स्वरा का बायसेक्शुअल बम: हंसी, तंज और ट्रोल का तड़का

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मुम्बई। बॉलीवुड की बेबाक बाला स्वरा भास्कर ने एक बार फिर अपने बयान से सोशल मीडिया को हॉट कर दिया। इस बार मंच था एक पॉडकास्ट, जहां वह अपने पति फहद अहमद के साथ बैठी थीं। स्वरा ने बड़े ठाठ से कहा, “हम सब बायसेक्शुअल हैं, हेटरोसेक्शुअलिटी एक थोपी गई विचारधारा है।” और तो और, उन्होंने डिंपल यादव को अपना क्रश बताकर तड़के में मिर्च का डोज और बढ़ा दिया। अब ये सुनकर फहद का चेहरा देखने लायक था-शायद सोच रहे होंगे, “ये तो मेरा उत्तर प्रदेश का सियासी करियर भी डुबो देगी!”

स्वरा का ये बम वाकई कमाल का था। एक तरफ वो मानव जाति की उत्पत्ति और बायोलॉजी पर दार्शनिक ज्ञान बांट रही थीं, दूसरी तरफ डिंपल जी की तारीफ में कसीदे पढ़ रही थीं। सोशल मीडिया पर तुरंत मेला लग गया। कोई बोला, “ये स्वरा तो समाजवादी पार्टी का टिकट पक्का करने की जुगत में है!” तो किसी ने तंज कसा, “बायसेक्शुअल?

ये तो बस स्वरा की नई स्क्रिप्ट का डायलॉग है!” कुछ ने तो इसे वैज्ञानिक दृष्टिकोण कहकर तारीफ भी की, लेकिन ज्यादातर ट्रोल्स ने इसे ‘नया ड्रामा’ करार दिया।

स्वरा की इस बेबाकी का जवाब नहीं। वह बोलती हैं, और दुनिया सुनती है-या तो तालियां बजाती है, या फिर कीबोर्ड पर उंगलियां। लेकिन इस बार मामला थोड़ा अलग था। डिंपल यादव को ‘करीना जैसी हॉट’ कहना और बायसेक्शुअलिटी को सामान्य बताना, ये ऐसा मसाला था जो हर ट्वीट में चटकारे ले रहा था। कुछ ने कहा, ‘स्वरा, तू तो बायोपिक बनाकर ऑस्कर ले जाएगी!’ तो कुछ ने फहद को सलाह दी, ‘भाई, अब तो यूपी में रैली करने से पहले डिंपल जी से इजाजत ले लेना!’

स्वरा भास्कर एक ब्राह्मण परिवार से आती हैं। उनके पिता, उदय भास्कर, तेलुगु मूल के हैं, और उनकी मां, इरा भास्कर, बिहारी मूल की हैं। स्वरा ने उत्तर प्रदेश के मुस्लिम युवक फहद अहमद के साथ निकाह पढ़ा है।

Source: https://x.com/buzz_bihar/status/1957724986933743991

भारत का स्वतंत्रता संघर्ष और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ

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 डॉ. प्रवेश चौधरी

आज देश में एक बार पुनः राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को लेकर खूब चर्चा हो रही है। आज भी देश के कमतर बुद्धि एवं वामी गैंग के साथी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को निशाना बनाने से नही चूक रहे है। बार-बार संघ को लेकर मीडिया डिबेट में प्रश्न  करने लगते है की संघ का आज़ादी की लड़ई  में क्या? योगदान है, तो कभी कहते है संघ तो देश के तिरंगे का ही सम्मान नही करता। ऐसे सब में देश कई राजनीतिक दलो के नेता भी ऐसे ही कुछ प्रश्न खड़े करते है कभी यही दल डॉ०अम्बेडकर और स्वतंत्रता की लड़ाई में उनके योगदान को चिन्हित ही नही करते थे, उन्हें केवल ओर केवल दलित नेता के रूप में दिखाते थे।  

आज वही दल राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के योगदान पर प्रश्न खड़े कर रहे है। ऐसे में मुझे जैसे कार्यकर्ता के मन में आता है की समाज को ये ज्ञात हो की संघ ने आज़ादी की लड़ाई में भी बढ़-चढ़ कर भाग लिया वही तिरंगे का सम्मान भी उस दिन से करत आ रहा जब से कांग्रेस ने इस तिरंगे को मान्यता दी थी। हम सभी जानते है की राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ दुनिया का सबसे बड़ा स्वयंसेवी संगठन है देश और समाज में सबसे ज़्यादा स्वाकरिता भी संघ और उसके स्वयंसेवकों की ही है। 1925 में जिस संघ का बीज रोपण ही भारत राष्ट्र को पुनः उसके विश्व में गुरु के रूप स्थापित करना था, जिसके एक-एक कार्यकर्ता का ध्येय समरस भारत सशक्त भारत निर्माण हो ऐसा ही हो, जो सदैव  संघ गीत गुन गुनाते हुए कहता है की “देश हमें देता है सब कुछ हम भी तो कुछ देना सीखे”। जो कार्यकर्ता सदैव संघ की प्रार्थना में कहता “ नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमेत्वया हिन्दुभूमे सुखं वर्धितोहम्।महामङ्गले पुण्यभूमे त्वदर्थे। पतत्वेष कायो नमस्ते नमस्ते” इसके अर्थ को देखे तो ज्ञात होता है की एक संघ कार्यकर्ता प्रार्थना में करता क्या है। 

हे वात्सल्यमयी मातृभूमि, तुम्हें सदा प्रणाम! इस मातृभूमि ने हमें अपने बच्चों की तरह स्नेह और ममता दी है। इस हिन्दू भूमि पर सुखपूर्वक मैं बड़ा हुआ हूँ। यह भूमि महा मंगलमय और पुण्यभूमि है। इस भूमि की रक्षा के लिए मैं यह नश्वर शरीर मातृभूमि को अर्पण करते हुए इस भूमि को बार-बार प्रणाम करता हूँ। अगली ही पंक्ति में कहा जाता है की “त्वदीयाय कार्याय बध्दा कटीयम्” आपके ही कार्य के लिए हम कटिबद्ध हुवे है। जिस संगठन का निर्माण ही भारत की पुरातन हिंदू संस्कृति को पुन: जागृत कर भारत के ज़न मानस के भीतर राष्ट्र गौरव का जागरण कर एक सशक्त राष्ट्र का निर्माण करना भला हो वो संगठन कैसे देश की आज़ादी की लड़ाई से अपने को भिन्न कर सकता है। हम देखे की राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक डॉ केशव बलिराम हेडगेवार अपने बाल्य काल से ही एक राष्ट्र भक्त थे। उनके विद्यालय में ब्रिटेन की रानी के जन्मदिन के उपलक्ष्य में बटने वाले मिठाई को लेने से माना कर देते है, जिसके लिए उन्हें विद्यालय प्रबंध समिति द्वारा दंड भी दिया जाता है। अपनी युवा अवस्था में कलकता में पढ़ते हुए वे अनुशीलन समिति के सक्रिय सदस्य है, अंग्रेज़ी पुलिस उन पर नज़र रखे है। महाराष्ट्र में वे कांग्रेस के बड़े नेता है नागपुर में हो रहे कांग्रेस अधिवेशन की प्रबन्ध समिति में है वही स्वागत  समिति के सचिव है। 

1921 में हेडगेवार असहयोग आंदोलन में शामिल हुए जिस कारण उन्हें एक वर्ष के करावास में रहना पड़ा। जब हेडगेवार जी ज़ैल से निकल कर आए तो तमाम कांग्रेस नेताओ ने उनका स्वागत  किया, उनके स्वागत हेतु बुलाई सभा में मोतीलाल नेहरू जैसे दिग्गज कांग्रेसी नेता भी थे। ज़ैल में किए उनके चिंतन ने उनके मन में ये विचार जागृत किया की बिना संगठित हिन्दू  शक्ति के भारत सशक्त नही हो सकता। हमारी प्रतंत्रता का कारण हमारा एक संगठित शक्ति ना होना है,इस लिए 1925 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की गई। 

हेडगेवार जी जहाँ एक और संघ की शाखा के माध्यम से युवा शक्ति के बीच राष्ट्र जागरण का कार्य कर रहे थे वही आज़ादी की लड़ाई में वे शामिल होते थे एवं तमाम संघ के कार्यकर्ता भी गाँधी जी एवं कांग्रेस के आवहन का अक्षरशः मानते हुए उन अभियानो में शामिल होते थे। 1930 में गाँधी जी द्वारा नामक सत्यग्रह में कुछ संघ कर्यकर्ताओ के साथ डॉ हेडगेवार भी शामिल हुए जिसमें उन्हें 9 महीने का कारावास का दंड भी मिला। 1928 में भगत सिंह, राजगुरु एवं सुखदेव को उमरेड नागपुर के संघ कार्यकर्ता भैय्या जी ढानी के यहाँ रुकने की व्यवस्था संघ प्रमुख हेडगेवार जी ने ही की थी। हेडगेवार जी को वन्दे  मातरम कहने पर स्कूल से निकल दिया गया था अपने युवा अवस्था में अनुशीलन समिति के सक्रिय सदस्य रहे। इतना ही नही  1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में संघ बहुत ही सक्रिय भूमिका रही 27-28 अप्रेल 1942 को संघ के तत्कालीन प्रमुख गुरु गोलवलकर ने कार्यकर्ताओं को संदेश देते हुए कहा की “ वर्तमान सरकार को स्वार्थवश यथासम्भव भरपूर सहयात देने वाले व्यक्तियों की हम निंदा करते है, वही अपने दूसरे भाषण में उन्होंने स्वयंसेवकों को साफ़ निर्देश दिए की “ स्वयंसेवकों को देश के उदेश्य के लिए अपने प्राणो के बलिदान के लिए तैयार रहना चाहिए ये सब 28/8/1942 अंग्रेज़ी सरकार की ख़ुफ़िया रिपोर्ट में उद्धृत है। जिस उत्तरप्रदेश में संघ को लेकर अनर्गल अलाप हुआ वही सैकड़ों कार्यकर्ताओं ने अपना बलिदान दिया। उत्तरप्रदेश मेरठ के मवाना तहसील जहाँ अंग्रेज़ी पुलिस ने निहाते संघ के कार्यकर्ताओं पर लाढ़ी- ड़डो से मारा बाद में गोलियाँ चलाई  गई जिसके परिणाम स्वरूप सैकड़ों कार्यकर्ता का बलिदान हुआ। जो कांग्रेस कहती है संघ का आज़ादी की लड़ाई में क्या योगदान तो इतिहास के पन्ने पलटे अरुणा आसाफली एवं जयप्रकाश जी को दिल्ली के उस समय के संघचालक लाला हंसराज गुप्ता जी ने ही अपने यहाँ छुपा रखा था। जिस सावरकर को लेकर कांग्रेस जन आलोचना करते है उनकी रिहाई को लेकर स्वयं महात्मा गाँधी कई बार चिट्ठी लिखते है, इतना ही नही इंदिरागाँधी जी सावरकर को भारत की आज़ादी के महान सपूत कहती है।

डॉ. अम्बेडकर, महात्मा गाँधी, सुभाष चंद्र बोस आदि संघ की शाखा पर गए, शिविर में गये वही भारत के पहले प्रधानमंत्री जवहारलाल नेहरू ने संघ की सहायता से कश्मीर जैसी समस्या का निदान किया एवं चीन युद्ध में संघ कर्यकर्ताओ के योगदान को कौन नकार सकता है इसी का परिणाम है की 1963 की गणतंत्र दिवस परेड में संघ ने भी भाग लिया। उत्तरप्रदेश के मेरठ की मवाना तहसीलमें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ताओं पर पुलिस ने लाढ़ी  चार्ज कर दी, गोली चलाई, जिसमें कई कार्यकर्ता गम्भीररूप से घयाल हुए ।मैं पहले ही कह रहा इस आंदोलन में समाज के तमाम संगठनों ने भाग लिया, जिसमें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की विशेष भूमिका रही है। इस प्रकार ये आंदोलन 1942 के अंत तक चला सैकड़ों लोगों ने इसमें अपनी शहादत दी परंतु अंग्रेज़ी शासन कीनींव ज़रूर हिला कर रखा दी।1942 में ही पटना में  तिरंगा लहराने के जुर्म में बाला जी राय पुरकर को अंग्रेजो ने गोली मार दी जो संघ के कार्यकर्ता थे वही दादा नायक 1942 के आन्दोलन  में शामिल होने के कारण अंग्रेज़ी सरकार  द्वारा फाँसी की सजा दी गई। 1930 में संघ की प्रत्येक शाखा पर तिरंगा लहराया गया, ये भी इतिहास में इंगित है की जिस दिन पहली बार तिरंगा लहराया गया उस दिन भी किशन सिंह राजपूत ने ही इस पुनीत कार्य में सहयोग किया जिसकी प्रशंसा स्वयं नेहरू ने की ये कार्यकर्ता भी संघ का स्वयंसेवक था। संघ समाज स्वीकारीता को देखते हुए विवेकानंद मेमोरीयल एवं मूर्ति के  विमोचन कार्यक्रम में संघ के वरिष्ठ कार्यकर्ता एकनाथ रानाडे जी के कहने पर इंदिरा गाँधी जी स्वयं शामिल हुई।  

जयप्रकाश आंदोलन को जन-जन तक ले जाने का कार्य किसने किया तो वो अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद था, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ था।आज भी देश में कितने ही सेवा कार्यों में संघ लगा है,अभी हाल के कोरोना संकट के दोरान संघ के द्वारा किए सेवा कार्यों ने उसकी स्वीकारित को और अधिक बढ़ा दिया है।इस सबके बावजूद समाजवादी समेत अन्य दल राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को कटघरे में खड़ा करते है।

प्लास्टिक से जकड़ा भारत

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दिल्ली की जाम नालियाँ, मुंबई के कचरे से पटे समुद्रतट, हिमालय की पगडंडियों पर बिखरे रैपर, वाराणसी और वृंदावन के घाटों पर तैरती बोतलें और माला…आज भारत का हर कोना प्लास्टिक से घिरा है। यह जहरीला बोझ मिट्टी को बंजर बना रहा है, नदियों का दम घोंट रहा है, जानवरों की जिंदगी छीन रहा है और पवित्र स्थलों की आभा धूमिल कर रहा है।
पहाड़, जो कभी निर्मल और शांत थे, अब कचरे के ढेरों से सजे दिखते हैं। तालाब और कुंड प्लास्टिक की मालाओं से भरे हैं, और समुद्रतट पर सीपियों की जगह अब पैकेजिंग व रैपर चमकते हैं। एकबारगी इस्तेमाल होने वाला यह प्लास्टिक सिर्फ कचरा नहीं है—यह हमारे भोजन, हवा और यहां तक कि खून में भी घुस चुका है।
प्लास्टिक प्रदूषण अब सिर्फ पर्यावरणीय समस्या नहीं, बल्कि अस्तित्व का संकट है। जिनेवा में प्लास्टिक पर वैश्विक संधि को लेकर तीन साल चली छह दौर की बातचीत बेनतीजा रही। उत्पादन घटाने की मांग करने वाले और सिर्फ कचरा प्रबंधन पर जोर देने वाले देशों के बीच खाई गहरी होती गई। इसका सबसे बड़ा नुकसान भारत जैसे देशों को हो रहा है, जहां आबादी विशाल है और कचरा प्रबंधन बेहद कमजोर।
भारत रोज़ाना करीब 26,000 टन प्लास्टिक कचरा पैदा करता है। इसमें से आधे से ज्यादा गलत तरीके से निपटाया जाता है—नालियों में, खाली ज़मीन पर या सीधे नदियों और समुद्र में। नतीजा यह कि भारत हर साल लगभग 80 लाख मीट्रिक टन प्लास्टिक महासागरों में फेंक देता है।
7,500 किलोमीटर लंबी तटरेखा पर बसे मछुआरे समुदाय इसका सीधा खामियाजा भुगत रहे हैं। अरब सागर से बंगाल की खाड़ी तक, कछुए, मछलियां और समुद्री पक्षी प्लास्टिक में उलझे या अपचनीय बोतलों-थैलियों से भरे पेट के साथ मृत पाए जा रहे हैं। माइक्रोप्लास्टिक मछलीपालन को तबाह कर रहा है और खाद्य सुरक्षा पर सीधा खतरा खड़ा कर रहा है।
भारत पर दबाव है कि वह उत्पादन घटाने की दिशा में कदम बढ़ाए। लेकिन यह आसान नहीं। लाखों लोग इस उद्योग पर आश्रित हैं, और भारत जैसा मूल्य-संवेदनशील बाज़ार अभी सस्ते विकल्पों के बिना जी नहीं सकता। रिवर एक्टिविस्ट पद्मिनी अय्यर कहती हैं, “प्लास्टिक उद्योग रोज़गार का बड़ा स्रोत है। अगर उत्पादन पर अचानक रोक लगी, तो सामाजिक-आर्थिक संकट गहरा जाएगा।”
फिर भी, भारत ने कुछ कोशिशें की हैं। स्वच्छ भारत मिशन, कुछ राज्यों में एकबारगी प्लास्टिक पर आंशिक प्रतिबंध, और समुद्रतट सफाई अभियान—ये सब आशा जगाते हैं, लेकिन नाकाफी हैं। समस्या है कमजोर ढांचा, असंगत प्रवर्तन और व्यापक रीसाइक्लिंग सिस्टम का अभाव। एक्टिविस्ट चतुर्भुज तिवारी बताते हैं, “देश में सिर्फ 60% प्लास्टिक कचरा ही रीसाइक्लिंग तक पहुंच पाता है। बाकी नालियों में सड़ता है या जलाकर जहरीला धुआं बन जाता है।”
जिनेवा की विफल वार्ता ने साफ कर दिया है कि भारत को वैश्विक सहमति का इंतजार नहीं करना चाहिए। मुक्ता गुप्ता, सोशल एक्टिविस्ट, कहती हैं: “अगर हमें अपनी नदियों, पहाड़ों और समुद्रों को बचाना है, तो हमें खुद निर्णायक कदम उठाने होंगे। कचरे का पृथक्करण अनिवार्य करना होगा, आधुनिक रीसाइक्लिंग तकनीकों में निवेश करना होगा और जैव-अवक्रमणशील विकल्पों को सुलभ बनाना होगा।”
समुद्रतट सफाई जैसे अभियान प्रतीकात्मक हैं। असली बदलाव तभी आएगा जब प्रणालीगत सुधार होंगे—नगर निकायों से लेकर उद्योग तक सबको इसमें भागीदार बनाना होगा। भारत के अनौपचारिक कचरा बीनने वाले, जो रीसाइक्लिंग का बड़ा हिस्सा संभालते हैं, अभी तक सुरक्षा, वेतन और सम्मान से वंचित हैं। उन्हें औपचारिक ढांचे में लाना ही होगा।
एनवायरनमेंटलिस्ट डॉ. देवाशीष भट्टाचार्य चेतावनी देते हैं, “मछलियों और समुद्री नमूनों में माइक्रोप्लास्टिक मिल चुका है। यह हमारी थाली तक पहुंच रहा है। स्वास्थ्य पर इसके दीर्घकालिक खतरे अभी पूरी तरह सामने नहीं आए हैं, लेकिन कैंसर, हार्मोनल गड़बड़ियों और प्रतिरोधक क्षमता पर असर की आशंका गहरी है।” आर्थिक दृष्टि से भी संकट बड़ा है। तटीय राज्यों की आजीविका—मत्स्य उद्योग और पर्यटन—दोनों ही खतरे में हैं। कौन विदेशी पर्यटक गंदगी और कचरे से पटे समुद्रतट देखना चाहेगा?
पब्लिक कॉमेंटेटर प्रो. पारस नाथ चौधरी मानते हैं कि समाधान दोतरफा है: “हमें उत्पादन भी घटाना होगा और प्रबंधन भी सुधारना होगा। दोनों में संतुलन लाए बिना भारत न तो अपने लोगों की रक्षा कर पाएगा, न ही वैश्विक स्तर पर उदाहरण बन पाएगा।” आज की हकीकत यह है कि प्लास्टिक प्रदूषण ने भारत के पर्यावरण, संस्कृति, अर्थव्यवस्था और स्वास्थ्य—चारों पर शिकंजा कस लिया है।
अगर अब निर्णायक कदम नहीं उठाए गए तो नदियाँ, समुद्र, पहाड़ ही नहीं—भारत का भविष्य भी इस प्लास्टिक के बोझ तले दब जाएगा।

मुख्यमंत्री श्री भजनलाल शर्मा की केंद्रीय मंत्री श्री मनोहर लाल खट्टर से मुलाकात।

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दिल्ली । राजस्थान के मुख्यमंत्री श्री भजनलाल शर्मा ने बुधवार को नई दिल्ली में केंद्रीय ऊर्जा, आवासन एवं शहरी कार्य मंत्री श्री मनोहर लाल खट्टर से उनके आवास पर भेंट कर राजस्थान में ऊर्जा और आवासन से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दों पर विस्तार से चर्चा की।

श्री शर्मा ने केंद्रीय मंत्री से आग्रह किया कि राजस्थान ने नवीकरणीय ऊर्जा निकासी की योजना बनाई है। इस योजना में शामिल परियोजनाओं को ग्रीन एनर्जी कॉरिडोर- थर्ड में शामिल कर केंद्र की तरफ से अधिकतम अनुदान शीघ्र स्वीकृत किया जावे। श्री शर्मा ने कहा कि राजस्थान में नवीकरणीय ऊर्जा के क्षेत्र में निवेश के महत्वपूर्ण प्रस्ताव प्राप्त हुए हैं इन प्रस्तावों के क्रियान्वयन हेतु नवीकरणीय ऊर्जा योजनाओं से ऊर्जा की निकासी हेतु सुदृढ़ पारेषण तंत्र की आवश्यकता है जिसके लिए अधिकतम केंद्रीय सहयोग आवश्यक है।

*जयपुर मेट्रो फेज- 2 की स्वीकृति का किया आग्रह।*

मुख्यमंत्री श्री शर्मा ने केंद्रीय मंत्री से मुलाकात के दौरान आग्रह किया कि जयपुर मेट्रो रेल फेज- 2 का ज्वाइंट वेंचर (50:50)के तहत निर्माण की विस्तृत कार्य योजना को जल्द स्वीकृति प्रदान की जावें। उन्होंने कहा कि इस महत्वपूर्ण प्रस्तावित परियोजना के लिए केंद्रीय अंशदान की स्वीकृति से जयपुर वासियों के लिए एक सुदृढ़ , सुरक्षित सार्वजनिक परिवहन की सुविधा प्रदान करने के लक्ष्य को जल्द हासिल किया जा सकेगा।

*नॉन मिलियन प्लस शहरों के लिए केंद्रीय सहयोग पर चर्चा।*

मुख्यमंत्री श्री शर्मा ने केंद्रीय मंत्री से मुलाकात के दौरान 15वें वित्त आयोग के अंतर्गत राजस्थान के नॉन मिलियन प्लस शहरों की नगरीय निकायों को दिए जाने वाले केंद्रीय सहयोग पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने कहा कि इन नगरीय निकायों को प्रदान किए जाने वाले वित्तीय सहयोग से गतिमान विकास कार्यों को जल्द से जल्द पूरा किया जा सकेगा।

मुख्यमंत्री श्री शर्मा ने केंद्रीय मंत्री का ध्यान आकर्षित करते हुए कहा कि राजस्थान सरकार द्वारा एशियन डेवलपमेंट बैंक एवं वल्ड बैंक के संयुक्त वित्त पोषण के माध्यम से संचालित आर यू आई डी पी पांचवें चरण की परियोजना तैयार कर भारत सरकार के समक्ष प्रस्तुत की है जिस पर केंद्रीय मंत्रालय का सकारात्मक सहयोग आवश्यक है। उन्होंने कहा कि राजस्थान सरकार इस योजना के माध्यम से जलापूर्ति, अपशिष्ट जल प्रबंधन, ठोस अवशिष्ट प्रबंधन, शहरी यातायात सुधार, बाढ़ प्रबंधन और विरासत संरक्षण सहित प्रदेश के शहरों के सर्वांगीण विकास के लक्ष्य को जल्द से जल्द पूर्ण करने के लिए प्रतिबद्ध है। उन्होंने केंद्रीय मंत्री से आग्रह किया कि इस परियोजना की शीघ्र स्वीकृति से राज्य के चहुमुखी विकास में गति आएगी तथा प्रदेश की जनता लाभान्वित होगी।

इस अवसर पर मुख्यमंत्री ने कहा कि राजस्थान में ऊर्जा उत्पादन की अपार संभावनाएं व्याप्त है जिनके सकारात्मक दोहन और उपयोगिता बढ़ाने के साथ-साथ प्रदेश के शहरी क्षेत्रों में आधारभूत संरचना के विकास के लिए केंद्रीय सहयोग आवश्यक है इस पर केंद्रीय मंत्री द्वारा राजस्थान को हर संभव मदद का आश्वासन दिया है।

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