हमपर FIR को लेकर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई। पंजाब सरकार के वकील कन्फ्यूज्ड नज़र आए

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अनुपम के सिंह

दिल्ली । जज: FIR की कॉपी ला कर दीजिए।

सरकारी वकील: हमारी जानकारी में कोई FIR नहीं है।

जज: फिर मैं लिख देता हूँ कि उक्त व्यक्तियों पर राज्य में कोई FIR नहीं है।

वकील: नहीं-नहीं… हो सकता है हो भी! लेकिन इतना बड़ा राज्य है, हमें कैसे पता होगा…

जज: तो पता कीजिए… सप्ताह भर बाद हमें FIR (यदि हुई है) की कॉपी चाहिए।

वकील: जी!
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पत्रकारों को धमकाने के लिए राज्य सरकारें किस स्तर तक जाती हैं, उसका यह एक उदाहरण मात्र है। FIR की बातें सोशल मीडिया पर डाल दो कि हमने सैकड़ों लोगों पर FIR कर दी है। बड़े नेताओं से पोस्ट करवाओ कि अब तो इनकी खैर नहीं।

राजनैतिक रोटी सेंकने के लिए पत्रकार तवा बन जाते हैं। दो दिन का हो-हल्ला होता है, बात दब जाती है। उनका लक्ष्य सध जाता है कि हम फलाँ समूह के लिए बहुत चिंतित हैं। उनको नया विषय मिल जाता है।

एक पत्रकार के समक्ष दो विकल्प होते हैं। डर कर बोलना-लिखना छोड़ दे, यह स्वीकार ले कि सरकार से आप नहीं भाग सकते। या यह कि, चाहे जो हो जाए हम जो कर रहे हैं, वो करते रहेंगे।

मेरे जैसे व्यक्ति के लिए तो स्थिति और विचित्र होती है। हमें न्याय भी वहीं से माँगना होता है, जिस संस्था की आलोचना हम करते रहे हैं। यह भी सत्य है कि पूरी संस्था में हर कोई यशवंत वर्मा ही नहीं होता, कुछ कर्तव्यनिष्ठ लोग भी होते हैं।

आप आशा की वही डोर पकड़ कर इस युद्ध में उतरते हैं।

राजद के नेतृत्व में प्रमुख बाहुबली परिवार चुनावी मैदान में

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पटना। बिहार की राजनीति हमेशा से ही बाहुबलियों की छाया में रही है, लेकिन 2025 के विधानसभा चुनावों में राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) ने इसे एक कला में बदल दिया है। अपराध के काले इतिहास वाले परिवारों को टिकट बांटकर वोटों की फसल लूटने की यह रणनीति न केवल नैतिक पतन की मिसाल है, बल्कि बिहार के भविष्य को भी खतरे में डाल रही है। जहां अन्य पार्टियां जैसे भाजपा, जेडीयू या कांग्रेस में दागदार उम्मीदवारों की संख्या उंगलियों पर गिनी जा सकती है, वहीं आरजेडी का घोषणापत्र ही बाहुबली वंशवाद का प्रतीक बन गया है। तेजस्वी यादव के नेतृत्व वाली यह पार्टी अपराधियों की विरासत को ‘राजनीतिक न्याय’ का नाम देकर बिहार को फिर से गुंडाराज की ओर धकेलना चाहती है। क्या यह लोकतंत्र है या अपराध की राजनीति? आइए, इन प्रमुख बाहुबली परिवारों पर नजर डालें, जो चुनावी मैदान में आरजेडी के सहारे उभर रहे हैं।

अनंत बनाम सूरजभान

सबसे पहले बात मोकामा की, जहां अनंत सिंह परिवार की छाया आज भी भय का प्रतीक है। जेडीयू ने अनंत सिंह को टिकट देकर उन्हें मैदान में उतारा है, लेकिन यह वही सीट है जिसे 2020 के उपचुनाव में आरजेडी के सहयोगी ने जीता था। अनंत सिंह पर हथियार रखने और अपहरण जैसे दर्जनों मुकदमे हैं। मोकामा की राजनीति ‘अनंत बनाम सूरजभान परिवार’ की परंपरागत जंग बन चुकी है, जहां हिंसा और बदले की आग कभी ठंडी नहीं पड़ती।

आरजेडी इस जंग को भुनाने के बजाय, सूरजभान सिंह परिवार को अप्रत्यक्ष समर्थन देकर खुद को निर्दोष साबित करने की कोशिश कर रही है। सूरजभान सिंह खुद चुनावी दौड़ में नहीं हैं, लेकिन उनकी पत्नी वीणा देवी आरजेडी टिकट पर मैदान में हैं। यह टक्कर ‘बाहुबल बनाम बाहुबल’ की होनी है, जो बिहार के ग्रामीण इलाकों को फिर से रक्तरंजित कर सकती है। आरजेडी क्यों ऐसे परिवार को संरक्षण दे रही है? साफ है, वोट बैंक की लालच में अपराध को वैधता प्रदान करना।

आरजेडी का चेतन आनंद पर विश्वास

कोसी और सीमांचल के इलाके में आनंद मोहन परिवार की दहशत आज भी बरकरार है। पूर्व राजद सांसद आनंद मोहन, जिन्हें ‘राजपूत बाहुबली’ कहा जाता है, आजीवन कारावास की सजा काट चुके हैं। उनके अपराधों की फेहरिस्त लंबी है—हत्या, अपहरण से लेकर गुंडागर्दी तक। फिर भी, उनके बेटे चेतन आनंद को आरजेडी ने नवीनगर से टिकट थमा दिया है। आनंद मोहन की सामाजिक पकड़ अभी भी मजबूत है, और आरजेडी इसे जातिगत समीकरण साधने के लिए इस्तेमाल कर रही है। क्या बिहार के युवाओं को ऐसे अपराधी वंशजों से प्रेरणा लेनी चाहिए? यह परिवार की राजनीति नहीं, अपराध की निरंतरता है, जिसे आरजेडी चुपचाप प्रोत्साहित कर रही है।

अनिता देवी राजद की प्रॉक्सी उम्मीदवार

वारिसलीगंज सीट पर आरजेडी का यह खेल और भी साफ दिखता है। तेजस्वी यादव ने बाहुबली अशोक महतो की पत्नी अनीता देवी को फिर से टिकट दिया है। अशोक महतो पर हत्या और अपराध के सैकड़ों केस हैं, और उनकी पत्नी को ‘प्रॉक्सी’ बनाकर चुनाव लड़ाना आरजेडी की पुरानी चाल है। उनका मुकाबला भाजपा की अरुणा देवी से है, जो स्वर्गीय अखिलेश सिंह (दूसरे बाहुबली) की पत्नी हैं। यह ‘दो बाहुबलियों की पत्नियों’ के बीच टक्कर सबसे चर्चित है, लेकिन सवाल यह है कि आरजेडी क्यों अपराध की इस होड़ को बढ़ावा दे रही है? वोटों के लिए नैतिकता की बलि चढ़ाना बिहार की छवि को धूमिल कर रहा है।

आरजेडी से शुक्ला परिवार को उनकी जागीर समझी जाने वाली सीट

वैशाली के लालगंज में मुन्ना शुक्ला परिवार की कहानी भी कम आपराधिक नहीं है। पूर्व बाहुबली विधायक मुन्ना शुक्ला की बेटी शिवानी शुक्ला आरजेडी टिकट पर चुनाव लड़ रही हैं। यह सीट लंबे समय से शुक्ला परिवार की जागीर रही है, जहां अपराध और राजनीति का घालमेल आम है। मुन्ना पर हत्या के प्रयास जैसे गंभीर आरोप हैं, फिर भी आरजेडी उन्हें विरासत सौंप रही है।

शाहबुद्दीन का बेटा भी मैदान में

इसी तरह, सीवान के रघुनाथपुर में दिवंगत राजद बाहुबली मोहम्मद शहाबुद्दीन के बेटे ओसामा शहाब को टिकट मिला है। शहाबुद्दीन की गुंडागर्दी की यादें अभी ताजा हैं—हत्या, जबरन वसूली से लेकर न्यायपालिका पर दबाव तक। ओसामा लंदन से कानून पढ़कर लौटे हैं, लेकिन पिता की विरासत को जीवित रखने का मतलब अपराध को वैधता प्रदान करना है। आरजेडी का यह फैसला सीवान को फिर से अराजकता की ओर ले जा सकता है।

बाहुबली मंत्री के परिवार से

नवादा में राजवल्लभ यादव परिवार की विभा देवी को आरजेडी ने फिर से मैदान में उतारा है। राजवल्लभ को ‘बाहुबली मंत्री’ कहा जाता था, और उनकी पत्नी की पहचान ‘बाहुबली की बीवी’ से ही जुड़ी है। अपराध के केसों की परतें अभी भी खुले हैं। तरारी सीट पर पूर्व जदयू विधायक सुनील पांडेय के बेटे विशाल प्रशांत उम्मीदवार हैं, लेकिन यहां भी आरजेडी का अप्रत्यक्ष समर्थन दिखता है। मगध क्षेत्र के युवा चेहरे के रूप में विशाल को प्रोजेक्ट करना वंशवाद का नया रूप है।

आरजेडी की यह रणनीति बिहार को पीछे धकेल रही है। अपराधियों के परिवारों को टिकट देकर पार्टी न केवल वोट बटोर रही है, बल्कि लोकतंत्र को अपराध का शिकार बना रही है।

अन्य पार्टियां जहां सुधार की दिशा में कदम बढ़ा रही हैं, वहीं आरजेडी पुरानी सोच में अटकी हुई है। बिहार के मतदाताओं को सोचना होगा—क्या हम अपराध की जंजीरों में बंधे रहना चाहते हैं?

विकास, शिक्षा और रोजगार की बजाय बाहुबलियों की विरासत चुनना आत्मघाती होगा। समय है कि बिहार की जनता इस वंशवादी राजनीति को ठुकराए और एक स्वच्छ, अपराधमुक्त भविष्य का निर्माण करे। अन्यथा, बाहुबलियों का साया कभी न मिटेगा।

बिहार की राजनीति में सम्राट चौधरी का महत्व

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पटना। बिहार की राजनीति, जो जातीय समीकरणों और गठबंधनों की जटिल जाल में उलझी रहती है, वहां सम्राट चौधरी एक ऐसे चेहरे के रूप में उभरे हैं जो बदलाव और स्थिरता का प्रतीक बन चुके हैं। 16 नवंबर 1968 को जन्मे सम्राट चौधरी, उर्फ राकेश कुमार, पूर्व सांसद शकुनी चौधरी के पुत्र हैं। राजनीतिक विरासत उन्हें विरासत में मिली, लेकिन उन्होंने अपनी मेहनत से इसे मजबूत किया। 1990 में सक्रिय राजनीति में प्रवेश करने वाले सम्राट ने राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) से शुरुआत की। 1999 में राबड़ी देवी सरकार में मात्र 31 वर्ष की आयु में कृषि मंत्री बनकर उन्होंने सबसे कम उम्र के मंत्री का रिकॉर्ड कायम किया। परबत्ता विधानसभा क्षेत्र से 2000 और 2005 में आरजेडी के टिकट पर विधायक चुने गए।

हालांकि, 2018 में आरजेडी छोड़कर भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) में शामिल होना उनके राजनीतिक सफर का टर्निंग पॉइंट साबित हुआ। यह कदम न केवल व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा था, बल्कि बिहार की जातीय राजनीति में एक बड़ा संदेश भी। कुशवाहा (कोइरी) समुदाय से ताल्लुक रखने वाले सम्राट (जिनकी जाति बिहार में 7-9 प्रतिशत वोट बैंक रखती है) ने बीजेपी को पिछड़ी जातियों के बीच मजबूत आधार प्रदान किया। आरजेडी-महागठबंधन के दौर में कुशवाहा वोटों का एक हिस्सा विपक्ष की ओर झुकाव रखता था, लेकिन सम्राट के नेतृत्व ने इसे एनडीए की ओर मोड़ दिया। 2023 में बिहार बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष बनने के बाद उन्होंने पार्टी को संगठनात्मक मजबूती दी। विधान परिषद में नेता प्रतिपक्ष के रूप में उन्होंने विपक्ष पर तीखे हमले बोले, खासकर नीतीश कुमार की ‘पलटासन’ राजनीति पर।

2024 में नीतीश कुमार के एनडीए में वापस लौटने पर सम्राट चौधरी बिहार के उपमुख्यमंत्री बने। यह नियुक्ति बीजेपी की रणनीति का हिस्सा थी—कुशवाहा समुदाय को प्रतिनिधित्व देकर जातीय संतुलन बनाना। विजय सिन्हा (भूमिहार) के साथ उनकी जोड़ी एनडीए सरकार को मजबूत आधार देती है। सम्राट की आक्रामक शैली—जैसे हाल ही में तेजस्वी यादव पर ‘गुंडागर्दी’ का आरोप लगाना या नीतीश पर ‘शराबी बनाने’ का तंज कसना—बिहार की राजनीति को गरमाती रहती है। 2025 विधानसभा चुनावों में तारापुर सीट से उम्मीदवार बनकर वे पुश्तैनी जंग लड़ रहे हैं।

सम्राट चौधरी का महत्व केवल पदों तक सीमित नहीं। वे बिहार की जाति-आधारित राजनीति में एक पुल का काम करते हैं—आरजेडी से बीजेपी तक का सफर दर्शाता है कि कैसे व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा और पार्टी हित सामंजस्य बिठा सकते हैं। कुशवाहा-कुर्मी गठजोड़ को मजबूत कर वे एनडीए को 2025 में बहुमत की ओर धकेल रहे हैं। भ्रष्टाचार-विरोधी छवि और विकास-केंद्रित एजेंडे से वे युवा मतदाताओं को आकर्षित कर रहे हैं। बिहार, जहां राजनीति अस्थिरता का पर्याय है, वहां सम्राट स्थिरता और आक्रामकता का संगम हैं। यदि एनडीए सत्ता में लौटता है, तो उनका सीएम बनना असंभव नहीं। कुल मिलाकर, सम्राट चौधरी बिहार की राजनीति को नई दिशा देने वाले रणनीतिकार हैं, जो जाति से ऊपर उठकर विकास का मंत्र दे रहे हैं।

हिंदू कहने में हिचकिचाहट क्यों?

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आगरा । हमारा धर्म साझा विश्वासों, मूल्यों और परंपराओं के जरिए राष्ट्र को एकजुट कर सकता है। जब किसी देश में धर्म को राष्ट्र की नींव के रूप में देखा जाता है, तो यह सांस्कृतिक एकता और सामूहिक उद्देश्य की भावना को मजबूत करता है। इतिहास में कई देशों ने यह अनुभव किया है—जैसे पाकिस्तान में इस्लाम ने राष्ट्रीय पहचान बनाई, पोलैंड में कैथोलिक धर्म ने कम्युनिज्म के खिलाफ संघर्ष को ताकत दी। यरूशलेम और मक्का जैसे धार्मिक स्थल राष्ट्रों को उनकी आध्यात्मिक जड़ों से जोड़ते हैं। आयरलैंड की कैथोलिक परंपराओं या थाईलैंड के बौद्ध त्योहारों की तरह धार्मिक रीति-रिवाज और नैतिक मूल्य समाज को साथ लाते हैं और राष्ट्र को मजबूती देते हैं।
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आजादी के 75 साल बाद, भारत की असली रूह अब खुलकर सामने आना चाहती है। वो आत्मा, जो हिंदू है, जो सनातन है। सालों तक “सेक्युलरिज्म” के नाम पर इस देश की असलियत को छिपाया गया, लेकिन अब वो परदा हट रहा है। वक्त आ गया है कि हम भारत की उस पुरानी, चिरस्थायी आत्मा को फिर से अपनाएं, जिसने सदियों से इस मुल्क को एक रखा और इसकी तकदीर को संवारा।

भारत के प्रधान मंत्री ही नहीं, राष्ट्रपति मुर्मू भी धार्मिक स्थलों की यात्रा करने में पीछे नहीं हैं, भाजपा सरकारें खुलकर राज्यों में धार्मिक गतिविधियों को प्रोत्साहित कर रही हैं। सदियों बाद ये माहौल बना है। लोकतंत्र में मेजॉरिटी समुदाय के साथ अन्याय, उपेक्षा, नफरत का वातावरण, बनाना, कहां तक उचित था, आज इसका जवाब मांगा जा रहा है। दुर्भाग्यवश, भारत अब तक अपनी रूह से पूरी तरह जुड़ नहीं पाया था। वो रूह, जो हिंदू फलसफे में बसती है, लेकिन संविधान में “सेक्युलर” का लेबल लगा दिया गया। 1975 के आपातकाल में “सेक्युलर” शब्द जोड़ा गया, ताकि निष्पक्षता का दिखावा हो, मगर हकीकत में ये सियासी तुष्टिकरण का हथियार बन गया। अब वक्त है इस नकाब को उतारने का और अपनी असली शक्ल को कबूल करने का।
प्रो. पारसनाथ चौधरी कहते हैं, “1947 में मुल्क का बंटवारा मजहब के आधार पर हुआ। पाकिस्तान ने अपनी इस्लामी पहचान को खुलकर अपनाया, लेकिन भारत अपनी सनातन रूह को कबूलने में हिचकिचाया। आधुनिकता और तथाकथित निष्पक्षता की तलाश में हमने अपनी सांस्कृतिक जड़ों को दबा दिया। मगर अब इतिहास हमें पुकार रहा है — भारत की रूह सिर्फ हिंदू सोच में ही जिंदा है।”

हिंदू फलसफा हमें वो सबक देता है, जो हमेशा से हमारे साथ रहे — “हक से पहले फर्ज,” “सच हर मजहब में बस्ता है,” और “वसुधैव कुटुंबकम” यानी सारा जहां एक खानदान है। यही वो उसूल हैं, जिन्होंने इस रंग-बिरंगे मुल्क को सदियों तक जोड़े रखा। हिंदू धर्म कोई कट्टरपन नहीं, बल्कि एक ऐसा तरीका है जीने का, जो कई रास्तों को एक ही सच की ओर ले जाता है।

भारत को हिंदू मुल्क कहना किसी को दबाने की बात नहीं, बल्कि उस विचारधारा का सम्मान है, जिसने बुद्ध, महावीर, गुरु नानक और विवेकानंद जैसे महान लोग दिए। इसने पारसियों, यहूदियों और हर मजहब वालों का खुला दिल से स्वागत किया। समाजशास्त्री टी.पी. श्रीवास्तव कहते हैं, यही उदारता, यही सब्र भारत की असली पहचान है।

फिर भी “सेक्युलरिज्म” के नाम पर बहुसंख्यक समाज को गुनहगार ठहराया गया। हमारी सांस्कृतिक शान को दबाया गया, और देशभक्ति तक को शक की नजर से देखा गया। अब वक्त है इस मानसिक गुलामी की बेड़ियों को तोड़ने का। भारत को हिंदू मुल्क कहना किसी को बाहर करने की बात नहीं, बल्कि संविधान की रूह को मुल्क की रूह से जोड़ने की कोशिश है।

डॉ. देवाशीष भट्टाचार्य कहते हैं, “भारत का खयाल कोई बाहर से आया नहीं। ये वेदों में जन्मा, उपनिषदों में पला, गीता में चमका और सदियों में फला-फूला। भारत को हिंदू मुल्क कहना कोई नई बात नहीं, ये तो अपनी रूह को फिर से जगाने की बात है। वेदों की गूंज इस मिट्टी में है, पुराणों की कहानियां इसकी नदियों में बहती हैं, और इसकी हवाओं में त्याग, तप और रहम की खुशबू है। अब वक्त है कि भारत बेखौफ अपनी जड़ों की ओर लौटे।”

दरअसल, हिंदुत्व कोई कट्टर सोच नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक चेतना है, जो अलग-अलग धाराओं को एक बड़े संगम में मिलाती है। जब सेक्युलरिज्म बराबरी की जगह तुष्टिकरण बन जाता है, तो वो मुल्क की एकता को खतरे में डालता है। आज भारत उसी खतरे से जूझ रहा है। कश्मीर से पलायन, राम मंदिर के लिए दशकों का संघर्ष, और समान नागरिक संहिता पर खामोशी — ये सब उस टेढ़े-मेढ़े सेक्युलरिज्म के निशान हैं, जो गुलामी की “बांटो और राज करो” की सोच से निकले हैं, कहते हैं सामाजिक कार्यकर्ता श्री सुब्रमनियन।

अब सच को गले लगाने का वक्त है: भारत की धड़कन हिंदू है, इसकी बुनियाद हिंदू है, इसकी रूह सनातन है। ये मुल्क हमेशा से हिंदू था — और हमेशा रहेगा।

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