्लेशन (वजन कम करना) से मुनाफा बनाए रखा। 1996-2006 के बीच रॉ मटेरियल की कीमतें 150% बढ़ीं, फिर भी कीमत स्थिर रखी। 2013 में यह 5000 करोड़ की बिक्री करने वाला पहला FMCG प्रोडक्ट बना। हर सेकंड 4451 लोग इसे खाते हैं, हर महीने 1 बिलियन पैकेट उत्पादित होते हैं।

स्वदेशी से वैश्विक पहचान: मोदी-मेलोनी ‘मेलोडी’ पल

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी को पारले की आइकॉनिक ‘मेलोडी’ टॉफी गिफ्ट की। सोशल मीडिया पर ‘मेलोडी’ (Modi + Meloni) ट्रेंड वायरल हो गया। पारले प्रोडक्ट्स ने प्रधानमंत्री का शुक्रिया अदा करते हुए इसे स्वदेशी ब्रांड को वैश्विक मंच पर ले जाने का गर्वपूर्ण क्षण बताया। पारले प्रोडक्ट्स के वाइस प्रेसिडेंट मयंक शाह के अनुसार, भारतीय उत्पादों को अंतरराष्ट्रीय मंच पर प्रमोट करने का पीएम मोदी का यह तरीका नायाब है। इससे घरेलू तथा अंतरराष्ट्रीय बिक्री को बड़ा बढ़ावा मिलेगा।

मोदी जी ने पारले-जी/मेलोडी का उत्पाद ही क्यों मेलोनी को दिया?

यह महज संयोग या मीठा उपहार नहीं था। यह सांकेतिक था – स्वदेशी उद्यमिता, ‘मेक इन इंडिया’ और भारतीय ब्रांडों की वैश्विक क्षमता का प्रदर्शन। पारले एक सदी पुराना स्वदेशी ब्रांड है, जो आज भी चौहान परिवार के पास है। तीन कंपनियों में बंटा (पारले प्रोडक्ट्स, पारले एग्रो, पारले बिसलेरी) पूरी तरह भारतीय स्वामित्व वाला है। मोदी जी की विदेश नीति में आर्थिक कूटनीति महत्वपूर्ण है, जहां भारतीय उत्पादों को प्रमोट किया जाता है। मेलोडी जैसी पॉपुलर टॉफी गिफ्ट करके उन्होंने न केवल व्यक्तिगत दोस्ती दिखाई, बल्कि भारत की सॉफ्ट पावर और एफएमसीजी क्षमता को हाइलाइट किया। यह ‘वोकल फॉर लोकल’ का प्रैक्टिकल उदाहरण है – जब प्रधानमंत्री खुद स्वदेशी ब्रांड को विश्व नेताओं तक ले जाते हैं।

एफएमसीजी का बढ़ता बाजार और भारत की संभावनाएं

भारत का कन्फेक्शनरी मार्केट करीब 5 बिलियन USD (लगभग 38-40 हजार करोड़ रुपये) का है, जिसमें बेकर्स कन्फेक्शनरी जोड़कर 6 बिलियन तक पहुंच जाता है। CAGR 5-7.5% है। शहरीकरण, बढ़ती आय, क्विक-कॉमर्स (ब्लिंकिट (Blinkit) और जेप्टो (Zepto) और ‘ऑन-द-गो’ स्नैकिंग ने पैक्ड प्रोडक्ट्स की मांग बढ़ाई है। प्रीमियमाइजेशन ट्रेंड (डार्क चॉकलेट, शुगर-फ्री) भी चल रहा है।

अमेरिका, चीन, जर्मनी के बाद वैश्विक स्तर पर भारत टॉप 10 कन्फेक्शनरी बाजारों में है। पारले-जी चीन की सभी बिस्कुट कंपनियों से ज्यादा उत्पादन करता है। कंपनी के पास 130+ फैक्टरियां, 50 लाख+ रिटेल स्टोर्स और 21+ देशों में एक्सपोर्ट हैं। लॉकडाउन में यह गरीबों का सहारा बना, देश भर के एनजीओ के जरिए खूब वितरित हुआ।

तर्कसंगत विश्लेषण: स्वदेशी मॉडल की सफलता

पारले की सफलता का राज बड़ा स्केल, कम मार्जिन और व्यापक वितरण है। एमएनसी’ज से मुकाबला करते हुए यह 40%+ भारतीय बिस्कुट मार्केट शेयर रखता है। कैंटर की सिंडिकेटेड रिसर्च रिपोर्ट्स में लगातार 13 वर्षों से भारत का सबसे पसंदीदा एफएमसीजी ब्रांड है ।

स्वदेशी आंदोलन से संबंध: पारले ब्रिटिश बिस्कुटों की जगह सस्ता विकल्प लाया। आजादी के बाद गेहूं संकट में जौ से बिस्कुट बनाकर राष्ट्र सेवा की। स्वतंत्रता सेनानियों को नमन करते हुए कंज्यूमर अपील की। यह मॉडल आज ‘आत्मनिर्भर भारत’ से जुड़ता है – जहां लोकल ब्रांड ग्लोबल बनते हैं।

मोदी जी का मेलोनी को मेलोडी गिफ्ट इसी फिलॉसफी का विस्तार है। विदेश नीति में सांस्कृतिक और आर्थिक कूटनीति का मिश्रण। इससे न केवल ब्रांड प्रमोट होता है, बल्कि निवेश और ट्रेड डील्स को बढ़ावा मिलता है।

चुनौतियां और भविष्य

पारले को प्रीमियम सेगमेंट में एक्सपैंड करना होगा। युवा उपभोक्ताओं के लिए हेल्दी वेरिएंट्स (लो-शुगर, फोर्टिफाइड) लाने होंगे। ग्लोबल कॉम्पिटिशन और सप्लाई चेन इश्यूज चुनौतियां हैं, लेकिन स्केल और ब्रांड लॉयल्टी मजबूत आधार हैं।

एक अनुमान के अनुसार पारले-जी की एक महीने की प्रोडक्शन से धरती से चांद तक (72.5 लाख किमी) पुल बन सकता है – यह परियों की कहानी नहीं, बल्कि भारतीय उद्यमिता की सच्चाई है।

पारले की कहानी स्वदेशी से शुरू होकर वैश्विक मंच तक पहुंची है। मोदी जी द्वारा मेलोनी को मेलोडी उपहार देना महज मीठा पल नहीं, बल्कि भारत की बढ़ती आर्थिक ताकत और सांस्कृतिक आत्मविश्वास का प्रतीक है। एफएमसीजी सेक्टर में भारत की संभावनाएं अनंत हैं – बढ़ती आबादी, युवा डेमोग्राफी और डिजिटल पहुंच के साथ।

जब तक आम भारतीय का पहला नाश्ता या स्नैक पारले-जी रहेगा, स्वदेशी का स्वाद जीवित रहेगा। यह सिर्फ बिस्कुट या टॉफी नहीं, बल्कि आत्मनिर्भर भारत की मिसाल है।

रक्तरंजित दौर के बाद नॉर्थईस्ट में थमी पत्रकार हत्याएँ

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नव ठाकुरीया

गुवाहाटी: कभी अशांत क्षेत्र के रूप में पहचाने जाने वाले भारत के नॉर्थईस्ट में, जहाँ पिछले तीन दशकों में हमलावरों के हाथों 30 से अधिक संपादकों, रिपोर्टरों और संवाददाताओं की जान गई थी, वहाँ पिछले आठ वर्षों से पत्रकार हत्या का कोई मामला सामने नहीं आया है। वर्ष 2017 में मीडिया पेशेवरों की आखिरी सनसनीखेज हत्याओं के बाद, वर्ष 2025 को समाप्त हुए चार महीने से अधिक समय बीत चुके हैं और इस दौरान ऐसी कोई दुर्भाग्यपूर्ण घटना दर्ज नहीं हुई।

जहाँ देशभर में औसतन हर वर्ष पाँच से दस पत्रकार अपनी जान गंवाते हैं, वहीं नेपाल, भूटान, तिब्बत/चीन, म्यांमार और बांग्लादेश की सीमाओं से घिरा यह क्षेत्र इस सकारात्मक स्थिति को बनाए हुए है। एक अरब से अधिक आबादी वाले भारत में पिछले वर्ष छह पत्रकारों की हत्या दर्ज की गई। इनमें बस्तर (छत्तीसगढ़) से NDTV के स्ट्रिंगर मुकेश चंद्रकार, इमालिया सुल्तानपुर (उत्तर प्रदेश) से दैनिक जागरण के राघवेंद्र वाजपेयी, डिगलीपुर (अंडमान द्वीप समूह) से Republic Andaman के सहदेव डे, गुरुग्राम (हरियाणा) से Fast News India के धर्मेंद्र सिंह चौहान, भुवनेश्वर (ओडिशा) से Times Odia के नरेश कुमार तथा जोशियारा (उत्तराखंड) से Delhi Uttarakhand Live के राजीव प्रताप सिंह शामिल हैं। इसके अतिरिक्त देहरादून के फ्रीलांस पत्रकार पंकज मिश्रा की संदिग्ध हत्या का मामला भी सामने आया था।

इस वर्ष अब तक दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत ने हमलावरों के हाथों एक पत्रकार को खोया है। 28 अप्रैल 2026 को तेलुगू पत्रकार वी. जगनमोहन रेड्डी की हत्या कर दी गई। आंध्र प्रदेश के चित्तूर जिले के वेंकटगिरि कोटाइन इलाके में सुबह की सैर पर निकले जगनमोहन पर घातक हथियारों से लैस बदमाशों के एक समूह ने हमला किया, जिससे उनकी मौके पर ही मौत हो गई। ‘आंध्र ज्योति’ अखबार से जुड़े 40 वर्षीय जगनमोहन की हत्या के बाद विभिन्न पत्रकार संगठनों ने तिरुपति प्रेस क्लब में विरोध प्रदर्शन आयोजित किए।

‘इंडियन जर्नलिस्ट्स यूनियन’ (IJU) ने दावा किया कि यह हमला उस रिपोर्ट के कुछ दिनों बाद हुआ, जिसमें उन्होंने क्षेत्र में सक्रिय चंदन तस्करों पर खबर प्रकाशित की थी। संगठन ने कार्यरत पत्रकारों की सुरक्षा और प्रेस की स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के लिए कठोर नीति बनाने की मांग भी की। जिनेवा स्थित वैश्विक मीडिया सुरक्षा एवं अधिकार संगठन ‘प्रेस एम्बलम कैंपेन’ (PEC) ने भी जगनमोहन के लिए न्याय की मांग उठाई। PEC के अध्यक्ष ब्लेज़ लेम्पेन ने संबंधित अधिकारियों से अपराधियों को शीघ्र गिरफ्तार कर कानून के तहत कठोर सज़ा सुनिश्चित करने की अपील की। 1 जनवरी 2026 से दुनिया भर में मारे गए मीडिया कर्मियों में जगनमोहन 28वें पीड़ित बने। वह अपने पीछे पत्नी, दो बच्चों और अनेक शुभचिंतकों को छोड़ गए हैं।

इस निराशाजनक राष्ट्रीय परिदृश्य के विपरीत, नॉर्थईस्ट क्षेत्र अपेक्षाकृत बेहतर तस्वीर प्रस्तुत करता है। लगभग छह करोड़ आबादी वाले इस क्षेत्र में आखिरी बार वर्ष 2017 में त्रिपुरा में दो पत्रकारों—शांतनु भौमिक और सुदीप दत्ता भौमिक—की हत्या हुई थी। इससे पहले वर्ष 2013 में भी बांग्लादेश सीमा से लगे इसी राज्य में तीन मीडियाकर्मियों—सुजीत भट्टाचार्य, रंजीत चौधरी और बलराम घोष—की हत्या की गई थी। इन तीनों की हत्या अगरतला स्थित एक बंगाली समाचार पत्र के कार्यालय के भीतर हुई थी।

असम और मणिपुर में इससे पहले पत्रकार हत्याओं के मामले तब सामने आए थे, जब रायहानुल नयुम और द्विजमणि नानाओ सिंह अपराधियों के निशाने पर आए। अकेले असम में वर्ष 1987 से अब तक 25 से अधिक मीडियाकर्मियों की हत्या हो चुकी है।

हालाँकि, Covid-19 महामारी ने इस क्षेत्र के मीडिया जगत को गहरी क्षति पहुँचाई। नॉर्थईस्ट में 20 से अधिक पत्रकारों और मीडियाकर्मियों की मौत कोरोना संक्रमण से हुई, जबकि पूरे देश में यह आँकड़ा लगभग 300 तक पहुँचा। पूर्वोत्तर में सबसे अधिक मौतें असम में दर्ज की गईं, जबकि अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड, मिजोरम और सिक्किम में किसी पत्रकार की कोरोना संक्रमण से मृत्यु नहीं हुई।

पहला मामला गुवाहाटी से सामने आया, जब 3 जुलाई 2020 को ‘असोमिया खोबोर’ के प्रिंटर एवं प्रकाशक रंटू दास को कोरोना संबंधी जटिलताओं के कारण मृत घोषित किया गया। इसके बाद उदलगुरी के ग्रामीण पत्रकार धनेश्वर राभा, सिलचर के पत्रकार असीम दत्ता तथा रेडियो समाचार एंकर गुलाब सैकिया की भी गुवाहाटी में इलाज के दौरान कोरोना से संबंधित जटिलताओं के कारण मृत्यु हो गई।

असम ने कोरोना महामारी के दौरान दो प्रतिष्ठित मीडिया हस्तियों—डॉ. लक्ष्मी नंदन बोरा और होमेन बोरगोहेन—को भी खो दिया। युवा पत्रकार आयुष्मान दत्ता, मोरान के जादू चुटिया, चायगांव के शिवचरण कलिता, बोकाजान के रुबुल दिहिंगिया तथा नगांव के हुमेश्वर हीरा भी कोरोना पीड़ितों की सूची में शामिल रहे। नई दिल्ली में रह रहीं असमिया पत्रकार नीलाक्षी भट्टाचार्य (55) और उनके पति कल्याण बरुआ की 24 घंटे के भीतर कोरोना संक्रमण से मृत्यु हो गई। दिल्ली में ही पत्रकार अनिर्बान बोरा ने भी वायरस से संघर्ष करते हुए दम तोड़ दिया।

त्रिपुरा में जितेंद्र देबबर्मा, तन्मय चक्रवर्ती, गौतम दास और माणिक लाल दास की मृत्यु के साथ कोरोना से मीडियाकर्मियों की मौत के मामले सामने आए। वहीं मणिपुर ने सगोलसेम हेमंत, साइखोम शांति कुमार, थोतशांग शैजा और लैरेनजम बिजेन सिंह को खो दिया, जबकि मेघालय में सिंडोर सिंह सिएम की मृत्यु कोरोना के बाद उत्पन्न जटिलताओं के कारण हुई।

हालाँकि नई दिल्ली स्थित केंद्र सरकार और कुछ राज्य सरकारों ने कोरोना पीड़ित पत्रकारों के परिवारों को मुआवज़ा देने की घोषणा की थी, लेकिन नॉर्थईस्ट के किसी भी राज्य ने ऐसी कोई प्रभावी योजना लागू करने की दिशा में ठोस कदम नहीं उठाया। ओडिशा सरकार ने कोरोना संक्रमण से जान गंवाने वाले प्रत्येक कार्यरत पत्रकार के परिवार को 15 लाख रुपये की सहायता राशि प्रदान की। उत्तर प्रदेश, तमिलनाडु और पंजाब सरकारों ने 10-10 लाख रुपये प्रति परिवार मुआवज़ा दिया। आंध्र प्रदेश और छत्तीसगढ़ ने पाँच-पाँच लाख रुपये की सहायता दी, जबकि बिहार ने चार लाख और तेलंगाना ने दो लाख रुपये का मुआवज़ा घोषित किया।

असम सरकार ने शुरुआत में यह घोषणा की थी कि कोरोना के कारण जान गंवाने वाले मीडियाकर्मियों को अन्य फ्रंटलाइन वॉरियर्स की तरह 50 लाख रुपये की जीवन बीमा योजना में शामिल किया जाएगा। लेकिन बाद में प्रभावित पत्रकार परिवारों को सहायता प्रदान करने के मुद्दे पर सरकार पूरी तरह खामोश हो गई। नॉर्थईस्ट के अन्य राज्यों ने भी लगभग यही रुख अपनाया, जैसा कि इस क्षेत्र में अक्सर देखने को मिलता है।

(लेखक पूर्वोत्तर भारत के वरिष्ठ पत्रकार)

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