राम बहादुर राय: यूं ही कोई वफ़ा नहीं करता…

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शशि शेखर

दिल्ली। 17 साल पहले राय साहब से उनके गाजियाबाद स्थित आवास पर मिला था. चूंकि, तब मैं मनीष सिसोदिया के साथ मिल कर सूचना का अधिकार क़ानून पर एक पत्रिका ‘अपना पन्ना’ निकालता था और राय साहब उसके सलाहकार संपादक थे. मनीष जी के कहने पर सलाह लेने चला गया था. नि:संदेह राय साहब एक उच्च कोटि के विद्वान है और उनकी पत्रकारिता के बारे में कुछ लिखने की मेरी हैसियत है नहीं. राय साहब आजकल चर्चा में हैं. उन्होंने गांधी मार्ग के बाद, ‘मोदी मार्ग’ की संकल्पना पेश की हैं. बुद्ध के ‘मध्य मार्ग’ को वे शायद अप्रसांगिक मान रहे हो. अस्तु.

साल 2004 के दौर में, दिल्ली में मैंने पत्रकारों की एक ऐसी समृद्ध परंपरा देखी, जिनके बारे में आप कुछ भी कर ले, यह अंदाज तक नहीं लगा सकते थे कि उनकी खुद की विचारधारा क्या है? कांग्रेस की सरकार में खामोशी से सम्मान और रोजगार मिलता रहा. साल 2014 के बाद तो भाई साहब, क्या ही कहने? कहीं वीसी, कहीं एचओडी, कहीं किसी संस्थान के अध्यक्ष. अलबत्ता, ये गुण इंसान में होना श्रेष्ठीजन होने की निशानी है और हमजैसे लोग बेसिकली ‘बिग सल्फेट’ थे या हैं. अस्तु.
बहरहाल, मित्र राजेश कुमार ने लिखा है “जितना तुम बदले उतना नहीं बदला जाता.” मित्र राजेश, कहाँ कुछ बदला है. जाड़े के दिनों में गाँव में घोंघा देखा होगा या कछुआ? विपरीत हालात में दोनों अपनी गर्दन एक सुरक्षित शेल के भीतर घुसा लेते हैं. और जिस जनसत्ता के पर्याय राय साहब हैं, उसी जनसत्ता के मालिक गोयनका साहब विदिशा से जनसंघ के सांसद हुआ करते थे. पत्रकारीय क्रान्ति तो आपातकालीन बाय-प्रोडक्ट था. भड़ास वाले युवा तुर्क यशवंत सिंह भी ‘मोदी मार्ग’ संकल्पना पेश किए जाने के बाद से आहत दिख रहे हैं. बड़े भाई, आहात न होइए. सीखिए कि श्रेष्ठीजन कैसे बनते हैं? यह भी सीखिए कि हर दौर में डार्विन की संकल्पना (सर्वाइवल) को कैसे सही सिद्ध किया जाना चाहिए?
अक्सर श्रेष्ठीजन गैंडे से भी मजबूत कवच के स्वामी होते हैं. शब्दों का कवच तो और भी मजबूत होता है. जेपी के साइलेंट सहयोगी बने कई लोगों को बाद के कई सालों तक वो नहीं मिला, जिसकी उन्हें उम्मीद थी. 14 के बाद कुछ मिलने का समय आया तो ‘त्याग’ कर पाना मुश्किल हुआ. लेकिन, इस सबके बीच, सबसे महत्वपूर्ण है ‘विचार’, मोदी मार्ग की संकल्पना महज कोई ‘मक्खनबाजी’ नहीं है. यह एक विचार को एंडोर्स करने का बौद्धिक प्रयास हैं. और इस प्रयास की छटपटाहट भी कोई नई नहीं है. जागरूक लोग यकीनन ‘प्रभाष परंपरा’ के संस्थापक स्वयं प्रभाष जी के सती प्रथा वाले आलेख से परिचित होंगे.
तो विचारों का द्वन्द और टकराव कोई नया कहाँ है? कांग्रेस के भीतर कई ‘प्रभाष जी’, कई ‘राय साहब’ आपको मिल जाएंगे. दिग्गी राजा अपडेटेड वर्जन थे ही कांग्रेस के पास. और मैं तो आज भी मानता हूँ कि कांग्रेस से ज्यादा ‘हिंदूवादी’ आज तक भाजपा भी न हो सकी है. अन्यथा, एक प्रधानमंत्री चिठ्ठी भेजता रहा, लेकिन पन्त साहब ने कह दिया कि राम लला की मूर्ती अब नहीं हटाई जाएगी. और एक और प्रधानमंत्री भरी दुपहरिया भात-सांभर खा कर सो गए और उधर अयोध्या में जो होना था, होता रहा.
अस्सी के राय साहब शतायु हो. ईश्वर से मेरी प्रार्थना है. हिन्दुस्तान ने हर मार्ग को जगह दी हैं. जिस मार्ग में दम होता है, उसी पर चलना लोग पसंद करते हैं.

(सोशल मीडिया से)

क्या भाजपा अपने समर्थकों की बैचेनी को समझ रही है ?

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सुरेंद्र चतुर्वेदी

जयपुर : प्रश्न यह है की क्या भाजपा मतदाताओं की बैचेनी और बदलते व्यवहार को पहचान रही है ? क्या भाजपा नेतृत्व को अपने परम्परागत मतदाताओं की नाराजगी और उसके कारण समझ में आ रहे हैं ? और ये भी कि यदि विपक्ष तर्कसंगत और मजबूत हो तो क्या मतदाता अपने मत का प्रयोग भाजपा के विरुद्ध करने में एक बार विचार करेंगे या नहीं ? इन्ही प्रश्नों में भाजपा के लिए आगामी चुनावों का परिणाम नहीं टिका है ? हालांकि अभी उत्तर प्रदेश सहित पाँच राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनावों में पाँच महीने से ज़्यादा का समय बाक़ी है लेकिन अभी से भाजपा के परम्परागत मतदाताओं का रुझान भाजपा विरोधी होता दिखाई दे रहा है। इसका प्रमाण राजस्थान में संपन्न हुए स्थानीय निकाय के चुनावों में आए परिणामों से मिल रहा है। यह सही है कि भाजपा लगभग 200 स्थानों पर अपना बोर्ड बनाने में तकनीकी रूप से सफल हुई है लेकिन मतदाताओं ने भाजपा उम्मीदवारों के प्रति जिस तरह की उदासीनता और बेरुखी दिखाई है, वह राजस्थान के साथ साथ आने वाले पाँच राज्यों के चुनाव में खतरे की ओर संकेत कर रहे हैं।

इन सबके मूल में हैं भाजपा से सवर्ण मतदाताओं के बीच पनप रही असुरक्षा की भावना। इन मतदाताओं के मन में यह बात गहरे पैठ गई है कि जिस तुष्टिकरण का विरोध कर भाजपा ने इस वर्ग का समर्थन हासिल किया था, अब भाजपा भी उसी तुष्टिकरण को अपने हथियार के रूप में इस्तेमाल कर रही है। मुस्लिम मतदाताओं के प्रति उदारता तो राजनीतिक मजबूरी हो सकती है लेकिन हिंदू समाज के बीच जातीय वर्चस्व की लड़ाई के अवसर उपलब्ध कराना इन मतदाताओं के ग़ुस्से का बड़ा कारण है। *जातीयता विहीन समाज को बनाने की दिव्य दृष्टि लेकर राजनीति करने उतरी भाजपा का मतदाताओं को जातीय चश्मे से देखना हतप्रभ करता है।*

भाजपा के इस परिवर्तन का प्रभाव इतना गहरा है कि मोदी सरकार द्वारा किये गए कार्य जैसे कश्मीर से धारा 370 का हटना , भव्य राम मंदिर का निर्माण, जान धन खाते, हर घर में स्वच्छ पानी, निर्धन को आवास, पाकिस्तान को बेचारा बना देश बना देना जैसी उपलब्धियां भी बौनी नजर आने लगी हैं। यू जी सी द्वारा जारी दिशा निर्देशों ने हर घर में चिंता बढ़ा दी है। राजनीतिक समीक्षक मानते हैं कि सवर्ण समाज को अनुसूचित जाति/ जनजाति को दिए जाने वाले आरक्षण से कोई असहमति नहीं थी। लेकिन अनुसूचित जाति/ जनजाति क़ानून में किए गए अनुचित बदलाव और बिना जाँच के ग़ैर जमानती अपराध बनाने व झूठी शिकायत पर भी मिलने वाले वित्तीय मुआवजे के प्रावधान ने जातीय संघर्ष की एक नई पटकथा तैयार कर दी है। जिसका प्रमाण मुंबई आईआईटी के प्रोफेसर सूर्यनारायण दुल्ला का प्रकरण है, जिसमें उन्होंने बी टेक के छात्र साहिल वोकडे को नकल करते पकड़ा और आईआईटी प्रशासन को इसकी जानकारी दी। अगले दिन साहिल ने आत्महत्या कर ली। इस घटना के बाद साहिल के परिजनों ने प्रोफेसर सूर्यनारायण दुल्ला के खिलाफ अनुसूचित जाति / जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम के तहत प्राथमिकी दर्ज करा दी। यह एक ऐसा मामला बना है कि पूरे भारत में कोई भी सवर्ण या पिछड़ा वर्ग का व्यक्ति अनुसूचित जाति / जनजाति में संरक्षण पाये नागरिकों की मनमानी के ख़िलाफ़ कुछ नहीं बोलेगा। उनके मन में यह डर बैठ जाएगा कि मेरे विरोध करने पर मुझे ही बिना अपराध जेल जाना पड़ेगा और मुकदमा झेलना पड़ेगा। इसका दूसरा परिणाम यह भी हो सकता है कि पूरे भारत में अनुसूचित जाति / जनजाति के लोगों का अघोषित बहिष्कार हो जाये और सामाजिक समरसता का स्थान सामाजिक विद्वेश ले ले।

जानकार लोग यह भी मानते हैं की 2014 के बाद भाजपा के जनाधार बढ़ा है लेकिन देश का लगभग 20 प्रतिशत सवर्ण मतदाता बड़े पैमाने पर भाजपा के साथ ही मजबूती से खड़ा रहा है और यदि मतदाताओं का यह वर्ग भाजपा से मुंह मोड़ लेता है तो भाजपा की सत्ता में वापसी मुश्किल ही होगी। अब यह भाजपा को देखना है कि वो इस तुष्टिकरण के अभियान में आगे बढ़ती है या रुककर सर्व समावेशी राजनीति के नए मापदण्ड स्थापित करती है।

साहित्य क्रांति’ पत्रिका के उद्यापन समारोह में

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मनोज श्रीवास्तव

भोपाल: ‘साहित्य क्रांति’ पत्रिका आज ढाई दशक से अधिक समय की यात्रा के बाद अपने उद्यापन-क्षण तक पहुँची है।

आज याद करें कि इस पत्रिका के 90 के दशक में शुरू होने का अर्थ क्या था? धर्मयुग वर्ष 1993 में बंद हुआ था ।साप्ताहिक हिंदुस्तान का प्रकाशन दिसंबर 1992 में बंद कर दिया गया था।सारिका लगभग 1990-1991 में बंद हुई।दिनमान वर्ष 1990 के आसपास बंद हुआ था। ‘धर्मयुग’, ‘साप्ताहिक हिन्दुस्तान’, ‘सारिका’, ‘दिनमान’ जैसी पत्रिकाएँ साहित्य को अलग-थलग कोने में नहीं रखती थीं। साहित्य, संस्कृति, राजनीति, कला, समाज, विज्ञान और सामान्य जीवन एक ही पाठकीय संसार में आते थे। इसी कारण साहित्यिक लेखक को अपने पाठक तक पहुँचने के लिए केवल “साहित्यिक पत्रिका” की प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ती थी।
इसके बावजूद वे बन्द हुईं। ऐसे समय हिन्दी की साहित्यिक पत्रिका शुरू करने का निर्णय करना ही बहुत बड़ी आस्था, बहुत बड़े विश्वास का परिणाम था।
31 दिसंबर 2024 को PRGI के अनुसार कुल 1,54,362 पंजीकृत पत्रिकाएँ/प्रकाशन थे। इनमें से 1,02,092 को ‘defunct’ यानी निष्क्रिय चिह्नित किया गया था, क्योंकि उनके प्रकाशकों ने लगातार पाँच वर्षों तक वार्षिक विवरण दाखिल नहीं किया था। उसी अवधि में केवल 36,369 प्रकाशनों ने 2023–24 का वार्षिक विवरण दाखिल किया।अर्थात मोटे तौर पर: 1,54,362 पंजीकृत → 1,02,092 निष्क्रिय → लगभग 66 प्रतिशत।और केवल लगभग 23.6 प्रतिशत ने उस वर्ष वार्षिक विवरण दाखिल किया।

भारतीय मुद्रित पत्रिका-संस्कृति का पंजीकृत ढाँचा जितना विशाल दिखाई देता है, उसका सक्रिय हिस्सा उतना विशाल नहीं है।
31 मार्च 2023 तक भारत में कुल 1,48,363 पंजीकृत मुद्रित पत्रिकाएँ/प्रकाशन थे। इनमें अकेले हिंदी के 57,050 पंजीकृत प्रकाशन थे—अर्थात कुल पंजीकृत प्रकाशनों का लगभग 38.4 प्रतिशत। अंग्रेजी के 10,929 और मराठी के 10,659 पंजीकृत प्रकाशन थे। हिंदी की संख्या इसलिए विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि वह केवल अंग्रेजी से बड़ी नहीं, बल्कि कई गुना बड़ी है।लेकिन यही वह आँकड़ा है जिसे देखकर कोई जल्दबाजी में कह सकता है—“फिर हिंदी पत्रिकाएँ संकट में कैसे हैं? हिंदी में तो 57 हजार से अधिक पत्रिकाएँ हैं!”
यहीं असली बात छिपी है। 57,050 ‘हिंदी पंजीकृत प्रकाशन’ का अर्थ 57,050 साहित्यिक पत्रिकाएँ नहीं है। इनमें समाचार-पत्र, साप्ताहिक, धार्मिक, व्यावसायिक, संस्थागत, शैक्षिक, स्थानीय और अनेक अन्य प्रकार के प्रकाशन सम्मिलित हैं। इसलिए हिंदी साहित्यिक पत्रिकाओं की स्थिति जानने के लिए यह आँकड़ा सीधे इस्तेमाल करना गलत होगा। यह केवल हिंदी मुद्रित प्रकाशन-जगत का आकार बताता है।
आज हिन्दी साहित्यिक पत्रिकाओं की संख्या यदि कम है, तो इसके पीछे एक बड़ा कारण उन हिन्दीभाषियों का भी है जो हिन्दी साहित्य पत्रिकाओं को खरीदकर नहीं पढ़ते और अब तो उनका माइग्रेशन डिजिटल संसाधनों और सोशल मीडिया की तरफ उत्तरोत्तर बढ़ रहा है तब तो इन साहित्यिक पत्रिकाओं के सामने चुनौती और बड़ी हो गई है।
आज साहित्यकारों का भी सम्मान है।साहित्यकार होना आसान इसलिए नहीं है कि साहित्य केवल लेखन नहीं है। साहित्यकार को पहले जीवन पढ़ना पड़ता है। उसे मनुष्य के सुख में छिपे हुए दुःख को और दुःख में बची हुई आशा को पहचानना पड़ता है। उसे यह जानना पड़ता है कि इतिहास केवल राजाओं, युद्धों और विजयों से नहीं बनता; वह उन साधारण मनुष्यों से भी बनता है जिनके नाम इतिहास की पुस्तकों में नहीं आते, लेकिन जिनके जीवन के बिना कोई समाज बन ही नहीं सकता। साहित्यकार की सबसे बड़ी पूँजी उसकी संवेदना है। लेकिन संवेदना अकेली पर्याप्त नहीं। उसके साथ स्मृति चाहिए, अध्ययन चाहिए, भाषा का अनुशासन चाहिए और अपने समय से संवाद करने का साहस चाहिए। इसीलिए किसी साहित्यकार को सम्मानित करना उस श्रम को सम्मानित करना है जिसे अक्सर समाज देख नहीं पाता। मंच पर लेखक की पुस्तक दिखाई देती है; उसके पीछे वर्षों का एकांत दिखाई नहीं देता। प्रकाशित कविता दिखाई देती है; उसके पीछे की असंख्य काट-छाँट दिखाई नहीं देती। लेखक का नाम दिखाई देता है; उसके पीछे की वह लंबी साधना दिखाई नहीं देती जिसमें उसने स्वयं को शब्द के योग्य बनाया है।
साहित्य-साधना भी ऐसा ही व्रत है। लेखक जब लिखना आरंभ करता है तो वह केवल शब्दों को कागज पर नहीं रखता; वह अपने जीवन का एक अंश शब्दों के हवाले कर देता है। और जब कोई साहित्यिक पत्रिका पच्चीस वर्षों से अधिक समय तक निरंतर निकलती है, तो वह किसी व्यक्ति की निजी साधना नहीं रह जाती—वह एक सामूहिक व्रत बन जाती है।
‘साहित्य क्रांति’ का यही अर्थ है।
मुझे यह उद्यापन शब्द अच्छा लगा। पत्रिकाएँ बंद होती हैं लेकिन कोई इस तरह उनका उद्यापन नहीं करता। उद्यापन व्रत का ही होता है। उद्यापन शब्द अपने भीतर ही एक विलक्षण सांस्कृतिक गरिमा रखता है। हम किसी ऐसी वस्तु का उद्यापन करते हैं जिसका जीवन हमारे लिए केवल उपयोग का नहीं, अनुष्ठान का रहा हो। दीप का उद्यापन हो, व्रत का उद्यापन हो, किसी धार्मिक अनुष्ठान का उद्यापन हो-उसमें समाप्ति का अर्थ विनाश नहीं होता। वह कहता है कि जो कार्य आरंभ हुआ था, वह अपने नियत पड़ाव तक पहुँच गया; अब उसकी लौ किसी दूसरे हाथ में, किसी दूसरी स्मृति में, किसी दूसरी संभावना में चली जाएगी।
दउद्यापन का अर्थ यह नहीं कि व्रत विफल हो गया। इसके ठीक विपरीत—उद्यापन इस बात की घोषणा है कि व्रत ने अपनी नियत यात्रा पूरी कर ली। जिस संकल्प के साथ आरंभ किया गया था, वह अब एक पड़ाव तक पहुँच गया है। इसलिए उद्यापन में दीप भी है और आँसू भी; संतोष भी है और विरह भी; पीछे मुड़कर देखने की तृप्ति भी है और आगे की ओर देखने की बेचैनी भी।
बिना व्रत के इतनी मेहनत नहीं होती। ढाई दशकों से अधिक तक शब्द को स्थान देना, रचनाकारों को बुलाना, नई आवाज़ों को सुनना, पांडुलिपियों के बीच से रचना चुनना, अंक तैयार करना, उसे पाठकों तक पहुँचाना—यह केवल प्रकाशन-व्यवस्था नहीं थी। यह साहित्य के प्रति लिया गया एक दीर्घ संकल्प था। इसीलिए आज उसका उद्यापन हो रहा है।
और यहाँ ‘उद्यापन’ शब्द को समझना बहुत आवश्यक है।
इसलिए आज का दिन केवल ‘साहित्य क्रांति’ को नहीं, उसके पीछे खड़े उन सभी अदृश्य हाथों को भी प्रणाम करने का दिन है।उन हाथों को, जिन्होंने पांडुलिपियाँ संभालीं।उन आँखों को, जिन्होंने प्रूफ पढ़े।उन डाकियों को, जिन्होंने अंक पहुँचाए।उन पाठकों को, जिन्होंने सदस्यता ली।उन लेखकों को, जिन्होंने अपनी रचनाएँ भेजीं।उन मित्रों को, जिन्होंने संकट के समय साथ दिया।और उन परिवारों को, जिन्होंने साहित्यिक पत्रिका के कारण घर में आने वाली अनेक अतिरिक्त चिंताओं को चुपचाप स्वीकार किया।साहित्य का इतिहास अक्सर बड़े नामों से लिखा जाता है; लेकिन साहित्यिक संस्कृति का इतिहास अनाम श्रम से बनता है।आज उस अनाम श्रम को भी स्मरण किया जाना चाहिए।
समय की नदी बहती रही और ‘साहित्य क्रांति’ उसके किनारे एक दीप की तरह जलती रही।
आज वह दीप अपने नियत अनुष्ठान के बाद बुझाया जा रहा है; लेकिन उसकी रोशनी उन आँखों में रह गई है जिन्होंने उसे देखा है।
मुद्रित शब्द की अपनी एक अद्भुत नियति होती है—वह अपने वर्तमान से निकलकर स्मृति का हिस्सा बन जाता है।
अभी पूर्व वक्ता कह रहे थे कि इसे खत्म न करिये जारी रखिए, तब मुझे मेरी माँ की याद आयी। वे भी बार बार व्रत का उद्यापन करती थीं और थोड़े अंतराल के बाद फिर शुरू कर देती थीं। तो उद्यापन शब्द से निराश न हों। मैं धर्मवीर भारती की एक कविता की याद दिलाऊँ-
सृजन की थकन भूल जा देवता!
अभी तो पड़ी है धरा अधबनी,
अभी तो पलक में नहीं खिल सकी
नवल कल्पना की मधुर चाँदनी
अभी अधखिली ज्योत्सना की कली
नहीं ज़िंदगी की सुरभि में सनी—
अभी तो पड़ी है धरा अधबनी,
अधूरी धरा पर नहीं है कहीं
अभी स्वर्ग की नींव का भी पता!
सृजन की थकन भूल जा देवता!
रुका तू गया रुक जगत् का सृजन
तिमिरमय नयन में डगर भूल कर
कहीं खो गई रोशनी की किरन
बादलों में कहीं सो गया
नई सृष्टि का सप्तरंगी सपन
रुका तू गया जगत् का सृजन
अधूरे सृजन से निराशा भला
किस लिए; जब अधूरी स्वयं पूर्णता
सृजन की थकन भूल जा देवता!
तो हम उम्मीद कर सकते हैं।

विश्व नदी दिवस है आज: दस देश घूमे, सत्रह पड़ाव देखे, फिर भी दिल यमुना में अटका रहा

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मथुरा : यूरोप जीतने निकले थे। कुछ ही दिनों के बाद पता चला कि यूरोप जीतना तो दूर, अपने घुटनों को मनाना ही बड़ी जीत है।
सत्तर पार के हम दो भारतीयों ने सोचा था कि पासपोर्ट में कुछ नए ठप्पे लगेंगे, आंखों को कुछ नए नजारे मिलेंगे और कैमरे की मेमोरी भर जाएगी। सब हुआ। लेकिन एक बात उम्मीद के बिल्कुल उलट हुई। यूरोप जितना देखा, भारत उतना ही याद आता गया।
बेंगलुरु से यात्रा शुरू हुई। अबू धाबी होते हुए लंदन पहुंचे। फिर पेरिस, ब्रसेल्स, एम्स्टर्डम, जर्मनी, स्विट्जरलैंड, लिकटेंस्टाइन, ऑस्ट्रिया और आखिर में इटली। वेटिकन सिटी ने इस महायात्रा पर जैसे अंतिम मुहर लगा दी।
दस देश। सत्रह ठिकाने। अनगिनत स्मारक। सैकड़ों तस्वीरें। हजारों किलोमीटर।
और पैरों में हजारों किलोमीटर की शिकायत!
सीमाएं हमने ऐसे पार कीं जैसे भारत में सड़क पार करते हैं। कभी अकड़कर, कभी डरकर और कभी उस प्रार्थना के सहारे जिसे किसी भाषा या धर्म की जरूरत नहीं होती।
लेकिन हमारी असली यात्रा शहरों की नहीं थी।
हम नदी से नदी तक चलते रहे।
लंदन में टेम्स मिली। पेरिस में सीन। जर्मनी में नेकर और राइन। इंसब्रुक में इन नदी साथ रही। वेनिस में नदियां नहीं, पूरी जिंदगी ही पानी पर तैरती मिली। फ्लोरेंस में आर्नो इतिहास को अपने साथ बहाती रही।
और इन सबके बीच एक नदी बार-बार सिर उठाती रही।
यमुना।
क्यों?
क्योंकि यूरोप की नदियां सिर्फ पानी नहीं थीं। वे शहरों की पहचान थीं।
टेम्स लंदन की कहानी कहती है। सीन पेरिस की तस्वीर बनाती है। नेकर हाइडेलबर्ग के इतिहास को सहलाती हुई गुजरती है। राइन फॉल्स में पानी गरजता है तो लगता है प्रकृति ने खुद माइक पकड़ लिया है। वेनिस में पानी रास्ता भी है, बाजार भी है और जीवन की धड़कन भी।
तभी एक सवाल पीछा करने लगा।
हम अपनी नदियों के साथ ऐसा क्यों नहीं कर सकते?
यह कहना गलत होगा कि यूरोप की नदियां पूरी तरह साफ-सुथरी और समस्यामुक्त हैं। लेकिन एक फर्क साफ दिखाई देता है। वहां नदी को शहर के जीवन का हिस्सा माना जाता है। उसे छिपाने या उससे मुंह मोड़ने के बजाय उसके साथ जीने की कोशिश दिखाई देती है।
हम अक्सर नदी को नाले में बदल देते हैं और फिर उसके किनारे सौंदर्यीकरण का बोर्ड लगा देते हैं।
यानी पहले बीमारी पैदा करो, फिर उद्घाटन करके इलाज का दावा करो।
पद्मिनी अय्यर ने राइन फॉल्स के सामने खड़े होकर कहा था, “पानी की ताकत यहां किसी नाटक जैसी लगती है। हाइडेलबर्ग में नेकर सदियों का इतिहास लेकर चुपचाप बहती है। वेनिस में पानी सिर्फ दृश्य नहीं है, शहर की धड़कन है।”
बात छोटी थी, लेकिन दिल में उतर गई।
क्योंकि नदी को देखने का नजरिया ही शायद सभ्यता का आईना है।
स्विट्जरलैंड ने एक और सबक दिया। ट्रेनें समय पर आती रहीं। सड़कें व्यवस्थित थीं। पैदल यात्रियों को जगह मिली। सार्वजनिक परिवहन ने भरोसा कायम रखा। पुरानी इमारतें नई दुनिया के बीच भी सम्मान से खड़ी रहीं।
हमारे दल ने भी अपनी तरफ से यूरोप को कुछ दिया।
भारतीय शोर, संगीत और अपनापन।
हमारी बस धीरे-धीरे एक चलती-फिरती बारात बन गई।
भजन शुरू हुए। फिर अंताक्षरी। फिर किस्से। फिर हंसी। कुछ दिनों में जो लोग अजनबी थे, वे रिश्तेदार जैसे लगने लगे।
जैमिन और संकेत के पास खाने का इंतजाम हमेशा रहता था। अनीता जी की जेब में फ्लेवर वाली सुपारी और दिमाग में अनुभव की पूरी दुकान थी। और लेडी मार्था?
उनके पास यूरोप का ऐसा ज्ञान था जो किसी गाइडबुक में नहीं मिलता।
अगला टॉयलेट कहां है।
सत्तर के बाद यह जानकारी कोलोसियम और एफिल टावर से कम महत्वपूर्ण नहीं होती।
मार्था कभी गाइड बनीं, कभी दार्शनिक, कभी ट्रैफिक पुलिस और कभी पूरे दल की अभिभावक।
पेरिस में खोया पर्स सस्पेंस बन गया। राइन फॉल्स की गलतफहमी रोमांचक अभियान बन गई। और लगातार पैदल चलने ने पैरों को लोकतांत्रिक अधिकारों की याद दिला दी।
उन्होंने साफ संदेश दिया, “अब बस!”
तभी हमें पता चला कि यूरोप देखने के लिए आंखें काफी नहीं हैं। पैर भी चाहिए।
और पैर भी ऐसे जो सरकार की तरह हर दिन नई योजना स्वीकार कर लें!
फिर रोम आया।
इतिहास हमारे सामने था। कोलोसियम था। रोमन साम्राज्य की यादें थीं। लेकिन तभी पद्मिनी के पैर में चोट लग गई।
अचानक सारे सम्राट, सारे खंडहर और सारे फव्वारे पीछे छूट गए।
उस एक पल ने पूरी यात्रा का सबसे बड़ा सबक दे दिया।
दुनिया घूमिए, लेकिन अपने शरीर को पीछे मत छोड़िए।
उम्र के इस पड़ाव पर पासपोर्ट अभी भी कहता है, “चलो दुनिया देखते हैं।”
घुटने धीरे से जवाब देते हैं, “पहले होटल तक तो पहुंचो।”
पिसा ने हमें मुस्कुराया। रोम ने सोचने पर मजबूर किया। वेनिस ने सपने दिखाए। स्विट्जरलैंड ने व्यवस्था दिखाई। वेटिकन ने विश्वास और इतिहास की ताकत याद दिलाई।
लेकिन नदियों ने सबसे गहरी बात कही।
सभ्यता आखिरकार पानी के साथ इंसान का रिश्ता है।
हजारों किलोमीटर दूर यूरोप गए थे, लेकिन यूरोप ने बार-बार हमें भारत की ओर लौटा दिया।
टेम्स में यमुना दिखाई दी।
राइन में यमुना सुनाई दी।
वेनिस की नहरों में यमुना की परछाईं महसूस हुई।
और तब लगा कि शायद यात्रा का असली मतलब विदेशी धरती से प्रेम करना नहीं, बल्कि अपनी धरती को नई आंखों से देखना है।
घर से दूर जाकर ही कभी-कभी घर की कीमत समझ आती है।
हम लौट रहे हैं तो साथ में तस्वीरें हैं, स्मृतियां हैं, किस्से हैं, चॉकलेट हैं और व्हाट्सऐप पर भेजने के लिए सैकड़ों तस्वीरें हैं।
लेकिन सबसे बड़ी चीज सूटकेस में नहीं है।
वह मन में है।
एक बड़ा क्षितिज।
थोड़ी ज्यादा विनम्रता।
बहुत सारी कृतज्ञता।
और अपनी यमुना के लिए फिर कुछ करने की बेचैनी।
सूटकेस खाली हो जाएंगे। कपड़े धुल जाएंगे। तस्वीरें परिवार और दोस्तों तक पहुंच जाएंगी। कुछ दिनों बाद हमारी यात्रा भी पुरानी खबर हो जाएगी।
फिर कोई पूछेगा,
“तो बताइए, यूरोप में सबसे अच्छी जगह कौन सी लगी?”
मैं शायद मुस्कुराऊंगा।
लंदन नहीं।
पेरिस नहीं।
रोम नहीं।
वेनिस भी नहीं।
मेरे लिए सबसे यादगार वह क्षण था, जब यूरोप की तमाम नदियों ने मिलकर मुझे वापस यमुना के किनारे खड़ा कर दिया।
तब समझ आया।
दुनिया देखने से घर छोटा नहीं होता।
घर की परिभाषा बड़ी हो जाती है।
हम यूरोप देखने निकले थे।
यूरोप ने हमें इतिहास दिया, वास्तुकला दी, व्यवस्था दिखाई, नदियां दिखाईं और ढेरों यादें दीं।
लेकिन सबसे बड़ा उपहार यह था कि उसने हमें फिर से अपनी यमुना याद दिला दी।
दुनिया घूमकर लौटे तो पाया,
सबसे लंबी यात्रा बाहर की नहीं थी।
सबसे लंबी यात्रा अपने भीतर की थी।
और उस यात्रा के अंत में भी एक नदी बह रही थी।
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