जब पेरिस आएंगे पोप, शहर में होगी प्रार्थना, भीड़ और ट्रैफिक की परीक्षा

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पेरिस : पेरिस ने राजा देखे हैं, राष्ट्रपति देखे हैं, फिल्मी सितारे देखे हैं और फैशन की दुनिया के बड़े नाम भी देखे हैं। लेकिन अगले सप्ताहांत शहर एक ऐसी हस्ती का स्वागत करने जा रहा है, जिसके साथ ग्लैमर से ज्यादा आस्था जुड़ी है।

पोप लियो चौदहवें पेरिस आ रहे हैं।

2008 के बाद पहली बार कोई पोप फ्रांस की राजधानी में कदम रखेगा। जाहिर है, पेरिस तैयार है। प्रार्थनाएं होंगी, बड़ी भीड़ जुटेगी, सुरक्षा कड़ी होगी और ट्रैफिक ऐसा हो सकता है कि पेरिसवासियों को अपने ही शहर में रास्ता ढूंढना किसी छोटी तीर्थयात्रा से कम न लगे।
पोप लियो चौदहवें शुक्रवार, 25 सितंबर को पेरिस पहुंचेंगे। उनका पहला महत्वपूर्ण कार्यक्रम राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों से एलिसे पैलेस में मुलाकात का होगा।
इसके बाद आम लोगों के लिए भी उन्हें देखने का मौका होगा। शाम 4 से 5 बजे के बीच पोप लैटिन क्वार्टर से पोपमोबाइल में गुजरेंगे। यह यात्रा सभी के लिए निःशुल्क और खुली रहेगी।
यानी उस दिन लैटिन क्वार्टर में नजरें ऊपर नहीं, सड़क पर रहेंगी। हो सकता है पेरिस के किसी पर्यटक को पहली बार एहसास हो कि एफिल टावर के अलावा भी यहां देखने लायक बहुत कुछ है।
शुक्रवार की शाम युवाओं के नाम होगी। स्टेड द फ्रांस में पोप के साथ होने वाली युवा प्रार्थना सभा में करीब 75,000 लोगों के पहुंचने की उम्मीद है।
लेकिन शनिवार को तस्वीर और भी बड़ी होगी।
दोपहर 3 बजे खुली जगह पर विशेष प्रार्थना सभा होगी। इसका क्षेत्र प्लास द ला कॉनकॉर्ड से शॉं-ज़े-लीज़े तक फैलेगा। आयोजकों को उम्मीद है कि इसमें पांच लाख तक लोग शामिल हो सकते हैं।
पेरिस में उस दिन एफिल टावर, लूव्र और कैफे ही आकर्षण नहीं होंगे। आधा मिलियन लोग एक ही दिशा में देखते नजर आ सकते हैं।
सुरक्षा और यातायात को लेकर भी बड़े इंतजाम किए जा रहे हैं। प्लास द ला कॉनकॉर्ड और आसपास के इलाकों में मेट्रो बंद रहने और सड़कों पर रोक लगाए जाने की व्यवस्था की जा रही है।
पर्यटकों के लिए सीधी सलाह है, यात्रा की योजना पहले बना लें। वैसे भी पेरिस में एक जगह से दूसरी जगह पहुंचना कभी-कभी अपने आप में एक छोटी परीक्षा होती है। पोप के आने पर यह परीक्षा थोड़ी और कठिन हो सकती है।
पेरिस के बाद पोप लियो चौदहवें लूर्द और मेत्ज़ जाएंगे। इसके बाद उनकी फ्रांस यात्रा समाप्त होगी।
पेरिस दुनिया को एफिल टावर, लूव्र और शॉं-ज़े-लीज़े के लिए आकर्षित करता है। लेकिन अगले सप्ताहांत शहर की पहचान कुछ अलग होगी।
घंटियां बजेंगी। भीड़ जुटेगी। प्रार्थनाएं होंगी। और कुछ घंटों के लिए शायद तेज रफ्तार वाला पेरिस भी थोड़ा ठहर जाएगा। पोप आ रहे हैं। पेरिस तैयार है।

पेरिस: एफिल टावर चमका, पैरों ने बगावत की और हैंडबैग ने रचा थ्रिलर

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पेरिस: पेरिस ने हमारा स्वागत नहीं किया। उसने पहले हमारा इम्तिहान लिया। लंदन से उतरते ही लगा कि हम किसी दूसरे ग्रह पर आ गए हैं। भाषा फ्रेंच थी, इमारतें बेहद सलीकेदार थीं, लोग फैशनेबल दिख रहे थे और ट्रैफिक ऐसा था जैसे सड़क पर कोई मुकाबला चल रहा हो। मौसम ने भी अपना अलग ही मिज़ाज दिखाया। कुल मिलाकर शहर नहीं बदला था, पूरी दुनिया बदल गई थी।

और फिर आया यूरोस्टार।

इंग्लिश चैनल के नीचे से ट्रेन का गुजरना अपने आप में एक कमाल है। हम आराम से बैठे थे और ऊपर कहीं समुद्र बह रहा था। मन में सवाल आया, जब चैनल के ऊपर से उड़ सकते हैं तो नीचे से क्यों न निकल जाएँ? हम सब कुछ देर के लिए शानदार कपड़े पहने हुए सुरंग के चूहे जैसे महसूस कर रहे थे।
पेरिस में दिन बहुत तेज़ी से भागे। सबसे यादगार रहा सीन नदी का क्रूज़। नाव धीरे-धीरे आगे बढ़ रही थी और पेरिस दोनों किनारों पर अपना हुस्न दिखा रहा था। लगता था जैसे पूरा शहर हमारे लिए चलता-फिरता पोस्टकार्ड बन गया हो।
फिर आया एफिल टावर।
रात के अँधेरे में जब टावर अचानक जगमगाने लगा तो सबकी निगाहें ऊपर थीं और मोबाइल कैमरे नीचे नहीं आ रहे थे। हर घंटे होने वाली पाँच मिनट की रोशनी ने माहौल में जादू घोल दिया। ठंडी हवा ने खूब कोशिश की कि रोमांस में खलल डाले, लेकिन नाकाम रही।
दिलचस्प बात यह थी कि उस समय किसी ने मोबाइल के ज्यादा इस्तेमाल की शिकायत नहीं की। जिस मोबाइल को लेकर हम बच्चों को डाँटते हैं, उसी ने उस रात एफिल टावर को कैद करने में कोई कसर नहीं छोड़ी।
एफिल की रोशनी सचमुच कमाल की थी। लोहे की यह बुज़ुर्ग महिला आज भी महफ़िल लूटना जानती है।
फिर पहुँचे वर्साय।
महल की शान देखकर लगा कि पुराने ज़माने के राजा-महाराजा सचमुच अलग ही दुनिया में रहते थे। इतनी शानो-शौकत कि आदमी सोचने लगे, आखिर जनता कब तक यह सब देखती रहती?
म्यूज़ियमों में कला और इतिहास का खजाना मिला। हर तरफ सदियों पुरानी कहानियाँ थीं। और फिर आया डिज़नीलैंड। वहाँ जाकर पता चला कि उम्र चाहे कितनी भी हो, सही माहौल मिले तो बच्चा अंदर से बाहर आने में देर नहीं लगाता।
लेकिन पेरिस ने हमें एक और बड़ा सबक दिया, सुंदर शहरों में सुंदरता देखने के लिए पैर भी चाहिए।
हम चलते रहे। फिर चलते रहे। और चलते ही रहे।
रोज़ के 10,000 कदम कब पार हो गए, पता ही नहीं चला। शाम तक हमारे पैर शिकायत नहीं कर रहे थे। वे बाकायदा राजनयिक छूट (diplomatic immunity) की मांग कर रहे थे।
कुछ पैरों ने तो शायद खतरा भत्ता भी माँगा होगा।
ऐसे में हमारी आरामदेह बस यात्रा किसी शांति समझौते से कम नहीं थी। बस में बैठते ही पैरों और यात्रियों के बीच युद्धविराम हो जाता था।
खाने की चिंता जरूर थी, क्योंकि हम शाकाहारी हैं। लेकिन पेरिस ने यहाँ भी ज्यादा परेशान नहीं किया। अच्छे भारतीय शाकाहारी भोजन ने दिल जीत लिया।
एक शाम शैंपेन के बाद हम पहुँचे शिवम रेस्टोरेंट। जालंधर के एक मेहनती पंजाबी उद्यमी द्वारा चलाया जा रहा यह रेस्तराँ उस रात हमें पेरिस से सीधे पंजाब ले गया।
थाली में सब्ज़ियाँ थीं, स्वाद में घर की याद थी और मन में सुकून। हमें पहली बार लगा कि विदेश में भी कोई समझता है कि सब्ज़ी का मतलब केवल प्लेट सजाना नहीं होता।
मार्था हमेशा की तरह हमारे साथ रहीं। उनका मुस्कुराता चेहरा, मदद का जज़्बा और हर वक्त काम की जानकारी बहुत काम आई। हमारी लोकल गाइड मैग्डलीन ने भी पेरिस की कहानी को और दिलचस्प बना दिया। उन्होंने इमारतों और जगहों के पीछे छिपी कई बातें बताईं।
लेकिन असली थ्रिलर अभी बाकी था।
होटल पहुँचते ही पद्मिनी अय्यर ने ऐसा ऐलान किया कि पूरा खुशहाल पर्यटक दल अचानक आपातकालीन समिति बन गया।
“मेरा हैंडबैग खो गया!”
हैंडबैग में मोबाइल था।
और उससे भी बड़ी आफ़त, पासपोर्ट था।
पैसा खो जाए तो वापस आ सकता है। मोबाइल भी खरीदा जा सकता है। लेकिन पासपोर्ट! वह तो ऐसा कागज़ है जिसके गायब होते ही आदमी को अंतरराष्ट्रीय नौकरशाही के लंबे गलियारों के सपने आने लगते हैं।
सलाहों की बौछार शुरू हो गई।
पुलिस को फोन करो। रास्ता दोबारा देखो। जहाँ-जहाँ गए थे, वहाँ तलाश करो। किसी ने तो यहाँ तक कह दिया कि सीन नदी में भी देख लेना चाहिए।
तभी किसी समझदार ने धीरे से कहा:
“पहले होटल का कमरा तो देख लीजिए।”
मैं फोन करने लगा और संभावित संकट की योजनाएँ बनाने लगा। मार्था आसपास तलाश करने निकल गईं। होटल की लॉबी कुछ देर के लिए संयुक्त राष्ट्र की आपात बैठक जैसी लगने लगी।
बस फर्क इतना था कि यहाँ राजनयिक कम और सूटकेस ज्यादा थे।
और तभी पद्मिनी दौड़ती हुई वापस आईं।
“मिल गया!”
हैंडबैग कमरे में ही था।
पूरे समय वहीं था।
कपड़ों के ढेर के नीचे चुपचाप पड़ा था। शायद वह भी हमारे साथ लुका-छिपी खेलना चाहता था।
एक पल में अंतरराष्ट्रीय संकट खत्म हो गया।
पुलिस की जरूरत नहीं पड़ी। दूतावास को फोन नहीं करना पड़ा। कोई राजनयिक तार नहीं भेजना पड़ा। संयुक्त राष्ट्र को भी खबर नहीं करनी पड़ी।
एक कपड़े ने पूरी कूटनीति बचा ली
सच कहें तो पेरिस फिर से सुंदर उसी क्षण लगा।
पीछे मुड़कर देखें तो इस यात्रा में सब कुछ था। सीन का रोमांस था। एफिल टावर की जगमगाहट थी। वर्साय की शानो-शौकत थी। म्यूज़ियमों का इतिहास था। डिज़नीलैंड की बचपन वाली खुशी थी।
आरामदेह बस थी। स्वादिष्ट भारतीय शाकाहारी खाना था। मार्था की मदद थी। मैग्डलीन की जानकारी थी।
और सबसे बढ़कर था: 2026 का हैंडबैग थ्रिलर।
फ्रांस ने हमें कला, इतिहास और वास्तुकला दी।
पेरिस ने हमें रोज़ 10,000 कदम दिए।
हमारे पैरों ने बदले में हमें याद दिलाया कि हर हसीन शहर का अपना हिसाब होता है। और पद्मिनी ने इस यात्रा की सबसे शानदार सस्पेंस कहानी दे दी।
पेरिस की सीख सीधी है
एफिल टावर की चमक देखिए। सीन पर तैरिए। वर्साय में हैरत कीजिए। अच्छा खाना खाइए। खूब घूमिए।
लेकिन अगर होटल में कोई सामान गायब हो जाए, तो पुलिस, दूतावास या संयुक्त राष्ट्र को फोन करने से पहले कपड़ों के नीचे जरूर देख लीजिए। कभी-कभी सबसे बड़ा अंतरराष्ट्रीय संकट, एक मुड़े हुए स्वेटर के नीचे पड़ा होता है।

छोटी-सी गलती: “बस पांच मिनट और” ने फ्रांस को झकझोर दिया ; और भारत को सोचने पर मजबूर कर दिया

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पेरिस: बस पाँच मिनट और!” ये वही फेमस पाँच मिनट हैं जो घर के टाइमर नहीं मानते। पेरिस के एक घर में 14 साल का बेटा मोबाइल से चिपका बैठा है; माँ चिल्लाती है, “खाना ठंडा हो रहा है,” पिता आधे गुस्से में आधा विनती करते हैं, “मोबाइल नीचे कर दे।” बेटा पलटकर कहता है, “पापा, यह आखिरी वीडियो है।” वीडियो आखिरी नहीं होता। खुद-ब-खुद चलने वाले अगले-नेक्स्ट ने पाँच मिनट को पचास में बदल दिया , और खाना तो ठंडा ही हुआ।

यह सीन फ्रांस का है, पर एंडिंग इंडिया में भी वही दिखेगी। पेरिस में ये सवाल जोर पकड़ रहा है: बच्चों को डिजिटल दुनिया में कितनी आज़ादी दें? फ्रांस ने 15 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर एक सख्त रोक का कानून बनाया , जैसी नीयत सही थी, लेकिन अगस्त 2026 में फ्रांस की संवैधानिक परिषद ने कह दिया कि पूरी तरह का बंद करना अभिव्यक्ति और निजता पर ज़रूरत से ज़्यादा चोट है। यानी कहीं अभिव्यक्ति के नाम पर बच्चों को “डिजिटल परदर्शी” बना दिया जाए, तो भी समस्या है।

मैक्रॉन ने हार नहीं मानी: नया प्रस्ताव आया , 13-15 साल वालों के लिए माता-पिता की सहमति, रात में नोटिफिकेशन बंद, ऑटो-प्ले पर पाबंदी और अजनबियों से संपर्क पर रोक। सरल भाषा में: दरवाजा बंद नहीं करेंगे, पर खिड़कियों पर जाली लगा देंगे।
भारत को भी यह तमाशा दूर से नहीं दिखना चाहिए। हमारे एक अरब से अधिक इंटरनेट उपयोगकर्ताओं में इंस्टाग्राम और यूट्यूब किशोरों की रोज़मर्रा की दुनिया बन चुके हैं। यूट्यूब पढ़ाई का वरदान है; वही यूट्यूब कभी-कभी मिर्च-मसाले वाला जाल भी बन जाता है , एक क्लिक और आप “अनसक्योर एरिया” में। बच्चा फिर वही कहता है, “बस पाँच मिनट…” और पाँच मिनट पता ही नहीं चलता कब परीक्षा के पेपर जितने लंबा हो गया।
2023 का हमारा डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन कानून अच्छी कोशिश है: अभिभावकों की सत्यापन योग्य सहमति, बच्चों पर लक्षित विज्ञापन पर रोक , सही कदम हैं। पर असली परीक्षा मैदान पर है। बच्चे जन्मतिथि बदलकर दर्ज कर दें, और पूरा सिस्टम उसी पल का नो-शो कर देता है। ऑनलाइन उम्र छिपाना उतना आसान है जितना परीक्षा में पीछे की सीट से कॉपी देखना , और ज़्यादा स्मार्ट।
तो क्या सीधा बैन कर दें, जैसा फ्रांस ने सोचा? भारत और फ्रांस की दुनिया अलग है: ग्राम और शहर का डिजिटल गैप, माता-पिता की डिजिटल अनभिज्ञता, और वही इंटरनेट जो अवसर देता है, उसे काटना सही नहीं होगा। करोड़ों बच्चे ऑनलाइन पढ़ाई, कौशल और नौकरी की जानकारी पा रहे हैं , इन्हें बंद कर देना समस्या का इलाज नहीं, सर्जरी होगी जिसकी सुई गलत जगह लगेगी।
प्रस्तावित रास्ता: प्रतिबंध नहीं, पर ज़िम्मेदारी। मजबूत अभिभावक-सहमति, बेहतर उम्र-प्रमाणीकरण तकनीक, और स्कूलों में डिजिटल साक्षरता पर जोर। सोशल प्लेटफॉर्म्स को भी जवाबदेह बनाइए: ऑटो-प्ले, लगातार नोटिफिकेशन और नशे जैसा डिजाइन—इन फीचर्स पर कड़ाई। बच्चों के लिए “डिजिटल ब्रेक” मोड, रात में नोटिफिकेशन ब्लॉक और शिक्षकों-माता-पिता के लिए आसान टूल्स , छोटे-छोटे सुधार बड़ा फर्क डाल सकते हैं।
मोबाइल अब सिर्फ फोन नहीं रहा। वह जेब में रखा स्कूल भी है, खेल का मैदान भी और कभी-कभी मुसीबत का दरवाज़ा भी। डिजिटल जिन्न बोतल से बाहर आ चुका है; वापस बंद करना मुश्किल है, पर लगाम किसके हाथ में होगी , ये फैसला अभी हमारे हाथ में है। सुरक्षा ज़रूरी है, पर वह स्वतंत्रता और निजता की कीमत पर नहीं होनी चाहिए।
फ्रांस रास्ता तलाश रहा है; हम भी सीखें, पर काट-छाँट करने से पहले समझदारी से चुने। आपका बच्चा “बस पाँच मिनट” कहेगा , पर कौन तय करेगा कि पास पाँच मिनट हैं या गिरफ़्तार कर देने वाले पचास?

संस्थानों की आचार-संहिताओं में एआई न होना दुनिया केसामने खड़ा एक गंभीर नैतिक संकट

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दिल्ली । कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस अब भविष्य कीकोई दूर की तकनीक नहीं रह गई है। यह कार्यालयों, उद्योगों, विश्वविद्यालयों, अस्पतालों, मीडिया संस्थानों, बैंकों, न्यायव्यवस्था, मानव संसाधन प्रबंधन और सरकारी सेवाओं तक पहुंचचुकी है। भर्ती से लेकर कर्मचारी मूल्यांकन तक, ग्राहक सेवा सेलेकर सामग्री निर्माण तक और निर्णय लेने से लेकर डेटाविश्लेषण तक एआई का इस्तेमाल लगातार बढ़ रहा है। लेकिनइसी तेजी के बीच एक ऐसी खबर सामने आई है जो तकनीकीप्रगति से कहीं अधिक गंभीर सवाल उठाती है। 16 सितंबर2026 को प्रकाशित एचआर ड्राइव की रिपोर्ट के अनुसार, एलआरएन के एक हालिया अध्ययन में पाया गया कि 10 में से1 से भी कम संस्थागत आचार-संहिताओं में आर्टिफिशियलइंटेलिजेंस या तकनीकी नैतिकता का स्पष्ट उल्लेख है। यानीजिन संस्थाओं में कर्मचारियों से नैतिक आचरण की अपेक्षा कीजाती है, उनमें से बड़ी संख्या ने उस तकनीक के लिए स्पष्टनैतिक दिशा-निर्देश ही तैयार नहीं किए हैं जो अब उनकेकामकाज को प्रभावित कर रही है।

यह स्थिति इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि आचार-संहिता केवलएक औपचारिक दस्तावेज नहीं होती। उसका उद्देश्य कर्मचारियोंको यह बताना होता है कि कठिन परिस्थितियों में संगठन उनसेकिस प्रकार के व्यवहार की अपेक्षा करता है। लेकिन यदिकर्मचारी प्रतिदिन एआई का उपयोग कर रहा है और संगठन कीआचार-संहिता में एआई से जुड़े प्रश्नों का कोई स्पष्ट उत्तर नहींहै, तो वह कर्मचारी कई महत्वपूर्ण निर्णयों में अपने विवेक, सुविधा या तत्काल लक्ष्य पर निर्भर हो सकता है। क्या किसीकर्मचारी को गोपनीय दस्तावेज किसी सार्वजनिक एआईप्रणाली में डालना चाहिए? क्या एआई से तैयार सामग्री कोबिना सत्यापन के आधिकारिक रिपोर्ट में इस्तेमाल किया जासकता है? यदि एआई किसी उम्मीदवार को भर्ती प्रक्रिया मेंबाहर कर देता है, तो उसकी जिम्मेदारी किसकी होगी? यदिएआई द्वारा तैयार सूचना गलत निकलती है तो जवाबदेहीकिसकी होगी? यदि किसी कर्मचारी के प्रदर्शन का आकलनकिसी एल्गोरिदम से किया जाता है तो कर्मचारी को उस निर्णयको समझने और चुनौती देने का अधिकार होना चाहिए या नहीं? ऐसे प्रश्न अब काल्पनिक नहीं हैं।

एलआरएन के अध्ययन से जुड़ी एचआर ड्राइव की रिपोर्ट यह भीबताती है कि लगभग 2,000 पूर्णकालिक कर्मचारियों में लगभगसभी ने कहा कि उनके नियोक्ता उनसे आचार-संहिता कोस्वीकार करने या उसके अनुपालन की पुष्टि करने की अपेक्षाकरते हैं। लेकिन आचार-संहिता को वास्तविक मार्गदर्शक के रूपमें इस्तेमाल करने वाले कर्मचारियों का अनुपात घटा है। लगभग5 में से 1 कर्मचारी ने कहा कि उनकी आचार-संहिता मेंव्यावहारिक मार्गदर्शन का अभाव है। यह तथ्य हमें एक बड़े प्रश्नतक ले जाता है—क्या संस्थानों में आचार-संहिताएं केवलअनुपालन की औपचारिकता बनती जा रही हैं, जबकि वास्तविककार्यस्थल की समस्याएं उनसे आगे निकल चुकी हैं?

एआई के मामले में यह अंतर और भी गंभीर है। तकनीक काविकास संस्थागत नीतियों की तुलना में कहीं अधिक तेजी से होरहा है। कुछ वर्ष पहले तक अधिकांश कर्मचारियों के लिएएआई का अर्थ मुख्यतः स्वचालन या मशीन लर्निंग था। आजजनरेटिव एआई, बड़े भाषा मॉडल और एआई एजेंट कार्यालयीकार्यों के अनेक हिस्सों में प्रवेश कर चुके हैं। कर्मचारी ईमेललिखने, रिपोर्ट तैयार करने, डेटा का विश्लेषण करने, प्रस्तुतियांबनाने, कोड लिखने, अनुवाद करने और शोध में एआई काइस्तेमाल कर सकते हैं। ऐसे में केवल यह कहना कि “तकनीकका जिम्मेदारी से उपयोग करें” पर्याप्त नहीं है। जिम्मेदार उपयोगका अर्थ क्या है, यह भी स्पष्ट करना होगा।

यहां गोपनीयता का प्रश्न सबसे पहले सामने आता है। किसीसंगठन के पास कर्मचारियों, ग्राहकों, मरीजों, विद्यार्थियों याव्यापारिक साझेदारों से संबंधित संवेदनशील जानकारी होसकती है। यदि कर्मचारी सुविधा के लिए ऐसी जानकारी किसीबाहरी एआई प्रणाली में डाल देता है, तो डेटा सुरक्षा औरगोपनीयता से जुड़े गंभीर प्रश्न पैदा हो सकते हैं। इसलिएसंस्थागत एआई नीति में यह स्पष्ट होना चाहिए कि कौन-साडेटा एआई उपकरणों में डाला जा सकता है, कौन-सा डेटाप्रतिबंधित है और किन परिस्थितियों में संगठन द्वारा स्वीकृतएआई प्रणालियों का ही उपयोग किया जाना चाहिए।

दूसरा महत्वपूर्ण प्रश्न है—सटीकता और सत्यापन। जनरेटिवएआई उपयोगी सामग्री तैयार कर सकता है, लेकिन उसकाआउटपुट स्वतः सत्य का प्रमाण नहीं बन जाता। गलत तथ्य, काल्पनिक संदर्भ, गलत आंकड़े और भ्रमित करने वाले उत्तरसंभव हैं। इसलिए यदि एआई किसी रिपोर्ट, समाचार, शोध, कानूनी दस्तावेज या प्रशासनिक निर्णय के लिए इस्तेमाल कियाजा रहा है, तो मानव सत्यापन आवश्यक हो सकता है। संगठनकी आचार-संहिता को यह निर्धारित करना चाहिए कि किसप्रकार के कार्यों में मानव समीक्षा अनिवार्य होगी।

तीसरा प्रश्न निष्पक्षता का है। एआई प्रणालियां जिन आंकड़ोंऔर प्रक्रियाओं पर आधारित होती हैं, उनमें मौजूद पूर्वाग्रह उनकेपरिणामों को प्रभावित कर सकते हैं। भर्ती, पदोन्नति, कर्मचारीमूल्यांकन, ऋण, बीमा और अन्य महत्वपूर्ण निर्णयों में यदिएआई का इस्तेमाल किया जाता है तो यह देखना जरूरी है किक्या किसी समूह के साथ व्यवस्थित रूप से असमान व्यवहार तोनहीं हो रहा। SHRM ने भी कार्यस्थल में एआई के नैतिकउपयोग के संदर्भ में स्पष्ट अपेक्षाओं, प्रशिक्षण, संचार औरनेतृत्व की जिम्मेदारी पर जोर दिया है।

चौथा प्रश्न जवाबदेही का है। मशीन निर्णय ले सकती है, लेकिननैतिक और कानूनी जिम्मेदारी अंततः किसी व्यक्ति या संस्था केस्तर पर तय होनी ही होगी। “

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