19 सितम्बर 2022 सुप्रसिद्ध गौरक्षक और राम जन्मभूमि आँदोलन को जीवन समर्पित करने वाले आचार्य धर्मेंद्र का निधन

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दिल्ली । राजनैतिक संघर्ष और स्वसत्ता स्थापित करना तो स्वतंत्रता संघर्ष होता ही है लेकिन इससे बड़ा संघर्ष समाज में स्वत्व और साँस्कृतिक गौरव की स्थापना करना है । इसी अभियान को अपना पूरा जीवन समर्पित किया था आचार्य धर्मेन्द्र ने । गौरक्षा आँदोलन में उन्होंने अनशन किया तो उनकी पत्नि भी जेल गईं थी ।
अद्भुत विचारक और ओजस्वी वक्ता संत आचार्य धर्मेन्द्र अपने यशस्वी पिता संत रामचंद्र वीर की इकलौती संतान थे । उनका जन्म 9 जनवरी 1942 को उस समय हुआ जब उनके पिता जेल में थे । वे आठ वर्ष की आयु से पिता के साथ रहते और प्रवचन सुनते । उनकी स्मरण शक्ति अद्भुत थी । यह स्वतंत्रता के बाद विभाजन से उत्पन्न विभीषिका का समय था । उत्तर मध्य और पश्चिम भारत में हुये रक्तपात और शरणार्थियों के दर्द की कल्पना तक नहीं की जा सकती। सभी संत और सामाजिक व्यक्ति पीड़ितों की सेवा सुश्रुषा में लगे थे । पिता रामचंद्र वीर भी इसी में व्यस्त थे । बालवय धर्मेन्द्र भी उनके साथ जो समाज सेवा में लगे तो पूरा जीवन समर्पित हो गया । पिता के साथ सेवा कार्य तो करते ही साथ साथ संस्कृत की शिक्षा भी होती रहती । किशोर वय में उनके मन में यह बात आ गई कि समाज और देश के सामने इस संकट का मुख्य कारण संस्कृति से विखराव और असंगठन है । उन्होंने तेरह वर्ष की आयु में एक समाचारपत्र निकाल जिसका नाम हनुमान जी के नाम पर “वज्रांग” रखा । इस समाचार पत्र में तीन प्रकार की सामग्री होती । एक भारतीय संस्कृति की श्रेष्ठता और वैज्ञानिकता । दूसरा संगठन का महत्व और तीसरा परंपराओं का महत्व और उनकी रक्षा के लिये जाग्रत रहना । अपने इस अभियान के अंतर्गत देश भर की यात्रा की और लोगों को गौरक्षा एवं गौपालन के लिये प्रेरित किया ।

 

अपने देश व्यापी अभियान के साथ वेद वेदान्त और उपनिषद का अध्ययन भी नारंतर रहा । समय के साथ विवाह हुआ और पत्नि प्रतिभा भी सनातन संस्कृति की विद्वान थीं। अपने अभियान के अंतर्गत ही विश्व हिंदु परिषद के संपर्क में आये । 1966 के गौरक्षा आँदोलन में भी उनकी भूमिका महत्वपूर्ण रही । उन्होंने गौरक्षा आँदोलन में 52 दिनों का अनशन किया था । वे गिरफ्तार हुये और जेल भेजे गये । इस आँदोलन में उनकी पत्नि प्रतिभा देवी भी गिरफ्तार हुईं और तीन दिन जेल में रहे ।
आगे चलकर वे राजस्थान में जयपुर के समीप विराटनगर स्थित श्री पंचखंड पीठाधीश्वर बने । उन्होंने बालवय में इसी आश्रम में रहकर शिक्षा ग्रहण की थी और साधु संतों के सानिध्य में साधना सीखी थी । इस आश्रम का प्रमुख बनने के बाद उनके संपर्क में सभी राजनैतिक दलों के नेताओं से बने । जिनमें काँग्रेस के भी थे ।

 

पर गौरक्षा आँदोलन के बाद उनका संपर्क विश्व हिन्दु परिषद से गहरा हुआ और स्थाईरूप से विश्व हिन्दु परिषद के हो गये । वे बहुभाषा के ज्ञानी थे । अद्वितीय स्मरण शक्ति और अद्भुत वक्ता थे अपनी प्रतिभा के चलते ही विश्व हिन्दु परिषद और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में उनका संपर्क गहरा हो गया । इसका एक कारण यह भी था कि विश्व हिन्दु परिषद और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने गौरक्षा का न केवल खुलकर समर्थन किया था अपितु उनके असंख्य कार्यकर्ता संतों के साथ आँदोलन में सहभागी बने थे । विश्व हिन्दु परिषद ने उनकी प्रतिभा और क्षमता के अनुरूप दायित्व सौंपे। वे विश्व हिन्दु परिषद के केन्द्रीय मंडल के प्रमुख सदस्य बने । इसके चलते पहले भारतीय जनसंघ और फिर भारतीय जनता पार्टी में ऐसा कोई नेता नहीं जिनसे उनका व्यक्तिगत परिचय न हो । विश्व हिन्दु परिषद द्वारा निकाली गई गंगाजलि यात्रा और फिर अयोध्या में रामजन्म भूमि मुक्ति आन्दोलन में भी उनकी भूमिका महत्वपूर्ण रही ।

 

उन्होंने अपना पूरा जीवन हिन्दु, हिंदी, हिंदुत्व और हिंदुस्तान के गौरव की पुनर्प्रतिष्ठा के लिए समर्पित कर दिया था । बातों को तोड़ मरोड़कर प्रस्तुत करना उनके स्वभाव में न था । वे दो टूक बात करते थे और तर्क के साथ । कई बार उनके वक्तव्यों से असहमति के बाद भी विभिन्न राजनैतिक दलों के नेता उनका सम्मान ही करते थे । वे जो काम हाथ में लेते उसे प्राण पण से पूरा करते थे । श्रीराम जन्मभूमि मुक्ति मानों उन्होंने अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया था । वे इस आंदोलन का महत्वपूर्ण हिस्सा थे और प्रमुख नेतृत्व कर्ताओं में से एक थे । राम मंदिर मुद्दे पर उन्होंने देशव्यापी यात्रा की, कार्यकर्ताओं का मार्गदर्शन किया और मीडिया से खुलकर बात की । 1992 में जब विवादास्पद ढांचा ढहा तब जिन्हे भी आरोपी बनाया गया था । जब ढांचा विध्वंस का फैसला सुनाया जाना था तब इन्होने कहा था- “सच से डरना क्या, जो फैसला होगा हमें स्वीकार होगा, हमारा जन्म तो रामकाज के लिये ही हुआ है” । ढांचा विध्वंस मामले में श्री कल्याण सिंह, लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी और उमा भारती को भी इनके साथ आरोपी बनाया गया था ।

आचार्य धर्मेंद्र का पूरा जीवन भारत माँ की सेवा और हिंदुत्व भाव की जाग्रति में समर्पित रहा । वे अनेक आंदोलनों और सत्याग्रहों का हिस्सा रहे और जेल गए ।
उनके जीवन का उत्तरार्ध गहन शारीरिक अस्वस्थता में बीता वे कई दिनों तक जयपुर के सवाई मानसिंह अस्पताल में भर्ती रहे । वे आंतों से संबंधित गंभीर बीमारी से पीड़ित थे । अंततः 19 सितम्बर 2022 को उन्होने संसार से विदा ली । उनका अंतिम संस्कार विराटनगर स्थित उनके मठ में ही किया गया । उनके निधन पर राजस्थान के सभी राजनैतिक दलों से जुड़े नेताओं और विशेष कर हिंदू संगठनों से जुड़े कार्यकर्ताओं ने देश भर में शोक सभाएँ कीं । उनके निधन से राममंदिर आँदोलन जुड़े सभी कारसेवकों को गहरा शोक हुआ । वे अपने जीवन में वहाँ भव्य मंदिर देखना चाहते थे । उनकी यह इच्छा अधूरी रह गई।

ज्योतिर्मातमसो गमय !

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बाबा सत्यनारायण मौर्या

भोपाल । फ्री में UPI कब तक दें…. ठीक है लेकिन बाकी हजारों करोड़ फ्री की योजनाये चल रही है … वे क्या उचित हैं ? भाजपा सरकार ने देश को आर्थिक रूप से कई मामलों में मजबूत किया है मान लिया लेकिन चुनाव के समय ऐसे कदम उठाये तो भविष्य में जो आयेंगे क्या वे इस धन की बंदरबांट करके ख़त्म नहीं कर देंगे ?
इण्डिया शाइनिंग का हाल पार्टी पहले देख चुकी है. मुफ्त में मकान, अनाज और बाकी सामान जिन्हें बांटा है उन्होंने क्या दिया है ? आज भी वे केश का ही धंधा करते है. उन्हें टेक्स से मतलब है ही नहीं . जो समाज एक नम्बर की मुख्य धारा में आ रहा है उसे और नाराज करने से क्या मिलेगा ? उनसे जो लात मिलेगी वो कितनी जोरदार होगी… इसे चिदंबरम बहुत अच्छी तरह समझ रहे हैं। कोई मूर्ख नही है जो समर्थन कर रहे हैं।

ये जिओ वाली टेक्नीक है पहले फ्री बांटो फिर आदत लग जाने पर काटो. सरकार शुरू से ही यदि ये भार लगा देती तो आज हंगामा नहीं मचता ! बाद में आरक्षण जैसी स्थिति तो होगी ही.
हालांकि ये रकम जनता के लिए भी छोटी सी है और सरकार के लिए तो न के बराबर ही है. लेकिन ये वही कदम है जो देश को फिर से काले धन की और ले जायेगा.
सरकार को इस कदम को क्या कहा जाए … पडी लकड़ी लेना या कुल्हाड़ी पर पैर मारना. जब उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य का चुनाव हो तब इसे कदम उठाना क्या माना जाएगा ? मीडिया तो इसकी तारीफ़ करेगा ही क्योंकि सरकार आपकी है. सोशल मीडिया की टीम भी समझाने की कोशिस करेगी लेकिन उनसे यह पूछा जाना चाहिए कि इससे सरकार पर बोझ बढेगा लेकिन बाकी की हजारो करोड़ की मुफ्त बांटों की योजनाओं से सरकार का कौन सा खजाना भर रहा है.?
अगर upi फ्री भी है तो भी उससे ज्यादा GST तो मिल ही रहा है न ! उससे पेट नही भर रहा है सरकार का ! कान तो वैसे भी पकड़ ही रखा है न।
सच बात तो ये है कि नेता और अधिकारी लोग तो झोला भर लेंगे. मोदी जी तो झोला उठाकर चल देंगे. बाद में कौन भुगतेगा …. वही जिसने भरोसा किया.
सच सोचना कहिये कि अब जहां जाने की उम्र हो चुकी है वहां झोला भी नहीं ले जाया जा सकता !
खेर देश को सफ़ेद से काले धन की यात्रा मुबारक !
ज्योतिर्मातमसो गमय ! हमें उजाले से अँधेरे की और ले चल

परसेप्शन और नैरेटिव का खेल 

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कृष्णमुरारी त्रिपाठी अटल

रायपुर ।  को लेकर समाज में नए उद्वेलन की तैयारी है। ये एक नया बखेड़ा शुरू हो चुका है। UGC GUIDLINE, एट्रोसिटी एक्ट, Neet-exam, एथेनॉल के बाद अब UPI को लेकर समाज में विमर्श बनाना , सरकार के बूते की बात नहीं समझ आ रही है। कोई कितना भी पीठ ठोंके, आंकड़े बताएं। फला-फला होगा। लोग नहीं सुनना चाहते। उन्होंने ये परसेप्शन मान लिया है कि – ये ग़लत है। इससे आम लोगों की ज़िंदगी में बोझ बढ़ेगा। ठीक वैसे ही जैसे तीनों कृषि कानून भले ही कितने अच्छे रहे हों, लेकिन परसेप्शन बना तो बना।

वैसे भी राजनीति तो परसेप्शन और नैरेटिव का ही खेल है‌ । मुझे ये समझ नहीं आता है कि —समाज में भ्रम, उद्वेलन उत्पन्न करने वाले निर्णय थोक के भाव क्यों लिए जा रहे हैं? UPI – जो डिजिटल बैंकिंग की हमारी वैश्विक पहचान बनी। उसको लेकर अविश्वास उत्पन्न करने की इतनी क्या जल्दी थी ? तमाम दावों के बाद
₹ 2 हजार की लिमिट वाला मामला किसी के गले नहीं उतर रहा है।

—• कहीं ऐसा तो नहीं है कि आर्थिक सलाहकारों, ब्यूरोक्रेट्स ने ठान लिया है कि – इस सरकार को अब लंबे समय तक नहीं रहने देना है? अन्यथा थोक के भाव ऐसे फैसले क्यों आ रहे हैं? जो सीधे आम लोगों के मन में अविश्वास स्थापित कर रहे। बाक़ी विरोधी तो अपनी रोटियां सेंकेंगे ही।

यूपीआई सरचार्ज और झूठ की गूंज वाली राजनीति

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लखनऊ । यूनिफाइड पेमेंट इंटरफेस (यूपीआई) की 10 वर्षों की गौरवमयी यात्रा और अभूतपूर्व सफलता के बाद केंद्र सरकार ने आगामी 15 अक्तूबर 2026 से इसके माध्यम से दो हजार रुपए से अधिक के कारोबारी भुगतान पर कारोबारियों के लिए 0.4 प्रतिशत मर्चेंट डिस्काउंट रेट (एमडीआर) लगाने का निर्णय लिया है।
झूठ की गूंज एक्सप्रेस चलाने वाले कांग्रेस नेता राहुल गांधी के नेतृत्व वाला इंडी गठबंधन इस निर्णय के लिए सरकार पर अमेरिकी दबाव में झुकने, घुटने टेकने जैसे आरोप लगा रहा है। विपक्ष सोशल मीडिया पर 0.4 प्रतिशत एमडीआर शुल्क को मोदी टैक्स बताकर इसे तत्काल वापस लेने की मांग कर रहा है। 2000 से ऊपर के कारोबारी भुगतान के इस 0.4 प्रतिशत शुल्क पर विपक्ष के झूठ की गूंज सोशल मीडिया से लेकर व्यापारियों तक पहुंच चुकी है। राजधानी लखनऊ व उत्तर प्रदेश के व्यापारी इसका प्रबल विरोध कर रहे हैं जबकि पेट्रोल पंप कंपनियां इस टैक्स को वापस लेने के लिए सरकार पर दबाव बना रही हैं, कुछ पेट्रोल पंपों ने यूपीआई से करें भुगतान वाले बैनर व पोस्टर हटाने भी शुरू कर दिए हैं।
राहुल गांधी व उनका ईको सिस्टम एक सुनियोजित साजिश के तहत सोशल मीडिया पर तरह -तरह की अफवाहें फैला रहा है कि अब डिजिटल लेन-देन कम हो जाएंगे और बाजार में कैश का चलन बढ़ जाएगा। जो लोग कैश की जगह यूपीआई पेमेंट करते हैं उन्हें आर्थिक नुकसान उठाना होगा। राहुल गांधी व इंडी गठबंधन के नेताओं को लग रहा है कि 0.4प्रतिशत शुल्क की आड़ में वो अपनी राजनीति को चमका लेंगे और मोदी सरकार की छवि को गहरा आघात लगा देंगे। राहुल गांधी ऐसे प्रयास पहले भी कर चुके हैं । राफेल से लेकर कोविड तक और फिर अमेरिका -ईरान युद्ध के मध्य गैस व तेल का संकट पैदा होने पर भी इन लोगों ने सोचा था कि अब तो मोदी सरकार चली ही जाएगी।
आश्चर्यजनक बात ये है कि एक तरफ कांग्रेस नेता राहुल गांधी 0.4प्रतिशत एमडीआर पर मोदी सरकार के पीछे पड़े हैं वहीं संसदीय समिति में शामिल कांग्रेस के सांसदों ने इसका समर्थन किया है। सरकार का विरोध करने से पहले राहुल गाँधी को अपने उन सांसदों से बात करनी चाहिए थी जिन्होंने वित्तीय मामलों की संसद की स्थायी समिति में यूपीआई पर यह टैक्स लगाने का समर्थन किया था। इस समिति में कांग्रेस सांसद तथा पूर्व वित्त मंत्री पी चिदम्बरम, मनीष तिवारी, गौरव गोगोई, किशोरीलाल और के. गोपीनाथ जैसे नेता शामिल थे।
यूपीआई भारत का सफलतम डिजिटल नवाचार है। आज देश का लगभग हर नागरिक डिजिटल भुगतान कर रहा है। आम जनता अपनी जेब में नोट व खुले पैसे रखना भूल चुकी है। यूपीआई से प्रतिदिन 79 करोड़ ट्रांजेक्शन होते हैं। यह दुनिया का सबसे बड़ा डिजिटल प्लेटफार्म बन चुका है जिस पर विगत वर्ष 24 हजार करोड़ ट्रांजेक्शन के माध्यम से 314 लाख करोड़ रुपए का लेनदेन हुआ। इतना बड़ा प्लेटफार्म अभी तक पूरी तरह से निः शुल्क चल रहा था। एक वर्ष में डिजिटल प्लेटफार्म को चलाने में 20 हजार करोड़ रुपए खर्च होते हैं और सरकार ने इसे 10 वर्ष तक निःशुल्क चलाया। लेन-देन की संख्या अरबों में पहुंचने के बाद सर्वर ,साइबर सुरक्षा और तकनीकी रख रखाव के लिए एक स्थायी राजस्व मॉडल की जरूरत है। अब चूंकि नियम साफ हो चुके हैं और बडे़ मर्चेट लेन देन पर शुल्क का रास्ता खुल गया है इससे उन बैंकों और फिनटेक कंपनियों की वित्तीय सेहत सुधरेगी जो इस नेटवर्क को चला रह हैं।सरकार का यह निर्णय आते ही फिनटेक कंपनियों की किस्मत चमक गई है और पेटीएम का शेयर 52 सप्ताह के शिखर पर पहुंच गया है।
सरकार ने इस पहली बार यूपीआई की व्यवस्था के खर्च को संबोधित करने के लिए मामूली शुल्क लगाया है। शुल्क लेने में अत्यंत कड़ी शर्तें हैं जिसमें अगर कोई व्यापारी आम जनता से एमडीआर शुल्क के बहाने अधिक पेमेंट की मांग करता है तो वह उपभोक्ता संबंधित दुकानदार व व्यापारी की शिकायत भी कर सकता है। विकसित भारत विरोधी अराजक तत्व अभियान चलाकर, सामान्य जनता को बहका रहे हैं जबकि सत्यता यह है कि 96 प्रतिशत यूपीआई भुगतान अभी भी एमडीआर से बाहर है। सरकार द्वारा बनाए गए नियम एकदम स्पष्ट हैं जिसके अनुसार रेहड़ी पटरी लगाने वालों तथा फल सब्जी आदि बेचने वाले किसी भी छोटे कारोबारी को अतिरिक्त शुल्क कतई नही देना है। प्रतिमाह एक लाख रूपए का कारोबार करने वाले दुकानदार को भी कोई चार्ज नहीं देना है। उपभोक्ता जब कारोबारी को यूपीआई के माध्यम से दो हजार रुपए का भुगतान करेंगे तो उन्हें कोई शुल्क नहीं देना होगा। यह शुल्क केवल कारोबारियों पर लगेगा। कारोबारियों से स्पष्ट कहा गया है कि वह शुल्क की वसूली वह ग्राहकों से नही कर सकते। नियमों के अनुसार किसी भी कारोबारी को 2000 रुपए तक पेमेंट एमडीआर से छूट वाला ही रहेगा इसलिए किराना, दवाएं ,रेस्तरां, कैब ,छोटी खरीदारी और रोजमर्रा के अधिकांश भुगतान पर कोई बदलाव नहीं होगा। रेलवे, टेलीकॉम, बीमा ईंधन और कृषि इनपुट जैसी जरूरी या कम मुनाफे वाले क्षेत्रों को अलग राहत दी गई है।
विशेषज्ञों का स्पष्ट मत है कि इस एमडीआर शुल्क से यूपीआई से भुगतान का अनुभव पहले जैसा ही रहेगा अपितु यह और आसान हो जाएगा। ग्राहक के लिए यूपीआई पूरी तरह से निःशुल्क है छोटे भुगतान और व्यापारी पूरी तरह से सुरक्षित हैं केवल 2,000 रुपए से ऊपर के चुनिंदा बड़े कारोबारियों पर 15 अक्तूबर 2026 से सीमित एमडीआर लागू होगा।
विपक्ष के झूठ की गूँज कितनी भी तेज हो भारत की आम जनता अब समझदार हो गई है और बेधड़क यूपीआई का प्रयोग करती रहेगी । राहुल गांधी एंड कंपनी को पहले इस बात का उत्तर देना होगा कि यदि उनको एमडीआर से विरोध था तो उनके सांसदों ने अवसर दिए जाने पर भी इसका विरोध क्यों नहीं किया और क्यों हंगामा कर रहे हैं? स्वाभाविक रूप से राहुल गाँधी की नीयत में खोट है ।
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