कॉल गर्ल नेटवर्क्स ने आगरा की रेड लाइट बस्तियों को उजाड़ दिया है

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आगरा शहर के बीचों बीच माल का बाजार, कश्मीरी बाजार, सेव का बाजार, और किसी वक्त की बदनाम बस्ती बसई ग्राम, अंधेरा होते ही संगीत की महफिलों से गुलजार रहते थे। ऊंची बालकनियों से ज्यादातर नेपाली सेक्स वर्करस अश्लील इशारे करके राहगीरों को बुलाती थीं। गंदी तंग गलियों से होकर दल्ले ग्राहकों को कोठे तक पहुंचाते थे। आए दिन पुलिसिया रेड्स होती थीं, कोतवाली में वेश्याओं की पहचान परेड होती थी।

अब परिदृश्य बदल चुका है। फतेहाबाद रोड हाइ प्रोफाइल टूरिस्ट एरिया बनने से बसई में होटल और एंपोरियम्स खुल चुके हैं। उधर सैकड़ों सालों से मुगल कालीन बाजार भी अब व्यावसायिक केंद्रों में तब्दील हो चुके हैं। समय के साथ देह व्यापार में भी डिमांड सप्लाई का खेल काफी बदल चुका है।

जानकार लोग बताते हैं कि ताजमहल और अन्य आकर्षणों के कारण आगरा की वैश्विक पर्यटन केंद्र के रूप में बढ़ती स्थिति ने कथित तौर पर देह व्यापार में वृद्धि की है, अब शहर में देश के विभिन्न हिस्सों से यौनकर्मियों की आमद देखी जाती है। दिल्ली क्षेत्र के काफी लोग वीकेंड या छुट्टियों में प्राइवेट वाहनों से अपने “इंतजामों” के साथ ही विचरण करने आते हैं। टूरिस्ट गाइड्स कहते है कि आगरा में नाइटलाइफ़ तेज़ी से “रंगीन” होती जा रही है, जिसमें एस्कॉर्ट सेवाएँ और हाई-प्रोफ़ाइल पार्टियाँ जैसी गतिविधियाँ पर्यटकों और स्थानीय लोगों दोनों के लिए हैं। सेवाओं के आयोजन और विज्ञापन के लिए ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्म और सोशल मीडिया के उपयोग ने सुविधाओं को और विस्तार दिया है। स्थानीय सोशल एक्टिविस्टों का तर्क है कि उचित कानून प्रवर्तन और सार्वजनिक जागरूकता की कमी ने ऐसी गतिविधियों को पनपने दिया है।

एक सामाजिक कार्यकर्ता कहते हैं “आगरा के देह व्यापार में पिछले वर्षों में काफी परिवर्तन हुए हैं। पारंपरिक रेड-लाइट एरियाज, जो कभी लोकप्रिय अड्डे थे, लगभग गायब हो गए हैं, जिससे सेक्स व्यापार का फैलाव नए क्षेत्रों में विकेंद्रित हुआ है। होटलों, स्पा, बार और क्लबों के माध्यम से भी संचालित होता है, जो अब आमतौर पर पॉश इलाकों में पाए जाते हैं। पूर्व में आर्थिक और सामाजिक मजबूरियों से चलता था सेक्स बाजार, अब शौकिया पार्ट टाइमरस और गोरी विदेशी बालाएं भी मैदान में हैं।”

फरवरी 2020 की एक घटना को याद करते हुए एक टूरिस्ट गाइड ने बताया कि पुलिस ने ताजगंज इलाके के एक होटल से उज्बेकिस्तान की तीन और दिल्ली की दो महिलाओं समेत पांच लोगों को गिरफ्तार किया था। तत्कालीन एसपी सिटी रोहन बोत्रे प्रमोद ने कहा था कि इलाके के कुछ होटल पुलिस के रडार पर हैं और करीब 37 छोटे मोटे होटलों की पहचान ऐसे नेटवर्क के तौर पर की गई है जो विभिन्न स्तरों पर सेक्स रैकेट संचालित करते हैं। एक स्थानीय टूर ऑपरेटर ने कहा कि कुछ साल पहले बीमा नाम का एक शख्स “विदेशी ग्राहकों में विशेषज्ञता रखने वाला एक बिग सेक्स रैकेट ऑपरेटर था जिसके बारे में कहा जाता था कि वह दिल्ली और आगरा के होटलों में रूसी लड़कियों को सप्लाई करता था। एक पुलिस सूत्र ने बताया कि गिरफ्तार किए गए गिरोह के सदस्य स्थानीय फाइव स्टार होटलों से ग्राहकों को लुभाकर सेक्स रैकेट चला रहे थे।”

ऐतिहासिक रूप से, आगरा में सेक्स वर्क में अक्सर कुछ समुदायों की महिलाएँ शामिल होती थीं, जो जीवित रहने के साधन के रूप में इस व्यापार में शामिल होने के लिए जाने जाते थे। उनके साथ, नेपाल की महिलाएँ भी इस परिदृश्य में प्रमुखता से शामिल थीं। फिर पूर्वी राज्यों और बांग्लादेशी भी आए। 20वीं सदी के उत्तरार्ध के दौरान, ये समूह स्थानीय सेक्स वर्क परिदृश्य पर हावी थे, जो पारंपरिक रेड-लाइट क्षेत्रों से जुड़े थे जहाँ लेन-देन सार्वजनिक और स्थानीय थे। इन बस्तियों के पतन के कारण सेक्स व्यापार का विखंडन हुआ है। पिछले दो से तीन दशकों में, विभिन्न सामाजिक परिवर्तनों और आर्थिक बदलावों के आगमन ने देह व्यापार की गतिशीलता को फिर से परिभाषित किया है। बढ़ते पर्यटन द्वारा प्रेरित कॉल-गर्ल बाजार के उदय ने स्थानीय और विदेशी संरक्षकों की मांग में उल्लेखनीय वृद्धि देखी है। यह बदलाव प्रौद्योगिकी और गोपनीयता पर निर्भरता की विशेषता है, जिसमें ग्राहक अक्सर सुरक्षित, सुलभ और आरामदायक व्यवस्था चाहते हैं। छोटे होटलों ने घंटे के आधार पर कमरे किराए पर देकर इस प्रवृत्ति का लाभ उठाया है। पूर्व में सेक्स वर्क को अक्सर हाशिए पर रहने वाली महिलाओं के लिए अंतिम उपाय के रूप में देखा जाता था, आज के देह व्यापार में फ्रीलांसर और अंशकालिक खिलाड़ी शामिल हैं। जागरूकता और कंट्रासेप्टिव्स की व्यापक उपलब्धि से कई घरेलू महिलाएँ, छात्राएँ या युवा पेशेवर भी शामिल हो चुकी हैं, या हॉस्टलर्स जो अतिरिक्त आय या लचीले कार्य शेड्यूल की तलाश में हैं। यह बदलाव व्यापक सामाजिक परिवर्तनों को दर्शाता है, जिसमें कार्यबल में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी और कामुकता और आर्थिक एजेंसी की बदलती धारणाएँ शामिल हैं।

जबकि पारंपरिक रेड-लाइट क्षेत्र कम हो गए हैं, सेक्स वर्क के भूमिगत और अधिक परिष्कृत रूप में तस्करी, शोषण और असुरक्षित स्थितियों सहित खतरे और भी अधिक हो सकते हैं। इसके अलावा, नाइटलाइफ़ और आधुनिक अवकाश गतिविधियों के साथ इसके जुड़ाव के माध्यम से सेक्स उद्योग का ग्लैमराइजेशन – बार और क्लबों के उदय में देखा गया – स्टूडेंट्स और युवा पेशेवरों की भागीदारी उन परिस्थितियों के बारे में नैतिक चिंताएँ पैदा करती है जो उन्हें ऐसे विकल्पों के लिए प्रेरित करती हैं। आर्थिक दबाव, बढ़ती जीवन लागत और जीवनशैली में सुधार की चाहत अक्सर व्यक्तियों को इस अनिश्चित पेशे में धकेलती है।

जैसे-जैसे आगरा विकसित होता जाएगा, वैसे-वैसे इसके देह व्यापार की गतिशीलता और व्यापकता बढ़ती जाएगी।

सोशल मीडिया पर अधकचरे हैल्थ ज्ञान से बीमारियां बढ़ रही हैं?

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एक सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर ब्यूटी टिप्स देने वाली ने सलाह दी कि पिंपल्स, मुंहासों के लिए रात को टूथ पेस्ट लगाकर सोएं। 15 वर्षीय बालिका माही ने कई रातें ये फॉर्मूला आजमाया, अब उसके चेहरे पर मुंहासों के गुच्छे निकल आए हैं। उधर शालिनी आंटी ने एक सोशल मीडिया डॉक्टर की सलाह पर रात का नॉर्मल खाना बंद कर सलाद और फ्रूट्स खाना शुरु किया तो अब भयंकर कब्ज की गिरफ्त में हैं। गुप्ताजी ने इतना एलो वेरा और आमला का जूस पी लिया कि अब एसिडिटी और अल्सर का इलाज चल रहा है।

आजकल न डॉक्टर की चल रही है न परंपरागत अनुभव की। सोशल मीडिया और अखबारों के नीम हकीमों का मार्केट बुलंदी पर है। सरकार को कड़े कदम उठाने होंगे नहीं तो नकली हेल्थ और ब्यूटी इंडस्ट्री सबको बीमार बना देगी।

हमारे हाइपर-कनेक्टेड युग में, सोशल मीडिया बिना पुष्टि किए मेडिकल सलाह के लिए डिलीवरी सेंटर बन गया है। हर स्क्रॉल में चमत्कारी स्वास्थ्य लाभ का वादा करने वाले दावों की झड़ी लगी हुई है, जिसमें “सुपरफूड” से लेकर आहार निषेध तक शामिल हैं, जो अक्सर वैज्ञानिक समर्थन से रहित होते हैं। यह व्यापक गलत सूचना सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए एक गंभीर खतरा है, क्योंकि उपयोगकर्ता इन दावों को आसानी से अपना लेते हैं, जिससे संभावित रूप से उनकी सेहत को खतरा हो सकता है।

वास्तविकता यह है कि ऑनलाइन स्वास्थ्य सलाह के एक महत्वपूर्ण हिस्से में किसी भी विश्वसनीय आधार का अभाव है। स्व-घोषित स्वास्थ्य गुरु, जिनके पास बहुत कम या कोई चिकित्सा प्रशिक्षण नहीं है, इन प्लेटफ़ॉर्म पर हावी हैं, जो अक्सर संदिग्ध स्रोतों से लिए गए आधे-अधूरे सिद्धांतों का प्रसार करते हैं। लाइक और फ़ॉलोअर्स की इस चाह ने एक ऐसी संस्कृति बनाई है जहाँ सनसनीखेजता वैज्ञानिक कठोरता को मात देती है।

इस गलत सूचना के परिणाम गंभीर हो सकते हैं। व्यक्ति खतरनाक डिटॉक्स आहार अपना सकते हैं, निराधार दावों के आधार पर अपने आहार से आवश्यक पोषक तत्वों को हटा सकते हैं, या बिना किसी अनुभवजन्य साक्ष्य के विचित्र स्वास्थ्य प्रथाओं में संलग्न हो सकते हैं। इससे न केवल शारीरिक नुकसान का खतरा है, बल्कि उन लोगों के लिए महत्वपूर्ण भावनात्मक संकट भी होता है, जो गुमराह स्वास्थ्य विकल्पों के नतीजों को झेलते हैं।

यह प्रवृत्ति सामान्य स्वास्थ्य सलाह से आगे बढ़कर सौंदर्य और त्वचा की देखभाल के क्षेत्र तक फैल गई है। महिलाओं पर विशेषज्ञ मार्गदर्शन के बजाय वायरल रुझानों पर आधारित प्रयोगात्मक सौंदर्य दिनचर्या की बौछार हो रही है। सोशल मीडिया पर सौंदर्य और स्वास्थ्य सलाह का मिलन अक्सर महिलाओं को ऐसी प्रथाओं में संलग्न होने के लिए प्रेरित करता है जो उनकी त्वचा के स्वास्थ्य या समग्र कल्याण से समझौता करती हैं यह एक सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट है।

ऑनलाइन स्वास्थ्य संबंधी जानकारी मिलने पर व्यक्तियों के लिए आलोचनात्मक सोच और विवेक का प्रयोग करना महत्वपूर्ण है।

ऐसे युग में जहाँ सोशल मीडिया हमारे जीवन को बहुत अधिक प्रभावित करता है, हमारे सामूहिक स्वास्थ्य को अयोग्य प्रभावशाली लोगों की सनक और झूठी सलाह के बेतहाशा प्रचार पर नहीं छोड़ा जाना चाहिए।

हाल के वर्षों में गलत सूचना के उदाहरण:

* डिटॉक्स डाइट: दावा है कि ये सफाई शरीर से विषाक्त पदार्थों को बाहर निकालती है, जो काफी हद तक निराधार है। शरीर की अपनी प्राकृतिक डिटॉक्सिफिकेशन प्रणाली होती है।
* क्षारीय जल: यह दावा कि यह शरीर के pH को संतुलित कर सकता है और बीमारियों को रोक सकता है, वैज्ञानिक प्रमाणों द्वारा समर्थित नहीं है।
* वजन घटाने की खुराक: बहुत से लोग थोड़े प्रयास से तेजी से वजन घटाने का वादा करते हैं, लेकिन बहुत से अनियमित होते हैं और खतरनाक हो सकते हैं।
* “वसा जलाने वाले” खाद्य पदार्थ: जबकि कुछ खाद्य पदार्थों में मामूली चयापचय प्रभाव हो सकते हैं, कोई भी एकल भोजन उचित आहार और व्यायाम के बिना महत्वपूर्ण वजन घटाने का कारण नहीं बन सकता है।
* विटामिन ओवरडोज: जबकि आवश्यक है, अत्यधिक विटामिन का सेवन हानिकारक हो सकता है और संतुलित आहार का विकल्प नहीं है।
* कैंसर के लिए “चमत्कारी इलाज”: दावा है कि बेकिंग सोडा या भांग का तेल पारंपरिक उपचार के बिना कैंसर को ठीक कर सकता है, खतरनाक और भ्रामक है।
* वैक्सीन-ऑटिज्म लिंक: इस खारिज किए गए दावे ने वैक्सीन हिचकिचाहट में योगदान दिया है, जिससे रोकथाम योग्य बीमारियों का प्रकोप बढ़ गया है।
* एंटी-एजिंग “चमत्कार”: कोई भी स्किनकेयर उत्पाद वास्तव में उम्र बढ़ने को उलट नहीं सकता है। कई एंटी-एजिंग दावे अतिरंजित हैं और सबूतों द्वारा समर्थित नहीं हैं। * “सुपरफूड”: पौष्टिक होने के बावजूद, कोई भी एकल भोजन बीमारियों को रोक या ठीक नहीं कर सकता है। संतुलित आहार महत्वपूर्ण है। इसके अतिरिक्त सेक्स और लव गुरुओं ने भी तमाम चंडू खाने के प्रयोगों से मुश्किलों का अंबार लगा दिया है जिससे कोई पार्टनर संतुष्ट नजर नहीं आता।

संघ जनसंघ और भाजपा के अद्भुत सृजक और शिल्पी

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संपन्नता अर्जित करना उतना कठिन नहीं जितना गुरुत्व प्राप्त करना है । गुरुत्व के लिये साधना लगती है, तपस्चर्या लगती है । लक्ष्य पूर्ति की सतत साधनारत तपस्पवियों को ही ऋषि कहा गया । ऋषियों की साधना और तप से भारत विश्व में सम्मानित रहा है । ऋषि जीवन भारतीय भूमि की भीनी सुगन्ध रही है । आज भी भारत के आधुनिक विकास आयाम का आधार यही ऋषि साधना ही है । कुशाभाऊ ठाकरे भारत की ऐसी ही ऋषि परंपरा के वाहक रहे हैं। जिन्होंने अपनी साधना, तपस्चर्या और सेवा संकल्प से राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ, जनसंघ और भारतीय जनता पार्टी को कीर्तिमान स्वरूप प्रदान करने के लिये पूरा जीवन समर्पित कर दिया । आज यदि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भारतीय जनता पार्टी दोनों अपने जन समर्थन और संगठनात्मक स्वरूप में पूरे विश्व में अग्रणीं हैं तो इसके पीछे कुशाभाऊ ठाकरे जैसे तपोनिष्ठ ऋषि तुल्य विभूतियों की साधना ही रही है ।

कुशाभाऊ ठाकरे जी का जन्म 15 अगस्त 1922 को मध्यप्रदेश के धार नगर में हुआ था । आज उनकी शताब्दी वर्ष की पूर्णता के तिथि हैं । विक्रम संवत की दृष्टि से यह तिथि संवत् 1979 भाद्रपद माह कृष्ण पक्ष की अष्टमी थी । यह अष्टमी भगवान श्रीकृष्ण के अवतार की तिथि है, इसे जन्माष्टमी कहते है । तपस्या और त्यागमयी जीवन के साथ संस्कृति, समाज और राष्ट्रसेवा का व्रत उन्हें अपने परिवार के संस्कार में मिला था । उनके पिता डाक्टर सुन्दरराव जी ठाकरे अपने समय के सुप्रसिद्ध चिकित्सक थे जिन्होंने अहमदाबाद मेडिकल कॉलेज से डॉक्टरी की डिग्री ली थी । प्लेग और अन्य महामारी के समय अपने प्राणों बिना परवाह किये पीड़ितों की सेवा करने के लिये सुविख्यात रहे हैं । ठाकरे जी का परिवार कोंकण के पाली गाँव का मूल निवासी था । किन्तु समय के साथ उनके प्रपितामह गुजरात के मेहसाणा में आ बसे थे । जहाँ उनकी गणना एक संपन्न और प्रतिष्ठित परिवार के रूप में होने लगी थी । पिता सुन्दरराव जी का जन्म मेहसाणा में हुआ । सुन्दरराव जी अपने छात्र जीवन से ही स्वदेशी आंदोलन से जुड़ गये थे । स्वदेशी अभियान के साथ ही उन्होने अपनी पढ़ाई की थी । वे मेडिकल की पढ़ाई करने अहमदाबाद मेडिकल कॉलेज गये । मेडिकल की पढ़ाई के बीच ही उनका विवाह धार के प्रतिष्ठित दिघे परिवार की बेटी शांता बाई के साथ हो गया था । पढ़ाई पूरी करने लौटे तो परिवार में संपत्ति बँटवारे पर कुछ खींचतान आरंभ हुई । तब पत्नि के परामर्श से अपने हिस्से की संपत्ति भी अपने भाई विनायकराव को देकर खाली हाथ एक जोड़ी कपड़े से धार आकर गये थे । धार में आधुनिक मेडिकल चिकित्सा पद्धति का कोई डाक्टर भी नहीं था । इसीलिए उन्हें अपना प्रतिष्ठित स्थान बनाने में अधिक कठिनाई नहीं हुई । महाराजा धार ने भी उनका स्वागत किया । कुशाभाऊ जी का जन्म यहीं धार में हुआ । उनकी आभा बहुत सौम्य और आकर्षक थी । उनका जन्म जन्माष्टमी को हुआ था । इसलिये उनके नाना ने इस नन्हे बालक को कृषा कहकर पुकारा । समय बीता । नामकरण संस्कार का समय आया । तब उनका नाम शशिकांत रखा गया । नाम भले शशिकांत रखा गया हो पर वे प्रचलन में “कृषा” और “कुशा” और कुशाभाऊ के नाम से ही जाने गये । समय के साथ बड़े हुये । धार के विद्यालय में शिक्षा आरंभ हुई। तब उनका पूरा नाम “शशिकांत सुन्दरराव ठाकरे” अंकित किया गया । उनका छात्र जीवन इसी नाम का रहा । औपचारिक रूप में भले उनका नाम शशिकांत ठाकरे रहा । पर घर बाहर और विद्यालय के मित्रों के बीच उनकी पहचान कुशाभाऊ नाम से प्रतिष्ठित होती रही ।

स्वदेशी आंदोलन के प्रबल समर्थक और गाँधी जी के खादी आंदोलन में सहभागी रहे पिता डाक्टर सुन्दर राव का जुड़ाव राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से हो गया था । इस नाते परिवार में संघ विचार का वातावरण था । कुशाभाऊ जी किशोर वय में संघ और संघ विचार से परिचित हो गये थे । और उनका शाखा जाना आरंभ हो गया । 1939 में कुशाभाऊ जी ने धार से मैट्रिक परीक्षा उत्तीर्ण की । पिता अपने पुत्र को अपनी ही भांति डाक्टर बनाना चाहते थे । इसीलिए आगे की पढ़ाई के लिये ग्वालियर भेज दिया । कुशाभाऊ जी कुशाग्र बुद्धि थे । मैट्रिक परीक्षा उन्होंने प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की थी । इसलिये ग्वालियर में सरलता से प्रवेश भी मिल गया । उन्होने 1941 में इंटर की परीक्षा उत्तीर्ण की और मेडिकल में दाखिला भी ले लिया । किन्तु नियति ने उनके लिये कुछ कार्य निर्धारित किया था । वे संघ विचार में ढल गये थे, शाखा के नियमित स्वयं सेवक थे । उन्होंने 1942 में संघ के शिक्षा वर्ग में प्रशिक्षण लिया और अपना पूरा जीवन राष्ट्र, संस्कृति और संघ को समर्पित कर दिया । उन दिनों संघ के शिक्षा वर्ग को “ओ टी सी” नाम से जाना जाता था । ओटीसी के बाद ठाकरे जी अपनी पढ़ाई छोड़कर संघ के प्रचारक निकल गये । पढ़ाई छोड़ने संघ का प्रचारक बनने की अनुमति परिवार से मांगी, जो सहज ही मिल गई । और 1942 से उनका संघ जीवन पूर्ण कालिक प्रचारक के रूप हो गया ।

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने उन्हें मालवा और मालवा से लगे राजस्थान के क्षेत्र में संघ के विस्तार का कार्य सौंपा । उन्होंने नीमच को अपना केन्द्र बनाया और इसके चारों ओर धार, झाबुआ, रतलाम मंदसौर राजगढ़ शाजापुर से लेकर चित्तौड़ तक निरंतर प्रवास किये । उज्जैन, धार, झाबुआ, शाजापुर, रतलाम मंदसौर आदि जिलों का तो संभवतः कोई गाँव ऐसा शेष हो जहाँ ठाकरे जी ने संपर्क न किया हो, उन्होंने निरंतर प्रवास किये। जहाँ जो साधन मिला साइकल बस बैलगाड़ी जो मिला उसी से यात्रा निरंतर रही । हनुमान जी ने कभी कहा था “रामकाज कीजै बिना मोहि कहाँ विश्राम” संभवतः यही मंत्र ठाकरे जी का था अंतर केवल एक ठाकरे जी संकल्प था ” संघ कार्य कीजै बिना मोहि कहाँ विश्राम” । सुन्दर लाल पटवा, वीरेन्द्र कुमार सकलेचा और कैलाश जोशी जैसे सुपरिचित व्यक्तित्वों को उनकी युवा आयु में ठाकरे जी ने ही संघ से जोड़ा था । 1947 में सुन्दर लाल पटवा को संघ कार्य के लिये प्रचारक के रूप में ठाकरे जी ने ही तैयार किया था । और जब 1951 में राजनैतिक दल के रूप जनसंघ अस्तित्व में आया तब ठाकरे जी ने ही पटवा जी को मालवा में जनसंघ कार्य विस्तार का दायित्व दिया ।

समय अपनी गति से साथ दौड़ता रहा । समय के साथ संघ और जनसंघ का कार्य भी गति लेता रहा । समय के साथ परिवार की एक शाखा इंदौर आ गयी । इस नाते कुशाभाऊ जी को यहाँ परिवार से संघ कार्य में सहायता मिली । हो सकता है किसी को यह बात सुनने में सच न लगे किन्तु यह सत्य है कि ठाकरे जी ने संघ और जनसंघ के कार्य विस्तार में परिवारजनों का तो सहयोग लिया किंतु स्वयं परिवार की कभी सहायता न की । वे पाँच भाई एक बहन थे । स्वाभाविक है समय के साथ परिवार का और विस्तार हुआ । परिवार की शाखाएँ विभिन्न नगरों मे हैं । एक शाखा धार में भी । पर सभी सामान्य जीवन ही जी रहे हैं । ठाकरे जी का संगठन के प्रति, अपने कार्य के प्रति कितना समर्पण था इसका अनुमान इस घटना से भी लगाया जा सकता है कि 1953 में जब उनकी माता जी शाँताबाई मरणासन्न हुईं तब संदेश मिलने के बाद भी वे धार न जा सके । और अंतिम संस्कार में ही गये । यह ठाकरे जी की साधना का ही प्रभाव था कि मालवा क्षेत्र में संघ और जनसंघ की जड़ें तो गहरी हुईं ही, संघ कार्य विस्तार के लिये प्रचारक भी बड़ी संख्या में इस क्षेत्र से निकले । ठाकरे जी ने अपने कार्य विस्तार में परिवार का ही सहयोग नहीं लिया अपितु अपने मित्रों को भी संघ और जनसंघ के कार्य विस्तार में जोड़ा। इसका सबसे बड़ा उदाहरण ग्वालियर के नारायण कृष्ण शेजवलकर हैं । वे ग्वालियर में इंटर की पढ़ाई के साथ ठाकरे जी के मित्र बने और पहले संघ से और फिर जनसंघ से जुड़े ।

मध्यप्रदेश में जनसंघ की स्थापना के साथ उन्होंने पूरे मध्यप्रदेश की यात्राएं कीं। उन दिनों छत्तीसगढ भी मध्यप्रदेश का एक अंग था । मुरैना से बस्तर तक और झाबुआ से रीवा तक मध्यप्रदेश का ऐसा कोई नगर कस्बा नहीं जहाँ ठाकरे जी ने यात्रा न हो और कार्यकर्ता न खड़े किये हों । वे संघ प्रचारक के रूप में सर्वाधिक समय मालवा में रहे । जनसंघ को और बाद में भारतीय जनता पार्टी को सबसे अधिक सफलता इसी क्षेत्र से मिलती थी ।

वे जनसंघ और बाद में भाजपा के लगभग सभी महत्वपूर्ण पदों पर रहे । संगठन मंत्री, महामंत्री और भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी रहे । लेकिन पद उनके लिये महत्व पूर्ण न था । वे किसी भी पद पर रहे हों उनकी जीवन शैली सदैव एक सी रही । उन्होंने जीवन भर धोती कुर्ता पहना । खादी का कुर्ता उन्हें सदैव प्रिय रहा । वे बिना प्रेस के धोती कुर्ता पहनते थे और अपने हाथ से स्वयं धोते थे । और जब पार्टी के काम विस्तार हुआ तब उनके सहायक की वृद्धि हुई । बड़ी मुश्किल से उन्हे समझाया जा सका और वे तैयार हुये । वे चने मुरमुरे से शाम का अल्पाहार करते थे और मिठाई में इमरती उन्हे पसंद थी । वे बोलते कम थे । भोपाल में जनसंघ का प्रांतीय कार्यालय पहले चौक बाजार के पास लखेरापुरा में था फिर सोमवारा आया । वे भोपाल में जब भी रहते तो कार्यकर्ताओं से मिलने केलिये अधिक समय देते थे । प्रदेश चारों कौनों पर उन्होंने जिन कार्यकर्ताओं को जोड़ा वे सब प्रभावशाली और संगठन के लिये उपयोगी रहे । उस समय हिन्दु महासभा के अत्यंत प्रभावशाली नेता विदिशा के निरंजन वर्मा जी और भोपाल के भाई उद्धवदास जी मेहता को जनसंघ में लाने वाले ठाकरे जी थे । राजमाता जी के लिये जनसंघ में आने का मार्ग बनाने वाले ठाकरे जी थे । ठाकरे जी सुनते अधिक थे और बोलते कम थे । पता नहीं उनमें वह क्या विशेषता थी कि बातचीत के बाद कार्यकर्त्ता उनसे सदैव प्रसन्नचित्त और संतुष्ट भाव से ही लौटता था । दूरदराज से कोई कार्यकर्त्ता उनके पास कैसी भी शिकायत लेकर आता पर उनके सामने उसका सारा असंतोष निकल जाता और वह उत्साह के साथ संगठन के काम में जुट जाता । सारी बात सुनकर कार्यकर्ता का एक हाथ मोड़ कर पीठ पर घूँसा मारना मानों उनके आत्मीय स्नेह की वर्षा होती और कार्यकर्त्ता प्रसन्न और सन्तुष्ट होकर लौटकर जाया करते थे । जनसंघ के संगठन मंत्री के रूप में उन्होंने उड़ीसा, राजस्थान, गुजरात महाराष्ट्र आदि अनेक प्रातों में कार्य को विस्तार दिया । उन्होंने खंडवा लोकसभा क्षेत्र से लोकसभा के लिये दो चुनाव लड़े । पहले उपचुनाव में तो सफलता मिली पर दूसरी बार आमचुनाव में सफलता न मिल सकी । सबने आग्रह किया तो चुनाव लड़ लिया । न जीत की खुशी न हार का गम । वे जैसे पहले थे वैसे ही जीत के बाद भी और हार के बाद भी रहे । उनके राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के पूर्व बीच में कुछ समय ऐसा भी बीता जब लगा ठाकरे जी एकाकी हो रहे हैं। वे भारतीय जनता पार्टी के दिल्ली कार्यालय के अंग के समीप के परिसर में ही रहा करते थे । पर तब भी उनके व्यवहार में विचार में कोई अंतर न आया था । जो भी मिलने जाता उससे उसके परिवार ही नहीं उसके मित्रों का भी हालचाल पूछते थे । उनकी स्मरण शक्ति भी अद्भुत थी। वे एक बार नाम पूछते तो सदैव स्मरण रखते थे । मध्यप्रदेश और देश के कितने कार्यकर्ता थे जिन्हे ठाकरे जी नाम लेकर ही पुकारते थे । वे विलक्षण विद्वान थे, कौनसा ऐसा विषय था जिसका वे समुचित समाधान न सुझा देते थे । वे मनोविज्ञान के तो मानों विशेषज्ञ थे । मन के भाव जानकर कार्यकर्त्ता को मार्गदर्शन देते थे ।
आपातकाल में मीसा में निरुद्ध रहे । जेल के भीतर सभी कार्यकर्ताओं को ढांढस बँधा कर गीत भजन में लगाना उनकी विशेषता थी । जनसंघ और भारतीय जनता पार्टी के बीच कुल कालखंड जनता पार्टी के रूप में भी बीता । उस काल खंड कुछ अन्य घटक समूहों ने अनावश्यक जनसंघ घटक के लोगों पर दबाना आरंभ किया । तब ठाकरे जी उनकी भी पूरी बातें सुनते और अपने कार्यकर्ताओं को संयम बनाये रखने की सलाह देते । अंततः वह स्थिति अधिक दिन न सकी । इसका आभास ठाकरे जी को था । आपातकाल के बाद 1977 में जनता पार्टी सत्ता में आई। किंतु 1979 से ही ठाकरे जी ने बिना कुछ कहे जनता पार्टी के भीतर जनसंघ घटक के कार्यकर्ताओं को सामाजिक और जनहित के मुद्दों पर सक्रिय कर दिया था । और अंततः 1980 में भारतीय जनता पार्टी अस्तित्व में आई । कौन कौन कार्यकर्त्ता मध्यप्रदेश से मुम्बई अधिवेशन में जायेगा इसका समन्वय स्वयं ठाकरे जी किया और मुम्बई में पाँडालों में ठहरे कार्यकर्ताओं की व्यवस्था को स्वयं जाकर देखा था । 1984 के लोकसभा और 1985 के विधानसभा चुनाव में आशातीत सफलता न मिलने के बाद जनहित के मुद्दों पर आंदोलन की रणनीति ठाकरे जी ने तैयार की । विशेषकर किसानों की समस्या पर आंदोलन का निर्णय ठाकरे जी ने लिया था । और 1990 में भारतीय जनता पार्टी ने पूर्ण बहुमत के साथ सरकार बनाई ।

राजनैतिक उतार चढ़ाव कैसे भी रहे हों पर ठाकरे जी जीवन शैली विचार बीथि में कभी अंतर नहीं आया । वे संघ के प्रचारक रहे हों या भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे हों । सदैव एक सी शैली में जिये । सेवा और संगठन का विस्तार उनका प्रमुख धेय था । उन्होंने कभी प्रशंसा आलोचना अथवा पद पाने, या न पाने की चिंता नहीं की । वे समान गति और समान चिंतन से ही जिये । आज देश में और विशेषकर मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भारतीय जनता पार्टी का जो भी स्वरूप है उसके आधार स्तंभ हैं ठाकरे जी । वे मानों प्राण शक्ति हैं संगठन की । 28 दिसंबर 2003 को उनका शरीर पंचतत्व में विलीन हुआ । पर वे आज भी संगठन में जीवन्त हैं सबकी स्मृतियों में हैं। संगठन की प्राण शक्ति में संवाहित हैं और सदैव रहेंगे ।

गैर ‘गांधियों’ से नफरत रही सोनिया परिवार को

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पंकज कुमार झा

प्रणव दा कोई अकेले नहीं थे। ऐसे तमाम कांग्रेस के नेता जिनका कद बड़ा हो गया, वे नेहरू-फिरोज परिवार के निशाने पर रहे। कांग्रेस के हर बड़े नेता से नफरत सा रहा सोनिया परिवार को। प्रणव मुखर्जी जी को भारत रत्न भी नरेन्द्र मोदीजी ने दिया। आदरणीय मनमोहन सिंह जी के अध्यादेश को उसी हिकारत के साथ फाड़ कर भारत के प्रधानमंत्री का अपमान किया था राहुल गांधी ने जिस हिकारत के साथ आज धर्मग्रंथ जलाये जा रहे हैं।तय मानिए, अगर आज कांग्रेस की सरकार होती न तो दिल्ली में दो गज जमीन तो नसीब होना छोड़िए, दिल्ली के किसी सार्वजनिक शवदाह गृह तक में उनका अंतिम संस्कार तक नहीं होने देती सोनियाजी।ऐसा यूं ही नहीं कह रहा। याद कीजिए, पूर्व प्रधानमंत्री नरसिम्हा रावजी, जिनकी सरकार में वित्त मंत्री रहते मनमोहन सिंहजी ने वैश्विक यश प्राप्त किया था, उनके साथ क्या किया था सोनियाजी ने? वे कांग्रेस मुख्यालय में भी उनका पार्थिव शरीर अंतिम दर्शन हेतु रखने को तैयार नहीं थी। जब अत्यधिक दबाव के कारण नरसिम्हा राव जी को लाना पड़ा, तब मात्र 11 लोग उपस्थित थे, उनके दर्शन के लिए।

कोई पूछेगा आज कांग्रेस से कि उतने बड़े व्यक्तित्व और विद्वान पूर्व प्रधानमंत्री की समाधि कहां है? हैदराबाद में उनके अंतिम संस्कार करने पर क्यों विवश किया गया। केवल इसलिए, क्योंकि सोनिया परिवार बिल्कुल नहीं चाहता था कि कोई और बड़ा कद दिल्ली में दिखे जो राजीव खानदान का न हो। नरसिम्हा राव जी से सोनिया गांधीजी के घृणा का एक कारण यह भी था कि उन्होंने श्रीअयोध्या में लाशें नहीं बिछने दी। केवल प्रणव दा, नरसिम्हा रावजी, मनमोहन सिंह जी का भी प्रश्न नहीं है। याद कीजिए, प्रातः स्मरणीय लाल बहादुर शास्त्री जी के साथ क्या किया गया?भारत रत्न प्रथम राष्ट्रपति, संविधान सभा के अध्यक्ष डा. राजेंद्र प्रसाद जी के साथ जैसा व्यवहार किया नेहरूजी ने उसे जान कर तो आप रो पड़ेंगे। सेवा निवृत्ति के बाद उन्हें दिल्ली में रहने के लिए एक कमरा तक नहीं मिला। भारत का पहला राष्ट्रपति, जो अस्थमा के गंभीर मरीज थे, उन्हें अपना शेष जीवन पटना के सदाकत आश्रम के सीलन भरे कमरे में गुजारना पड़ा। मृत्यु भी उनकी पटना में हुई और दिल्ली में कोई समाधि या संस्कार की व्यवस्था तक नहीं की गयी। नेहरुजी शामिल भी नहीं हुए। तब के राष्ट्रपति राधाकृष्णन जी को भी उन्होंने मना किया था, पर वे नहीं माने थे। क्योंकि सोमनाथ मंदिर जीर्णोद्धार में नेहरुजी के मना करने के बावजूद शामिल हुए थे प्रथम राष्ट्रपति, इसलिए नेहरू की घृणा इस रूप में निकली थी। पोस्ट में वर्णित हर तथ्य के दस्तावेजी प्रमाण हैं।

सरदार पटेल से लेकर नेहरूजी के परिवार से पीड़ित कांग्रेस नेताओं की, कांग्रेस (इंदिरा) के ऐसे दुष्कृत्यों की लंबी सूची है।अगर इनकी सरकार रहते अटलजी का निधन हुआ होता, तो जैसा इनका इतिहास है, उसके अनुसार तो अटलजी को भी दिल्ली में स्थान नहीं मिलता। मनमोहन सिंहजी का महाप्रयाण आज इस तरह समादृत हो रहा है, उन्हें कृतज्ञ राष्ट्र इस संपूर्ण गरिमा, आदर के संग याद कर रहा है, उन्हें अश्रुमिश्रित श्रद्धांजलि मिल रहा है, तो केवल इसलिए क्योंकि आज कथित गांधी परिवार कुछ भी खराब करने की स्थिति में नहीं है। मनमोहन सिंहजी को रिमोट की तरह ही सही, पीएम उन्होंने इसलिए बनाया क्योंकि सिख नरसंहार का कलंक थोड़ा धो कर वह वोट बटोरना चाह रही थी। कांग्रेस और उसके पेड ईको सिस्टम के गाल बजाने, उस थोथे चना के घना बजाने से सच्चाई नहीं बदलेगी। रक्तरंजित ही नहीं, कलंक रंजित भी रहा है नकली गांधियों वाले कांग्रेस का इतिहास!

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