यमुना स्वच्छता अभियान: प्लास्टिक कूड़ा उठाया, बाजार में जागरूकता मार्च

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नई दिल्ली। नमामि गंगे के नेतृत्व में यमुना टास्क फोर्स के सहयोग से युवा परिवर्तन फाउंडेशन द्वारा रविवार 17 मई को यमुना घाट पर स्वच्छता अभियान चलाया गया। सुबह 7:30 बजे से 10:30 बजे तक ढाई पुस्ते यमुना घाट पर आयोजित इस अभियान में टीम ने घाट को प्लास्टिक कूड़े से मुक्त करने का कार्य किया।

अभियान के पहले भाग में स्वयंसेवकों ने यमुना घाट से बड़ी मात्रा में प्लास्टिक कूड़ा एकत्रित किया। अभियान के दूसरे भाग में टीम सोनिया विहार के दूसरे पुस्ता मार्केट पहुंची, जहां पैदल जागरूकता मार्च निकाला गया। मार्केट के दुकानदारों से अपील की गई कि वे स्वयं जागरूक हों और ग्राहकों को भी जागरूक करें।

युवा परिवर्तन फाउंडेशन की महासचिव निशा राठौर के दिशा-निर्देश में चलाए गए इस अभियान में मुख्य संदेश दिया गया कि पूजा सामग्री आने वाले किसी भी प्लास्टिक पैकेट को कूड़े के रूप में ही देखा जाए। इसे यमुना में प्रवाहित न किया जाए बल्कि कूड़ेदान में डाला जाए। घाटों की स्वच्छता बनाए रखने की अपील की गई।

इस अभियान में नवजागृति योग समिति और माँ जानकी सेवा समिति ने भी सहयोग प्रदान किया। टीम के सदस्यों ने कहा कि यमुना की सफाई केवल एक दिन का कार्यक्रम नहीं है, बल्कि यह निरंतर प्रक्रिया है। आम नागरिकों, दुकानदारों और पूजा सामग्री विक्रेताओं की भागीदारी से ही हम यमुना को स्वच्छ बना सकते हैं।

अभियान में शामिल स्वयंसेवकों ने घाट पर जमा कूड़े को साफ करते हुए और बाजार में जागरूकता फैलाते हुए पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक सकारात्मक कदम उठाया। युवा परिवर्तन फाउंडेशन ने भविष्य में भी ऐसे नियमित अभियानों का आयोजन करने की योजना बनाई है।

हेले लेंग : भारत विरोध का नया चेहरा, पुरानी टूलकिट

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— कृष्णमुरारी त्रिपाठी अटल

नॉर्वे के ओस्लो में ग्लोबल टूलकिट के प्रोपेगैंडा वाली बात कोई नहीं है। पत्रकार के भेष में जिस हेले लेंग ने अपने ही देश नॉर्वे के प्रोटोकॉल का पालन नहीं किया। जब भारत और नॉर्वे अपने महत्वपूर्ण फैसलों को विश्व के समक्ष रख रहे हों।जहां प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं है, प्रेस ब्रीफिंग हो। जहां
दोनों देशों के प्रमुख प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और प्रधानमंत्री जोनास — द्विपक्षीय संबंधों, फैसलों को प्रेस को ब्रीफ करने के बाद वहां से अपने दूसरे कार्यक्रमों के लिए जा रहे हों। उसी वक्त — अचानक वहाँ जानबूझकर योजनाबद्ध तौर पर अपना प्रोपेगैंडा चलाना। हेले लेंग का ये पूछना कि—“प्रधानमंत्री मोदी, आप दुनिया की सबसे स्वतंत्र प्रेस के सवालों को क्यों नहीं लेते?”

— फिर 2024 के बाद अचानक 2026 में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर एक्टिव होना।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के ख़िलाफ़ उस वीडियो को मोहतरमा हेले लेंग द्वारा X पोस्ट करना।भारत विरोध में विष वमन करना। तत्पश्चात भारत में बैठे भारत विरोधियों का उस पर लहालोट होना। उस वीडियो के सहारे कांग्रेस के शहजादे राहुल एंड कंपनी द्वारा —प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर आक्षेप लगाना। राहुल गांधी का सबसे पहले उस वीडियो को रिट्वीट करना।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के बहाने भारत को अपमानित करना। ये सब कुंठित और पराजित भारत विरोधी राजनीति के अतिरिक्त कुछ नहीं है। वैश्विक स्तर पर भारत को पत्रकारिता, मानवधिकार आदि पर ज्ञान देना। ये सब पुरानी टैक्टिक्स, टूलकिट के नए प्रयोग हैं। फ़र्क इतना है कि भारत विरोधी कंटेंट वही है बस पैकेजिंग चेंज है। ये कोई संयोग नहीं है बल्कि भारत की साख को कमतर सिद्ध करने के टूलकिटिए प्रयोग हैं।

अब आते हैं कहानी पर..
हेले लेंग के X Post के बाद जब भारत के विदेश मंत्रालय (पश्चिमी ) के सचिव सिबी जार्ज ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्हें बुलाया। वहां हेले लेंग NGO’s पैटर्न वाली टूलकिट के क्वेश्चन लेकर आईं। प्रोवोक करने पर उतर आईं। वहां सिबी जार्ज ने उनका अच्छी तरह से ज्ञानवर्धन किया। तथ्य के आधार पर उन्हें समझाया। लेकिन हेले लेंग अपने प्रोपेगैंडा से बाज नहीं आईं। हेले लेंग का एक सवाल उनके प्रोपेगैंडा को आईने की तरह साफ़ कर देता है। हेले पूछती हैं कि—’ दुनिया भारत पर भरोसा क्यों करें?’

— उनके इसी सवाल में उनकी और उन्हें प्लांट करने वाले उनके आकाओं की भूमिका स्पष्ट दिखाई देती है। ये सारी योजनाएं भारत की बढ़ती साख, विश्व समुदाय के बीच भारत की स्वीकार्यता के विरुद्ध नैरेटिव चलाने का अहम हिस्सा है। हेले लेंगे वही तथाकथित पत्रकार हैं जो चीन और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के कसीदे पढ़ती रही हैं। उनकी प्रशंसा में आर्टिकल लिखती रही हैं। हेले लेंग का एजेंडा एकदम साफ़ था वो था — भारत विरोध। हालांकि ये सब नई बात नहीं है भारत के ख़िलाफ़ ये सब वर्षों से जारी है। भारत इन सबसे ऊपर उठकर नए दौर में है। जहां ऐसे सस्ते तरीक़े, पब्लिसिटी स्टंट भारत की साख पर बट्टा नहीं लगा सकते। हां केवल इतना है कि मीडिया की सनसनी ज़रूर बन सकते हैं। मोदी विरोधियों,भारत विरोधियों के लिए मिर्च मसाला ज़रूर बन सकते हैं। जो लोग ख़ुश हैं कि— अहा! हेले लेंग ने तो मोदी की बेइज्जती कर दी।उनकी सोच पर तरस आती है। ये कैसे लोग हैं जिन्हें ‘मोदी विरोध और भारत विरोध’ में फ़र्क नहीं पता? हेले लेंग स्पष्ट तौर पर भारत के ख़िलाफ़ ज़हर उगल रही हैं। क्या ये भारत में बैठे इन दुर्बुद्धियों को समझ नहीं आता है?

लेकिन दूसरी ओर चिन्ता की बात ये भी है कि— भारत के ख़िलाफ़ जब भी कोई वैश्विक प्रोपेगैंडा चलाया जाता है। ठीक वैसे ही कांग्रेस और राहुल गांधी—पूरी ऊर्जा के साथ एक्टिव हो जाते हैं।
उन्हें अपनी राजनीति के लिए खाद-पानी ; भारत विरोधी प्रोपेगैंडा से मिलता है। तत्पश्चात राहुल एंड कंपनी अपने अभियान में जुट जाते हैं।

चाहे पूर्व का हिंडेनबर्ग रिपोर्ट वाला प्रोपेगैंडा हो। याकि 2021 में किसान आंदोलन के समय ग्रेटा थनबर्ग के ट्वीट वाली टूलकिट। याकि राहुल गांधी का विभिन्न विदेशी यूनिवर्सिटी में पूर्व प्रायोजित कार्यक्रमों में जाकर — भारत के लोकतंत्र पर हमला बोलना हो। दूसरे देशों को भारत के आतंरिक मामलों में हस्तक्षेप का आमंत्रण देना हो।याकि दुनिया का ऐसा कोई नेता हो— जो भारत के ख़िलाफ़ बोलता है। राहुल एंड कंपनी उस पर प्रो एक्टिव रहती है। राहुल गांधी इन सबको तोते की तरह रट लेते हैं। फिर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के बहाने अपने ही देश के अपमान में जुट जाते हैं। ठीक ऐसा ही कांग्रेस के शहजादे राहुल गांधी अब हेले लेंग के बहाने कर रहे हैं। शायद अब राहुल गांधी को देश की जनता पर नहीं बल्कि विदेशी टूलकिट पर ज्यादा भरोसा हो गया है?

जबकि आप देखिए कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नॉर्वे दौरे से भारत के लिए कितने सुखद संदेश आए। जहां नॉर्वे के राष्ट्र प्रमुख, भारत के साथ आत्मीयता और कृतज्ञता के बोध के साथ आगे बढ़ रहे हैं। प्रधानमंत्री जोनास गहर स्टोर से लेकर वहां के विदेश मंत्री एस्पेन बार्त आईडे भारत और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की भूरि-भूरि प्रशंसा कर रहे हैं । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को नॉर्वे अपने सर्वोच्च सम्मान ‘ग्रैंड क्रॉस ऑफ द रॉयल नॉर्वेजियन ऑर्डर ऑफ मेरिट’ से सम्मानित कर रहा है। नॉर्वे समेत विश्व के लगभग 32 से अधिक देश प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को अपने सर्वोच्च सम्मान से सम्मानित कर चुके हैं। ये क्या भारत की वैश्विक साख को नहीं बता रहे हैं?

तथाकथित पत्रकार हेले लेंगे के कंधे पर बंदूक रखकर भारत विरोध में जो प्रोपेगैंडा चलाया गया। उसे नॉर्वे ख़ुद ध्वस्त कर चुका है। नार्वे के विदेश मंत्री एस्पेन बार्त आईडे भारत और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की प्रशंसा कर रहे हैं। नार्वे के विदेश मंत्री ने जो कहा वो हेले लेंग और राहुल गांधी जैसों के मुंह पर करारा तमाचा है।
विदेश मंत्री एस्पेन बार्त आईडे ने कहा कि— “प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भारत के लोकप्रिय और प्रभावशाली राजनेता हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भारत को वैश्विक मंच पर एक मजबूत और महत्वपूर्ण स्थान दिलाने में अहम भूमिका निभाई है।”

इतना ही नहीं विदेश मंत्री आईडे कह रहे हैं कि— “भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है और बहुत तेजी से आगे बढ़ती हुई अर्थव्यवस्था है। आने वाले समय में यह दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की ओर अग्रसर है। भारत एक बहुत महत्वपूर्ण और नवाचार से भरपूर साझेदार है।”

क्या नॉर्वे के विदेश मंत्री का ये कहना हेले लेंग और उनके समर्थकों के लिए पर्याप्त नहीं है? ऐसे में हेले लेंगे जैसे टूलकिट वाले एजेंडाबजों की क्रेडिबिलिटी क्या रह जाती है? ये कौन होते हैं जो भारत को ज्ञान देंगे? स्पष्ट है कि भारत विरोध अस्वीकार्य है।

वहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नॉर्वे के प्रधानमंत्री के साथ भारत-नॉर्वे व्यापार और अनुसंधान शिखर सम्मेलन को संबोधित किया। भारत तथा नॉर्वे और दोनों देशों की 50 से अधिक कंपनियों के बीच कई व्यापारिक समझौतों पर हस्ताक्षर किए गए। आर्थिक साझेदारी समझौते-टीईपीए TEPA जैसे महत्वपूर्ण निर्णय नई कहानी बयां कर रहे हैं। इसके साथ ही विज्ञान, नवाचार, ग्रीन एनर्जी (स्वच्छ ऊर्जा)— (ग्रीन हाइड्रोजन, पवन ऊर्जा), समुद्री अर्थव्यवस्था (ब्लू इकोनॉमी) और अंतरिक्ष सहयोग की दृष्टि से ऐतिहासिक ‘ग्रीन स्ट्रेटेजिक पार्टनरशिप’ तथा त्रिकोणीय विकास सहयोग समझौते भारत की रणनीतिक और कूटनीतिक मजबूती को दर्शा रहे हैं। इतना ही नहीं अंतरिक्ष, डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना, स्थिरता, टनलिंग प्रौद्योगिकी, स्वास्थ्य और उन्नत प्रौद्योगिकियों जैसे प्रमुख क्षेत्रों में हुए समझौते दोनों देशों के संबंधों को गति देने वाले होंगे।

लेकिन रुकिए.. कहानी कुछ और भी है।
भारत को लेकर पश्चिमी मीडिया कैसे प्रोपेगैंडा चलाता है। वो भारत के ख़िलाफ़ कैसे Micro Level प्लानिंग के साथ Global Propaganda चलाता है।राष्ट्रनिष्ठ व्यक्ति के लिए उसे समझना इतना भी मुश्किल नहीं है। वरिष्ठ पत्रकार रहे स्व. उमेश उपाध्याय
ने वर्षों के शोध के बाद प्रामाणिक पुस्तक लिखी थी। ‘Western Media Narratives on India :From Gandhi to Modi’ — इसे मंगाकर पढ़िए। इसके पन्ने पलटिए। आपको पश्चिमी मीडिया से लेकर भारत को लेकर पश्चिम की हीनग्रंथि का सहज ही अनुमान हो जाएगा। ये दुनिया कभी भी भारत की प्रगति बर्दाश्त नहीं कर सकती है। भारत को लेकर दुराग्रह पालने वाला पश्चिमी मीडिया एक ख़ास एजेंडे पर काम करता है। फिर पत्रकारिता पर भारत को ज्ञान बघारता है। स्व. उमेश उपाध्याय ने अपनी पुस्तक में तथ्यात्मक रूप से सारे संदर्भ उकेरे हैं।

क्योंकि बाजारवादी आसुरी शक्तियां भारत की एकता, शक्ति और सम्प्रभु नीति से भयभीत हैं। उन्हें भारत की स्थिरता रास नहीं आ रही है। ऐसे में वैश्विक शक्तियां भारत के ख़िलाफ़ अनेकानेक प्रोपेगैंडा चलाएंगी। विभाजनकारी, विप्लवकारी टूलकिट चलाएंगी। नाम, चेहरे और स्थान बदले रहेंगे लेकिन उनका काम एक रहेगा। वो है भारत विरोध।भारत को अस्थिर करना। जैसा उन्होंने हमारे पड़ोस नेपाल, बांग्लादेश, श्रीलंका आदि में किया। लेकिन भारत के मामले में डीप स्टेट, ब्रेकिंग इंडिया फोर्सेज, भारत विरोधी शक्तियों को मुंह की खानी पड़ी। किन्तु उनके प्रोपेगैंडा बदस्तूर जारी हैं। ऐसे में कांग्रेस और राहुल गांधी का इनके साथ कदमताल करना। भारत विरोधी हर चीज़ को मुद्दा बनाकर पेश करना। इनसे अपनी खोई हुई राजनीतिक ज़मीन तलाशना भी कोई नई बात नहीं है। जब भी दुनिया के किसी हिस्से से भारत विरोधी टूलकिट एक्टिवेट होगी। कांग्रेस के शहजादे राहुल गांधी उसके सबसे बड़े प्रचारक के तौर पर आएंगे। क्योंकि भारत की जनता ने उन्हें इतनी बार ख़ारिज कर दिया है कि— ब्रेकिंग इंडिया फोर्सेज के अलावा उनके पास अब कोई और सहारा नहीं बचा है।

बाक़ी भारत के अंदर और बाहर ‘सोरोस के जितने पपेट’ हैं वो एक स्वर में जोरों-शोरों से ब्रेकिंग इंडिया फोर्सेज की टूलकिट पर काम कर रहे हैं। इन्हें आप अर्बन नक्सलियों के तौर पर भी जानते हैं। जो हर मुद्दे पर, हर प्रोपेगैंडा पर, हर स्थान पर अलग-अलग रूप धरकर आते हैं। लेकिन इन्हें और इनके आकाओं को नहीं पता कि भारत माता की संतानें हर विभाजनकारी मंसूबे को ध्वस्त कर देती हैं। ये नया भारत है जो सर्जन की सामूहिक चेतना के साथ आगे बढ़ चला है। भारत को आगे बढ़ने से कोई नहीं रोक सकता। हमारी आपकी सतर्कता और राष्ट्रनिष्ठा भारत विरोधियों की नींद उड़ाने के लिए पर्याप्त है।

सनातन के अपमान का दुस्साहस

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सर्वेश कुमार सिंह

दिल्ली । सनातन के अपमान का फिर दुस्साहस हुआ है। वहीं जहां सितंबर 2023 में हुआ था। वही उदयनिधि स्टालिन जिसने तब कहा था। सनातन डेंगू और मलेरिया है। इसे खत्म करना होगा। थोड़ा विरोध, हल्ला गुल्ला हुआ। मामला शांत हो गया। अब फिर सनातन पर हमला। वही व्यक्ति उदयनिधि जब तमिलनाडु विधान सभा में द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (डीएमके) विधायक दल का नेता चुना जाता है, और नेता विरोधी दल बनता है, तो पहले भाषण में ही सनातन को खत्म करने की बात कहता है। वह कहता है सनातन समाज को बांटता है। इसलिए इसे समाप्त करना जरूरी है।

जब तमिलनाडु विधान सभा में सनातन के अपमान का दुस्साहस होता है, तो विरोध का कोई स्वर सुनाई नहीं देता। यहां तक कि मुख्यमंत्री टी जोसेफ विजय भी कोई प्रतिक्रिया नहीं देते। न ही प्रतिकार और न ही रोकने की कोई कोशिश। ऐसा लगता है कि तमिलनाडु विधानसभा सनातन विरोध का केंद्र बन गई है। दो बार उदयनिधि दुस्साहस कर चुके है। ये पूर्व मुख्यमंत्री एमके स्टालिन के बेटे और द्रमुक संस्थापक के करुणानिधि के पौत्र हैं। इस परिवार ने दीर्घ काल तक तमिलनाडु में सरकार चलाई है। ईसाई मतावलंबी होने के बावजूद इस परिवार को तमिल हिंदुओं का समर्थन मिलता रहा है। लेकिन इस परिवार के आचार,व्यवहार और सोच में सहिष्णुता और सर्वधर्म समभाव का पूर्णतः अभाव है। अगर ऐसा नहीं होता तो एमके स्टालिन अपने बेटे को रोकते, टोकते और भारत की विविधतापूर्ण सांस्कृतिक विरासत रक्षा की कोशिश करते मगर उन्होंने ऐसा कोई प्रयास नहीं किया। न अब जब 11 मई को उनके पुत्र ने सनातन का अपमान किया और न ही वर्ष 2023 में जब सनातन को डेंगू कहा गया।

भारत के सांस्कृतिक विकास क्रम में तमिल संस्कृति का अनूठा और अनुपम योगदान है। तमिल भाषा विश्व की प्राचीनतम भाषाओं में से एक है। इस गौरव से संपूर्ण भारत गौरवान्वित है। तमिल संस्कृति के महत्व को देखते हुए ही भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने निर्वाचन क्षेत्र में काशी-तमिल संगमम आयोजन किए। ये आयोजन उतर और दक्षिण की सनातन संस्कृति का मिलन ही नहीं। भारत की एकरूपता का संदेश है। लेकिन पीएम मोदी की इस भावना को समझने के लिए स्टालिन परिवार तैयार नहीं है।

आज आवश्यकता है कि सनातन संस्कृति पर बढ़ रहे आक्रमणों और नियोजित, प्रायोजित अपमान का संगठित रूप से लोकतांत्रिक मर्यादाओं में रहकर प्रतिकार किया जाए, अन्यथा ये दुस्साहस बढ़ता जाएगा।

प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक स्वयं कितना स्वतंत्र है?

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मनोज श्रीवास्तव

दिल्ली । विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक के आधार पर न केवल नार्वे की वह दुराग्रही पत्रकार उछल रही है बल्कि भारत में राष्ट्रीय स्वाभिमान से शून्य पत्रकार भी।

इंडेक्स में प्रत्येक देश को 0 से 100 के बीच स्कोर दिया जाता है — 100 सबसे बेहतर (अधिकतम स्वतंत्रता) और 0 सबसे खराब। यह स्कोर दो घटकों पर आधारित है: पहला, पत्रकारों के विरुद्ध दुर्व्यवहार का मात्रात्मक आकलन; और दूसरा, 25 भाषाओं में उपलब्ध RSF प्रश्नावली पर प्रेस स्वतंत्रता विशेषज्ञों की गुणात्मक प्रतिक्रियाएं होती हैं।

पाँच संदर्भात्मक संकेतक उपयोग किए जाते हैं जिनका समान भार होता है:

1. राजनीतिक संदर्भ (Political Context)
2. कानूनी ढांचा (Legal Framework)
3. आर्थिक संदर्भ (Economic Context)
4. सामाजिक-सांस्कृतिक संदर्भ (Sociocultural Context)
5. सुरक्षा (Safety)

दुर्व्यवहार की गंभीरता के अनुसार भार-गुणांक (coefficients) निर्धारित हैं — जैसे मीडिया संस्थान को बंद कराने या बर्बरता के लिए गुणांक 1 है, जबकि अपहरण या जबरन गुमशुदगी के लिए 50 है।

प्रश्नावली में 87 प्रश्न होते हैं जो पत्रकारों, वकीलों और समाजशास्त्रियों को भेजे जाते हैं। इसका अनुवाद 20 भाषाओं में किया जाता है।

पर कुछ सच्चाइयाँ इस सूचकांक के बारे में जान ली जायें-

मात्र लगभग 150 उत्तरदाताओं और 18 NGOs से 83 प्रश्नों पर प्रत्येक देश का मूल्यांकन करवाया जाता है। औसतन एक देश के लिए एक ही उत्तरदाता होता है — यह कल्पना करना कठिन है कि एक व्यक्ति किसी पूरे देश में प्रेस की स्वतंत्रता का सटीक आकलन कर सके।

इसे Reporters Without Borders (RSF) — फ्रेंच में Reporters Sans Frontières — नामक एक गैर-सरकारी संगठन तैयार करता है जो 2002 से हर साल 180 देशों की रैंकिंग प्रकाशित करता है।

RSF का बजट लगभग €8 मिलियन (2022) था, जिसमें 52% फ्रांसीसी सरकार और यूरोपीय आयोग जैसी सरकारी संस्थाओं से आया। इसके अतिरिक्त 22% जॉर्ज सोरोस की Open Society Foundations और Ford Foundation जैसे विचारधारा-संरेखित निजी संगठनों से आया। इससे RSF की तथाकथित स्वतंत्रता पर प्रश्नचिह्न लगता है।

RSF यह नहीं बताता कि प्रति देश कितने उत्तरदाता हैं, उनका भौगोलिक वितरण क्या है, उनकी संस्थागत संबद्धता, राजनीतिक झुकाव, या जिस क्षेत्र का वे मूल्यांकन कर रहे हैं उससे उनका संबंध क्या है। इस पारदर्शिता के अभाव में यह जाँचना असंभव है कि सैंपल पर्याप्त विविध और स्वतंत्र है या नहीं?

इंडेक्स हार्ड डेटा — जैसे स्वतंत्र मीडिया संस्थानों की संख्या, मीडिया की पहुँच, प्रेस बहुलवाद, या इंटरनेट एक्सेस — पर आधारित नहीं है, बल्कि पूरी तरह धारणाओं और राय पर निर्भर है। यह वैज्ञानिक दृष्टि से एक गंभीर कमज़ोरी है। यह तथ्य के ऊपर राय को वरीयता देता है।

राज्य-नियंत्रित मीडिया वाले देशों को इस सूचकांक में स्पष्ट लाभ मिलता है। कतर जैसे देशों में शाही परिवार की आलोचना अपराध है और रवांडा में RSF के अनुसार राज्य पत्रकारों की जासूसी करता है, फिर भी ये देश भारत से बेहतर रैंक पाते हैं। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि जहाँ प्रेस की आवाज़ ही नहीं है, वहाँ कोई टकराव नज़र नहीं आता।

इंडेक्स की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि जिन देशों में पत्रकार वास्तव में मारे जा रहे हैं, वे भारत से बेहतर रैंक पाते हैं। 2024 में RSF के अनुसार सबसे घातक देश थे — फिलिस्तीन पाकिस्तान, मेक्सिको, सूडान और इराक — फिर भी इनकी रैंकिंग भारत से ऊपर थी। यह जमीनी हकीकत और सर्वेक्षण-आधारित धारणा के बीच की खाई को उजागर करता है।

सर्वेक्षण करने वाले विशेषज्ञों की पहचान गोपनीय रखी जाती है और उनके चयन की प्रक्रिया पारदर्शी नहीं है। इससे वैचारिक पूर्वाग्रह का स्पष्ट खतरा बना रहता है, क्योंकि न तो सार्वजनिक जवाबदेही है और न कि नमूने की कोई जाँच।

हालांकि प्रश्नावली 24 भाषाओं में उपलब्ध है, लेकिन प्रश्नों का ढाँचा पश्चिमी दृष्टिकोण से तैयार होता है। यह उन गैर-पश्चिमी देशों के लिए नुकसानदायक है जहाँ मीडिया की परंपराएं इंडेक्स के निर्धारित मानकों से भिन्न हैं, जिससे इन देशों में प्रेस की स्थिति का ग़लत चित्रण होता है।

RSF यह सार्वजनिक नहीं करता कि पाँच संकेतकों में से प्रत्येक का अंतिम स्कोर में क्या भार है। इससे कुछ मुद्दों को असंगत रूप से अधिक महत्व देना और दूसरों को नजरअंदाज करना संभव हो जाता है — यह वैज्ञानिक पारदर्शिता का उल्लंघन है।

इंडेक्स किसी देश में मीडिया प्लेटफॉर्म की कुल संख्या — टीवी, रेडियो, प्रिंट, ऑनलाइन — को ध्यान में नहीं लेता। एक जीवंत मीडिया परिवेश जिसमें विविध माध्यम हों, स्वस्थ प्रेस का संकेत है लेकिन उसे इंडेक्स में मान्यता नहीं मिलती।

सिंगापुर के एक पूर्व प्रधानमंत्री ने WPFI को “पश्चिमी उदारवादियों के चश्मे से देखी गई एक व्यक्तिपरक माप” कहा। ब्रिटेन के शिक्षाविदों और प्रेस पेशेवरों ने भी कहा कि “प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक मीडिया का एकरूप दृष्टिकोण अपनाते हैं जो देशों की तुलना तो सुविधाजनक बनाता है, लेकिन यह चुनौती बनी रहती है कि ‘मीडिया’ एक समग्र शब्द है।

भारत जैसे देश जो स्वतंत्र विदेश नीति अपनाते हैं या डिजिटल विनियमन जैसे मुद्दों पर पश्चिमी दबाव का विरोध करते हैं, उन्हें अक्सर असंगत रूप से आलोचित किया जाता है — प्रेस स्वतंत्रता लुप्त होने के कारण नहीं, बल्कि इसलिए कि उनकी नीतियाँ पश्चिमी आख्यान से मेल नहीं खातीं।

जब भारत ने 2021 में IT नियम लागू किए तो RSF ने उन्हें सत्तावादी बताया और इंडेक्स में इसका असर दिखा। लेकिन यही आलोचक तब चुप रहे जब यूरोपीय संघ ने Digital Services Act या ऑस्ट्रेलिया ने Online Safety Act लागू किए — जो भारत के उन्हीं नियमों से मिलते-जुलते थे। यह दोहरा मानदंड इंडेक्स की निष्पक्षता पर गहरा प्रश्न उठाता है।

इंडेक्स की पद्धति और व्यक्तिपरक पूर्वाग्रहों को लेकर हंगरी, भारत सहित कई देशों की सरकारों ने आपत्ति जताई है। RSF का दावा है कि वह एक तटस्थ संस्था है, लेकिन न तो इसका कोई स्वतंत्र पियर-रिव्यू होता है, न ही कोई वैकल्पिक ऑडिट। किसी भी वैज्ञानिक दावे के लिए स्वतंत्र सत्यापन अनिवार्य है — यहाँ वह अनुपस्थित है।

मूल्यांकन पद्धति बदलती रहती है, अतः वर्षवार तुलना असंभव (Inconsistent Methodology Over Years) है।

RSF की पत्रकार की परिभाषा इतनी सीमित है कि फ्रीलांसर, कंट्रीब्यूटर, फिक्सर और तकनीकी संचालक जो पत्रकारिता के कार्य में मारे जाते हैं, उनकी गणना में नहीं आते। इससे विशेषकर गाजा जैसे संघर्ष क्षेत्रों में मारे गए पत्रकारों की संख्या का कम आकलन होता है, जो इंडेक्स की विश्वसनीयता को गंभीर रूप से प्रभावित करता है।

दुर्व्यवहार और हिंसा के आंकड़ों के लिए न तो स्पष्ट रूप से परिभाषित और विश्वसनीय स्रोत उपलब्ध हैं, न ही किसी भी देश की सरकार या देश-विशेष के स्रोतों से इन आंकड़ों को स्पष्ट करने का कोई प्रयास किया जाता है। यह किसी भी गंभीर शोध-पद्धति के विरुद्ध है।

तो भारत के किसी गुमनाम मीडिया आलोचक द्वारा किया गया भारत का आकलन हमारे देश का स्थान निर्धारण करता है।

और वह कौन है, क्या है? किसी को पता नहीं।

देश के सारे पत्रकारों के परिश्रम पर एक व्यक्ति का अभिमत हावी है।

( लेखक राज्य सूचना आयुक्त मप्र हैं)

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