ताजमहल की सांप्रदायिक ब्रांडिंग अनुचित, सफेद ताज महल न हरा है न भगवा

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17वीं सदी का एक उत्कृष्ट नमूना, ताजमहल, प्यार की एक अमर निशानी के तौर पर खड़ा है, जिसे बादशाह शाहजहाँ ने अपनी प्रेमिका मुमताज महल की याद में बनवाया था। इसकी अद्वितीय खूबसूरती और ऐतिहासिक अहमियत ने इसे यूनेस्को की विश्व धरोहर बना दिया है, जो दुनिया भर से लाखों पर्यटकों को अपनी तरफ खींचता है।

लेकिन, इसके धर्मनिरपेक्ष किरदार को लेकर हाल ही में हुए विवादों ने बहस को जन्म दिया है, जिससे सवाल उठ रहे हैं कि क्या मोहब्बत के इस स्मारक को सांप्रदायिक राजनीति के गड्ढे में घसीटा जा रहा है?

ताजमहल को लंबे अरसे से एक धर्मनिरपेक्ष स्मारक के तौर पर देखा जाता रहा है, जो मज़हबी सरहदों को पार करता है और प्यार, शांति और एकता की सार्वभौमिक कद्रों को दर्शाता है। फिर भी, हालिया सालों में, यह मज़हबी गुटों के लिए एक जंग का मैदान बन गया है जो इसकी विरासत पर अपना अधिकार जताना चाहते हैं।

भगवान शिव (भोले नाथ) के भेस में आए एक पर्यटक को दाख़िल होने से रोकना और मज़हबी निशानियाँ ले जाने वाले एक हिंदू संत पर पाबंदी जैसी घटनाओं ने तनाव को हवा दी है। इन घटनाओं ने हिंदुत्व ग्रहों में क्रोध पैदा किया है, जो तर्क देते हैं कि अल्पसंख्यक मिल्कियत के दावों से स्मारक की धर्मनिरपेक्ष हैसियत को कम किया जा रहा है।

इस विवाद की जड़ें इतिहासकार पीएन ओक की किताब, ताज महल: द ट्रू स्टोरी में देखी जा सकती हैं, जिसमें दावा किया गया है कि यह स्मारक असल में राजपूत राजाओं द्वारा बनाया गया एक हिंदू मंदिर था। इस विचार को वामपंथी इतिहासकारों ने खारिज कर दिया है। ऐसे दावे, हालाँकि बेकार हैं, ताजमहल के सांप्रदायिकरण में योगदान दिया है, जिससे इसके धर्मनिरपेक्ष किरदार को ख़तरा है।

ताजमहल के संरक्षक, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) ने लगातार यह कहा है कि स्मारक एक धर्मनिरपेक्ष मिल्कियत है, किसी भी मज़हबी व्याख्या के बजाय इसके ऐतिहासिक और वास्तुशिल्प अहमियत पर ज़ोर दिया है। ब्रज मंडल हेरिटेज कंजर्वेशन सोसायटी ने कई बार कहा है कि एएसआई का काम स्मारक को इंसानी रचनात्मकता और सांस्कृतिक विरासत के सबूत के तौर पर महफूज़ करना है, न कि मज़हबी रस्मों या सांप्रदायिक गतिविधियों के स्थल के तौर पर।

हालाँकि, ताजमहल में नमाज़ से लेकर पूजा और गंगा जल से आरती तक धार्मिक रस्मों की बढ़ती मौजूदगी ने चिंता बढ़ा दी हैं। ये गतिविधियाँ, जो कुछ समूहों द्वारा आयोजित की जाती हैं, स्मारक को एकता के बजाय विभाजन के निशान में बदलने की कोशिश दिखती हैं। सालाना शाहजहाँ उर्स, जिसके दौरान एक रस्मी चादर चढ़ाई जाती है, का भी पैमाना और लंबाई लगातार बढ़ रही है। चार गज से अब चादर एक हज़ार मीटर से अधिक लंबी हो चुकी है। तीन दिनों के लिए, एएसआई मुफ्त दाख़िले की इजाज़त भी देता है। ज़ाहिर है इस तरह की गतिविधियाँ, हिंदुस्तान की सांस्कृतिक विविधता को तो दर्शाते हैं, लेकिन आयोजकों को स्मारक के धर्मनिरपेक्ष सार को कमजोर करने की इजाज़त नहीं मिलनी चाहिए।

समाज सेविका डॉ विद्या चौधरी कहती हैं, “ताजमहल का सांप्रदायिकरण वैश्विक पर्यटक आकर्षण के तौर पर इसकी हैसियत के लिए एक उभरता ख़तरा है।” आगरा का पर्यटन उद्योग, जो स्मारक पर बहुत ज़्यादा निर्भर करता है, ने हिंदुत्व और मुस्लिम ग्रुप्स के बीच चल रहे विवाद पर चिंता ज़ाहिर की है। उद्योग जगत के नेताओं को डर है कि इस तनाव से पर्यटक निराश हो सकते हैं, जिससे प्यार और खूबसूरती के निशान के तौर पर स्मारक की प्रतिष्ठा धूमिल हो सकती है।

दरअसल, ताजमहल की अहमियत इसके मज़हबी संबंधों में नहीं बल्कि प्यार और इंसानी कामयाबी के स्मारक के तौर पर इसके सार्वभौमिक आकर्षण में निहित है।

इस जगह पर सांप्रदायिक गतिविधियों की इजाज़त देने से समुदायों के अलग-थलग पड़ने और इसके समावेशी किरदार को कमज़ोर पड़ने का डर है। ताजमहल जैसे वैश्विक धरोहर स्थल पूरी इंसानियत के हैं, जो सांप्रदायिक सरहदों से परे हैं और साझा विरासत की रूह को बढ़ावा देते हैं। ताजमहल की धर्मनिरपेक्ष साख को महफूज़ करना न सिर्फ़ ऐतिहासिक अहमियत का मामला है, बल्कि नैतिक ज़रूरत भी है। यह याद दिलाता है कि प्यार, खूबसूरती और कला सार्वभौमिक कद्रें हैं जो हमें एकजुट करती हैं, चाहे हमारी मज़हबी या सांस्कृतिक पृष्ठभूमि कुछ भी हो।
स्मारक को सांप्रदायिक ब्रांडिंग से बचाकर, हम इसकी विरासत का सम्मान कर सकते हैं और यक़ीनी बनाते हैं कि यह आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बना रहे। ताजमहल सिर्फ़ एक स्मारक नहीं है; यह प्यार की स्थायी ताक़त और इंसानियत की साझा विरासत का सबूत है।

जाति और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण: भारतीय राजनीति का गेम चेंजर या रोड ब्लॉक?

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भारतीय राजनीति का नक्शा बदलने वाले दो सबसे बड़े ‘X-Factors’ हैं – जातिवाद और सांप्रदायिकता। ये दोनों ही चुनावी रणनीतियों से लेकर शासन तक, हर पहलू को प्रभावित करते हैं।

2027 के उत्तर प्रदेश (यूपी) विधानसभा चुनावों की तैयारियों में यह साफ दिख रहा है। भाजपा ने 70 में से 44 जिला अध्यक्षों की नियुक्ति में ब्राह्मण और ओबीसी (पिछड़ा वर्ग) को प्राथमिकता दी है, जो जातिगत गणित के महत्व को रेखांकित करता है। वहीं, महिलाओं का प्रतिनिधित्व महज छह नियुक्तियों तक सीमित है, जो राजनीति में जाति और लिंग की जटिल अंतःक्रिया को प्रदर्शित करता है।

पटना के सोशलिस्ट विचारक टीपी श्रीवास्तव के मुताबिक, “बिहार में जाति-आधारित नेतृत्व का पुनरुत्थान और क्षेत्रीय दलों के रणनीतिक गठबंधन, जातिगत निष्ठाओं पर राजनीतिक लामबंदी की निर्भरता को दर्शाते हैं।” बैंगलोर के समाजवादी नेता बापू शेट्टी कहते हैं, “कर्नाटक में भी लिंगायत और वोक्कालिगा जैसे प्रभावशाली समुदायों के साथ-साथ रेड्डी, गौड़ा और राव जैसे शक्तिशाली परिवारों का दबदबा है। जातिगत समूहों के दाव पेंच, दबाव और गतिशीलताएं न केवल उम्मीदवार चयन, बल्कि नीति निर्माण और शासन की प्राथमिकताओं और अपॉइंटमेंट्स को भी प्रभावित करती हैं।”

दिल्ली, जो अपनी महानगरीय छवि के लिए जानी जाती है, भी जातिगत राजनीति से अछूती नहीं है। मुख्यमंत्री के रणनीतिक चयन में जातिगत वोट बैंक को ध्यान में रखा गया और इस बार वैश्य समुदाय को मौका मिला है।

नेहरू-इंदिरा गांधी युग के ब्राह्मणवादी प्रभुत्व से लेकर वीपी सिंह काल में मंडल आयोग की सिफारिशों के बाद ओबीसी नेताओं के उदय तक, भारतीय राजनीति का इतिहास जातिगत गतिशीलता की कहानी कहता है। समाजवादी पार्टी के स्थापक मुलायम सिंह यादव हों या बिहार के लालू प्रसाद यादव, सबने खुलकर जातिवादी राजनीति की।

20वीं सदी के उत्तरार्ध में कांशीराम और बसपा के उदय ने एक नया मोड़ लिया, और मायावती के नेतृत्व में दलित राजनीति का उभय देखा। बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद हिंदू राष्ट्रवाद के उभार ने जाति-आधारित राजनीति को कुछ समय के लिए sideline किया लेकिन जातियों के मकड़जाल से फिर भी मुक्ति नहीं मिली।

उधर तमिल नाडु में डीएमके के नेतृत्व में एंटी ब्राह्मण मूवमेंट ने कास्ट सिस्टम को एक नया आयाम दिया। कोयंबटूर के गोपाल कृष्णन बताते हैं कि ब्राह्मणों का “एक बड़ा तबका दिल्ली या अमेरिका, सिंगापुर व अन्य जगहों को पलायन कर गया, जो आबादी बची उसे द्रविड़ लामबंदी के नाम पर उत्तर और हिंदी विरोधी बना दिया गया।”

पब्लिक कॉमेंटेटर प्रोफेसर पारस नाथ चौधरी कहते हैं “वास्तविकता ये है कि सांप्रदायिकता भी जाति के साथ मिलकर राजनीतिक परिदृश्य को और जटिल बना देती है। “आइडेंटिटी पॉलिटिक्स” जहां धार्मिक और जातिगत पहचानों को रणनीतिक रूप से इस्तेमाल किया जाता है, ने मतदाताओं के ध्रुवीकरण को बढ़ावा दिया है। यह धार्मिक बयानबाजी और सांप्रदायिक गठबंधनों में साफ देखा जा सकता है। ‘पसमांदा’ मुस्लिम आंदोलन इसका एक बड़ा उदाहरण है, जो मुस्लिम समुदाय के भीतर जातिगत विभाजन को उजागर करता है। अन्य धार्मिक समुदाय भी जातिगत पूर्वाग्रहों और बंटवारों से अछूते नहीं हैं।”
शहरीकरण और बदलती कार्य संस्कृति ने जातिगत पहचानों को कुछ हद तक कमजोर किया है, लेकिन हिंदू समाज की सामाजिक संरचनाएं अभी भी जातिगत पदानुक्रम को बनाए रखती हैं। सोशल एक्टिविस्ट मुक्त गुप्ता के मुताबिक विवाह के मामलों में यह और स्पष्ट है, जहां सजातीय विवाह एक मजबूत सामाजिक मानदंड बना हुआ है। “अंतरजातीय विवाह अक्सर एक ही पेशेवर स्तर वाले लोगों तक ही सीमित हैं। तथाकथित प्रेम विवाह, “मैरिज ऑफ कन्वेनिएन्स” के तौर पर हो रही हैं जिसमें कम से कम संघर्ष या सामाजिक तनाव होता है। ”

चुनावी राजनीति में पार्टियां इन विभाजनों का फायदा उठाती हैं, जिससे वोट बैंक पॉलिटिक्स नीतिगत बहस और राष्ट्रीय एकता से ऊपर हो जाती है। पहचान-आधारित लामबंदी आर्थिक विकास, स्वास्थ्य सेवा और शिक्षा जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों से ध्यान भटकाती है।

स्वतंत्रता के सात दशक बाद भी, जातिवाद और सांप्रदायिकता के वायरस भारतीय राजनीति में ‘game-changer’ बने हुए हैं। ये उम्मीदवार चयन, पार्टी रणनीतियों और मतदाता व्यवहार को प्रभावित करते हैं। जाति और सांप्रदायिकता भारतीय राजनीति के ‘DNA’ में गहराई तक बसी हुई हैं।

बसपा का भविष्य अनिश्चितता के भंवर में बहनजी का अगला कदम क्या होना चाहिए?

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क्या बहुजन समाज पार्टी का विलय कांग्रेस में हो जाना चाहिए या फिर बहन मायावती को भाजपा के NDA से जुड़ जाना चाहिए? क्या छोटी छोटी क्षेत्रीय पार्टीज का कोई फ्यूचर है? क्या वोट काटू पार्टीज के चुनावी गठबंधन, तेज ध्रुवीकरण के चलते, कभी भाजपा को सत्ता से बाहर करने की हैसियत रखते हैं? पिछले कई चुनावों के परिणामों के संदर्भ में ये सवाल आज प्रासंगिक हो गए हैं।

उत्तर प्रदेश की राजनीति में मौजूदा हालात संकेत दे रहे हैं कि बहुजन समाज पार्टी अपने बलबूते दोबारा सत्ता हथियाने में कामयाब नहीं हो सकती। पार्टी की निरंतर घटती लोकप्रियता ने एक जटिल तस्वीर पेंट कर दी है।

पारिवारिक कलह और अंतर्विरोध ने बसपा को प्रभावित किया है, जिससे पार्टी संगठन दिशाहीन नजर आ रहा है। पार्टी सुप्रीमो बहन मायावती की ढलती उम्र और स्वास्थ्य के कारण सक्रियता में कमी आ जाने से राजनीति की डगर और कठिन हो गई है।

राजनैतिक विश्लेषक प्रोफेसर पारस नाथ चौधरी के मुताबिक “वर्तमान में, दलित राजनीति में चंद्रशेखर आजाद का उदय एक नया विकल्प पेश कर रहा है। उनकी करिश्माई नेतृत्व शैली और युवा मतदाताओं के बीच बढ़ती लोकप्रियता ने बसपा को एक नई चुनौती दी है। आजाद की रणनीतियाँ और सामाजिक न्याय के प्रति उनकी प्रतिबद्धता ने उन्हें दलित समुदाय की आंखों में एक नायक बना दिया है। ऐसे में मायावती की बसपा का दोबारा सत्ता में लौटना, खासकर चंद्रशेखर आजाद के बढ़ते प्रभाव के बीच, फिलहाल संभावित नहीं दिखता। वर्तमान परिदृश्य में बसपा के लिए चुनौतियाँ बरकरार हैं।”

मायावती, बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की प्रमुख और चार बार उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री रह चुकीं एक प्रभावशाली नेता, पिछले कुछ वर्षों में अपनी राजनीतिक ताकत को फिर से मजबूत करने की असफल कोशिशें कर रही हैं। हालांकि, हाल के चुनावी नतीजों और पार्टी के प्रदर्शन को देखते हुए उनके भविष्य को लेकर कई सवाल उठ रहे हैं। राजनैतिक कॉमेंटेटर मिथलेश झा का मानना है कि बहन मायावती का युग ग्रैंड फिनाले के साथ अस्त हो चुका है।
स्मरण रहे “2007 में बसपा ने उत्तर प्रदेश में पूर्ण बहुमत हासिल किया था, जो मायावती के करियर का शिखर था। लेकिन इसके बाद 2014 के लोकसभा चुनाव में बसपा को एक भी सीट नहीं मिली, और 2017 के विधानसभा चुनाव में केवल 19 सीटें आईं। 2022 के विधानसभा चुनाव में पार्टी 12.83% वोट शेयर के साथ सिर्फ 1 सीट जीत पाई। हाल ही में 2024 के उपचुनावों में 7% वोट शेयर के साथ उनका प्रदर्शन और कमजोर हुआ,” बताते हैं समाज विज्ञानी टीपी श्रीवास्तव।

मायावती ने अपने भतीजे आकाश आनंद को पहले पार्टी में बड़ी जिम्मेदारी दी, फिर हटाया। यह अनिर्णय और परिवारवाद की छवि उनकी विश्वसनीयता को प्रभावित कर रही है। सेकंड लाइन ऑफ लीडरशिप न होने की वजह से आज बसपा चौराहे पर है, और सुप्रीमो अनिर्णय की पशोपेश में हैं। सवाल पूछा जा रहा है कि बहनजी की विरासत को कौन संरक्षित करेगा?

इस बीच कुछ चुनावी विश्लेषक कह रहे है कि चंद्रशेखर आजाद जैसे युवा दलित नेता और उनकी आजाद समाज पार्टी (आसपा) पश्चिमी उत्तर प्रदेश में खासकर जाटव वोटों को आकर्षित कर रही है, जो बसपा सुप्रीमो के लिए उभरती चुनौती है।

इन संकेतों से लगता है कि मायावती का राजनीतिक भविष्य अनिश्चित है। उनकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि वह अपनी पुरानी रणनीति को नए समय के हिसाब से ढाल पाती हैं या नहीं। लेकिन वर्तमान में उनकी पार्टी हाशिए पर दिख रही है। बीस साल पहले, यानी 2000 के दशक की शुरुआत में, मायावती का दलित वोट बैंक, उनकी सबसे बड़ी ताकत था, लेकिन अब पकड़ ढीली हो रही है।

पॉलिटिकल आब्जर्वर डॉ विद्या चौधरी के मुताबिक “मान्यवर श्री कांशीराम द्वारा शुरू किए गए बहुजन आंदोलन को बहन मायावती ने आगे बढ़ाया और दलितों को एकजुट कर सत्ता तक पहुंचाया। लेकिन अब स्थिति बदल गई है। पहले बसपा को उत्तर प्रदेश में दलितों (लगभग 20% आबादी) का लगभग एक समान समर्थन मिलता था। 2007 में उनकी सोशल इंजीनियरिंग (दलित+ब्राह्मण+मुस्लिम) ने 30% से ज्यादा वोट दिलाया। लेकिन अब बीजेपी, सपा, और नए दलित नेताओं ने इस वोट बैंक में सेंध लगाई है। 2024 के उपचुनाव में 7% वोट शेयर यह दिखाता है कि उनका कोर वोट भी छिटक रहा है।”
बीजेपी ने कल्याणकारी योजनाओं (जैसे उज्ज्वला, पीएम आवास) और हिंदुत्व के एजेंडे से गैर-जाटव दलितों (पासी, कोरी, वाल्मीकि आदि) को अपने पाले में खींचा है। 2017 में बीजेपी ने 84 में से 70 आरक्षित सीटें जीती थीं, जो बसपा की कमजोरी को दर्शाता है।

कुछ जानकारों का कहना है कि पश्चिमी यूपी में दलित वोट, जो मायावती का गढ़ था, अब शिफ्ट हो रहा है। साथ ही, दलित समाज में शिक्षा और जागरूकता बढ़ने से इस वर्ग की आकांक्षाएं बदली हैं, और वे अब एक ही पार्टी से बंधे नहीं रहना चाहते।

2019 के लोकसभा चुनाव में सपा-बसपा गठबंधन को 19.3% वोट मिले और बसपा ने 10 सीटें जीतीं, लेकिन अकेले 2022 में उनका वोट शेयर 12.83% तक गिर गया। यह दर्शाता है कि उनका आधार अब उतना मजबूत नहीं है जितना पहले था।

मायावती का राजनीतिक भविष्य इस समय कमजोर दिख रहा है, और उनकी दलित वोट बैंक अब पहले जैसी एकजुट और मजबूत नहीं रही। बीस साल पहले वह दलितों की निर्विवाद नेता थीं, लेकिन अब बदलते राजनीतिक समीकरण, नए नेताओं का उदय, और बीजेपी की रणनीति ने उनकी पकड़ को ढीला कर दिया है।

राजाओं का हिंदू-मुखी आवरण और अधार्मिक खेल: नेपाल में हिंदू राष्ट्र असफल होने का रहस्य

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विनय यादव

नेपाल के इतिहास में राजशाही को हिंदू धर्म का संरक्षक बताया जाता रहा है, लेकिन वास्तविकता इसके बिल्कुल विपरीत है। हिंदू अधिराज्य का नारा देकर सत्ता चलाने वाले राजाओं ने ही नेपाल में हिंदू धर्म को कमजोर करने का षड्यंत्र रचा। धर्मांतरण का खुला खेल राजाओं के संरक्षण में हुआ, हिंदू धर्मगुरुओं को दमन में रखा गया, और हिंदू संस्थाओं को नष्ट करने की योजनाबद्ध नीति लागू की गई।

राजाओं का हिंदू राष्ट्रवाद सिर्फ दिखावा था। सच्चाई यह है कि दरबार के भीतर ही विदेशी धर्मों के प्रति आकर्षण था। विदेशी शक्तियों से मिलकर इस्लामिक और पश्चिमी प्रभाव को बढ़ाने का खेल खेला गया। हिंदू धार्मिक और सांस्कृतिक संस्थाओं को कमजोर करने के हर प्रयास में राजसत्ता शामिल थी।

हिंदू संस्थाओं पर कब्जा, संतों का दमन

नेपाल में हिंदू जागरण का केंद्र मठ-मंदिर थे, लेकिन राजाओं ने उनकी रक्षा करने के बजाय उन्हें अपने नियंत्रण में ले लिया। गुठी संस्थान बनाकर पूरे देश के मठ-मंदिरों को राजकीय संपत्ति घोषित कर दिया गया। हिंदू धर्म को मजबूत बनाने में संत-महात्माओं की भूमिका अहम होती है, लेकिन उन्हें नेपाल से जबरन निकाला गया।
हिंदू राष्ट्र के संरक्षक बनने चाहिए थे राजाओं को, लेकिन वे ही हिंदू धर्म के शत्रु बन बैठे।

नेपाल में हिंदू समाज को संगठित करने के प्रयास हुए, लेकिन उन्हें योजनाबद्ध रूप से रोका गया। जब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) ने नेपाल में गीता कक्षाएं चलानी शुरू कीं, तो राजाओं ने उस पर प्रतिबंध लगा दिया। संघ के प्रचारक स्व. लक्ष्मणराव भिड़े पर गिरफ्तारी वारंट जारी कर उन्हें भारत लौटने पर मजबूर कर दिया गया।
इसके विपरीत, ईसाई मिशनरियों, मदरसों और इस्लामिक संघों को राजकीय संरक्षण दिया गया। दरबार के भीतर ही पशुपतिनाथ मंदिर की आय को निजी विलासिता में खर्च किया गया। हिंदू जागरण के लिए कोटिहोम की स्थापना करने वाले योगी नरहरिनाथ को जेल में डाल दिया गया। बाद में उनका शव बागमती के जंगल में फेंक दिया गया। वे किसी तरह बचकर भारत भागने को विवश हुए और प्रवासी जीवन बिताने लगे। बहुदलीय व्यवस्था आने के बाद ही वे नेपाल लौट सके।

शाही सरकार ने हिंदू स्वयंसेवक संघ (HSS) के कार्यालयों पर छापा मरवाया। संघ के वार्षिक प्रशिक्षण शिविर को नेपाल में अनुमति नहीं दी गई, जिसके कारण प्रशिक्षण कार्यक्रम भारत के सुनौली में आयोजित करना पड़ा।

राजशाही का हिंदू धर्म रक्षक होना एक भ्रम

आज भी कई हिंदू राष्ट्रवादी, राजशाही की बहाली को हिंदू राष्ट्र स्थापना का उपाय मानते हैं। लेकिन सत्य यह है कि राजाओं ने हिंदू धर्म की रक्षा के लिए कभी ठोस कदम नहीं उठाए। हिंदू धर्म पर सुनियोजित हमले का केंद्र ही राजसंस्था थी।

राजनीतिक असफलता और हिंदू समाज की कमजोरी

नेपाल की धर्मनिरपेक्षता के लिए केवल 2063 साल (2006 ईस्वी) का राजनीतिक परिवर्तन जिम्मेदार नहीं है। हिंदू अधिराज्य के दौर में ही नेपाल में धर्मांतरण व्यापक रूप से हुआ।

2047 साल के संविधान में नेपाल को हिंदू अधिराज्य घोषित किया गया था, लेकिन उसी समय चर्च, मस्जिद और विदेशी धर्म प्रचारकों की संख्या में दिन-ब-दिन वृद्धि होती गई।

भारत में धर्मनिरपेक्ष कांग्रेस के शासन में हिंदू समाज कमजोर रहा, लेकिन जब हिंदू चेतना जागी, तब मोदी और योगी जैसे नेता उभरे। नेपाल में भी यही मॉडल अपनाना होगा—हिंदू राजा पर आश्रित होने के बजाय, हिंदू नेतृत्व को सत्तासीन करना होगा।

राजाओं की मौनता: इस्लामिक प्रभाव और विदेशी शक्तियों से साँठगाँठ

शाही शासनकाल में अयोध्या स्थित राम मंदिर पर इस्लामिक आतंकियों ने हमला किया। दुनियाभर के हिंदू संगठनों ने विरोध किया, लेकिन नेपाल के राजाओं ने मौन साध लिया। जब कुछ हिंदू राष्ट्रवादियों ने तत्कालीन गृहमंत्री कमल थापा से नेपाल सरकार द्वारा निंदा वक्तव्य जारी करने की मांग की, तो उन्होंने कहा, “यह मेरे स्तर की बात नहीं है, राजा से बात करें।”

लेकिन जब राजा तक बात पहुँचाई गई, तो उनके सलाहकारों ने कहा—”अगर हम अयोध्या हमले की निंदा करेंगे, तो पाकिस्तान नाराज हो जाएगा।”

अब प्रश्न उठता है—अगर नेपाल हिंदू अधिराज्य था, तो हिंदू हित के मुद्दों पर राजाओं ने मौन क्यों साधा? वे विदेशी शक्तियों से क्यों डरते थे?

वीरगंज में स्थित श्रीराम सिनेमा के सामने की जमीन को इस्लामिक कट्टरपंथी समूह को ‘अतिमखाना’ (मृतक प्रार्थना स्थल) के लिए देने का प्रयास हुआ। हिंदू समाज ने विरोध किया, तो इस्लामिक समूह ने हिंदुओं पर हमला कर दिया, जिसमें मैं (लेखक) स्वयं गंभीर रूप से घायल हुआ।अगले दिन जब हिंदू समाज विरोध में उतरा, तो पुलिस ने उन पर लाठीचार्ज किया, आंसू गैस छोड़ी और गोली चलाई।

अगर राजा सच में हिंदू धर्म के रक्षक थे, तो फिर हिंदू समाज पर गोली क्यों चलाई गई? इस्लामिक समूह को संरक्षण क्यों दिया गया?

समाधान क्या है? हिंदू नेतृत्व आवश्यक, राजतंत्र नहीं

आज भी कुछ हिंदू राष्ट्रवादी, राजशाही को ही हिंदू राष्ट्र स्थापना का उपाय मानते हैं। लेकिन वास्तविकता यह है कि नेपाल का इतिहास यह दिखा चुका है कि राजाओं ने कभी हिंदू धर्म की रक्षा नहीं की।

नेपाल में हिंदू राष्ट्र की पुनःस्थापना के लिए हिंदू समाज को जागरूक करना होगा, हिंदूवादी नेतृत्व को सत्तासीन करना होगा, और लोकतांत्रिक प्रक्रिया के माध्यम से संविधान संशोधन कर हिंदू राष्ट्र घोषित करने के लिए दो-तिहाई बहुमत सुनिश्चित करना होगा।

भारत का संविधान धर्मनिरपेक्ष है, लेकिन मोदी सरकार हिंदू हित में फैसले लेने में सफल रही है। नेपाल में भी यही रणनीति अपनानी होगी।

हिंदू राष्ट्र की पुनःस्थापना के लिए राजा नहीं, हिंदू चेतना और हिंदू नेतृत्व की आवश्यकता है।
अब समय आ गया है कि हिंदू समाज भावनाओं में बहने के बजाय रणनीति अपनाए। हिंदू नेतृत्व को संसद में पहुंचाए, हिंदू संगठनों को सशक्त बनाए और हिंदू राष्ट्र की पुनःस्थापना के लिए लोकतांत्रिक साधनों का अधिकतम उपयोग करे। नेपाल में हिंदू राष्ट्र की पुनःस्थापना के लिए राजा नहीं, हिंदू चेतना और नेतृत्व का उदय ही एकमात्र समाधान है।

(लेखक नेपाल में राष्ट्रीय एकता अभियान के अध्यक्ष हैं)

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