आगरा घराने की अनसुनी विरासत: विलुप्त होती शास्त्रीय संगीत की धरोहर

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कुछ दिन पहले दक्षिण भारत में आयोजित एक शास्त्रीय संगीत कार्यक्रम में एक विद्वान ने मुझसे प्रश्न किया, “आगरा घराने की वर्तमान स्थिति क्या है, और कौन इसे संजो रहा है?” मेरा उत्तर अज्ञानता और असहायता के बोझ से दबा हुआ था। यह प्रश्न एक बड़ी चिंता की ओर इशारा करता है—हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत, विशेष रूप से आगरा घराना, आधुनिक समय में कैसे उपेक्षित हो रहा है।

आज की तेज़ रफ़्तार जिंदगी और तात्कालिक संतुष्टि की चाह ने युवा पीढ़ी को बॉलीवुड म्यूजिक, रैप, रीमिक्स और पंजाबी पॉप जैसे त्वरित पहचान दिलाने वाले संगीत की ओर खींच लिया है। इस बदलाव के कारण गहरी संगीत परंपराओं, जैसे आगरा घराने, के विलुप्त होने का खतरा बढ़ गया है। धैर्य, एकाग्रता और समर्पण की आवश्यकता को समझने वाले कम होते जा रहे हैं। परिणामस्वरूप, आगरा घराना, जो कभी अपनी बोल्ड और जटिल शैली के लिए मशहूर था, अब गुमनामी में खो रहा है।

हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की कभी जीवंत प्रतिध्वनियाँ, विशेष रूप से प्रतिष्ठित आगरा घराना, उसी शहर में गुमनामी में खोती जा रही हैं जहाँ ये इस क्षेत्र की समृद्ध संगीत विरासत का प्रतीक था। समर्पित संरक्षकों और उत्साही शिष्यों की अनुपस्थिति में, यह सदियों पुरानी परंपरा अब विलुप्त होने के कगार पर है। अपनी शक्तिशाली गायन तकनीकों और भावनात्मक रूप से भावपूर्ण प्रस्तुतियों के साथ आगरा घराने को फैयाज खान और विलायत हुसैन खान जैसे दिग्गज उस्तादों ने पोषित किया। फिर भी, आज, यह मान्यता और समर्थन की कमी से जूझ रहा है। युवा पीढ़ी, क्षणभंगुर वैश्विक रुझानों से मोहित होकर, संगीत परंपरा के इस खजाने से काफी हद तक अनजान बनी हुई है। इसे पुनर्जीवित करने और संरक्षित करने के लिए तत्काल प्रयासों के बिना – त्यौहारों, वित्तपोषण और संस्थागत समर्थन के माध्यम से – आगरा घराना लुप्त होने का जोखिम उठाता है, एक ऐसे शहर में सांस्कृतिक शून्यता छोड़ता है जो कभी अपने भावपूर्ण ताल से गूंजता था।

चार सदी पुराने आगरा घराने के अंतिम प्रतिष्ठित प्रतिनिधि, उस्ताद अकील अहमद साहब ने किसी भी तरफ से कोई समर्थन न मिलने के कारण गरीबी में जीवन व्यतीत किया। अभी कोई भी ऐसा नहीं है जो आगरा घराने को अन्य धाराओं से अलग करने वाली सूक्ष्म बारीकियों और विविधताओं के बारे में एक भावुक गायक को प्रशिक्षित कर सके। लेकिन संगीत शिक्षकों का कहना है कि पुरानी परंपराओं को संरक्षित किया जाना चाहिए क्योंकि वे हमारी संगीत विरासत का हिस्सा हैं। केवल जब हम पुराने घराने के संगीत को सीखते हैं और शास्त्रीय धाराओं में अच्छी पकड़ रखते हैं, तो हम संगीत के अन्य रूपों में अच्छा कर सकते हैं। युवा पॉप संगीत धाराओं की ओर बढ़ रहे हैं जो न तो आत्मा को संतुष्ट करती हैं और न ही इंद्रियों को सुकून देती हैं।

हालाँकि आगरा घराना आगरा में लोकप्रिय नहीं था, लेकिन पूरे भारत में इसके संरक्षक थे और कई शास्त्रीय गायक इसे जीवित रख रहे थे। “आगरा घराना अभी मरा नहीं है। इसके प्रशंसक और संरक्षक हर जगह हैं। लेकिन आगरा के लोग समृद्ध परंपरा को संरक्षित करने और बढ़ावा देने के लिए कष्ट नहीं उठा रहे हैं, जो वास्तव में दुखद है,” कहती हैं डॉ ज्योति खंडेलवाल, निदेशक, नृत्य ज्योति कथक केंद्र।

आगरा घराने का जन्म शमरंग और सासरंग के प्रयासों से हुआ, जो मुगल सम्राट अकबर के शासनकाल के दौरान रहने वाले दो राजपूत पुरुष थे। बाद में मुगल दरबार में गाने के लिए दोनों ने इस्लाम धर्म अपना लिया। माना जाता है कि वे ग्वालियर के मियां तानसेन के रिश्तेदार थे। उस्ताद फैयाज खान ने बाद में आवाज के उतार-चढ़ाव और आलाप (हिंदुस्तानी शास्त्रीय गायन का गैर-मीटर वाला प्रारंभिक खंड) और बंदिश (बीट्स के चक्र में शब्दों के साथ तय की गई मधुर रचना) के लयबद्ध पैटर्न के माध्यम से संगीत के रूप में कई बारीकियों को पेश किया। उस्ताद को उचित आगरा घराने की स्थापना का श्रेय दिया जाता है। संगीत का यह स्कूल राग के मधुर पहलू पर जोर देता है और अलंकरण से परिपूर्ण है। इस स्कूल के प्रसिद्ध गायकों में शराफत हुसैन खान, उस्ताद विलायत हुसैन खान ‘अग्रवाले’, लताफत हुसैन खान, यूनुस हुसैन, विजय किचलू, ज्योत्सना भोले, दीपाली नाग और सुमति मुताटकर। उस्ताद फैयाज खान द्वारा प्रशिक्षित एक प्रसिद्ध स्वतंत्र गायक के एल सहगल थे। आगरा घराने की अद्वितीय बहुमुखी प्रतिभा को दर्शाते हुए इन गायकों ने ध्रुपद और ख्याल के अलावा ठुमरी, दादरा, होरी और टप्पा जैसी गायन की विभिन्न शैलियों का अभ्यास और पोषण किया है।

अंतर राष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त संगीतज्ञ डॉ सदानंद ब्रह्मभट्ट बताते हैं कि ‘घराना’ शब्द द्योतक है, किसी भी राग को प्रदर्शित करने के विशिष्ट तरीके (जिसे गायकी कहते हैं) से । कलाकारों में इसे अपने परिवार तक ही सीमित रखने का चलन इसलिए था ताकि कोई और इसे सीख न ले ।और उनकी गायकी अपने परिवार तक ही सीमित रहे । ऐसा चलन वर्षों चला ।

वर्षों से संगीत साधना में लगे विद्वान पंडित ब्रह्मभट्ट कहते हैं कि राग भैरव के स्वर सभी घरानों में एक जैसे हैं जो वर्षों से गाये जा रहे हैं परंतु इन्हें प्रस्तुत करने की गायकी में भिन्नता है । यह अंतर अत्यंत सूक्ष्म होता है जिसे एक समझदार कलाकार ही समझ सकता है ।

आजकल रिकॉर्डिंग का ज़माना है सभी लोग एक दूसरे को सुनते हैं तो अब यह उतना प्रासंगिक नहीं रहा । क्योंकि किसी घराने की गायकी चाहे वो ग्वालियर, दिल्ली, रामपुर, सहसवान, किराना, बनारस अथवा आगरा घराना हो, को आत्मसात करना एक दीर्घकालिक साधना एवं प्रक्रिया है जिसमें कमी आई है । अब किसी से एक दो राग सीखने से ही लोग उसे उस घराने का गायक कह देते हैं । इस शैली के प्रथम गायक नायक गोपाल (नौहर बानी के संस्थापक) के वंशज सुजान दास को अकबर ने इस्लाम अपनाने तथा हज करने के लिए कहा । जिससे वे हाजी सुजान ख़ान कहलाए ।हाजी सुजान खां को आगरा घराने का प्रवर्तक माना जाता है । इस घराने के प्रमुख गायक फ़ैयाज़ खां हुए जो अपनी 1932 में आगरा छोड़कर बड़ौदा चले गए । उनके बाद बशीर ख़ान और उनके दो पुत्र अक़ील अहमद ख़ान एवं शब्बीर अहमद खाँ ने इसे जारी रखा । इनके परिवार नाज़िम अहमद खाँ कोलकाता चले गए उनके पुत्र वसीम अहमद आईटीसी कोलकाता में हैं ।

“फैयाज खा साहब के बड़ौदा जाने के बाद आगरा में तब ग्वालियर घराने के तीन गुरु पंडित गोपाल लक्ष्मण गुणे जी ( मेरे गुरु जी) पंडित रघुनाथ तलेगाँवकर जी, पंडित सीताराम व्यवहारे जी पधारे जिन्होंने शास्त्रीय संगीत का प्रचार -प्रसार किया और कई शिष्यों को सिखाया । आजकल आगरा में इन तीनों विभूतियों के ही अर्थात् ग्वालियर की गायकी के सिखाए लोग हैं ।

आगरा में निवास करने वालों में आगरा की गायकी सीखने वालों में वर्णाली बोस है जो यहाँ रहती बाक़ी वर्तमान में आगरा घराने के प्रमुख गायकों के नाम इस प्रकार हैं- पं अरुण कशालकर जी(पुणे) , वसीम अहमद ख़ान (कोलकाता), अदिति कैकिनी उपाध्याय, भारती प्रताप इत्यादि कलाकार आगरा घराने के हैं ।”

संगीत विशेषज्ञ मानते हैं कि आगरा विश्वविद्यालय को आगे बढ़कर “आगरा घराने” को संरक्षित करने के लिए ठोस कदम उठाने चाहिए।

सांस्कृतिक परम्पराओं के चलते पूरे विश्व में अपना विशेष स्थान बनाता भारत

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आर्थिक क्षेत्र में प्रगति की दृष्टि से भारत की अपनी विशेषताएं हैं, जो अन्य देशों में नहीं दिखाई देती हैं। उदाहरण के लिए भारत में आयोजित होने वाले धार्मिक आयोजनों एवं मेलों आदि में भाग लेने वाले श्रद्धालुओं द्वारा न केवल आध्यात्मिक दृष्टि से इन मेलों/कार्यक्रमों में भाग लिया जाता है बल्कि इन श्रद्धालुओं द्वारा इन स्थानों पर किये जाने वाले खर्च से स्थानीय स्तर पर व्यापार को बढ़ावा देने एवं रोजगार के लाखों नए अवसर निर्मित करने में भी अपना योगदान दिया जाता है। इसी प्रकार, धार्मिक पर्यटन भी केवल भारत की विशेषता है। प्रतिवर्ष करोड़ों परिवार धार्मिक स्थलों पर, विशेष महुरतों पर, पूजा अर्चना करने के लिए इकट्ठा होते है। जम्मू में माता वैष्णोदेवी मंदिर, वाराणसी में भगवान भोलेनाथ मंदिर, अयोध्या में प्रभु श्रीराम मंदिर, उज्जैन में बाबा महाकाल मंदिर, दक्षिण में तिरुपति बालाजी मंदिर आदि ऐसे श्रद्धास्थल है जहां पूरे वर्ष भर ही श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है। प्रत्येक 3 वर्षों के अंतराल पर आयोजित होने वाले कुम्भ के मेले में भी करोड़ों की संख्या में श्रद्धालु ईश्वर की पूजा अर्चना हेतु प्रयागराज, हरिद्वार, नासिक एवं उज्जैन में पहुंचते हैं। शीघ्र ही, 14 जनवरी 2025 से लेकर 26 फरवरी 2025 तक प्रयागराज में महाकुम्भ मेले का आयोजन किया जा रहा है। महाकुम्भ की 44 दिनों की इस इस पूरी अवधि में प्रतिदिन एक करोड़ श्रद्धालुओं के भारत एवं अन्य देशों से प्रयागराज पहुंचने की सम्भावना व्यक्त की जा रही है, इस प्रकार, कुल मिलाकर लगभग 45 करोड़ से अधिक श्रद्धालुगण उक्त 44 दिनों की अवधि में प्रयागराज पहुंचेंगे। करोड़ों की संख्या में पहुंचने वाले इन श्रद्धालुगणों द्वारा इन तीर्थस्थलों पर अच्छी खासी मात्रा में खर्च भी किया जाता है। जिससे विशेष रूप से स्थानीय अर्थव्यवस्था को तो बल मिलता ही है, साथ ही करोड़ों की संख्या में देश में रोजगार के नए अवसर भी निर्मित होते हैं एवं होटल उद्योग, यातायात उद्योग, पर्यटन से जुड़े व्यवसाय, स्थानीय स्तर के छोटे छोटे उद्योग एवं विभिन्न उत्पादों के क्षेत्र में कार्य कर रहे व्यापारियों के व्यवसाय में भी अतुलनीय वृद्धि होती दिखाई देती है।

इसी प्रकार, भारत में विवाहों के मौसम में सम्पन्न होने वाले विवाहों पर किए जाने वाले भारी भरकम खर्च से भी भारतीय अर्थव्यवस्था को बल मिलता है। वर्ष 2024 के, मध्य नवम्बर से मध्य दिसम्बर के बीच, भारत में 50 लाख विवाह सम्पन्न हुए हैं। उक्त एक माह की अवधि के दौरान सम्पन्न हुए इन विवाहों पर भारतीय परिवारों द्वारा 7,000 करोड़ अमेरिकी डॉलर की राशि का खर्च किया गया है। जबकि पिछले वर्ष इसी अवधि में सम्पन्न हुए विवाहों पर 5,500 करोड़ अमेरिकी डॉलर की राशि का खर्च किया गया था। उक्त वर्णित 50 लाख विवाहों पर औसतन प्रति विवाह 14,000 डॉलर, अर्थात लगभग 13 लाख रुपए की राशि का खर्च किया गया है एवं 50,000 विवाहों पर तो एक करोड़ रुपए से अधिक की राशि का खर्च किया गया है। भारत में प्रति विवाह होने वाला औसत खर्च, परिवार की औसत प्रतिवर्ष की कुल आय का तीन गुणा एवं देश में औसत प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद के 5 गुणा के बराबर रहता है। भारत में विवाहों पर पूरे वर्ष में कुल 13,000 करोड़ अमेरिकी डॉलर का खर्च किया जाता है जो चीन के बाद दूसरे स्थान पर है। चीन में प्रतिवर्ष विवाहों पर 17,800 करोड़ अमेरिकी डॉलर का खर्च किया जाता है। ऐसी उम्मीद की जा रही है कि आगामी वर्ष में भारत, विवाहों पर किए जाने वाले खर्च की दृष्टि से, चीन को पीछे छोड़कर पूरे विश्व में प्रथम स्थान पर आ जाएगा। भारत में प्रति वर्ष एक करोड़ विवाह सम्पन्न होते हैं। भारत में सर्दियों के मौसम को विवाहों का मौसम कहा जाय तो कोई अतिशयोक्ति नहीं हैं क्योंकि पूरे वर्ष भर में सम्पन्न होने वाले विवाहों में से लगभग 50 प्रतिशत विवाह सर्दियों के मौसम में ही सम्पन्न होते हैं।

भारत में विवाहों पर होने वाले भारी भरकम राशि के कुल खर्च में से प्रीवेडिंग फोटोग्राफी, वेडिंग फोटोग्राफी, पोस्टवेडिंग फोटोग्राफी पर लगभग 10 प्रतिशत की राशि का खर्च किया जाता है। विवाह के स्थान के चयन एवं साज सज्जा पर वर्ष 2023 में 18 प्रतिशत की राशि का खर्च किया गया था, जो वर्ष 2024 में बढ़कर 26 प्रतिशत हो गया है क्योंकि भारतीय परिवारों द्वारा विवाह अब अन्य शहरों यथा गोवा, पुष्कर, उदयपुर एवं केरला जैसे स्थानों पर सम्पन्न किया जा रहे हैं। खानपान आदि पर कुल खर्च का लगभग 10 प्रतिशत भाग खर्च किया जा रहा है। म्यूजिक आदि पर लगभग 6 प्रतिशत की राशि का खर्च किया जा रहा है। इसी प्रकार, ज्वेलरी, ऑटो बाजार एवं सोशल मीडिया आदि पर भी अच्छी खासी राशि का खर्च किया जाता है। इससे, उक्त समस्त क्षेत्रों में रोजगार के लाखों नए अवसर निर्मित होते हैं। अतः भारत में विवाहों के मौसम में होने वाले भारी भरकम राशि के खर्च से देश के सकल घरेलू उत्पाद में वृद्धि दर को तेज करने में सहायता मिलती है।

हाल ही में सम्पन्न हुए विवाहों के मौसम में भारतीय परिवारों द्वारा किए गए खर्च के चलते अब ऐसी उम्मीद की जा रही है कि वित्तीय वर्ष 2024-25 की तृतीय तिमाही में सकल घरेलू उत्पाद में वृद्धि दर को गति मिलेगी जो द्वितीय तिमाही में गिरकर 5.2 प्रतिशत के स्तर पर आ गई थी। विनिर्माण क्षेत्र एवं सेवा क्षेत्र में विकास दर अधिक रहने की सम्भावना व्यक्त की जा रही है। बंग्लादेश में राजनैतिक अस्थिरता के चलते रेडीमेड गार्मेंट्स के क्षेत्र में विनिर्माण इकाईयां बंद हो रही हैं एवं वैश्विक स्तर पर रेडीमेड गर्मेंट्स के क्षेत्र में कार्यरत सप्लाई चैन की इकाईयां बांग्लादेश के स्थान पर अब भारत से निर्यात को प्रोत्साहित कर रही हैं। जिससे भारत में रेडीमेड गर्मेंट्स एवं फूटवीयर उद्योग में कार्यरत इकाईयों को इन उत्पादों को अन्य देशों को निर्यात करने के ऑर्डर लगातार बढ़ रहे हैं।

उक्त कारकों के चलते भारत में परचेसिंग मैन्युफैक्चरिंग इंडेक्स नवम्बर 2024 माह के 58.6 से बढ़कर वर्तमान में 60.7 हो गया है। इस इंडेक्स के ऊपर जाने का आश्य यह है कि विनिर्माण के क्षेत्र में गतिविधियों में गति आ रही है। इसके साथ ही उपभोक्ता मूल्य सूचकांक भी 6.21 प्रतिशत से घटकर 5.48 प्रतिशत पर नीचे आ गया है, अर्थात, उपभोक्ता मूल्य सूचकांक आधारित मुद्रा स्फीति की दर भी नियंत्रण में आ रही है। जिससे आगे आने वाले समय में नागरिकों की खर्च करने की क्षमता में वृद्धि होगी। हाल ही के वर्षों में विनिर्माण उद्योग, सेवा क्षेत्र एवं गिग अर्थव्यवस्था में रोजगार के करोड़ों नए अवसर निर्मित हुए हैं और वर्ष 2005 के बाद से इस वर्ष विभिन्न कम्पनियों द्वारा सबसे अधिक नई भर्तियां, रिकार्ड स्तर पर, की गई हैं। इस सबके साथ ही, भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा फरवरी 2025 माह में मोनेटरी पॉलिसी में रेपो दर में कमी किए जाने की प्रबल सम्भावना बनती दिखाई दे रही है क्योंकि उपभोक्ता मूल्य सूचकांक आधारित मुद्रा स्फीति की दर अब नियंत्रण में आ रही है। इस वर्ष भारत में मानसून का मौसम भी बहुत अच्छा रहा है एवं विभिन्न फसलों की बुआई रिकार्ड स्तर पर हुई है जिससे इन फसलों की पैदावार भी रिकार्ड स्तर पर होने की सम्भावना है। किसानों के हाथों में अधिक पैसा आएगा एवं उनके द्वारा विभिन्न उत्पादों की खरीद पर भी अधिक राशि का खर्च किया जाएगा। कुल मिलाकर, इन समस्त कारकों का सकारात्मक प्रभाव भारतीय अर्थव्यवस्था पर होने जा रहा है और वित्तीय वर्ष 2024-25 की तीसरी एवं चोथी तिमाही में सकल घरेलू उत्पाद में वृद्धि दर के तेज रहने की प्रबल सम्भावना व्यक्त की जा रही है।

थिएटर रेडी है, जानें कब विश्व युद्ध का तीसरा सीक्वल रिलीज होगा

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“नानू, अनुमान लगाओ कि चौथा विश्व युद्ध कब शुरू होगा?

कोई संभावना नहीं है प्रिय वीर! आने वाला विश्व युद्ध किसी को भी जीवित नहीं छोड़ेगा, जिससे तीसरा सीक्वल बन सके।”
वास्तव में, तीसरे विश्व युद्ध की संभावनाएँ, – मानवता का पसंदीदा खेल ! यह किसी मूवी फ़्रैंचाइज़ के खराब रीबूट की तरह है: वही कथानक (सत्ता संघर्ष), नए विशेष प्रभाव (एआई ड्रोन और साइबर हमले), और पात्रों की एक और भी बदतर कास्ट।

मज़ाक को छोड़ दें, तो शराब पार्टियों के बीच चर्चा का वर्तमान विषय यह है कि क्या 2025 में आखिरकार ख़तरनाक तीसरा विश्व युद्ध छिड़ जाएगा या अभी लंबा इंतेज़ार करना होगा।

2025 के लिए सबसे भयावह भविष्यवाणियों में से, सबसे ख़तरनाक तीसरे विश्व युद्ध का भूत है। बहुत लोगों को डर है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प इसमें एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

विश्व युद्ध की संभावनाओं की भविष्यवाणी करना जटिल है। संभावित रूप से बड़े पैमाने पर संघर्ष को ट्रिगर करने वाले कारकों में शामिल हैं: यू.एस., चीन और रूस जैसी प्रमुख शक्तियों के बीच बढ़ते विवाद संघर्ष की संभावना, क्षेत्रीय विवाद, विशेष रूप से दक्षिण चीन सागर या पूर्वी यूरोप जैसे क्षेत्रों में, महत्वपूर्ण जोखिम पैदा करते हैं; नाटो जैसे मौजूदा गठबंधन, एक सदस्य राज्य पर हमला होने पर व्यापक संघर्ष का कारण बन सकते हैं। इसके विपरीत, अनौपचारिक गठबंधन भी तनाव बढ़ा सकते हैं; पानी, ऊर्जा और भोजन जैसे संसाधनों के लिए प्रतिस्पर्धा संघर्ष का कारण बन सकती है, विशेष रूप से उन क्षेत्रों में जो पहले से ही अस्थिरता का शिकार हैं; बढ़ते साइबर हमले और डिजिटल युद्ध के कारण जवाबी कार्रवाई हो सकती है, जो सैन्य कार्रवाइयों तक बढ़ सकती है; विभिन्न देशों में बढ़ती आतंकवादी घटनाएं, उग्र राष्ट्रवादी भावनाओं के कारण कथित खतरों के खिलाफ आक्रामक विदेश नीतियां या सैन्य कार्रवाई हो सकती है; आर्थिक अस्थिरता देशों को ध्यान भटकाने या एक आम दुश्मन के खिलाफ जनता को एकजुट करने के साधन के रूप में संघर्ष में शामिल होने के लिए प्रेरित कर सकती है; अप्रत्याशित घटनाएं, जैसे क्षेत्रीय विवाद बढ़ना, सैन्य टकराव या हत्याएं, तनाव को तेजी से बढ़ा सकती हैं।

जबकि विश्व युद्ध की संभावना को मापना मुश्किल है, अंतरराष्ट्रीय समुदाय के कूटनीतिक प्रयास, आर्थिक परस्पर निर्भरता और आधुनिक संचार ऐसे संघर्षों को रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। जनवरी 2025 में, एशिया कई भू-राजनीतिक तनावों का सामना कर रहा है जो क्षेत्रीय स्थिरता को प्रभावित कर सकते हैं। चिंता के प्रमुख क्षेत्रों में शामिल हैं: चीन और ताइवान के बीच बढ़ता तनाव, दोनों पक्षों की ओर से सैन्य गतिविधियाँ और मुखर बयानबाजी बढ़ गई है। ताइवान के पास चीन के सैन्य निर्माण और अभ्यास ने संभावित संघर्ष के बारे में चिंताएँ बढ़ा दी हैं। संयुक्त राज्य अमेरिका ने ताइवान के साथ सैन्य आदान-प्रदान बढ़ा दिया है, और अमेरिकी सैन्य जहाज़ उच्च आवृत्ति पर ताइवान जलडमरूमध्य से गुज़रे हैं, जिससे संबंध और भी तनावपूर्ण हो गए हैं।

दक्षिण चीन सागर में क्षेत्रीय दावों को लेकर विवाद चीन, फिलीपींस, वियतनाम और अन्य दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के बीच घर्षण पैदा करते रहते हैं। चीन द्वारा सैन्य सुविधाओं का निर्माण और विवादित रीफ़ पर काउंटर-स्टील्थ रडार सिस्टम की तैनाती ने क्षेत्रीय तनाव को बढ़ा दिया है इसके अतिरिक्त, यूक्रेन संघर्ष में रूस का समर्थन करने के लिए उत्तर कोरिया द्वारा सैनिकों की कथित तैनाती ने क्षेत्रीय गतिशीलता को जटिल बना दिया है। 2025 में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की व्हाइट हाउस में वापसी ने अमेरिकी विदेश नीति में अनिश्चितताओं को जन्म दिया है। उनके प्रशासन का ‘युद्धों को समाप्त करने’ पर ध्यान केंद्रित करना और अंतर्राष्ट्रीय संबंधों के लिए लेन-देन का दृष्टिकोण अपनाना एशियाई संघर्षों में अमेरिकी भागीदारी को प्रभावित कर सकता है, विशेष रूप से चीन और ताइवान से संबंधित। उधर नॉर्थ कोरिया भी समय समय पर उकसाने वाली कार्यवाही कर रहा है। जिओ पॉलिटिकल तनाव एशिया में आर्थिक स्थिरता को प्रभावित कर रहे हैं। चीन और दक्षिण कोरिया जैसे देशों में इंजीनियरिंग क्षेत्रों में कमजोरी के संकेत मिले हैं, आंशिक रूप से अमेरिकी टैरिफ नीतियों से जुड़ी व्यापार अनिश्चितताओं के कारण। चीन की आर्थिक सुधार सुस्त बनी हुई है, जिससे क्षेत्रीय आर्थिक चिंताएँ बढ़ रही हैं। इसके अलावा, यूक्रेन और रूस के बीच संघर्ष, पश्चिम एशिया में संकट, जिसमें इज़राइल, फिलिस्तीन, सीरिया, ईरान शामिल हैं, बड़े क्षेत्रों को विनाशकारी क्रोध में झोंकने की धमकी देते हैं। दक्षिणपंथी उग्रवादियों द्वारा शेख हसीना को अपदस्थ करने के बाद भारतीय उपमहाद्वीप भी एक नया हॉट स्पॉट बन गया है, जिससे उथल-पुथल और अनिश्चितता पैदा हुई है। म्यांमार की सीमा पर भी सैन्य जुंटा, बौद्ध उग्रवादी संगठन और रोहिंग्याओं के बीच लगातार संघर्ष के दृश्य देखे जा रहे हैं। अभी दुनिया के सभी क्षेत्र समस्याओं और हॉट स्पॉट से ग्रसित हैं।

विश्व को प्रलयकारी भट्टी में झोंकने के लिए सिर्फ एक पागल अहंकारी शासक की जरूरत है जो एआई नियंत्रित परमाणु हथियारों के ट्रिगर को सभी दिशाओं में दबा सके। चंद घंटों में पृथ्वीवासी गोलोकधाम के द्वारों पर क्यू में लगे दिखेंगे।

भारत में तेज गति से बढ़ती बिलिनायर (अतिधनाडयों) की संख्या

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भारत में आर्थिक प्रगति की दर लगातार तेज होती दिखाई दे रही है। भारत के सकल घरेलू उत्पाद में वृद्धि दर भी अन्य देशों की तुलना में द्रुत गति से आगे बढ़ रही है। भारत आज विश्व की सबसे तेज गति से आगे बढ़ती अर्थव्यवस्था बन गया है एवं भारतीय अर्थव्यवस्था आज विश्व की पांचवीं अर्थव्यवस्था है तथा शीघ्र ही विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की ओर अग्रसर है। भारत का वैश्विक व्यापार भी द्रुत गति से आगे बढ़ रहा है। कुल मिलाकर, भारत आज अर्थ के क्षेत्र में पूरे विश्व में एक चमकते सितारे के रूप उभर रहा है।लगातार तेज तो रही आर्थिक प्रगति का प्रभाव अब भारत में नागरिकों की औसत आय में हो रही वृद्धि के रूप में भी दिखाई देने लगा है।

हाल ही में अमेरिका में जारी की गई यूबीएस बिल्यनेर ऐम्बिशन रिपोर्ट के अनुसार भारत में बिलिनायर (अतिधनाडयों) की संख्या 185 तक पहुंच गई है और भारत विश्व में बिलिनायर की संख्या की दृष्टि से तृतीय स्थान पर आ गया है। प्रथम स्थान पर अमेरिका है, जहां बिलिनायर की संख्या 835 हैं एवं द्वितीय स्थान पर चीन है जहां बिलिनायर की संख्या 427 है। इस वर्ष भारत और अमेरिका में जहां बिलिनायर की संख्या में वृद्धि हुई है वहीं चीन में बिलिनायर की संख्या में कमी आई है। अमेरिका में इस वर्ष बिलिनायर की सूची में 84 नए बिलिनायर जुड़े हैं एवं भारत में 32 नए बिलिनायर (21 प्रतिशत की वृद्धि के साथ) जुड़े हैं तो वहीं चीन में 93 बिलिनायर कम हुए हैं। पूरे विश्व में आज बिलिनायर की कुल संख्या 2682 तक पहुंच गई है जबकि वर्ष 2015 में पूरे विश्व में 1757 बिलिनायर थे। भारत में वर्ष 2015 की तुलना में बिलिनायर की संख्या में 123 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज हुई है। बिलिनायर अर्थात वह नागरिक जिसकी सम्पत्ति 100 करोड़ अमेरिकी डॉलर से अधिक हो गई है अर्थात भारतीय रुपए में लगभग 8,400 करोड़ रुपए की राशि से अधिक की सम्पत्ति। 

पिछले एक वर्ष के दौरान भारत में उक्त वर्णित बिलिनायर की सम्पत्ति 42 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज करते हुए 9,560 करोड़ अमेरिकी डॉलर के स्तर पर पहुंच गई हैं। जबकि अमेरिका में बिलिनायर की सम्पत्ति वर्ष 2023 में 4 लाख 60 हजार करोड़ अमेरिकी डॉलर से बढ़कर वर्ष 2024 में 5 लाख 80 हजार करोड़ अमेरिकी डॉलर के स्तर पर पहुंच गई है। चीन में तो बिलिनायर की सम्पत्ति वर्ष 2023 में एक लाख 80 हजार करोड़ अमेरिकी डॉलर से घटकर वर्ष 2024 में एक लाख 40 हजार करोड़ अमेरिकी डॉलर की हो गई है। पूरे विश्व में बिलिनायर की सम्पत्ति बढ़कर 14 लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर के स्तर पर पहुंच गई है। उक्त प्रतिवेदन में यह सम्भावना भी व्यक्त की गई है कि आगे आने वाले 10 वर्षों में भारत में बिलिनायर की संख्या में और तेज गति से वृद्धि होगी। भारत में 108 से अधिक पारिवारिक व्यवसाय में संलग्न परिवार भी हैं जो अपने व्यवसाय को भारतीय पारिवारिक परम्परा के अनुसार आगे बढ़ा रहे हैं और भारत में बिलिनायर की संख्या में वृद्धि एवं भारतीय अर्थव्यवस्था में अपना योगदान दे रहे हैं।       

भारतीय बिलिनायर की संख्या केवल भारत में ही नहीं बढ़ रही है बल्कि अन्य देशों में निवास कर रहे भारतीय भी बिलिनायर की श्रेणी में शामिल हो रहे हैं एवं वे अपनी आय के कुछ हिस्से को भारत में भेजकर यहां निवेश कर रहे हैं और इस प्रकार अन्य देशों में निवास कर रहे भारतीय मूल के नागरिक भी भारत के आर्थिक विकास में अपना योगदान दे रहे हैं। विशेष रूप से भारत के विदेशी मुद्रा भंडार को द्रुत गति से बढ़ाने में भारतीय मूल के इन नागरिकों का महत्वपूर्ण योगदान रहता आया है। इस समय भारतीय मूल के एक करोड़ 80 लाख से अधिक नागरिक विभिन्न देशों में कार्य कर रहे हैं एवं प्रतिवर्ष वे अपनी कमाई का एक बड़ा हिस्सा भारत में जमा के रूप से भेजते हैं। हाल ही में वर्ल्ड बैंक द्वारा जारी किए गए एक प्रतिवेदन में यह बताया गया है कि वर्ष 2024 में 12,900 करोड़ अमेरिकी डॉलर की भारी भरकम राशि अन्य देशों में रह रहे भारतीयों द्वारा भारत में भेजी गई है। भारत पिछले कई वर्षों से इस दृष्टि पूरे विश्व में प्रथम स्थान पर कायम है। वर्ष 2021 में 10,500 करोड़ अमेरिकी डॉलर, वर्ष 2022 में 11,100 करोड़ अमेरिकी डॉलर, वर्ष 2023 में 12,500 करोड़ अमेरिकी डॉलर की राशि भारत में भेजी गई थी। प्रतिवर्ष भारत में भेजी जाने वाली राशि की तुलना यदि अन्य देशों में भेजी जा रही राशि से करें तो ध्यान में आता है कि वर्ष 2024 में मेक्सिको में 6,800 करोड़ अमेरिकी डॉलर की राशि भेजी गई थी, जिसे पूरे विश्व में इस दृष्टि से द्वितीय स्थान प्राप्त हुआ है। मेक्सिको में भेजी गई राशि भारत में भेजी गई राशि की तुलना में लगभग आधी है। चीन को तृतीय स्थान प्राप्त हुआ है एवं चीन में 4,800 करोड़ अमेरिकी डॉलर की राशि भेजी गई है, फ़िलिपीन में 4,000 करोड़ अमेरिकी डॉलर एवं पाकिस्तान में 3,300 करोड़ अमेरिकी डॉलर की राशि अन्य देशों में रह रहे इन देशों के नागरिकों द्वारा भेजी गई है।

भारत में भारतीय नागरिकों द्वारा अन्य देशों से भेजी जा रही राशि में उत्तरी अमेरिका, यूरोप, खाड़ी के देशों एवं एशिया के कुछ देशों यथा मलेशिया एवं सिंगापुर का प्रमुख योगदान है। जैसा कि विदित ही है कि प्रतिवर्ष भारत से लाखों युवा उच्च शिक्षा प्राप्त करने की दृष्टि से विकसित देशों की ओर जाते हैं। उच्च एवं तकनीकी  शिक्षा प्राप्त करने के उपरांत भारतीय युवा इन देशों में ही रोजगार प्राप्त कर लेते हैं एवं अपनी बचत की राशि का बड़ा भाग भारत में भेज देते हैं। आज तक भारतीय मूल के इन नागरिकों द्वारा एक लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर की राशि भारत में भेजी गई है। भारत के लिए विदेशी मुद्रा भंडार के संग्रहण में यह राशि बहुत बड़ी भूमिका निभा रही है। वर्ष 2024 में पूरे विश्व में 68,500 करोड़ अमेरिकी डॉलर की राशि विभिन्न देशों के नागरिकों द्वारा अपने अपने देशों को भेजी गई है। यह राशि वर्ष 2023 में भेजी गई राशि से 5.8 प्रतिशत अधिक है। पूरे विश्व में विभिन्न देशों में निवास कर रहे नागरिकों द्वारा भेजी गई उक्त राशि में से 20 प्रतिशत से अधिक की राशि अन्य देशों में निवास कर रहे भारतीयों द्वारा ही अकेले भारत में भेजी गई है। इस प्रकार, भारतीय मूल के नागरिकों की सम्पत्ति न केवल भारत में बल्कि अन्य देशों में भी बहुत तेजी के साथ बढ़ रही है। 

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