उर्मिला, राम के वनवास का हिस्सा भी नहीं…

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भोपाल । राम वन गए। अयोध्या रोई। दशरथ टूट गए। राजमहल की दीवारें करुणा से कांप उठीं। माताओं की आंखें सूख गईं। कैकेयी इतिहास के कटघरे में खड़ी कर दी गईं। सीता त्याग की प्रतिमा बनकर राम के साथ चल पड़ीं। लक्ष्मण भ्रातृभक्ति के अमर प्रतीक बन गए।

लेकिन उसी अयोध्या में एक स्त्री और थी… जो न वन गई, न इतिहास में ठीक से दर्ज हुई…*वह उर्मिला थीं।*

रामायण जब भी सुनाई जाती है, लोग राम के वनवास पर रोते हैं, सीता की अग्निपरीक्षा पर विचलित होते हैं, लक्ष्मण की सेवा और समर्पण पर अभिभूत हो जाते हैं। लेकिन बहुत कम लोग उस स्त्री को याद करते हैं, जिसने इन सबके बीच सबसे लंबा, सबसे मौन और सबसे एकाकी वनवास जिया।

*उर्मिला राम के वनवास का हिस्सा भी नहीं थीं… फिर भी सबसे अधिक वनवास उन्हीं ने सहा।* क्योंकि वन केवल जंगलों में नहीं होता। वन वहां भी होता है, जहां प्रतीक्षा हो। जहां विरह हो। जहां हर रात किसी की अनुपस्थिति सिरहाने बैठकर रोती हो। जहां हर सुबह किसी की आवाज़ के बिना खुलती हो। जहां जीवन चलता तो रहे, मगर भीतर सब थम चुका हो। अयोध्या के राजमहल में रहकर भी वह भीतर से वनवासी थीं। हर रात उन्होंने स्मृतियों का एक वन पार किया होगा। हर सुबह उन्होंने अपने टूटे हुए हृदय को फिर से समेटा होगा।

लक्ष्मण जब राम के साथ वन जाने के लिए खड़े हुए होंगे, तब इतिहास ने उनकी निष्ठा देखी। लेकिन उसी क्षण उर्मिला के भीतर क्या टूटा होगा, इसका कोई श्लोक नहीं लिखा गया। किसी कवि ने नहीं लिखा कि उस रात उर्मिला ने कितना रोया होगा।

किसी महाकाव्य ने यह नहीं बताया कि चौदह वर्षों की उस पहली रात उन्होंने अपने आंसुओं को कैसे चुप कराया होगा। किसी ने यह नहीं पूछा कि जिस स्त्री का पति अभी-अभी उससे दूर गया हो, वह अगली सुबह कैसे उठी होगी।

उर्मिला ने लक्ष्मण का हाथ पकड़कर यह नहीं कहा “मुझे भी साथ ले चलिए।” उन्होंने कोई प्रश्न नहीं किया। कोई प्रतिकार नहीं किया। कोई शिकायत नहीं की। और शायद यहीं से उनका तप शुरू होता है।

सीता वन गईं, इसलिए संसार ने उनके त्याग को देखा। उर्मिला महल में रहीं, इसलिए उनके दुःख को किसी ने देखा ही नहीं। लेकिन कभी-कभी पीछे छूट जाना, साथ चलने से कहीं अधिक कठिन होता है।

रामचरितमानस में तुलसीदास लिखते हैं…
“रघुकुल रीति सदा चलि आई,
प्राण जाए पर वचन न जाई।”
इस मर्यादा की रक्षा में राम वन गए। लक्ष्मण सेवा में गए।
*लेकिन उर्मिला…?*
उर्मिला ने भी उसी मर्यादा के लिए अपने समस्त स्त्रीत्व, अपने प्रेम, अपने यौवन और अपने अधिकारों का मौन समर्पण कर दिया। उन्होंने पति को रोका नहीं। क्योंकि वह जानती थीं कि लक्ष्मण केवल उनके पति नहीं, राम के अनुज भी हैं। धर्म के प्रहरी भी हैं। मर्यादा के सैनिक भी हैं। परंतु क्या कोई समझ सकता है कि उस स्त्री के भीतर कैसी आंधियां चली होंगी, जिसने अपने सुहाग को चौदह वर्षों के लिए स्वयं अपने हाथों से वन की ओर विदा किया हो?

उर्मिला ने लक्ष्मण को जाने दिया… लेकिन स्वयं वहीं ठहर गईं, जहां समय ठहर जाता है। लक्ष्मण वन में जागते रहे। लोककथा कहती है कि उर्मिला ने उनकी नींद अपने हिस्से में ले ली थी।
यह कथा चाहे प्रतीक हो, किंतु उसके भीतर छिपा सत्य बहुत गहरा है। क्योंकि हर महान पुरुष के पीछे अक्सर एक ऐसी स्त्री होती है, जो स्वयं अंधेरे में रहकर उसके भीतर का प्रकाश बचाए रखती है।

यदि लक्ष्मण चौदह वर्षों तक राम की सेवा में अडिग खड़े रह सके, तो उसके पीछे उर्मिला का मौन त्याग भी था। क्योंकि जिसे घर की चिंता न हो, जिसे पीछे छूटे रिश्तों की बेचैनी न सताए, वही पूरी निष्ठा से धर्मयुद्ध लड़ पाता है।

लक्ष्मण को *’कालजयी लक्ष्मण’* बनाने में उर्मिला का योगदान उतना ही बड़ा है, जितना दीपक में बाती का होता है। लौ दिखाई देती है, बाती नहीं। प्रकाश की प्रशंसा होती है, धीरे-धीरे जलती हुई सूत की डोरी का कोई स्मरण नहीं करता। *उर्मिला वही अदृश्य बाती हैं।*

उन्होंने युद्ध नहीं लड़ा… फिर भी हर दिन भीतर एक युद्ध जिया। उन्होंने कोई अग्निपरीक्षा नहीं दी, फिर भी चौदह वर्षों तक हर रात अपने हृदय को अग्नि में तपाया।

रामायण का प्रत्येक पात्र किसी न किसी रूप में गौरव प्राप्त करता है। राम मर्यादा पुरुषोत्तम कहलाए। सीता त्याग और पवित्रता की प्रतिमा बनीं। भरत भ्रातृप्रेम के शिखर बने। हनुमान भक्ति के प्रतीक बने। लक्ष्मण सेवा और समर्पण के अमर आदर्श बने।
पर उस स्त्री का क्या, जिसने सबसे लंबा विरह जिया? उन्हें इतिहास ने बस ‘लक्ष्मण की पत्नी’ कहकर छोड़ दिया। किसी ने यह नहीं कहा कि वह विरह की सबसे बड़ी तपस्विनी थीं। किसी ने यह नहीं लिखा कि चौदह वर्षों तक उन्होंने अपने अकेलेपन को किस धैर्य से जिया।

लेकिन किसी रात, किसी एकांत क्षण में यदि कोई हृदय सचमुच विरह की तपस्या को समझना चाहेगा, तो उसे अयोध्या के किसी मौन कक्ष में बैठी उर्मिला अवश्य दिखाई देंगी…दीपक की उस अदृश्य बाती की तरह, जो स्वयं जलती रही… ताकि दूसरों का प्रकाश अमर बना रहे।

उन्होंने न धन मांगा। न यश। न स्मृति। न सम्मान। उन्होंने बस प्रेम निभाया। और प्रेम का सबसे ऊंचा रूप वही होता है, जहां अधिकार नहीं, समर्पण बचा रह जाए। उर्मिला की करुणा यह नहीं थी कि उनके पति दूर चले गए। उनकी करुणा यह थी कि उन्हें अपने दुःख को भी मौन रखना पड़ा। अयोध्या को संभालना था। माताओं को सहारा देना था। राजमहल की मर्यादा को टूटने नहीं देना था।
वह टूटी होंगी…
लेकिन चुपचाप।
वह रोई होंगी…
लेकिन अकेले।
वह जली होंगी…
लेकिन बिना धुएं के।
इतिहास तलवार उठाने वालों को याद रखता है।
लेकिन जो लोग भीतर-ही-भीतर जलकर दूसरों को प्रकाश देते हैं, वे अक्सर इतिहास के हाशिए पर छूट जाते हैं। *उर्मिला वही हाशिए पर छूटी हुई ज्योति हैं।* और शायद इसीलिए उनका त्याग सबसे बड़ा है। क्योंकि उन्होंने किसी विजय की आकांक्षा नहीं की। किसी प्रशंसा की इच्छा नहीं की। उन्होंने केवल इतना चाहा कि लक्ष्मण अपने धर्म से विचलित न हों।

रामायण/राम चरित मानस यदि त्याग का महाकाव्य है, तो उर्मिला उसका सबसे शांत, सबसे उपेक्षित और सबसे करुण अध्याय हैं।

उन्होंने कोई प्रश्न नहीं किया।
कोई प्रतिकार नहीं किया।
बस अपने हिस्से का प्रेम, अपने हिस्से का जीवन और अपने हिस्से का स्त्रीत्व चुपचाप धर्म के चरणों में समर्पित कर दिया। शायद इसलिए उर्मिला भारतीय नारी की वह अनकही पीड़ा हैं, जो साथ न चलकर भी सबसे अधिक साथ निभाती है।

रामायण के सबसे लंबे विरह की कोई चौपाई नहीं लिखी गई… क्योंकि वह उर्मिला की आंखों में मौन रह गई।

भाजपा समग्र हिंदुत्व पर ही लड़ेगी उत्तर प्रदेश की चुनावी लड़ाई

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लखनऊ । पश्चिम बंगाल की विजय से उत्साहित भारतीय जनता पार्टी ने उत्तर प्रदेश में 2027 की चुनावी तैयारियां प्रांरभ कर दी हैं। बंगाल से स्पष्ट जनादेश आ जाने के बाद भाजपा की स्थिति मजबूत हो गई है। समाजवादी पार्टी एसआईआर, चुनाव आयोग व ईवीएम के खिलाफ वातावरण बनाने में लग गई है। ऐसा प्रतीत हो रहा है कि बंगाल में टीएमसी की हार के बाद यूपी में विरोधी दल अभी से पराजय का बहाना खेाज रहे हैं जबकि भारतीय जनता पार्टी फ्रंटफुट पर आकर बल्लेबाजी कर रही है। भाजपा ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में ही चुनाव मैदान में उतरने का निर्णय किया है और संगठन को उसी के अनुसार तैयार किया जा रहा है। बंगाल की की ही तरह भाजपा ने उत्तर प्रदेश में अपनी रणनीति को धार देना आरम्भ कर दिया है।
बंगाल के चुनाव प्रचार में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री येागी आदित्यनाथ की जनसभाओं में भारी भीड़ आ रही थी तथा उनका स्ट्राइक रेट 90 प्रतिशत रहा है। यही कारण है कि भाजपा अध्यक्ष नितिन नवीन ने उन्हें आगामी विधान सभा चुनावों के लिए भाजपा का चेहरा घोषित कर दिया है।

बंगाल में नयी सरकार के शपथ ग्रहण के बाद ही प्रदेश में बहुप्रतिक्षित मंत्रिपिरिषद का विस्तार हो गया है। भाजपा ने इस मंत्रिमंडल विस्तार के सहारे जातीय व क्षेत्रीय संतुलन साधने का प्रयास किया है। सपा की पीडीए की धार को कुंद करने के लिए मंत्रिमंडल विस्तार में पिछड़े और दलित समाज के प्रतिनिधियों को कहीं अधिक प्रतिनिधित्व दिया है। भाजपा ने ओबीसी समाज से तीन और मंत्री बनाने के साथ ही दो को प्रोन्नत भी किया गया है। दलित समाज से भी दो मंत्री बनाए गए हैं। पूरब से पश्चिम तक को साधा गया है। मंत्रिमंडल विस्तार के साथ ही मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ सहित 60 मंत्री हो गए हैं। जिसमें 60 प्रतिशत ओबीसी व दलित समाज है। क्षत्रिय व वैश्य समाज की भगीदारी यथावत है । यूजीसी के कारण सवर्ण समाज की नाराजगी को दूर करने के लिए मनोज पांडेय को मंत्री बनाया है वह सपा से भाजपा में आए थे। मंत्रिपरिषद मे पहली बार वाल्मीकि और पासी समाज के सदस्यों को प्रतिनिधित्व दिया गया है, सपा और बसपा दोनो की ही नजर इस वोट बैंक पर रहती है।

भाजपा ने इस मंत्रिपरिषद विस्तार के माध्यम से समग्र हिंदुत्व के एजेंडे को धार देने का प्रयास किया है। बिना कोई बड़ा बदलाव किए जिस प्रकार मंत्रिमंडल विस्तार हुआ है और जिन चेहरों को शामिल किया गया है वह बताता है कि भाजपा ने विधानसभा चुनाव में भरोसे और एकजुटता के संदेश के साथ आगे बढ़ने का निर्णय कर लिया है। मंत्रिमंडल विस्वार में निष्ठा को पुरस्कार व हिंदू एकता का फार्मूला दिखाई पड़ रहा है। भाजपा ने यह संदेश देने का स्पष्ट प्रयास किया है कि भाजपा ही पूरे हिंदू समाज का प्रतिनिधित्व करती है। लोकसभा चुनाव मे विपक्ष ने भले ही संविधान बदलने और आरक्षण पर भ्रम फैलाकर बढ़त बना ली हो किंतु अब भजपा खुद को ऐसी पार्टी के रूप मे प्रस्तुत कर रही है जो विभिन्न जातियों की भागीदारी के साथ व्यापक हिंदू एकता के भाव से आगे बढ़ रही है।

मंत्री परिषद व संगठन विस्तार के साथ ही अब प्रदेश सरकार अनेक योजनाओं के शिलान्यास व लोकार्पण व्यापक सिलसिला आरम्भ करने जा रही है, जिनमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर अनेक केंद्रीय मंत्री तक शामिल होंगे। अगर बंगाल की ही तरह यूपी का हिंदू एकजूट हो गया तो सपा का पीडीए ध्वस्त हो जाएगा अतः आने वाले समय में सपा हिन्दू समाज को तोड़ने वाले मसले उभार सकती है।

कट्टरपंथी और अलगाववादी शक्तियाँ अब काँग्रेस सहित कुछ विपक्षी दलों के झंडे तले

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भोपाल । हाल ही संपन्न पाँच राज्यों के विधानसभा चुनाव परिणामों में संपूर्ण भारत केलिये सतर्कता की एक गहरी दस्तक मिली है। यह दस्तक सभी कट्टरपंथियों, अलगाववादी और सनातन विरोधी शक्तियों की एकजुट होकर अपने समर्थक मतदाताओं का ध्रुवीकरण करने की है। इसमें एक चिंता की बात यह भी है कि इन शक्तियों ने काँग्रेस सहित कुछ विपक्षी दलों में अपना महत्वपूर्ण स्थान बना लिया है। इसकी झलक इन पाँचों राज्यों में काँग्रेस, तृणमूल-कांग्रेस सहित इन दलों के विजयी उम्मीदवारों और केरल में सत्तारूढ़ होने जा रहे गठबंधन से स्पष्ट समझा जा सकता है।

इन पाँचों राज्यों के विधानसभा चुनाव परिणाम अनुमान के अनुरूप हैं। असम, प. बंगाल और पांडिचेरी में भाजपा और केरल में काँग्रेस गठबंधन सत्तारुढ़ होगा। जबकि तमिलनाडु के मतदाताओं ने एक नये राजनैतिक दल को अपना समर्थन दिया। यह इन परिणामों का एक पक्ष है। दूसरा पक्ष भारत की सभी राष्ट्रवादी शक्तियों के माथे पर चिंता की एक लकीर खींच रहा है। इन परिणामों ने भविष्य के भारत केलिये एक डरावनी दस्तक दी है। यह दस्तक कट्टरपंथी मुस्लिम शक्तियों और अलगाववादियों की एकजुट होकर अपने समर्थक मतदाताओं को एकजुट करने की है। इसे समझने केलिये इन पाँचों राज्यों का सामाजिक और सांस्कृतिक स्वरूप देखें। भाव भाषा और जिवन शैली की दृष्टि से केरल, तमिलनाड और प बंगाल-असम में कोई एकरूपता नहीं है। लेकिन सभी राज्यों में मुस्लिम कट्टरपंथियों और अलगाववादी वोटों के धुर्वीकरण दिशा एक ही रही है। इसमें दूसरी चिंताजनक बात यह है कि इन्होंने काँग्रेस जैसे एक बड़े दल में अपनी गहरी पैठ बना ली है। अब यह सत्ता प्राप्त करने केलिये काँग्रेस की अपनी ललक रही हो अथवा कट्टरपंथियों की अपनी कूटनीति कि अब काँग्रेस के नीति निर्णयों में कट्टरपंथ का समर्थन स्पष्ट दीख रहा है। काँग्रेस ने केरल में जिन दलों के साथ अपना गठबंधन बनाया अथवा असम एवं प. बंगाल में जिस प्रकार अपने उम्मीदवारों का चयन किया उसमें काँग्रेस की नीति स्पष्ट झलक रही है।

काँग्रेस के नेतृत्व में केरल की सत्ता संभालने जा रहे “यूडीएफ” गठबंधन में इंडियन मुस्लिम लीग, केरल कांग्रेस(जोसेफ) , केरल कांग्रेस(जैकब) , क्रांतिकारी समाजवादी पार्टी प्रमुख सदस्य हैं। इस गठबंधन की सहयोगी इंडियन मुस्लिम लीग तो अपने कट्टरपंथ और शरीयत कानून का खुला समर्थन करने जानी जाती है। जबकि क्राँतिकारी समाजवादी पार्टी कम्युनिस्ट विचारधारा पर काम करती है। वहीं केरल काँग्रेस (जौसेफ) और केरल काँग्रेस (जेकब) का भी अपना इतिहास है। इनमें से एक सीरियाई ईसाई और नायर समाज का संगठन माना जाता है और दूसरी की गणना लेफ्ट के समीप होती है। केरल विधानसभा में इस बार 34 मुस्लिम विधायक चुनाव जीते हैं। इनमें मुस्लिम लीग के 22 और काँग्रेस टिकिट पर आठ हैं। अब केरल में सत्ता संभालने जा रहे यूडीएफ की नीति क्या होगी यह इस गठबंधन में शामिल दलों की रीति नीति और विधायकों से ही स्पष्ट हो रहा है।

यदि केरल से असम की दूरी देखें तो यह लगभग साढ़े तीन हजार किलोमीटर है। इन दोनों राज्यों में भाव, भाषा, जीवन शैली और साँस्कृतिक मूल्यों में भी कोई तालमेल नहीं है लेकिन कट्टरपंथी मतदाता के ध्रुवीकरण की जो लहर केरल में रही बिल्कुल वही लहर असम में भी देखने को मिली। असम विधानसभा में इसबार विपक्ष के कुल चौबीस विधायक पहुँचे हैं। चौबीस में से बाईस विधायक मुस्लिम हैं। कांग्रेस के टिकिट पर कुल उन्नीस विधायक चुनाव जीते। इनमें मुस्लिम विधायकों की संख्या अठारह है। कट्टरपंथी मतदाता का यही धुर्वीकरण प. बंगाल और तमिलनाड में भी देखा गया। प. बंगाल में काँग्रेस टिकिट पर कुल दो विधायक जीते। इनमें एक मुस्लिम है। जबकि तृणमूल कांग्रेस ने कुल अस्सी सीटे जीती, इनमें मुस्लिम विधायकों की संख्या 31 है। इन राज्यों में मुस्लिम वोटों के इस ध्रुवीकरण के दो लक्ष्य थे, एक भाजपा को रोकना और दूसरा विधानसभा अपनी सदस्य संख्या की वृद्धि करना। यदि कट्टरपंथियों का उद्देश्य केवल भाजपा को रोकना होता तो वे असम और पश्चिम बंगाल में काँग्रेस के गैर मुस्लिम उम्मीदवारों का भी समर्थन कर सकते थे। लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। उनकी प्राथमिकता में मुस्लिम उम्मीदवार ही रहे इसलिये मुर्शिदाबाद में बाबरी मस्जिद की नींव रकने वाले हुँमायू कबीर ने दोनों विधान सभा क्षेत्रों से विजय प्राप्त की। यदि कट्टरपंथियों का उद्देश्य केवल भाजपा को रोकना होता तो वे इन दोनों सीटों पर भी काँग्रेस उम्मीदवार को ही वोट देते, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। यहाँ काँग्रेस की बजाय हुँमायू कबीर को पसंद किया।

इन पांच राज्यों में वोटों के इस ध्रुवीकरण में केवल मुस्लिम कट्टरपंथी अकेले नहीं हैं। इसमें अलगाववादी, मार्क्सवादियों और माओवादियों का भी गठजोड़ रहा है। यद्यपि वैचारिक दृष्टि से इन दोनों समूहों के लक्ष्य और धारा में कोई मेल नहीं हैं। दुनियाँ के अन्य देशों में इन दोनों धाराओं के बीच कोई तालमेल नहीं है लेकिन भारत में इन दोनों के बीच अद्भुत गठजोड़ है। यह गठजोड़ केवल राजनैतिक दृष्टि से ही नहीं है, ये सामाजिक और बौद्धिक मंचों पर दोनों एकसाथ दिखाई देते हैं। दिल्ली के जेएनयू में होने वाले कार्यक्रम इसका उदाहरण है। इन दोनों समूहों का पूरे देश में अपना नेटवर्क है। इन समूहों की एक विशेषता यह भी है कि वे सार्वजनिक चर्चा केलिये विशेष “नैरेटिव” सेट करने में भी सिद्धहस्त होते हैं। अपने अभियान और रणनीति से लोगों का ध्यान हटाने केलिये कुछ ऐसे “नैरेटिव” उछालते हैं जिससे जन सामान्य इन्हीं नैरेटिव में उलझ जाए और वे अपने लक्ष्य की ओर आगे बढ़ते रहें। इन पाँच राज्यों में संपन्न विधानसभा चुनाव परिणाम में हिन्दू वोटों के धुर्वीकरण का नैरेटिव उछाला गया। यह ठीक है कि हिन्दु मतदाताओं का एक बड़ा भाग भारतीय जनता पार्टी को ओर झुका। लेकिन वह हिन्दु वोटों का धुर्वीकरण नहीं था। पश्चिम बंगाल में लगभग सत्तर प्रतिशत हिन्दु मतदाता हैं लेकिन भाजपा को लगभग पैंतालीस प्रतिशत वोट मिले। इसका अर्थ है कि लगभग पच्चीस प्रतिशत हिन्दु वोट काँग्रेस, तृणमूल-कांग्रेस तथा अन्य दलों को भी मिले। यह स्थिति केवल पश्चिम बंगाल या असम की नहीं है। केरल, तमिलनाड और पुड्डुचेरी भी यही स्थिति रही। इन सभी प्राँतों में काँग्रेस समर्थक हिन्दु मतदाताओं ने काँग्रेस के मुस्लिम उम्मीदवारों को भी वोट दिया। यह काँग्रेस के विजयी मुस्लिम उम्मीदवारों को मिले कुल वोटों और उस विधानसभा क्षेत्र में मुस्लिम मतों की कुल संख्या से स्पष्ट हो जाता है। लेकिन मुस्लिम मतों का विभाजन कहीं नहीं हुआ। लेकिन कट्टरपंथी मुस्लिम मतों के धुर्वीकरण से लोगों का ध्यान हटाने केलिये हिन्दु मतों के धुर्वीकरण का नैरेटिव उछाल दिया गया। सोशल मीडिया और मीडिया के अधिकांश नेटवर्क पर यही नैरेटिव चला।

अब इस संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता कि असम से लेकर केरल तक मुस्लिम मतदाताओं का इस धुर्वीकरण की राजनीति का प्रभाव देश के अन्य राज्यों पर भी पड़ेगा। विशेषकर उत्तर, मध्य और पश्चिम भारत में इन्हें काँग्रेस का सशक्त कंधा मिल गया है। हालाँकि काँग्रेस की राजनीति में मुस्लिम तुष्टिकरण सदैव प्राथमिकता पर रहा है लेकिन अब काँग्रेस और कुछ विपक्षी दलों की राजनीति केवल तुष्टिकरण तक सीमित नहीं रहेगी। वह कट्टरपंथ को संरक्षण देने की दिशा में एक कदम और आगे बढ़ेगी। भारत के इतिहास की कुछ घटनाएँ इस बात का प्रमाण हैं कि कट्टरपंथी एक एक कदम आगे बढ़ते हैं और अंत में अपनी पसंद के निर्णय भी कराते हैं। 1857 की क्राँति के बाद भारत के कट्टरपंथियों ने अंग्रेजों को अपनी वफादारी दिखाई और काँग्रेस पर दबाव बनाया। यह कट्टरपंथियों के दबाव का ही तो परिणाम था कि काँग्रेस बात तो रामराज्य की करती थी लेकिन खिलाफत आँदोलन खलीफा राज केलिये किया था। स्वतंत्रता से पहले बंगाल के अधिकांश मुसलमान काँग्रेस के विरुद्ध और मुस्लिम लीग के साथ थे। लेकिन भारत विभाजन के बाद शेष बचे बंगाल में सभी मुसलमान काँग्रेस के झंडे तले आ गये। लेकिन यदि काँग्रेस का पतन हुआ तो वे लेफ्ट समर्थक हो गये। लेफ्ट के पतन के बाद तृणमूल-कांग्रेस के बैनर पर सक्रिय हुये और अब पुनः काँग्रेस के माध्यम से अपनी राजनीति करना चाहते हैं। आरंभिक काल में भले वे कुछ कहें लेकिन उनका अंतिम लक्ष्य भारत राष्ट्र का सांस्कृतिक और सामाजिक रूपान्तरण करना है। इन चुनाव परिणामों के बाद केरल और तमिलनाड के प्रशासन में कट्टरपंथियों का प्रभाव बढ़ेगा। और इसका प्रभाव देश के अन्य प्रांतों में भी पड़ने की स्पष्ट आशंका दिखाई दे रही है। लव जिहाद और लैंड जिहाद के रूप में कट्टरपंथ का अभियान देशभर में चल रहा है। अब ऐसी घटनाओं में और वृद्धि होने की आशंका बढ़ गई है। तथा ऐसे तत्वों के समर्थन में काँग्रेस सहित कुछ राजनैतिक दलों द्वारा खुलकर समर्थन करने की आशंका भी बढ़ गई है। इसके लिये समस्त देश वासियों को सावधान होकर आगे बढ़ने की आशंका है।

विकसित भारत 2047: वैश्विक संकटों के बीच राष्ट्र प्रथम का नया आह्वान

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गौहर आसिफ

दिल्ली । भारत आज एक ऐसे निर्णायक दौर में खड़ा है, जहाँ वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच राष्ट्रीय एकता और जिम्मेदारी की भावना पहले से अधिक महत्वपूर्ण हो गई है। Viksit Bharat 2047 केवल एक दीर्घकालिक विकास योजना नहीं, बल्कि एक ऐसा राष्ट्रीय संकल्प है जो नागरिकों की जीवनशैली, आर्थिक व्यवहार और सामूहिक सोच से जुड़ा हुआ है। हाल के वैश्विक संकट—महामारी, युद्ध, ऊर्जा संकट और आर्थिक अस्थिरता—ने यह स्पष्ट कर दिया है कि विकसित राष्ट्र बनने के लिए सरकार की नीतियों के साथ-साथ जनता की सक्रिय भागीदारी अनिवार्य है।

इसी संदर्भ में Narendra Modi द्वारा हाल में की गई “राष्ट्र प्रथम” अपील को समझना आवश्यक है। यह अपील केवल संकट से निपटने के लिए अस्थायी उपाय नहीं, बल्कि विकसित भारत 2047 की दिशा में सामूहिक राष्ट्र निर्माण का संदेश है। जब प्रधानमंत्री नागरिकों से कुछ जीवनशैली आधारित कदम अपनाने का आग्रह करते हैं, तो उसका उद्देश्य केवल तात्कालिक बचत नहीं, बल्कि राष्ट्रीय संसाधनों को मजबूत करना और आत्मनिर्भरता की संस्कृति विकसित करना है।

प्रधानमंत्री की अपील में सबसे प्रमुख सुझावों में एक था—जहाँ संभव हो, वर्क फ्रॉम होम को प्राथमिकता देना। यह कदम केवल व्यक्तिगत सुविधा के लिए नहीं है। इससे ईंधन की खपत घटती है, यातायात पर दबाव कम होता है और ऊर्जा संरक्षण होता है। वैश्विक तेल कीमतों की अस्थिरता के समय यह एक व्यावहारिक आर्थिक रणनीति भी है। यदि लाखों लोग रोज़ाना कम यात्रा करते हैं, तो विदेशी तेल आयात पर दबाव घटता है, जिससे राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था को लाभ मिलता है।

दूसरा महत्वपूर्ण आह्वान था—अगले एक वर्ष तक सोना खरीदने से बचना। भारत दुनिया में सोने का बड़ा आयातक है, और सोने की खरीद से विदेशी मुद्रा पर भारी दबाव पड़ता है। वैश्विक संकट के समय जब विदेशी मुद्रा भंडार और व्यापार संतुलन महत्वपूर्ण होते हैं, तब सोने की खरीद में कमी देश की आर्थिक स्थिरता को मजबूत कर सकती है। यह एक ऐसा उदाहरण है जहाँ व्यक्तिगत निवेश का निर्णय भी राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था पर प्रभाव डालता है।

इसी तरह पेट्रोल और डीज़ल की खपत कम करने तथा सार्वजनिक परिवहन—मेट्रो, बस और अन्य सामूहिक साधनों—का उपयोग बढ़ाने की अपील सीधे ऊर्जा सुरक्षा से जुड़ी है। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है। ऐसे में सार्वजनिक परिवहन का अधिक उपयोग केवल पर्यावरणीय दृष्टि से नहीं, बल्कि आर्थिक दृष्टि से भी राष्ट्रहित में है। जब नागरिक निजी वाहनों के बजाय सार्वजनिक परिवहन चुनते हैं, तो यह राष्ट्रीय संसाधनों की बचत का हिस्सा बन जाता है।

प्रधानमंत्री द्वारा खाद्य तेल (खाद तेल) के सीमित उपयोग की बात भी इसी व्यापक सोच का हिस्सा है। भारत खाद्य तेल का बड़ा आयातक है। यदि नागरिक अनावश्यक खपत कम करें, तो आयात बिल घट सकता है। यह स्वास्थ्य और अर्थव्यवस्था दोनों के लिए लाभकारी कदम है। राष्ट्र निर्माण कभी-कभी ऐसे छोटे दिखने वाले निर्णयों से भी जुड़ता है, जो करोड़ों लोगों के स्तर पर बड़ा प्रभाव डालते हैं।

एक और महत्वपूर्ण संदेश था—विदेशी ब्रांडों का कम उपयोग और स्वदेशी उत्पादों को अपनाना। यह आत्मनिर्भर भारत की मूल भावना है। जब भारतीय उपभोक्ता स्थानीय उत्पादों और निर्माताओं को प्राथमिकता देते हैं, तो घरेलू उद्योग मजबूत होते हैं, रोजगार बढ़ता है और पूंजी देश के भीतर ही रहती है। स्वदेशी केवल भावनात्मक नारा नहीं; यह आर्थिक राष्ट्रवाद का व्यावहारिक मॉडल है। विकसित भारत 2047 की दिशा में यह अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि मजबूत घरेलू उत्पादन क्षमता ही विकसित अर्थव्यवस्था की आधारशिला है।

इसी क्रम में विदेश यात्राओं से बचने की अपील भी वैश्विक आर्थिक परिस्थिति से जुड़ी है। विदेश यात्रा पर होने वाला खर्च, विदेशी मुद्रा का बहिर्वाह बढ़ाता है। यदि नागरिक घरेलू पर्यटन को प्राथमिकता दें, तो यह न केवल देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत करता है बल्कि स्थानीय रोजगार और सेवा क्षेत्र को भी गति देता है। भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में घरेलू पर्यटन स्वयं में आर्थिक विकास का बड़ा स्रोत है।

इन सभी अपीलों का मूल संदेश यही है कि संकट के समय राष्ट्र निर्माण केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं हो सकता। सरकार नीतियाँ बनाती है, लेकिन उनकी सफलता नागरिकों की भागीदारी पर निर्भर करती है। वैश्विक संकटों के बीच भारत सरकार ने स्वास्थ्य, खाद्य सुरक्षा, ऊर्जा प्रबंधन, डिजिटल सेवाओं और बुनियादी ढाँचे पर तेज़ी से काम किया है। लेकिन विकसित भारत 2047 का सपना तभी साकार होगा जब नागरिक भी अपने दैनिक व्यवहार में राष्ट्रहित को स्थान देंगे।

आज भारत का लक्ष्य केवल आर्थिक वृद्धि नहीं है। यह एक ऐसे राष्ट्र का निर्माण है जो आत्मनिर्भर हो, वैश्विक नेतृत्व करे और संकटों के समय स्थिरता का उदाहरण बने। G20 New Delhi Summit ने दिखाया कि भारत अब वैश्विक मंच पर नीति-निर्माता के रूप में उभर रहा है। लेकिन इस नेतृत्व की असली शक्ति घरेलू अनुशासन और राष्ट्रीय एकता से आती है।

विकसित भारत 2047 की यात्रा में सरकार का दृष्टिकोण स्पष्ट है—आत्मनिर्भरता, समावेशी विकास और नागरिक भागीदारी। प्रधानमंत्री की हालिया अपील इसी दृष्टि का सामाजिक विस्तार है। जब नागरिक वर्क फ्रॉम होम अपनाते हैं, सोना खरीद कम करते हैं, सार्वजनिक परिवहन का उपयोग बढ़ाते हैं, खाद्य तेल की बचत करते हैं, स्वदेशी उत्पादों को प्राथमिकता देते हैं और विदेशी यात्राओं से बचते हैं, तब वे केवल व्यक्तिगत निर्णय नहीं ले रहे होते—वे राष्ट्र निर्माण में सक्रिय भागीदारी निभा रहे होते हैं।

विकसित भारत 2047 केवल सरकारी परियोजनाओं का परिणाम नहीं होगा। यह तब साकार होगा जब हर भारतीय अपने जीवन में “राष्ट्र प्रथम” को व्यवहार में उतारे। प्रधानमंत्री की अपील इसी सामूहिक चेतना का आह्वान है—जहाँ छोटे व्यक्तिगत कदम मिलकर एक बड़े राष्ट्रीय भविष्य का निर्माण करते हैं।

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