डीयू में अभाविप की प्रचंड विजय : राष्ट्रीय विचारों के साथ है युवा शक्ति

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अनंत सोनी

दिल्ली । दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ चुनाव के परिणाम केवल एक विश्वविद्यालय के चुनावी नतीजे नहीं हैं, बल्कि वे देश के युवाओं की सोच, उनकी प्राथमिकताओं और छात्र राजनीति के प्रति उनके दृष्टिकोण को भी अभिव्यक्त करते हैं। वास्तव में ये जीत राष्ट्रीयता के मंत्र की जीत है। ये जीत भारत के मूल विचार की जीत है। ये विभाजन के विरुद्ध सृजन की जीत है। ये जीत दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ में विजय प्राप्त करने वाले अध्यक्ष पद के प्रत्याशी यश दबास, सचिव पद की प्रत्याशी रिया छाबड़ा, सह सचिव तथा समस्त अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के कार्यकर्ताओं की विजय।

पिछले कुछ समय से यह चर्चा लगातार चल रही थी कि युवाओं की सोच बदल रही है?‌ तथाकथित “Gen Z” के नाम पर अनेक मंचों पर यह दावा किया जा रहा था कि नई पीढ़ी राष्ट्रीय विचारों और सकारात्मक छात्र राजनीति से दूर हो रही है। विभिन्न नकारात्मक आंदोलनों और सार्वजनिक विमर्शों के माध्यम से भी ऐसा वातावरण बनाने का प्रयास किया गया कि देश का युवा एक अलग वैचारिक दिशा में आगे बढ़ रहा है। किंतु दिल्ली विश्वविद्यालय के चुनाव परिणामों ने इन धारणाओं को ध्वस्त कर दिया है।
राष्ट्रीयता का शंखनाद हुआ है। टुकड़े-टुकड़े गैंग घुटनों पर आया है।

दरअसल, दिल्ली विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों ने अपने मत के माध्यम से स्पष्ट संदेश दिया है कि वे केवल नारों और प्रचार से प्रभावित नहीं होते, बल्कि संगठन के कार्य, उसकी कार्यपद्धति और छात्र हित में किए गए प्रयासों के आधार पर निर्णय लेते हैं। विद्यार्थी परिषद ने वर्षों से छात्र समस्याओं के समाधान, शैक्षणिक सुधार, राष्ट्र निर्माण और सकारात्मक छात्र नेतृत्व के विकास के लिए जो कार्य किया है। अभाविप की इसी निष्ठा पर विद्यार्थियों ने एक बार फिर अपना विश्वास व्यक्त किया है।

युवाओं का यह विश्वास किसी एक चुनावी अभियान का परिणाम नहीं है। विद्यार्थियों को भली-भांति ज्ञात है कि – अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद केवल चुनाव के समय परिसर में दिखाई देने वाला संगठन नहीं है। बल्कि वर्ष के 365 दिन छात्र हितों और समाज जीवन के विभिन्न विषयों पर सक्रिय रहने वाला छात्र संगठन है। विद्यार्थी परिषद अपने विविध आयामों और गतिविधियों के माध्यम से विद्यार्थियों के बीच निरंतर कार्य करती है।

विद्यार्थी परिषद का स्टूडेंट्स फॉर डेवलपमेंट (SFD) आयाम जल, जंगल, जमीन, जन और पर्यावरण संरक्षण जैसे विषयों पर कार्य करता है। स्टूडेंट्स फॉर सेवा (SFS) समाज के वंचित और जरूरतमंद वर्गों तक सेवा गतिविधियों को पहुंचाने का कार्य करता है। कला मंच कला, साहित्य और सांस्कृतिक क्षेत्र से जुड़े विद्यार्थियों को मंच प्रदान करता है, जबकि खेलो भारत के माध्यम से खेल प्रतिभाओं को प्रोत्साहित करने और खेल संस्कृति को बढ़ावा देने का प्रयास किया जाता है।

इसके साथ ही विद्यार्थी परिषद केवल गतिविधियों तक सीमित नहीं रहती, बल्कि शिक्षा के मूलभूत प्रश्नों पर भी गंभीरता से कार्य करती है। परिषद पाठ्यक्रम सुधार, शिक्षा व्यवस्था में आवश्यक परिवर्तन, परीक्षा प्रणाली में सुधार, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, शोध एवं नवाचार को बढ़ावा देने जैसे विषयों पर लगातार आवाज उठाती रही है। विद्यार्थी परिषद एजुकेशन रिफॉर्म की बात करती है, एग्जामिनेशन रिफॉर्म की बात करती है, नई शिक्षा नीति के प्रभावी क्रियान्वयन की बात करती है और विद्यार्थियों को बेहतर शैक्षणिक वातावरण उपलब्ध कराने के लिए निरंतर प्रयास करती है। यही कारण है कि विद्यार्थी परिषद को विद्यार्थियों का समर्थन केवल चुनावी समय में नहीं, बल्कि पूरे वर्ष किए गए उसके निरंतर कार्यों के आधार पर प्राप्त होता है।

यह परिणाम केवल दिल्ली विश्वविद्यालय तक सीमित नहीं हैं। इससे पूर्व पंजाब विश्वविद्यालय सहित देश के अनेक शिक्षण संस्थानों में भी विद्यार्थियों ने विद्यार्थी परिषद को समर्थन दिया है। यह दर्शाता है कि देश का युवा रचनात्मक कार्य, संगठनात्मक प्रतिबद्धता और राष्ट्रहित से जुड़े मुद्दों को महत्व देता है। यह परिणाम इस बात का भी प्रमाण है कि भारतीय युवा आज भी अपने राष्ट्र, अपनी संस्कृति और समाज के प्रति उत्तरदायित्व की भावना रखता है।

आज आवश्यकता है कि छात्र राजनीति केवल विरोध तक सीमित न रहकर शिक्षा, शोध, नवाचार, रोजगार और राष्ट्र निर्माण जैसे विषयों पर केंद्रित हो। विद्यार्थी परिषद लंबे समय से इसी दिशा में कार्य करती आई है और यही कारण है कि विद्यार्थियों का विश्वास संगठन के प्रति लगातार बढ़ता दिखाई देता है। दिल्ली विश्वविद्यालय के चुनाव परिणाम यह संदेश देते हैं कि भारत का युवा जागरूक है, विचारवान है और राष्ट्र के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को समझता है। यह विजय केवल एक चुनावी सफलता नहीं, बल्कि छात्र हित, सकारात्मक कार्यशैली और राष्ट्र निर्माण के प्रति समर्पित विचारों में विद्यार्थियों के विश्वास का प्रतीक है। यह विजय बता रही है कि – देश की युवा तरुणाई- संघ शक्ति के साथ है‌। राष्ट्रीय विचारों के साथ है। ये परिणाम केवल अभाविप की विजय का परिणाम नहीं है बल्कि अराजकता, उपद्रव और हिंसा की सोच के ख़िलाफ़ — भारत बोध का परिणाम है। अभाविप संकल्पित है कि हम परिसर-परिसर जाएंगे। भारत मां की जयकार लगाएंगे और हर विभाजन के विरुद्ध दीवार बनकर खड़े रहेंगे। ये परिणाम बता रहे हैं कि भारत की युवा शक्ति किसी बहकावे में नहीं आएगी। वो सृजन के साथ राष्ट्र निर्माण के पथ पर अग्रसर है। ये क्रम अबाध जारी रहेगा।

( लेखक अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद छत्तीसगढ़ के प्रदेश मंत्री हैं )

भरोसे का सौदा : भारत में विदेशी ‘नेस्ले’ का उपभोक्ताओं के साथ धोखा !

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डॉ. मयंक चतुर्वेदी

भोपाल। भारतीय खाद्य सुरक्षा नियामक (एफएसएसएआई) ने देश के सबसे बड़े और बहुराष्ट्रीय ब्रांड्स में से एक, नेस्ले इंडिया लिमिटेड के खिलाफ शिशु पोषण उत्पादों में खाद्य सुरक्षा मानकों का उल्लंघन करने पर तीन अलग-अलग न्यायनिर्णयन (adjudication) मामले दर्ज किए हैं। यह कानूनी कार्रवाई देश के उन मासूम नवजातों की सेहत से जुड़ी है, जो खुद बोलकर अपनी तकलीफ बयां नहीं कर सकते।

इसमें सबसे बड़ी चिंता की बात यह है कि यह कोई इकलौती घटना नहीं है। यह उस लंबी फेहरिस्त की एक और कड़ी है, जोकि समय-समय पर यह सोचने को मजबूर करती है कि क्या भारत जैसे विशाल विकासशील देश को बहुराष्ट्रीय कंपनियां सिर्फ एक बड़ा ‘मुनाफा कमाने का बाजार’ मानती हैं? 1912 से शुरू हुई अपनी 114 साल से अधिक लंबी यात्रा में आज ₹23,194.95 करोड़ से अधिक का वार्षिक टर्नओवर रखती है। अब यह कंपनी किस तरह भारतीय उपभोक्ताओं के भरोसे, सेहत और उनकी जेब के साथ कथित तौर पर धोखा करती आई है, वास्‍तव में आज सामने आए आंकड़ें इस संबंध में बहुत कुछ सोचने पर मजबूर कर रहे हैं।

‘मेक इन इंडिया’ की आड़ में दोहरे मापदंड

नेस्ले के व्यापारिक सफर की सबसे बड़ी कड़वी सच्चाई यह है कि वह विकसित यूरोपीय देशों के नागरिकों के लिए उच्च स्वास्थ्य मानक रखती है, जबकि भारत जैसे विकासशील देशों के उपभोक्ताओं के लिए बिल्कुल अलग और हानिकारक नीति अपनाती है। एक स्विस खोजी एनजीओ की रिपोर्ट में यह पहले ही खुलासा हो चुका है कि नेस्ले अपने सबसे प्रसिद्ध शिशु आहार ब्रांड ‘सेरेलैक’ के निर्माण में दोहरी नीति अपनाता है।

कंपनी जर्मनी, ब्रिटेन, फ्रांस और स्विट्जरलैंड जैसे अमीर यूरोपीय देशों में जो सेरेलैक बेचती है, उसमें ऊपर से एक ग्राम भी अतिरिक्त चीनी नहीं मिलाई जाती। इसके विपरीत, वही सेरेलैक जब भारत के माता-पिता अपने छह महीने के मासूम बच्चे के लिए खरीदते हैं, तो उसमें प्रति सर्विंग 2.7 ग्राम से तीन ग्राम तक अतिरिक्त रिफाइंड चीनी छिपी होती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्‍ल्‍यूएचओ) की गाइडलाइंस कहती हैं कि शिशुओं को दो साल की उम्र तक किसी भी तरह की अतिरिक्त चीनी नहीं दी जानी चाहिए। नेस्ले ने भारतीय बच्चों के स्वाद ग्रंथियों को जानबूझकर चीनी का आदी बनाया ताकि उनके उत्पाद की बिक्री लगातार बढ़ती रहे, भले ही इसके परिणामस्वरूप बच्चों में बचपन का मोटापा, दांतों की सड़न और भविष्य में डायबिटीज का खतरा पैदा हो जाए। यानी कि आज भारत में जिन बच्‍चों के दांत खराब हो रहे हैं, आप मान सकते हैं कि इसके लिए कहीं न कहीं ये कंपनी जिम्‍मेदार है।

भ्रामक मार्केटिंग और ममता का बाजारीकरण

भारत का कानून इन्फेंट मिल्क सब्स्टीट्यूट्स (आईएमएस) एक्ट, 1992 और एफएसएसएआई रेगुलेशन, 2020 नवजात शिशुओं के फॉर्मूला मिल्क के किसी भी प्रकार के व्यावसायिक विज्ञापन या उसे स्तनपान से बेहतर बताने वाले दावों पर पूरी तरह रोक लगाता है। इसके पीछे वैज्ञानिक कारण यह है कि मां का दूध ही शिशु के लिए सर्वोत्तम है। इसके बावजूद, नेस्ले इंडिया ने भारतीय उपभोक्ताओं को गुमराह करने के लिए भ्रामक विज्ञापनों का सहारा लिया।

कंपनी ने अपने NAN Excella Pro Stage 1 उत्पाद पर ‘5 HMOs’ और ‘व्हे प्रोटीन’ के बड़े-बड़े दावे करके माताओं को यह भरोसा दिलाने की कोशिश की कि यह डिब्बाबंद दूध मां के प्राकृतिक दूध जैसा ही शक्तिशाली है। इसी तरह, Lactogen Pro 1 के प्रचार में गैर-प्रमाणित रूप से लिखा गया कि इसका व्हे प्रोटीन “पचने में बेहद आसान” होता है. एक मां अपने बच्चे के स्वास्थ्य के लिए सबसे अच्छी चीज खरीदना चाहती है, किंतु नेस्ले ने अपनी भारी-भरकम और भ्रामक वैज्ञानिक शब्दावली के जरिए भारतीय माताओं के मन में यह भ्रम पैदा किया, जोकि पूरी तरह से गैर-कानूनी प्रचार स्टंट और उपभोक्ता अधिकारों का हनन है।

पोषक तत्वों में कटौती और गुणवत्ता के साथ खिलवाड़

जब बात बच्चों या आम जनता के भोजन की हो, तो शुद्धता के मानकों पर 100 फीसद खरा उतरना अनिवार्य है, लेकिन नेस्ले इंडिया का ट्रैक रिकॉर्ड बताता है कि उसने कई मौकों पर भारतीय मानकों को हल्के में लिया। एफएसएसएआई की प्रयोगशाला जांच रिपोर्ट में नेस्ले इंडिया के एक इन्फेंट मिल्क (फॉलो-अप फॉर्मूला) का सैंपल पूरी तरह सब-स्टैंडर्ड (मानकों से कम) पाया गया है। इस प्रोडक्ट में बच्चों के दिमागी और शारीरिक विकास के लिए आवश्यक विटामिन बायोटिन (Biotin/Vitamin B7) की मात्रा तय भारतीय कानूनी सीमा से काफी कम मिली।

उपभोक्ता डिब्बे पर लिखी न्यूट्रिशन वैल्यू को सच मानकर पूरी कीमत चुकाता है, लेकिन डिब्बे के अंदर बंद पाउडर में वह पोषण होता ही नहीं है जिसका वादा किया गया था, वस्‍तुत: यह सीधे तौर पर भारतीय ग्राहकों की जेब काटने और उनके बच्चों को कुपोषण की ओर धकेलने जैसा धोखा है।

2015 का मैगी संकट– जब भारत की थाली में परोसा गया ‘शीशा’

भारत में नेस्ले द्वारा किए गए उपभोक्ताओं के भरोसे के सबसे बड़े कत्ल के रूप में साल 2015 का मैगी विवाद हमेशा याद किया जाएगा। 1983 में भारत में लॉन्च होने के बाद मैगी ने भारतीय घरों में ‘दो-मिनट’ के जादुई स्लोगन से अपनी जगह बनाई थी और बाजार के एक बहुत बड़े हिस्से पर कब्जा कर लिया था।

उत्तर प्रदेश के खाद्य सुरक्षा अधिकारियों की जांच में मैगी के सैंपल्स में लेड (शीशा) की मात्रा तय सुरक्षित सीमा (2.5 ppm) से कई गुना अधिक पाई गई थी। लेड इंसान के शरीर, विशेषकर बच्चों के लिवर, किडनी और मस्तिष्क विकास के लिए एक खतरनाक न्यूरोटॉक्सिन (धीमा जहर) है। इसके अलावा, मैगी के हर पैकेट पर लिखा होता था—”No Added MSG”, मगर प्रयोगशालाओं की जांच में इसमें मोनोसोडियम ग्लूटामेट (एमएसजी) की मौजूदगी पाई गई। इस बड़े धोखे के बाद एफएसएसएआई ने देशव्यापी प्रतिबंध लगाते हुए नेस्ले को 38,000 टन मैगी बाजार से वापस मंगाकर नष्ट करने पर मजबूर किया था और भारत सरकार ने कंपनी के खिलाफ ₹640 करोड़ का मुकदमा भी दायर किया था।

आंतरिक रिपोर्ट की स्वीकारोक्ति– 60 फीसद उत्पाद स्वास्थ्य के मानकों से दूर

यह आरोप सिर्फ भारतीय नियामकों का नहीं है, इस संबंध में खुद नेस्ले के वैश्विक नेतृत्व ने इस सच को स्वीकार किया है। साल 2021 में नेस्ले का एक आंतरिक दस्तावेज मीडिया में लीक हो गया था, जिसने पूरी दुनिया को चौंका दिया। इस प्रेजेंटेशन में कंपनी ने खुद कबूल किया कि उसके मुख्यधारा के खाद्य और पेय पोर्टफोलियो (जैसे नूडल्स, चॉकलेट, कन्फेक्शनरी) के 60 फीसद से अधिक उत्पाद स्वास्थ्य की स्थापित अंतरराष्ट्रीय परिभाषाओं पर खरे नहीं उतरते हैं।

कंपनी ने माना था कि उनके कुछ श्रेणियों के उत्पादों को वे चाहे जितनी कोशिश कर लें, कभी भी ‘न्यूट्रिशियस या पूरी तरह हेल्दी’ नहीं बनाया जा सकता। इसके बावजूद, भारतीय बाजारों में आकर्षक विज्ञापनों के जरिए इन उत्पादों को ‘खुशियों का जरिया’ और ‘बच्चों के टिफिन का सबसे अच्छा साथी’ बताकर धड़ल्ले से परोसा जाता है।

1912 से 2026 : उपभोक्ता बीमार, कॉर्पोरेट मालामाल

यदि हम नेस्ले इंडिया के 114 वर्षों के आर्थिक ग्राफ और उपभोक्ताओं के साथ किए गए व्यवहार की तुलना करें, तो एक हैरान करने वाला विरोधाभास सामने आता है। एक तरफ उपभोक्ताओं की सेहत से जुड़े विवाद बढ़े हैं, तो दूसरी तरफ कंपनी का टर्नओवर लगातार तेज हुआ है। इस संबंध में यह आंकड़ें गौर करनेलायक हैं। 1912 – 1959 का समय इस कंपनी के लिए आयात और नींव स्‍थापित करने का दौर रहा। इस समय तक यह एक छोटी विदेशी एक्सपोर्ट इकाई के रूप में भारत में चल रही थी। शुरुआत में कुछ लाख रुपये का राजस्व कमाने वाली यह कंपनी, जो पूरी तरह से आयातित माल बेचती थी।

फिर आया 1961 – 1990 का समय, जब इसने स्थानीय उत्पादन शुरू किए और मैगी क्रांति से घर-घर अपनी पैठ बनाना शुरू कर दी। पंजाब के मोगा में पहली फैक्ट्री लगाकर दूध और नूडल्स बाजार पर एकाधिकार स्थापित किया। इस दौरान टर्नओवर ₹50 करोड़ से ₹1,000 करोड़ के पार पहुंच गया। 2015 मैगी बैन के कारण कंपनी के राजस्व और ब्रांड वैल्यू में इतिहास की सबसे बड़ी गिरावट दर्ज की गई। इसके बाद 2016 – 2026 (रिकॉर्ड तोड़ मुनाफा युग आप इसका मान सकते हैं, आक्रामक मार्केटिंग के दम पर वित्तीय वर्ष 2025-26 में नेस्ले इंडिया ने ₹23,194.95 करोड़ का टर्नओवर और ₹3,544.6 करोड़ का शुद्ध मुनाफा कमाया है।

सजगता ही उपभोक्ताओं का असली हथियार

ऐसे में नेस्ले इंडिया की यात्रा यह साफ दर्शाती है कि कोई भी कॉर्पोरेट ब्रांड तब तक पूरी तरह जवाबदेह नहीं बनता, जब तक कि उपभोक्ता खुद जागरूक न रहे । नेस्ले द्वारा भारत में लगातार किए जा रहे ये उल्लंघन इस बात का प्रमाण हैं कि कंपनियां ढीले कानूनी मुकदमों और जुर्माने की राशियों को अपने व्यापार के खर्च (Cost of Doing Business) का हिस्सा मान चुकी हैं। आज के भारतीय उपभोक्ता को सिर्फ ‘2-मिनट’ के आराम के पीछे न भागकर, पैकेट के पीछे लिखे सच को पढ़ना सीखना होगा। जब तक उपभोक्ता इन भ्रामक दावों को खुद नकारना शुरू नहीं करेंगे, तब तक मुनाफे का यह खेल हमारी सेहत की कीमत पर खेला जाता रहेगा। कल के अंग्रेजी दौर की तरह आज विदेशी कंपनियां हमें लूटती रहेंगी।

वे लौट कर फिर ना आए

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संजीव लपप्रीत

दिल्ली। मैं इन बुजुर्ग देवी द्वारा जो एक कार्यक्रम में बोला गया उसे जस का तस लिख रहा हूँ… कुछ भी मिलाये बिना…
“मैं दस साल की थी जब मैंने खेल(बैडमिंटन) शुरू किया और साढ़े दस साल में स्टेट का ladies double started भी जीत लिया।
फिर मैं खेली till the age of twenty two and I represented India. उसके बाद शादी करने का टाइम आ गया। It was an arranged marriage, my husband was in the air force, a fighter pilot.
हम लोग अंबाला में posted थे, लड़ाई का माहौल कुछ बनने लगा and suddenly 3rd of December nineteen seventy-one में लड़ाई शुरू हो गई और उस समय तो फिर bombing शुरू ही अंबाला से हुई। My husband वो night duty पे थे, base पे duty पे थे। वो जाने लगे, he said मैं जा रहा हूँ तुम हो सके तो घर चले जाना। मैंने कहा मैं कहीं नहीं जाती, मैं यही रहूँगी, I will wait for you.
उन्होंने ये भी guidance दिया कि siren बजेगा तो आपको trench के अंदर जा के बैठना है। 3rd of December was peak of interest, तीन दिन हम वहाँ पे उस trench में ही बैठे रहे और third day gate पे दो जने आए। Official वर्दी में थे but उन्होंने कहा कि साहब ने कहा है आप घर चले जाओ।
छोटा सा सूटकेस बांधा, घर को ताला लगाया। And believe me ढाई से तीन किलोमीटर आधी रात को बारह से दो बजे पैदल जा के स्टेशन पे खड़ी हो गई मैं। आज ही वो सोच के ज्यादा डर लगता है जितना उस समय नहीं लग रहा था कि मैंने कैसे किया होगा? पता नहीं, I was twenty-three at that time.
वहाँ गाड़ी आई, फिर blackout रहता है तो lights नहीं जलाते ना स्टेशन पे ना डिब्बे के अंदर, अँधेरा रहता है पूरा। मैं अपना किसी तरह से सूटकेस ले के चढ़ गई। बाथरूम के बाहर बैठ के रात गुजारी and I reached home.
तो ये तो my first encounter with war था, जिसको कहिए आप। बहरहाल वो हुआ, लड़ाई चली, इतने दिन लड़ाई खत्म भी हो गई। इस बीच में मेरे father in law ने कहीं से एक न्यूज़ पेपर लाया जो कि पाकिस्तान का न्यूज़ पेपर था।
और उसके फ्रंट पेज पे लिखा था:
पाकिस्तान डाउंस forty six planes, five pilots captured अलीवे और उसमें मेरे हस्बैंड का नाम था।
वो दिन और आज का दिन, वो पेपर पे ही रह गया, आज तक नहीं पता चला।
पर जो… अकेले हम नहीं, चौवन परिवार ऐसे हैं जो लोग आज तक लौट के नहीं आए उनके परिवार के लोग।
हम लोगों ने कोशिश करी, नहीं ऐसा हुआ होगा, वैसा हुआ होगा। जब जंग होती है तो individual मायने नहीं रखता है, देश मायने रखता है।”
ये बातें कहीं तश्वीर में दिख रही “श्रीमती दमयंती ताँबे” ने…. जो कभी राष्ट्रीय बैडमिंटन खिलाडी रहीं और उनके पति फ्लाइट लेफ्टिनेंट विजय वसंत ताँबे 1971 की जंग में पाकिस्तान के आसमान में लापता घोषित हुए…. और फिर कभी न लौटे
और न युद्ध जीतने के बाद भारत की तब की सरकार ने उनपर सोचा!!

हनुमान अंश की अपार सफलता ओैर भारतीय सिनेमा का नया परिदृश्य 

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लखनऊ। निर्माता निर्देशक विशाल चतुर्वेदी की आध्यात्मिक संत बाबा नीब करौली के जीवन पर बनी फिल्म हनुमान अंश सफलता के नये आयाम छू रही है। फिल्म के प्रति आम जनमानस में इतना उत्साह है कि एक लंबे अंतराल के बाद कोई फिल्म 5 वां सप्ताह छू सकी है। देश के अनेकानेक सिनेमाघरों में हनुमान अंश अभी भी हाउसफुल चल रही है तथा अनेक सिनेप्रेमी फिल्म देखने के लिए कतार में लगे हैं। बॉलीवुड के इतिहास में लंबे अंतराल के बाद कोई ऐसी फिल्म आई है जिसके विषय में हर कोई बात कर रहा है हर जगह बात हो रही है।

हनुमान अंश ने सिनेमा जगत के कई मिथकों को ध्वस्त कर दिया है। हनुमान अंश की सफलता से यह बात स्पष्ट हो गई है कि भारत का जनमानस बॉलीवुड सिनेमा की गंदगी व बेसिरपैर की कहानियों से ऊब चुका है तथा कुछ अच्छा देखना चाहता है। हनुमान अंश ने अपनी लोकप्रियता के माध्यम से फिल्मों की सफलता के लिए एक लंबी रेखा खींच दी है। फिल्म के सफलता के लिए किसी बड़े नायक -नायिका, केवल हिंसा औरअश्लीलता परोसने वाला फार्मूला टूट गया है।

हनुमान अंश की सफलता सिर्फ करोड़ों की कमाई तक ही सीमित नहीं है। फिल्म की शुरुआत बहुत छोटी थी, न बड़े स्टार का सहारा था, न हजारों स्क्रीन और न ही सुनियोजित प्रचार फिर भी मात्र दो करोड़ में बनी हनुमान अंश ने करोड़ों की कमाई वाली फिल्मों के क्लब में स्थान बना लिया। जिस फिल्म के निर्माताओं ने स्वयं कोई प्रचार नहीं किया उसका प्रचार सोशल मीडिया पर उसके दर्शक कर रहे हैं ।बॉलीवुड के बड़े -बड़े दिग्गज फिल्म की सफलता को लेकर हैरान हो रहे हैं।

हनुमान अंश की यात्रा:  बिना किसी भारी भरकम प्रचार और मात्र 2 करोड़ के बजट से बनी यह फिल्म केवल 3 से 25 सिनेमाघरों में घिसट -घिसट कर शुरू हुई थी और आज देश के 1200 से 1500 स्क्रीन और रोजना 5,000 से 9,000 शोज तक जा पहुंची है। एक अनुमान के अनुसार प्रदर्शन के 40वें दिन तक एक करोड़ लोग इस फिल्म को देख चुके हैं तथा इतने ही लोग अपनी बारी की प्रतीक्षा कर रहे हैं। फिल्म की सफलता का यह आलम है कि अब नीब करौली बाबा से जुड़े सभी स्थलों का पर्यटन की दृष्टि से विकास किया जा रहा है तथा बाबा के धाम कैंचीधाम में भी भक्तों व पर्यटकों की भारी भीड़ उमड़ रही है। उत्तराखंड व छत्तीसगढ़ में हनुमान अंश को टैक्स फ्री कर दिया गया है। पहले बॉलीवुड में 10 साल की बड़ी हिट फिल्मों में दंगल, घुरंधर, एनिमल, पठान, छावा, कंतारा, धारा 370 पर बनी फिल्मों के नाम लेते थे किंतु इस एक फिल्म ने इस लिस्ट को सदा -सदा के लिए बदल दिया है ।

कई स्थानों पर हनुमान अंश के दर्शक भगवा वस़्त्र व साड़ी पहनकर नंगे पांव जा रहे हैं, कई जगह सिनेमा हॉल  मंदिर में परिवर्तित हो गए हैं जहां हनुमान चालीसा का पाठ तथा फिल्म के समापन के बाद हनुमान चालीसा व प्रसाद का वितरण हो रहा है। बहुत दिनों बाद दर्शकों को ऐसी फिल्म देखने को मिली है जो परिवर के साथ बैठकर देखी जा सकती है।

हनुमान अंश की कहानी हनुमानभक्त बाबा नीब करौली के जीवन प्रसंगों पर आधारित है। फिल्म में नये कलाकार हैं ,जिनकी कभी कहीं चर्चा नहीं हुई फिर भी फिल्म में कहीं कोई ऊबासी का क्षण नहीं आया। हनुमान अंश मनोरंजक, ज्ञानवर्धक व नये आघ्यात्मिक विचारों को जन्म देने वाली फिल्म है । फिल्म की सफलता का सबसे बड़ा कारण यह है कि आज घरों में  इस प्रकार के आध्यात्मिक चमत्कारों पर कोई चर्चा नहीं होती और सभी के लिए इसमें नयापन है।

अभी तक लोग केवल महात्मा गांधी के विषय में जानते थे कि उन्हें दक्षिण अफ्रीका में भारतीय होने के नाते ट्रेन से नीचे फेंक दिया गया था किंतु इस फिल्म के माध्यम से दर्शकों को पता चल रहा है कि ऐसी ही एक घटना बाबा नीब करौरी के साथ भी घटित हुई थी। जब बाबा एक ट्रेन के एसी डिब्बे में चढ़ गए थे और अपने सहयेागी के साथ भजन गा रहे थे। वह डिब्बा अंग्रेज अफसरों के लिए  था। ट्रेन में सफर कर रहे अंग्रेज अफसर को यह बात नागवार गुजरी और उसने जबरदस्ती ट्रेन रुकवाकर बाबा को ट्रेन से उतरवा दिया जिसके बाद  वह ट्रेन आगे बढ़ ही नहीं सकी। बाद में बाबा को मनाया गया और उन्हें वापस ट्रेन पर बिठाया गया तब ट्रेन दोबारा चल सकी।

बाबा नीब करौली की भूमिका निभाने वाले  शोभिनव सत्य व फिल्म में बाबा की पत्नी की भूमिका निभाने वाली पूर्णिमा तिवारी ने अद्भुत अभिनय किया है। लखनऊ  रंगमंच के बड़े चेहरे अनिल रस्तोगी ने भी अपनी भूमिका के साथ न्याय किया है । बाबा के पिता बने लखनऊ के सामान्य से दिखने वाले रंगमंच कलाकार आजाद मिश्रा अपनी छोटी भूमिका में भी अत्यंत प्रभावशाली रहे हैं।

हनुमान अंश की सफलता में संगीतकार धीरेंद्र मुलकलवार की मेहनत रंग लाई है। उन्हें कई बार असफलता का सामना करना पड़ा किंतु इस फिल्म ने उनका भाग्य चमका दिया है। फिल्म के नेत्रहीन गायक सुनील लोधी के भजन आज घर- घर में गाए जा रहे हैं। नेत्रहीन सुनील लोधी ट्रेनों  में ही भजन गाया करते थे, हनुमान अंश की सफलता से उनके भी अच्छे दिन आ गए हैं। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने उन्हें बुलाकर सम्मानित किया है तथा उनके नेत्रों का सर्वश्रेष्ठ उपचार कराने की घोषणा करी है।

हनुमान अंश की सफलता से गदगद  फिल्म की दूसरी निर्माता और सहयोगी अनुप्रिया नागर ने कैंची धाम जाकर बाबा का आशीर्वाद लिया। आज हर कोई “मैंने तेरे ही भरोसे हनुमान“ गाकर बाबा का आशीर्वाद प्राप्त कर रहा है ।अनुप्रिया नागर फिल्म बनाने से पहले प्रेमानंद महाराज से भी मिलने गई थीं। मुंबई में जन्मीं अनुप्रिया ने ब्रिटेन में पढ़ाई की है वो अर्थशास्त्री, कलाकार और फिल्म प्रोड्यूसर हैं ।

हनुमान अंश ने सिद्ध कर दिया है कि सफल फिल्म के लिए हिंसा और अश्लीलता का मसाला , बड़े नाम, पैसा, वीएफएक्स की नही बल्कि अच्छी कहानी और और सही तरीके से उसे दिखाने की भावना ही काफी है।

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