Filipino scribe shot dead, PEC demands authentic probe and justice

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Geneva: Press Emblem Campaign (PEC), the global media safety and rights body, expressed shock over the murder of Filipino radio scribe Nestor Micator and demanded justice following an authentic probe into the incident. The news anchor and commentator of D’Empire Radio in the southern Philippines was shot dead by two unknown assailants in Malidegao locality of Cotabato on 21 May. Nestor (56) along with his wife was riding on a motorcycle when the gunmen attacked them. He was rushed to a nearby hospital where he was declared dead. His wife is recovering from injuries.

“PEC, while condemning the murder of Nestor Micator, reminds that the Philippines becomes a nation with impunity to journo-murderers. Nestor is the third journo-victim in his country and 32nd across the world since 1 January 2026. We hope the authorities will go for an all-out action to nab the culprits and punish under the law,” said Blaise Lempen, president of PEC (pressemblem.ch/pec-news). PEC’s south and southeast Asian representative Nava Thakuria informed that Nestor was also serving as a member of the village council in Fort Pikit, which usually takes initiatives to resolve various local conflicts and issues among the villagers.

The Catholic-majority nation earlier reported a suspected murder of another radio scribe (Nichole Ledesma, 30), who worked as the chief editor of online media outlet Paghimutad-Negros and a regional coordinator of Alternative Media Network that focuses on land, labour, displacement over renewable energy mission in the island nation. Nichole, also known as a poet and human rights activist, was among a group of people who were killed during an anti-insurgency operation in Toboso locality on 19 April by the security personnel.

25 मई : जब लोकतंत्र को बारूद से लहूलुहान करने की शुरुआत हुई थी

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प्रणय विक्रम सिंह

दिल्ली । मई, भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का वह रक्तरंजित दिन, जब पहली बार संगठित रूप से बंदूक को संविधान से ऊपर रखने की कोशिश की गई थी।

वह दिन, जब मतपत्र को ‘बुर्जुआ ढकोसला’ कहकर बारूद को परिवर्तन का माध्यम घोषित किया गया। वह दिन, जब भारत की लोकतांत्रिक आत्मा पर हिंसक वर्ग-संघर्ष के नाम पर पहली वैचारिक गोली दागी गई।

जिसे आज भी कुछ वामपंथी संगठन ‘महान नक्सलबाड़ी किसान विद्रोह’ कहकर महिमामंडित करते हैं, वह वस्तुतः लोकतांत्रिक भारत के विरुद्ध सशस्त्र हिंसा की संगठित प्रस्तावना थी। यह केवल एक किसान आंदोलन नहीं था, बल्कि भारतीय राज्य, भारतीय संविधान और भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था को हिंसा के माध्यम से चुनौती देने का उद्घोष था।

विडंबना यह है कि जो लोग आज ‘फासीवाद’ के विरुद्ध सबसे ऊंची आवाज़ में नारे लगाते हैं, उनकी वैचारिक जड़ें स्वयं उस विचार में धंसी हुई हैं, जो लोकतंत्र को छल, चुनाव को भ्रम और संविधान को वर्गीय औजार मानता रहा है।

नक्सलबाड़ी कोई रोमानी कविता नहीं थी। वह रक्त, भय और बंदूक से लिखी गई वैचारिक हिंसा की शुरुआत थी। उस दिन जो चिंगारी जली, उसने आने वाले दशकों में भारत के अनेक हिस्सों को बारूद, बंदूक और रक्त से भर दिया। जंगलों में समानांतर सत्ता खड़ी करने की कोशिश हुई।

जन-अदालतों के नाम पर हत्याएं हुईं। गरीब आदिवासियों को ‘क्रांति’ के नाम पर बंदूक थमा दी गई। विकास को ‘राज्य का षड्यंत्र’ बताकर स्कूल उड़ाए गए, सड़कें तोड़ी गईं, रेलवे लाइनें बिछने नहीं दी गईं और अस्पतालों तक को संदेह की दृष्टि से देखा गया।

यह कैसी क्रांति थी, जिसने सबसे पहले शिक्षा पर हमला किया? यह कैसी मुक्ति थी, जिसमें आदिवासी बच्चों के हाथों में किताबों की जगह कारतूस थमा दिए गए? यह कैसी समानता थी, जिसमें गांवों के गरीब युवक मरते रहे और वैचारिक नेतृत्व महानगरों के परिसरों में ‘क्रांति’ पर सेमिनार करता रहा?

भारत के इतिहास में यह शायद पहली ऐसी विचारधारा थी, जिसने लोकतंत्र के भीतर रहते हुए लोकतंत्र को ही नष्ट करने का स्वप्न देखा। संसद को खारिज किया गया। चुनाव को मज़ाक कहा गया। न्यायपालिका को वर्गीय संस्था बताया गया। और अंततः बंदूक को ही अंतिम सत्य घोषित कर दिया गया।

लेकिन भारत की आत्मा बारूद से नहीं चलती। भारत की आत्मा बहस से चलती है। विविधता से चलती है। मतभेद से चलती है। मतपत्र से चलती है।

यही कारण है कि जिन क्षेत्रों में दशकों तक नक्सली प्रभाव रहा, वहां अंततः जनता ने विकास, सड़क, शिक्षा और लोकतांत्रिक भागीदारी की मांग की। आदिवासी समाज ने भी यह समझ लिया कि बंदूक केवल मृत्यु देती है, भविष्य नहीं।

आज भी नक्सलवाद के समर्थक ‘जल-जंगल-जमीन’ की भाषा बोलते हैं, लेकिन यह नहीं बताते कि जिन क्षेत्रों को उन्होंने दशकों तक अपनी हिंसक प्रयोगशाला बनाए रखा, वहां सबसे अधिक गरीबी, अशिक्षा और भय क्यों पनपा?

क्यों हजारों गरीब आदिवासी युवक ‘क्रांति’ के नाम पर मारे गए? क्यों सुरक्षा बलों के जवानों की लाशों पर वैचारिक उत्सव मनाए गए? क्यों गांवों को लोकतंत्र और विकास से काटकर ‘रेड कॉरिडोर’ में बदल दिया गया?

सच्चाई यह है कि भारत के वंचित समाज को जितना प्रतिनिधित्व लोकतंत्र ने दिया, उतना किसी माओवादी बंदूक ने नहीं दिया। पंचायत से संसद तक, संविधान ने दलित, आदिवासी, पिछड़े और गरीब समाज को आवाज़ दी। आज भारत का आदिवासी राष्ट्रपति भवन तक पहुंचता है, संसद तक पहुंचता है, प्रशासन और न्यायपालिका तक पहुंचता है। यह परिवर्तन हिंसा से नहीं, लोकतंत्र से आया है।

नक्सलबाड़ी की सबसे बड़ी त्रासदी यह थी कि उसने असंतोष को सुधार की दिशा में नहीं, विनाश की दिशा में मोड़ दिया। उसने युवाओं को यह विश्वास दिलाया कि परिवर्तन बहस, संगठन और जनमत से नहीं, हत्या और हिंसा से आएगा। यही वह वैचारिक विष था, जिसने हजारों परिवारों को उजाड़ा। और सबसे बड़ा विरोधाभास देखिए, जो विचारधारा स्वयं स्टालिन, माओ और पोल पॉट जैसे रक्तरंजित इतिहासों से प्रेरणा लेती रही, वही आज मानवाधिकार की सबसे बड़ी व्याख्याता बनने का अभिनय करती है।

भारत का किसान आज बंदूक नहीं, बाजार चाहता है। भारत का आदिवासी आज बारूद नहीं, बेहतर स्कूल चाहता है। भारत का युवा आज क्रांति नहीं, अवसर चाहता है।

25 मई किसी ‘हिंसक रोमांच’ की नहीं, बल्कि उस ऐतिहासिक भूल को याद करने की है, जिसने लोकतंत्र के विरुद्ध हिंसक अधैर्य को वैचारिक सम्मान देने की कोशिश की थी।

यह दिन हमें याद दिलाता है कि जब विचारधारा मनुष्य से बड़ी हो जाती है, तब शवों पर घोषणापत्र लिखे जाते हैं। और जब लोकतंत्र को ‘कमजोरी’ कहा जाने लगता है, तब समाज अंततः रक्त और भय की सुरंग में धकेल दिया जाता है।

बंदूकें कुछ समय के लिए भय पैदा कर सकती हैं, लेकिन वे सभ्यताएं नहीं बनातीं। बारूद रास्ते जला सकता है, भविष्य नहीं गढ़ सकता। जिन विचारों की शुरुआत हत्या से होती है, उनका अंत भी प्रायः राख, वीरानी और पछतावे में ही होता है।

भारत ने अंततः उस रास्ते को अस्वीकार किया, जहां मतभेद का उत्तर गोली हो और परिवर्तन का माध्यम रक्त। भारत ने मतपत्र का मार्ग चुना। संविधान का मार्ग चुना। और यही कारण है कि नक्सलबाड़ी आज इतिहास की एक हिंसक प्रतिध्वनि भर रह गया है, जबकि भारतीय लोकतंत्र आज भी जीवित, गतिशील और निरंतर विकसित हो रहा है।

आज जब कुछ लोग 25 मई को ‘क्रांति’ का प्रतीक बताने का प्रयास करते हैं, तब आवश्यक है कि राष्ट्र उस मौन पीड़ा को भी याद करे, जो दशकों तक नक्सली हिंसा से जले गांवों, उजड़े परिवारों, अनाथ बच्चों और शहीद जवानों के घरों में पसरी रही।

भारत का भविष्य किसी लाल आतंक में नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक चेतना, विकास, सामाजिक न्याय और राष्ट्रीय एकता में निहित है। क्योंकि अंततः राष्ट्र बंदूक से नहीं चलते… विश्वास से चलते हैं। सभ्यताएं बारूद से नहीं बचतीं… संवाद, संवेदना और लोकतंत्र से बचती हैं।

शुभेंदु सरकार के त्वरित निर्णयों से उभरता नया बंगाल

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कोलकाता । बंगाल में 69 वर्षों के अथक संघर्ष के बाद बनी शुभेंदु अधिकारी के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार अपने चुनावी संकल्प पत्र के अनुरूप काम पर लग गई है। सत्ता परिवर्तन होते ही सभी धार्मिक स्थलों पर लाउडस्पीकर बंद करवाए गए। अवैध बूचड़खानों पर बुलडोजर एक्शन के आदेश जारी हुए। सभी विद्यालयों में अब सम्पूर्ण वंदेमातरम का गायन अनिवार्य कर दिया गया है । सड़कों पर नमाज व अन्य धार्मिक गतिविघियों पर पाबंदी लगा दी गई है। सीमा पर फेंसिंग के लिए सीमा सुरक्षा बल को जगह दे दी गई है और सम्पूर्ण भूमिहस्तांतरण निर्णय के 45 दिन में पूरा हो जाएगा। चिकन नेक क्षेत्र केंद्र को सौंप दिया गया है। धार्मिक आधार पर चलने वाली योजनाएं जैसे इमामों को वेतन बंद कर दिया गया है। आर.जी.कर केस की फाइल दोबारा खुलने के आदेश हो गए हैं। आयुष्मान भारत जैसी केंद्रीय जन कल्याण योजनाएं अब बंगाल पहुँच रही हैं।

शुभेंदु सरकार की गति और संकल्प सिद्धि के प्रयासों से जुड़े निर्णयों का प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ने लगा है। हालत यह हो गई है पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी का डायमंड हार्बर मॉडल का पुष्पा ”जहागीर खान” बहाना बनाकर फलटा विधानसभा उपचुनाव में ठीक उसी समय पलटा मारकर कर भाग गया जब मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी उपचुनाव में भाजपा उम्मीदवार को विजयी बनने के लिए रोड शो निकाल रहे थे। यह वही क्षेत्र है जहां विधानसभा चुनावों के दौरान ईवीएम मशीन पर भाजपा के चुनाव चिन्ह के आगे काला टेप लगा दिया गया था। यूपी के एक तेजतर्रार पुलिस अफसर अजय पाल शर्मा की आब्जर्वर के रूप में नियुक्ति हुई थी जिसके बाद जहांगीर खान ने पोस्टर जारी करके अपने आप को पुष्पा बताने की जुर्रत की थी। आज वही तथाकथित पुष्पा चुनावी मैदान बीच में छोड़कर भाग खड़ा हुआ । यह भय बनाम भरोसे में भरोसे की एक और बड़ी जीत है। यह सब कुछ हिंदुओं की एकजुटता और उनके जागरण से ही संभव हो सका है अगर हिंदू समाज आगे भी इसी प्रकार एकजुट रहता है तो सनातन का अपमान करने व उन्हें भयभीत करने वाले लोग इसी प्रकार से स्वतः प्रेरणा से भागते रहेंगे।

बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने प्रचार के दौरान उत्तर प्रदेश के भगवावस्त्र धारी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के चरण स्पर्श किए थे और उनके शपथ ग्रहण में योगी जी ने अपना भगवा पटका उनके गले में डाला था तभी यह बात तय हो गई थी कि बंगाल भी उत्तर प्रदेश की तरह सांस्कृतिक पुनर्जागरण के मार्ग पर चलने वाला है। बंगाल में भी दंगाइयों व उत्पातियों का इलाज यूपी की ही तरह होगा । कोलकाता के जिस थाने पर दगांइयों ने हमला करने का प्रयास किया था वहां मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी खुद पहुंचे और पुलिस बलों का मनोबल बढ़ाते हुए दंगाइयों व उपद्रवियों के प्रति जीरो टालरेंस की नीति अपनाने को कहा। मुख्यमंत्री अधिकारी ने कहा कि पुलिस पहले ममता दीदी के गुंडों से डरती थी किंतु अब समय बदल चुका है।

शुभेंदु सरकार के बड़े निर्णयों में वर्ष 2021 के चुनावों के बाद राज्य में हुई राजनतिक हत्याओं व हिंसक घटनाओं की सभी फाइलें खोलना भी है जिसके कारण ममता दीदी इतनी अधिक भयभीत हो गयीं कि वह काला कोट पहनकर हाईकार्ट पहुंच गयीं और 2021 की हिंसा से ध्यान भटकाने के लिए 2026 के चुनावों के बाद घटी कुछ छुटपुट घटनाओं को सनसनीखेज बताने का असफल प्रयास किया। जब वह कोर्ट परिसर से बाहर निकलने लगीं तब वकीलों के एक बड़े समूह ने उन्हें घेर लिया ओैर चोर -चोर के नारे लगाए।

बंगाल में अब सीबीआई तथा ईडी जैसे केंद्रीय जांच एजेंसियों का प्रवेश संभव हो गया है, जिससे वहां 69 वर्षों में हुए घोटालों की जांच में गति आएगी। ईडी ने टीएमसी के बड़े नेताओं को हिरासत में ले भी लिया है। शुभेंदु अधिकारी के 145 एकड़ जमीन बीएसफ को देने के ऐतिहासिक निर्णय से बांग्लादेशी घुसपैठ की रोकथाम में महत्वपूर्ण सफलता मिलने की आशा है क्योंकि बांग्लादेश से लगी हुई बंगाल की लंबी खुली सीमा से बांग्लादेशी व रोहिंग्या घुसपैठिए आसानी प्रवेश कर लेते थे । अब सीमा पर तीव्रता के साथ फेंसिंग का कार्य होगा ।

बंगाल में मुस्लिम तुष्टिकरण के लिए धर्म के आधार पर चलने वाली सभी योजनाएं बंद कर दी गई हैं। नई सरकार ने वोटबैंक के पुराने ढर्रे को ध्वस्त करने के एजेंडे पर आगे बढ़ चुकी है। बंगाल कैबिनेट ने धर्म के आधार पर चलाई जा रही सभी वित्तीय सहायता योजनाओ को पूरी तरह से बंद करने का निर्णय लिया है। यह मात्र एक प्रशासनिक निर्णय नहीं अपितु बंगाल की राजनीतिक दिशा को बदलने वाला वैचारिक परिवर्तन है। चुनावी बिसात पर इमामों, मुअज्जिनों और पुरोहितों के लिए शुरू की गई मासिक भत्ता पूरी तरह से बंद कर दिया गया है।

बंगाल के खेल मंत्री नीशिथ प्रामाणिक ने कोलकाता के युवा भारती क्रीडांगन परिसर में लगी व लोगो वाली फुटबालर की आधी प्रतिमा को तोड़े जाने का आदेश दिया है, बंगाल सरकार की विभिन्न वेबसाइाटो से भी इसे हटाया जा रहा है। दिसंबर 22 में अर्जेंटीना के फुटबॉलर मेसी के कार्यक्रम में मची भगदड़ और कुप्रबंधन की जांच की जाएगी। उस घटना की फाइलें खोलने के आदेश जारी हो चुके हैं। मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी व अन्य सभी सहयोगी मंत्री यह बात लगातार कह रहे हैं कि जिन लोगों ने बंगाल को लूटा और जनता के मन मे भय पैदा किया उन सभी पर कार्यवाही जरूर की जाएगी।

बंगाल में अब आयुष्मान भारत योजना सहित केंद्र सरकार की तमाम कल्याणकारी योजनाओं के लागू होने का मार्ग प्रशस्त हो रहा है। भाजपा ने बंगाल की महिलाओं से किए गए वादों को भी लागू करना भी आरंभ कर दिया है। आगामी एक जून 2026 से महिलाओं को 3000 रुपये की मासिक सहायता वाली अन्नपूर्णा योजना को भी मंजूरी दे दी गई है। बंगाल की महिलाओ को बस में फ्री यात्रा की सुविधा भी मिलने जा रही है। सरकारी कर्मचारियों के साथ किया गया 7वें वेतन आयोग का वादा भी पूरा होने जा रहा है। बंगाल मे पड़ोसी राज्यों से ट्रकों की आवाजाही के दौरान 100 रुपए से लेकर 1000 रुपए तक की जो कटमनी टीएमसी के गुंडे वसूल रहे थे उनके अनधिकृत टोल नाके बंद किए जाने के आदेश आ चुके हैं। बंगाल का आलू अब पूरे भारत में जाएगा।

बंगभूमि पर वंदेमातरम की गूंज व जयश्रीराम का नारा सुनाई दे रहा है। बंगाल परिवर्तन की डगर पर चल पड़ा है । भय पर भरोसे की विजय हो रही है।

बंगाल से बांद्रा, बुलडोजर और बवाल

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विजयमनोहरतिवारी

बंगाल से बांद्रा तक बीते दशकों में सरकारी जमीनों पर हुए कब्जों के खिलाफ एक मुहिम छिड़ी हुई है। इस संदर्भ में क्या आपने ऑल इंडिया यूनाइटेड मुस्लिम मोर्चा के प्रवक्ता हाफिज गुलाम सरवर एक ताजा बयान सुना है?
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भोपाल । मुंबई यात्राओं के दौरान मैं बांद्रा के होटल रंगशारदा और मरीन ड्राइव पर सी-ग्रीन में रुकते हुए अक्सर खाली शामों को जुहू-बांद्रा के तटों और खार-अंधेरी की तंग गलियों में घूमता रहा हूँ। इन इलाकों में मुंबई की चमकदमक से परे एक अलग ही शहर पसरा हुआ देखा। रेल पटरियों से सटे टीन-टप्परों के चार मंजिला ऊंचे शेड, जो दरअसल कारखाने या रहने के ठिकाने बनते गए। ज्यादातर यूपी, बिहार और बंगाल के इलाकों से 40 साल पहले कोई एक आया था। अब उसी के चार सौ रिश्तेदार यहाँ दस बस्तियों में जमा हैं। धरावी एशिया की सबसे बड़ी स्लम तो यहाँ है ही, मुंबई के सारे उपनगरों में धरावी का संक्रमण तेजी से फैला हुआ है। बेरोकटोक सुनियोजित कब्जों की खुली कहानी, घुसपैठियों के लिए जन्नत बनती गई!

कोलकाता तो पूरा कबाड़खाना ही बन चुका है, जहाँ आप एक मरते हुए शहर की साँसें अनुभव कर सकते हैं। फुटपाथ और रेलवे स्टेशनों पर ऐसे कब्जे देश में शायद ही कहीं और देखने को मिलें, जैसी ईजाद बंगाल में हुई और यह किसी एक सरकार का योगदान नहीं है। सीपीएम के सत्ता में आते ही सबै भूमि जैसे हजरत लाल सलाम की हो गई। कब्जों से वसूली का मालदार नेटवर्क बाद में टीएमसी के खातों में जुड़ गया और कोलकाता अपने पुराने वैभव के साथ मरता रहा। आप गाँधी मार्ग के दोनों ओर की गलियों में घूमिए, ढाका और इस्लामाबाद के दीदार दूर-पास से होते ही रहेंगे। जैसे कानून नाम की कोई चीज ही नहीं बची थी।

एक बात साफ है कि भारत के ग्रामीण और जनजातीय समाज के लोगों का पलायन केवल मजदूरी के लिए है, जो आपको बंगाल से बांद्रा तक के संगठित और ताकतवर कब्जाधारियों में शायद ही कहीं दिखाई दें। वे असंगठित क्षेत्र की लेबर हैं, जो इन्फ्रास्ट्रक्चर के प्रोजेक्ट्स, खदानों और कारखानों में खपती है। कुछ महीनों के बाद लौट-लौटकर अपने गाँवों में आती रहती है। बुलडोजरों के निशाने पर आ रही यह एक अलग ही दुनिया है, हाफिज सरवर इसी की ओर इशारा कर रहे हैं।

बंगाल और बांद्रा के कब्जों में डेमोग्राफी बदलने का संगठित पैटर्न साफ है, जो हर जगह दिन की रोशनी जैसा स्पष्ट है। एक ही शहर में पुरानी तंग बस्तियों के बाशिंदे रोजगार और कमाई के लिए नए विकसित होते इलाकों पर निर्भर हैं। शहरों का कोई फुटपाथ, कोई खाली जमीन, कोई नदी-नाले, पुल-पुलिया या कोई सरकारी जमीन इनसे सुरक्षित नहीं है। बहुत मामूली स्तर पर किसी धर्मस्थल के लिए कब्जाई गई जमीन पर केवल तीस साल में मेले का मजमा दिखाई देगा मगर यह गुनगुने पानी के लगातार बढ़ते तापमान जैसा परिवर्तन होगा, जिसमें बैठा मेंढक अपने अंत से बेखबर है। गैरकानूनी ढँग से फैलने-पसरने की लत कैसे और किन्होंने लगाई, हाफिज सरवर से सुनिए।

मध्यप्रदेश में लोकल फंड ऑडिट के डायरेक्टर डॉ. रमेश केवलिया नगर निगमों को “नरक निगम’ कहा करते थे। वे ऐसा केवल स्थानीय निकायों में व्याप्त भयावह भ्रष्टाचार के कारण कहते थे। नगरीय निकायों की अनदेखी या मिलीभगत लगातार बढ़ते कब्जों का मूल कारण है, जो सियासी संरक्षण के बिना संभव नहीं है। अदालतों के आदेशों की अवहेलना वर्ना कैसे मुमकिन है? बंगाल और बांद्रा के दृश्य यह बता रहे हैं कि यह नरक फैलता जब तक भी रहे मगर एक दिन मजबूर होकर सरकारों को इनके खिलाफ खुलकर आना ही होगा। असम, उत्तरप्रदेश और उत्तराखंड में हो सकता है कि बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया जा रहा हो और असल में प्रशासन केवल अपनी सुविधा से ही कब्जों को हटाने में लगा हो, मगर शहरों को पूरी तरह नर्क में बदलने के पहले यह एक व्यापक अभियान में बदलना चाहिए।

कब्जों के खिलाफ बुलडोजर एक प्रतीक बन गया है, जिसे उत्तरप्रदेश में योगी आदित्यनाथ से जोड़ दिया गया है। मगर 1991 में मुख्यमंत्री सुंदरलाल पटवा के समय बाबूलाल गौर ने भोपाल रेलवे स्टेशन के पास कुछ ऐसी ही शुरुआत सबसे पहले की थी। भोपाल को कानून के शासन का अहसास कराया गया था। इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक सीनियर वकील ने मुझे बताया था कि आपातकाल के पहले संजय गाँधी ने त्रिवेणी के रास्ते में ऐसी ही एक नाजायज घनी बस्ती साफ कराई थी और किसी भी प्रकार के उपद्रव की आशंका को देख स्थानीय मजहबी नेताओं को आगे करने के लिए खुद दिल्ली से अचानक आए थे।

कब्जों के विरुद्ध जारी मुहिम की तस्वीरें भले ही बंगाल और बांद्रा से आ रही हों मगर यह नजारा पूरे देश का है। शहरों में कब्जों की बाढ़ आई हुई है। हर खाली जमीन पर झुग्गियाँ जंगल सी उग रही हैं। हर फुटपाथ पर गुमटी-ठेले प्रकट हो रहे हैं। अगर गाँवों से लोग शहरों में पलायन कर रहे हैं तो इनके समाजशास्त्रीय अध्ययन होने चाहिए कि वो कौन लोग हैं, कहां से आते हैं, उनकी सामुदायिक पहचान क्या है, वे एकल पलायन में हैं या डेमोग्राफी के लक्ष्य से कोई संगठित पैटर्न काम कर रहे हैं। घरों की रोज सफाई घरों को रहने लायक बनाए रखती है। हमारे छोटे-बड़े शहरों की नियमित निगरानी और साफ-सफाई शहरों को रहने लायक रखेगी। वोट बैंक की राजनीति ने दशकों तक कूड़ा फैलने दिया और अब बांद्रा से उखड़ रहे कब्जाधारी कांग्रेस सांसद सुनील दत्त की रहमदिली को याद कर रहे हैं, जब उन्हें बेरोकटोक बसाया गया होगा। बंगाल में भी यही हाल है।

भारत की तेज गति से बढ़ती आबादी और असंतुलित विकास की नीतियों में गाँवों की अनेदखी अंतत: शहरों को ही नर्क बना रही है। बीस लाख आबादी की क्षमता के शहर दो गुनी से ज्यादा आबादी झेल रहे हैं। हर दिन ऑफिस टाइम में ट्रैफिक इसके सबूत दे रहा है। हर बाजार, सड़क और फुटपाथ पर कब्जे उबल रहे हैं। वे हमारे दैनिक जन-जीवन पर बुरा असर कर रहे हैं। हमारे शहर दमघोंटू चिल्लपौं में बदल गए हैं, जहाँ शहर कम और भीड़ अधिक है। यह असंतुलन पुलिस के लिए भी भारी पड़ रहा है क्योंकि हर तरह के अपराध बढ़ ही रहे हैं और कब्जाई गई जमीन पर किसी योजना से बसाए गए घुसपैठिए एक स्थाई खतरा बन रहे हैं। समय रहते इनसे न निपटा गया तो दस साल बाद हम जानेंगे कि केवल वोट बैंक को संगठित ताकत बनाकर किस दूरगामी योजना के तहत तबाही की तैयारी थी।

बहरहाल हालातों को देखते हुए हाफिज गुलाम सरवर इस नतीजे पर पहुँचे हैं कि मुसलमानों को गैरकानूनी काम करने की लत लगा दी गई थी। सेक्युलर पार्टियों ने मुसलमानों का गलत इस्तेमाल किया इसलिए सबसे बड़े भुक्तभोगी वे ही हैं। दुकान मछली, मुर्गे या गोश्त की हो लाइसेंस तो चाहिए। अब भाजपा का चाबुक चल रहा है तो ऐसे कारोबारों में मुसलमानों की अधिकता होने से उन्हें ही परेशानी हो रही है। गैरकानूनी निर्माण, गैरकानूनी दुकान, गैरकानूनी तिजारत जैसे मामले बढ़ा दिए गए थे। इसी का खामियाजा आज भुगतना पड़ रहा है।

ये उन्हीं के शब्द हैं। और भी बहुत कुछ बोले हैं मगर मैं गुलाम सरवर के आधे घंटे के इस वीडियो से पूरी तरह सहमत नहीं हूँ। वह काबिले-गौर जरूर है!

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