मेटा के भारत और दक्षिण एशिया के सार्वजनिक नीति निदेशक, श्री शिवनाथ ठुकराल ने सोशल मीडिया पर माफी जारी की और भारत को मेटा के नवाचारों के लिए एक महत्वपूर्ण भागीदार बताया।

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मार्क जुकरबर्ग का भारत पर बयान – जो रोगन पॉडकास्ट

मार्क जुकरबर्ग ने झूठा दावा किया कि भारत की वर्तमान सरकार कोविड-19 की कमजोर प्रतिक्रिया के कारण चुनाव हार गई, जिसके चलते केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव की तीखी प्रतिक्रिया सामने आई।

संसदीय समिति ने मेटा को मार्क के बयान पर तलब किया

मेटा ने मार्क जुकरबर्ग के बयान पर माफी मांगी

घटनाओं की सूची:

तारीख मुद्दा बयान/प्रतिक्रिया
10 जनवरी 2025 जो रोगन के साथ एक इंटरव्यू में, श्री मार्क जुकरबर्ग ने गलत दावा किया कि 2024 के चुनावों में अधिकांश सत्तारूढ़ सरकारें, जिसमें भारत भी शामिल है, हार गईं। मार्क जुकरबर्ग ने कहा, “2024 दुनिया भर में चुनावों का एक बड़ा साल था, और इन सभी देशों, भारत और अन्य कई देशों में चुनाव हुए। मौजूदा सरकारें लगभग हर जगह हार गईं।”
13 जनवरी 2025 भारत के संदर्भ में यह दावा तथ्यात्मक रूप से गलत था। 2024 के चुनावों में, एनडीए सरकार, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में, सत्ता में बनी रही। केंद्रीय सूचना और प्रसारण मंत्री, श्री अश्विनी वैष्णव ने मार्क जुकरबर्ग के बयान की तथ्य-जांच की और प्रतिक्रिया दी। उन्होंने ट्वीट किया:
“दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत ने 2024 के चुनावों में 640 मिलियन से अधिक मतदाताओं के साथ एनडीए में विश्वास व्यक्त किया। जुकरबर्ग का यह दावा कि कोविड-19 के बाद 2024 के चुनावों में भारत सहित अधिकांश सत्तारूढ़ सरकारें हार गईं, तथ्यात्मक रूप से गलत है।”
13 जनवरी 2025 सूचना प्रौद्योगिकी और संचार पर संसदीय स्थायी समिति, जिसकी अध्यक्षता श्री निशिकांत दुबे कर रहे हैं, ने मेटा को इस गलत जानकारी के लिए तलब करने की योजना बनाई। श्री निशिकांत दुबे ने कहा:
“किसी भी लोकतांत्रिक देश के बारे में गलत जानकारी उसकी छवि खराब करती है। इस संगठन को इस गलती के लिए संसद और यहां की जनता से माफी मांगनी होगी।”
14 जनवरी 2025 मेटा इंडिया के सार्वजनिक नीति के उपाध्यक्ष, श्री शिवनाथ ठुकराल ने मंत्री के ट्वीट के जवाब में मेटा की ओर से माफी मांगी। उन्होंने लिखा:
“आदरणीय मंत्री @AshwiniVaishnaw, मार्क का यह अवलोकन कि 2024 के चुनावों में कई सत्तारूढ़ दलों को दोबारा नहीं चुना गया, कई देशों के लिए सही है, लेकिन भारत के लिए नहीं। हम इस अनजाने में हुई गलती के लिए माफी मांगते हैं। भारत मेटा के लिए एक अविश्वसनीय रूप से महत्वपूर्ण देश बना हुआ है, और हम इसके नवाचार के भविष्य में योगदान करने की उम्मीद करते हैं।”

विवाद का विवरण

मेटा प्लेटफॉर्म्स इंक. के अध्यक्ष और सीईओ मार्क जुकरबर्ग ने जो रोगन पॉडकास्ट में भारत को कोविड-19 महामारी के दौरान सरकारों के प्रति असंतोष का उदाहरण दिया। उनका बयान यह सुझाव देता है कि महामारी के बाद अधिकांश सत्तारूढ़ सरकारें, जिनमें भारत भी शामिल है, अगले चुनाव हार गईं।

केंद्रीय मंत्री की प्रतिक्रिया

केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने जुकरबर्ग के दावे की तथ्य-जांच करते हुए इसे खारिज किया। उन्होंने भारत के 2024 के चुनावों को दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक प्रयास के रूप में बताया, जिसमें 640 मिलियन से अधिक मतदाताओं ने भाग लिया और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार को एक मजबूत जनादेश दिया।

मंत्री वैष्णव ने भारत सरकार द्वारा कोविड-19 के दौरान उठाए गए कुछ प्रमुख कदम भी गिनाए:
• 800 मिलियन नागरिकों को मुफ्त खाद्यान्न वितरण।
• 2.2 बिलियन मुफ्त वैक्सीन खुराक।
• 110 मिलियन से अधिक किसानों को वित्तीय सहायता।
• “वसुधैव कुटुंबकम” (दुनिया एक परिवार है) की भावना को अपनाते हुए अन्य देशों को सहायता प्रदान करना।
• रणनीतिक निवेश के कारण मजबूत महामारी के बाद की आर्थिक सुधार।

संसदीय समिति का कदम

श्री निशिकांत दुबे की अध्यक्षता वाली समिति ने मेटा के अधिकारियों को तलब किया है और 20-24 जनवरी के बीच चर्चा करेगी। अगर मेटा द्वारा माफी नहीं दी गई तो कानूनी कार्रवाई की सिफारिश की जा सकती है।

मेटा की माफी

मेटा के भारत और दक्षिण एशिया के सार्वजनिक नीति निदेशक, श्री शिवनाथ ठुकराल ने सोशल मीडिया पर माफी जारी की और भारत को मेटा के नवाचारों के लिए एक महत्वपूर्ण भागीदार बताया।

अयोध्या में धार्मिक, आध्यात्म और आर्थिक समृद्धि का नया अध्याय : तीर्थ यात्रियों का भी कीर्तिमान

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रामलला के अपने जन्मस्थान अयोध्या में पुनः विराजमान होने की वर्षगाँठ का तीन दिवसीय उत्सव संपन्न हुआ । इस एक वर्ष में अयोध्या ने अनेक कीर्तिमान बनाये। कभी सरयू में दीनदान का तो कभी दीपावली दीपोत्सव का । इस पूरे वर्ष अयोध्या आने वाले तीर्थ यात्रियों का भी कीर्तिमान बना ।

अपने जन्मस्थान अयोध्या में रामलला गत वर्ष पौष शुक्ल पक्ष द्वादशी को विराजमान हुये थे । तब अंग्रेजी तिथि 22 जनवरी थी । लेकिन विक्रम संवत के अनुसार पौष शुक्ल पक्ष द्वादशी इस वर्ष 11 जनवरी को आई । वर्षगाँठ उत्सव विक्रम संवत तिथि के अनुसार 11जनवरी से आरंभ हुआ जो तीन दिन चला । भीषण ठंड और महाकुंभ आरंभ होने के बाद भी इन तीन दिनों में लगभग साढ़े तीन लाख श्रृद्धालुओं ने सरयू में डुबकी लगाई और रामलला के दर्शन किये । इस तीन दिवसीय उत्सव का शुभारंभ उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने किया । इन तीन दिनों में पूरी अयोध्या राममय रही । रामलला को लगभग पचास क्विंटल फूलों से सजाया गया । इसमें विदेशी फूल भी थे । उत्सव के इन तीन दिनों में उन सभी कार्यक्रमों की झलक थी जो पूरे वर्ष अयोध्या में चले । इनमें आध्यात्मिक साधना, संतों के प्रवचन, यज्ञ हवन, पूजन के साथ भजन कीर्तन एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम भी संपन्न हुये । अनुष्ठान यज्ञशाला में श्री राम बीज मन्त्रों का अनुष्ठान और 21 वैदिक आचार्य के द्वारा 6 लाख जाप संपन्न किया गया । 11 वैदिक आचार्यों द्वारा शुक्ल यजुर्वेद के मन्त्रोंच्चारण से आहुति दी गई । प्रतिदिन सबसे पहले रामलला का सुगंधित द्रव्यों से अभिषेक पूजन होता, फिर मंदिर परिसर में चारों वेदों का पारायण और राम संरक्षण मंत्र का अखंड जप किया गया । उत्सव के प्रथम दिन 122035, दूसरे दिन 130155 और तीसरे दिन 105070 श्रद्धालुओं ने रामलला का पूजन दर्शन किया ।

अयोध्या आने वाले श्रृद्धालुओं में एक छै वर्ष का बालक मोहब्बत भी था जो पाकिस्तान बॉर्डर से सटे फाजिल जिले से लगभग बारह सौ किलोमीटर दौड़ लगाकर अयोध्या पहुंचा था। इस बालक ने 14 नवंबर से अपनी यात्रा आरंभ की थी। वह प्रतिदिन 20 किमी दौड़ता था। 10 जनवरी को वह फैजाबाद पहुंचा और 11 नवम्बर को अयोध्या पहुंचा। मुख्यमंत्री योगी योगेन्द्रनाथ ने साल श्रीफल से इस बालक का सम्मान किया ।

अपने जन्मस्थान में विराजमान होने की यह वर्षगाँठ का तीन दिवसीय उत्सव तो एक औपचारिकता थी । अयोध्या में तो यह पूरा वर्ष ही सामाजिक, धार्मिक, आध्यात्मिक और आर्थिक उत्थान का रहा । इस वर्ष कई कीर्तिमान बने और अयोध्या ने विकास की नई अंगड़ाई ली। अयोध्या अब उसी भव्यता की यात्रा पर है जिसका वर्णन राम चरित मानस और अन्य ग्रंथों में मिलता है । संतों के प्रवचन, साधकों की साधना और भजन कीर्तन के साथ अयोध्या में विकास के नये कार्य आरंभ हुये हैं । पूरे नगर और उसके आसपास ऐसा कोई क्षेत्र कोई गली मोहल्ला ऐसा नहीं जहाँ नये निर्माण कार्य आरंभ न हुये हों । अयोध्या को उसके अतीत का वैभव लौटाने केलिये शासकीय और सार्वजनिक कार्यों केअतिरिक्त निजी स्तर की सक्रियता भी बढ़ी है ।

अयोध्या का अतीत और स्मृतियाँ

इतिहास में जहाँ तक दृष्टि जाती है, अयोध्या का वर्णन मिलता है । रामजी से पहले भी और रामजी के बाद भी । अयोध्या हर कालखंड में आकर्षण का केन्द्र रही । अयोध्या की भव्यता की ओर विदेशी राजनयिकों, पर्यटको और शोध कर्ताओं के आने का वर्णन मिलता है । ढाई हजार वर्ष पूर्व के चीनी और यूनानी यात्रियों द्वारा लिखे गये विवरण इसका प्रमाण हैं । लेकिन दसवीं शताब्दी के साथ अयोध्या के विध्वंस का दौर चला । यह भारत पर मध्य एशिया के आक्रमणों का नया दौर था । प्रत्येक आक्रमणकारी के निशाने पर अयोध्या रही । आक्रांता आते, लूटते विध्वंस करते और लौट जाते थे । उनके जाने के बाद स्थानीय शासक और जन सामान्य द्वारा पुनर्निर्माण हो जाया करता था । आक्रमण, प्रतिकार, बलिदान, विध्वंस और पुनर्निर्माण के संघर्ष का जितना लंबा इतिहास अयोध्या का है वैसा संसार में किसी और नगर का नहीं। यह संघर्ष चार प्रकार का रहा । पहले पाँच सौ वर्षों की अवधि विध्वंस और पुनर्निर्माण हुआ। दूसरी अवधि ऐसी आई जब जन्मस्थान मंदिर को पूरी तरह ढहाकर उसके स्थान पर मस्जिद बना दी गई । यह हमलावर बाबर के समय 1526 में हुआ । मुगल बादशाह अकबर के समय पूजन के लिये एक चबूतरा बनाने का स्थान मिलने का विवरण तो मिलता है लेकिन मूर्ति स्थापित करने की अनुमति नहीं मिली। लेकिन औरंगजेब के समय वह चबूतरा भी तोड़ दिया गया । तब से संघर्ष तीव्र हुआ जो अंत तक रुका नहीं । औरंगजेब के समय जन्मस्थान की मुक्ति केलिये साधु संतों, श्रद्धालुओं के साथ निहंगों के भी सतत बलिदान हुये । यह क्रम लगभग दो सौ वर्ष चला । इसमें पीढ़ियों के बलिदान हुये । फिर अंग्रेजीकाल आया । तब कानूनी लड़ाई का दौर आरंभ हुआ । 1858 में फैजाबाद कलेक्टर को आवेदन दिया गया । 1886 में जिला अदालत में भी सुनवाई हुई। अंग्रेजीकाल में यह कानूनी लड़ाई स्वतंत्रता के सूर्योदय तक लगभग नब्बे वर्ष चली । अंग्रेजों ने इसे विवादित स्थल घोषित कर दिया था। स्वतंत्रता के बाद संघर्ष का चौथा स्वरूप उभरा । रामलला इस विवादित स्थल में प्रकट हुये । तब कानूनी संघर्ष के साथ जन जागरण अभियान भी चला । समय के साथ इन संघर्षों का स्वरूप और शैली भले बदली हो बदली हो लेकिन प्राणों के बलिदान कभी रुका नहीं। जन जागरण अभियान में कारसेवकों का बलिदान कभी भुलाया नहीं जा सकता । यह बलिदान अयोध्या में कारसेवा के दौरान पुलिस गोली चालन और कारसेवा लौटते कारसेवकों का गोधरा में हुआ । एक भीड़ ने योजना पूर्वक सावरमती एक्सप्रेस को रोका और कारसेवकों को घेरकर मारा गया वह घटना आज भी रोंगटे खड़े कर देती है ।
अयोध्या का गौरव लौटाने के लिये हुये सतत संघर्ष में, कितने प्राण गये, उनकी गिनती तक नहीं है। अंततः 2019 में अदालत का अंतिम निर्णय आया, 5 फरवरी 2020 को जन्मस्थान मंदिर न्यास गठित हुआ, 5 अगस्त 2020 को प्रधानमंत्री श्रीनरेंद्र मोदी ने मंदिर निर्माण कार्य केलिये भूमि पूजन किया और 22 जनवरी 2024 को रामलला अपने जन्मस्थान पर विराजमान हो गये ।

अयोध्या में बने कीर्तिमान

अयोध्या में अपने जन्मस्थान पर रामलला के विराजमान होने के बाद इस एक वर्ष में अनेक कीर्तिमान बने । ये कीर्तिमान राम नवमीं, दीपावली और नववर्ष पर श्रृद्धालुओं के आने, सरयूतट पर दीपोत्सव, परिक्रमा वासियों की संख्या एवं पूरे वर्ष में अयोध्या आने वाले श्रृद्धालुओ की कुल संख्या का है । रामलला के विराजमान होनै की तिथि 22 जनवरी 2024 से 11 जनवरी 2025 तक अयोध्या आने वाले श्रृद्धालुओं की संख्या लगभग 18.6 करोड़ का ऑकड़ा छू रही है । यह संख्या भारत के सभी धार्मिक एवं पर्यटन स्थल पर पहुँचने वाले यात्रियों में सर्वाधिक है । इससे पहले देशी और विदेशी दोनों प्रकार के पर्यटकों की अधिकतम संख्या का कीर्तिमान अक्सर ताजमहल के नाम रहा करता था । लेकिन इस वर्ष अयोध्या ने सारे कीर्तिमान ध्वस्त कर दिये। तीज त्यौहारों के विशेष दिनों को छोड़कर समान्य दिनों में अयोध्या आने वाले श्रृद्धालुओं की औसतन संख्या दो लाख तक रही है। 2025 नववर्ष के दिन एक जनवरी को दस लाख से अधिक यात्री अयोध्या आये । वर्ष 2024 दीपावली उत्सव के कुल पांच दिनों में सरयू तट पर द्वीप जलाने के तीन रिकॉर्ड बने। दो रिकॉर्ड सरयू आरती के और एक दीपोत्सव का । दीपावली 30 अक्टूबर को थी । 27 अक्टूबर से ही सरयू नदी के 55 घाटों पर दीप सजाने का कार्य आरंभ हो गया था । यह कार्य में 35 हजार वालेंटियरों द्वारा किया गया था । 30 अक्टूबर की शाम सरयू आरती का भी कीर्तिमान बना । अयोध्या के प्रमुख साधु-संतों और 1,100 बटुकों ने आरती की थी। गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड की टीम अयोध्या पहुँची थी । इस शाम कुल 25 लाख 12 हजार 585 दीप जलाने कीर्तिमान बना । गिनीज बुक ने यह सर्टिफिकेट भी प्रदान किया। दूसरा कीर्तिमान परिक्रमा का बना । कार्तिक पूर्णिमा से आरंभ परिक्रमा में केवल तीन दिन में पैंतीस लाख तीर्थयात्री सम्मिलित हुये । यह भी एक कीर्तिमान था ।

सुरक्षा मानक भी विश्व स्तरीय

अयोध्या आने वाले श्रृद्धालुओं की संख्या, दीपोत्सव, सरयू आरती और परिक्रमा करने वालों की संख्या का कीर्तिमान बनाने के साथ इस वर्ष अयोध्या ने सुरक्षा का भी विशेष मानक स्थापित किया । सुरक्षा का पहला मानक मंदिर निर्माण में किसी भी दुर्घटना का न होना है। मंदिर निर्माण केलिये बड़े बड़े पत्थरों के साथ दिन रात काम चल रहा है । छोटी मोटी घटनाएँ तो हुई लेकिन ऐसी कोई दुर्घटना नहीं हुई जिसमें कोई घायल हुआ हो और उपचार की आवश्यकता पड़ी हो । इसके लिये ब्रिटिश सुरक्षा परिषद ने बिल्डर को ‘स्वॉर्ड ऑफ ऑनर’ प्रदान किया, जबकि राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद ने गोल्डन ट्रॉफी प्रदान की। मंदिर निर्माण में बरती जा रही सावधानियों का अध्ययन करने केलिये अनेक विशेषज्ञ अयोध्या आये और उन्होंने मंदिर निर्माण में उत्‍कृष्‍ट सुरक्षा के उपायों की प्रशंसा की बिल्डर को मिले पुरस्कार को वैश्विक सुरक्षा मानकों का अनुपालन और विश्‍व स्‍तर पर अन्य निर्माण परियोजनाओं के लिए एक मॉडल माना ।

अयोध्या में विकास के नये आयाम

रामलला के विराजमान होने के साथ अयोध्या के विकास का नया अध्याय आरंभ हुआ है । अयोध्या के भावी विकास के लिये प्रधानमंत्री श्रीनरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ विशेष रूचि ले रहे हैं। रामलला जिस मंदिर में विराजमान हुये हैं वह मंदिर भी अपनी भव्यता का स्वरूप लेने जा रहा है । मंदिर संरचना में 392 खंभे और 44 दरवाजे पारंपरिक नागर शैली में निर्मित हुये हैं। राम जन्मभूमि मंदिर 380 (पूर्व-पश्चिम) 250 फीट की चौड़ाई में फैला है और 161 फीट ऊंचा है। 32 सीढ़ियों वाला एक भव्य प्रवेश द्वार है। सभी मापदंडों पर पांच सितारा रेटिंग स्तर का निर्माण हुआ है ।

मंदिर के साथ पूरी अयोध्या नया स्वरूप लेने जा रही है ।नगर के विकास योजनाएँ तीन प्रकार की हैं । पहली तात्कालिक, दूसरी मध्य समयावधि की और तीसरी दीर्घकालिक। अनुमान है आगामी दस वर्षों में अयोध्या उस भव्यता और गरिमा को प्राप्त कर लेगी जिसका वर्णन पुराणों में मिलता है । 30.5 हजार करोड़ से अधिक की आठ परियोजनाओं का कार्य पूर्णता की ओर है । जबकि लगभग 85 हजार करोड़ की अन्य परियोजनाएँ आगामी दो वर्षों में पूरी हो जायेंगी। उत्तरप्रदेश में संपन्न ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट में अयोध्या के लिए 6 हजार करोड़ से अधिक के निवेश प्रस्ताव प्राप्त हुये । इन पर भी कार्य आरंभ हो रहा है । अयोध्या में जो काम होने जा रहे हैं उनमें सबसे प्रमुख पूरी अयोध्या में

सौर ऊर्जा से प्रकाशमान होने का प्रबंध है । जो आठ कार्य प्राथमिकता से किये जा रहे हैं उनमें सबसे पहला विमानतल को अंतर्राष्ट्रीय स्वरूप प्रदान करना है। चौदह सौ करोड़ के इस प्रोजेक्ट में 11 सौ करोड़ रुपए प्रदेश सरकार की ओर से दिये गये। दूसरा अयोध्या धाम जंक्शन रेलवे स्टेशन का निर्माण। यह कार्य पूरा हो गया है।

जो कार्य आरंभ हुये हैं उनमें वर्तमान नगर और उसके आसपास कुल 1100 एकड़ में अयोध्या नया उभर रहा है । अन्य कार्यो में अयोध्या नगर के सभी प्रवेश द्वार नागर शैली के बनाए जा रहे हैं। मेन स्पाइन रोड, सुग्रीव किला से श्री राम मंदिर मार्ग, श्रृंगार हाट से राम मंदिर का मार्ग, और पंचकोशी परिक्रमा मार्ग का विकास हैं ।

अयोध्या विकास प्राधिकरण विशाल वाहन पार्किंग और दुकानों का निर्माण कर रही है ।

सड़कों का चौड़ीकरण और नालों को गहरा करने, सूर्यकुंड का सौंदर्यीकरण, पार्क का निर्माण, लाइट एंड साउंड शो, ग्रीन फ़ील्ड टाउनशिप, सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट जैसी परियोजनाएं शामिल हैं। राम मंदिर, हनुमान गढ़ी, कनक महल, नंदीग्राम आदि धार्मिक स्थलों के विकास के साथ अयोध्या के कुछ पर्यटन स्थलों जिनमें जायसी के पैतृक स्थान का विकास, बाबा गोरखनाथ की प्रतिमा स्थापित करना, सरयू तट और घाटों का विकास जैसे कार्य शामिल हैं।

दो बार कार्यकारी प्रधानमंत्री बने फिर भी मकान नहीं खरीद पाये

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भारतीय राजनीति में कुछ ऐसे मनीषी हुये जो अपने जीवन में बहुत शांत और सरल लेकिन अपने सिद्धांतों पर अडिग रहे। श्री गुलजारी लाल नंदा ऐसे विलक्षण राजनेता थे, जो तीन बार देश के ग्रहमंत्री और दो बार कार्यकारी प्रधानमंत्री रहे फिर भी अपना निजी मकान नहीं बना पाये और न उन्होंने अपने किसी परिवारिक सदस्य को राजनीति में बढ़ावा दिया ।

श्री गुलजारी लाल नंदा का पूरा जीवन शांत, सात्विक और संकल्पनिष्ट रहा है । भारतीय राजनीति में वे ऐसे विरले राजनेता थे जो सत्ता की भव्यता और उच्चतम अधिकार प्राप्त करके भी साधारण रहे । उनकी सादगी और सिद्धांत के प्रति दृढ़ रहने के प्रसंग समय समय पर अनेक लेखकों और पत्रकारों ने लिखे हैं। वे शांत रहते थे, कम बोलते थे और सुनते अधिक थे । मतभेद होने पर विवाद नहीं करते थे, अपना मार्ग बदल लेते थे । राजनीति से मार्ग बदलने का भी यही कारण था । प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गाधीँ से उनके मतभेद हुये । वे शांत रहे । 1971 के लोकसभा चुनाव में प्रचार भी किया और परिणाम के तुरन्त बाद राजनीति से संयास लेने की घोषणा कर दी । वे अपने राजनैतिक और सार्वजनिक जीवन में कितने सरल और ईमानदार थे इसका वर्णन एक पुस्तक “भारत के प्रधानमंत्री” में है । इस पुस्तक के लेखक अपने समय के वरिष्ठ पत्रकार रशीद किदवई हैं। उन्होंने लिखा है कि जब नंदाजी ने राजनीति छोड़ी तो उनके पास आजीविका का कोई साधन नहीं था । आर्थिक कठिनाई के बीच वे अक्सर दिल्ली के कनॉट प्लेस में बस स्टॉप पर बस का इंतजार करते दिख जाते थे। सामान्य और सरल जीवन शैली का उनके जीवन का एक प्रसंग अपने समय बहुत चर्चित रहा है । राजनीति से संन्यास लेकर वे नई दिल्ली की फ्रेंड्स कॉलोनी में किराये का घर लेकर रहने लगे थे । लेकिन कुछ स्थिति ऐसी बनी कि किराया न दे पा रहे थे, किराया चढ़ा तो मकान मालिक मकान खाली कराने के लिये झगड़ा करने लगा । मोहल्ले के लोग एकट्ठे हो गये । उनमें एक पत्रकार भी थे । अगले दिन यह समाचार प्रमुखता से छपा तो अधिकारी और राजनेता उनके निवास पर पहुँचे। सबने उनसे शासकीय आवास में आने को कहा । पर उन्होंने इंकार कर दिया । उन दिनों स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों को पाँच सौ रुपये प्रतिमाह सम्मान निधि दी जाती थी । नंदाजी इस निधि को यह कहकर अस्वीकार कर दिया था कि उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में किसी सम्मान निधि केलिये भाग नहीं लिया था । लेकिन इस घटना के बाद उन्होंने यह निधि स्वीकार की । और इसी निधि में वे अपना खर्च चलाते थे । नंदाजी श्रीमद्भगवत गीता का नियमित पाठ करते थे, भगवान श्रीकृष्ण उनके ईष्ट थे । समय के साथ कुरुक्षेत्र आ गये । कुरुक्षेत्र वहीं स्थान जहाँ भगवान श्रीकृष्ण ने श्रीमद्भगवत गीता का उपदेश दिया था । नंदा जी ने स्वयं को कुरुक्षेत्र के विकास के लिये समर्पित कर दिया । उन्होंने कुरुक्षेत्र विकास बोर्ड का गठन करके कार्य आरंभ किया । आज कुरुक्षेत्र का जो व्यवस्थित स्वरूप हम देखते हैं । यह नंदाजी के कारण ही विकसित हुआ। उनके प्रयासों से कुरुक्षेत्र आज विश्व के प्रमुख पर्यटक और पुरातात्विक महत्व के स्थलों के रूप में जाना गया । उन्होंने लगभग बाईस वर्ष तक कुरूक्षेत्र की सेवा की । वृद्धावस्था और स्वास्थ्य की गिरावट के बाद भी वे कुरुक्षेत्र विकास के लिये समर्पित रहे । उन्होंने “नवजीवन संघ”और “मानव धर्म मिशन” जैसी संस्थाओं की नींव रखी ।

राजनेता के साथ नंदाजी की पहचान एक लेखक के रूप में भी रही । उनकी मुख्य पुस्तक रचनाओं में “आस्पेक्ट्स ऑफ खादी”, “अप्रोच टू द सेकंड फ़ाइव इयर प्लान”, “गुरु तेगबहादुर”, “संत एंड सेवियर”, “हिस्ट्री ऑफ़ एडजस्टमेंट इन द अहमदाबाद टेक्सटाल्स” और “फॉर ए मौरल रिवोल्युशन तथा सम बेसिक कंसीड्रेशन” हैं। भारत सरकार ने 1997 में उन्हें सर्वोच्च सम्मान “भारत रत्न” से सम्मानित किया ।

संक्षिप्त जीवन परिचय

ऐसी विलक्षण प्रतिभा के धनी श्री गुलजारीलाल नंदा का जन्म 4 जुलाई 1898 को सियालकोट में हुआ था । अब यह क्षेत्र पाकिस्तान में है। पिता बुलाकी राम नंदा शिक्षक थे और माता श्रीमती ईश्वर देवी भारतीय परंपराओं के प्रति समर्पित ग्रहणी थीं। गुलजारी लाल जी की प्राथमिक शिक्षा सियालकोट में हुई । इंटर की पढ़ाई लाहौर के ‘फोरमैन क्रिश्चियन कॉलेज’ में तथा आगे कला संकाय में स्नातकोत्तर एवं क़ानून की पढ़ाई इलाहाबाद से की । पढ़ाई के बीच में ही अठारह वर्ष की आयु में इनका विवाह लक्ष्मी देवी के साथ हुआ । समय के साथ दो पुत्र और एक पुत्री के पिता बने ।

जब वे इलाहाबाद में अपनी वकालत की पढ़ाई के साथ ही स्वाधीनता आँदोलन से जुड़ गये थे। पढ़ाई पूरी करके मुम्बई आये । यहाँ नेशनल कॉलेज में व्याख्याता हो गये । लेकिन यहाँ अधिक न रुक सके । वहाँ से अहमदाबाद आये । अहमदाबाद में टेक्सटाइल्स इंडस्ट्री लेबर एसोसिएशन के सचिव के रूप में जुड़ गये । इस संस्था के सचिव के रूप में वे श्रमिक वर्ग के समीप आये, उनकी व्यवसायिक और व्यक्तिगत समस्याओं से जुड़े और इस वर्ग के प्रति सदैव संवेदनशील रहा । समय के साथ गाँधी जी के निकट आये । वे गाँधी जी के चिंतन और सादगी से बहुत प्रभावित हुये और अपने सार्वजनिक जीवन में गाँधीजी को ही अपना आदर्श मानते थे । नंदाजी ने गाँधी के आव्हान पर प्रत्येक आँदोलन में हिस्सा लिया । इनमें 1921 के असहयोग आँदोलन के साथ 1932 में सत्याग्रह और 1942 का अँग्रेजों भारत छोड़ो आन्दोलन भी था । वे तीनों आँदोलन जेल भी गये । अंग्रेजी काल में हुये आंतरिक विधानसभा चुनावों में वे

नंदा बॉम्बे विधानसभा क्षेत्र से 1937 से 1939 तक और 1947 से 1950 तक विधायक रहे। इस दौरान उन्होंने मुम्बई सरकार में श्रम एवं आवास मंत्रालय का कार्यभार भी संभाला। 1947 में काँग्रेस की श्रमिक इकाई ‘इंडियन नेशनल ट्रेड यूनियन कांग्रेस’ की स्थापना नंदा जी पहल पर हुई थी।

स्वतंत्रता के बाद जब वे 1951 में राष्ट्रीय योजना समिति के सदस्य बने । योजना समिति और आयोग में अशासकीय संस्थाएँ भी सहभागी बने, इसके लिये नंदाजी ने अशासकीय व्यक्तियों का एक नेटवर्क तैयार किया । जो आगे चलकर भारत सेवक समाज के रूप में उभरा । भारत सेवक समाज के गठन के बाद भारत साधु समाज की नीव भी नंदाजी ने रखी । इसके अतिरिक्त मानव धर्म मिशन, श्री सनातन महावीर दल, रास्ट्रीय लोक सेना, कुरुक्षेत्र विकास बोर्ड, भारतीय संस्कृति रक्षा संस्थान,नव जीवन संघ ,भारतीय जाग्रत समाज,श्री कृष्ण आयुर्वेदिक फार्मेसी, मानव धर्म सम्मेलन जैसी लगभग दो दर्जन संस्थाओं के गठन का श्रेय भी नंदा जी को जाता है । नंदा जी चाहते थे कि शासकीय योजनाओं, नीति निर्माण और उनके क्रियान्वयन में जन भागीदारी हो । इसके लिये लगभग दो दर्जन संस्थाओं का गठन कर समाज के विभिन्न वर्ग समूहों के अशासकीय व्यक्तियों को जोड़ा । योजना आयोग के साथ वे केन्द्रीय मंत्री भी बने । केन्द्रीय मंत्री रहते हुये भी योजना आयोग के उपाध्यक्ष रहे । भारत की आरंभिक पंचवर्षीय योजना बनाने का श्रेय भी नंदा जी को जाता है । 1957 से 1967 तक सिंचाई, रोजगार, योजना आदि विभिन्न विभागों के केंद्रीय मंत्री रहे । 1963 में केन्द्रीय ग्रहमंत्री मंत्री का प्रभार भी उनके पास रहा । नंदाजी की छवि एक ईमानदार, कर्त्तव्यनिष्ट एवं अपने कार्य के प्रति समर्पित राजनेता के रूप में रही । वे मिलावट और भ्रष्टाचार के सख्त खिलाफ थे । उन्होंने अपने मंत्रालयों में कई ऐसी नीतियां दी जो विभागों प्ररेणा बनीं। वे भारत के तीनों आरंभिक प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू, लाल बहादुर शास्त्री और श्रीमती इंदिरा गांधी के मंत्रीमंडल में रहे और दो बार कार्यकारी प्रधानमंत्री बने । दोनों बार उनके कार्यकारी प्रधानमंत्री रहने की अवधि तेरह तेरह दिन रही । पहली बार 1964 में पं जवाहरलाल नेहरू की मृत्यु के बाद और दूसरी बार 1966 श्री लाल बहादुर शास्त्री की मृत्यु के बाद कार्यवाहक प्रधानमंत्री बने। 1971 में उन्होंने राजनीति से संयास लिया और समाज सेवा में जुट गये । जीवन के अंतिम समय में वे अपनी बेटी के पास अहमदाबाद चले गये थे । अंत में सौ वर्ष की आयु में 15 जनवरी 1998 को उन्होंने संसार से विदा ली । उनके द्वारा संस्थापित कुछ संस्थाएँ आज भी समाज सेवा में सक्रिय हैं।

दिल्ली में ‘राष्ट्रसमर्था अहिल्याबाई होलकर’ की नाट्य प्रस्तुति ।

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नाट्य लेखिका – डॉ वृषाली जोशी (राष्ट्रीय संगठन मंत्री विश्व मांगल्य सभा

डायरेक्टर (निर्देशक) – सुबोध सुरेजकर

पुण्यशोलका लोकमाता अहिल्याबाई होलकर की 300वीं जन्म शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में दिल्ली के मानेकसॉ ऑडिटोरियम में शनिवार को “राष्ट्रसमर्था अहिल्याबाई होलकर” की नाट्य प्रस्तुति हुई । मानेकसॉ के जोरावर ऑडिटोरियम में इस नाट्य प्रस्तुति के माध्यम से देवी अहिल्याबाई होलकर की जीवनी का इतिहास वर्तमान में जीवंत हो उठा । इस नाटक की लेखिका विश्व मांगल्य सभा की राष्ट्रीय संगठन मंत्री डॉ वृषाली जोशी हैं जो एक फिजियोथैरेपिस्ट हैं । इस नाट्य मंचन के निर्देशक जाने-माने डायरेक्टर सुबोध सुरेजकर हैं । “राष्ट्रसमर्था अहिल्याबाई होलकर” का नाट्यमंचन पूरे देश में लगभग 101 अलग – अलग स्थानों पर चल रहा है । दिल्ली में ये नाट्य प्रस्तुति भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय और विश्व मांगल्य सभा के संयुक्त तत्वाधान में आयोजित किया गया ।

दिल्ली में इस नाट्य प्रस्तुति का आयोजन विश्व मांगल्य सभा की दिल्ली प्रांत की अध्यक्ष सुरभि तिवारी और संगठन की अखिल भारतीय सह संगठन मंत्री सुश्री पूजा देशमुख के मार्गदर्शन में हुआ ।

इस कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में विश्व हिंदू परिषद के अध्यक्ष एडवोकेट आलोक कुमार जी और बीजेपी के उत्तर-पूर्वी दिल्ली के सांसद और जाने माने गायक मनोज तिवारी रहे ।

“राष्ट्रसमर्था अहिल्याबाई होलकर” की नाट्यमंचन से पहले विश्व हिंदू परिषद के अध्यक्ष आलोक कुमार जी ने कहा कि “अहिल्या बाई होलकर की जीवनी भारत के संस्कृति की परिचायक है । जो बताता है कि भारत कि स्त्री जब आदिदेव महादेव शिव को हाथों में रख कर जब एक योद्धा बनती है तो बड़े -बड़े आक्रांता पीछे हट जाते हैं । एक शासक के तौर पर देवी अहिल्याबाई होलकर ने जिस तरह से साम्राज्य की सुरक्षा की और भारत की संस्कृति की रक्षा के साथ साथ उसका विस्तार किया आज भारत की हर बेटी हर स्त्री को अपने अंदर की अहिल्याबाई को जगाना होगा । शिवाला के साथ-साथ अपने अंदर की शक्ति को जगाना होगा और भारत की संस्कृति का विस्तार करना होगा । मंदिरों के पुनरउद्धार के साथ-साथ जिस तरह से रानी अहिल्या ने नदियों पर घाट बनवाये , धर्मशाला बनवाये वो उनकी दूरदर्शिता का परिचायक है । उन्होंने उस समय अर्थव्यवस्था के महत्व को समझा और माहेश्वरी साड़ी के रूप बुनकरों को टेक्सटाइल इंडस्ट्री दिया ।

दिल्ली के उत्तर -पूर्वी दिल्ली के सांसद मनोज तिवारी ने कहा कि किसी भी बच्चे के लिए उसकी माँ ही प्रथम गुरु होती है और विश्व मांगल्य सभा एक संगठन के रूप में जिस तरह समाज में मातृ निर्माण का कार्य कर रही है उससे नए और संस्कारित भारत का निर्माण हो रहा है ।
जिसका जीता जागता उदाहरण वो ख़ुद अपने घर में देखते हैं । विश्व मांगल्य सभा की दिल्ली प्रांत की अध्यक्ष सुरभि तिवारी भले उनकी पत्नी हैं लेकिन मातृत्व के जिस तरह के संस्कार और संस्कृति का धारा प्रवाह वो समाज में कर रहीं है उसकी छाप पूरी तरह से उनके घर पर और बच्चों में दिखता है । उन्होंने कहा कि देवी अहिल्याबाई के जीवनी को आज पूरे भारत में शहर -शहर और गाँव -गाँव प्रसारित करने की ज़रूरत है और घर -घर में जीवंत करने की ज़रूरत है ।

विश्व मांगल्य सभा की राष्ट्रीय संगठन मंत्री डॉ वैशाली जोशी ने कहा कि अगर हमें देश में शिवाजी जैसे बच्चे चाहिए तो हमें अपनी बेटियों को माता जीजा बाई जैसी माँ बनाना होगा । महिलाओं को लेकर एक नैरेटिव बना कि भारत की महिलाए कमजोर होती हैं और समाज में दबी -कुचली होती । ऐसे विमर्श को खत्म करने के लिए हमें हमारी वीरांगनाओं और आदर्श नारियों के इतिहास को जन-जनतक पहुंचाना होगा । लोगों को अवगत करवाना होगा कि समाज भारत की नारियों को लेकर कितना सकारात्मक और सम्मान भारी दृष्टि रखता था । भारत की नारियां हमेशा से सशक्त थी । उन्होंने कहा कि विश्व मांगल्य सभा घर-घर मातृत्व और नारीत्व निर्माण का कार्य कर रहा है ।

विश्व मांगल्य सभा की स्थापना 19 जनवरी 2010 को हुई जो देश में राष्ट्रीय स्तर पर एक महिला जन संगठन के रूप में काम कर रही है । अपने विशिष्ट कार्यपद्धति से भारत की स्त्री वर्ग को “माँ” अभिव्यक्ति के साथ एक सूत्र में बांधने का कार्य कर रही है । आधुनिकता से समन्वय बनाते हुए भारत की आध्यात्मिक , राष्ट्रीय ,पारंपरिक गृहरचना और महापुरुषों को जन्म देने वाली शक्ति केंद्र बने यह समय की माँग है । भारत के देश -धर्म के काम से परिपूर्ण , सौभाग्यशाली , तेजस्वी माता का घर -घर में निर्माण हो ये विश्व मांगल्य सभा का मुख्य उद्देश्य है । सामाजिक उत्थान और देश में सुसंस्कृत और नैतिकता से परिपूर्ण समाज बनाने के उद्देश्य से विश्व मांगल्य सभा वैश्विक महिला संगठन महिलाओं में मातृत्व की भावना जागृत करने का कार्य कर रही है ।

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