पाकिस्तान अब नहीं बचा पाएगा अपना कोई भी आतंकी

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पुलवामा आतंकी हमले का साजिशकर्ता और भारत में कई आतंकी हमलों में वाछित अल बदर मुजाहिदीन का आपरेशनल कमांडर अर्जमंद गुलजार उर्फ़ हमजा बुरहान पाकिस्तान में गुलाम कश्मीर की राजधानी मुजफ्फराबाद में मार दिया गया है। हमजा को दो अज्ञात लोगों ने आजरा में एमएस कालेज परिसर के पास मारा। मूलतः दक्षिण कश्मीर में पुलवामा के खरबतपोरा के रहने वाले बुरहान पर सुरक्षाबलों ने 10 लाख का इनाम रखा था। केंद्रीय गृह मंत्रालय ने भी उसे 20 अप्रैल 2022 को आतंकी घोषित कर रखा था।

हमजा बुरहान करीब आठ वर्ष से पाकिस्तानी सेना और उसकी खुफिया एजेंसी आईएसआई का बहुत चहेता था। आईएसआई व पाक सेना हमजा की सुरक्षा किया करती थी। वह आतंकी संगठन अल बदर मुजाहिदीन की कमान काउंसिल में तीसरा स्थान रखता है। पहले नंबर पर बख्त जमीन उसके बाद यूसुफ बलोच और हमजा बुरहान आता था। घाटी में हिजबुल मुजाहिदीन के नेटवर्क के लगभग तबाह होने के बाद आईएसआई के स्थानीय चेहरे के रूप में उसे इस्तेमाल करते हुए कश्मीर में स्थानीय आतंकियों की भर्ती का षड्यंत्र चला रही थी। पाकिस्तान में जिस प्रकार एक के बाद एक आतंकी मारे जा रहे हैं उससे यह बात सिद्ध हो रही है कि जो पाकिस्तान आज पश्चिम एशिया युद्ध में शांति दूत बनने की कोशिश कर रहा है असल में दुनिया भर में अशांति का दूत है। पाकिस्तान केवल अपने आप को बचाने के लिए अमेरिका की गोद में बैठकर दुनिया को शांति मार्ग दिखाने का नाटक कर रहा है।

पुलवामा हमले में 14 फरवरी 2019 को जम्मू कश्मीर राष्ट्रीय राजमार्ग पर पुलवामा में आतंकियों ने विस्फोटकों से भरी एक कार से सीआरपीएफ के काफिले में शामिल वाहन को टक्कर मारी थी । इस हमले में 40 जवान शहीद हो गए थे। यह कुख्यात आतंकी हमजा बुरहान उसी हमले का साजिशकर्ता था जो अब मारा जा चुका है। यह कई और आतंकी वारदातों मे भी शामिल रहा था। पाकिस्तान में जिस प्रकार से एक के बाद एक भारत विरोधी आतंकी मारे जा रहे हैं उससे इन आतकी संगठनो के नेतृत्व में खलबली व बैचेनी बढ़ गई है कि अब अगला नंबर किसका हो सकता है।आतंकी संगठनों में खलबली मचना इसलिए भी स्वाभाविक है क्योकि उनकी सुरक्षा पाक सेना करती है। पाकिस्तान में एक चर्चा यह भी हो रही है कि कहीं ये घटनाएं आपसी गुटबाजी या संघर्ष का परिणाम तो नहीं हैं। हमजा बुरहान 2017 में पाकिस्तान चला गया था। वह खुद को पाकिस्तान में शिक्षक बताता था। वह पाक अधिकृत गुलाम कश्मीर में कई आतंकी संगठनों को प्रशिक्षण देने के काम में लगा हुआ था। साथ ही वह आतंकियों को भारत में घुसपैठ करवाने में मदद करता था। हमजा को अपने सर्किल में ”डाक्टर“ नाम से भी जाना जाता था।

पाकिस्तान में एक बाद एक आतंकी लगातार मारे जा रहे हैं । सुरक्षा की दृष्टि से यह एक बहुत बड़ा बदलाव है। ऑपरेशन सिंदूर के बाद पाकिस्तान में अब तक दो दर्जन से अधिक ऐसे आतंकी मारे जा चुके हैं जो भारत में किसी बड़ी आतंकी घटना में शामिल रहे हैं। अब तक जिन आतंकियों को एक तरह से मारा गया है उनमें मार्च 2025 को लश्कर आतंकी फैजल नदीम उर्फ अबु कताल, फरवरी 2025 को लश्कर -ए -तैयबा की राजनीतिक शाखा का चीफ मौलना काशिफ अली, मार्च 2025 में ही आईएसआई का अंडर कवर एजेंट मुफ्ती शाह मीर , नवंबर 2023 मे आतंकी मससूद अजहर का करीबी रहीम उल्लह मारिक, नवंबर 2023 में ही लश्कर आतंकी अकरम गाजी और लश्कर आतंकी ख्साजा शाहिद फिर सितंबर 2023 में लश्कर आतंकी मौलना जियाउर रहमान अप्रैल 2025 में मसूद अजहर का करीबी काजी एजाज आबिद, अक्तूबर 2023 में मसूद अजहर का करीबी दाऊद मालिक दिसंबर 2023 में लश्कर आतंकी अदनान अहमद, फरवरी 2023 में हिजबुल आतंकी बशीर अहमद पीर मार्च 2022 में जैश का आतंकी जहूर इब्राहीम, मार्च 2025 में आईएसपीआर अधिकारी मेजर दानियाल, सितम्बर 2023 में लश्कर- ए -तैयबा का आतंकी रियाज अहमद तथा मई 2023 में खालिस्तानी आतंकी परमजीत सिहं पंजवार को अब तक मारा जा चुका है । यह सभी कुख्यात आतंकी रह चुक थे तथा भारत में बड़़ी आतंकी वारदातों को आंजाम देने में इन सभी की बड़ी भूमिका रह चुकी थी।

इसके अलावा भी कई और आतंकवादी अज्ञात व गुमानाम लोगों के द्वारा मारे जा चुके हैं। पाकिस्तान में अभी भी हाफिज सईद और मसूद अजहर सहित भारत के मोस्ट वांटेड आतंकवादी खुलेआम घूम रहे हैं । दाऊद इब्राहीम भी सेना व आईएसआई के संरक्षण में वहीं रह रहा है और इन सभी की सुरक्षा अत्यंत कड़ी है। यहां पर यह बात भी ध्यान देने योग्य है कि हमजा बुरहान को सेना ने सुरक्षा गार्ड और कार तक दे रखी थी। भारत के रक्षामंत्री राजनाथ सिंह कई अवसरों पर पाक को कड़ी चेतावनी दे चुके हैं कि अब पाकिस्तान की एक भी गली व कोना भारत से छिपा हुआ नहीं रह गया है, जिस देश को भारत ने जन्म दिया है वह उसे समाप्त भी कर सकता है। भारतीय सेना भी कह रही कि अगर पाकिस्तान नहीं सुधरा तो उसका इतिहास- भूगोल सब कुछ बदल जाएगा।

मोदी , मेलोनी के पहुनवा राघो की मेलोडी !

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दयानंद पांडेय

लखनऊ: हम जब बच्चे थे कुछ वाक़ये ग़ज़ब घटते थे l जब अम्मा के साथ बैलगाड़ी से ननिहाल जाते थे तो चलते समय गांव में हमारे बाबा यानी पितामह बड़े प्यार से मुस्कुराते हुए कहते थे कि बाबू अपनी नानी से कहना कि तैयार रहेंगी, हम जल्दी ही उन्हें विदा कराने आने वाले हैं l उधर से वापस आते समय, नाना कहते कि नाती अपनी इया यानी दादी से कहना कि हम जल्दी ही उन को विदा कराने आ रहे हैं l और हम किसी कबूतर की तरह बाल सुलभ अंदाज़ दोनों को यह संदेश दे देते थे l सुन कर इधर इया हंसतीं, उधर नानी हंसतीं l

ग़ज़ब तो तब होता जब ननिहाल का हलवाह , नाई या कहार बड़े प्यार से कहता कि फूफा कहो l ददिहाल में भी यही लोग कहते मौसा कहो l हम किसी छोटी मोटी लालच में आ कर कह देते l तो पाता कि अम्मा दोनों तरफ़ नाराज हो जाती l दुखी हो जाती l ददिहाल में भी , ननिहाल में भी l बात तब समझ नहीं आती थी l कि माजरा क्या है ?

इसी तरह गांव के कुछ चाचा लोग फुआ पक्ष के लोगों को देखते ही कहते थे , पहुना कहो ! पहुना मतलब बहनोई ! ननिहाल पक्ष के लोग तो लोग पहुना कहते ही थे l गांव में इस तरह की ठिठोली, हँसी, मज़ाक़ रिश्तों में मिठास , अपनापन और आत्मीयता घोलते थे l एक दूसरे के प्रति सम्मान और मर्यादा का भाव रखते l

एक समय हरिशंकर तिवारी जब गोरखपुर के चिल्लूपार से विधायक चुन कर लखनऊ आए तो पार्क रोड पर बलिया के विधायक भोला पांडेय के बगल में ही उन्हें आवास आवंटित हुआ l दोनों ब्राह्मण , दोनों माफिया l दोनों में ही गहरा मेलजोल और हँसी मज़ाक इसी भाव में होता l कोई 1986-1987 की बात होगी यह l

भोला पांडेय से हरिशंकर तिवारी कहते , पहुना नहीं कहा l पहुना कहिए l तो यही संवाद भोला पांडेय भी दुहराते l देखा कि अकसर भोला पांडेय को ही पहुना कहना पड़ता l चुहुल चलती रहती l मिठास बनी रहती l भोला पांडेय, तिवारी के पांव भी छूते थे l पहुना भाव बना रहता l

भोला पांडेय के ऊपर बैडमिंटन खिलाड़ी सैय्यद मोदी और अमिता मोदी भी रहते थे l फर्स्ट फ्लोर पर l संजय सिंह का मोदी के घर आना जाना बना रहता था l सैय्यद मोदी के फ्लैट के सामने ही न्यूज एजेंसी यू एन आई का दफ़्तर था l सदाशिव द्विवेदी वहाँ संवाददाता थे l बलिया के ही थे l हमारी अच्छी दोस्ती थी l तो अकसर देखता था कि संजय सिंह आते l जिप्सी चलाते हुए l बिना ड्राइवर के l

सैय्यद मोदी दरवाज़ा खोलता और बाहर निकल कर सीढ़ी उतर जाता l संजय सिंह अंदर जा कर दरवाज़ा बंद कर लेते l एक बार भोला पांडेय से इस की चर्चा की l चुहुल में l वह हँसे l भोला पांडेय भले विधायक थे l माफिया थे l पर रंगबाजी और लौंडपना भी बहुत था l उन्हीं दिनों भोला पांडेय ने एक महिला विधायक सुमनलता दीक्षित से दूसरा विवाह भी कर लिया था l

सुमन लता दीक्षित सुंदर भी थीं और हट्ठी कट्ठी भी l लंबी सी l इस लिए भी भोला पांडेय चर्चा में थे l यह वही भोला पांडेय थे जो जनता पार्टी की मोरार जी देसाई सरकार के समय एक बार आकाशवाणी लखनऊ के स्टूडियो में जबरिया घुस कर इंदिरा गांधी जिंदाबाद का नारा लगा दिया था l जो प्रसारित हो गया था l उन के साथ सुल्तानपुर के देवेंद्र पांडेय भी थे l जल्दी ही भोला पांडेय और देवेंद्र पांडेय ने एक फ़्लाइट में टेनिस बाल को बम बता कर हाईजैक कर लिया था l बाद में कांग्रेस ने दोनों को टिकट दिया और दोनों विधायक चुने गए l

ख़ैर एक दिन भोला पांडेय ने संजय सिंह के भीतर जाते ही बाहर से बेलन लगा कर दरवाज़ा बंद कर पुलिस को फ़ोन कर दिया कि फला फ़्लैट में रंडीबाजी हो रही है l आनन फानन पुलिस ने फ़्लैट घेर लिया l दरवाज़ा खुलवाने पर संजय सिंह बाहर निकले l सरकार में ताक़तवर मंत्री थे l तत्कालीन मुख्य मंत्री वीर बहादुर सिंह को चुनौती देते हुए , मुख्य मंत्री पद के दावेदार l पुलिस उन्हें देखते ही सकपका गई l उल्टे पांव लौट गई l पर हंगामा हो गया l पूरा पार्क रोड जुट गया l

उस दिन भोला पांडेय ने बिना टोके हरिशंकर तिवारी से हंसते हुए कहा , पहुना आज त मजा आ गईल ! हरिशंकर तिवारी अपनी मूंछों में मुस्कुराए और बोले , सरऊ हम के बदनाम करे ख़ातिर हमरे घरे आ गईलs !

पहुना ! कह कर हाथ जोड़ कर भोला पांडेय भी ठठा कर हंस पड़े l

यह पहुना प्रकरण इटली में मेलोनी को मोदी ने जो मेलोडी खिलाई उस संदर्भ में याद आ गया l मेलोनी और मोदी की मिठास के किसिम-किसिम के रिश्ते गढ़ने , मिठास और ठिठोली के बीच ही कोई राहुल की मौसी का मज़ा ले रहा है , कोई ममेरी बहन का रिश्ता खोज रहा है , कोई कुछ l इंदिरा गांधी की भी याद आ गई है l कभी ब्रेजनेव , कभी फ़िदेल कास्त्रो के साथ उन की भी बड़ी चर्चा हुई l रीगन के साथ भी l

मोदी, मेलोनी के क़िस्से पहले भी ख़ूब गढ़े गए , गाए और बताए गए हैं l पर अब की राहुल गांधी की बौखलाहट ने इस में एक नया और चटक रंग भर दिया है l राहुल गांधी के भक्तों ने इस रंग में फिटकिरी डाल-डाल कर इसे और चटक कर दिया है l इतना कि शारदा सिन्हा का गाया मैथिली गीत, पहुनवा राघो ! याद आ गया है l पहुनवा राघो की सोंधी मिठास मन में घुल गई है l किसी राजनयिक यात्रा में पहुनवा राघो भी हो सकता है भला ! यह ठीक ही कहा जाता है कि मोदी दिल , दिमाग़ और ड्रामा एक साथ ले कर चलता है l पहुनवा राघो गाने को मजबूर कर देता है l

मोदी, अमित शाह और संघ को गद्दार कहने वाले मूर्खाधिपति के लिए भावोद्गार।

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इंदुशेखर तत्पुरुष

ये उजड्ड है, वज्रमूर्ख है,
जगह–जगह ठुकराया है।
फिर भी इसकी अकड़ तो देखो,
राजवंश का जाया है।।

जब भी इसको दौरा पड़ता,
अल्ल–बल्ल कुछ बकता है।
जब–जब ये पिटता चुनाव में,
तब विदेश जा छुपता है।।

कभी भागता थाईलैंड ये,
जाता कभी मलेशिया।
अबकी बार सुना था मस्कट,
कैसा कष्ट कलेसिया।।

सबको निपटाकर बतला रे!
अब किसको निपटाएगा?
गिरने की भी हद होती है,
कितना गिरता जाएगा?

देशद्रोहियों का पिछलग्गू ,
सोरोसी पिट्ठू लगता।
कौवे जैसी वाणी इसकी
बड़ा मियाँ मिट्ठू बनता।।

जिनकी देशभक्ति जगजाहिर,
उनको ये कहता गद्दार।
असल मूर्ख तो वे जो अब भी
करते हैं इसको स्वीकार।।

संघ, राष्ट्रवाद और कांग्रेस की सियासी असहजता

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प्रणय विक्रम सिंह

दिल्ली । भारतीय लोकतंत्र का सौंदर्य उसकी विविधता, वैचारिक बहुलता और संवाद की परंपरा में निहित है। यहां असहमति को स्थान मिला है, आलोचना को भी। किंतु जब राजनीतिक विरोध मर्यादा की सीमा लांघकर राष्ट्रसेवा से जुड़े संगठनों, नेतृत्व और करोड़ों नागरिकों की वैचारिक आस्था को ‘गद्दारी’ जैसे शब्दों से परिभाषित करने लगे, तब वह केवल राजनीतिक प्रतिक्रिया नहीं रह जाती, वह उस गहरी वैचारिक बेचैनी का उद्घाटन बन जाती है, जो लंबे समय से भारत की सांस्कृतिक राष्ट्रवादी चेतना के प्रति एक विशेष राजनीतिक मानसिकता के भीतर विद्यमान रही है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृहमंत्री अमित शाह और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रति राहुल गांधी की अमर्यादित टिप्पणी को इसी व्यापक संदर्भ में समझना होगा। यह विवाद केवल एक बयान का विवाद नहीं है। यह भारत की राजनीति में चल रहे उस गहरे वैचारिक संघर्ष का प्रतिबिंब है, जिसमें एक ओर सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, सभ्यतागत आत्मविश्वास और ‘राष्ट्र प्रथम’ की चेतना है, जबकि दूसरी ओर वह राजनीति है, जिसने दशकों तक भारतीय समाज को जाति, क्षेत्र, तुष्टीकरण और प्रतीकात्मक धर्मनिरपेक्षता की रेखाओं में बांटकर सत्ता का गणित साधने का प्रयास किया।

विडंबना यह है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर प्रश्न वही कांग्रेस उठा रही है, जिसका राजनीतिक इतिहास स्वयं लोकतांत्रिक संस्थाओं के केंद्रीकरण, आपातकाल, तुष्टीकरण और वोटबैंक की राजनीति से जुड़ा रहा है। भारतीय राजनीति का यह शायद सबसे बड़ा विरोधाभास है कि जिसने लोकतंत्र पर आपातकाल थोपकर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का गला घोंटा, वही दल आज लोकतांत्रिक मूल्यों और राष्ट्रभक्ति का प्रमाणपत्र बांटने का प्रयास कर रहा है।

राहुल गांधी की टिप्पणी को यदि केवल चुनावी बयान मानकर छोड़ दिया जाए, तो यह अधूरा विश्लेषण होगा। दरअसल यह उस वैचारिक असहजता का परिणाम है, जो पिछले एक दशक में भारत की राजनीति में आए बड़े परिवर्तन के कारण उत्पन्न हुई है। लंबे समय तक राष्ट्रवाद को संदेह और संकोच के घेरे में रखने वाली राजनीति अब स्वयं वैचारिक रक्षात्मकता में खड़ी दिखाई दे रही है।

नरेंद्र मोदी का उदय केवल एक नेता का उदय नहीं था। वह उस भारत के पुनरुत्थान का प्रतीक था, जो दशकों तक अपनी सांस्कृतिक पहचान को राजनीतिक संकोच में जीता रहा। पहली बार राष्ट्रवाद केवल चुनावी नारा नहीं रहा, वह शासन का दर्शन बना।

विदेश नीति से लेकर सुरक्षा नीति तक, सांस्कृतिक पुनर्जागरण से लेकर आत्मनिर्भरता तक, भारत ने स्वयं को एक आत्मविश्वासी राष्ट्र के रूप में प्रस्तुत करना शुरू किया।

यही वह बिंदु है, जहां कांग्रेस की वैचारिक बेचैनी सबसे अधिक स्पष्ट होती है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को लेकर कांग्रेस की असहजता नई नहीं है। स्वतंत्रता के बाद से ही संघ को संदेह की दृष्टि से देखने का एक स्थायी राजनीतिक आग्रह कांग्रेस के भीतर रहा। क्योंकि संघ सत्ता आधारित संगठन नहीं है, वह समाज आधारित वैचारिक शक्ति है। उसकी जड़ें चुनावी राजनीति में नहीं, बल्कि सामाजिक संगठन, सेवा और सांस्कृतिक चेतना में हैं।

विश्व के सबसे विशाल सांस्कृतिक संगठन ‘संघ’ ने शाखा की अनुशासित पंक्ति में राष्ट्रप्रेम के संस्कार बोये, समाज के प्रत्येक क्षेत्र में सेवा, समरसता और संगठन का भाव जगाया।

भारत की आत्मा को आत्मविश्वास दिया, बिखरे समाज को एकात्मता के सूत्र में पिरोया, राष्ट्रवाद को जीवन का आधार बनाया और अखंड भारत के निर्माण के दिव्य संकल्प से जन-जन को जोड़ने का कार्य किया।

यही कारण है कि संघ को केवल राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी की तरह परिभाषित करना संभव नहीं रहा। आपदा हो, महामारी हो, बाढ़ हो, भूकंप हो या सामाजिक संकट, संघ के स्वयंसेवक बिना प्रचार और राजनीतिक लाभ की अपेक्षा के सबसे पहले मैदान में दिखाई देते हैं। गांवों, वनवासी क्षेत्रों, सीमांत समाज और शिक्षा के क्षेत्र में दशकों से चल रहे कार्यों ने संघ को समाज के भीतर गहरी स्वीकार्यता दी है। यही सामाजिक स्वीकार्यता कांग्रेस की सबसे बड़ी वैचारिक असहजता का कारण बनती रही है।

दरअसल कांग्रेस की राजनीति लंबे समय तक ‘छद्म धर्मनिरपेक्षता’ पर आधारित रही। इफ्तार राजनीति, तुष्टीकरण आधारित भाषण, पहचान-आधारित गठजोड़ और वोटबैंक की रणनीतियों को धर्मनिरपेक्षता का पर्याय बना दिया गया। इस राजनीति में राष्ट्रवाद को अक्सर संदेह की दृष्टि से देखा गया, सांस्कृतिक प्रतीकों को ‘बहुसंख्यकवाद’ कहकर खारिज किया गया और भारत की सभ्यतागत चेतना को राजनीतिक विमर्श में हाशिए पर रखने का प्रयास हुआ।

लेकिन भारत का सामाजिक मानस बदल चुका है। आज का भारत अपनी सांस्कृतिक पहचान को लेकर अपराधबोध में नहीं जीता। वह काशी विश्वनाथ धाम के पुनरुत्थान को भी स्वीकार करता है और चंद्रयान की सफलता पर भी गर्व करता है। वह राम मंदिर को भी अपनी सभ्यता का प्रतीक मानता है और ‘आत्मनिर्भर भारत’ को भी राष्ट्रीय स्वाभिमान का विस्तार समझता है। यही ‘नया भारत’ कांग्रेस की पुरानी राजनीतिक भाषा को अप्रासंगिक बना रहा है।

यही कारण है कि जब भारत सर्जिकल स्ट्राइक करता है, सीमाओं पर निर्णायक रुख अपनाता है, आतंकवाद पर कठोर नीति लागू करता है और वैश्विक मंचों पर आत्मविश्वास से अपनी बात रखता है, तब कांग्रेस का वैचारिक संकट और गहरा होता जाता है।

सवाल यह भी है कि ‘गद्दारी’ का नैतिक अधिकार किसके पास है? क्या राष्ट्रभक्ति पर उपदेश देने का अधिकार उन लोगों को है, जिन्होंने सर्जिकल स्ट्राइक पर सेना से सबूत मांगे? क्या नैतिकता का दावा वे लोग कर सकते हैं, जिन्होंने विदेशी मंचों पर भारत की लोकतांत्रिक संस्थाओं और छवि को कठघरे में खड़ा किया? क्या राष्ट्रवाद पर प्रश्न उठाने वाले यह भूल सकते हैं कि वर्षों तक अलगाववादी राजनीति और तुष्टीकरण आधारित समीकरणों ने देश को कितनी बड़ी वैचारिक क्षति पहुंचाई?

कश्मीर में वर्षों तक अलगाववादी तत्वों के प्रति दिखाई गई राजनीतिक नरमी, यासीन मलिक जैसे चेहरों के प्रति सत्ता प्रतिष्ठानों की अस्वाभाविक सहजता और पंजाब में अस्थिरता के दौर में वोटबैंक आधारित राजनीतिक समीकरणों ने देश की एकता को गहरी चोट पहुंचाई। विडंबना यह है कि राष्ट्रवाद पर प्रश्न वही राजनीति उठा रही है, जिसने कई बार राष्ट्रीय सुरक्षा और वैचारिक स्पष्टता के स्थान पर तुष्टिकरण और राजनीतिक सुविधा को प्राथमिकता दी।

भारत की जनता अब इन प्रश्नों को समझती है। यही कारण है कि कांग्रेस की भाषा जितनी तीखी होती जा रही है, उसका जनाधार उतना ही सिमटता जा रहा है। क्योंकि राजनीतिक आक्रोश और वैचारिक आत्मविश्वास में अंतर होता है। आत्मविश्वास संवाद करता है, हताशा आरोप लगाती है। राहुल गांधी की टिप्पणी को इसी राजनीतिक अधैर्य और वैचारिक संकट के संदर्भ में पढ़ा जाना चाहिए।

राष्ट्रसेवा, सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और भारत की एकात्म चेतना को निरंतर सशक्त कर रहे प्रधानमंत्री, गृहमंत्री और ‘संघ’ के प्रति कांग्रेस की वैचारिक असहजता स्वाभाविक है।

दरअसल लोकतंत्र में आलोचना आवश्यक है। नरेंद्र मोदी की नीतियों का विरोध भी लोकतांत्रिक अधिकार है। अमित शाह के निर्णयों पर प्रश्न उठाना भी राजनीतिक प्रक्रिया का हिस्सा है। किंतु आलोचना और अवमानना के बीच एक स्पष्ट रेखा होती है। जब राजनीतिक संवाद तथ्य और विचार से हटकर अपमानजनक विशेषणों पर उतर आए, तब वह लोकतांत्रिक परिपक्वता नहीं, बल्कि वैचारिक असंतुलन का संकेत बन जाता है।

राष्ट्रवादी विचारधारा से मतभेद हो सकते हैं, लेकिन करोड़ों स्वयंसेवकों की राष्ट्रनिष्ठा पर प्रश्न उठाना अंततः भारत की उस सामाजिक चेतना का अपमान है, जिसने सेवा, संगठन और समर्पण को राजनीति से ऊपर रखा है।
आज भारत एक निर्णायक संक्रमण काल से गुजर रहा है। यह केवल सत्ता परिवर्तन का दौर नहीं है, यह राजनीतिक संस्कृति के परिवर्तन का दौर है। यहां राजनीति अब केवल चुनावी समीकरणों का खेल नहीं रह गई। वह सभ्यतागत दिशा, सांस्कृतिक आत्मविश्वास और राष्ट्रीय पहचान का विमर्श बन चुकी है।

यही कारण है कि कांग्रेस और राहुल गांधी की भाषा में बढ़ती आक्रामकता दरअसल उस वैचारिक असहजता का संकेत है, जो बदलते भारत को समझने में असमर्थता से उत्पन्न हुई है।

लेकिन भारत अब बदल चुका है। यह ‘नया भारत’ राष्ट्रवाद को संकोच से नहीं, स्वाभिमान से देखता है। यह सांस्कृतिक चेतना को विभाजन नहीं, एकात्मता का आधार मानता है। यह ‘राष्ट्र प्रथम’ को राजनीतिक नारा नहीं, राष्ट्रीय चरित्र का आधार मानता है। यही परिवर्तन आज भारत की राजनीति की नई धुरी है। और शायद यही वह सत्य है, जिसे स्वीकार करने में जाति, क्षेत्र और तुष्टीकरण की विभाजक रेखाओं पर खड़ी जनाधारहीन, मुद्दाविहीन और नीतिविहीन कांग्रेस सबसे अधिक असहज महसूस कर रही है और उसकी कुंठा हास्यास्पद बयानों के रूप में सामने आ रही है। कांग्रेस को समझना होगा कि…
अंधेरों के दम पर तारीख़ नहीं बदला करती
सूरज के ख़िलाफ़ साज़िशें हर दौर में होती हैं

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