स्विट्ज़रलैंड: पहाड़ों पर कुदरत का करिश्मा, मशीनों का जलवा और हम सबको ‘आज खाने में क्या है की चिंता?’

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ज्यूरिख–इंटरलाकेन (स्विट्ज़रलैंड):  क्या हो अगर कुदरत अपनी पूरी दौलत एक ही जगह लुटा दे, पहाड़ों को बर्फ का ताज पहना दे और इंसान उन पहाड़ों पर चढ़ने के लिए ऐसी ट्रेन बना दे, जिसे देखकर गुरुत्वाकर्षण भी शर्म से सिर झुका ले?
स्विट्ज़रलैंड में आपका स्वागत है! यहाँ पहाड़ आसमान से गुफ़्तगू करते हैं, झीलें आईने की तरह चमकती हैं और ट्रेनें ऐसी वक्त की पाबंद हैं कि लगता है, घड़ी भी इनके सामने हाज़िरी लगाती होगी।
इंटरलाकेन की हमारी यात्रा ने कुदरत, इंजीनियरिंग और स्विस अनुशासन का ऐसा नज़ारा पेश किया कि कुछ देर के लिए हमारी बोलती बंद हो गई। मगर भारतीय यात्रियों को चुप रखना आसान नहीं। थोड़ी देर बाद सवाल उठ ही गया: “भाई, लंच में क्या है?”

ज्यूरिख से इंटरलाकेन और फिर पहाड़ों की ओर हमारा सफर शुरू हुआ। ट्रेन जैसे-जैसे ऊपर चढ़ती गई, धरती का रंग बदलता गया। हरी-भरी घाटियाँ पीछे छूटने लगीं। सामने ऊँची चट्टानें, गहरी ढलानें और बर्फ से सजी चोटियाँ दिखाई देने लगीं।

ट्रेन का खड़ी चढ़ाई पर आगे बढ़ना अपने आप में एक तमाशा था। पटरी पहाड़ के सीने पर साँप की तरह बल खाती हुई ऊपर जा रही थी। हमें लगा, ट्रेन पहाड़ से कह रही हो, “भाई साहब, जरा साइड दीजिए। सैलानी ऊपर आ रहे हैं!”
कभी-कभी लगा कि ट्रेन नहीं, हमारी हिम्मत चढ़ाई चढ़ रही है। लेकिन स्विस इंजीनियरिंग ने ऐसा इंतज़ाम किया था कि पहाड़ भी परेशान नहीं हुआ और यात्री भी सुरक्षित आगे बढ़ते रहे।

फिर आई केबल कारों की बारी। ये गाड़ियाँ हवा में झूलती हुई हमें धरती से ऊपर ले जा रही थीं। नीचे घर खिलौनों जैसे दिखाई दे रहे थे, सड़कें पेंसिल से खींची गई लकीरों में बदल गई थीं और हरी घाटियाँ किसी चित्रकार की शानदार कृति जैसी लग रही थीं।

केबल कार में बैठकर नीचे देखिए तो दिल कहता है, “वाह, क्या नज़ारा है!”
और दिमाग धीरे से पूछता है, “अगर केबल ने आज छुट्टी लेने का फैसला कर लिया तो?”
खैर, स्विस व्यवस्था पर भरोसा था। इसलिए डर को जेब में रखा और कैमरे को बाहर निकाल लिया।

फिर वह दृश्य आया, जिसे आँखें शायद कभी भुला नहीं पाएँगी।
बर्फ से ढका पहाड़ किसी बुज़ुर्ग बादशाह की तरह खड़ा था। सिर पर चमकता हुआ बर्फ का ताज, चेहरे पर सदियों की गंभीरता और चारों ओर प्रकृति का दरबार। सूरज की किरणें बर्फ पर पड़तीं तो कभी चाँदी जैसी चमक पैदा होती, कभी हल्का नीला रंग उभर आता।

हवा में ठंडक थी, लेकिन नज़ारों में ऐसी गर्मजोशी कि मन वहीं ठहर जाने को करता था। कैमरे लगातार क्लिक कर रहे थे। हर यात्री चाहता था कि इस जन्नत का थोड़ा-सा हिस्सा अपने मोबाइल में कैद कर ले।
लेकिन प्रकृति को मोबाइल की गैलरी में कैद करना भी अजीब कोशिश है। असली नज़ारा सामने था, और हम सब स्क्रीन पर उसका छोटा-सा संस्करण खोज रहे थे!
हिमनद यानी ग्लेशियर ने हमें मंत्रमुग्ध कर दिया। सफेद बर्फ का यह संसार जितना शानदार था, उतना ही चिंताजनक भी।
पिघलते ग्लेशियरों की खबरें याद आईं। प्रकृति हमें अपनी सुंदरता का तोहफा देती है, लेकिन साथ में चेतावनी भी लिख देती है: “मेरी हिफाज़त करो, वरना यह नज़ारा अगली पीढ़ी को तस्वीरों में ही मिलेगा।”
कुदरत की मेहरबानी का आनंद लेना चाहिए, मगर उसकी हिफाज़त की जिम्मेदारी भी याद रखनी होगी।
स्विट्ज़रलैंड पर लगता है जैसे कुदरत ने कुछ ज़्यादा ही मेहरबानी की हो। पहाड़, झीलें, हरियाली, साफ-सुथरे रास्ते और शानदार बुनियादी ढाँचा—हर तरफ एक नज़्म जैसी लय दिखाई देती है।
लेकिन इस देश की कहानी केवल कुदरती हुस्न की नहीं है। यहाँ व्यवस्था, समय की पाबंदी, सफाई और तकनीकी दक्षता भी खास ध्यान खींचती हैं।
ट्रेनें अपने समय के अनुसार चलती हैं। केबल कारें व्यवस्थित ढंग से काम करती हैं। मशीनें रोजमर्रा के अनेक काम संभालती हैं। पूरा सिस्टम इस तरह चलता दिखाई देता है, जैसे किसी अदृश्य कंडक्टर के हाथ में संचालन की छड़ी हो।
भारत में सफर का अपना अलग मज़ा है। किसी अनजान यात्री से बातचीत शुरू हो जाती है। चाय के साथ राजनीति, क्रिकेट, महँगाई और रिश्तेदारों की चर्चा भी हो सकती है। पाँच मिनट में आदमी अपना जीवन-वृत्तांत सुना देता है और कभी-कभी आपका भी पूछ लेता है!
स्विट्ज़रलैंड में बातचीत अक्सर संक्षिप्त और काम-केंद्रित दिखाई देती है। यहाँ सिस्टम और प्रक्रियाएँ जीवन को व्यवस्थित रखती हैं। भारत में इंसानी रिश्तों, सहज बातचीत और अचानक पैदा होने वाली मदद की अपनी अलग रवायत है।
दोनों अनुभवों में अपनी-अपनी खूबसूरती है। एक तरफ मशीनों की सटीकता, दूसरी तरफ इंसानी जुड़ाव की गर्माहट।
### बर्फ के बीच ‘वंदे मातरम्’ की गूँज
और फिर पहाड़ की चोटी पर एक अनोखा भारतीय पल देखने को मिला।
दो समूहों में शामिल भारतीय और प्रवासी भारतीय पहाड़ी रेलवे स्टेशन पर इकट्ठा हुए। अचानक राष्ट्रीय गान और ‘वंदे मातरम्’ की आवाज़ गूँज उठी। चारों ओर बर्फीली चोटियाँ थीं, ठंडी हवा थी और बीच में भारत की पहचान से जुड़ा एक भावनात्मक क्षण।
दूर देश में रहने वाले भारतीयों के लिए राष्ट्रीय पहचान का यह सार्वजनिक प्रदर्शन ध्यान खींचने वाला था। मातृभूमि से जुड़ाव सीमाओं और दूरियों के बावजूद अपनी जगह बनाए रखता है।
हमारी निगाहें बार-बार ग्लेशियर, झीलों और पहाड़ों की ओर लौट रही थीं। लेकिन उस पल में देश की याद ने भी अपना रंग भर दिया।
### स्विस पहाड़, भारतीय पेट और अचार की बोतल
अब खाने की बात न हो तो यात्रा-वृत्तांत अधूरा ही रहेगा।
आखिर आगरा हो या ज्यूरिख, पहाड़ की चोटी हो या होटल का कमरा, भारतीय यात्री के मन में एक सवाल जरूर उठता है:
“आज खाने में क्या है?”
यूरोप में भारतीय भोजन की उपलब्धता देखकर खुशी हुई। वेजिटेरियन खाना, जैन व्यंजन और दक्षिण भारतीय पकवान आसानी से मिल रहे हैं। हम दो बार दक्षिण भारतीय भोजन का स्वाद ले चुके हैं।
सच कहूँ तो बेकार ही अपने साथ अचार की बोतल लेकर आए थे। यहाँ तो कई भोजन के साथ अचार भी मिल गया! हमारी बोतल ने शायद मन ही मन कहा होगा, “मुझे इतनी दूर लाने की क्या जरूरत थी, मालिक?”
लंच में बड़ा पाव, भाजी पाव और गर्मागर्म मसालेदार चाय मिली। फिर क्या था—ठंडे मौसम में चाय ने आत्मा तक को गर्म कर दिया। मसालेदार स्वाद ने यात्रा की थकान पर मरहम लगा दिया।
स्विट्ज़रलैंड में चॉकलेट हाउस का अनुभव भी शानदार रहा। तरह-तरह की मस्त, रसीली, कुरकुरी चॉकलेटें! कुछ चॉकलेट्स का स्वाद ऐसा कि जीभ ने तुरंत दूसरा राउंड माँग लिया।
और जब झोली भर फ्री चॉकलेट मिल गईं, तो हमारी ऊर्जा का स्तर अचानक पहाड़ की ऊँचाई से भी ऊपर पहुँच गया। यात्रियों के चेहरों पर मुस्कान थी और हाथों में चॉकलेट। स्विस अर्थव्यवस्था का यह मीठा पक्ष हमें खूब भाया!
### ज्यूरिख झील और भारतीय डिनर
दिन भर के सफर के बाद ज्यूरिख झील का नज़ारा मन को सुकून देने वाला था। पानी की शांति, आसपास की व्यवस्था और शाम का वातावरण—सब कुछ दिल को छू गया।
रात का शानदार डिनर एक और भारतीय रेस्टोरेंट में हुआ। भारतीय मसालों और परिचित स्वादों ने विदेश की धरती पर घर जैसा एहसास कराया।
कभी-कभी लगता है कि भारतीय भोजन केवल पेट नहीं भरता, वह यात्रा में भावनाओं का भी इंतज़ाम करता है। एक गरम रोटी, थोड़ा मसालेदार खाना और चाय का प्याला—बस, आदमी फिर दुनिया जीतने निकल पड़ता है!
### भारत की याद? अभी तो चॉकलेट चल रही है!
स्विट्ज़रलैंड ने हमें कुदरत की शायरी, इंजीनियरिंग की महारत और एक अलग सामाजिक व्यवस्था का अनुभव दिया।
हम पहाड़ देखने आए थे। लेकिन साथ में चॉकलेट हाउस, ज्यूरिख झील, भारतीय भोजन और कई मजेदार अनुभव भी मिल गए।
अब तक इस यात्रा में भारत को बहुत मिस करने का मौका नहीं मिला। जहाँ-जहाँ गए, भारतीय भोजन मिला, भारतीय चेहरे मिले और कहीं न कहीं अपने देश की झलक दिखाई दी।
भारत की शान और तिरंगा अपनी जगह बुलंद हैं। और हम भारतीय, दुनिया के किसी भी कोने में पहुँच जाएँ, अपने स्वाद, अपनी बातचीत और अपने जज़्बे के साथ पहुँचते हैं।
वापस लौटते समय हमारे साथ थीं बर्फीली चोटियों की यादें, झीलों का सुकून, हरी घाटियों की ताज़गी, समय की पाबंद ट्रेनें और पहाड़ों के बीच गूँजता हुआ अपना देश।
स्विट्ज़रलैंड ने एक बात फिर साबित कर दी—कुदरत जब मुस्कुराती है, तो पहाड़ खिल उठते हैं। और जब भारतीय यात्री मुस्कुराता है, तो अगला सवाल होता है:
“चलो ठीक है, अब बताओ… कल खाने में क्या है?”

राइन फॉल्स, स्विस सीढ़ियाँ और बुज़ुर्ग घुटने: नाव की सैर बनी ओलंपिक प्रतियोगिता!

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ज्यूरिख (स्विट्ज़रलैंड) : झरना गरज रहा था। नाव झूम रही थी। और तभी एक सीढ़ी ने हमारे घुटनों के खिलाफ जंग का ऐलान कर दिया!
हम स्विट्ज़रलैंड के शाफहाउज़ेन के पास शानदार राइन फॉल्स देखने आए थे। सोचा था शांतिपूर्ण नाव की सैर होगी। लेकिन देखते-देखते यह सफर रोमांच, सीढ़ियों की चढ़ाई, यातायात की उलझन और आखिर में बचाव अभियान में बदल गया।
और इस पूरे अभियान में हमारे साथ थीं: लेडी मार्था, चाय और समोसे!
झरने के बीच मुफ्त फेसियल
हमारी नाव राइन फॉल्स की ओर बढ़ी। जैसे-जैसे हम विशाल जलप्रपात के करीब पहुंचे, पानी की गर्जना बढ़ती गई।
ऐसा लगा जैसे नदी खुद पुकार रही हो:
“आओ बहादुर इंसानों! मुफ्त फेसियल और थोड़ा-सा दिल का व्यायाम आपका इंतज़ार कर रहा है!”
और प्रकृति ने अपना वादा निभाया।
पानी की महीन बूंदें हवा में तैरती हुई हमारे चेहरों पर पड़ीं। लगा जैसे मदर नेचर खुद दुआएँ दे रही हों। न कोई टिकट, न अपॉइंटमेंट और न पानी का प्रेशर कम-ज्यादा करने की गुंजाइश!
राइन फॉल्स का नज़ारा वाकई दिलकश था। चट्टानों पर पूरी ताकत से गिरता सफेद पानी, चारों तरफ हरियाली और नीचे नीला-सा पानी, नज़ारा रोमांचक भी था और सुकून देने वाला भी।
हमारे कप्तान साहब भी पूरे जोश में थे। उन्होंने हमें झरने के आसपास लगभग तीन चक्कर लगवाए।
हम खूब खुश हुए।
हमें क्या मालूम था कि असली इम्तिहान अभी बाकी है।
वह सीढ़ी जिसे बुज़ुर्गों से शिकायत थी
नाव हमें एक जगह उतारकर चली गई। हमने सोचा, अब आसानी से रेलवे प्लेटफॉर्म और फिर अपनी बस तक पहुँच जाएंगे।
लेकिन सामने एक खड़ी सीढ़ी खड़ी थी।
ऐसी सीढ़ी, जिसे देखकर लगा कि इसे किसी शरारती पर्यटन अधिकारी ने बनाया होगा, जिसे बुज़ुर्ग यात्रियों के घुटनों से खास दुश्मनी हो।
फेरी जा चुकी थी। रास्ता कुछ साफ नहीं था। और सीढ़ियाँ ऊपर ऐसे जा रही थीं जैसे स्विट्ज़रलैंड का अपना एवरेस्ट हो।
हमने सीढ़ियों को देखा।
सीढ़ियों ने हमें देखा।
दोनों पक्ष समझौते के लिए तैयार नहीं थे।
“क्या रेलवे प्लेटफॉर्म ऊपर है?”
“बस कहाँ है?”
“अगली फेरी कब है?”
“किसी ने मेरे घुटनों का आपातकालीन नंबर देखा है?”
चढ़ाई शुरू हुई।
एक सीढ़ी। ठहरो। साँस लो।
दूसरी सीढ़ी। रेलिंग खोजो।
कुछ और सीढ़ियाँ। अब बेंच, चमत्कार या हेलीकॉप्टर, कुछ भी चलेगा!
हमारे घुटनों ने विरोध शुरू कर दिया। फेफड़ों ने बातचीत की। पैरों ने बाकायदा समझौता-पत्र पेश कर दिया:
“यह सब ब्रोशर में नहीं लिखा था!”
यह एवरेस्ट नहीं था, मगर दिन भर घूमने के बाद हमें ऐसा ही महसूस हो रहा था।
राइन फॉल्स ने नाव की सैर कराई थी।
सीढ़ियाँ अब हमें आध्यात्मिक यात्रा पर ले जा रही थीं!
फेरी गई, घबराहट आई
ऊपर पहुँचकर भी राहत नहीं मिली। अब सवाल था कि पानी पार करके अपनी बस तक कैसे पहुँचा जाए।
फेरी जा चुकी थी और रास्ता स्पष्ट नहीं था।
हल्की-सी अफरातफरी शुरू हुई। सवाल उठे: किसने क्या समझा? किसने क्या नहीं समझा? किसे लगा कि फेरी हमारा इंतज़ार करेगी, जैसे कोई शरीफ स्विस घड़ी?
गुस्सा कम था, हैरानी ज़्यादा।
तभी लेडी मार्था मैदान में उतरीं।
हमेशा की तरह शांत और मुस्तैद, उन्होंने तुरंत दूसरी नाव का इंतज़ाम कर दिया।
जान में जान आई।
लेकिन एक पेच था।
हमें जल्दी करना था।
और फिर शुरू हुई दिन की दूसरी खेल प्रतियोगिता।
हम सीढ़ियों से नीचे भागे। हाथों में सामान, चेहरों पर चिंता और साँसों में कमी।
कुछ मिनट पहले हम झरने की खूबसूरती देख रहे थे। अब बचाव नाव की तरफ ऐसे दौड़ रहे थे जैसे ओलंपिक की वरिष्ठ नागरिक स्पर्धा शुरू हो गई हो।
“जल्दी!”
“संभलकर!”
“नाव मत छूटने देना!”
और किसी ने शायद कहा:
“कोई मेरी इज़्ज़त पकड़ लो, तीन सीढ़ियाँ नीचे गिर गई है!”
माहौल गंभीर भी था और बेहद मज़ेदार भी। हम स्विट्ज़रलैंड घूमने आए थे, इबुप्रोफेन प्रायोजित सीढ़ी प्रतियोगिता में हिस्सा लेने नहीं!
खैर, मार्था का इंतज़ाम काम आया। हम नाव से पार पहुँचे और आखिरकार बस तक पहुँच गए।
दिल शांत हुआ। साँस सामान्य हुई। शरीर ने भी फिलहाल युद्धविराम घोषित कर दिया।
बाद में मार्था ने बताया कि पूरी उलझन गलतफहमी के कारण हुई थी। बात समझ में आई तो तनाव भी कम हुआ।
फिर आई चाय की प्याली
इतनी मशक्कत के बाद हमें किसी भाषण या प्रेरक संदेश की जरूरत नहीं थी।
हमें चाहिए थी चाय!
एक बिस्ट्रो में मसाला चाय और समोसे मिले। कई दिनों से यूरोपीय भोजन का लुत्फ उठाने के बाद चाय-समोसे ने जैसे घर वापसी करा दी।
सच पूछिए तो एक अच्छी कप चाय बहस खत्म कर सकती है, थके मुसाफिर को जगा सकती है और भविष्य पर फिर से भरोसा पैदा कर सकती है।
राइन फॉल्स ने रोमांच दिया था।
चाय ने भावनात्मक मरहम लगा दिया।
मार्था का शानदार तोहफा
होटल लौटते समय मार्था ने एक और खूबसूरत सरप्राइज़ दिया। उन्होंने पूरे समूह के लिए एक भारतीय रेस्तराँ में रात के खाने का इंतज़ाम किया।
मेज़ देखते ही लगा जैसे छोटा-सा हिंदुस्तानी त्योहार शुरू हो गया हो।
पानीपुरी, पिज़्ज़ा, चावल, सांभर, रसम, आइसक्रीम, वाइन और बीयर—सब अपनी-अपनी मौजूदगी दर्ज करा रहे थे।
पानीपुरी ने वही परिचित खट्टा-तीखा धमाका किया। सांभर और रसम ने पेट और दिल दोनों को सुकून दिया। चावल ने वह भरोसेमंद आधार दिया, जिस पर सभ्यता टिकी हुई है।
और पिज़्ज़ा?
उसने तो हमारे अंतरराष्ट्रीय खाने में स्थायी वीज़ा हासिल कर लिया है!
हमारी स्वादेंद्रियाँ ऐसे जागीं जैसे शादी में कोई अचानक कह दे: “बुफे खुल गया है!”
दिन भर की थकान, सीढ़ियों की मशक्कत और फेरी की अफरातफरी के बाद यह दावत किसी इनाम से कम नहीं थी।
मार्था की दरियादिली ने थकाऊ दिन को यादगार शाम में बदल दिया।
सफर का असली मज़ा
ब्लैक फॉरेस्ट से राइन फॉल्स तक का सफर सिर्फ खूबसूरत नज़ारों का सफर नहीं था। इसमें हरियाली, ताज़ी हवा, गरजता झरना और प्रकृति की ताकत के बेहद करीब जाने का मौका मिला।
लेकिन साथ में मिली एक अनपेक्षित सीढ़ी यात्रा, थोड़ी अफरातफरी, एक बचाव नाव और साफ संवाद की अहमियत का सबक।
सफर हमेशा तय कार्यक्रम के मुताबिक नहीं चलता। कभी फेरी निकल जाती है, रास्ता गड़बड़ा जाता है और बस तक पहुँचने का छोटा रास्ता एवरेस्ट जैसा लगने लगता है।
फर्क सिर्फ इतना है कि यहाँ नज़ारा शानदार होता है और घुटने बेचारे!
लेकिन यही अनपेक्षित लम्हे बाद में सबसे अच्छी कहानियाँ बनते हैं।
हम राइन फॉल्स देखने आए थे। लौटे तो साथ में झरने की गर्जना, पानी की फुहार, थके हुए पैर और ढेर सारी हँसी थी।
अच्छा टूर गाइड आपको खूबसूरत जगहों तक ले जाता है। महान गाइड मुसीबत में नाव भी मंगाता है और बाद में पानीपुरी भी खिलाता है!
मार्था, आपकी नाव, आपकी मेहरबानी और शानदार दावत के लिए शुक्रिया।
आपने याद दिलाया कि जब सफर की योजना गड़बड़ा जाए, तो सब्र, दोस्ती और एक प्याली चाय सफर को फिर पटरी पर ला सकती है।
हमने राइन फॉल्स देख लिया। सीढ़ियों से भी एक सम्मानजनक मुकाबला कर लिया। नाव पार कर ली। चाय, समोसे और भारतीय दावत से जश्न भी मना लिया।
अब एक बुज़ुर्ग मुसाफिर और क्या माँगे?

पैसे, पढ़ाई और एक चुटकी रोमांस

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फ्रैंकफर्ट–हाइडलबर्ग, (जर्मनी) : एक ही दिन, तीन देश : बिना वीजा, बिना झंझट। हमारी आरामदेह टूरिस्ट बस ने एक ही दिन में फ्रांस, बेल्जियम और नीदरलैंड के किनारे पार किए। रात तक हम जर्मनी के फ्रैंकफर्ट पहुंच चुके थे। न टैंक, न सैनिक , बस कैमरा, नाश्ता, गूगल मैप और उत्सुक भारतीय वरिष्ठ नागरिकों का एक जत्था।
सड़क से यूरोप का असली चेहरा
खिड़की से दौड़ता यूरोप पोस्टकार्ड से अलग दिखता है: कोमल हरियाली, खाने-पीने वाले छोटे गाँव, हवा में मँडराती पवनचक्कियाँ, और बीच-बीच में फैक्ट्रियाँ व गोदाम। रेलवे लाइनों, खेतों और कस्बों की अपनी-अपनी कहानियाँ हैं , महल और गिरजाघर ही सब कुछ नहीं बताते।
नदीयों का बहता इतिहास
टेम्स, सीन, एम्स्टेल और नेकर , ये नदियाँ शहरों का दूसरा चेहरा दिखाती हैं। सड़क से आप शहर देखते हैं, नदी से उसका मूड: लंदन की गंभीरता, पेरिस की रोमांटिक छाँव, एम्स्टर्डम की सहजता, और हाईडलबर्ग में नेकर के साथ पुराने मकानों की शान। साइकिलें, नावें और पतले-लम्बे मकान , सबको अपनी जगह चाहिए।
बस की छोटी-सी कूटनीति
हमारी बस ने तीन देशों की सीमाएँ पार कर दीं , बिना पूछताछ, बिना पासपोर्ट ड्रामे। पर असली ‘कूटनीति’ अंदर चली: मार्था ने यात्रियों से पलक झपकते ही फोटो-स्टॉप, सत्र और परिचय करवा दिए , “माइक लीजिए और अपने बारे में बताइए।” इतने दिन के सहयात्री अचानक परिचित बन गए।
एम्स्टर्डम से फ्रैंकफर्ट: रंग बदलते हैं
एम्स्टर्डम की नहरों और साइकिलों के बाद फ्रैंकफर्ट आभासी तौर पर अलग दुनिया थी , तेज, व्यवस्थित और पैसे का शहर। यह यूरोप का वित्तीय केंद्र है, जहाँ बैंक और कारोबार का बोलबाला है। फिर भी, इसी शहर में गोएथे का जन्मस्थान है , यानी पैसा और साहित्य साथ-साथ चलते हैं। बहुसांस्कृतिक माहौल के कारण खाने की परवाह करने वाले भारतीयों के लिये फ्रैंकफर्ट का ‘रंगोली’ रेस्टोरेंट किसी राहत से कम नहीं था: भरपेट शाकाहारी भोजन और आखिर में बड़ा कटोरा कस्टर्ड।
जलवायु परिवर्तन का सन्देश
यूरोप में गर्मी अब बड़ी चिंता बनती जा रही है। ऊँची-ऊँची इमारतें, अरबों के बैंक मदद नहीं करेंगे जब छाँव, पेड़ और खुले स्थान ज़रूरी हों। तापमान बैंक बैलेंस की परवाह नहीं करता , यही सबसे सादा सच है।
हाईडलबर्ग का धीरे-धीरे स्वागत
फ्रैंकफर्ट छोड़ते ही वातावरण बदल गया: ऊँची इमारतों की जगह पहाड़ियाँ और हरियाली। बस में सन्नाटा, फिर एक आवाज: “वो रहा हीडलबर्ग!” कैमरे फिर बाहर निकले। शहर ने शोर नहीं, शालीनता से परिचय दिया , हरी पहाड़ियाँ, पत्थर की गलियाँ, नेकर पर पुराना पुल और पहाड़ी पर बैठा हीडलबर्ग का किला। यहां इतिहास किताबों में बंद नहीं है; वह गलियों में चलता, पुलों पर ठहरता और नदी में अपना चेहरा देखता है।
फ्रैंकफर्ट और हाइडलबर्ग , दो चेहरे
फ्रैंकफर्ट आधुनिकता, पैसे और गिनती का शहर है; हाइडलबर्ग ज्ञान, इतिहास और थोड़े-से रोमांस का। शायद यही इन दोनों शहरों का जादू है: एक हाथ में बैंक का कैल्कुलेटर, दूसरे में कविता की पंक्ति। और नेकर किनारे खड़ा हाइडलबर्ग धीरे से कहता है: “ज़िन्दगी सिर्फ बैलेंस शीट नहीं है , थोड़ा रोमांस भी ज़रूरी है।”

दिल्ली सरकार और सुरुचि प्रकाशन की शानदार पहल का नाम है, शब्दोत्सव कैफे

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दिल्ली । दिल्ली सरकार और सुरुचि प्रकाशन की शानदार पहल का नाम है शब्दोत्सव कैफे। अभी तो महीना ही लगा है और दिल्ली में राष्ट्रीय विचार रखने वालों के बीच इसकी चर्चा फैल चुकी है। हर शनिवार शाम छह बजे कनॉट प्लेस के हनुमान मंदिर के सामने स्थित कॉफी हाउस में साहित्य, संगीत, कविता और कहानी का एक जीवंत मंच सजता है। यहां लोग अपनी गर्म कॉफी के साथ गीत सुन सकते हैं, कविता का आनंद ले सकते हैं और कहानी में डूब सकते हैं। गीत-संगीत प्रेमियों के लिए प्रवेश निशुल्क है। जिन्हें डोसा, समोसा, चाय या कॉफी टेबल पर चाहिए, उन्हें अपनी जेब ढीली करनी पड़ती है। फिर भी सौदा बुरा नहीं है। यह मंच नए कलाकारों के लिए खुला है। यदि आपमें भी कुछ बात है तो आयोजकों से संपर्क कीजिए। यदि कोई मित्र मंच पर प्रस्तुत कर सकता है तो उसे टैग कर दीजिए। आने की एक ही छोटी शर्त है-दिल में इंडिया धड़कता हो।
शब्दोत्सव कैफे दिल्ली सरकार और सुरुचि प्रकाशन के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित होता है। इसकी सबसे खूबसूरत बात यह है कि यहां कवि, कहानीकार, गायक और अन्य कलाकार अपनी कला प्रस्तुत करते हैं। सुरुचि प्रकाशन दिल्ली सरकार की सहायता से यह मंच उपलब्ध कराता है। माहौल खुला, गर्मजोशी भरा और प्रोत्साहक होता है। दर्शक आते-जाते रहते हैं, कोई कॉफी लेकर आता है, किसी को काउंटर से डोसा बुलाया जाता है और युवा तालियां बजाते हुए गीतों से जुड़ जाते हैं।
पिछले सप्ताह का प्रसंग खास यादगार बना। संचालन विकास कौशिक कर रहे थे। राजीव तुली और अंकुर पाठक व्यवस्था पर नजर रखे हुए थे। मंच के पास अनिल पांडेय, पूजा पुनेठा और गौरव ललित व्यस्त थे। प्रस्तुति चल रही थी और माहौल खुशनुमा था। तभी दर्शकों में बैठी अंजलि को लगा कि वह भी गा सकती है। यह ओपन माइक नहीं था, पर शब्दोत्सव कलाकार की कला का सम्मान करना जानता है। अंजलि मंच पर आई और आयोजकों को निराश नहीं किया।
जब उसने गाना शुरू किया तो उसकी जादुई आवाज ने पूरा माहौल थाम लिया। कुछ पल पहले दर्शकों के बीच बैठी बच्ची कुछ देर बाद मंच की जान बन गई। आयोजकों से लेकर श्रोताओं तक आशीर्वाद बरसा। बात यहीं नहीं रुकी। 19 सितंबर 2026 अंजलि के लिए यादगार दिन बन गया। अब वह श्रोताओं में से नहीं उठी, बल्कि शब्दोत्सव कैफे के पोस्टर पर उसका नाम था। मंच से उसका नाम पुकारा गया और प्रस्तुति को खूब सराहना मिली।
अंजलि को शब्दोत्सव कैफे की खोज कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी। उसकी कहानी दिल्ली के किसी भी ऐसे युवा की हो सकती है जिसे लगता है कि वह मंच पर कमाल कर सकता है। हर शनिवार शाम छह बजे हनुमान मंदिर के सामने कॉफी हाउस में यही कला की महफिल सजती है। इस शनिवार आप भी आइए।

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