सवर्णों के ख़िलाफ़ जहरीला हथियार है अब आरक्षण

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दयानंद पांडेय

लखनऊ । संविधान निर्माताओं ने दलित और वंचित समाज के लिए दस वर्ष के लिए आरक्षण का प्रावधान किया था कि यह लोग भी आर्थिक और सामाजिक तौर पर बराबरी में आ जाएं l देश के विकास में योगदान दें l बाद में मंडल की सिफारिशों के तहत पिछड़ी जातियों को भी आरक्षण मिल गया l आज़ादी के इन आठ दशक में आरक्षण ने आरक्षणधारियों को इतना सबल बना दिया है कि अब वह इसे सवर्णों के ख़िलाफ़ जहरीला हथियार बना चुके हैं l मरने-मारने पर आमादा हैं l

वोट बैंक के चक्कर में सभी राजनीतिक पार्टियों और नेताओं ने आरक्षणधारियों को भस्मासुर बना दिया है l हिंसक और अराजक बना दिया है l होता रहे देश प्रतिभाहीन, होता रहे प्रतिभा पलायन, वह तो माइनस चालीस वाले डाक्टर भी बना कर रहेंगे l देश में सामाजिक समता के नाम पर गहरी सामाजिक खाई बन गई है तो उन की बला से l यह आरक्षण जेहाद का ज़हर है l

आरक्षणधारी अब सवर्ण समाज के ख़िलाफ़ आक्रमणकारी बन कर उपस्थित हैं l इस्लाम के शरिया क़ानून से भी ज़्यादा ख़तरनाक और जहरीला हो चला है यह आरक्षण l यू जी सी आदि ने इस आग में घी का काम किया है l आप एक बार कैंसर और एड्स का इलाज कर सकते हैं l आरक्षण प्राप्त जहरीले लोगों का नहीं l राजनीतिज्ञों और सरकारों ने तो इसे इस हद तक पहुंचाया ही है l पता नहीं किसी सामाजिक विज्ञानी को इस का भान है कि नहीं l

सुप्रीम कोर्ट को इस ज़हर और जहरीले समाज का स्वत: संज्ञान लेना चाहिए l आरक्षण पूरी तरह ख़त्म कर देना चाहिए l बहुत दया आए तो आरक्षण को दलितों और पिछड़ों के ई डब्लू एस तक सीमित कर देना एक उपाय हो सकता है l नहीं जातीय और राजनीतिक दुकानदारों को जो विष बोना था बो चुके हैं l फ़सल कटने को तैयार है l

ग़नीमत है कि सवर्ण समाज संयम से काम ले रहा है l नहीं आरक्षणधारी तो जिन्ना के डायरेक्ट एक्शन के लिए पूरी तरह तैयार हैं l देश एक ख़तरनाक मोड़ पर खड़ा है l हिंदू , मुसलमान से भी बड़ी आपदा सामने उपस्थित है l

मुद्दों के मेले , हम हैं अकेले !!

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दिल्ली ।मेला देखकर लौट रहे हम लोग, एक अजीब चौराहे पर अटके हुए हैं। जनता पूछ रही है, “रोजगार कहाँ है?”
सत्ता पूछ रही है, “वंदे मातरम् बोला कि नहीं?”
विपक्ष पूछ रहा है, “EVM का प्लग निकाला कि नहीं!”
और मीडिया पूछ रहा है, “आम चूसकर खाना चाहिए या काटकर?”
वाह रे तांत्रिक लोकतंत्र। जिस घर में चूल्हा ठंडा हो, वहां टीवी पर बहस गरम है।
एक तरफ बेरोजगार डिग्रियां लेकर धूप में लाइन लगा रहे हैं। दूसरी तरफ नेता माइक्रोफोन लेकर इतिहास की कब्रें खोद रहे हैं।
किसी को अस्पताल की बदहाली नहीं दिखती। पर कौन किस धर्म का है, यह सबको एक्स-रे मशीन की तरह साफ दिख जाता है।
गरीब आदमी महंगाई से पिस रहा है।
आम जरूरत की चीजों के भाव सुनकर BP की गोलियों की सेल बढ़ती है। गैस सिलेंडर देखकर सांस फूलती है, अस्थमा अटैक हो रहे हैं।
लेकिन टीवी पर अर्बन ज्ञाणी द्वारा राष्ट्रवाद का ऑक्सीजन मुफ्त बांटा जा रहा है।
इसी बीच त्याग और सादगी की नदियों बहने लगी हैं। मितव्ययिता मंत्र दिया गया है। कम खर्च करो।फिजूलखर्ची छोड़ो। सादगी अपनाओ।
पूरा देश ये सुनकर भावुक हो गया है। कइयों ने विदेश यात्रा स्थगित कर दी हैं। सरकारी बाबुओं ने AC की हवा में बैठकर त्याग पर सेमिनार किया। कुछ नेताओं ने पांच सितारा होटल में “सादगी सम्मेलन” रखा। किसी ने कहा, “विदेश यात्रा जरूरी है, आखिर मितव्ययिता का वैश्विक संदेश देना है।”
नई राजनीति का नया योग सूत्र है।जनता कटौती करे। सरकार प्रेरणा दे।
कहा गया, शादी समारोह सादगी से हों। वाह! यह बात उन लोगों ने कही जिनके काफिले निकलते समय ट्रैफिक खुद लोकतंत्र को सलाम करता है।
कहा गया, सरकारी खर्च कम हो।
और उसी शाम नई LED स्क्रीन पर “ऐतिहासिक उपलब्धियों” का विज्ञापन चमक उठा।
कहा गया, अनावश्यक यात्राएं बंद हों।
देश मुस्कुराया। एयरपोर्ट थोड़ा घबराया। त्याग का ऐसा अलौकिक वातावरण बना कि मध्यम वर्ग ने चाय में चीनी आधी कर दी। गरीब ने दाल में पानी बढ़ा दिया। और अमीर ने ट्वीट कर दिया, “Nation First.”
व्यवस्था तंत्र के पास मुद्दों की पूरी जादुई पोटली है। जनता फिर पांच किलो मुफ्त राशन और पंद्रह सेकंड के गुस्से में सब भूल जाती है।
उधर विपक्ष भी कम कलाकार नहीं।
देश जल रहा हो, पर उनकी प्राथमिकता EVM का पोस्टमार्टम है।
हार गए तो मशीन चोर। कुछ नहीं तो इनको हटाओ, उनको हटाओ। जीत गए तो लोकतंत्र जिंदाबाद। हार गए तो लोगों को डेमोक्रेसी खतरे में दिखती है।
इस बीच पूरा देश एक दूसरे की गिनती करने में लगा है। जाति जनगणना से अगले कुंभ तक गरीबी भाग जाएगी।
विपक्ष कहता है इतने खतरे तो पुराने जमाने में डाकुओं से भरे जंगल में भी नहीं थे।
और मीडिया! अरे मीडिया तो इस महान लोकतांत्रिक सर्कस का रिंग मास्टर है। देश में किसान आत्महत्या करे, नदी सूख जाए, बच्चे कुपोषण से मर जाएं, कोई फर्क नहीं। ज्योतिषियों की चांदी कट रही है, सब कुछ सितारों के हवाले। हम क्या साथ लाए थे, क्या ले जाएंगे!
वर्ल्ड बेस्ट टीवी एंकर्स भारत में हैं, उनके रहते सरकारी प्रवक्ताओं की कोई जरूरत ही नहीं। अगर किसी ने कहा कि आम काटकर खाना चाहिए या चूसकर, तो तीन घंटे की “राष्ट्रव्यापी बहस” तय है।
“सीमा हैदर का छठा बच्चा।”
“ जेल में बेटी हुई।”
“फिल्म स्टार ने किस रंग की चप्पल या चड्डी पहनी?”
ब्रेकिंग न्यूज ऐसे दौड़ती है जैसे रॉकेट चांद पर नहीं, पाताल में उतर चुका हो।
पत्रकारिता अब सवाल नहीं पूछती।
TRP की भिक्षा मांगती है।
एंकर ऐसे चिल्लाते हैं जैसे देश की सारी समस्याएं डेसिबल से हल होंगी।
स्क्रीन पर आठ खिड़कियां खुलती हैं।
आठ लोग एक साथ चीखते हैं।
और दर्शक सोचता है, शायद यही लोकतंत्र का नया राष्ट्रीय गीत है।
शिक्षा?
उसकी हालत उस रिश्तेदार जैसी हो गई है जिसे शादी में कोई पूछता नहीं।
स्वास्थ्य व्यवस्था ICU में पड़ी है।
रोजगार फाइलों में लटका है।
गरीबी आंकड़ों में छिपी बैठी है।
लेकिन चुनाव आते ही सबको मंदिर, मस्जिद, भाषा, लोकल अस्मिता, पाकिस्तान और जाति याद आ जाती है।
मानो देश नहीं, कोई अनंतकालीन टीवी सीरियल चल रहा हो।
सब अपना अपना धंधा चमका रहे हैं।
जनता सिर्फ ताली बजाने वाली ऑडियंस है।
देश के असली मुद्दे फुटपाथ पर बैठे हैं।
और नकली मुद्दे लाल बत्ती वाली गाड़ियों में घूम रहे हैं।
कभी कभी लगता है भारत समस्याओं से नहीं, “प्रायोजित बहसों” से चल रहा है।
फिर भी उम्मीद जिंदा है।
क्योंकि इस देश का आम आदमी बहुत सहनशील है।
वह हर पांच साल बाद फिर लाइन में खड़ा हो जाता है।
उसे लगता है, शायद इस बार कोई रोटी, रोजगार और राहत की बात करेगा।
लेकिन सिस्टम को पक्ष, विपक्ष के बाजीगर ही चलते हैं। टोपी से कभी धर्म निकालता है। कभी डर। कभी दुश्मन। कभी मितव्ययिता का नया मंत्र। और जनता? वह फिर ताली बजाती है। क्योंकि असली मुद्दों की आवाज अब शोर में दब चुकी है

अधिक मास : आध्यात्म और विज्ञान के निष्कर्ष पर निर्धारण : समाज में सकारात्मक ऊर्जा का संदेश भी

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भोपाल । इस वर्ष ज्येष्ठ शुक्लपक्ष एकम् 17 मई से अधिकमास आरंभ हो गया है जो सोमवती अमावस 15 जून तक रहेगा। अधिकमास को “पुरुषोत्तम मास” माना गया। पंचांग के अनुसार अधिक मास का यह विधान विज्ञान, आध्यात्म और सामाजिक मनोविज्ञान के निष्कर्ष पर आधारित है। विज्ञान की दृष्टि से अधिकमास का निर्धारण सूर्य और चंद्रमा की गति के बीच समन्वय बनाने केलिये किया गया है तो आध्यात्म की दृष्टि से यह आत्मशक्ति जाग्रत करने का समय है। जबकि इसमें व्रत पूजा उपासना के विधान समाज में सकारात्मक चिंतन को प्रभावी बनाने के अद्भुत सूत्र हैं।
जीवन के लिये विज्ञान और आध्यात्म एक दूसरे के पूरक हैं। दोनों के संयुक्त निष्कर्ष से जीवन समृद्ध और सकारात्मक होता है। भारतीय परंपरा के विकास क्रम में धार्मिक उतसव के आयोजन हों अथवा तीज त्यौहारों का निर्धारण, यह परंपरा अथवा केवल उत्सव मनाने के प्रावधान भर नहीं हैं। इनमें विज्ञान के निष्कर्ष और आध्यात्म के बीच समन्वय बना कर जीवन को उन्नत बनाने के सूत्र हैं। ताकि समाज जीवन उन्नतिशील बने और परस्पर व्यवहारिक समन्वय भी सशक्त हो। यही सिद्धांत अधिकमास के निर्धारण में है। अधिकमास का निर्धारण केवल धार्मिक या केवल ज्योतिष का आधार नहीं है अपितु इसका आधार सूर्य और चंद्र की गति में संतुलन बिठाने के लिये किया गया है। चंद्रमा की तुलना में सूर्य गति तेज है। गति के इस अंतर के कारण वर्ष के अंत में समय का अंतर आ जाता है। अधिकमास के निर्धारण से इस अंतर को समायोजित किया जाता है। यह आश्चर्यजनक है कि हजारों वर्ष पहले भारतीय मनीषियों को इस अंतर की सटीक जानकारी थी। इसी आधार पर पंचांग का निर्माण हुआ। भारतीय पंचांग में वर्ष की अवधि का निर्धारण तो सूर्य की गति से होता है। जबकि प्रतिदिन पड़ने वाली तिथियों का निर्धारण चंद्रमा की गति से किया जाता है। यदि दोनों की गति की गणना की जाय तो चंद्रमा की गति के अनुसार वर्ष की अवधि 354 दिन, 8 घंटे और 34.28 सेकंड का होती है। जबकि सूर्य की गति के अनुसार वर्ष की अवधि 365 दिन, छह घंटे, 9.54 सेकंड होती है। इस प्रकार चंद्रमा और सूर्य की गति का यह अंतर वर्ष में 10 दिन, 21 घंटे और 35.16 सेकंड का हो जाता है। अंतर की इस अवधि की गणना करके यह सुनिश्चित किया गया कि जब यह अंतर 29 दिन 12 घंटे, 44 मिनट और 2.865 सेकंड से अधिक हो जाय तो अधिकमास का प्रावधान करके इस समयावधि का संतुलन बनाया गया है। सामान्यतः 19 वर्ष में सात अतिरिक्त मास के प्रावधान किये जाते हैं। अधिकमास का निर्धारण कब किया जाय इसका भी विधान सुनिश्चित किया गया है। सूर्य प्रत्येक राशि पर लगभग एक माह रहते हैं। सूर्य की राशि परिवर्तन की तिथि से अधिकमास प्रारंभ होता है। इस वर्ष 15 मई से सूर्य ने मेष राशि से बृष राशि में प्रवेश कर लिया है। लेकिन इस माह अमावस शनिवार 16 मई को थी इसलिये ज्येष्ठ शुक्लपक्ष एकम 17 मई से अधिकमास आरंभ हुआ जो 15 जून अमावस तक रहेगा।

अधिकमास का नामकरण “पुरुषोत्तम मास”

जब पृथ्वी के मौसम परिवर्तन का अध्ययन करने पर सूर्य और चंद्र की गति के अंतर का पता चला तब वर्ष की अवधि में सामंजस्य केलिये अधिकमास का निर्धारण हुआ। तब प्रश्न आया कि इसका नाम क्या हो और माह का स्वामी कौन होगा। इसके नामकरण की कथा श्रीमद्भागवत में भी है। चूँकि राशियाँ बारह होतीं हैं और सूर्य की यात्रा का निर्धारण इन राशियों के अनुसार होता है तब इस अतिरिक्त मास के लिये कोई राशि नहीं मिलक इस कारण इस अतिरिक्त मास को “मलमास” कहा जाने लगा। यह धारणा भी बन गई कि यह अवधि अशुभ होती है। इससे दुःखी होकर यह अधिकमास समुद्र के पास पहुँचा। समुद्र कोअपनी वेदना बताई तब समुद्र उसे लेकर भगवान विष्णु के पास गये। तब भगवान विष्णु ने स्वयं को इस मास को अपना नाम देकर “पुरुषोत्तम मास” निर्धारित किया और कहा कि इस मास में किये गये सभी आध्यात्मिक कार्यों का फल अधिक मिलेगा। यह प्रसंग श्रीमद्भागवत में है। पुरुषोत्तम मास का का उल्लेख श्रीमद्भगवद्गीता में भी है। तब से अधिकमास का नाम “पुरुषोत्तम मास” हुआ और इसके स्वामी श्रीमन्ननारायण माने गये । इसलिये इस माह में किये जाने वाले पूजन भजन से नारायण प्रसन्न होते हैं और पुण्य लाभ अधिक मिलता है। इसे यदि मनोविज्ञान की दृष्टि से देखे तो सकारात्मक कार्य करने से मन की अशांति दूर होती है, सकारात्मक कार्यों की गति तीव्र होती है तो स्वाभाविक है कि कार्य परिणाम अच्छे ही होंगे। इसके अतिरिक्त सामूहिक अनुष्ठान से परिवार और समाज के बीच समन्वय भी बनता है।

आरोग्य, आध्यात्मिक जागरण और सामाजिक स्वरूप

अधिकमास का निर्धारण विज्ञान के अनुसंधान के अनुसार सूर्य और चंद्र की गति के अंतर को समायोजित करने के लिये होता है तो वहीं उसकी पूजा उपासना विधि में आध्यात्म जागरण और सामाजिक सहभागिता से जोड़ा गया है। व्यक्ति के अस्तित्व में कुल पाँच आयाम होते हैं एक अन्नमय कोष अर्थात शरीर, दूसरा प्राणमय कोष यनि प्राण शक्ति, तीसरा मनोमय कोष यनि मन, चौथा ज्ञानमय कोष यनि बुद्धि, और पाँचवा आत्ममय कोष यनि आत्मा। हमारे आत्म जागरण और आरोग्य में इन पाँचों कोषों में ऊर्जा का समन्वय होना चाहिए। यदि किसी एक कोष में ऊर्जा अधिक हुई तो दूसरे कोष की ऊर्जा कमजोर होगी। आरोग्य की दृष्टि से यह असंतुलन रोगों का कारण होता है। जबकि आत्म चेतना न केवल शरीर, मन और बुद्धि को सशक्त बनाती है अपितु इन पाँचों कोषों में संतुलन भी बनाती है। अधिकमास में पूजन विधि और भोजन का निर्धारण इन पाँचों आयामों में ऊर्जा का संतुलन हो और समाज के सभी वर्गों में समन्वय बनाने केलिये किया गया है। इसकी झलक हमें अधिकमास के दौरान भोजन सामग्री और पूजन सामग्री में मिलती है ।
पुरुषोत्तम मास में गेहूं, चावल, सफेद धान, मूंग, जौ, तिल, मटर, बथुआ, ककड़ी, केला, घी, कटहल, आम, पीपल, जीरा, सोंठ, इमली, सुपारी, आंवला, सेंधा नमक आदि का सेवन करने और पूरे माह एक समय भोजन करने को कहा गया है । अधिकमास में शहद, चौलाई, उड़द की दाल, राई, प्याज, लहसुन, गोभी, गाजर, मूली और तिल का तेल का सेवन करने को मना किया गया है। इस भोजन निषेध और उपयुक्त भोजन सामग्री को पाप पुण्य से जोड़ा गया है। भोजन, पूजन और दिनचर्या का विधान कुछ इस प्रकार किया गया है जिससे मनुष्य में सकारात्मक भाव उत्पन्न हों। आदर्श नागरिक और समाज के आदर्श स्वरूप केलिये सकारात्मक चिंतन ही सबसे महत्वपूर्ण होता है।
इस प्रकार अधिकमास के निर्धारण एक त्रिवेणी है। विज्ञान का अनुसंधान है, आरोग्य एवं आध्यात्म जागरण है और सामाजिक सहभागिता भी है ।

भोजशाला : जब इतिहास की राख से फिर उठी सभ्यता बोल उठी

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प्रणय विक्रम सिंह

भोपाल । सभ्यताएं केवल पत्थरों, प्राचीरों और पुरातात्विक अवशेषों से नहीं बनतीं। वे स्मृतियों, श्रद्धा, ज्ञान और आत्मा के उन अदृश्य सूत्रों से निर्मित होती हैं, जिन्हें तलवारें काट नहीं सकतीं, फरमान मिटा नहीं सकते और आक्रमण पराजित नहीं कर सकते।

मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने भोजशाला-कमाल मौला कॉम्प्लेक्स की धार्मिक प्रकृति को भगवती वाग्देवी (सरस्वती) का मंदिर माना है। यह राजा भोज (परमार वंश) द्वारा स्थापित संस्कृत शिक्षा केंद्र था।

मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय द्वारा धार स्थित भोजशाला-कमाल मौला परिसर की धार्मिक प्रकृति को भगवती वाग्देवी (माँ सरस्वती) का मंदिर मानना केवल एक न्यायिक निर्णय नहीं, बल्कि उस सभ्यतागत सत्य की पुनर्पुष्टि है, जिसे सदियों तक धूल, ध्वंस और दमन के नीचे दबाने का प्रयास किया गया, किन्तु जिसे मिटाया नहीं जा सका।

यह वही भोजशाला है, जिसे परमार वंश के महान प्रतापी राजा भोज ने ज्ञान, संस्कृत और माँ वाग्देवी की आराधना के केंद्र के रूप में स्थापित किया था। यहां केवल पूजा नहीं होती थी, यहां भारत की वैदिक चेतना श्वास लेती थी। यहां शब्द साधना थी, शास्त्रार्थ था, संस्कृत की स्वर लहरियां थीं, और ज्ञान को ईश्वर मानने वाली भारतीय सभ्यता का आलोक था। यह केवल मंदिर नहीं था, यह भारतीय बौद्धिकता, भारतीय ज्ञान और भारतीय अध्यात्म का समन्वित विश्वविद्यालय था। किंतु भारत के इतिहास का एक लंबा कालखंड ऐसा भी रहा, जब बाहरी आक्रमणकारियों ने इस भूमि की आत्मा को तोड़ने का प्रयास किया। मंदिरों को केवल पत्थरों का ढांचा नहीं समझा गया, उन्हें भारतीय समाज की सांस्कृतिक रीढ़ मानकर लक्ष्य बनाया गया। क्योंकि आक्रमणकारी जानते थे कि यदि किसी सभ्यता की स्मृतियों, प्रतीकों और आस्था केंद्रों को ध्वस्त कर दिया जाए, तो उसके आत्मविश्वास को घायल किया जा सकता है।

सोमनाथ से काशी तक, मथुरा से मार्तंड तक और भोजशाला से नालंदा तक इतिहास के पन्नों पर ऐसे असंख्य रक्तरंजित अध्याय अंकित हैं, जहां केवल इमारतें नहीं टूटीं, बल्कि भारतीय अस्मिता को अपमानित करने का सुनियोजित प्रयास हुआ। आक्रमण केवल भूभाग पर नहीं, भारत की स्मृति पर था।

पुस्तकालय जलाए गए, विद्यापीठ ध्वस्त किए गए, मूर्तियों को खंडित किया गया, और सभ्यता की स्मृतियों पर पराये प्रतीकों का आवरण चढ़ाने का प्रयास किया गया। भोजशाला भी उसी पीड़ा की साक्षी बनी। जहां कभी सरस्वती वंदना गूंजती थी, वहां इतिहास को बदलने के प्रयास हुए। जहां ज्ञान का दीप प्रज्वलित था, वहां पहचान का अंधकार थोपा गया। किन्तु सनातन की विशेषता यही है कि वह पराजित नहीं होता। वह प्रतीक्षा करता है। वह सहता है। वह समय के गर्भ में सत्य को सुरक्षित रखता है।

मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने उपलब्ध ऐतिहासिक साहित्य, पुरातात्विक साक्ष्यों, सतत उपासना परंपरा और वैज्ञानिक जांच के आधार पर यह स्पष्ट किया कि भोजशाला माँ वाग्देवी का प्राचीन मंदिर एवं संस्कृत शिक्षा का केंद्र थी। यह निर्णय किसी भावनात्मक आवेग का परिणाम नहीं, बल्कि संवैधानिक प्रक्रिया, पुरातात्विक परीक्षण और न्यायिक विवेक की कसौटी पर आया हुआ निर्णय है।

यह अत्यंत महत्वपूर्ण है कि न्यायालय ने ASI जैसी विशेषज्ञ संस्था की जांच, दोनों पक्षों की दलीलों, ऐतिहासिक प्रमाणों और प्रत्यक्ष निरीक्षण के बाद यह निर्णय दिया। यह बताता है कि भारत का संविधान और न्यायपालिका सत्य तक पहुंचने की क्षमता रखते हैं, यदि धैर्य और विश्वास बनाए रखा जाए।

यह निर्णय सामाजिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। लंबे समय तक भारत में ऐतिहासिक सत्य पर चर्चा को ही विवाद बना दिया गया। सभ्यतागत पीड़ा की अभिव्यक्ति को सांप्रदायिकता कहकर दबाने का प्रयास हुआ। मंदिर विध्वंसों की स्मृतियों को ‘अतीत भूल जाओ’ कहकर ढंकने का प्रयास किया गया। लेकिन कोई भी समाज अपने घावों को स्वीकार किए बिना स्वस्थ नहीं हो सकता।

भोजशाला का निर्णय इस बात का संकेत है कि आधुनिक भारत अब अपनी सभ्यता के इतिहास से आंखें चुराने के बजाय उसका संतुलित और तथ्याधारित पुनर्पाठ करने को तैयार है।

राजनीतिक दृष्टि से भी यह निर्णय भारत की बदलती चेतना का प्रतीक है। यह उस ‘नए भारत’ का संकेत है, जो अपनी सांस्कृतिक जड़ों को लेकर संकोचग्रस्त नहीं है। जो यह मानता है कि विकास और विरासत साथ-साथ चल सकते हैं। जो मंदिरों को केवल धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्मृति और सभ्यतागत पहचान के केंद्र के रूप में देखता है।

यह निर्णय उन करोड़ों भारतीयों के मन में विश्वास भी जगाता है, जिन्होंने दशकों तक यह अनुभव किया कि उनकी आस्था, उनकी पीड़ा और उनकी सांस्कृतिक स्मृतियां सार्वजनिक विमर्श में उपेक्षित रहीं। भोजशाला का निर्णय उन्हें यह आश्वासन देता है कि संवैधानिक और न्यायिक प्रक्रिया के भीतर रहते हुए भी ऐतिहासिक न्याय संभव है।

इस निर्णय का सबसे बड़ा संदेश यह है कि सनातन केवल पूजा पद्धति नहीं, बल्कि एक जीवित सभ्यता है। उसे तलवारों से घायल किया जा सकता है, लेकिन समाप्त नहीं किया जा सकता।

आज भोजशाला का प्रश्न केवल एक मंदिर का प्रश्न नहीं है। यह भारत की उस ज्ञान परंपरा का प्रश्न है, जिसने विश्व को व्याकरण दिया, दर्शन दिया, गणित दिया, अध्यात्म दिया। यह उस सांस्कृतिक अस्मिता का प्रश्न है, जिसे बार-बार मिटाने का प्रयास हुआ, लेकिन जो हर बार और अधिक तेजस्विता के साथ पुनः खड़ी हो गई।

न्यायालय द्वारा लंदन के ब्रिटिश म्यूजियम में स्थापित मां सरस्वती की प्रतिमा को भारत वापस लाने की दिशा में विचार करने संबंधी टिप्पणी भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। वह प्रतिमा केवल मूर्ति नहीं है, वह भारत की सांस्कृतिक चेतना का प्रतीक है। उसका पुनः भोजशाला में स्थापित होना वस्तुतः इतिहास की टूटी हुई कड़ी का पुनर्संयोजन होगा। वह केवल प्रतिमा की वापसी नहीं होगी, वह भारतीय आत्मा की घर-वापसी होगी।

किन्तु इस निर्णय को प्रतिशोध या पराजय के भाव से नहीं देखा जाना चाहिए। यह किसी समुदाय की हार नहीं है। यह ऐतिहासिक सत्य की स्वीकृति है।

अब आवश्यकता भोजशाला को पुनः ज्ञान और संस्कृत साधना के वैश्विक केंद्र के रूप में स्थापित करने की है। वहां पुनः वेदों की ऋचाएं गूंजें। वहां पुनः संस्कृत का अध्ययन हो। वहां पुनः भारत की ज्ञान परंपरा विश्व को दिशा दे। वहां पुनः यह सिद्ध हो कि यह भूमि केवल आस्था की नहीं, ज्ञान की भी जननी है। तभी यह निर्णय अपने पूर्ण अर्थ को प्राप्त करेगा।

भोजशाला हमें याद दिलाती है कि इतिहास का सत्य देर से लौट सकता है, लेकिन लौटता अवश्य है। और जब सत्य लौटता है, तब केवल एक भवन नहीं जीतता… सभ्यता मुस्कुराती है, इतिहास की राख से फिर सरस्वती उठ खड़ी होती हैं।

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