‘द केरला स्टोरी 2- गोज़ बियॉन्ड’ की रिलीज से पहले दिल्ली प्रेस कॉन्फ्रेंस में 55 पीड़ितों और 33 परिवारों ने साझा की अपनी आपबीती

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दिल्ली : द केरला स्टोरी 2- गोज़ बियॉन्ड’ की रिलीज से पहले, मेकर्स ने दिल्ली में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस रखी, जिसमें देशभर से आए पीड़ितों और उनके परिवारों को एक साथ लाया गया। यहाँ उन्होंने उन असल कहानियों को पेश किया, जो इस आने वाली फिल्म का आधार बताई जा रही हैं।

​इस इवेंट में बंगाल, बिहार, भीलवाड़ा, गंगापुर, राजकोट, उदयपुर, जम्मू, महाराष्ट्र, भोपाल, झारखंड, फरीदाबाद, मेरठ, दिल्ली, नोएडा, गुड़गांव और इंदौर के लोग शामिल हुए।

आयोजकों के मुताबिक, कुल 55 लड़कियों और 33 परिवार वालों ने सामने आकर अपने अनुभव शेयर किए हैं।

स्टेज पर 49 पीड़ित और उनके परिवार के सदस्य मौजूद थे, जबकि कई अन्य लोग दर्शकों के बीच बैठे थे। इस प्रेस कॉन्फ्रेंस में फिल्म की टीम भी शामिल थी, जिसमें प्रोड्यूसर विपुल अमृतलाल शाह, डायरेक्टर कामाख्या नारायण सिंह, को-प्रोड्यूसर आशिन ए. शाह के साथ फिल्म की लीड कास्ट उल्का गुप्ता, ऐश्वर्या ओझा और अदिति भाटिया नजर आईं। कुल मिलाकर, पीड़ितों और उनके परिवारों के साथ मेकर्स और कास्ट के छह सदस्य वहां मौजूद थे।

​इस सभा को सर्वाइवर्स और उन लड़कियों के परिवारों का एक मिला-जुला समूह बताया गया, जिनकी कथित तौर पर मृत्यु हो चुकी है। कई लोगों ने मीडिया से बात की, अपनी आपबीती सुनाई और लोगों से इस बारे में जागरूक होने की अपील की।

कामाख्या नारायण सिंह द्वारा निर्देशित यह फिल्म, जिसे कन्नड़ और तेलुगु भाषाओं में भी रिलीज किया जाएगा, तीन हिंदू लड़कियों उल्का गुप्ता, अदिति भाटिया और ऐश्वर्या ओझा की झकझोर देने वाली कहानी को सामने लाती है। उनकी जिंदगी तब एक खौफनाक मोड़ ले लेती है जब उन्हें तीन मुस्लिम लड़कों से प्यार हो जाता है, और ये रिश्ते धीरे-धीरे धर्म परिवर्तन के एक सोचे-समझे एजेंडे का खुलासा करते हैं। ‘द केरला स्टोरी 2- गोज़ बियॉन्ड’ का निर्माण विपुल अमृतलाल शाह ने सनशाइन पिक्चर्स के बैनर तले किया है। यह फिल्म 27 फरवरी, 2026 को सिनेमाघरों में रिलीज होने वाली है।

यूजीसी प्रकरण पर बीजेपी को सोशल मीडिया इन्फ्लूएंसर अजीत भारती के कुछ सुझाव

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01. धर्मेंद्र प्रधान बिना किसी स्पष्टीकरण के हटाए जाएँ।

02. यूजीसी वाली संसदीय कमिटी में जो भी सदस्य भाजपा के थे, उनमें से जो भी वामपंथियों के साथ कॉम्प्रोमाइज्ड हैं, उन्हें निकाला जाए।

03. अतिमहत्वपूर्ण: सामान्य वर्ग के निर्धन छात्र-छात्राओं को अनुसूचित जाति के स्तर की निःशुल्क/सब्सिडी की सुविधा- निःशुल्क कोचिंग, परीक्षा के फॉर्म, हॉस्टल की फीस, कोर्स की फीस आदि SC के समकक्ष। ऐसा करने से किसी को कोई समस्या नहीं होगी।

04. UGC-AICTE को समाप्त करने वाले बिल को बजट सत्र में ही ला कर यह कहें कि पूर्व के जो भी नियम हैं, उन्हें वर्तमान परिस्थितियों के आलोक में समीक्षा के उपरांत ही लागू किया जाएगा एवम् समाज के हर वर्ग का उचित ध्यान रखा जाएगा। कैम्पस को पुलिस थाना नहीं बनने देंगे।

05. हर नेता की भाषा में ‘दलित-वंचित-पीड़ित’ जैसी शब्दावली का लोप और ‘हर वर्ग के लिए समर्पित’ जैसे वाक्यांशों का प्रयोग। टोन में यह बदलाव काफी सहायक सिद्ध होगा।

05. पार्टी के लिए ‘नैरेटिव बनाने वाली’ हर कंपनी का कॉन्ट्रैक्ट रद्द करें, ऑडिट हो कि इन्होंने कौन सा सर्वे सही किया, किस विषय पर कितना नैरेटिव बनाया, पार्टी के लिए कौन से बीस अकाउंट बनाए जो प्रभावशाली कहे जा सकते हैं। जो कसौटी पर खड़ा उतरे उसे रखें।

06. अम्बेडकर को बाप मानना बंद करें। जितना कर दिए, वही जितनी घृणा उत्पन्न कर रहा है, वह आपसे हैंडल नहीं हो सकेगा।

08. आइटी सेल (के नाम से चलने वाले, या माने जाने वाले) हैंडलों को पार्टी-विरोधी गतिविधि करने से रोकें। उन्हें समझाएँ कि किसी को पर्सनल गाली दे कर पार्टी को सामूहिक क्षति पहुँचाना किस स्तर की मूर्खता है। ऐसे लोगों को बताएँ कि उनकी डिफेंस पार्टी पर कितनी भारी पड़ रही है।

09. वैसी कोई योजना न बनाएँ जिसमें SC/ST/OBC का तुष्टिकरण स्पष्ट दिखे। जिन चीजों को माँगा न जाए, वो दे कर पागल न करें।

10. कैम्पस और सोशल मीडिया में ब्राह्मण-घृणा फैलाने वाले लोगों पर पुलिसिया कार्रवाई, हैंडलों पर भारत में प्रतिबंध। इस बात की स्वीकार्यता हो कि ऐसी कोई बात हो रही है देश में जो नारेबाजी से आरंभ हो कर अब एक ब्राह्मण छात्र को बाथरूम में बंद कर, अग्निशामक से शुष्क कार्बन डाई ऑक्साइड चला कर मारने तक पहुँच चुका है। विक्टिम कार्ड नहीं, उचित कार्रवाई का आश्वासन और एक्शन।

11. हर राज्य में कुकुरमुत्ते की तरह पास होते सामान्य वर्ग के हिन्दुओं को अपराधी बनाने वाले कानून (BC एट्रोसिटी एक्ट) पर आपकी पार्टी के वकील उसका प्रतिकार कोर्ट में करें। या, आप उसे सर्वसमावेशी बनाने पर बल दें कि जातिवादी घृणा का शिकार किसी भी जाति का व्यक्ति हो सकता है।

१2. किसी बड़े नेता द्वारा किसी पॉडकास्ट आदि पर यह स्वीकार कराएँ कि पार्टी की चुप्पी ने बहुत क्षति पहुँचाई, दोनों ही तरफ के लोग अपने हैं, उनके कन्सर्न्स उचित हैं। यह भी कि यह नियमावली वर्तमान परिस्थितियों को देखने की जगह वामपंथी प्रायोजित विमर्श को सत्य मान कर बनाई गई, जो अनुचित है।

१3. कोर्ट यदि ऐसे मामलों में कोई निर्णय दे, तो उसे पलट कर राजीव गाँधी न बनें।

नेशनल दस्तक पत्रकारिता नहीं, करता है’धंधा’

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दीपक पांडेय

‎दिल्ली। मेरी पहली ही नौकरी नेशनल दस्तक में थी और मैं यहां का पहला फाउंडर जूनियर सब एडिटर बना। मतलब इस मीडिया कंपनी में जुड़ने वाला मै पहला जूनियर सब एडिटर था। इसी चैनल के उद्घाटन पर पहली बार रविश कुमार से मिला। आप जब इसके उद्घाटन का वीडियो देखेंगे तो इसमें मेरा भी नाम लिया गया है।

‎पर यहां का इतना जहरीला माहौल था कि पहले ही दिन से उल्टी आने लगी। मैं फरीदाबाद से दिल्ली इसे ज्वाइन करने आ रहा था, मेरे लिए तब दिल्ली बिल्कुल नई थी। कुछ नहीं जानता था मैं  Delhi के रूट आदि के बारे में। रास्ता भटक गया।

‎10 बजे की बजाय 10.30 बजे पहुंचा। पहले ही दिन आंबेडकरवाद और सामाजिक न्याय के मसीहा संपादक जी ने मुझको वेलकम में ही काफी खरी खोटी सुना दी। मैं तो बस शॉक्ड था। ये एकदम से नया नया था। पहले ही दिन डांट।

‎तब जबकि किसी अन्य मीडिया समूह में कभी भी ऐसा नहीं होता। क्योंकि उसके बाद मैं कई बड़े मीडिया समूह के साथ काम किया। वहां तो बकायदा से हंसते मुस्कराते हुए वेलकम होता है।

‎खैर, दो महीना भी इनके साथ काम करना मुहाल हो गया। मैं शायद दुनिया का पहला ऐसा व्यक्ति रहा हूं, जो पहले ही दिन से पहली ही जॉब में सबसे पहले दूसरी जॉब ढूंढने लगा।

‎जब दो महीने तक कोई नई जॉब नहीं मिला, तो नेशनल दस्तक में 14 दिन की सैलरी छोड़कर गांव वापस प्रयागराज चला आया। मैने अपने घर वालों को भी नहीं बताया कि मैने जॉब छोड़ दी।

‎करीब हफ्ते भर गांव में रहा। उसी दौरान एक इंटरव्यू के लिए काल आया। फिर दोबारा दिल्ली आ गया। इंटरव्यू दिया और संयोगवश मेरा सलेक्शन हो भी गया। लेकिन मुझे मेरी 14 दिन की सैलरी याद थी, जो नेशनल दस्तक के साथ काम किया था। मैं उसी दिन शाम को उनसे बकाया सैलरी लेने के लिए पहुंच गया।

‎पहले दिन उन्होंने सैलरी देने से साफ मना कर दिया और बोला – तुमने (वहां आपने कहने का चलन नहीं था) बिना बताए जॉब छोड़ दिया। इसलिए तुमको कुछ नहीं मिलेगा। मैने भी कहा – क्यों, नहीं मिलेगा?

‎अभी तो मैं तीन महीने के प्रोबेशन पीरियड पर था। जब आप अपनी सेवा शर्तों के अनुसार बिना किसी सूचना के इस दौरान मुझे कंपनी से बाहर निकालने पर सिग्नेचर करवाएं हैं, तो मुझे भी तीन महीने तक बाहर निकलने के लिए आपको बिना कुछ बताए बाहर निकलने का अधिकार है। आपको मेरी सैलरी देनी ही होगी। चाहे जो कुछ हो जाए।

‎यह अधिकार आदि वाली थेथरई मैने इन्हीं के साथ दो महीने तक काम करते हुए सीखी थी और उनके ही लॉजिक से मेरा इस बात को लेकर वहां खूब विवाद हुआ। मैने कहा – मैं बिना सैलरी लिए वापस नहीं जाऊंगा। आपको देना ही होगा।

‎फिर उन्होंने दूसरे दिन आने को बोला और मैं दूसरे दिन आकर सैलरी लेकर ही गया। लेकिन फिर भी इन्होंने मेरे पूरे 14 दिन की सैलरी नहीं दी। केवल 7 दिन की ही दी। मैने भी मन ही मन ही कहा – जहां एक दिन की भी मिलने की उम्मीद नहीं थी, तो यहां यार.. भागे भूत की लंगोटी ही सही। इन्हीं से सीखी थेथरई, कुछ तो काम आया।

‎मैं शायद मीडिया का पहला भी ऐसा आदमी रहा होऊंगा, जो 90 फीसदी की अधिकार की हिस्सेदारी का नारा लगाने वालों से अपना 50 प्रतिशत अधिकार लड़के वसूल लिया। बिल्कुल भी विक्टिम कार्ड नहीं खेला।

‎मैं बता दूं कि इनका सिंगल प्वाइंट एजेंडा है। थेथरई करना, विक्टिम कार्ड खेलना और वंचितों और गरीबों की भावनाओं का दोहन करते हुए समाज और सरकार को ब्लैकमेल करना।

‎अगर पत्रकारिता की आड़ में ब्लैकमेलिंग के कारोबार को चलाने का कोई आदर्श उदाहरण देखना हो, तो वह यहां जैसे मीडिया संस्थानों में देखा जा सकता है। यहां काम करने वाले खुद को पत्रकार कहने वाले दलालों को देखा जा सकता है।

‎इस नेशनल दस्तक चैनल का आप लोगो देखिए, इसमें आपको नीले बैकग्राउंड के साथ लाल रंग का चक्र दिखेगा। इसी से इनकी विचारधारा समझा जा सकता है। नीला बैकग्राउंड वामसेफियों के वामन मेश्राम जैसे जहरीले लोगों का प्रतीक है, तो लाल रंग पत्रकारिता की आड़ में छिपे वामपंथियों की कलुषित विचारधारा का संचालक, जिसका काम खबरों के नाम पर उन्हें अपने एजेंडे के हिसाब से मैनिपुलेट करना और समाज में खाई पैदा करना है।

‎अगर आपको लगता है कि ये पत्रकारिता कर रहे तो आप बड़ी भूल में हैं। इनके लिए अपने फायदे के लिए दूसरे वर्ग के लोगों पर जहरीली जबान का इस्तेमाल करना न्यू नार्मल है। धंधा है। क्योंकि इससे क्लिक बेट के साथ साथ फंड भी अच्छा खासा मिलता है। इनकी स्थापना ही प्रोपोगेंडा के लिए होता है।

दुनिया का पहला अंगदान-देहदान समर्पित अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव ‘वरदान 2026’ दिल्ली में 26-27 फरवरी को

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नई दिल्ली : अंगदान, नेत्रदान और देहदान जैसे संवेदनशील एवं जीवनदायी विषयों को केंद्र में रखकर विश्व का पहला समर्पित अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव – ‘वरदान अंतरराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल 2026’ – 26 एवं 27 फरवरी 2026 को दिल्ली में आयोजित किया जा रहा है।
यह अभिनव आयोजन दधीचि देहदान समिति और संप्रेषण मल्टीमीडिया के संयुक्त तत्वावधान में होगा।
27 वर्ष पूर्व आलोक कुमार की प्रेरणा से स्थापित दधीचि देहदान समिति ने पिछले 13 वर्षों में लगभग 1250 अंगदान-नेत्रदान और 500 से अधिक देहदान में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। इन प्रयासों से हजारों मरीजों को नया जीवन मिला, जबकि मेडिकल छात्रों को “प्रथम मूक गुरु” के रूप में पार्थिव शरीर उपलब्ध हुए।
चार वर्ष पूर्व देशभर की 45 संस्थाओं ने समिति को नेतृत्व सौंपा और आलोक कुमार को अध्यक्ष चुना। वर्तमान में वे विश्व हिंदू परिषद के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं। समिति के पूर्व अध्यक्ष हर्ष मल्होत्रा वर्तमान में केंद्र सरकार में राज्य मंत्री हैं, जबकि पूर्व उपाध्यक्ष रेखा गुप्ता दिल्ली की मुख्यमंत्री के रूप में जनसेवा कर रही हैं।
यह महोत्सव सिनेमा के माध्यम से अंगदान-देहदान के प्रति जागरूकता फैलाने के साथ सामाजिक सरोकारों पर रचनात्मक अभिव्यक्ति को वैश्विक मंच प्रदान करेगा।
उद्घाटन समारोह
26 फरवरी को प्रातः 11 बजे माननीय मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता उद्घाटन करेंगी। मुख्य अतिथि के रूप में राज्य मंत्री हर्ष मल्होत्रा और संस्कृति मंत्री कपिल मिश्रा उपस्थित रहेंगे। सुप्रसिद्ध अभिनेता मनोज जोशी विशिष्ट अतिथि होंगे। दधीचि देहदान समिति के संस्थापक आलोक कुमार और फेस्टिवल निदेशक अतुल गंगवार भी मौजूद रहेंगे।
फिल्म प्रदर्शन एवं कार्यक्रम

देश-विदेश से चयनित 70+ उत्कृष्ट फिल्मों का प्रदर्शन होगा। इनमें अंगदान-देहदान की प्रेरक कहानियां, मानवीय संवेदना और जीवन पुनर्सृजन के संदेश होंगे।
  • निर्माता-निर्देशक-कलाकारों के साथ संवाद सत्र
  • विशेष मास्टर क्लास:
    • 26 फरवरी, दोपहर 2 बजे — मनोज जोशी: “अभिनय की बारीकियाँ और सिनेमा की संवेदनशीलता”
    • 27 फरवरी — अनंत विजय: “सिनेमा में विषय चयन और सामाजिक सरोकार”
  • आलोक कुमार के साथ युवा विद्यार्थियों का विशेष संवाद
  • पुरस्कार समारोह

    27 फरवरी संध्या को सर्वश्रेष्ठ फिल्मों को प्रथम, द्वितीय एवं तृतीय पुरस्कार दिए जाएंगे। विजेताओं को ट्रॉफी, प्रमाणपत्र एवं लाखों रुपये की पुरस्कार राशि प्रदान की जाएगी।

    समापन संदेश

    ‘वरदान अंतरराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल 2026’ सिनेमा और सामाजिक चेतना का अनुपम संगम है। यह संदेश देता है कि अंगदान-देहदान मृत्यु के बाद भी जीवन देने की सर्वोच्च मानवीय परंपरा है। आयोजकों ने फिल्मकारों, मीडिया, विद्यार्थियों और समाज के सभी वर्गों से इस ऐतिहासिक आयोजन में सक्रिय भागीदारी की अपील की है।

    (अधिक जानकारी के लिए: वेबसाइट vardaanfilmfestival.com या दधीचि देहदान समिति से संपर्क करें।)

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