कृष्ण के संग कुछ कदम… और जिंदगी का सफर हो जाए आसान!

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आगरा । क्या जिंदगी के हर सवाल का जवाब किसी मोटे-मोटे ज्ञान की किताब में ही छिपा है? या फिर कभी-कभी जवाब वहीं मिल जाता है, जहां हम देखना भूल जाते हैं; श्रीकृष्ण की सीख में?
आज का कुरुक्षेत्र भी कम दिलचस्प नहीं है। कहीं दफ्तर में तनाव है, कहीं कारोबार में चिंता। कहीं रिश्तों की उलझन है तो कहीं भविष्य का डर। अर्जुन तब रथ पर परेशान था, आज का आदमी मोबाइल हाथ में लेकर परेशान है।
तरुण गर्ग की छोटी-सी किताब ‘कुछ कदम कृष्ण के साथ’ इसी बेचैनी को समझने की कोशिश करती है। किताब श्रीमद्भगवद्गीता के 18 अध्यायों की सीख को आज की जिंदगी से जोड़ती है। भाषा सरल है और अंदाज बातचीत जैसा है।
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पुस्तक: कुछ कदम कृष्ण के साथ
लेखक: तरुण गर्ग
प्रकाशक: निखिल पब्लिशर्स, आगरा
पृष्ठ: 90
मूल्य: ₹299
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किताब का कवर ही इसकी कहानी का संकेत दे देता है। एक आधुनिक युवक कृष्ण के साथ चल रहा है। दोनों के बीच बातचीत हो रही है। लगता है जैसे आज का अर्जुन अपनी परेशानियां लेकर कृष्ण के पास पहुंच गया हो।
समय बदल गया है, लेकिन इंसान के सवाल शायद ज्यादा नहीं बदले। नौकरी का दबाव हो या कारोबार की चिंता, परिवार की परेशानी हो या भविष्य का डर; सवाल आज भी वही हैं।
मैं क्या करूं? सही रास्ता कौन-सा है? मुश्किल समय में खुद को कैसे संभालूं?
यहीं तरुण गर्ग की किताब पाठक का हाथ पकड़ लेती है।
वे गीता को कठिन दार्शनिक भाषा में समझाने नहीं बैठते। न संस्कृत के भारी शब्दों का बोझ डालते हैं, न पाठक को विद्वान बनने की परीक्षा देते हैं। वे सरल सवाल-जवाब और रवि नाम के एक आधुनिक किरदार के जरिए कृष्ण की सीख सामने रखते हैं।
रवि कोई पौराणिक पात्र नहीं है। वह हमारे आसपास का आदमी है। उसके सवाल भी हमारे जैसे हैं। इसलिए पाठक को उससे जुड़ने में ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ती।
किताब का मकसद गीता की कोई अंतिम या विद्वत्तापूर्ण व्याख्या करना नहीं है। मकसद सीधा है, गीता को जिंदगी के करीब लाना।
बहुत से लोग गीता का नाम सुनकर ही थोड़ा घबरा जाते हैं। लगता है कि इसे समझने के लिए संस्कृत, दर्शन और धर्मशास्त्र पढ़ना पड़ेगा। गर्ग इस डर की गांठ खोलने की कोशिश करते हैं।
उनका संदेश है कि कृष्ण की बातें केवल मंदिर या पूजा तक सीमित नहीं हैं। उनका संबंध हमारे रोज के फैसलों, व्यवहार और सोच से भी है।
किताब का सबसे महत्वपूर्ण संदेश भी सीधा है, कर्म करते रहिए और परिणाम की चिंता में अपना कर्म मत बिगाड़िए।
आज हर कोई नतीजे के पीछे भाग रहा है। विद्यार्थी अच्छे अंक चाहते हैं। युवा अच्छी नौकरी चाहते हैं। कर्मचारी पदोन्नति चाहते हैं। कारोबारी ज्यादा मुनाफा चाहते हैं।
और सोशल मीडिया ने तो इस दौड़ में पेट्रोल डाल दिया है।
दूसरे की चमकती जिंदगी देखकर हमें अपनी जिंदगी फीकी लगने लगती है। हर किसी को लगता है कि बाकी सब आगे निकल गए और हम पीछे रह गए।
ऐसे समय में गीता का कर्मयोग बहुत काम की बात करता है। अपना काम ईमानदारी से करो। अपनी जिम्मेदारी निभाओ। परिणाम की चिंता में आज का काम मत खराब करो।
तरुण गर्ग खुद कई क्षेत्रों से जुड़े रहे हैं। आगरा के सफल व्यवसायी होने के साथ वे एंकर, अभिनेता, गायक, कवि और पॉडकास्टर भी हैं। शायद इसी वजह से उनकी लेखन शैली में संवाद और मंचीय सहजता दिखाई देती है।
वे पाठक को भाषण नहीं देते। उससे बातचीत करते हैं।
किताब की एक और खूबी इसकी संक्षिप्तता है। केवल 90 पन्नों में गीता के 18 अध्यायों की मूल भावना तक पहुंचाना आसान काम नहीं। लेकिन इसी वजह से यह किताब उन लोगों के लिए उपयोगी हो सकती है, जो गीता पढ़ना चाहते हैं लेकिन उसकी विशालता देखकर शुरुआत ही नहीं कर पाते।
बेशक, इसे गीता पर कोई गहरी दार्शनिक टीका समझना उचित नहीं होगा। गंभीर अध्ययन के लिए इससे कहीं बड़े और विस्तृत ग्रंथ उपलब्ध हैं।
लेकिन यह किताब ऐसा दावा भी नहीं करती।
इसकी ताकत कुछ और है। यह कठिन बात को आसान भाषा में कहती है। और कई बार आसान भाषा ही सीधे दिल तक पहुंचती है।
किताब पढ़ते हुए महसूस होता है कि लेखक कृष्ण को केवल पूजनीय देवता के रूप में नहीं, बल्कि जिंदगी के मार्गदर्शक के रूप में सामने लाना चाहते हैं।
मन भ्रमित हो तो कृष्ण की सीख याद करो।
संकट सामने हो तो कर्म मत छोड़ो।
नतीजा मनमाफिक न मिले तो धैर्य रखो।
सफलता मिले तो अहंकार से बचो।
और जब रास्ता समझ न आए तो थोड़ा अपने भीतर झांको।
आखिर ज्ञान की असली परीक्षा किताब के पन्नों में नहीं होती। वह हमारे व्यवहार में दिखाई देता है।
गुस्से के समय संयम रहे। असफलता के समय हिम्मत रहे। सफलता के समय विनम्रता रहे। मुश्किल समय में कर्तव्य याद रहे।
तभी गीता की सीख जिंदगी में उतरती है।
इस नजर से देखें तो ‘कुछ कदम कृष्ण के साथ’ केवल पढ़ने की किताब नहीं है। यह रुककर सोचने की किताब भी है।
कभी-कभी जिंदगी में लंबे भाषण की जरूरत नहीं होती। कोई बस इतना कह दे; “घबराओ मत, अपना कर्म करते रहो।”
कृष्ण ने अर्जुन से संवाद किया था। तरुण गर्ग ने उसी संवाद को आज के पाठक तक पहुंचाने की कोशिश की है।
इस किताब की सबसे बड़ी खूबी शायद यही है कि इसमें हमें अपने सवाल दिखाई देते हैं। और उन्हीं सवालों के बीच कृष्ण की सीख एक शांत आवाज की तरह सुनाई देती है।
कृष्ण के साथ चलने के लिए शायद हमेशा लंबी यात्रा जरूरी नहीं होती। कभी-कभी कुछ कदम ही काफी होते हैं।
तरुण गर्ग की यह किताब उन्हीं कुछ कदमों का निमंत्रण है।

प्रधानमंत्री श्रीनरेंद्र मोदी : व्यक्तित्व में कर्मशीलता और निर्णयों में भविष्य दृष्टि

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दिल्ली । प्रतिपल सैकड़ों शिशु संसार में जन्म लेते हैं। अधिकांश लोग सामान्य जीवन जीकर संसार से विदा हो जाते हैं। उनका पूरा जीवन भोजन, निद्रा केलिये सुरक्षित स्थान अर्थात घर बनाने, जोड़ा बनाने, संतान को जन्म देने अथवा क्रोध प्रेम की अभिव्यक्ति में बीत जाता है। ये निजी आवश्यकता तो चींटी से लेकर हाथी तक सभी प्राणी पूरी करते हैं। इस प्रकार का जीवन तो सृष्टि के मनुष्योत्तर प्राणियों की भाँति ही जीवन हुआ। लेकिन कुछ लोग होते हैं जो जीवन की इन आधारभूत आवश्यकता ऊपर अपनी जीवन यात्रा आरंभ करते हैं। उन्हें केवल अपनी ही नहीं अपने पूरे समाज, संस्कृति, परंपरा, राष्ट्र और संसार की चिंता होती है। ऐसी विभूतियों ऋग्वेद के आव्हान “मनुर्भवः” आव्हान का पूरा करती हैं। इनकी गणना महापुरुषों में होती हैं। यही विभूतियाँ इतिहास बनाती हैं। भारत के वर्तमान प्रधानमंत्री श्रीनरेंद्र मोदी ऐसे ही व्यक्तित्व के धनी हैं। बालपन से लेकर आज तक उनके सामने हर क्षण चुनौतियाँ रहीं लेकिन उन्होंने हर चुनौती का सामना किया। विषमताओं और विरोध को अपनी शक्ति बनाया। वे भविष्य में आने वाली चुनौतियाँ का आकलन पहले से कर लेते हैं। उन्होनें हर चुनौती का समाधान करने का मार्ग कुछ इस प्रकार बनाया कि वे चुनौतियाँ ही उनकी शक्ति बनीं। हम उनका बचपन देखे, बचपन में उन्होने चाय बेची। चाय बेचकर अपने स्कूल का खर्चा निकाला। परिवार का कोई भी सदस्य राजनीति में नहीं था। फिर भी अपनी कर्मशीलता से वे राजनीति के सर्वोच्च स्थान तक पहुँचे। वे जहाँ रहे, जो दायित्व मिला उसे उन्होंने कुछ इस प्रकार निभाया कि आने वाली पीढ़ी ने उसका अनुकरण किया। उन्होंने न किसी विरोध की परवाह की और न प्रशंसा से आत्ममुग्ध हुये। यदि कहीं सम्मान मिला तो अंहकार भी नहीं आया। सतत आगे बढ़ना उनका स्वभाव रहा है। गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुये उनका जितना विरोध हुआ, उतना विरोध भारत के किसी मुख्यमंत्री का आज तक नहीं हुआ। इस विरोध के चलते उन्हें अमेरिका की बीजा तक नहीं मिला था। लेकिन वे अडिग रहे, विचलित नहीं हुये। और आगे चलकर उसी अमेरिका ने उन्हें अपने देश में आने का आमंत्रण दिया। प्रधानमंत्री के रूप में अमेरिका के व्हाईट हाउस जो उनका जैसा सम्मान हुआ वैसा सम्मान उनसे पहले भारत के किसी प्रधानमंत्री का नहीं हुआ। अमेरिका ने उनके सम्मान में डिनर का आयोजन किया था।

प्रधानमंत्री का पद संभालने के बाद भी उनपर राजनैतिक हमले लगातार हो रहे हैं। ये हमले भी हर प्रकार के हैं। व्यक्तिगत हमले भी हुये, राजनैतिक भी, और निर्णयों को भी मुद्दा बनाया गया। लेकिन कभी विचलित नहीं हुये और निरंतर आगे बढ़ रहे हैं। इन सभी हमलों के बीच उन्होंने भारत में लगातार सबसे लंबी अवधि तक पदारूढ़ रहने का कीर्तिमान बनाया। गुजरात के मुख्यमंत्री से लेकर देश के प्रधानमंत्री रहने तक लगातार इतनी लंबी अवधि कोई भी राजनेता पदारूढ़ नहीं रहा। अपने व्यक्तित्व की कर्मशीलता से ही उन्होनें राजनीति में यह कीर्तिमान बनाया है। वे अकेले ऐसे प्रधानमंत्री हैं जिन्होंने पद संभालने से पहले पूरे भारत की यात्रा की थी। देश का शायद ही कोई ऐसा जिला केन्द्र हो जहाँ वे गये न हों। इससे भारतीय संस्कृति और मनोविज्ञान की विविधता का उन्होंने सहज जानकारी है। इसीलिए उनके निर्णयों जमीनी समस्या के समाधान के सूत्र होते हैं। उनका स्वच्छता अभियान, हर घर को नल जल, अभियान, ग्रामीण बहनों को धुँये से मुक्ति केलिये उज्जवला योजना, प्रधानमंत्री आवास योजना, किसान सम्मान निधि आदि ऐसी योजनाएँ आरंभ की जिससे न केवल भारत के लोकजीवन की मूलभूत समस्याओं के समाधान का मार्ग निकला अपितु भारतीय जनता पार्टी का स्वरूप भी व्यापक हुआ।

प्रधानमंत्री के रूप में उनके अधिकांश निर्णयों में दूरदृष्टि है। इनमें स्पेस टेक्नालॉजी के लिये बजट बढ़ाकर अनुसंधान को प्रोत्साहित किया जिससे अब भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन “इसरो” दुनियाँ के अन्यदेशों के उपग्रह स्थापित कर रहा है। चन्द्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर तिरंगा फहराने वाला भारत पहला राष्ट्र बना। आयुध निर्माण में भारत अब निर्यातक देश है। करोना और मध्य एशियाई तनाव के बीच अर्थव्यवस्था की स्थिरता भी मोदीजी के दूरदृष्टि से लिये गये निर्णयों के कारण है। जहाँ पूरी दुनिया की अर्थ व्यवस्था डगमगा रही है वहीं भारत की अर्थ व्यवस्था सुदृढ़ हो रही है।भारत अब दुनियाँ की चौथी अर्थ व्यवस्था है और तीसरी पर आने की राह पर चल रहा है। हाल ही दिल्ली में संपन्न ब्रिक्स देशों के सम्मेलन में भी भारत की अंतराष्ट्रीय सामर्थ्य की प्रशंसा सभी देशों ने की। देश के भीतर समृद्धि और अंतराष्ट्रीय साख बढ़ने के पीछे मोदीजी की भविष्य दृष्टि और उसके अनुरूप यथेष्ट निर्णय लेना ही है।

मध्यप्रदेश सरकार उनके जन्मदिन से सेवा संकल्प अभियान आरंभ कर रही है। यह अभियान पूरे एक माह चलेगा। इसमें सरकार और संगठन जनता के बीच होगा। यह सेवा संकल्प अभियान उभयपक्षीय है। इसमें सरकार अपनी योजनाएँ और उनका क्रियान्वयन भी जनता के सामने लेकर जायेगी और इसके साथ जन सामान्य की समस्याएँ भी सुनेगी। सरकार यह प्रयास भी करेगी कि जनता की जो समस्याएँ सामने आईं हैं उनका समाधान तुरन्त हो जाय। निसंदेह एक जनोन्मुखी सरकार का यह प्रयास सराहनीय है और श्री नरेन्द्र मोदी के जन्मदिन पर इसका शुभारंभ उनके व्यक्तित्व के अनुरूप भी है।

प्रसंगवश : कालिदास की भूल और डिजिटल इंडिया की ‘डाल’ पर शुल्क की कुल्हाड़ी

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– डॉ. मयंक चतुर्वेदी

भोपाल। संस्कृत साहित्य के शिखर पुरुष महाकवि कालिदास के प्रारंभिक जीवन का एक प्रसंग अत्यंत प्रसिद्ध है। ज्ञान और बोध से शून्य कालिदास एक वृक्ष की उसी डाल को कुल्हाड़ी से काट रहे थे, जिस पर वे स्वयं बैठे थे। राहगीरों ने उन्हें टोका कि ऐसा करने से वे स्वयं नीचे गिरेंगे और चोटिल होंगे, परंतु कालिदास ने उस समय इस चेतावनी को अनसुना कर दिया। परिणाम वही हुआ, डाल कटी और वे धड़ाम से नीचे आ गिरे। इस आत्मघाती कृत्य के बाद जब उन्हें विद्वानों द्वारा सत्य का ज्ञान दिया गया, तब कहीं जाकर उनके ‘ज्ञान चक्षु’ खुले और वे मूर्खता के अंधकार से निकलकर प्रज्ञा के आलोक की ओर बढ़े।

आज भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था के संदर्भ में केंद्र सरकार द्वारा 15 अक्टूबर 2026 से ₹2,000 से अधिक के मर्चेंट भुगतानों पर 0.4 फीसद मर्चेंट डिस्काउंट रेट (एमडीआर) लगाने का निर्णय ठीक वैसी ही नीतिगत भूल प्रतीत होता है। सरकार जिस ‘डिजिटल ट्रांजैक्शन’ और ‘कैशलेस इकोनॉमी’ की मजबूत डाल पर बैठकर देश की जीडीपी और कर संग्रह को बढ़ाने का दावा कर रही है, वह अब उसी डाल को शुल्क रूपी कुल्हाड़ी से काटने की तैयारी में है।

पिछले एक दशक में यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (यूपीआई) भारत की सबसे बड़ी सफलता को दर्शाता है। इसने देश के आर्थिक परिदृश्य को पूरी तरह बदल दिया, जिसमें कि देश के 55 करोड़ से अधिक सक्रिय उपयोगकर्ता और करोड़ों छोटे-बड़े व्यापारी इस तंत्र से जुड़े। जब लेन-देन डिजिटल हुआ, तो अनौपचारिक अर्थव्यवस्था बैंकिंग प्रणाली के दायरे में आ गई। इसके कारण सरकार का जीएसटी संग्रह रिकॉर्ड ₹1.8 लाख करोड़ से ₹2 लाख करोड़ प्रति माह के स्तर को छूने लगा।

यूपीआई की इस अभूतपूर्व सफलता का एकमात्र सबसे बड़ा स्तंभ इसका पूरी तरह से निःशुल्क होना था। उपभोक्ताओं और व्यापारियों ने इसे इसलिए अपनाया क्योंकि यह नकद से अधिक सुरक्षित और पूरी तरह मुफ्त था, किंतु अब जब ₹2,000 से ऊपर के लेन-देन पर 0.4 फीसद का शुल्क (अधिकतम ₹300) लगाया जा रहा है, तो आप यह मानकर चलें कि केंद्र सरकार के लिए यह कदम आत्मघाती साबित होगा।

वस्‍तुत: इसके पीछे उल्‍लेखित ठोस तथ्य और आंकड़े मौजूद हैं, जिन्‍हें बिल्‍कुल भी नकारा नहीं जा सकता है। जैसे कि भारत में खुदरा व्यापारियों का नेट प्रॉफिट मार्जिन बहुत कम होता है, आमतौर पर तीन फीसद से पांच प्रतिशत तक यह देखा जाता है। ऐसे में यदि सरकार उनसे 0.4 प्रतिशत का शुल्क लेगी, तो यह उनके मुनाफे का सीधे 10 से 13 प्रतिशत हिस्सा छीन लेगी। जिसका परिणाम यह होगा कि व्यापारी इस शुल्क से बचने के लिए ग्राहकों को दोबारा नकद में भुगतान करने के लिए मजबूर या प्रोत्साहित करेंगे। वहीं, इस शुल्क के लागू होने से उच्च-मूल्य वाले मर्चेंट डिजिटल ट्रांजैक्शन में 15 फीसद से 20 प्रतिशत तक की भारी गिरावट आ सकती है।

सरकार का तर्क है कि यूपीआई इंफ्रास्ट्रक्चर को चलाने के लिए सालाना लगभग ₹20,000 करोड़ का खर्च आता है, जिसकी भरपाई के लिए यह शुल्क जरूरी है, किंतु कालिदास की तरह सरकार दूरगामी नुकसान को नहीं देख पा रही है, यदि सिर्फ 15 प्रतिशत लेन-देन भी वापस नकद (ब्लैक मनी/अनअकाउंटेड कैश) में बदल जाता है, तो अर्थव्यवस्था से पारदर्शिता खत्म होगी। इसके कारण सरकार को जो जीएसटी और कॉर्पोरेट/आयकर का नुकसान होगा, वह इस यूपीआई शुल्क से मिलने वाले ₹20,000 करोड़ के राजस्व से कहीं अधिक (अनुमानित ₹50,000 करोड़ से ऊपर) होगा। यानी थोड़े से राजस्व के लालच में सरकार अपने बड़े टैक्स बेस का नुकसान कर बैठेगी।

दूसरी ओर भले ही सरकार कह रही है कि यह शुल्क व्यापारियों पर लगेगा, किंतु अर्थशास्त्र का बुनियादी नियम है कि हर अप्रत्यक्ष लागत अंततः उपभोक्ता पर ट्रांसफर होती है। व्यापारी अपने उत्पादों की कीमतें 0.5 फीसद से अधिकतम दो प्रतिशत तक बढ़ा देंगे। इससे बाजार में अप्रत्यक्ष महंगाई बढ़ेगी और डिजिटल भुगतान के प्रति जनता का विश्वास कमजोर होगा। यह इसलिए भी संभव है, क्‍योंकि बाजार पर न राज्‍यों के स्‍तर पर और न ही केंद्र के स्‍तर पर लागत के मुकाबले एमआरपी पर किसी का कोई जोर नहीं है। जिसकी जो इच्‍छा होती है, वह उसकी वह एमआरपी तय करता है।

अत: हम फिर एक बार कालिदास पर आते हैं, जैसे उन्‍हें जब अपनी भूल का अहसास कराया गया, तब उन्होंने तंत्र-मंत्र और अज्ञानता को छोड़कर मां सरस्वती की साधना की और महान ग्रंथों की रचना की। ठीक इसी तरह, केंद्र सरकार को भी अपने ‘आर्थिक ज्ञान चक्षु’ खोलने की आवश्यकता है। वस्‍तुत: राष्ट्रीय अवसंरचना का सिद्धांत यही कहता है कि जैसे सरकार राष्ट्रीय राजमार्गों, रेलवे लाइनों और सार्वजनिक पार्कों का निर्माण करती है और उनका पूरा खर्च जनता से सीधे वसूलने के बजाय उसे ‘देश के विकास की लागत’ मानती है, वैसे ही यूपीआई को एक डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर (सार्वजनिक संपत्ति) माना जाना चाहिए।

ऐसे में तथ्‍य यही समझ आता है कि इस पूरे प्रकरण में सब्सिडी ही सही मार्ग है। सरकार को व्यापारियों की जेब काटने के बजाय अपने केंद्रीय बजट से हर साल ₹15,000 से ₹20,000 करोड़ की स्थायी वित्तीय सहायता बैंकों और एनपीसीआई को देनी चाहिए। यह खर्च देश की जीडीपी को मिलने वाली रफ्तार और पारदर्शी टैक्स कलेक्शन के सामने बेहद मामूली है, यह तो सरकार एवं उनके आर्थ‍िक विशेषज्ञ भी जानते ही हैं।

वस्‍तुत: यूपीआई पर शुल्क लगाने का निर्णय ठीक वैसा ही है जैसा उस सोने का अंडा देने वाली मुर्गी को काटने जैसा है, जो प्रतिदिन सरकार को टैक्स के रूप में करोड़ों का राजस्व दे रही है। यदि सरकार ने समय रहते इस फैसले की समीक्षा नहीं की और अपने नीतिगत ‘ज्ञान चक्षु’ नहीं खोले, तो डिजिटल इंडिया की यह ऐतिहासिक डाल कट जाएगी और देश की अर्थव्यवस्था वापस ‘कैश इज किंग’ (नकद राज) के पुराने और पारदर्शी-हीन दौर में पहुंच जाएगी।

अच्‍छा हो, केंद्र की मोदी सरकार कालिदास की भूल से कुछ सीख लेगी, वैसे भी सरकार में बैठे एवं केंद्र में जिस राजनीतिक पार्टी की सत्‍ता है वह भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) हर वर्ष कालीदास की जयन्‍ती पर उन्‍हें उनके विद्या योगदान के लिए नमन तो करती ही है, आशा है, उनके आचरण से सबक भी लेगी, इसलिए इस शुल्क को तुरंत वापस लेना चाहिए ताकि देश के डिजिटल पैर सुरक्षित रहें।

(लेखक फिल्‍म सेंसर बोर्ड, एडवाइजरी कमेटी के पूर्व सदस्‍य एवं पत्रकार हैं)

NSUI workers attack ABVP members’ residence at Hari Mandir; apprehended NSUI worker handed over to police

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Apprehended individual admits to being part of NSUI’s social media cadre

New Delhi : A serious incident of violence has been reported at the residence of ABVP members at Hari Mandir in Delhi University. NSUI workers entered the premises and attacked ABVP members who were holding a peaceful meeting. Women student members were also present at the residence at the time of the incident. Following the attack, several individuals fled the spot, while one attacker was apprehended by ABVP workers and handed over to the police.

ABVP Delhi State secretary Sarthak Sharma said, “NSUI must explain why its workers reached the residence of ABVP members and attacked them despite women student activists being present there. ABVP members were holding a peaceful meeting and had not provoked anyone. One person who was fleeing after the attack was apprehended and handed over to the police. ABVP did not take the law into its own hands; instead, we handed the individual over to the police. The apprehended person has admitted to being part of NSUI’s social media cadre. Congress-IYC-NSUI must explain why its social media cadre was involved in an attack on the residence of ABVP members? Students of Delhi University can clearly see the difference between democratic student engagement and the use of violence.

ABVP members are continuously engaging with students peacefully, while people associated with Congress-IYC-NSUI are allegedly resorting to violence. The Congress leadership must clarify its political accountability for the activities of its youth and student organisations. ABVP will not be intimidated by violence or pressure. We demand an impartial police investigation and strict legal action against all those involved, along with adequate measures to ensure the safety of students. The facts of the incident can also be verified from the local police.”

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