भारत पर आधारित, नॉर्वे में अखबार का संपादकीय

unnamed-7.jpg

दिल्ली : आज नॉर्वे में अखबार का संपादकीय भारत पर आधारित है। एक पत्रकार AI सम्मेलन से लौटे हैं, और उन्होंने अपने अनुभव कुछ यूँ साझा किए हैं। जाहिर है, उनकी सोच एक नॉर्वे-वासी की दृष्टि से है, लेकिन पढ़ा जाए

चींटी के ढेर पर पैर रखना

क्या होगा जब लाखों भारतीय जो तीन-पहिया टेम्पू से यात्रियों को ढोकर जीविका चलाते हैं, उन्हें एयर-कंडीशन कारों से प्रतिस्पर्धा करनी पड़े?

पिछले सप्ताह मैंने एक बिल्कुल अलग दुनिया का दौरा किया। मैं काम के सिलसिले में नई दिल्ली में था। हमेशा की तरह, शहर के एक सिरे से दूसरे सिरे तक जाना था, तो टैक्सी से जाना स्वाभाविक था। एक वातानुकूलित टैक्सी। यह एक गरम देश है। वातानुकूलित कार एक शीशों में बंद, छोटी-सी दुनिया की तरह महसूस होती है। बाहर चाहे जैसा भी मौसम हो, अंदर ठंडा और आरामदायक। दिल्ली में काम के लिए आने वाले अधिकांश मेरे जैसे लोग यही चुनते हैं।

लेकिन सड़कों पर उस दिन सामान्य से भी अधिक भीड़ थी। सम्मेलन आयोजक ने कुछ हद तक खुद को दोषी ठहराया। पुलिस ने सड़कों पर गाड़ियों को घटाने के लिए कुछ रास्ते बंद कर दिए। मैंने सोचा कि इससे बेहतर टहल ही लिया जाए।

नई दिल्ली में सुबह की भीड़ के बीच चलना एक रोचक अनुभव है। जीवन तेज है, गंध और शोर-शराबा भरपूर हैं। ख़ास कर उनके लिए जो ढीले-ढाले छोटे से नॉर्वेजियन शहर के जीवन के आदी हैं।

सम्मेलन कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के बारे में था। मैं उसके बारे में आगे लिखूँगा। जब हम कृत्रिम बुद्धिमत्ता की बात करते हैं तो हम अक्सर भविष्य की कल्पना करते हैं। लेकिन यहाँ खड़े होकर लगा कि भविष्य तो पहले ही आ चुका है।

देश पहले ही बदल चुका है। 22 वर्ष पहले भारत एक बिल्कुल अलग देश था।

आइए सड़कों से शुरू करें। हर दिशा में ठसाठस भरा हुआ है, और वाहनों का घनत्व लगातार बदल रहा है। लगभग हर चीज़ का अपना प्रवाह है। मेरा मानना है कि अब बसें बिजली से चलनी चाहिए। निजी कारें भी बैटरी पर चल सकती हैं। अच्छी वायु-गुणवत्ता पर ध्यान देने की ज़रूरत है।

संस्कृति बदल चुकी है। 22 वर्ष पहले मैंने भारत के अंग्रेज़ी अख़बार में “PDA” शब्द के बारे में पढ़ा था। मुझे लगा कि Personal digital assistant होगा, लेकिन भारत में इसका अर्थ “Public Display of Affection” था। इसका मतलब था कि युवक-युवती हाथ में हाथ डाले चलें, गले मिलें या चूमें। ऐसी बहसें अब भारत में देखने को नहीं मिलती। अब यह यहाँ स्वाभाविक है। युवा उन्मुक्त हैं, उनके हाथों में स्मार्टफ़ोन हैं।

पहले युवतियाँ पारंपरिक कपड़े पहनती थी (या पूरी तरह ढकी हुई होती थी)। बड़े, झूलते, चमकीले सोने के कानों के झुमके, हर इंच ढका हुआ। यह एक समय का संकेत था जब सुपारी और तंबाकू चबाना सामान्य था। जैसे ओस्लो के उपनगरों में धूम्रपान से पहले और बाद जैसा अंतर।

यह क्रांति केवल एक किस्सा नहीं है। यह यहाँ के लोगों के जीवन का हिस्सा है। संस्कृति बदलना आसान नहीं है, लेकिन यहाँ यह हुआ है।

आईटी उद्योग दुनिया के सबसे बड़े उद्योगों में से एक है। सैकड़ों-हज़ारों लोगों को अपनी पहली स्थायी नौकरी इसी उद्योग से मिली है। एक मध्यवर्ग विकसित हुआ है, जो उपभोग कर सकता है। यह एक विशाल छलांग है। अब लोग स्मार्टफ़ोन से भुगतान करते हैं। परंपराओं को चुनौती दी जा रही हैं। महत्वाकांक्षाएँ विशाल हैं।

यह स्पष्ट है कि भारत तरक्की कर रहा है। अब केवल सरल आईटी सेवाएँ नहीं, बल्कि उन्नत तकनीकी सेवाएँ, यहाँ तक कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता भी भारत में आ गयी हैं। जो प्रगतिशील विचार पहले से घूम रहे थे, उन्होंने नई दिशा ली है। जिन लोगों से मैं मिला, उनमें से हज़ारों की नौकरियाँ बदल गई हैं। सड़क पर भारी दबाव है। बसें। यातायात। अव्यवस्था। कारें। मोटरसाइकिलें। साइकिलें। रिक्शे। अलग-अलग रंग। लोग सामान ढोते हुए। काम पर जाते हुए।

लेकिन इन लोगों का क्या होगा यदि तकनीक वास्तव में वह कर दे जो संभावना के रूप में बताया जा रहा है?

यदि आज लाखों भारतीय जो तीन-पहिया टेम्पू से यात्रियों को ढोते हैं, उन्हें एयर-कंडीशन वाली ड्राइवर-रहित कारों से मूल्य पर प्रतिस्पर्धा करनी पड़े? यदि मोटरसाइकिल या साइकिल द्वारा पहुँचाया जाने वाला सामान ड्रोन द्वारा पहुँचाया जाए? यदि दुकानों के कर्मचारी रोबोटों से बदल दिए जाएँ, जो आदमी से बेहतर और सस्ते हों?

दुनिया भर में लोग यह सोच रहे हैं कि श्रम बाज़ार में क्या होने वाला है। यह ज्ञात है कि नई तकनीक परिवर्तन लाती है। लेकिन नॉर्वे में हम अभी भी संरक्षित क्षेत्रों में हैं। हमारे आय स्तर और संसाधन हमें सुरक्षा देते हैं। जबकि अन्य देशों में श्रम एक उलझा हुआ क्षेत्र है।

यदि किसी देश को अचानक बड़े पैमाने पर बेरोज़गारी मिलती है, तो वह स्थिर नहीं रहेगा। विरोध होंगे। और वे हिंसक भी हो सकते हैं।

हम कहते हैं कि हमें जीवन भर सीखते रहना चाहिए। यह सही है। लेकिन हर कोई आईटी विशेषज्ञ नहीं बन सकता। इसे निराशावाद के रूप में न समझें। कोई भी हमसे हमारी नौकरियाँ नहीं छीन रहा है। हम कल भी काम पर जाएँगे। लेकिन इस पर सोचना आवश्यक है।

नॉर्वे में हमें परिश्रम का फल मिलता है। लेकिन दुनिया में अरबों लोग अत्यंत कठोर श्रम करते हैं, जो गायब भी हो सकता है। पिछली औद्योगिक क्रांति के दौरान भी कई लोग पीछे छूट गए। हालाँकि उसी समय नई नौकरियाँ भी बनीं। कृत्रिम बुद्धिमत्ता की क्रांति में एकाधिकार जैसी प्रवृत्तियाँ पैदा हो सकती हैं, जिसका शायद कुछ ही लोगों को लाभ मिले।

संभल कर चलना होगा। एक ग़लती हुई और हमारे पैर चींटियों के ढेर पर होंगे।

[नॉर्वे के अखबार Dagsavisen में स्तंभकार Kjetil Staalesen

अमर उपहार – देहदान पर विश्व का प्रथम अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव

images-1-5.jpeg

अर्पित शर्मा

नई दिल्ली :- विश्व में पहली बार दिल्ली में देहदान जैसे विषय पर फिल्म फेस्टिवल आयोजित होने जा रहा है। यह आयोजन “गुरु गोविंद सिंह,इंद्रप्रथ विश्वविद्यालय, नई दिल्ली” एवं दधीचि देहदान समिति और संप्रेषण मल्टीमीडिया के संयुक्त तत्वाधान में 26 एवं 27 फरवरी को आयोजित किया जायेगा।
फिल्म फेस्टिवल का उद्घाटन एवं शुभारंभ 26 फरवरी को प्रातः 11 बजे दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता के द्वारा किया जायेगा। उद्घाटन समारोह में केंद्रीय राज्य मंत्री हर्ष मल्होत्रा तथा दिल्ली के संस्कृति मंत्री कपिल मिश्रा, विशिष्ट अतिथि फिल्म अभिनेता मनोज जोशी, समिति के संरक्षक तथा विश्व हिंदू परिषद के अंतर्राष्ट्रीय अध्यक्ष आलोक कुमार तथा फिल्म फेस्टिवल के निदेशक अतुल गंगवार मौजूद रहेंगे।

जीवन दान के साथ चिकित्सा शिक्षा में निभाई महत्वपूर्ण भूमिका

आलोक कुमार ने समिति की स्थापना 27 वर्ष पहले की थी, जिसका उद्वेश्य लोगो में मृत्यु उपरांत देहदान करने के लिए जागरूक करना था ताकि रोगी मनुष्य के जीवन को बचाया जा सके। समिति ने 13 वर्षों में 1250 अंगदान एवं 500 से अधिक नेत्रदान कराए है। इस प्रयासों से चिकित्सा महाविद्यालयों में विद्यार्थियों को “प्रथम मूक गुरु” प्रदान किया है।

शरीर की त्वचा भी हो सकती है दान

आलोक कुमार ने बताया कि लोगो को जानकारी का अभाव हे इसलिए मृत्यु उपरांत हम अपने शरीर को व्यर्थ नष्ट कर देते है, जबकि शरीर के अंगों के साथ शरीर की तव्चा भी जीवित शरीरी के रोग दूर करने में काम आती है।
बात को आगे बढ़ाते हुए कुमार कहते है कि सिनेमा का प्रभाव सीधा समाज पर पड़ता हे इसलिए ऐसे संवेदनशील विषय पर हमने यह फेस्टिवल आयोजित किया है, जिसमें लघु फिल्मों के माध्यम से हम समाज में जागरूकता फैलाने का कार्य करेंगे।
इस फिल्म फेस्टिवल के माध्यम से अंगदान और देहदान की महत्ता, मानवीय संवेदना,सामाजिक उत्तरदायित्व और जीवन के पुनर्सृजन की प्रेरक कहानियां दर्शकों तक पहुंचेगी।

70 से अधिक फिल्म प्रदर्शन के साथ कार्यशाला एवं संवाद सत्र रहेगा
फेस्टिवल के निदेशक अतुल गंगवार ने बताया कि देश-विदेश से 70 लघु फिल्म को हमने चयनित किया है, जिनका प्रदर्शन 26 एवं 27 फरवरी को रहेगा। इसी के साथ प्रतिभागियों के लिए हमने निर्माता निर्देशक एवं कलाकारों के साथ संवाद सत्र का आयोजन किया है। जिस फिल्म करो दर्शकों विद्यार्थियों को सृजनात्मक अनुभवों को सीखने का अवसर मिलेगा। साथ ही प्रख्यात अभिनेता मनोज जोशी की विशेष मास्टर्स क्लास रखी जाएगी जिसका विषय “अभिनय की बारीकियां चरित्र निर्माण और सिनेमा की संवेदनशीलता” होगा द्वितीय दिवस के सत्र में वरिष्ठ पत्रकार, लेखक, सिनेमा समीक्षक अनंत विजय की “सिनेमा के विषय चयन और सामाजिक सरोकार” विषय पर मास्टर क्लास रहेगी।
फेस्टिवल में प्रथम,द्वितीय,तृतीय स्थान पर आने वाली फिल्मों के विजेताओं को ट्रॉफी, प्रमाण पत्र एवं लाखों रुपए की पुरस्कार राशि प्रदान की जाएगी।

विज्ञान और अध्यात्म : तर्क और चेतना का संगम

images-8.jpeg

डॉ शिवानी कटारा

लखनऊ : डॉ. सी. वी. रमन ने प्रकाश के प्रकीर्णन (scattering of light) पर शोध कर 1930 में नोबेल पुरस्कार प्राप्त किया। उनका कार्य यह दर्शाता है कि वैज्ञानिक अनुसंधान भारतीय परंपरा में निरंतर जीवित और सक्रिय रहा है। रमन का कथन था—“प्रकृति स्वयं हमें प्रेरित करती है।” यह वाक्य वैज्ञानिक अवलोकन (scientific observation) और आध्यात्मिक संवेदना (spiritual sensitivity) के सुंदर मेल को प्रकट करता है।

पश्चिमी आधुनिक सोच में विज्ञान और अध्यात्म को अक्सर दो अलग रास्तों की तरह देखा जाता है—एक experiment (प्रयोग) और evidence (प्रमाण) पर आधारित, दूसरा experience (अनुभव) और faith (आस्था) पर। लेकिन भारतीय ज्ञान परंपरा में यह दूरी इतनी स्पष्ट नहीं रही। यहाँ ज्ञान (knowledge) को एक समग्र यात्रा माना गया, जहाँ प्रकृति (nature) और चेतना (consciousness) दोनों की खोज समान रूप से महत्वपूर्ण थी। स्वामी विवेकानंद ने 1893 (Chicago) में कहा था कि विज्ञान और धर्म का लक्ष्य एक ही है—सत्य की खोज।

विज्ञान पूछता है—यह जगत कैसे काम करता है?
अध्यात्म पूछता है—मैं कौन हूँ और जीवन का अंतिम सत्य क्या है?
दोनों के प्रश्न अलग दिखते हैं, पर लक्ष्य एक है—सत्य।

भारत की scientific consciousness (विज्ञान चेतना) केवल तकनीकी प्रगति नहीं, बल्कि तर्क (logic), जिज्ञासा (curiosity) और जिम्मेदारी से सोचने की आदत है। इस दृष्टि से देखें तो भारतीय अध्यात्म ने वैज्ञानिक सोच को केवल प्रेरणा ही नहीं दी, बल्कि उसे एक गहरा दार्शनिक आधार (philosophical foundation) भी प्रदान किया।

वैदिक युग : प्रश्न से शुरू हुई खोज

भारतीय अध्यात्म का प्रारंभिक आधार ऋग्वेद है। इसमें नासदीय सूक्त ‘ नासदासीन्नो सदासात्तदानीं ‘ सृष्टि की उत्पत्ति पर प्रश्न उठाते हैं—“तब क्या था? किसने सृष्टि की?” यहाँ कोई अंतिम उत्तर थोपने की जल्दी नहीं है, बल्कि प्रश्न करने की स्वतंत्रता है। यही वैज्ञानिक दृष्टिकोण (scientific temper) की पहली सीढ़ी है – आश्चर्य और जिज्ञासा।

उपनिषदों में “नेति-नेति” (यह नहीं, वह नहीं) की पद्धति भी एक तरह की विश्लेषणात्मक विधि (analytical method) है—हर संभावना को परखकर सत्य तक पहुँचना। यह उसी प्रकार है जैसे विज्ञान में परिकल्पना (hypothesis) को जांचकर अंतिम निष्कर्ष निकाला जाता है।

इस प्रकार भारतीय अध्यात्म ने विज्ञान को विरोधी नहीं, बल्कि सहयोगी माना—बाहरी खोज (outer exploration) और आंतरिक अनुभूति (inner realization) की संयुक्त यात्रा के रूप में। यहाँ प्रकृति, ग्रहों या शरीर का अध्ययन आध्यात्म से अलग नहीं समझा गया। भारतीय दृष्टि के अनुसार केवल बाहरी ज्ञान से जीवन का पूर्ण अर्थ नहीं मिलता और केवल आंतरिक साधना से संसार की कार्यप्रणाली नहीं समझी जा सकती; दोनों का संतुलन आवश्यक है।

प्राचीन विज्ञान : अध्यात्म की भूमि पर विकसित

प्राचीन भारत में गणित, खगोलशास्त्र (astronomy) और आयुर्वेद का विकास केवल तकनीकी आवश्यकता से नहीं, बल्कि एक गहरे आध्यात्मिक वातावरण में हुआ। भारतीय गणितज्ञों ने decimal system (दशमलव पद्धति), zero (शून्य) और infinity (अनंत) जैसी क्रांतिकारी अवधारणाएँ दीं। ये खोजें केवल संख्याओं का विस्तार नहीं थीं, बल्कि ब्रह्मांडीय व्यवस्था (cosmic order – ऋत) को समझने का प्रयास भी थीं—एक ऐसा विश्वास कि यह सृष्टि व्यवस्थित और अर्थपूर्ण है।

खगोलशास्त्र में ग्रह-नक्षत्रों की गति को केवल गणना का विषय नहीं माना गया, बल्कि एक नियमबद्ध ब्रह्मांड (ordered universe) की अभिव्यक्ति के रूप में देखा गया। इसी प्रकार आयुर्वेद को “science of life” कहा गया। आयुर्वेद समग्र दृष्टि (holistic approach) अपनाता है—जहाँ शरीर, मन और आत्मा एक ही सूत्र में जुड़े माने जाते हैं। स्वास्थ्य को तीन दोष (वात, पित्त, कफ) के संतुलन के रूप में समझा गया। यह संतुलन हमें याद दिलाता है कि हम अलग-थलग अस्तित्व नहीं हैं, बल्कि प्रकृति का ही हिस्सा हैं। हमारे भीतर का सूक्ष्म जगत (microcosm) बाहर के विराट जगत (macrocosm) से जुड़ा है। जब प्रकृति में लय होती है, तब जीवन में भी लय आती है।

अध्यात्म ने विज्ञान को कैसे समृद्ध किया?

भारतीय अध्यात्म ने विज्ञान को तीन स्तरों पर दिशा दी—पहला, नैतिक दिशा (ethical direction), ताकि ज्ञान मानव कल्याण के लिए उपयोग हो। दूसरा, जिज्ञासा-प्रेरित खोज (curiosity-driven inquiry), जहाँ “मैं कौन हूँ?” और “यह जगत क्या है?” जैसे प्रश्न खोज की शुरुआत बने। तीसरा, समग्र दृष्टि (holistic vision), जिसमें मनुष्य, प्रकृति और ब्रह्मांड को परस्पर जुड़ी हुई व्यवस्था (interconnected reality) माना गया।

आधुनिक युग : क्वांटम फिजिक्स और वेदांत

आज के समय में भी विज्ञान और अध्यात्म के बीच संवाद जारी है। विशेषकर Quantum Physics (क्वांटम भौतिकी) और Cosmology (ब्रह्मांड विज्ञान) के क्षेत्र में। जिनेवा स्थित विश्वप्रसिद्ध प्रयोगशाला CERN में भगवान शिव ‘नटराज’ की प्रतिमा स्थापित है। यह “कॉस्मिक डांस” यानी ‘ब्रह्मांड का नृत्य’ की प्रतीक है—सृष्टि लगातार बनती और बदलती रहती है। जैसे शिव का नृत्य निर्माण और विनाश के चक्र को दिखाता है, वैसे ही विज्ञान बताता है कि बहुत छोटे कण (particles) आपस में टकराते हैं, टूटते हैं और ऊर्जा में बदल जाते हैं। वैज्ञानिक Fritjof Capra ने कहा कि जो दृश्य भारतीय कलाकारों ने शिव के नृत्य में दिखाया, आज के वैज्ञानिक उसे कणों (particles) और ऊर्जा (energy) की गतिविधि में देखते हैं। यानी अलग भाषा है, पर कहानी एक ही है—ब्रह्मांड हमेशा गतिशील है।

क्वांटम फिज़िक्स का एक रोचक सिद्धांत है wave-particle duality (तरंग-कण द्वैत)। बहुत छोटे कण (particles) कभी तरंग (wave) की तरह व्यवहार करते हैं और कभी कण (particle) की तरह। यानी जो चीज़ हमें एक रूप में दिखती है, वह असल में उससे कहीं अधिक जटिल हो सकती है। यह हमें सोचने पर मजबूर करता है कि वास्तविकता (reality) हमेशा वैसी नहीं होती जैसी हमारी आँखों को दिखाई देती है। यही बात वेदांत के माया (illusion) सिद्धांत में भी कही गई है—दिखने वाली दुनिया अंतिम सत्य नहीं, बल्कि एक परत है जिसके पीछे गहरा सत्य छिपा है। प्रसिद्ध वैज्ञानिक Erwin Schrödinger वेदांत से प्रभावित थे। उनका मानना था कि चेतना (consciousness) मूल रूप से एक ही है, अलग-अलग व्यक्तियों में बंटी हुई नहीं। यह विचार वेदांत के अद्वैत (non-duality) सिद्धांत से मिलता है, जहाँ सब कुछ एक ही सार्वभौमिक चेतना (universal consciousness) का हिस्सा माना जाता है।

इस प्रकार आधुनिक विज्ञान और वेदांत के बीच यह संवाद दिखाता है कि सत्य की खोज केवल प्रयोगशाला तक सीमित नहीं, बल्कि चेतना की गहराइयों तक फैली हुई है। जब विज्ञान और अध्यात्म साथ चलते हैं, तो हमारी समझ अधिक व्यापक, संतुलित और अर्थपूर्ण बनती है।

चेतना का प्रश्न : आज भी खुला संवाद

आज का आधुनिक विज्ञान ब्रह्मांड और मस्तिष्क का बहुत बारीक नक्शा बना सकता है। हम जान सकते हैं कि कौन-सा हिस्सा क्या काम करता है। लेकिन एक सवाल अब भी पूरी तरह सुलझा नहीं है—हम जो “अनुभव” करते हैं, जैसे खुशी, दुख, प्रेम या शांति, वह आखिर कैसे जन्म लेता है? यह व्यक्तिगत अनुभव (subjective experience) अभी भी विज्ञान के लिए एक रहस्य है। ऋषियों ने बहुत पहले कहा था कि भौतिक जगत को समझ लेना ही अंतिम ज्ञान नहीं है। उसके परे भी एक आयाम है— चेतना, जो केवल पदार्थ से परिभाषित नहीं होती क्योंकि वह हमारे अनुभव, सोच और आत्मबोध से जुड़ी है। आज ध्यान पर हो रहे वैज्ञानिक शोध दिखा रहे हैं कि यह तनाव कम कर सकता है और मस्तिष्क पर सकारात्मक प्रभाव डाल सकता है। इस तरह प्राचीन योग परंपरा और आधुनिक neuroscience के बीच एक रचनात्मक विमर्श विकसित हो रहा है—जहाँ बाहरी अध्ययन और आंतरिक अनुभव एक-दूसरे से सीख रहे हैं।

निष्कर्ष : एक समग्र समझ की ओर

इस पूरे विमर्श से स्पष्ट होता है कि भारतीय ज्ञान परंपरा में अध्यात्म और विज्ञान का संबंध विरोध का नहीं, बल्कि परस्पर सहयोग (complementarity) का रहा है। प्राचीन वैदिक चिंतन से लेकर आधुनिक प्रयोगशालाओं तक, दोनों ने अलग-अलग तरीकों से एक ही लक्ष्य—सत्य—की खोज की है। यह कहना उचित नहीं कि आधुनिक विज्ञान ने प्राचीन आध्यात्मिक सिद्धांतों को पूरी तरह प्रमाणित कर दिया है। किंतु यह अवश्य कहा जा सकता है कि जब विज्ञान और अध्यात्म के बीच सार्थक संवाद स्थापित होता है, तो ज्ञान अधिक व्यापक और गहरा बनता है।

(लेखिका, डेंटल सर्जन हैं तथा दिल्ली स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स से पीएचडी हैं)

जाति के बंधनों से ऊपर उठकर: असली सामाजिक समरसता की जीती-जागती मिसालें

bhagawa-hindu-rahul.jpg

जयपुर। भारतीय समाज में जाति को लेकर सदियों से चली आ रही दीवारों को तोड़ने वाली अनगिनत घटनाएं मौजूद हैं, लेकिन उन्हें अक्सर अनदेखा कर दिया जाता है। कुछ ताकतें जानबूझकर समाज को जाति के आधार पर बांटने में लगी रहती हैं, जबकि मजहब की ‘सच्चाई’ इससे कहीं बड़ी है।

कांग्रेस जैसी पार्टियों ने दशकों तक अपनी राजनीति में हिंदुओं को जाति के नाम पर बांटने का काम किया और साथ ही धार्मिक एकता का नारा देकर असल मुद्दों को ढकने की कोशिश की। उनका इकोसिस्टम भी इसी दिशा में काम करता रहा—हिंदू-मुस्लिम एकता की चुनिंदा कहानियों को इतना बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जाता है, जैसे हिंदू समाज सिर्फ अगड़े-पिछड़े की लड़ाई में उलझा हो, लेकिन मुसलमानों से भाईचारा निभा रहा हो।

सवाल यह है— कोई समाज जब खुद अपने भीतर एकजुट नहीं होता, तो दूसरे के साथ एकता का दावा कैसे कर सकता है? देश में लाखों ऐसी अनकही कहानियां हैं जहां अगड़े-पिछड़े का भेद मिटाकर लोग एक-दूसरे के साथ खड़े हुए, लेकिन मीडिया और राजनीतिक हलकों ने उन्हें कभी प्रमुखता नहीं दी।

वामपंथी विचारधारा में जाति का जहर बचपन से ही पिलाया जाता है। इसलिए कई प्रगतिशील दिखने वाले लोग प्रेम-विवाह तो करते हैं, लेकिन लड़की अपनी ही जाति की चुनते हैं। जैसे अजीत अंजुम सिंह और अविनाश पांडेय अनार्य वहीं, संजीव और कवयित्री स्वाति तिवारी जैसे असंख्य जोड़े बिना किसी लेबल के, सिर्फ हिंदू होने के नाते एक-दूसरे से बंधे। उन्होंने अंतरजातीय विवाह नहीं किया—क्योंकि उसमें जाति का ढांचा बरकरार रह जाता है—बल्कि हिंदू होकर हिंदू से विवाह किया, जहां जाति गौण हो जाती है।

हाल ही में राजस्थान के सीकर में एक ऐसी घटना हुई जिसने छुआछूत को सीधा चुनौती दी। सवर्ण और अनुसूचित जाति के लोगों ने मिलकर सामूहिक भोजन का आयोजन किया। यह सिर्फ भोजन नहीं था—यह जातिगत भेदभाव पर एक तगड़ा थप्पड़ था। जब राज्य के कुछ हिस्सों में जातीय तनाव की खबरें आ रही थीं, तब सीकर के इस प्रयास ने दिखाया कि दोनों समुदाय सम्मान और सहयोग के साथ साथ बैठ सकते हैं। लोगों ने इसे ‘हिंदुत्व का असली मर्म’ करार दिया, क्योंकि यहां मदद और आदर दोनों तरफ से था।

एक और दिल छू लेने वाली घटना राजस्थान के पाली जिले से जुड़ी है, जहां सुकड़ी नदी के तेज बहाव में फंसे सात लोगों (चार महिलाएं, एक बच्चा और दो पुरुष) को मेघवाल समाज (अनुसूचित जाति) के तीन युवकों—मदन मेघवाल, बबलू मेघवाल और प्रकाश मेघवाल—ने अपनी जान जोखिम में डालकर बचाया। उन्होंने नदी में छलांग लगाई और सभी को सुरक्षित बाहर निकाला। यहां जाति का कोई विचार नहीं था—सिर्फ इंसानियत थी। बहुजन समाज ने सवर्ण समुदाय के लिए हाथ बढ़ाया और साबित किया कि मुश्किल में इंसान इंसान के काम आता है।

ऐसी घटनाएं स्पष्ट संदेश देती हैं कि समाज में हिंदू-मुस्लिम विभाजन फैलाने वाले तत्वों के बावजूद, जमीनी स्तर पर सवर्ण और बहुजन एक-दूसरे के दुख-दर्द में शामिल होते हैं—चाहे वह शादी में सहयोग हो, आपदा में बचाव हो या सामूहिक भोज में साथ बैठना हो। यही सच्ची सामाजिक समरसता है, जो धीरे-धीरे मजबूत हो रही है।

ऐसे प्रयासों को समाज में और बढ़ावा मिलना चाहिए। जब तक हिंदू समाज अपने भीतर एकजुट नहीं होगा, तब तक हिंदू-मुस्लिम एकता की बातें सिर्फ धोखे का जाल बुनती रहेंगी। पहले अपना घर मजबूत बनाइए, अपनी एकता को अटूट कीजिए—तभी सच्ची दोस्ती और भाईचारे का हाथ आगे बढ़ सकता है।

यही वह राह है जो समाज को वास्तविक सद्भाव की ओर ले जाएगी।

scroll to top