सुमित व संगीता की पुस्तकें हुईं लोकार्पित

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दिल्ली। सुपरिचित साहित्यकार सुमित प्रताप सिंह की ग्यारहवीं पुस्तक म्लेच्छ और अन्य लघुकथाएं तथा युवा लेखिका संगीता सिंह तोमर की प्रथम पुस्तक एवं बाल कहानी संग्रह मोटा चश्मा का लोकार्पण हरिहर आश्रम के पीठाधीश्वर श्री श्री 108 बाबा सुयज्ञमुनि जी महाराज के करकमलों द्वारा शुक्रवार, 15 मई 2026 को दिल्ली के कमला मार्केट में स्थित हरिहर उदासीन आश्रम में संपन्न हुआ।

इस अवसर पर वक्तव्य देते हुए महाराज जी ने कहा कि सुमित प्रताप सिंह कई वर्षों से साहित्य सेवा में समर्पित भाव से जुटे हुए हैं तथा उनके द्वारा लिखा गया साहित्य समाज को नई दिशा देने का कार्य कर रहा है। उन्होंने आशा व्यक्त की कि सुमित भविष्य में भी साहित्य के माध्यम से समाज में जागरूकता फैलाने का कार्य निरंतर करते रहेंगे। महाराज जी ने युवा लेखिका संगीता सिंह तोमर को उनकी पुस्तक मोटा चश्मा के प्रकाशन पर बधाई एवं आशीर्वाद देते हुए उज्ज्वल लेखन भविष्य की शुभकामनाएं प्रदान कीं।

सुमित प्रताप सिंह ने आश्रम में उपस्थित भक्तजनों को संबोधित करते हुए कहा कि उनकी इस पुस्तक में जीवन के अच्छे-बुरे अनुभवों एवं विभिन्न घटनाओं से प्रेरित लघुकथाओं का संकलन किया गया है। उन्होंने बताया कि अपनी इस पुस्तक को उन्होंने श्रद्धापूर्वक श्री श्री 108 बाबा सुयज्ञमुनि जी महाराज को समर्पित किया है।

इस अवसर पर युवा पत्रकार प्रवीण कुमार ने दोनों पुस्तकों के विमोचन पर लेखक सुमित प्रताप सिंह एवं लेखिका संगीता सिंह तोमर को शुभकामनाएं देते हुए पाठकों से आग्रह किया कि वे इन पुस्तकों को अवश्य पढ़ें। उन्होंने बताया कि दोनों पुस्तकें अमेजॉन पर उपलब्ध हैं।
कार्यक्रम में सुमित एवं संगीता के पिता पूर्व पुलिसकर्मी एवं समाजसेवी सुरेश सिंह तोमर, पुरबिया समाचार के संपादक मनोज कुमार सिंह, युवा पत्रकार आदित्य भारद्वाज, संजीव असवाल सहित अनेक भक्तगण एवं श्रोता उपस्थित रहे। ज्ञात हो कि दोनों पुस्तकों को दिल्ली के शिवांक प्रकाशन ने प्रकाशित किया है।

न्यूयॉक के सफ़ोल्क काउंटी ने किया नेपाली बेटी ‘देवी प्रतिभा’ को सम्मानित

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मनोज बस्नेत

न्यूयॉर्क (अमेरिका)– भारत में आध्यात्मिक प्रवचन के क्षेत्र में तीसरे स्थान पर गिनी जाने वाली नेपाली बेटी देवी प्रतिभा को अमेरिका के न्यूयॉर्क राज्य के सफ़ोल्क काउंटी (Suffolk County) ने विशेष सम्मान प्रदान किया है। ‘हामी नेपाली इंटरनेशनल’ द्वारा आयोजित और ‘रिवील इवेंट्स आईएनसी’ के सहयोग से न्यूयॉर्क के वुडसाइड में ‘क्रियापुत्री भवन’ (अंतिम संस्कार गृह) और गुम्बा (मठ) निर्माण के लिए धन जुटाने हेतु आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के समापन अवसर पर सफ़ोल्क काउंटी ने उन्हें विशेष सम्मान पत्र देकर सम्मानित किया। 15 से 17 मई तक चले इस श्रीमद्भागवत कार्यक्रम में उन्होंने कथा वाचन किया था।

सफ़ोल्क काउंटी के प्रशासक सैमुअल गोंजालेज द्वारा हस्ताक्षरित सम्मान पत्र में उल्लेख किया गया है— “सुश्री प्रतिभा ने सनातन धर्म के लिए एक वैश्विक राजदूत के रूप में भूमिका निभाई है और अपनी सुंदर प्रस्तुति के माध्यम से दुनिया भर की अनगिनत हिंदू-संबंधित संस्कृतियों को एकीकृत किया है। देवी प्रतिभा ने अपने जीवन के कई वर्ष हिंदू और नेपाली समुदायों के लिए आध्यात्मिक प्रवचन, कथा और प्रेरक भाषणों के माध्यम से समर्पित किए हैं। ये कार्यक्रम आध्यात्मिकता, संस्कृति, भक्ति और सकारात्मक ऊर्जा को जोड़ते हैं, जो आस्था, धर्म और संस्कृति की बाधाओं को पार करते हैं।”

देवी प्रतिभा ने कम उम्र में ही आध्यात्मिकता को अपना लिया था और वह देश-विदेश के धार्मिक कार्यक्रमों में अपने प्रखर प्रवचनों के लिए प्रसिद्ध हो रही हैं। नेपाल के काभ्रेपलाञ्चोक जिले के मण्डनदेउपुर नगरपालिका-10, ज्वानेटार में जन्मी प्रतिभा ने भारत के वृंदावन में संस्कृत व्याकरण में ‘आचार्य’ तक की शिक्षा प्राप्त की है। वह गायन और संगीत में भी निपुण हैं। प्रवचन के दौरान धार्मिक भजनों पर श्रद्धालुओं को झूमने और नाचने पर मजबूर कर देने की उनमें विशेष कला है।

‘हामी नेपाली इंटरनेशनल’ के केंद्रीय अध्यक्ष नवराज केसी ने कहा, “उनका यहाँ सम्मानित होना हम सभी नेपालियों का सम्मान है। उनके द्वारा वाचन की गई श्रीमद्भागवत कथा अत्यंत भव्य और सफल रही।”

कांग्रेस की मुस्लिम-ईसाई पिच पर मंत्रिमंडल का फंदा

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आचार्य श्रीहरि

दिल्ली । केरल में कम्युनिस्टों की सत्ता गई तो कांग्रेस नेतृत्व की सरकार आयी पर हिन्दुओं के लिए कुछ भी नहीं बदला है। कम्युनिस्टों की तरह ही कांग्रेसी ने भी सेक्युलरिज्म का नंगा नाच शुरू कर दिए हैं। हिंदुओं को दोयम दर्जे का नागरिक बनाने का कार्य कांग्रेसी सरकार ने शुरू कर दिया है। कांग्रेसी सरकार के लिए पहले नम्बर पर मुस्लिम हैं, दूसरे नंबर पर ईसाई है, आखिरी नम्बर पर हिंदू है। अनुमान यह लगाया जा रहा है कि कांग्रेसी सरकार हिंदुओं को अपना दुश्मन और संघ बीजेपी के समर्थक मानकर काम करेगी। इसलिए आने वाले समय में हिंदुओं के साथ उपेक्षा बढने वाला है, विकास में भेदभाव बढेगा, भागीदारी कमजोर होगी, सुरक्षा की चुनौतियां खतरनाक और हिंसक होने वाली है, लव जिहाद की घटनाएं बढने वाले है, धर्मांतरण की मार भी पडेगी। कहने का अर्थ यह है कि हिंदुओं के लिए कांग्रेस, कम्युनिस्टों से भी ज्यादा खतरनाक और जहरीला साबित होगी।

केरल कांग्रेस सरकार द्वारा सेक्युलरिज्म की नंगा नाच की बात सच है या फिर कोरी कल्पना है? अभी अभी तो कांग्रेस की सरकार बनी है फिर सेक्युलरिज्म की नंगा नाच की बात कहा से आ गई? यह कोरी कल्पना नहीं है, सौ आने सही बात है। साक्षात प्रमाण है। साक्षात प्रमाण देखिए फिर आपको सेक्युलरिज्म का नंगा नाच भी दिखेगा और कांग्रेस की हिंदुओं के साथ दुश्मनी भी दिखेगी और भेदभाव भी दिखेगा। प्रमाण तो कांग्रेस का मंत्रिमंडल है। मंत्रिमंडल में हिंदुओं को सर्वश्रेष्ठ भागीदारी मिलने की उम्मीद थी, पर उचित भागीदारी भी नहीं मिली। हिंदू धर्म का प्रतिनिधित्व करने वाले सिर्फ छह लोगों को कांग्रेस सरकार में जगह मिली है जबकि मुस्लिम और ईसाई वर्ग से सात सात लोगो को मंत्रिमंडल में जगह मिली है। जनसंख्या की कसौटी पर भी यह न्यायसंगत नहीं है और अत्याचार है। केरल की जनसांख्यिकी परिधि और परिस्थितियों को देखना जरूरी ही नहीं है बल्कि अनिवार्यता भी है। केरल में अभी भी हिंदू सर्वश्रेष्ठ है, जनसंख्या इनकी मुस्लिम और ईसाई आबादी से बडी है, मुस्लिम आबादी से तो दुगनी है। हिंदुओं की आबादी 55 प्रतिशत से ही ज्यादा है, मुस्लिम आबादी 27 प्रतिशत, ईसाई आबादी 18 प्रतिशत है। मंत्रिमंडल में मुस्लिम आबादी और ईसाई आबादी को तरजीह देने और हिंदू आबादी को सीमित रखने का संदेश क्या है? जबकि केरल की सत्ता परिवर्तन में हिंदुओं की भूमिका अग्रणी रही है, हिंदुओं ने परिवर्तन के पक्ष में वोट किया, कांग्रेस गठबंधन की किस्मत चमकाई, कम्युनिस्ट गठबंधन की कब्र खोदी। अगर 55 प्रतिशत आबादी एक साथ कम्यूनिस्टों को वोट कर दिया होता तो फिर क्या केरल में कांग्रेस की सरकार बनती?

यह कांग्रेसी की केंद्रीय कृत राजनीति का ही प्रकटीकरण है। मुस्लिम तुष्टिकरण करण और ईसाई तुष्टिकरण का लोमहर्षक प्रदर्शन है। हिंदूद्रोह तो कांग्रेस की जन्मजात रीती नीति रही है। जवाहरलाल नेहरू ने इसे अपना राजनीतिक हथियार बनाया था। जवाहरलाल नेहरू कहते थे कि हम गलती से हिंदू धर्म में जन्म लिया हूँ, स्वभाव और मन से हिंदू नहीं बल्कि मुस्लिम हूं, इस्लाम के नजदीक हूँ, क्योंकि इस्लाम मुझे प्रभावित करता है। मुस्लिम तुष्टिकरण के लिए नेहरू ने संविधान में भी विशेष व्यवस्थाएं कराई थी। मुसलमानों को चार शादियां करने का सौगात दिया था। इंदिरा गांधी से लेकर मनमोहन सिंह, सोनिया गांधी तक यह कडी टूटी नहीं। मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी ने मिलकर हिंदुओं के संहार करने का सपना देखा था। दंगा रोधी विधेयक के माध्यम से हिंदुओं के अस्तित्व को ही कुचलने का सपना देखा था। नरेंद्र मोदी ने कांग्रेस पर विजय प्राप्त नहीं की होती तो फिर हिंदुओं के अस्तित्व संहार का इनका सपना पूरा भी हो सकता था। प्रचंड हिंदुत्व के प्रवाह ने राहुल गांधी को हारने के लिए बाध्य कर दिया। स्मृति ईरानी ने राहुल गांधी को अमेठी से खदेड दिया था। राहुल गांधी ने मुस्लिम बहुलता वाली लोकसभा सीट वायनाड चुनी। मुस्लिम आबादी ने बहुलता की शक्ति का प्रदर्शन कर लोकसभा भेज दिया, वायनाड से अभी सांसद राहुल गांधी की बहन प्रियंका गांधी है। राहुल गांधी ने वायनाड सीट इसीलिए चुनी थी कि क्योंकि वह सीट मुस्लिम बहुल थी, मुस्लिम बहुल होने के कारण उनकी जीत की गारंटी थी। कांग्रेस के हिंदू आतंक की थ्योरी भी कुख्यात रही है। मुस्लिम आतंकवाद को कभी भी इस्लाम से नहीं जोडा, पर प्रत्यारोपित हिंदू आतंक को हिन्दू धर्म से जरूर जोड दिया। जबकि हिंदू आतंक एक फर्जी और हिंदू लक्षित सोच से निकला हुआ कांग्रेसी शब्द था। हिंदू आतंक पर बोलने वाले कांग्रेसी नेता और मनमोहन सरकार में गृह मंत्री रहे सुशील कुमार शिंदे ने कहा था कि हिंदू आतंक नाम की कोई चीज ही नहीं थी, मेरी पार्टी यानी कांग्रेस ने मुझे हिंदू आतंक को स्थापित करने के लिए कहा था, इसीलिए मैने पार्टी फरमान का पालन करते हुए हिंदू आतंक को स्थापित कर दिया। केरल मे कांग्रेस हमेशा से मुस्लिम समर्थक पार्टी मानी जाती है।

एक बडा प्रश्न यह है कि केरल में मुस्लिम आबादी कांग्रेस को समर्थन क्यों करती है और इनके प्रति सहानुभूति क्यों रखती है, मुस्लिम आबादी को कम्यूनिस्टों का साम्यवाद और धर्म एक अफीम है कि थ्योरी क्यों नहीं पसंद आई?हालांकि कम्युनिस्टों ने भी चुनाव राजनीति की सफलता के लिए अपने निर्धारित सिद्धांत से समझौता किया था और मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति खेली थी। तत्कालीन कम्युनिस्ट सरकार के मुख्यमंत्री विजयन की बेटी ने मुस्लिम से शादी की थी, विजयन ने इसका लाभ उठाने की भी कोशिश की थी। लेकिन कम्युनिस्टों का विकल्प मुस्लिम आबादी के सामने था, क्योकि कम्युनिस्ट सिर्फ सीमित स्तर पर तुष्टिकरण कर सकते थे पर कांग्रेस परिधि मुक्त तुष्टिकरण करने की लिए तैयार थी। इसी कारण मुस्लिम आबादी कांग्रेस को चुनी। जहा तक ईसाई समुदाय के झुकाव की बात है तो फिर कम्युनिस्टों के विकासहीन नीति ने उन्हें विरोधी बनाया और कांग्रेस के लिए लाभकारी बन गये। लेकिन मुस्लिम और ईसाई एकता ज्यादा दिनों तक चलने वाली नहीं है। लव जिहाद और धर्मातंरण तथा मुस्लिम आतंकवाद को लेकर ईसाइयों और मुस्लिम आबादी के बीच जिहाद छिड सकता है, शह मात का खेल शुरू हो सकता है। लव जिहाद को लेकर ईसाई समुदाय भी वही सोच रखती है जो सोच हिन्दू वर्ग रखता है। मुस्लिम आतंकवादियों ने केरल में एक ईसाई प्रोफेसर का हाथ काट देने का दुस्साहस किया था जिन्होंने इस्लाम के प्रेरणा पुरूष के खिलाफ कोई असुविधाजनक प्रश्न पत्र बनाये थे।

कांग्रेस ने केरल में पश्चिम बंगाल और ममता बनर्जी के उदाहरण से कुछ भी नहीं सीखा है। अगर पश्चिम बंगाल और ममता बनर्जी के उदाहरण से सबक लिया होता तो फिर निश्चित तौर पर केरल मे मुस्लिम और ईसाई सर्वश्रेष्ठता वाली रणनीति नहीं बनायी होती और मंत्रिमंडल का आकार संतुलित होता। ममता बनर्जी भी ऐसी ही रणनीति के वाहक और अभियानी थी। ममता बनर्जी ने सोच लिया था कि पश्चिम बंगाल की 29 प्रतिशत मुस्लिम आबादी उनकी सत्ता को अपराजित बनाते रहेगी। मुस्लिम आबादी के खिलाफ प्रतिक्रिया हुई, हिन्दुत्व की गोलबंदी हुई। हिन्दुत्व के प्रचंड प्रवाह में ममता बनर्जी की सरकार बह गयी। कांग्रेस हिन्दुत्व के प्रचंड प्रवाह में ही केन्द्रीयकृत सरकार से बाहर हुई थी, कई राज्यों में कांग्रेस की हार के पीछे हिन्दुत्व का प्रचंड प्रवाह ही माना जाता है। हिन्दुओं की एकता के सामने असम में भी कांग्रेस की वापसी नहीं हो सकी। केरल में भाजपा आक्रामक तौर पर खडी है। भाजपा ने स्वयं के बल पर दो विधान सभा सीटों पर जीत हासिल की थी, कई विधान सभा सीटों पर भाजपा का प्रदर्शन भी उल्लेखनीय रहा है। अगर भाजपा थोडी सी भी मजबूत होती तो फिर कांग्रेस के लिए उम्मीद ना उम्मीदी में तब्दील हो जाती। भाजपा भी जनाधार के आधार पर तीसरी शक्ति जरूर है। त्रिपुरा में भी भाजपा ने जीरो से शुरू कर कम्युनिस्ट सरकार की कब्र खोद डाली थी और त्रिपुरा में अपनी सरकार बनायी थी। केरल में भाजपा के पास लोकसभा सीट भी है। केरल की राजधानी त्रिवनतपुरम नगर निगम पर भाजपा का कब्जा है। ये सभी राजनीतिक परिस्थितियां यह साबित करने के लिए काफी हैं कि भाजपा उतनी कमजोर तो कतई नहीं जितनी कमजोर कांग्रेस मानती है। भाजपा ने कांग्रेस मंत्रिमंडल को ईसाई और मुस्लिम सर्वश्रेष्ठता को लेकर प्रश्न भी उठाना शुरू कर दिया है। भाजपा ने विशेष अभियान भी चलाया है। सोशल मीडिया पर इसकी बडी चर्चा हुई और कांग्रेस को हिन्दू विरोधी पार्टी घोषित कर दिया गया है। केरल के हिन्दुओ में इसकी नाराजगी देखी जा रही है। अगर केरल की 55 प्रतिशत हिन्दू आबादी भाजपा के वोटर बन जायेगी तो फिर क्या कांग्रेस की सरकार स्थायी रह सकती है?, कांग्रेस सरकार गतिशील रह सकती है? निश्चित तौर पर भाजपा केरल में अपनी सरकार बनाने की संभावनाएं बनायेगी, पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा और असम की तरह अपनी सरकार बना सकती है, कांग्रेस की सरकार की कब्र खोद सकती है। कांग्रेस ने आत्मघाती राजनीति खेल कर अपनी मौत का फंदा ही बनाया है।

( यह लेख जागरूकता एवं ज्ञानार्जन के लिए प्रेषित है, इसका व्यवसायिक उपयोग प्रतिबंधित है और कॉपी राइट एक्ट के दायरे में है )

Marital Rape : कानून से आगे का सामाजिक औरसांस्कृतिक प्रश्न

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बी कृष्णा

दिल्ली । “हमें शब्दों की ठीक-ठीक समझ होनी चाहिए, उनके वास्तविक अर्थ औरभाव को जानना चाहिए।”

यह वाक्य केवल भाषाई सावधानी का आग्रह नहीं है; यह एक गहरीबौद्धिक चेतावनी है। क्योंकि शब्द केवल संवाद का माध्यम नहीं होते, वेविचारों की दिशा तय करते हैं, समाज की चेतना गढ़ते हैं और धीरे-धीरेसभ्यताओं की संरचना तक को प्रभावित करने लगते हैं।

आज भारत में “Marital Rape” को लेकर जो बहस चल रही है, वहकेवल एक कानूनी संशोधन का प्रश्न नहीं है। यह भाषा, संस्कृति, विवाहसंस्था, परिवार व्यवस्था और राज्य की सीमाओं से जुड़ा हुआ एक गहरासभ्यतागत विमर्श है। इस विषय पर न्यायालयों में याचिकाएँ दायर हैं औरसरकार पर भी दबाव है कि “Marital Rape” को एक पृथक आपराधिकश्रेणी के रूप में मान्यता दी जाए। परंतु इस पूरी बहस में सबसे पहले यहसमझना आवश्यक है कि हम किन शब्दों का प्रयोग कर रहे हैं और उनशब्दों के पीछे कौन-सी वैचारिक संरचनाएँ कार्य कर रही हैं।

“Marital” शब्द “Marriage” से आया है। “Marriage” की आधुनिकअवधारणा मुख्यतः पश्चिमी विधिक चिंतन की उपज है, जहाँ विवाह कोमूलतः एक कानूनी अनुबंध के रूप में देखा गया। यह अधिकारों, दायित्वोंऔर व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर आधारित संरचना है। इसके विपरीत भारतीयपरंपरा में “विवाह” कभी मात्र अनुबंध नहीं रहा; यह संस्कार है। ऐसासंस्कार जिसमें केवल दो व्यक्ति नहीं जुड़ते, बल्कि दो परिवार, दो वंश, दोजीवन-दृष्टियाँ और दो उत्तरदायित्व जुड़ते हैं। यहाँ संबंध का आधारकेवल अधिकार नहीं, बल्कि धर्म, मर्यादा, संयम, सह-अस्तित्व और कर्तव्यभी है।

यही कारण है कि “Marriage” और “विवाह” को बिना संदर्भ के समानमान लेना एक गंभीर बौद्धिक भूल हो सकती है। क्योंकि जब शब्द बदलतेहैं, तो उनके साथ समाज की संबंध-दृष्टि भी बदलने लगती है। संस्कारधीरे-धीरे अनुबंध में बदल जाता है और संबंध साझेदारी से अधिकअधिकार-आधारित कानूनी संरचना बन जाते हैं।

“Marital Rape” की आधुनिक अवधारणा इसी पाश्चात्य वैधानिक ढाँचेसे उत्पन्न हुई है, जहाँ “Consent” अर्थात् स्पष्ट सहमति को सर्वोच्च तत्वमाना गया। इस दृष्टिकोण में यदि वैवाहिक संबंध के भीतर भी किसी पक्षकी इच्छा के विरुद्ध शारीरिक संबंध स्थापित किया जाता है, तो उसेअपराध माना जाता है। यहाँ संबंध की प्रकृति गौण हो जाती है और केंद्र मेंव्यक्ति की शारीरिक स्वायत्तता आ जाती है।

निस्संदेह किसी भी प्रकार की हिंसा, जबरदस्ती या अमानवीय व्यवहार कोउचित नहीं ठहराया जा सकता। विवाह किसी भी प्रकार की क्रूरता कालाइसेंस नहीं हो सकता। परंतु भारत में प्रश्न केवल इतना नहीं है कि“सहमति” आवश्यक है या नहीं। प्रश्न इससे कहीं बड़ा है – क्या भारतीयविवाह संस्था को उसी वैचारिक ढाँचे में पुनर्परिभाषित किया जा रहा है, जिसमें पश्चिमी समाजों ने अपने संबंधों को देखा?

यहीं यह विमर्श केवल कानूनी नहीं, बल्कि सभ्यतागत बन जाता है।

भारतीय भाषिक परंपरा में “बलात्कार” शब्द केवल यौन हिंसा का द्योतकनहीं है। यह किसी की इच्छा, स्वतंत्रता और गरिमा के विरुद्ध किया गयाहस्तक्षेप है ; चाहे वह शारीरिक हो, मानसिक हो या सामाजिक।भारतीय चिंतन संबंधों को केवल शरीर तक सीमित करके नहीं देखता; वहमन, धर्म, मर्यादा और सामाजिक संतुलन को भी साथ लेकर चलता है।

यदि हम भारतीय शास्त्रीय परंपरा को देखें, तो यह स्पष्ट होता है कि यहाँविवाह को कभी निरंकुश अधिकार नहीं माना गया। कौटिल्य के अर्थशास्त्रमें पति-पत्नी के व्यवहार, संसर्ग और दायित्वों को लेकर स्पष्ट मर्यादाएँनिर्धारित की गई थीं। वहाँ यह भी कहा गया कि किन परिस्थितियों में पतिका व्यवहार दंडनीय हो सकता है और किन स्थितियों में स्त्री पति कापरित्याग कर सकती है। अर्थात् भारतीय परंपरा ने संबंधों के भीतरसंतुलन, मर्यादा और उत्तरदायित्व की आवश्यकता को स्वीकार किया था।

भारतीय समाज में विवाह केवल दो व्यक्तियों का निजी मामला नहीं रहा; यह सामाजिक स्थिरता की मूल इकाई रहा है। दाम्पत्य जीवन कीजटिलताओं को सुलझाने के लिए यहाँ एक सामाजिक-सांस्कृतिकव्यवस्था विकसित हुई थी, जहाँ पति-पत्नी, परिवार, बुज़ुर्ग और समुदायअनेक स्तरों पर संवाद और समाधान की प्रक्रिया का हिस्सा होते थे।संबंधों को केवल दंड और अपराध की दृष्टि से नहीं, बल्कि संतुलन, समझऔर सामाजिक उत्तरदायित्व की दृष्टि से भी देखा जाता था।

यहीं आधुनिक विमर्श का सबसे बड़ा प्रश्न उभरता है – क्या हर वैवाहिकजटिलता का समाधान केवल आपराधिक कानून है?

क्या राज्य धीरे-धीरे व्यक्ति के सबसे निजी क्षेत्र, उसके परिवार और उसकेbedroom तक हस्तक्षेप का अधिकार प्राप्त कर रहा है?

और यदि ऐसा होता है, तो इसका प्रभाव केवल न्यायिक प्रक्रिया तकसीमित रहेगा या भारतीय परिवार व्यवस्था की मनोवैज्ञानिक औरसांस्कृतिक संरचना को भी बदल देगा?

इसी संदर्भ में “Marital Rape” का वर्तमान विमर्श केवल एक कानूनीबहस नहीं, बल्कि सांस्कृतिक मार्क्सवाद की उस वैचारिक पृष्ठभूमि सेजुड़ा हुआ दिखाई देता है, जो परिवार, विवाह और परंपरा जैसी संस्थाओंको सहयोग और सह-अस्तित्व के आधार पर नहीं, बल्कि संघर्ष औरशक्ति-संतुलन के ढाँचे में देखती है। इसी दृष्टिकोण में पति-पत्नी कासंबंध भी आत्मीयता, कर्तव्य और मर्यादा का संबंध न रहकर “power dynamics” अर्थात् अधिकार और नियंत्रण के संघर्ष के रूप में प्रस्तुतकिया जाने लगता है। परिणामस्वरूप विवाह जैसी सामाजिक-सांस्कृतिकसंस्था धीरे-धीरे विश्वास और संतुलन की इकाई से संदेह और वैधानिकहस्तक्षेप की इकाई में परिवर्तित होने लगती है। सांस्कृतिक मार्क्सवाद कायह रूप इसलिए भी गंभीर है क्योंकि यह परिवार और विवाह जैसीसंस्थाओं को संदेह के दायरे में खड़ा करता है। परिणामस्वरूप वे संस्थाएँ, जो लंबे समय तक सामाजिक स्थिरता और भावनात्मक सुरक्षा का आधारथीं, धीरे-धीरे वैधानिक निगरानी और वैचारिक संघर्ष का क्षेत्र बनने लगतीहैं। यही कारण है कि “Marital Rape” को कानून के अंतर्गत लाने केलिए चल रहा आंदोलन केवल महिला अधिकारों का प्रश्न नहीं, बल्किविवाह संस्था की पुनर्व्याख्या का प्रश्न भी बन गया है।

यहाँ यह भी उतना ही आवश्यक है कि समाज स्त्री की गरिमा, उसकीसुरक्षा और उसकी इच्छा की पूर्ण रक्षा सुनिश्चित करे। परंतु समाधानखोजते समय भारत अपनी सभ्यतागत संरचना, सांस्कृतिक मनोविज्ञानऔर संबंध-आधारित सामाजिक व्यवस्था को न भूले।

भारत की परंपरा केवल कानून-आधारित समाज नहीं रही; यहसंबंध-आधारित समाज रही है। यहाँ अधिकारों के साथ कर्तव्य, स्वतंत्रताके साथ मर्यादा और व्यक्तिवाद के साथ सामाजिक उत्तरदायित्व को भीसमान महत्व दिया गया। यदि हम केवल आयातित शब्दावली औरपाश्चात्य वैचारिक ढाँचों के आधार पर भारतीय संबंधों को पुनर्परिभाषितकरेंगे, तो संभव है कि हम समस्या का समाधान खोजने के साथ-साथअपनी सामाजिक संरचना की जड़ों को भी कमजोर कर दें।

इसलिए आवश्यकता केवल कानूनी निर्णय की नहीं है। आवश्यकता इसबात की है कि भारत इस पूरे विषय पर अपनी सभ्यतागत चेतना, अपनीभाषा और अपने सामाजिक अनुभवों के आधार पर गंभीर पुनर्विचार करे।क्योंकि अंततः यह केवल “Marital Rape” का प्रश्न नहीं है; यह इस बातका प्रश्न है कि आने वाले भारत में विवाह को संस्कार माना जाएगा याकेवल अनुबंध।

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