329 सैनिकों का बलिदान: साम्प्रदायिक हिंसा में 25 हजार हत्याएँ

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भोपाल । पूरे संसार में केवल भारत ऐसा देश हैं जहां स्वतंत्रता के बाद भी स्वतंत्रता का स्वरूप लेने के लिये भी लाखों बलिदान हुये और करोड़ो लोग बेघर हुये। जिन स्थानों पर स्वतंत्रता के बाद भी भारी हिंसा और संघर्ष हुआ उनमें एक हैदराबाद रियासत भी रही है। जहाँ सेना के हस्तक्षेप के बाद ही हिंसा रुक सकी और और वह भूभाग भारतीय गणतंत्र का अंग बन सका। सेना ने 13 सितम्बर को हैदराबाद में प्रवेश किया, 17 सितम्बर की शाम को हैदराबाद के निजाम ने समर्पण कर दिया था। इसलिए हैदराबाद मुक्ति दिवस 17 सितम्बर को मनाया जाता है। लेकिन 18 सितम्बर को विलीनीकरण दस्तावेज पर हैदराबाद के शासक निजाम के हस्ताक्षर हुये ।
स्वतंत्रता के पूर्व भारत में तीन प्रकार का प्रशासनिक स्वरूप था । एक जो सीधा अंग्रेजों के आधिपत्य में था, दूसरा वह अंग्रेजों का ध्वज और दासता तो थी किंतु निचले स्तर पर किसी राजा या नबाब का शासन था । और तीसरा डच या फ्रांसीसी सत्ता के हाथ । जून 1947 में वायसराय माउंटवेटन द्वारा बनाये गये फार्मूले से 15 अगस्त 1947 को स्वतंत्रता तो मिली पर यह स्वतंत्रता केवल ब्रिटिश आधिपत्य वाले क्षेत्रों तक ही सीमित थी । अंग्रेज जा तो रहे थे लेकिन वे एक ऐसे भारत की नींव बनाकर जा रहे थे जो सतत गृह कलह और रक्तपात में ही उलझा रहे । उन्होंने एक चाल चली । अंग्रेजों ने भारतीय रियासतों को भी स्वतंत्रता दी थी और उनसे कहा था कि वे चाहें तो स्वतंत्र रहें अथवा भारत या पाकिस्तान किसी में मिल लें । इसका लाभ कुछ रियासतों ने उठाया उसमें हैदराबाद भी थी । सभी रियासतों को जून 1947 में ही इस फार्मूले की सूचना मिल गयी थी । सूचना मिलते ही जून 1947 में हैदराबाद के शासक निजाम ने स्वयं को स्वतंत्र रहने का पत्र भेज दिया था और स्वतंत्र रहने की तैयारी आरंभ कर दी थी । निजाम को इस काम में अंग्रेजों का मौन और मोहम्मद अली जिन्ना का खुला समर्थन मिल गया था । लेकिन हैदराबाद रियासत की जनता निजाम शासन से मुक्ति चाहती थी । वह भारतीय गणतंत्र का हिस्सा बनना चाहती थी । इसका कारण हैदराबाद के शासकों का समाज पर दमन और अत्याचार करना था । हैदराबाद रियासत में बहुमत तो हिन्दु परंपरा को मानने वालों का था लेकिन वहां कानून इस्लामिक शरीयत के अनुसार चलता था । यह कानून हैदराबाद में 1720 से ही लागू हो गया था । यह निजाम शाही के आरंभ होने का वर्ष था । और जब 1798 में निजाम अंग्रेजों के आधीन हो गया तब भी आतंरिक शासन व्यवस्था में कोई अंतर न आया । हैदराबाद में धार्मिक सत्ता के अधिकारों का दुरुपयोग, बहुसंख्यक समाज का शोषण और उत्पीड़न का क्रम बना रहा । इसलिये हैदराबाद का बहुसंख्यक निजाम से मुक्ति चाहता था ।

हैदराबाद के नबाब को “निजाम-उल-मुल्क” की उपाधि मुगल बादशाह ने दी थी जिससे हैदराबाद का हर नबाब निजाम कहलाया । रियासत का आधिकारिक धर्म ही इस्लामिक प्रावधानों के अनुसार नहीं था अपितु अधिकांश शासकीय पदों पर भर्ती भी मुस्लिम समाज के लोगों की जाती थी । शीर्ष पदों पर तो एक भी गैर मुस्लिम नहीं था । रियासत को अंग्रेजों ने अपने आधीन तो कर लिया था पर रियासत के अदरूनी व्यवस्था में कोई हस्तक्षेप नहीं किया था । इसका कारण यह था कि अंग्रेजों को शासन व्यवस्था में कोई रूचि न थी । उनके केवल दो उद्देश्य थे । एक तो हैदराबाद रियासत से सालाना पैसा मिले और दूसरा आवश्यकता पड़ने पर निजाम उनकी सहायता के लिये अपने खर्चे पर सेना भेजे । निजाम इस काम को सहर्ष कर रहा था । अंग्रेजों को निजाम की जरूरत मराठों के विरुद्ध अभियान शुरु करने के लिये पड़ती थी । इसलिए उन्होने निजाम को कुछ विशेष अधिकार भी दे रखे थे । निजाम के मन में मराठा शासन के प्रति कितनी कटुता थी इस बात का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि जब मराठों ने भोपाल में अभियान चलाया तो भोपाल नबाब की मदद करने के लिये निजाम की फौज भोपाल आई थी । यह अलग बात है कि भोपाल के युद्ध में इस संयुक्त फौज को भी पराजय का मुंह देखना पड़ा । निजाम इससे पूर्व भी मराठों से पराजित हो चुका था इसलिये उसने अंग्रेजों से संधि कर ली थी । निजाम का सोच कितना साम्प्रदायिक था इसका एक उदाहरण यह भी है कि हैदराबाद रियासत में मुस्लिम आबादी केवल 11% प्रतिशत थी लेकिन रियासत की तीस प्रतिशत भूमि पर मुसलमानों का अधिकार था । इसके साथ वहां हिन्दुओं को हथियार रखने का अधिकार न था जबकि मुस्लिम समाज के पास हथियारों का जखीरा रहता था ।

हैदराबाद की इस विशिष्ट विचार और कार्य शैली कटुता और आक्रामकता 1921 के बाद और बढ़ी। यद्धपि रियासत के अधिकांश मुसलमान धर्मान्तरित थे उन्हे इसका आभास भी था लेकिन खिलाफत आँदोलन के बाद मुसलमानों में संगठन और आक्रामकता दोनों बढ़ी। अनेक स्थानों पर साम्प्रदायिक दंगे भी हुये। इसमें तेजी 1927 के बाद और बढ़ी इस वर्ष रियासत में एक संस्था “मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन” का गठन हुआ। इसका नेतृत्व सैय्यद कासिम रिजवी के हाथ में था। इस संस्था ने सशस्त्र समूह बनाया इसे “रजाकारों का संगठन” कहा गया। “रजाकार” मुस्लिम आर्म गार्ड थे। जिन्होंने हिन्दुओं की सामुहिक हत्याएँ कीं, संपत्ति छीनी, स्त्रियों से बलात्कार किये। 1946 में इस संगठन द्वारा “डायरेक्ट ऐक्शन” हैदराबाद में जो किया वह इतिहास के पन्नों में स्पष्ट है। 1946 के बाद निजाम इसी संगठन पर निर्भर हो गये थे । जून 1947 से हैदराबाद निजाम ने स्वयं को स्वतंत्र रहने की तैयारी आरंभ करली। 15 अगस्त 1947 को निजाम ने स्वयं को स्वतंत्र होने की और कासिम रिजवी ने इसे इस्लामिक देश होने की घोषणा कर दी। इस घोषणा के साथ हैदराबाद रियासत में हिंसा की शुरुआत हो गयी। रजाकारों और रियासत की सेना मिलाकर यह संख्या लगभग दो लाख थी जो हथियारों से युक्त थी। अनेक स्थानों पर दमन लूटपाट, हत्या, बलात्कार और धर्मान्तरण का सिलसिला चल पड़ा।

सैकड़ो हजारों परिवार सुरक्षित स्थानों की ओर भागे। आरंभ में भारत सरकार कश्मीर पर पाकिस्तान का हमला विभाजन के साथ बढ़ती हिंसा और शरणार्थियों की समस्या से जूझ रही थी इस कारण हैदराबाद की ओर ध्यान कम गया। तभी 1948 के आरंभ में यह सूचना मिली कि हैदराबाद में पाकिस्तान से सशस्त्र सैनिक आ रहे हैं उन्हें बसाया जा रहा है और रियासत हथियारों की खरीद के लिये आस्ट्रेलिया और चेकोस्लोवाकिया से 30 लाख पाउंड के हथियार खरीदने के आर्डर दे दिया गया है। तब तत्कालीन गृहमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल ने निजाम से बातचीत की किंतु निजाम के रवैये में कोई अंतर न आया उल्टे रिजवी की रजाकारों की गतिविधियां और बढ़ी । सरदार पटेल ने अंततः 9 सितम्बर 1948 को चेतावनी पत्र जारी किया। लेकिन निजाम न माना। 11 सितम्बर को हैदराबाद में सैन्य अभियान का निर्णय हुआ। इस अभियान को “आपरेशन पोलो” नाम दिया गया । 12 सितम्बर को सेना को कूच करने का आदेश दिया। 13 सितम्बर को सेना ने हैदराबाद आपरेशन आरंभ किया, 17 सितम्बर की शाम को निजाम ने समर्पण का प्रस्ताव दिया और 18 सितम्बर को विलीनीकरण दस्तावेज पर हस्ताक्षर हुये। सेना को इस अभियान में कुल 108 घंटे लगे। इस 108 घंटे के अभियान में सेना के कुल 329 जवानों के प्राणों का बलिदान हुआ। दूसरी तरफ निजाम सेना के 807और 1647 अन्य लोगों की मौत हुई । जून 1947 से सितम्बर 1948 के बीच इस लगभग सवा साल की अवधि में 22 से 30 हजार तक लोग मारे गये और एक लाख से अधिक लोग बेघर हुये। इस हिंसा पर विराम भारत सरकार की सक्रियता के साथ लगी। भारत सरकार ने कासिम रिजवी को गिरफ्तार कर लिया और उसकी संस्था मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लमीन यनि MIM पर पाबंदी लगा दी। आगे कासिम रिजवी पाकिस्तान चला गया। वह इस संस्था की कमान अपने समय के मशहूर वकील अब्दुल वहाद औबेसी को सौंप गया था। वे इस समय के आक्रामक नेता औबेसुद्दीन औवेसी के पितामह थे।

हैदराबाद रियासत कि क्षेत्रफल लगभाग 82 हजार वर्ग मील था । जो इंग्लैंड जैसे देश से भी अधिक है । तब इस रियासत की आबादी लगभग 1.6 करोड़ थी इसमें 85%हिन्दु, 11% मुसलमान और 4% अन्य थे । रियासत की वार्षिक आय लगभग 26 करोड़ वार्षिक थी। यह देश की दूसरी बड़ी रियासत मानी जाती थी। हैदराबाद के भारतीय गणतंत्र में विलीन होने के बाद भारत सरकार इन सारी घटनाओं की जाँच के लिये “सुन्दर लाल समिति” भी बनाई लेकिन राजनैतिक कारणों से यह रिपोर्ट सामने न आ सकी। इसे सार्वजनिक करने से रोक दिया गया था । इसके कुछ अश 2014 में ही सामने आ सके। हैदराबाद के विलीनीकरण के बाद भी किसी के पास इस प्रश्न का उत्तर न था उन निहत्थे सामान्य लोगों ने किसका क्या बिगाड़ना था जिन्हें हैदराबाद के आक्रामक जुनीनी लोगों ने लूटा, सब कुछ छीना, महिलाओं से बलात्कार किया और कुछ को मौत के घाट उतार दिया ।

मोदी: व्यक्ति नहीं, भारतीय राजनीति की सबसे बड़ी विभाजन-रेखा

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व्यालोक पाठक

पटना। मोदी एक ऐसा नाम, जो पिछले 12 वर्षों से इस देश में ध्रुवीकरण का सबसे बड़ा बायस हैं। मोदी से आप प्रेम कर सकते हैं, घृणा कर सकते हैं, अनदेखी नहीं कर सकते। जिस मोदी के खिलाफ पंचमक्कारों (मैकाले, मिशनरी, मुल्ला, मीडिया, मार्क्सवादी) ने पिछले 25 वर्षों से अनथक अभियान चलाया, अब उसमें स्वर्ण-रजत मवादी और 2014 के बाद पैदा हुए नवतुरिया राष्ट्रवादी भी पैदा हो गए हैं, जो महज एकाध साल पहले तक राम मंदिर की मुखालफत करते थे, वहां अस्पताल की वकालत करते थे और लव-जिहाद को कपोल-कल्पित बताते थे। आज वही मोदी और योगी को ज्ञान दे रहे हैं।

मोदी सरकार से शिकायतें हैं और कटुतम आलोचना की है मैंने, लेकिन मैं इतना वज्रमूर्ख नहीं  कि देश जलाने को तैयार बैठे राउल विंची औऱ तमाम गिरोहियों को दे दूं। हम भारतीय भूलने में अव्वल हैं। भूल जाते हैं, पटरियों के किनारे बैठे लोगों की पंक्तियां, रेल में सुबह-सुबह आती पाखाने की वो महक, गंधाते हुए प्लेटफॉर्म और जब कोई पीएम स्वच्छता अभियान की बात करता है, तो हम उसका मजाक उड़ाते हैं, उस अभियान को नाकामयाब करने की पूरी कोशिश करते हैं।

भारत में कुछ नाम ऐसे होते हैं जो केवल नाम नहीं रहते, वे बहस बन जाते हैं। नरेंद्र मोदी उन्हीं में से एक हैं। बीच का मैदान वर्षों पहले खाली हो चुका है।

मोदी की सबसे बड़ी राजनीतिक उपलब्धि शायद सड़क, पुल, एक्सप्रेसवे, एयरपोर्ट या डिजिटल व्यवस्था नहीं है। उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि उन्होंने भारत के बौद्धिक और राजनीतिक पाखंड को निर्वस्त्र कर दिया। जो लोग दशकों तक कहते रहे कि अनुच्छेद 370 कभी नहीं हट सकता, वह हट गया। जो कहते थे कि राम मंदिर केवल चुनावी नारा है, वहाँ मंदिर खड़ा हो गया। जो लोग भारत की विदेश नीति को स्थायी हीनभावना का दस्तावेज मानते थे, उन्हें भी मानना पड़ा कि दुनिया अब भारत को पुराने चश्मे से नहीं देखती।

भारत का बुद्धिजीवी (Sic.)  वर्ग और उसका राजनीतिक परजीवी तंत्र वर्षों तक इस विश्वास में जीता रहा कि सत्ता पर उसका नैसर्गिक अधिकार है। मोदी ने उस व्यवस्था को तोड़ा। परिणाम यह हुआ कि विरोध लोकतांत्रिक असहमति से आगे बढ़कर लगभग अस्तित्वगत घृणा में बदल गया। ऐसा लगा मानो किसी एक व्यक्ति के हटते ही देश में दूध-घी की नदियाँ बहने लगेंगी और सारी समस्याएँ समाप्त हो जाएँगी।

विडंबना देखिए, जरा। जो लोग कल तक राम मंदिर की जगह अस्पताल माँग रहे थे, आज मंदिर बन जाने के बाद हिंदुत्व का पाठ पढ़ा रहे हैं। जो लव-जिहाद को कल्पना बताते थे, वे अब सांस्कृतिक संकटों पर शोधपत्र लिख रहे हैं। जो लोग वर्षों तक राष्ट्रवाद का उपहास उड़ाते रहे, वे आज उसके सबसे बड़े स्वयंभू ठेकेदार बन बैठे हैं। भारत में विचार बदलना अपराध नहीं है, लेकिन स्मृति खो देना अवश्य एक राष्ट्रीय बीमारी है। हमारा समाज भूलने में विश्वगुरु है।

हम भूल जाते हैं रेलवे स्टेशन की वह दुर्गंध, शहरों की वह अव्यवस्था, सरकारी दफ्तरों की वह निराशा, और फिर किसी भी परिवर्तन को स्वाभाविक मान लेते हैं। जो काम हो गया, वह मानो हमेशा से था। जो सुविधा मिल गई, वह जैसे जन्मसिद्ध अधिकार थी। इतिहास का सबसे कठिन काम उपलब्धियाँ अर्जित करना नहीं, बल्कि लोगों को उनकी याद दिलाते रहना है।

मोदी की आलोचना होनी चाहिए। किसी भी लोकतंत्र में सत्ता आलोचना से ऊपर नहीं हो सकती। लेकिन आलोचना और उन्माद में अंतर होता है। समस्या तब पैदा होती है जब आलोचक का लक्ष्य सुधार नहीं, केवल ध्वंस रह जाता है। जब हर सड़क में तानाशाही दिखने लगे, हर फैसले में फासीवाद और हर चुनाव में लोकतंत्र की अंतिम साँस सुनाई देने लगे, तब समझ लेना चाहिए कि विश्लेषण कम और पूर्वाग्रह अधिक बोल रहा है।

मोदी के समर्थकों की भी अपनी अंधताएँ हैं और विरोधियों की भी। मगर भारतीय राजनीति का कठोर सत्य यह है कि किसी भी नेता का मूल्यांकन उसके विकल्पों से होता है, कल्पनाओं से नहीं। लोकतंत्र में जनता अंततः देवता नहीं चुनती, उपलब्ध विकल्पों में अपेक्षाकृत बेहतर प्रबंधक चुनती है। इसीलिए मोदी का प्रश्न केवल मोदी का प्रश्न नहीं है। वह उस भारत का प्रश्न है जो एक साथ परंपरा और आधुनिकता, राष्ट्रवाद और लोकतंत्र, विकास और पहचान, आस्था और संविधान के बीच अपना रास्ता तलाश रहा है।

वामपंथी जो न कर सके, घृणित जातिवादी जो न कर सके, वह 2014 के बाद पैदा नवतुरिया राष्ट्रवादियों (हे राम!) और स्वर्ण-रजत मवादियों ने कर दिया। मैं कभी व्यक्ति को आदर्श नहीं मानता, लेकिन इन गधों-नाबदानियों की वजह से कट्टर मोदीभक्त कहलाने को तैयार हूँ, उसी कतार में हूँ।

आदरणीय थानवी जी, नमस्कार  

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राजकिशोर

दिल्ली। हिंदी दिवस पर आपने ने याद दिलाया कि हिंदी फ़ारसी शब्द है। शुक्रिया। अब वाक्य पूरा कर लीजिए, क्योंकि आधे में छोड़ा गया वाक्य सूचना नहीं, चुटकी होता है। वह क्यों लेने की जरूरत है यहां पर..? सवाल उठाकर बस आगे बढ़ता हूँ.। निहितार्थ समझदार लोग निकाल लेंगे।

पहली बात जो सूची घुमाई गई है, इसमें आधे शब्द भारत को मिला दान नहीं, भारत के नाम पर कटी रसीद हैं।सूची यह है…हिंदी, हिंदू, हिंदुस्तान, हिंदवी, हिंदसा, हिंदबा, हिंदुवाना। और निष्कर्ष यह कि उदारमना हिंदी ने ये सब अरबी-फ़ारसी से लेकर अपना शब्द-भंडार भरा।

उदारता पर कोई विवाद नहीं। व्युत्पत्ति में उदारता से ज़्यादा ईमानदारी चाहिए, विवाद उस पर है।
हिंदुवाना को लीजिए। फ़ारसी में इसका शाब्दिक अर्थ ही है “हिंदी वाला”, यानी भारत वाला फल…तरबूज़। हिंदी रेवंद यानी भारत से आने वाला रेवतचीनी। और जिन अंकों से यह सब गिनती चल रही है, अरबों ने उन्हें ख़ुद अरक़ाम-ए-हिंदिया कहा, हिंदी अंक, क्योंकि वे यहीं से गए थे। ये शब्द हिंदी को दान में नहीं मिले। कोई अपनी ही रसीद दिखाकर एहसान गिनाए, यह उदारता नहीं, हिसाब में चूक है।
दो शब्द तो सूची में सिर्फ़ आवाज़ के दम पर घुसे हैं।

हिंदबा यानी कासनी। इसका रिश्ता आरामी के हेन्दबा से है, उसी कुल से यूनानी एन्तुबोन और लातीनी इन्तुबुस बने, जिनसे अंग्रेज़ी का एंडिव निकला। हिंद से कोई नाता नहीं।

हिंदसा मध्यकालीन फ़ारसी के हन्दाज़ग से आया है, अर्थ नाप और ढंग। इसी परिवार से फ़ारसी का अंदाज़ा और अरबी का हंदसा बने। यहाँ भी हिंद देखकर भारत खोज लेना व्युत्पत्ति नहीं, शब्द-पहचान की जल्दबाज़ी है।
अब मूल शब्द पर। ईरानी भाषाओं में शब्द के आरंभ का स ह हो जाता है। संस्कृत का सप्त अवेस्ता में हप्त है, सोम हओम है, असुर अहुर है, सरस्वती हरह्वती है। उसी नियम से सिन्धु से हिन्दु। दारा प्रथम के शासनकाल के अभिलेखों में, लगभग 520 से 486 ईसा पूर्व के बीच, सिंधु घाटी का प्रांत हिदुश दर्ज है। पुरानी फ़ारसी लिपि में व्यंजन से पहले का न लिखा नहीं जाता था, इसलिए उच्चारण हिंदुश ही पुनर्निर्मित होता है। अवेस्ता का हप्त हिंदु ऋग्वेद के सप्त सिन्धवः का ही रूप है।

रास्ता यह हुआ ….सिंधु से हिंदु, हिंदु से हिंद, और आगे यूनानी परंपरा में इंदोस तथा इंडिया।
तो अगर फ़ारसी माध्यम से आया रूप उधार है, तो उसी तर्क से इंडिया को यूनानियों की उधारी कहेंगे? नाम का किसी दूसरी भाषा में नया रूप ले लेना वंश बदल जाना नहीं होता।

एक मत और है, अल्पमत में। कुछ विद्वान कहते हैं कि स से ह ईरानी देन नहीं, सौराष्ट्र का उच्चारण है….वहाँ सोरठ होरठ बोला जाता है और सोमनाथ होमनाथ। उनका तर्क यह भी कि फ़ारसी-अरबी में सिंध और हिंद दोनों साथ चलते रहे। मुख्यधारा भाषाविज्ञान इसे नहीं मानता, क्योंकि स से ह का बदलाव एक निश्चित काल में हुआ और उसके बाद के या दोबारा लिए गए रूप उससे अछूते रह गए। पर मज़ा यह है कि यह मत सही निकले तब भी सूची डूबती है, क्योंकि तब हिंदु फ़ारसी की देन नहीं, काठियावाड़ का घरेलू उच्चारण ठहरेगा। दोनों रास्ते घर की ओर ही जाते हैं।

एक बात पहले ही साफ़ कर दूँ, क्योंकि आपकी दी सूची से पाठक निष्कर्ष यही निकालेगा। हिंदी नाम का रूप फ़ारसी हिंदी से आया, यह सच है, और उसमें लगा ई प्रत्यय भी फ़ारसी-अरबी का है। लेकिन हिंदी भाषा फ़ारसी की संतान नहीं। उसका विकास भारतीय इंडो-आर्यन परंपरा में संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश और शौरसेनी की लंबी धारा से हुआ है। नाम का रास्ता और भाषा का वंश, दो अलग चीज़ें हैं। जर्मन ख़ुद को डॉयच कहते हैं, जापानी अपने देश को निप्पोन, फ़िनलैंड ख़ुद को सुओमी, मतलब लेबल बाहर का, रीढ़ अपनी।
और हाँ, हिंदी ने फ़ारसी-अरबी से हज़ारों शब्द लिए हैं। दरवाज़ा, काग़ज़, क़लम, अदालत जैसे शब्दों को वापस भेजने कोई नहीं जा रहा। भाषा जातीय सीमा पर खड़ा चौकीदार नहीं होती।

थानवीजी, आपने ने पूछा..कहना क्या चाहते हो। एक वाक्य में बता देता हूँ। आपत्ति आपके किसी हवाले पर नहीं, आपके एक शब्द पर है। वह शब्द है मूलतः।
आपने लिखा कि हिंदी मूलतः फ़ारसी भाषा का शब्द है। शब्दकोश यह नहीं कहते। शब्दकोश कोष्ठक में लिखते हैं फ़ा॰, और वह आगत भाषा बताता है, मूल नहीं। मतलब शब्द हिंदी में किस रास्ते से आया, यह बताता  है। यह नहीं बताता कि वह बना कहां था। रास्ता और जन्म दो अलग चीज़ें हैं, और यह भेद मैंने नहीं गढ़ा, कोशकारों ने बरता है।
अब आपने जिन कोशों का नाम लिया, उन्हीं में से पहले का पन्ना खोलते हैं। हिंदी शब्दसागर, नागरी प्रचारिणी सभा, प्रधान संपादक बाबू श्यामसुंदर दास। प्रविष्टि… हिंद।
कोष्ठक में लिखा है फ़ा॰। और उसके ठीक नीचे, उसी प्रविष्टि में, विशेष टिप्पणी है कि यह शब्द वास्तव में सिंधु शब्द का फ़ारसी उच्चारण है। आगे वही कोश लिखता है कि ईसा से 500  वर्ष पहले दारा प्रथम के समय सिंधु नदी के आसपास के प्रदेश पर पारसियों का अधिकार हो गया था, कि प्राचीन पारसी भाषा में संस्कृत के ‘स’ का उच्चारण ‘ह’ होता था, जैसे संस्कृत सप्त और फ़ारसी हफ़्त, कि इसी नियम से सिंधु का उच्चारण हिंदु या हिंद हुआ, कि आवस्ता के हफ़्तहिंद का उल्लेख वेदों में सप्तसिंधु है, और कि यूनानियों ने फ़ारसी हिंद को इंड या इंडिका कहा, जिससे आज का इंडिया बना।
थानवी जी, मेरी पूरी पोस्ट में एक भी बात ऐसी नहीं थी जो इस प्रविष्टि में पहले से न हो। ‘स’ से ‘ह’ का नियम, सप्त और हफ़्त, दारा प्रथम, हफ़्तहिंद और सप्तसिंधु, हिंद से इंडिया… आप देख लें, सब यहीं दर्ज है।
तो अब सवाल यह नहीं रह जाता कि कौन शब्दकोश के साथ है और कौन उसके ख़िलाफ़। सवाल यह है कि हम दोनों में से किसने वह प्रविष्टि पूरी पढ़ी। आपने कोष्ठक पढ़ा। विशेष नहीं पढ़ा। और विशेष में वही लिखा है जिसे आप मेरी उपज बता रहे हैं।
अब संदेशवाहक वाली बात। संदेशवाहक चिट्ठी पहुंचाता है, ऊपर अपनी टीप नहीं लगाता। आपकी पोस्ट में तीन चीज़ें ऐसी थीं जो किसी कोश में नहीं मिलेंगी। पहली… मूलतः। दूसरी.. उदारमना हिंदी ने लेकर अपना भंडार समृद्ध किया। तीसरी…जिन्हें नहीं मालूम, उन्हें आज हिंदी दिवस पर कम-से-कम इतना तो बता ही दें।
सर, कोश न विशेषण लगाते हैं, न निष्कर्ष सुनाते हैं, न यह तय करते हैं कि किसे क्या नहीं मालूम। आप ख़ुद लिखते हैं कि व्युत्पत्ति जोड़ने के आप अधिकारी नहीं। सहमत हूं। पर मूलतः लिख देना व्युत्पत्ति का सबसे बड़ा दावा है। एक ही वाक्य में संदेशवाहक भी रहना और फ़ैसला भी सुना देना, दोनों नहीं हो सकता।
एक बात आपने बिल्कुल ठीक पकड़ी है, और मैं उसे बिना किसी शर्त के स्वीकार करता हूँ। आपने समूची हिंदी को फ़ारसी की संतान कहीं नहीं कहा था। वह पंक्ति मैंने पाठक के संभावित निष्कर्ष को रोकने के लिए लिखी थी, पर अगर वह आपके मुँह में डाला गया वाक्य लगी, तो मैं उसे वापस लेता हूँ। विमर्श में जो ग़लत हो, उसे छोड़ देना चाहिए। पूर्वजों और वरिष्ठों ने यही सिखाया है।
अब उसके बदले में यह देखिए कि आपकी लंबी टिप्पणी में क्या नहीं है। मैंने दो ठोस बातें रखी थीं। एक-हिंदबा का हिंद से कोई रिश्ता नहीं, वह आरामी के हेन्दबा से आया है और उसी कुल से यूनानी एन्तुबोन तथा अंग्रेज़ी का एंडिव बने। दो-हिंदसा का हिंद से कोई रिश्ता नहीं, वह मध्यकालीन फ़ारसी के हन्दाज़ग से आया है, जिससे अंदाज़ा बना, अर्थ है नाप। इन दोनों पर आपने एक शब्द नहीं लिखा। पूरी टिप्पणी में नहीं। आपने विज्ञापन का जुमला लिखा, कोशों की सूची लिखी, मेरे मनोविज्ञान पर लिखा, ताजमहल पर लिखा। आरामी और हन्दाज़ग पर कुछ नहीं। जब तथ्य का जवाब नहीं होता, तब विषय बदलता है, दुर्भाग्य से यह हम दोनों के पेशे की सबसे पुरानी पहचान है।
और ध्यान दीजिए, मैंने यह कहीं नहीं कहा कि ये शब्द ग़लत हैं या हिंदी में नहीं रहने चाहिए। मैंने साफ़ लिखा था कि दरवाज़ा, काग़ज़, क़लम, अदालत.. कोई इन्हें लौटाने नहीं जा रहा, और भाषा जातीय सीमा पर खड़ा चौकीदार नहीं होती। इसलिए कोशकारों में बेईमानी मुझे नहीं दिख रही। मैं तो उन्हीं के लिखे विशेष को पढ़कर समृद्ध हो रहा हूं और वही सुना रहा हूं।
रही यहीं से गए थे वाली बात, जिसमें आपको भाषाविज्ञान से ज़्यादा मनोविज्ञान सुनाई दिया। अरक़ाम-ए-हिंदिया मेरा गढ़ा पद नहीं है, वह अरब गणितज्ञों का अपना पद है। हिंदुवाना का शाब्दिक अर्थ भी मैंने तय नहीं किया, फ़ारसी ने किया। अगर यह बताना कि कोई शब्द भारत से गया, पीठ थपथपाना है, तो यह बताना कि कोई शब्द भारत आया, क्या कहलाएगा? यात्रा की दिशा तथ्य होती है, मनोदशा नहीं। और मनोविज्ञान का आरोप बहस का सबसे सस्ता औज़ार है, क्योंकि उसका न कोई प्रमाण देना पड़ता है न कोई खंडन संभव होता है।
अंत में ताजमहल और तेजोमहालय। इस तुलना का जवाब मैं ठंडे मन से दूंगा।
तेजोमहालय का सिद्धांत प्रमाण से इनकार पर खड़ा होता है। दस्तावेज़ मौजूद हैं और उन्हें नकारा जाता है। मैंने जो किया, उसका उल्टा है। मैंने प्रमाण गिनाए, और आज जो सबसे बड़ा प्रमाण सामने रखा है वह आपके ही बताए कोश का है। तो इस तुलना में स्थिति यह बनती है कि जिसने शब्दसागर का विशेष पढ़कर उद्धृत किया, उसे तेजोमहालय वाला कहा जा रहा है, और कहने वाले ने उसी प्रविष्टि में कोष्ठक से आगे नहीं पढ़ा।
थानवी जी, आप इस भाषा के वरिष्ठतम लोगों में हैं। आपकी क़लम का वज़न है, और उसी वज़न के कारण आपका एक विशेषण किसी को स्थायी रंग में रंग सकता है। आपने पहले मुझे ज्ञान देने वाला कहा, फिर आत्ममुग्ध होने का इशारा किया, फिर मनोविज्ञान पढ़ा, और अंत में एक रंग दे दिया। मैं उस रास्ते पर नहीं जाऊँगा। मेरा आपसे न कोई मतभेद है न कोई मनमुटाव। बात दावे की है।
और दावे की स्थिति यह है। आपने कहा, हिंदी मूलतः फ़ारसी का शब्द है। शब्दसागर कहता है, यह शब्द वास्तव में सिंधु शब्द का फ़ारसी उच्चारण है। इन दोनों वाक्यों में से एक ही सही हो सकता है।

हिंदी उदार है, इसमें शक नहीं। मगर इतनी भी नहीं कि हर हिंद से शुरू होने वाले शब्द की रसीद अपने नाम लिखवा ले।

हिंदी दिवस पर शब्दों का सम्मान कीजिए। उनकी वंशावली भी पढ़ लीजिए।

अतीत की आशंका, वर्तमान का संवाद: गोलवलकर से भागवत तक

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आतिफ रशीद

दिल्ली। भारत के सामाजिक-राजनीतिक इतिहास को समझने का सबसे सुरक्षित तरीका यही है कि हर विचार को उसके समय के भीतर रखा जाए। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भारतीय मुसलमानों के संबंधों पर भी यही नियम लागू होता है। आज जब मोहन भागवत भारतीय मुसलमानों को समाज का अभिन्न हिस्सा बताते हैं, तो उनके वक्तव्य को गुरु गोलवलकर के दौर से जोड़कर पढ़ना उपयोगी है-तुलना के लिए नहीं, संदर्भ के लिए।

 

विभाजन की पीढ़ी और ‘Bunch of Thoughts’ का समय

गोलवलकर की पुस्तक Bunch of Thoughts में मुसलमानों को लेकर कठोर टिप्पणियाँ हैं। “miniature Pakistans” जैसी अभिव्यक्ति भी उसी पुस्तक में आती है। यह भाषा आज के कानों में तीखी लगती है, और लगनी भी चाहिए। लेकिन 1947 के तुरंत बाद का भारत एक घायल देश था। विभाजन की त्रासदी ताज़ा थी, भारत-पाकिस्तान के बीच युद्ध और तनाव का वातावरण था, और लाखों परिवार सीमा के दोनों ओर बँटे हुए थे। किसी का भाई भारत में था तो दूसरा पाकिस्तान में; किसी की माँ या बहन उधर रह गई थी। उस पीढ़ी के लिए सीमा-पार रिश्तेदारी सामान्य अनुभव था।

इसी पृष्ठभूमि में गोलवलकर को राष्ट्रीय एकता और सुरक्षा को लेकर गहरी आशंकाएँ थीं। उन्होंने उन लोगों की चर्चा की जिनकी निष्ठा भारत के बजाय पाकिस्तान से जुड़ी दिखाई देती थी। उनकी चिंता को उनके समय में समझा जा सकता है। उसे आज के प्रत्येक भारतीय मुसलमान पर थोपना न तो इतिहास की समझ है, न न्याय।

क्रिकेट के मैदान से बदलती पीढ़ी तक

1960 से 1980 का दौर भी तनावपूर्ण रहा। 1965 और 1971 के युद्ध के बाद भारत-पाक क्रिकेट अक्सर खेल से अधिक भावना बन जाता था। उस समय कभी-कभी कुछ भारतीय मुसलमान पाकिस्तान टीम का समर्थन करते दिखे। इसके पीछे पारिवारिक स्मृतियाँ, विभाजन की छाया या पहचान की उलझन हो सकती थी। लेकिन कुछ लोगों के व्यवहार को पूरे समुदाय का चरित्र मान लेना गलत है।

1980 के बाद यह दूरी धीरे-धीरे बढ़ी। 1990-2000 तक आते-आते बड़ी संख्या में भारतीय मुसलमानों के लिए पाकिस्तान व्यक्तिगत पारिवारिक अनुभव नहीं, एक अलग देश रह गया। आज का हिंदुस्तानी मुसलमान मुख्यतः उसी भारत में पैदा हुआ है जिसमें वह रहता है। उसका स्कूल, नौकरी, कारोबार, मित्र मंडली और बच्चों का भविष्य यहीं है। दो-तीन पीढ़ियों बाद कई पुराने सीमा-पार रिश्ते भी समाप्त हो चुके हैं। इसलिए 1947 की मानसिकता से 2026 के भारतीय मुसलमान को नापना उचित नहीं।

भागवत का संदेश और नए संवाद की जगह

यहीं मोहन भागवत का वर्तमान स्वर महत्वपूर्ण हो जाता है। 29 अगस्त 2026 को न्यूयॉर्क में ‘One World, One Humanity’ कार्यक्रम में उन्होंने कहा कि यदि कोई हिंदू यह सोचता है कि भारत में मुसलमान नहीं होने चाहिए, तो वह हिंदू नहीं रहेगा। उन्होंने यह बात 2018 के उस संवाद के संदर्भ में दोहराई, जब मुस्लिम श्रोताओं ने उनसे पूछा था कि हिंदू राष्ट्र का अर्थ क्या उन्हें देश से निकालना है। उनका उत्तर था—नहीं, वह हिंदुत्व नहीं है।

यह वक्तव्य केवल मुसलमानों के लिए आश्वासन नहीं है। यह हिंदू समाज के लिए भी स्पष्ट सीमा है: भारत में मुसलमानों की नागरिक उपस्थिति विवाद का विषय नहीं होनी चाहिए। गोलवलकर अपने अस्थिर समय की आशंकाएँ लिख रहे थे; भागवत कई पीढ़ियों बाद के भारत की बात कर रहे हैं। दोनों को एक ही वाक्य में बाँधकर खारिज करना या महिमामंडित करना, दोनों ही सरलताएँ हैं।

आवश्यकता टकराव की नहीं, संवाद की है। भारतीय मुसलमान को अपने पूर्वजों के फैसलों का बोझ ढोकर निष्ठा सिद्ध नहीं करनी चाहिए। उनका मूल्यांकन उनके वर्तमान जीवन, उनके योगदान और भारत के प्रति उनके बोध से होना चाहिए। हिन्दू समाज को भी यह स्वीकार करना होगा कि देश की मजबूती साझी भागीदारी में है। इतिहास भुलाया नहीं जाना चाहिए; इतिहास की मानसिकता में हमेशा रहना भी राष्ट्रहित नहीं है।

भारत का भविष्य किसी एक समुदाय की जीत में नहीं, इस विश्वास में है कि यहाँ रहने वाला हर नागरिक-चाहे वह किसी भी धर्म का हो-इस देश के भविष्य का बराबर भागीदार है। संघ और हिंदुस्तानी मुसलमानों के बीच सकारात्मक, राष्ट्रहित आधारित संवाद यहीं से शुरू हो सकता है।

(लेखक आतिफ रशीद, पूर्व उपाध्यक्ष, राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग, भारत सरकार रहे हैं)

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