“इंडियन स्टेट से लड़ाई” वाले बयान पर श्री राहुल गांधी के नाम “खुला प्रेम पत्र!”

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– अभिरंजन कुमार

प्रिय श्री राहुल गांधी जी,

आप एक लोकतंत्र में हैं। वस्तुतः दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में हैं। हो सकता है कि आप इस सत्य को स्वीकार न कर सकें, लेकिन वास्तविकता यह है कि आप दुनिया के सबसे पुराने लोकतंत्र में हैं, जो सबके लिए सहिष्णुता, समानता, सम्मान और स्वतंत्रता के मानवतावादी विचारों की नींव पर सहस्त्राब्दियों से खड़ा है। इसलिए आपके प्रति पूर्ण सम्मान रखते हुए आपके नाम यह खुला प्रेम पत्र लिख रहा हूं।

तो प्रिय श्री राहुल गांधी जी,
चूंकि आप दुनिया के सबसे विशाल और प्राचीन लोकतंत्र में हैं, जिसका प्रादुर्भाव 1947 या 2014 में ही नहीं हुआ है, इसलिए इस देश में अभिव्यक्ति और विचारों की स्वतंत्रता आपको सहस्त्राब्दियों से मिली हुई है। इसलिए आपको किसी भी व्यक्ति , विचार, संगठन या सरकार से असहमति एवं नाराज़गी रखने की स्वतंत्रता भी सहज ही प्राप्त है। इसलिए आप किसी का भी राजनीतिक विरोध करें, जनता को अपनी बातें समझाकर, उन्हें साथ लेकर चुनाव के माध्यम से किसी को भी सत्ता से उखाड़ फेंकें, इसकी भी आपको स्वतंत्रता है। इस लिहाज से आप भारतीय जनता पार्टी का विरोध करें, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का विरोध करें, मोदी शाह भागवत का विरोध करें, आपसे कोई गिला नहीं। लेकिन आप “इंडियन स्टेट” से विरोध और लड़ाई की बात कैसे कह सकते हैं, इसके बावजूद कि आप कह रहे हैं कि भाजपा और आरएसएस ने देश की सभी संस्थाओं पर कब्जा कर लिया है?

प्रिय श्री राहुल गांधी जी,
जब आप कहते हैं कि भाजपा और आरएसएस ने देश की संस्थाओं पर कब्जा कर लिया है, तो इसमें प्रच्छन्न रूप से यह भी निहित है कि पहले किसी और का कब्जा था, जिसे छीनकर भाजपा और आरएसएस ने यह कब्जा किया है। तो वह कब्जा किसका था? स्पष्ट रूप से आप ही लोगों का था। 1947 से 2014 तक 67 वर्षों में 55 वर्षों तक केंद्र में आपकी पार्टी की सरकार रही, जिस दौरान देश ने बहुत गंभीरता से यह महसूस किया कि देश की सभी संस्थाओं पर आपकी पार्टी का प्रत्यक्ष कब्जा था। बीच के अन्य 12 वर्षों में चली कमज़ोर गठबंधन सरकारें भी संस्थाओं से आप लोगों का कब्ज़ा हटाने में सक्षम नहीं थीं, सो उस अवधि में भी प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से आप ही लोगों का कब्ज़ा रहा।

प्रिय श्री राहुल गांधी जी,
उक्त अवधि में देश की तमाम संस्थाओं पर आप लोगों का कब्ज़ा इतना मजबूत था कि आपकी दादी श्रीमती इंदिरा गांधी ने इलाहाबाद हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के फैसले से नाराज़ होकर देश में उसी संविधान को निलंबित करके इमर्जेंसी लगा दी, जिसकी प्रति अपने हाथों में लेकर आजकल आप यत्र तत्र सर्वत्र घूमते हुए पाए जाते हैं। आप लोगों का कब्ज़ा इतना मजबूत था कि आप लोगों ने बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर जी सहित देश के समस्त संविधान निर्माताओं की भावनाओं की अवहेलना करते हुए देश के संविधान की प्रस्तावना तक बदल डाली और उसमें अवांछित तरीके से धर्मनिरपेक्ष शब्द डाल दिया। कृपया याद रखें कि आप संविधान की जिस प्रति के साथ इन दिनों यत्र तत्र सर्वत्र घूमते हुए पाए जाते हैं, वह बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर जी सहित अन्य संविधान निर्माताओं द्वारा रचित मूल संविधान नहीं है। देश की संस्थाओं पर आप लोगों का कब्ज़ा इतना कठोर था कि शाहबानो नाम की पीड़ित किंतु बहादुर मुस्लिम महिला को सुप्रीम कोर्ट से मिले न्याय तक को आप लोगों ने कुचल दिया। वास्तव में वह न केवल एक बहादुर मुस्लिम महिला को कुचलना या, बल्कि समस्त मुस्लिम महिलाओं को, न्याय को और स्वयं देश के सर्वोच्च न्यायाधिकरण सुप्रीम कोर्ट को कुचलना था। देश की संस्थाओं पर आप लोगों का कब्ज़ा इतना मजबूत था कि स्वयं सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई को आप की सरकार का तोता बताया था। आपके पूज्य पिताजी स्वर्गीय श्री राजीव गांधी जी के काल तक चुनाव आयोग की भी क्या हालत थी? चुनावों में बूथ लूट, हिंसा, हत्याएं और कमज़ोर नागरिकों को मतदान से रोके जाने की घटनाएं आम थीं। बाद में मुख्य चुनाव आयुक्त टी एन शेषन ने जो चुनाव सुधार किए, वह वास्तव में चुनाव आयोग से आप लोगों का कब्ज़ा हटाने के लिए ही तो किए थे।

खैर, किस संस्था का नाम लेंगे, जिसपर आप लोगों का कठोर कब्जा नहीं था? देश की शिक्षा, संस्कृति और इतिहास के निर्धारण से जुड़ी तमाम संस्थाओं तक पर आप लोगों का कब्ज़ा रहा। आप लोगों ने झूठ सच जो चाहा, बच्चों को पढ़ाया, नागरिकों को बताया। कहीं से कोई चुनौती नहीं थी, इतना कठोर कब्जा था। आपके पुरखे एवं राजनीतिक परिवार के लोग स्वयं ही भारत रत्न ले लेते थे, अपने जन्मदिन को राष्ट्रीय दिवस घोषित करा लेते थे, लेकिन संस्थाओं पर कब्जा इतना कठोर था कि आलोचना के किसी स्वर की कहीं कोई गुंजाइश ही नहीं थी। यहां तक कि आप लोगों ने लगभग 90 बार विभिन्न राज्यों में लोकतांत्रिक तरीके से चुनी हुई सरकारों को बर्खास्त कर दिया, जिनमें आपकी दादी श्रीमती इंदिरा गांधी ने अकेले 50 से अधिक राज्य सरकारों को बर्खास्त किया था।

लेकिन 67 वर्षों तक देश की तमाम प्रमुख संस्थाओं पर आप लोगों के ऐसे कठोर कब्जे के बावजूद आपके राजनीतिक विरोधियों और हम नागरिकों ने कभी यह नहीं कहा कि देश की समस्त संस्थाओं पर आप लोगों का कब्ज़ा इतना भयानक है कि “ऐसा लगता है कि अब हमारी लड़ाई इंडियन स्टेट से हो गई है।” लेकिन आप तो सिर्फ साढ़े दस साल सत्ता से बाहर रहने के बाद ऐसी मानसिक और वैचारिक स्थिति में पहुंच गए हैं कि अपनी लड़ाई को “इंडियन स्टेट” के ही खिलाफ बता रहे हैं। यद्यपि मैं ऐसे शब्दों का आपके लिए इस्तेमाल नहीं करना चाहता, लेकिन यदि आपके विचार ऐसे हो गए हैं, तो दिल पर हाथ रखकर बताइए कि आपमें और नक्सलियों, माओवादियों अथवा आतंकवादियों में क्या अंतर रह गया है?

प्रिय श्री राहुल गांधी जी,
आप इस लोकतंत्र में सबसे बड़े विपक्षी दल के सबसे बड़े नेता हैं और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष भी हैं। यदि आप ही सत्ता में नहीं होने अथवा देश के नागरिकों को अपने नेतृत्व एवं विचारों से प्रभावित नहीं कर सकने के कारण ऐसी मानसिक और वैचारिक स्थिति का शिकार हो जाएंगे, तो इस देश को दुश्मन ताकतों का शिकार बनने से कौन बचा सकता है? क्या कथित “इंडिया” गठबंधन आपने “इंडियन स्टेट” से लड़ने के लिए ही बनाया है? क्या आपकी पार्टी के अन्य नेता और आपके गठबंधन के अन्य सहयोगी भी यह मानने लगे हैं कि भाजपा और आरएसएस से लड़ते लड़ते अब उनकी लड़ाई सीधे इंडियन स्टेट से हो गई है? यदि ऐसा है, तब तो देश की राजनीति में यह अत्यंत ही खतरनाक दौर आ गया है, जब आपके नेतृत्व में देश के समस्त विपक्षी दल एकजुट होकर सीधे देश के खिलाफ ही जंग का ऐलान कर चुके हैं। यह अत्यंत चिंताजनक और दुर्भाग्यपूर्ण है।

प्रिय श्री राहुल गांधी जी,
हम जैसे नागरिक आपकी बातों को ध्यान से सुनते हैं, उसपर चर्चा करते हैं, प्रतिक्रिया देते हैं, कायदे से तो यह भी अपने आप में इस बात का प्रमाण है कि देश की राजनीति, लोकतंत्र, व्यवस्थाओं और भाग्य पर आपके परिवार का लंबे समय से कब्जा बना हुआ है। आप एक ऐसे परिवार में पैदा हुए हैं, जो हम पर शासन करता रहा है, तो मजबूरन आपकी बात सुननी पड़ती है और जवाब देना पड़ता है। यदि आप हमारी तरह एक सामान्य परिवार में पैदा हुए होते तो आपकी किस मेधा और वैचारिक शक्ति के कारण आपकी बात इतनी सुनी जा सकती थी? देश के किसी भी मुद्दे पर बड़े बड़े विद्वानों तो छोड़ दीजिए, हम जैसे सामान्य नागरिकों से भी 15 मिनट डिबेट में आप टिक सकते हैं क्या? यहां स्पष्ट कर दूं कि इस पत्र में की जा रही यह टिप्पणी आपकी अवहेलना नहीं, बल्कि आपके अपने ही व्यवहार द्वारा प्रमाणित किए गए तथ्यों और घटनाओं पर आधारित है। जब आप किसी डिबेट में नहीं टिकते अथवा आपके पास किसी सवाल का जवाब नहीं होता, तो आप सवाल पूछने वाले को ही संघी-भाजपाई करार देते हैं। ऐसा आपने कई ऐसे पत्रकारों तक के साथ किया हुआ है, जिनकी देश के मुख्य विपक्षी दल के सर्वोच्च नेता होने के कारण आपसे सहानुभूति ही रही है।

इसलिए प्रिय श्री राहुल गांधी जी,
आपको मेरी विनम्र सलाह यह होगी कि आप अपना वैचारिक परिष्कार कीजिए। इस बात की समीक्षा कीजिए कि आपकी पार्टी की नीयत और नीतियों से देश की एक विशाल आबादी का भरोसा क्यों उठ गया? यहां तक कि आपके नेतृत्व से भी अब तक आपके प्रति समर्पित रहे प्रमुख पार्टी व गठबंधन नेताओं का भरोसा क्यों उठता जा रहा है? आपकी पार्टी यदि महात्मा गांधी की राजनीतिक और वैचारिक विरासत का वारिस होने का दावा करती है, तो कृपया आप महात्मा की इस बात को अवश्य याद करें कि जब आप दूसरों की तरफ एक उंगली उठाते हैं, तो तीन उंगलियां स्वयं आप ही की तरफ होती हैं। आज मैं आपको स्पष्ट रूप से बता सकता हूं कि वे कौन सी तीन उंगलियां स्वयं आप ही की तरफ मुड़ी हुईं हैं? ये तीन उंगलियां हैं- आपका नेतृत्व, आपकी नीतियां, आपकी नीयत। इन तीनों पर ही देश के बहुतायत नागरिकों और यहां तक कि आपके सहयोगी नेताओं एवं दलों को भी भरोसा नहीं है। यदि किसी दिन आप इन तीन मुद्दों का सही समाधान कर लेंगे, तो मुझे पूर्ण विश्वास है कि आपको सत्ता-विछोह से आसानी से मुक्ति मिल सकती है।

इसलिए प्रिय श्री राहुल गांधी जी,
आपको मेरी विनम्र सलाह यह भी होगी कि “इंडियन स्टेट” से लड़ने के बजाय आप इंडिया यानी भारत की आत्मा, विचारों एवं संस्कारों को समझिए और अपनाइए। केवल अपने गठबंधन का नाम “इंडिया” रखने से कुछ नहीं होगा, क्योंकि “आंख का अंधा, नाम नयनसुख” जैसी कहावतों का अर्थ इस देश के लोग खूब समझते हैं।

प्रिय श्री राहुल गांधी जी,
अंत में फिर से यह कहना चाहता हूं कि यदि आप मोदी सरकार की किसी नीति का विरोध करना चाहते हैं, तो शौक से कीजिए। यदि आप भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के किसी विचार का विरोध करना चाहते हैं, तो भी धूम धाम से कीजिए। जहां लगता है, वहां मैं भी करता हूं, जैसे अभी आपके “इंडियन स्टेट” से लड़ाई वाले अगंभीर, अपरिपक्व, अचिंतित और अस्वीकार्य वक्तव्य का विरोध कर रहा हूं। प्रमुख कृषि-फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य की मांग को मैंने देश के किसानों का जन्मसिद्ध अधिकार बताया है, जिससे भाजपा और आरएसएस के मेरे अनेक प्यारे भाई-बहन भी सहमत नहीं हैं। ऐसे और भी कई मुद्दे हैं जिनपर मौजूदा सरकार से मेरी असहमति है, जैसे आपसे भी असहमति है। लेकिन मैं न तो “इंडियन स्टेट” से लड़ाई लड़ रहा हूं, न ही भाजपा, आरएसएस, कांग्रेस और वामपंथी दलों सहित किसी भी राजनीतिक दल से लड़ाई में हूँ। आप सभी इस लोकतंत्र के महत्वपूर्ण अंग हैं और आप सभी के परस्पर विरोधी विचार भी इस लोकतंत्र में संतुलन पैदा करने का काम करते हैं। इसलिए आप सभी लोगों और लोकतंत्र के सभी महत्वपूर्ण अंगों के लिए मेरे मन में काफी सम्मान है।

प्रिय श्री राहुल गांधी जी,
चूंकि मैने सुना है कि आप अपनी पार्टी के बड़े-बड़े नेताओं और यहां तक कि अपने मुख्यमंत्रियों तक से आसानी से नहीं मिलते हैं और उनका जब चाहे तिरस्कार कर देते हैं, इसलिए अब तक यह साहस नहीं जुटा पाया हूं कि आपसे मिलने का समय मांगूं और आपको यथोचित स्नेह व सम्मान के साथ समझाऊं कि लोकतंत्र का असली मतलब क्या है, भारत के मौलिक विचार और संस्कार क्या हैं, आप लोग क्या-क्या गलतियां कर रहे हैं और इंडिया, इंडियन स्टेट एवं इसके नागरिकों के प्रति वास्तव में आपके दायित्व क्या-क्या हैं।

आशा है, आप इन बातों को अन्यथा नहीं लेंगे और आवश्यक आत्मचिंतन एवं सुधार करेंगे।

बहुकोणीय दिल्ली विधानसभा चुनावों में रेवड़ियों पर दाँव

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वर्ष 2025 का पहला विधानसभा चुनाव देश की राजधानी दिल्ली में होने जा रहा है। दिल्ली में विगत दस वर्षों से आम आदमी पार्टी की सरकार चल रही है। दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल व्यक्तिगत और आप पार्टी के संयोजक के रूप में शराब घोटाले के मुख्य आरोपी हैं तथा सुप्रीम कोर्ट की दया पर जमानत पर घूम रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट की कड़ी शर्तों के बाद भी वह जनता के बीच लोकलुभावन घोषणाएं कर जनता को गुमराह कर रहे हैं कि मानो कोर्ट ने उन्हें बरी कर दिया हो। पूर्व उपमुख्यमंत्री मनीष सिसौदिया सहित कई अन्य मंत्री व विधायक जेल यात्रा कर चुके हैं तथा कई पर गंभीर आरोपों के चलते जमानत पर हैं।आप सरकार के दो विधायकों पर बांग्लादेशी और रोहिंग्या को बसाने के मामले में गहन जांच चल रही है। अरविंद केजरीवाल पर शीशमहल जैसे कई अन्य घोटालों के भी दाग भी लगे हुए हैं। दिल्ली सरकार का शायद ही कोई भी विभाग ऐसा बचा है जहां हजारों करोड़ का घेटाला न हुआ हो और यह सच्चाई कैग रिपोर्ट से भी प्रकट हो रही है और यही कारण है कि आप सरकार ने कैग रिपोर्ट विधानसभा सत्र में प्रस्तुत नहीं करी।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने दिल्ली में आप सरकार को निशाने पर लेते हुए इसे आप-दा बाताया और जनता से इसे उखाड़ फेंकने का आह्वान किया। इस बार कांग्रेस पार्टी भी दिल्ली चुनावों में कमर कस रही है तथा बसपा और एआईएआईएम जैसे कट्टर मजहबी भी चुनावी जंग में उतर चुके हैं। समाजवादी पार्टी ने आप-दा के साथ ही रहने का मन बनाया है। 17 जनवरी को नामांकन पत्र प्रस्तुत करने की अंतिम तिथि के साथ ही चुनाव की तस्वीर एक सीमा तक स्पष्ट हो गई है। प्राथमिक और मोटे तौर पर दिल्ली चुनाव में सभी दल रेवड़ियों पर ही दाँव खेलते दिखाई दे रहे हैं शेष सभी मुद्दे गौण हैं।

भाजपा ने जारी किया संकल्प पत्र – दिल्ली विधानसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी इस बार केजरीवाल को उसी की भाषा में उत्तर दे रही है। पार्टी ने आप के घोटालों, दिल्ली में बढ़ रहे प्रदूषण, यमुना नदी की दयनीय स्थिति व मुफ्त नल की असलियत को मुददा बनाते हुए अपना संकल्प पत्र जारी किया है। ऐसा पहली बार हुआ है कि भाजपा ने अपना पूरा संकल्प पत्र नहीं जारी किया है अपितु उसका एक अंश ही जारी किया है और आगामी दिनों में वह कुछ योजनाएं व संकल्प लगातार जारी करती रहेगी। भाजपा इस बार झुग्गीवासियों का बहुत ध्यान रख रही है और उनके लिए प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत आवास देने का वादा किया है। मध्य प्रदेश, राजस्थान व हरियाणा की की ही तरह गरीबों के लिए 5 रुपये में भोजन देने की घोषणा करते हुए पार्टी ने कहा कि इसके लिए अटल कैंटीन योजना का आरम्भ किया जाएगा। मध्य प्रदेश,हरियाणा तथा राजस्थान में यह योजना सफलतापूर्वक चल रही है तथा अत्यंत लोकप्रिय हो रही है।भाजपा रणनीतिकारों का मानना है कि गरीबों के लिए 5 रुपये में भोजन की योजना दिल्ली में भी गेमचेंजर साबित होगी।

भाजपा का संकल्प पत्र जारी करते हुए भाजपा अध्यक्ष जे पी नड्डा ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राजनैतिक संस्कृति को काफी बदल दिया है आज से पहले राजनैतिक दल चुनावी घोषणाओें को भूल जाया करते थे लेकिन अब घोषणापत्र संकल्प पत्र में बदल चुका है। भाजपा ने 2014 में 500 संकल्प किये थे जिनमें से 499 पूरे हो चुके हैं। भाजपा ने संकल्प पत्र जारी करते समय कहा कि जनता के हित में आप सरकार की सभी योजनाएं जारी रहेंगी अपितु उसमें से भ्रष्टाचार व भ्रष्टाचारियों को बाहर का रास्ता दिखाया जायेगा। भारतीय जनता पार्टी की ओर से यह बात कई बार कही जा चुकी है कि क्योंकि आप की ओर से लगातार यह प्रचार किया जा रहा है कि जब बीजेपी सत्ता में आयेगी तब गरीबों की झुग्गियों में वह बुलडोजर चलवा देगी तथा सभी योजनाओं को बंद करवा देगी जबकि भाजपा का कहना है कि वह सभी झुग्गी वालों को मुख्यधारा में लेकर आएंगे।

भाजपा ने अपने द्वारा शासित अन्य राज्यों की तरह दिल्ली में भी महिलाओं को हर माह 2500 रुपये सहायता राशि देने का संकल्प लिया है। गर्भवती महिलाओ को 21000 रुपये देने व एक न्यूट्रीशनल किट भी देने का संकल्प किया है। भाजपा ने होली -दीपावली के अवसर पर मुफ्त सिलिंडर तथा 500 रुपए की एलपीजी सब्सिडी देने का वादा किया है। भाजपा ने वरिष्ठ नागरिकों के लिए 3000 रुपए तक की पेंशन देने, आयुष्मान भारत योजना को दिल्ली में भी लागू करने का ऐलान किया हैं।आयुष्मान योजना का संकल्प लेते हुए भाजपा अध्यक्ष जेपी नडडा ने दिल्ली में चल रहे मोहल्ला क्लीनिक में 300 करोड़ के घोटाले का आरोप लगाया तथा जब बीजेपी सरकार आने पर मोहल्ला क्लीनिक के घोटालो की जांच कराने का संकल्प दोहराया। भाजपा ने दिल्ली में सौर योजना लागू करने सहित 300 यूनिट बिजली फ्री देने सहित धार्मिक स्थलों को 500 यूनिट तक फ्री बिजली देने का संकल्प लिया है।
दिल्ली विधानसभा चुनावों में कांग्रेस भी अपने वादों के साथ चुनावी मैदान में दम भर रही है जिसके कारण चुनाव काफी रोचक होता जा रहा है। दिल्ली में कांग्रेस अपनी जमीन वापस पाने तथा बीजेपी सत्ता में वापसी के लिए मैदान में हैं और दोनों ने अपने सभी स्टार प्रचारकों को मैदान में उतरने को कह दिया है। भाजपा की रणनीति में सभी मुख्यमंत्री चुनाव प्रचार करने जा रहे हैं। खबर है कि दिल्ली में भी उप्र के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की रैलियों की बहुत डिमांड है तथा “बटेंगे तो कटेंग“ के पोस्टर दिल्ली की दीवारों पर लग रहे हैं।

सभी दलों ने अपनी पोटली से वादो और संकल्पों का पिटारा खोलकर रख दिया है। सभी ने रेवड़ियों पर दाँव खेला है जिससे आप- दा की सरकार कुछ दबाव में है। यदि कांग्रेस व ओवैसी के कारण मुस्लिम मतों का विभाजन होता है अथवा बसपा के कारण दलित वोट बैंक कुछ खिसकता है तो फिर आप -दा के लिए दिल्ली की राह कठिन हो जायेगी।

आगरा विकास प्राधिकरण, आगरा नगर निगम, आगरा स्मार्ट सिटी मिशन, या ताज ट्रिपेजियम जोन ऑथोरिटी?

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आगरा: इसका जवाब आपको मिल जाए तो जरूर बताएं, क्योंकि हम कन्फ्यूज्ड हैं। काफी शहरवासियों का मत है कि एक तरफ निर्वाचित जन प्रतिनिधियों की जमात है, तो दूसरी तरफ सरकारी संस्थाओं के बड़े बाबुओं की फौज है जो मिलकर आगरा को ढंग से निचोड़ रहे हैं।

परिणाम आपके सामने है। न औद्योगिक विकास हुआ है, न पर्यावरण सुरक्षित हुआ है। समस्याओं की लिस्ट लंबी होती जा रही है।

आज तक, तमाम प्रयासों के बाद भी तय नहीं है कि यमुना नदी स्वच्छ, निर्मल, जल से लबालब कब होगी, कब यमुना बैराज निर्माण प्रारंभ होगा, कब जिले का नहरी तंत्र, कैनाल सिस्टम दुरुस्त होगा, कब छोटी सहायक नदियां पुनर्जीवित होंगी।

अधिकारी बताएं कब तक नगरवासियों को शुद्ध वायु और शुद्ध पेय जल मुहैय्या हो सकेगा? क्या योजना है शहर के लोकल ट्रांसपोर्ट सिस्टम को सुरक्षित, आरामदायक और सुलभ बनाने की? कब तक अतिक्रमण मुक्त हो जाएगा शहर, कब जाम लगना बंद होंगे?

शासकीय नेतृत्व बताए कि हाई कोर्ट की बेंच आगरा को मिलेगी या नहीं, अंतरराष्ट्रीय फ्लाइट्स कभी आगरा से शुरू होगी या नहीं?

तीन विश्व हेरिटेज इमारतों का शहर, जो साल में एक करोड़ से ज्यादा टूरिस्ट आकर्षित करता हो, जो टूरिज्म इंडस्ट्री की धुरी हो, कैसे इतने लंबे समय से वो अपनी पहचान और अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहा है? विधायकजी यमुना की तलहटी से पतंग तो उड़ाते हैं, पर नदी में जल कब आएगा, कब मैली से निर्मल होगी, इस पर कुछ बोलने से कतराते हैं। कैसी विडंबना है इस शहर की, लगातार तीन दशकों से एक ही पार्टी को भरपूर आशीर्वाद मिल रहा है, लेकिन सब के सब अपनी व्यक्तिगत विकास यात्रा को तबुज्जो देते दिखते हैं, आगरा के सामूहिक इंटरेस्टस को एक जुट होकर पैरवी करने में नेताओं के पैर भारी हो जाते हैं।

1993 से लेकर अब तक, ऐसा लगता है कि आगरा को सिर्फ सुप्रीम कोर्ट ही चला रहा है। अधिकारी तो इतने हरि भक्ति में मग्न हैं कि कोई पेड़ काट कर ले जाए तो एन जी टी से ही पता चलता है इनको। भला हो जागरूक मीडिया का, वरना किसी को कुछ खबर ही न लगे कैसे खामोशी की साजिश से बर्बाद हो रहा है आगरा!!

नियोजित शहरी विकास क्या होता है, कोई पूछे प्राधिकरण के बाबुओं से। करोड़ों खर्च करके कई साल पहले दिल्ली स्कूल ऑफ आर्किटेक्चर एंड टाऊन प्लानिंग से एक विजन प्लान बनवाया था, उस का अता पता नहीं है। नगर निगम आज तक ये तय नहीं कर पाया है कि आगरा स्मार्ट सिटी है या हेरिटेज सिटी।

कई बार लोगों ने कहा है कि शहर में अवैज्ञानिक तरीके से टाइलें बिछाए जाने और पेड़ों के लिए साँस लेने की जगह छोड़े बिना पक्के फुटपाथ बनाना, जैसा कि पालीवाल पार्क में किया गया है, अच्छी बात नहीं है। टाइलें षटकोणीय होनी चाहिए थीं और बीच में घास उगाने के लिए छेद होने चाहिए थे।
एडीए के बाबू जिन्हें पर्यावरण संरक्षण के बारे में कोई जानकारी नहीं है, वे शहर के परिदृश्य को बर्बाद कर रहे हैं। नागरिकों को एडीए के साथ-साथ ज़मीन हड़पने वाले कुछ बेईमान बिल्डरों के खिलाफ़ भी जागने की ज़रूरत है।

“यह वास्तव में दुखद और दुर्भाग्यपूर्ण है कि हम उन लोगों के खिलाफ़ कुछ नहीं कर सकते जिन्होंने सामुदायिक तालाबों और कंक्रीट के हरे-भरे पैच पर कब्ज़ा कर लिया है,” पर्यावरणविद डॉ देवाशीष भट्टाचार्य कहते हैं। “आबादी का एक हिस्सा खुली जगहों को बेकार समझता है। नदी के किनारे, खुले नालों के किनारे एक-एक इंच जमीन हड़पी जा रही है। नालों पर होटल बन गए हैं और हम असहाय दर्शक बने हुए हैं, क्योंकि वे शक्तिशाली लोग हैं और आसानी से विरोध के स्वरों को शांत कर सकते हैं।”

बहुत पहले मांग की गई थी कि एडीए को पर्यावरण अनुकूल निर्माण योजनाएं बनाने में सहायता करने के लिए एक शहरी कला और भूनिर्माण निकाय का गठन किया जाए, लेकिन मठाधीश मैंडरिन्स अपने स्वार्थ की रक्षा के लिए कभी किसी को हस्तक्षेप नहीं करने देते। बाबू आते हैं और चले जाते हैं। शहर के दीर्घकालिक हित उनके दिलों में कभी भी इतने प्यारे नहीं हो सकते। एडीए को बदलना होगा।

हम सभी जानते हैं कि नगर निगम पर्याप्त संसाधनों से वंचित है। विभिन्न करों से जो कुछ भी यह कमाता है, वह व्यवस्था को वित्तपोषित करने में खर्च हो जाता है। आगरा विकास प्राधिकरण को लोकतांत्रिक बनाने का समय आ गया है, क्योंकि ये संस्था खुद ही बीमार, औपनिवेशिक और तनावग्रस्त लगती है।
यह एक दुखद टिप्पणी है, लेकिन काफी हद तक सच है कि इस महान शहर के नागरिक मामलों का उचित प्रबंधन नहीं किया जा रहा है। हमारे पास न तो प्रतिबद्ध प्रबंधक हैं और न ही उन समस्याओं को संभालने के लिए सक्षम विशेषज्ञ हैं। नियत की अलग कमी है।

Who is ruining Agra?

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Agra: If you find the answer, do let us know, because we are confused. Many residents believe that on one side, there is a group of elected representatives, and on the other, a battalion of bureaucrats who together are squeezing Agra dry.

The results are evident. Neither has industrial development taken place, nor has the environment been safeguarded. The list of problems keeps growing longer.

Despite numerous efforts, there is still no clarity on when the Yamuna River will be clean, pristine, and brimming with water. When will the construction of the Yamuna Barrage begin? When will the district’s canal system be repaired? When will the smaller tributaries be revived?

Officials must answer when the residents will get clean air and potable water. What is the plan to make the city’s local transport system safe, comfortable, and affordable? When will the city be free of encroachments? When will traffic jams cease?

The ruling party leadership must clarify whether Agra will get a High Court bench or not. Will international flights ever operate from Agra?

A city with three UNESCO World Heritage monuments, attracting over a crore tourists annually and serving as the hub of the tourism industry, has been struggling for its identity and existence for far too long. While MLAs fly kites from the Yamuna’s riverbed, they shy away from addressing when the river will be filled with water and transformed from polluted to pristine. What an irony for this city! For three decades, one party has received overwhelming support, yet all leaders seem more focused on their personal growth journeys rather than collectively advocating for Agra’s interests.
Since 1993, it feels as though Agra has been governed solely by the Supreme Court. Officials are so engrossed in their “divine duties” that they only learn about tree felling through the National Green Tribunal (NGT). Thanks to an alert media, otherwise, no one would know how Agra is being silently destroyed by conspiracies of neglect!

Ask the bureaucrats of the Agra Development Authority (ADA) what planned urban development means. Years ago, crores were spent to create a vision plan through the Delhi School of Architecture and Town Planning, but its whereabouts are unknown. The Municipal Corporation is yet to decide whether Agra is a smart city or a heritage city.

Many have pointed out that unscientific tiling and the construction of concrete footpaths without leaving breathing space for trees, as seen in Paliwal Park, is not ideal. The tiles should have been hexagonal with holes for grass to grow in between.

The ADA officials, who lack knowledge of environmental conservation, are ruining the city’s landscape. Citizens need to wake up against the ADA and some dishonest builders who grab land.

“It is truly sad and unfortunate that we cannot act against those who have encroached on community ponds and green patches,” says environmentalist Dr. Devashish Bhattacharya. “A section of the population considers open spaces useless. Every inch of land along riverbanks and open drains is being grabbed. Hotels have been built over drains, and we remain helpless spectators because these are powerful people who can easily silence dissent.”

A long-standing demand has been to establish an urban art and landscaping body to assist the ADA in creating eco-friendly construction plans. However, the mandarins in power never allow any intervention to protect their vested interests. Bureaucrats come and go, but the city’s long-term interests never seem to matter to them. The ADA must change.

We all know that the Municipal Corporation is under-resourced. Whatever it earns from various taxes is spent on maintaining the system. It is time to democratize the Agra Development Authority, as this institution itself appears sick, colonial, and stressed.

It is a sad but largely true commentary that the civic affairs of this great city are not being managed properly. We neither have committed managers nor capable experts to handle these issues. Also, there is a distinct lack of intent.

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