भारत को डराया नहीं जा सकता, यह नया भारत है

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दिल्ली । हाल ही में अमेरिकी संसद द्वारा भारत एवं चीन सहित कुछ अन्य देशों से अमेरिका को होने वाले विभिन्न उत्पादों के निर्यात पर 100 प्रतिशत अतिरिक्त टैरिफ लगाने सम्बंधी कानून को स्वीकृति प्रदान कर दी गई है, क्योंकि, ये देश रूस से कच्चे तेल का भारी मात्रा में आयात कर रहे हैं। अमेरिका के अनुसार, इन देशों द्वारा रूस से कच्चे तेल के आयात के चलते रूस को यूक्रेन के साथ युद्ध करने की आर्थिक शक्ति प्राप्त हो रही है। जबकि, यूरोपीयन देश एवं अमेरिका स्वयं रूस से गैस एवं अन्य उत्पादों का भारी मात्रा में आयात कर रहे हैं। अर्थात, इन देशों द्वारा रूस से अन्य पदार्थों के आयात करने से रूस को कोई आर्थिक ताकत प्राप्त नहीं होती है, केवल भारत एवं चीन सहित कुछ अन्य देशों द्वारा रूस से कच्चे तेल के आयात से रूस को आर्थिक शक्ति प्राप्त होती है। अमेरिका का यह दोहरा चरित्र अब पूरे विश्व के सामने प्रदर्शित हो रहा है। अमेरिका को अब यह समझ लेना चाहिए कि भारत से अमेरिका को होने वाले विभिन्न उत्पादों के निर्यात पर 100 प्रतिशत का अतिरिक्त टैरिफ लगाने का डर दिखा कर एवं भारत को दबाव में लाकर अमेरिका भारत से अपने मनमाफिक निर्णय करवा लेगा, तो आज की बदली हुई परिस्थितियों के बीच यह सम्भव होता हुआ दिखाई नहीं दे रहा है। अमेरिका एवं पूरे विश्व के सामने अब एक नया भारत खड़ा है। अमेरिका दरअसल चाहता है कि भारत उसके कृषि उत्पादों के लिए अपने बाजार खोले ताकि वह भारत को अपने कृषि एवं डेयरी उत्पाद निर्यात कर सके। यदि भारत अमेरिका के इस दबाव में आता है तो भारतीय किसानों पर इसका विपरीत प्रभाव पड़ेगा और केंद्र सरकार भारत के किसानों के हितों की बलि किसी भी कीमत पर देने को तैयार नहीं है। आज, संभवत: अमेरिका को भारत की अधिक आवश्यकता है क्योंकि भारत पूरे विश्व में सबसे बड़ी आबादी वाला देश बन गया है, जिसके कारण भारत पूरे विश्व में सबसे युवा देशों की श्रेणी में उच्च स्थान रखता है। साथ ही, भारत आज विश्व में विभिन्न उत्पादों का सबसे बड़ा उपभोक्ता देश बन गया है एवं आगे आने वाले समय में भारत की यही स्थिति लम्बे समय तक बनी रहने वाली है। भारत आज विश्व के अन्य उत्पादक देशों के लिए सबसे बड़ा बाजार है।

भारत का सकल घरेलू उत्पाद आज विश्व में बड़े देशों के बीच सबसे अधिक तेज गति से आगे बढ़ता हुआ दिखाई दे रहा है। हाल ही में जापान ने भारत की सार्वभौमिक क्रेडिट रेटिंग को अपग्रेड किया है। और तो और, अब अमेरिकी क्रेडिट रेटिंग एजेन्सियां भी भारत की सार्वभौमिक क्रेडिट रेटिंग में सुधार करने पर विचार करने को मजबूर हो रही हैं। हाल ही में मूडीज ने वर्ष 2026 में भारत के सकल घरेलू उत्पाद में होने वाली वृद्धि दर को 6 प्रतिशत से बढ़ाकर 7 प्रतिशत कर दिया है। साथ ही, जेफरीज ने भी अपने पूर्व अनुमान 6.7 प्रतिशत को सुधारकर 7 प्रतिशत कर दिया है। भारतीय रिजर्व बैंक ने भारत की आर्थिक विकास दर के अनुमान को 6.7 प्रतिशत कर दिया है, जबकि भारत ने वित्तीय वर्ष 2026-27 की प्रथम तिमाही में 7.8 प्रतिशत की आर्थिक विकास दर हासिल की है।

भारत के अपने विदेशी उत्पादों के लिए नए बाजार तलाशने सम्बंधित प्रयास आज सफल होते हुए दिखाई दे रहे हैं। क्योंकि, अगस्त 2026 का माह भारतीय निर्यातकों के लिए बहुत शानदार रहा है। वैश्विक स्तर पर कई प्रकार की चुनौतियों के चलते भी भारत से विभिन्न उत्पादों के निर्यात में 26.12 प्रतिशत की आकर्षक वृद्धि दर्ज हुई है। अगस्त 2025 माह में भारत के कुल निर्यात 3,474 करोड़ अमेरिकी डॉलर के रहे थे जो अगस्त 2026 में बढ़कर 4,381 करोड़ अमेरिकी डॉलर के हो गए हैं। फेडरेशन आफ इंडियन एक्सपोर्ट आरगनाईजेशन के अनुसार, भारत से विभिन्न उत्पादों के निर्यात में हो रही आकर्षक वृद्धि दर भारतीय निर्यातकों की ताकत, प्रतिस्पर्धा व बाजार के हिसाब से ढलने की क्षमता को दर्शाती है। चीन, सिंगापुर, जर्मनी, दक्षिण अफ्रीका, मलेशिया, तंजानिया, हांगकांग, आस्ट्रेलिया, स्पेन एवं श्रीलंका जैसे बाजारों में भारतीय उत्पादों की बढ़ती पहुंच भारत के निर्यात बास्केट के विस्तार का संकेत है। आटोमोबाईल निर्यात में 22.2 प्रतिशत की मजबूत बृद्धि दर्ज हुई है, इसमें दोपहिया व तिपाहिया वाहनों का दबदबा रहा है। जेम्स एंड ज्वेलरी के निर्यात में भी 3.14 प्रतिशत की वृद्धि दर हासिल हुई है। इलेक्ट्रॉनिक एवं इंजीनीयरिंग उत्पादों के निर्यात में लगातार वृद्धि भारत की मजबूत स्थिति को दर्शा रही है।

विदेशी व्यापार के मामले में भारत विश्व में केवल कुछ देशों (अमेरिका सहित) पर निर्भर रहने के स्थान पर अब अपने विभिन्न उत्पादों के निर्यात के लिए नए नए बाजार तलाश रहा है। केंद्र सरकार के इन प्रयासों का सुपरिणाम दिखाई भी देने लगा है। वित्तीय वर्ष 2026-27 के प्रथम पांच माह (अप्रेल-अगस्त 2026) के दौरान भारत का ब्रिक्स देशों (चीन, दक्षिण अफ्रीका, ब्राजील एवं रूस) को निर्यात 34 प्रतिशत बढ़कर 1,990 करोड़ अमेरिकी डॉलर के स्तर को पार कर गया है। इसी अवधि में चीन को भारत से विभिन्न उत्पादों के निर्यात में 39 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज हुई हैं। ब्रिक्स समूह के समस्त सदस्य देशों के साथ भारत अपने आर्थिक एवं राजनैतिक सम्बंध लगातार मजबूत कर रहा है, जिसका परिणाम अब इन देशों के साथ भारत के लगातार बढ़ रहे विदेशी व्यापार के रूप में दिखाई देने लगा है। वाणिज्य मंत्रालय द्वारा जारी किए गए आंकड़ों के अनुसार, ब्रिक्स के चार मुख्य देशों (चीन, दक्षिण अफ्रीका, ब्राजील एवं रूस) का भारत के कुल निर्यात में हिस्सा अप्रेल-अगस्त 2025 के दौरान 8.1 प्रतिशत से बढ़कर अप्रेल-अगस्त 2026 के दौरान 9.2 प्रतिशत हो गया है। इस वित्तीय वर्ष के प्रथम पांच माह के दौरान चीन को 960 करोड़ अमेरिकी डॉलर का निर्यात किया गया है तो वहीं दक्षिण अफ्रीका, ब्राजील एवं रूस को भारतीय उत्पादों के निर्यात में क्रमशः 58 प्रतिशत, 13 प्रतिशत एवं 11 प्रतिशत की आकर्षक वृद्धि दर्ज की गई है।

आज कई अमेरिकी कम्पनियां भारत में अपने वैश्विक योग्यता केंद्रों की स्थापना कर रही हैं। इनमें प्रमुख रूप से शामिल हैं – एस्ट्रा जेनेका, बैंक ओफ अमेरिका, ट्रूब्रिज, गाइडवायर, आदि। भारत में स्थापित इन वैश्विक योग्यता केंद्रों में हजारों की संख्या में भारतीय इंजीनीयर कार्य कर रहे हैं। कहीं यह अमेरिकी प्रशासन द्वारा लगातार बदले जा रहे वीजा सम्बंधी नियमों के चलते तो नहीं हो रहा है। अमेरिकी नीतियों से केवल विश्व के अन्य देश ही नहीं बल्कि अमेरिकी कम्पनियां भी परेशानी महसूस करने लगी हैं एवं वे अपनी इकाईयों को भारत सहित अन्य देशों में स्थानांतरित कर रही हैं।

भारत “वसुधैव कुटुम्बकम” की भावना के साथ विश्व के लगभग समस्त देशों के साथ अपने सम्बंधों को सुधारने का लगातार प्रयास कर रहा है। साथ ही, वैश्विक स्तर पर नागरिकों को सनातन संस्कृति के संस्कारों से परिचित कराने के प्रयास भी भारत द्वारा किए जा रहे हैं ताकि पूरे विश्व में शांति स्थापित की जा सके। इसी कड़ी में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के परमपूज्य सर संघचालक डॉ मोहन भागवत जी ने हाल ही में अमेरिका, कनाडा एवं ब्रिटेन की 17 दिवसीय यात्रा सम्पन्न की है। इन देशों में आयोजित सर्व धर्म सभाओं में अन्य धर्मों के धर्माचार्यों की भी उत्साहपूर्वक भागीदारी रही है। उक्त यात्रा में न्यूयार्क में सार्वभौमिक एकात्मता, टोरंटो में विश्व से मित्रता एवं लंदन में अपनेपन के संदेश के साथ डा भागवत ने सामाजिक समरसता, सेवा, विविधता के बीच एकता और नागरिक कर्तव्य पर भी जोर दिया। प्रवासी भारतीयों से उन्होंने अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़े रहते हुए अपनी कर्मभूमि के प्रति पूरी निष्ठा निभाने का आह्वान किया। एक तरफ भारत पूरे विश्व में सामंजस्य स्थापित कर शांति स्थापित करना चाहता है तो दूसरी ओर अमेरिका विभिन्न देशों पर अपने एकतरफा नियम थोपना चाहता है, चाहे वह टैरिफ से सम्बंधित हों अथवा अन्य देशों पर सैंक्शन लगाने से सम्बंधित हों। वेनेंजुएल जैसे कुछ छोटे देशों पर तो अमेरिका ने एक तरह से अपना पूरा नियंत्रण ही स्थापित कर लिया है एवं वहां के तेल के कुओं से निकलने वाले कच्चे तेल पर अपना पूर्ण अधिकार स्थापित करने का प्रयास किया है।

केवल अमेरिका ही क्यों, पूरे विश्व को ही आज भारत की सनातन संस्कृति के संस्कारों को जानने एवं उन पर अमल करने की आवश्यकता है। तभी, ईरान – अमेरिका, रूस – यूक्रेन एवं इजराईल – हम्मास जैसे युद्धों को टाला जा सकेगा और पूरे विश्व में शांति स्थापित की जा सकेगी।

बांग्लादेश में 7 हसीना सहयोगियों को मौत की सज़ा, भारत में शरण पर अटकलें

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नव ठाकुरीया

दिल्ली । दक्षिण एशियाई 17 करोड़ से अधिक आबादी वाला मुस्लिम-बहुल देश बांग्लादेश अक्सर गलत वजहों से मीडिया में रहता है। भारत और म्यांमार की सीमा से लगे इस देश की राजधानी ढाका में लगभग हर हफ्ते सड़कों पर प्रदर्शन होते हैं और दोषियों को अक्सर मौत की सज़ा सुनाई जाती है, जिनमें से कई को फांसी भी दी जाती है। मौत की सज़ाओं का ताज़ा मामला 15 सितंबर 2026 को सामने आया, जब बांग्लादेश अवामी लीग के सात साथियों को दो साल पहले देशभर में हुए जुलाई-अगस्त के बड़े आंदोलन के दौरान मानवता के खिलाफ अपराध के लिए सबसे कड़ी सज़ा (मौत की सज़ा) सुनाई गई।

बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना, जिन्हें उसी बड़े जन-आंदोलन के बाद सत्ता से हटा दिया गया था और जो अभी भारत में अनौपचारिक रूप से शरण लिए हुए हैं, उन्हें भी नवंबर 2025 में ऐसे ही फैसले का सामना करना पड़ा था। इंटरनेशनल क्राइम्स ट्रिब्यूनल (ICT – इसमें ‘इंटरनेशनल’ जैसा कुछ नहीं है, क्योंकि सभी जज बांग्लादेशी नागरिक हैं और इसका अधिकार क्षेत्र सिर्फ बांग्लादेश तक ही सीमित है) ने अवामी लीग की प्रमुख हसीना और उनके गृह मंत्री असदुज़्ज़मान खान कमाल को प्रदर्शनकारियों पर कार्रवाई करने का दोषी ठहराया था। संयुक्त राष्ट्र समर्थित एक पैनल के अनुसार, 2024 में देशव्यापी आंदोलन के दौरान 1,400 से अधिक लोग मारे गए और 25,000 लोग घायल हुए, जिनमें कई युवा शामिल थे।
अब उसी ICT ने अवामी लीग के महासचिव ओबैदुल कादर के साथ-साथ बहाउद्दीन नसीम, मोहम्मद अली अराफात, शेख फ़ज़ले शम्स पराश और मैनुल हुसैन खान निखिल को मौत की सज़ा सुनाई है। युवाओं के नेतृत्व वाले आंदोलन के दौरान बड़े पैमाने पर हत्याओं की साज़िश रचने के लिए छात्र लीग (अवामी लीग से जुड़ी संस्था) के दो नेताओं—सद्दाम हुसैन और शेख वली आसिफ़ एनन—को भी दोषी ठहराया गया। ढाका स्थित तीन सदस्यीय ICT पैनल ने कादर, नसीम, अराफात, पराश और निखिल की 50 प्रतिशत निजी संपत्ति ज़ब्त करने का भी आदेश दिया। ज़ब्त की गई संपत्ति (कुल 500 मिलियन टका) का इस्तेमाल उन परिवारों को मुआवज़ा देने के लिए किए जाने की उम्मीद है, जो प्रदर्शन के दौरान प्रभावित हुए थे।
हैरानी की बात यह है कि मौत की सज़ा पाने वाले सभी दोषियों पर उनकी गैर-मौजूदगी में मुकदमा चलाया गया, क्योंकि वे फरार हैं और बांग्लादेशी नागरिकों का एक बड़ा वर्ग मानता है कि वे चुपके से भारत में शरण लिए हुए हैं। सदमे से गुजर रहे परिवारों ने फैसले का स्वागत किया और ढाका में तारिक़ रहमान की अगुवाई वाली बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) सरकार से अपील की कि वह सभी दोषियों को वापस लाए, ताकि उन्हें सज़ा-ए-मौत दी जा सके। पीड़ित परिवारों को आज भी याद है कि कैसे छात्रों के नेतृत्व में हसीना-विरोधी आंदोलन ने पूरे देश को अपनी चपेट में ले लिया था और हिंसक कार्रवाई के बावजूद सरकार टिक नहीं पाई। लगातार 15 साल तक देश पर शासन करने के बाद भी हसीना की सत्ता चली गई और उन्हें 5 अगस्त 2024 को देश छोड़कर नई दिल्ली में अस्थायी शरण लेने के लिए मजबूर होना पड़ा।
नोबेल पुरस्कार विजेता प्रोफ़ेसर मुहम्मद यूनुस की अगुवाई वाली बांग्लादेश की अंतरिम सरकार ने हसीना को ढाका में मुकदमे के लिए वापस लाने की कोशिश शुरू की, लेकिन नई दिल्ली ने हमेशा इस पर कोई खास उत्साह नहीं दिखाया। इस साल 12 फरवरी को हुए 13वें राष्ट्रीय चुनावों के बाद प्रधानमंत्री बने BNP प्रमुख रहमान ने दोनों पड़ोसी देशों के बीच 2013 की प्रत्यर्पण संधि के तहत उन्हें वापस लाने की मांग जारी रखी। ढाका ने हसीना की वापसी के लिए अलग-अलग तरीकों से जोर दिया, लेकिन नई दिल्ली ने हाल ही में कहा कि वह संबंधित कानूनों के तहत इस मामले की जांच कर रही है। अपुष्ट सूत्रों का दावा है कि नई दिल्ली ने हसीना के प्रत्यर्पण पर कुछ शर्तें रखी हैं, जिनमें मुख्य रूप से उनकी सुरक्षा और बांग्लादेश में निष्पक्ष मुकदमे की मांग शामिल है।
स्थिति तब और जटिल हो गई, जब 78 वर्षीय हसीना ने हाल ही में घोषणा की कि वह आने वाले दिसंबर तक बांग्लादेश लौट आएंगी। बंगबंधु शेख मुजीबुर रहमान की बहादुर बेटी ने पिछले 5 अगस्त को नई दिल्ली में एक ऑडियो-लाइव प्रेस ब्रीफिंग को संबोधित करते हुए अपने देश लौटने का संकल्प लिया। हसीना के स्वेच्छा से बांग्लादेश लौटने के इरादे को वैश्विक मीडिया में काफी जगह मिली, भले ही बांग्लादेशी मीडिया को इस घटना को कवर करने (या उजागर करने) में पाबंदियों का सामना करना पड़ा।
नाराज़ रहमान सरकार ने इस बात पर असंतोष व्यक्त किया कि भारतीय अधिकारियों ने ‘नरसंहार करने वाली’ को मीडिया से बातचीत करने की अनुमति दी। ढाका प्रशासन के अधिकारियों ने दावा किया कि हसीना को खुद लौटने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए, बल्कि उन्हें वापस भेजा जाना चाहिए। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि बांग्लादेश की धरती पर आते ही हसीना को सज़ा-ए-मौत दी जाएगी, क्योंकि ICT के फैसले के बाद अपील करने की 30 दिन की समयसीमा पहले ही समाप्त हो चुकी है। असल में, वे हसीना को पकड़ना चाहते हैं और उन्हें बांग्लादेश में कानूनी प्रक्रियाओं का सामना करने के लिए मजबूर करना चाहते हैं। ऐसा लगता है कि हसीना के मुद्दे ने रहमान को अपनी पहली आधिकारिक विदेश यात्रा भारत के बजाय मलेशिया और चीन करने के लिए प्रेरित किया।
नई दिल्ली ने ढाका के गुस्से पर तुरंत प्रतिक्रिया देते हुए स्पष्ट किया कि हसीना का कार्यक्रम एक स्वतंत्र प्रेस क्लब द्वारा आयोजित किया गया था, जिसमें स्थानीय अधिकारियों की कोई भूमिका नहीं थी। यह कहते हुए कि वह ब्रीफिंग में व्यक्त किसी भी विचार का समर्थन नहीं करता है, भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने दोहराया कि हसीना और उनकी पार्टी के कार्यकर्ताओं को भारत में किसी संप्रभु राष्ट्र को निशाना बनाने वाली राजनीतिक गतिविधियों में शामिल होने से रोका गया है। भले ही भारत संयुक्त राष्ट्र के 1951 के रिफ्यूजी कन्वेंशन और 1967 के प्रोटोकॉल का हस्ताक्षरकर्ता नहीं है—जिसके तहत शरणार्थियों को कुछ बुनियादी अधिकार मिलते हैं—फिर भी नई दिल्ली अपनी वैश्विक छवि को लेकर सतर्क है। इसी वजह से वह हसीना को जल्दबाजी में वापस नहीं भेज रही है।
(लेखक पूर्वी भारत के वरिष्ठ पत्रकार और दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के मामलों के जानकार हैं)

जब क्रांति घर खा गई

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डॉ पवन विजय

दिल्ली । केट मिलेट ने 1970 में एक किताब लिखी – ‘सेक्सुअल पॉलिटिक्स’। दुनिया में आग लग गई। उसने कहा – प्यार धोखा है, शादी जेल है, पति मालिक है, परिवार पिंजरा है। औरत को आजाद होना है तो ये सब तोड़ना पड़ेगा।

अमेरिका की औरतों ने तालियां बजाईं। टाइम मैगजीन ने उसे कवर पर छापा – “स्त्री मुक्ति की माओ”।

पहला चरण:घर टूटा

केट का अपना घर था। पति था, फुमियो योशिमुरा। 17 साल से साथ खुश पर आंदोलन को एक शादीशुदा हीरोइन नहीं चाहिए थी। उसे लेस्बियन हीरोइन चाहिए थी।

एक मीटिंग में घेर कर पूछा गया – तू लेस्बियन है?
केट ने कहा दिया – हाँ। अगले दिन अखबार में छप गया। पति सामान लेकर निकल गया। उसकी सगी बहन मैलोरी ने बाद में लिखा, ये एक गलती केट को जिंदगी भर सालती रही। वह मरते दम तक उस टूटे हुए घर को याद करती रही।

दूसरा चरण : खुद की लिखी किताब सेक्सुअल पॉलिटिक्स से नफरत

जिस किताब ने उसे भगवान बनाया, उसी किताब से उसे नफरत हो गई। उसने लिखा, ये प्रसिद्धि नहीं, बेइज्जती है। लोग उसे पढ़ते नहीं थे, उसे इस्तेमाल करते थे।

तीसरा चरण: पागलखाना

क्रांति के बाद क्या बचा?

पति नहीं, बच्चा नहीं, परिवार नहीं।

यदि कुछ बचा तो बचा डिप्रेशन, पागलखाना, लिथियम की गोलियां, बिजली के झटके।

उसने अपनी आखिरी किताब ‘द लूनी-बिन ट्रिप’ में लिखा, पागलखाना जेल से भी गंदा है। वहाँ ताले हैं, जंजीरें हैं, और कोई सुनने वाला नहीं।

आखिरी बात

केट ने औरतों को सिखाया – परिवार को जहर समझो, पर्दा फाड़ दो।

पर पिछले तीस से प्रताड़ित होते होते आखिरी दिन जब वह 83 साल की होकर पेरिस में मरी, तो कमरे में अकेली थी। कोई बेटा नहीं, कोई बेटी नहीं, कोई पोता नहीं।

उसकी ही साथी औरतें बाद में पूछने लगीं, “हमने सब तोड़ दिया, पर हाथ में क्या आया?”

केट मिलेट का जीवन इसका जवाब है नारे में क्रांति थी, आंखों में सिर्फ पछतावा।

सनातन जीवन-संस्कृति में अपनी कहानी तलाशता हिंदी सिनेमा

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 प्रणय विक्रम सिंह

कहानी शायद वहीं लौट रही है, जहां से भारतीय सिनेमा ने अपनी यात्रा शुरू की थी।

मुंबई । वर्ष 1913 में दादा साहेब फाल्के ने जब राजा हरिश्चंद्र बनाई थी, तब भारतीय सिनेमा के पास न हजारों करोड़ का बजट था, न वीएफएक्स की चकाचौंध और न सितारों का बाजार। उसके पास एक कहानी थी, जिसे यह देश पहले से जानता था। एक चरित्र था, जिसे लोक अपने भीतर जीता था। सत्य था, त्याग था और अपनी सभ्यता से निकला हुआ एक नैतिक द्वंद्व था।

एक सदी से अधिक समय बाद पर्दा बदल चुका है, तकनीक बदल चुकी है, दर्शक बदल चुके हैं लेकिन शायद भारतीय मन की वह मूल धड़कन उतनी नहीं बदली।

2026 की छोटी-सी फिल्म हनुमान अंश ने इसी धड़कन को फिर सुनाई देने लायक बना दिया है।

नीम करौरी बाबा के जीवन और हनुमान भक्ति से प्रेरित हनुमान अंश लगभग ₹1.8 करोड़ के बजट में बनी। शुरुआत इतनी छोटी थी कि पहले दिन की कमाई करीब ₹10 लाख बताई गई। न कोई स्थापित सुपरस्टार, न हजारों स्क्रीन की शुरुआती ताकत। लेकिन दर्शकों की चर्चा ने फिल्म को उठाया और 45वें दिन तक उसका वैश्विक कारोबार लगभग ₹350 करोड़ के आसपास पहुंचने की खबरें आईं।

इस आंकड़े को केवल बॉक्स ऑफिस की सनसनी मान लेना शायद इस कहानी का सबसे छोटा अर्थ होगा।

बड़ा अर्थ कहीं और है।

आखिर ऐसा क्या था कि करोड़ों के प्रचार और बड़े सितारों के बिना एक साधारण सी दिखने वाली आध्यात्मिक कथा ने दर्शक को सिनेमाघर तक खींच लिया?

उत्तर शायद सिनेमा की तकनीक में कम और भारतीय समाज की सांस्कृतिक स्मृति में अधिक छिपा है।

भक्ति को देखा भर नहीं जाता, उसे अनुभव किया जाता है। आस्था किसी ग्राफिक्स इंजन में पैदा नहीं होती। संस्कृति कोई सेट नहीं है, जिसे करोड़ों रुपए खर्च कर खड़ा कर दिया जाए। दर्शन कोई संवाद भी नहीं, जिसे किसी बड़े अभिनेता से बुलवा देने भर से वह दर्शक के भीतर उतर जाए।

तकनीक आंख को चमत्कृत कर सकती है, भाव ही हृदय को छूता है और आस्था की कथा में यह अंतर बहुत बड़ा हो जाता है।

यही कारण है कि भारतीय धार्मिक-सांस्कृतिक आख्यानों को पर्दे पर उतारना किसी सामान्य फैंटेसी कथा को फिल्माने जैसा नहीं है।

*राम को दिखाना और रामत्व को अनुभूत करा देना दो अलग क्षमताएं हैं। हनुमान जी का विराट स्वरूप रच देना और उनकी भक्ति का समर्पण दर्शक तक पहुंचा देना दो अलग उपलब्धियां हैं।*

दर्शक यहां केवल कहानी देखने नहीं आता। वह अपने साथ अपनी दादी की सुनाई कथा, घर की आरती, गांव की रामलीला, मंदिर की घंटी, मानस की चौपाई और पीढ़ियों की स्मृति भी लेकर आता है।

इसलिए वह पर्दे पर केवल पात्र नहीं देख रहा होता, वह अपनी स्मृति से पर्दे का मिलान भी कर रहा होता है।

शायद रामानंद सागर की रामायण की स्थायी लोकप्रियता का एक सूत्र यहां भी खोजा जा सकता है। सीमित तकनीक के बावजूद उस प्रस्तुति ने कई पीढ़ियों के दर्शकों के मन में स्थान बनाया। तकनीकी दृष्टि से आज उससे कहीं अधिक विराट दृश्य बनाए जा सकते हैं, लेकिन सांस्कृतिक आख्यानों में तकनीकी श्रेष्ठता और भावात्मक स्वीकार्यता हमेशा एक ही चीज नहीं होती।

यहीं से आज के हिंदी सिनेमा के सामने एक रोचक मोड़ दिखाई देता है।

लंबे समय तक मुख्यधारा के हिंदी सिनेमा का बड़ा हिस्सा महानगरीय जीवन, रोमांस, अपराध, ग्लैमर और स्टार-केंद्रित कथाओं के इर्द-गिर्द घूमता रहा। इसका अर्थ यह नहीं कि इस दौरान संस्कृति, इतिहास, सेना, गांव या भारतीय समाज की कहानियां बनी ही नहीं। बनीं और कई सफल भी हुईं। इसलिए पूरे हिंदी सिनेमा को किसी एक रंग में रंग देना इतिहास के साथ न्याय नहीं होगा।

लेकिन यह भी सच है कि पिछले कुछ वर्षों में भारतीय लोक, पुराण, क्षेत्रीय स्मृतियों और आध्यात्मिक प्रतीकों से निकली कहानियों के लिए बाजार की संभावनाएं अधिक स्पष्ट होकर सामने आई हैं।

दक्षिण भारतीय सिनेमा ने इस दिशा में कुछ उल्लेखनीय उदाहरण दिए। कांतारा ने कर्नाटक की भूत-कोला परंपरा और स्थानीय लोकविश्वास को कथा की आत्मा बनाया। बाहुबली किसी धार्मिक आख्यान का प्रत्यक्ष रूपांतरण नहीं थी, लेकिन उसकी दृश्य-भाषा, राजधर्म, मातृत्व, वचन और महाकाव्यात्मक संरचना भारतीय सांस्कृतिक स्मृति से संवाद करती थी।

इन फिल्मों ने एक महत्वपूर्ण बात समझाई कि *’लोकल होना ग्लोबल होने की बाधा नहीं है’।* अपनी मिट्टी में जड़ें जितनी गहरी हों, कहानी का वृक्ष उतना ही दूर तक फैल सकता है।

अब हिंदी सिनेमा भी जैसे उसी मिट्टी में फिर हाथ डाल रहा है।

हनुमान अंश के बाद 25 सितंबर को द वन: फोर्स ऑफ द फॉरेस्ट सिनेमाघरों में आने वाली है। सिद्धार्थ मल्होत्रा और तमन्ना भाटिया अभिनीत, दीपक कुमार मिश्रा निर्देशित और एकता कपूर, अरुणाभ कुमार सहित अन्य निर्माताओं की यह फिल्म बिहार के बिहटा क्षेत्र के वन देवी मंदिर से जुड़ी सदियों पुरानी स्थानीय मान्यताओं और लोककथाओं से प्रेरणा लेती है।

यानी कहानी मुंबई के किसी आलीशान अपार्टमेंट से नहीं निकली। वह बिहार के एक जंगल, एक ग्राम-देवी और पीढ़ियों से फुसफुसाती चली आ रही लोककथा से निकली है।

यही बदलाव बहुत दिलचस्प है।

जिस लोक को कभी मुख्यधारा का सिनेमा ‘बहुत स्थानीय’ समझ सकता था, वही लोक अब कथा की विशिष्टता बन रहा है। बिहार की वन देवी हों, कर्नाटक की लोक-परंपराएं हों या उत्तर भारत की संत-भक्ति… सिनेमा धीरे-धीरे उस भारत को खोज रहा है जो महानगरों के बाहर सदियों से अपनी कहानियां स्वयं जीता आया है।

द वन सफल होगी या नहीं, यह 25 सितंबर के बाद दर्शक तय करेंगे। रिलीज से पहले उसके लिए किसी रिकॉर्ड की भविष्यवाणी करना जल्दबाजी होगी। लेकिन उसका विषय चुन लिया जाना अपने आप में इस बदलती सिनेमाई रुचि का संकेत अवश्य है।

और फिर सामने है सबसे बड़ी परीक्षा-रामायण।

नितेश तिवारी की दो भागों में बन रही रामायण का पहला भाग इस दीपावली पर प्रदर्शित होना है। रणबीर कपूर राम, साई पल्लवी सीता और यश रावण की भूमिका में हैं। निर्माता-अभिनेता यश ने स्पष्ट किया है कि चर्चित ₹4,000 करोड़ की राशि किसी एक फिल्म की लागत नहीं, बल्कि दोनों भागों तथा उनके वैश्विक रिलीज और प्रचार सहित पूरे प्रोजेक्ट से जुड़ी है।

पैमाना असाधारण है। तकनीकी महत्वाकांक्षा असाधारण है। ए.आर. रहमान और हांस जिमर जैसे नाम इससे जुड़े हैं।

लेकिन रामायण की असली चुनौती ₹4,000 करोड़ नहीं है। उसकी असली चुनौती राम और सीता को केवल पर्दे पर उतारना नहीं, भारतीय मानस में बसे उनके भाव को पर्दे पर जीवंत कर देना है।

क्योंकि राम भारतीय मानस में मनुष्यता के महानायक भर नहीं हैं। वे पुत्र हैं, पति हैं, भाई हैं, वनवासी हैं, राजा हैं, वे संघर्ष में धैर्य, सामर्थ्य में संयम और संबंधों में मर्यादा की भारतीय जीवन-दृष्टि के सर्वोच्च प्रतिमान हैं। उसी तरह सीता केवल मर्यादा पुरुषोत्तम की सहधर्मिणी नहीं हैं। वे धैर्य में दृढ़ता, मर्यादा में महिमा, स्वाभिमान में शक्ति और त्याग में तपस्या की वह जीवंत प्रतिमा हैं, जिसमें भारतीय स्त्री-चेतना सहस्राब्दियों से स्वयं को देखती आई है।

वाल्मीकि की रामायण से तुलसी के रामचरितमानस और लोक की असंख्य रामकथाओं तक आते-आते यह आख्यान पुस्तक से बहुत आगे निकल चुका है।

वह लोकगीत में है।
वह रामलीला में है।
वह विवाह के मंगल में है।
वह वनवासी समाज की कथाओं में है।

वह गांव के छोटे मंदिर में है और महानगर के घर की पूजा-चौकी में भी।

इसीलिए रामायण को फिल्माना केवल एक महाकाव्य का ‘स्क्रीन अडैप्टेशन’ नहीं है। यह करोड़ों लोगों की सांस्कृतिक स्मृति से संवाद है।

यहां वीएफएक्स आवश्यक हो सकता है, लेकिन पर्याप्त नहीं।

भव्य लंका बनाई जा सकती है। समुद्र पर सेतु रचा जा सकता है। आकाश में युद्ध दिखाया जा सकता है। हजारों वानरों की सेना कंप्यूटर पर खड़ी की जा सकती है।

लेकिन राम की आंखों में करुणा, सीता के मौन में स्वाभिमान, भरत के त्याग में तप और हनुमान के समर्पण में भक्ति… इनका कोई सॉफ्टवेयर नहीं होता।

इन्हें कलाकार को जीना पड़ता है। लेखक को समझना पड़ता है। निर्देशक को अनुभव करना पड़ता है। संगीतकार को सुनना पड़ता है।

और दर्शक?

वह तुरंत पहचान लेता है कि पर्दे पर केवल अभिनय हो रहा है या कहीं भीतर कोई भाव भी बह रहा है।

हनुमान अंश की सफलता को इसलिए बड़े बजट के विरुद्ध छोटे बजट की जीत कहना भी अधूरा होगा। उसका अधिक महत्वपूर्ण संदेश यह है कि दर्शक तक पहुंचने का सबसे छोटा रास्ता हमेशा सबसे महंगा रास्ता नहीं होता।

कभी-कभी वह रास्ता उसकी अपनी स्मृतियों से होकर जाता है।

उसकी भाषा से।
उसके लोक से।
उसकी आस्था से।
उसकी मिट्टी से।
और संभवतः भारतीय सिनेमा के लिए यही इस समय की सबसे बड़ी सीख है।

सनातन जीवन-संस्कृति कहानियों की कोई छोटी-सी खान नहीं है, जिसमें से दो-चार पौराणिक पात्र निकालकर फ्रेंचाइजी बना दी जाए। यह हजारों वर्षों से बहती हुई वह विराट कथा-परंपरा है जिसमें राम और कृष्ण हैं तो कबीर और तुलसी भी। शिव और शक्ति हैं तो ग्राम-देवियां और लोकदेवता भी। वेदांत है तो लोकगीत भी। दर्शन है तो पर्व भी। तीर्थ हैं तो जंगल, नदी, पहाड़ और गांव से जुड़ी असंख्य स्मृतियां भी।

यहां कथाओं की कमी नहीं है। जरूरत उन्हें देखने वाली आंख और महसूस करने वाले हृदय की है।

इसलिए हिंदी सिनेमा का अपनी जड़ों की ओर लौटना स्वागत योग्य सांस्कृतिक संभावना है, बशर्ते वह आस्था को केवल ‘मार्केट सेगमेंट’ न समझ बैठे।

क्योंकि आस्था बिकाऊ विषय बनते ही कृत्रिम दिखाई देने लगती है।

उसे सम्मान चाहिए।
अध्ययन चाहिए।
संवेदना चाहिए।
और सबसे अधिक …भाव चाहिए।

सौ वर्ष पहले राजा हरिश्चंद्र के पास तकनीक नहीं थी, लेकिन अपनी कथा पर विश्वास था। आज भारतीय सिनेमा के पास संसार की श्रेष्ठ तकनीक तक पहुंच है। यदि उस तकनीक के साथ अपनी सभ्यता की समझ और लोक के प्रति वही विश्वास जुड़ जाए, तो भारतीय कथाओं को संसार तक पहुंचने के लिए किसी उधार की सांस्कृतिक भाषा की आवश्यकता नहीं है।

शायद चक्र पूरा हो रहा है।

सिनेमा आधुनिक होता गया, बाजार वैश्विक होता गया, पर्दा विराट होता गया और इतनी लंबी यात्रा के बाद उसे फिर अपनी ही मिट्टी में कहानी दिखाई देने लगी है।

क्योंकि भारत में कहानी केवल लिखी नहीं जाती। कहीं वह गाई जाती है, कहीं पूजी जाती है, कहीं पीढ़ियों से सुनाई जाती है और कहीं वह जीवन की तरह जी जाती है।

हिंदी सिनेमा यदि इस अंतर को समझ गया, तो उसे केवल नई कहानियां नहीं मिलेंगी। उसे अपनी खोई हुई धड़कन भी मिल सकती है।

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