ABVP’s Organisational Architect Prof. Yashwantrao Kelkar Remembered Through ‘Priya Kelkar Ji’ Commemorative Presentation

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New Delhi : Akhil Bharatiya Vidyarthi Parishad (ABVP) Delhi organised a special commemorative programme titled ‘Priya Kelkar Ji’ on the occasion of the birth centenary year of ABVP’s organisational architect and former National President Prof. Yashwantrao Kelkar Ji at Dr. Shyama Prasad Mukherjee Civic Centre. The programme was attended by Rashtriya Swayamsevak Sangh’s Sarkaryavah Dattatreya Hosabale Ji as the Chief Guest.

On this occasion, former ABVP National President Prof. Rajkumar Bhatia Ji, National President Prof. RaghurajKishore Tiwari Ji, Akhil Bharatiya Chhatra Karya Pramukh Manu Sharma Kataria Ji, ABVP Delhi President Dr. Tapan Bihari Ji and ABVP Delhi Secretary Sarthak Sharma Ji were present. Senior RSS Pracharaks, Vice Chancellors, Registrars and Professors from various universities, the Speaker of Delhi Legislative Assembly, Ministers of the Delhi Government, Karyakartas of other Sangh-affiliated organisations and a large number of students were also present in the programme.

A nationalist thinker, organisational architect and a profound source of inspiration for student movement rooted in national consciousness, Prof. Yashwantrao Kelkar Ji was born on 25 April 1925 in Pandharpur (Solapur), Maharashtra. Considering national service as the mission of his life since his student days, Kelkar Ji became a Pracharak of the Rashtriya Swayamsevak Sangh in 1945. In 1955, he began teaching as a Professor of English at National College and, following the directions of the Sangh, started working for Akhil Bharatiya Vidyarthi Parishad. Through his distinctive style of functioning, ABVP received ideological clarity, organisational vision and a unique methodology of cadre-building, which gave ABVP a strong pan India presence. He played a pioneering role in establishing student power as a force for nation-building.

During the programme, the performance troupe led by Milind Bhadge from Pune presented ‘Priya Kelkar Ji’ in a impactful manner, portraying the life, thoughts and organisational methodology of Prof. Kelkar Ji. The presentation highlighted ABVP’s style of functioning, planning in detail and planning in advance, time management, discipline, collective functioning and the vibrant cadre-building methodology which Prof. Kelkar Ji embodied through his life.

Addressing the gathering, RSS Sarkaryavah Dattatreya Hosabale Ji said, “Balasaheb Deoras Ji used to say that Yashwantrao Kelkar Ji was a true inheritor of Dr. Hedgewar’s legacy. Prof. Kelkar Ji provided the organisational principles on which ABVP’s strong foundation was built. He ensured that ABVP was not limited merely to agitations, but was guided towards constructive work, representation and nation-building. Through teamwork, punctuality, simplicity, optimum utilisation of resources and an affectionate organisational methodology, Prof. Kelkar Ji presented an ideal model of organisational life. He was a personality who carried everyone together without any jealousy or bitterness. His life remains an eternal source of inspiration for workers.”

Highlighting ABVP’s organisational methodology and vision for life, he further said, “While working with Prof. Yashwantrao Kelkar Ji, I received a vision for life in ABVP, which further nurtured and enriched in the Sangh.”

ABVP National President Prof. Raghuraj Kishore Tiwari Ji said, “The life-journey of Prof. Yashwantrao Kelkar Ji is an ideal for every karyakarta. The methodology of functioning that ABVP follows across the nation today has been bestowed by Prof. Kelkar Ji. His life teaches us that there should be no difference between words and actions in the life of a karyakarta.”

Former ABVP National President Prof. Rajkumar Bhatia Ji said, “If we wish to understand the personality of Prof. Kelkar Ji and ABVP’s methodology of functioning, it is essential to seriously study the literature based on his life and thoughts. Prof. Kelkar Ji considered ABVP as a workshop for personality development.”

 

‘प्रिय केलकर जी’ अभिवाचन कार्यक्रम में जीवंत हुआ संगठन शिल्पी प्रा. यशवंतराव केलकर का व्यक्तित्व

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नई दिल्ली। अभाविप के संगठन शिल्पी एवं पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष प्रा. यशवंतराव केलकर जी के जन्मशती वर्ष के उपलक्ष्य में ‘प्रिय केलकर जी’ विशेष अभिवाचन कार्यक्रम का आयोजन डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी सिविक सेंटर में किया गया। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले जी उपस्थित रहे। इस अवसर पर अभाविप के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष प्रो. राजकुमार भाटिया जी, राष्ट्रीय अध्यक्ष प्रो. रघुराज किशोर तिवारी जी, अखिल भारतीय छात्रा कार्य प्रमुख मनु शर्मा कटारिया जी, दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष डॉ. तपन बिहारी जी तथा प्रदेश मंत्री सार्थक शर्मा जी उपस्थित रहे। कार्यक्रम में विभिन्न विश्वविद्यालयों के कुलपति, कुलसचिव, प्राध्यापक, दिल्ली विधानसभा अध्यक्ष, दिल्ली सरकार के मंत्री, संघ प्रेरित संगठनों के कार्यकर्ता एवं बड़ी संख्या में विद्यार्थी उपस्थित रहे।

राष्ट्रनिष्ठ चिंतक, संगठन शिल्पी एवं विद्यार्थी चेतना के प्रखर प्रेरणास्रोत प्रा. यशवंतराव केलकर जी का जन्म 25 अप्रैल, 1925 को महाराष्ट्र के पंढरपुर (सोलापुर) में हुआ था। विद्यार्थी जीवन से ही राष्ट्र कार्य को जीवन का ध्येय मानने वाले केलकर जी 1945 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक बने। 1955 में अंग्रेजी के प्राध्यापक के तौर पर उन्होंने नेशनल कॉलेज में पढ़ाना शुरू किया और संघ के निर्देशानुसार अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद का कार्य प्रारम्भ किया। उनकी कार्यशैली से अभाविप को वैचारिक स्पष्टता, संगठनात्मक दृष्टि एवं कार्यकर्ता निर्माण की ऐसी कार्यपद्धति प्राप्त हुई, जिसने अभाविप को अखिल भारतीय स्वरूप प्रदान किया। उन्होंने छात्र शक्ति को राष्ट्र निर्माण की शक्ति के रूप में स्थापित करने का कार्य किया।

कार्यक्रम में पुणे से आई मिलिंद भड़गे के नेतृत्व वाली अभिवाचन टोली ने ‘प्रिय केलकर जी’ प्रस्तुति के माध्यम से प्रा. केलकर जी के जीवन, विचार एवं कार्यपद्धति को मंचित किया। प्रस्तुति में अभाविप की कार्यशैली, पूर्व योजना-पूर्ण योजना, समय संतुलन, अनुशासन, सामूहिकता तथा कार्यकर्ता निर्माण की उस जीवंत पद्धति को प्रस्तुत किया गया।

सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले जी ने कहा, “बालासाहेब देवरस जी कहा करते थे कि यशवंतराव केलकर जी डॉ. हेडगेवार के कुलोत्पन्न हैं। प्रा. केलकर जी ने संगठन निर्माण के वे सूत्र दिए, जिन पर अभाविप की सशक्त नींव खड़ी हुई। उन्होंने अभाविप को केवल आंदोलन तक सीमित न रखते हुए रचनात्मकता, प्रतिनिधित्व एवं राष्ट्र निर्माण की दिशा प्रदान की। प्रा. केलकर जी ने टीम वर्क, समय पालन, सादगी, संसाधनों के सदुपयोग एवं आत्मीय कार्यपद्धति के माध्यम से संगठन जीवन का आदर्श प्रस्तुत किया। वे बिना किसी ईर्ष्या-द्वेष के सभी को साथ लेकर चलने वाले व्यक्तित्व थे। उनका जीवन कार्यकर्ताओं के लिए प्रेरणा का अखंड स्रोत है।” उन्होंने कहा, “प्रा. यशवंतराव केलकर जी के साथ कार्य करते हुए, विद्यार्थी परिषद में मुझे जीवन दृष्टि मिली और संघ में वह विकसित हुई।”

अभाविप के राष्ट्रीय अध्यक्ष प्रो. रघुराज किशोर तिवारी जी ने कहा, “प्रा. यशवंतराव केलकर जी का जीवन प्रत्येक कार्यकर्ता के लिए आदर्श है। आज अभाविप की जो कार्यपद्धति देशभर में दिखाई देती है, वह प्रा. केलकर जी द्वारा प्रदत्त है। उनके जीवन से यह सीखने की आवश्यकता है कि कार्यकर्ता के जीवन में कथनी और करनी में कोई अंतर नहीं होना चाहिए।”

अभाविप के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष प्रो. राजकुमार भाटिया जी ने कहा, “यदि हमें प्रा. केलकर जी के व्यक्तित्व एवं अभाविप की कार्यपद्धति को समझना है, तो उनके जीवन एवं विचारों पर आधारित साहित्य का अध्ययन करना आवश्यक है। प्रा. केलकर जी विद्यार्थी परिषद को व्यक्तित्व निर्माण की कार्यशाला मानते थे।”

राजस्थान का ग्राम चौपाल कार्यक्रम : जनसंवाद और सुशासन की नई पहल

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जयपुर । राजस्थान सरकार द्वारा मुख्यमंत्री श्री भजनलाल शर्मा के नेतृत्व में संचालित “ग्राम चौपाल” कार्यक्रम ग्रामीण क्षेत्रों में सुशासन, त्वरित समस्या समाधान तथा जनभागीदारी को सशक्त बनाने की दिशा में एक अभिनव पहल बनकर उभरा है। इस कार्यक्रम के माध्यम से मुख्यमंत्री स्वयं गांवों में पहुंचकर आमजन, किसानों, महिलाओं, युवाओं एवं वरिष्ठ नागरिकों से सीधे संवाद स्थापित कर रहे हैं तथा प्रशासनिक अधिकारियों को मौके पर ही समस्याओं के समाधान के निर्देश दिए जा रहे हैं।

अब तक आयोजित तीनों ग्राम चौपालों ने ग्रामीण जनता में सरकार के प्रति विश्वास को मजबूत किया है तथा प्रशासनिक संवेदनशीलता का प्रभावी उदाहरण प्रस्तुत किया है।

पहली ग्राम चौपाल : समस्याओं के त्वरित समाधान पर फोकस

पहली ग्राम चौपाल में मुख्यमंत्री ने ग्रामीणों से पेयजल, बिजली, सड़क, चिकित्सा एवं राजस्व संबंधी समस्याओं की जानकारी ली। कई मामलों में मौके पर ही अधिकारियों को समाधान के निर्देश दिए गए। किसानों ने सिंचाई, बिजली आपूर्ति और फसल बीमा से जुड़ी समस्याएं रखीं, जिन पर मुख्यमंत्री ने प्राथमिकता से कार्रवाई सुनिश्चित करने को कहा।

इस दौरान मुख्यमंत्री ने वरिष्ठ नागरिकों से भी आत्मीय संवाद किया और सामाजिक सुरक्षा पेंशन योजनाओं के लाभों की जानकारी ली। महिलाओं ने उज्ज्वला योजना, जल उपलब्धता और स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़े विषय उठाए, जबकि युवाओं ने रोजगार, कौशल विकास और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारियों से संबंधित सुझाव दिए।

दूसरी ग्राम चौपाल : जनकल्याण योजनाओं की पहुंच बढ़ाने पर जोर

दूसरी चौपाल में मुख्यमंत्री ने विभिन्न विभागों की योजनाओं की समीक्षा करते हुए पात्र लोगों को योजनाओं से जोड़ने पर विशेष बल दिया। चिकित्सा, शिक्षा, पशुपालन एवं कृषि विभागों द्वारा शिविर आयोजित कर ग्रामीणों को लाभान्वित किया गया।

मुख्यमंत्री ने किसानों से प्राकृतिक खेती, उन्नत कृषि तकनीक और कम लागत वाली खेती पर चर्चा की। महिलाओं के स्वयं सहायता समूहों की गतिविधियों की सराहना करते हुए उन्हें स्वरोजगार से जोड़ने के प्रयासों को गति देने के निर्देश दिए गए। युवाओं से संवाद में स्टार्टअप, डिजिटल शिक्षा और खेल सुविधाओं पर विशेष चर्चा हुई।

वरिष्ठ नागरिकों ने गांवों में स्वास्थ्य सुविधाओं और पेंशन प्रक्रियाओं को सरल बनाने की मांग रखी, जिस पर मुख्यमंत्री ने अधिकारियों को संवेदनशीलता से कार्य करने के निर्देश दिए।

तीसरी ग्राम चौपाल : विकास कार्यों की मॉनिटरिंग और संवेदनशील प्रशासन

तीसरी ग्राम चौपाल में मुख्यमंत्री ने विकास कार्यों की जमीनी स्थिति की समीक्षा की तथा अधिकारियों से कार्यों की गुणवत्ता एवं समयबद्धता सुनिश्चित करने को कहा। कई स्थानों पर राजस्व रिकॉर्ड सुधार, सड़क मरम्मत, बिजली कनेक्शन और पेयजल समस्याओं के समाधान की कार्रवाई मौके पर ही प्रारंभ करवाई गई।

मुख्यमंत्री ने महिलाओं से पोषण, शिक्षा और सुरक्षा संबंधी मुद्दों पर चर्चा की तथा बेटियों की शिक्षा को सरकार की प्राथमिकता बताया। किसानों से संवाद में उन्होंने रासायनिक उर्वरकों के कम उपयोग, जैविक एवं प्राकृतिक खेती तथा जल संरक्षण पर जोर दिया। युवाओं से चर्चा में रोजगार के नए अवसर, कौशल प्रशिक्षण और तकनीकी शिक्षा को बढ़ावा देने की बात कही गई।

वरिष्ठ नागरिकों ने मुख्यमंत्री के गांवों तक पहुंचकर संवाद करने की पहल की सराहना की। आम नागरिकों ने भी ग्राम चौपालों को प्रशासन और जनता के बीच दूरी कम करने वाला प्रभावी मंच बताया।

सुशासन का प्रभावी मॉडल

ग्राम चौपाल कार्यक्रम केवल जनसुनवाई तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह प्रशासनिक जवाबदेही और विकास कार्यों की निगरानी का प्रभावी माध्यम बनकर सामने आया है। इन चौपालों के माध्यम से सरकार अंतिम व्यक्ति तक योजनाओं का लाभ पहुंचाने, ग्रामीण समस्याओं का त्वरित समाधान करने तथा संवेदनशील शासन व्यवस्था स्थापित करने की दिशा में निरंतर कार्य कर रही है।

मुख्यमंत्री श्री भजनलाल शर्मा की यह पहल “अंत्योदय” और “जनसेवा” की भावना को मजबूत करते हुए राजस्थान में सुशासन के नए अध्याय का आधार बनती दिखाई दे रही है।

मिथक गढ़ने में बहुत कुशल होते हैं वामपंथी

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कोलकाता । अभी लेनिन की चार पाँच दिनों से ज़्यादा याद सताने लगी है तब से सोशल मीडिया पर एक मिथक घुमा रहे हैं।

उनका रचा मिथक यह है कि जब भगतसिंह को फाँसी होने वाली थी तो वे लेनिन की पुस्तक पढ़ रहे थे और उन्होंने कहा कि रुको अभी एक क्रांतिकारी दूसरे क्रांतिकारी से बात कर रहा है।

सबसे पहले तो यह कि पढ़ने से आप उस विचारधारा के अनुयायी हो जाते हैं क्या? तब तो हम जैसे बहु-अधीत क्या क्या न हुए।

पर सवाल यह है कि वामपंथी दावे का कोई प्रत्यक्ष प्रामाणिक जेल रिकॉर्ड (जैसे आधिकारिक जेल लॉग, वार्डर की आधिकारिक रिपोर्ट या एक्जीक्यूशन सर्टिफिकेट) क्यों उपलब्ध नहीं है।

प्राण नाथ मेहता (भगत सिंह के वकील) ने उन्होंने 23 मार्च 1931 को फाँसी से कुछ घंटे पहले मुलाकात की। उन्होंने भी इस पंक्ति का कोई उल्लेख नहीं किया।

इस मिथक के भी दो मुख्य संस्करण चलते हैं क्योंकि पुस्तक का नाम ठीक ठीक स्थिर नहीं कर पाये हैं — क्लारा जेटकिन की Reminiscences of Lenin (विकिपीडिया और कई वामपंथी स्रोतों में) या लेनिन की खुद की State and Revolution।

1931 में The Hindu, Bombay Chronicle आदि में फाँसी की खबर है, विरोध का उल्लेख है, संपादकीय छपे, लेकिन सेल के अंदर की यह निजी घटना नहीं।

मनमथनाथ गुप्त इसे प्रचारित करने वाले शख़्स थे पर उन्होंने भी इसे दूसरे क्रांतिकारियों से सुना था। मन्मथनाथ गुप्त स्वयं मार्क्सवादी क्रांतिकारी और कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (CPI) के सदस्य थे।

जबकि ऐतिहासिक सच्चाई यह थी कि 13 नवंबर 1930 को The Workers’ Weekly CPI के मुखपत्र ने भगतसिंह और उनके साथियों के कार्यों को “a psychology of revenge and not revolution” कहकर आलोचना की थी।तब लाहौर षड्यंत्र केस का मुक़दमा चल रहा था।

और जो लोग गाँधी जी की आलोचना यह कहते हुए करते हैं कि उन्होंने भगत सिंह की फाँसी को रुकवाने में कोई मदद नहीं की, वे स्वयं कम्युनिस्टों की आलोचना नहीं करते कि कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (CPI) ने अपने किसी अधिवेशन या सम्मेलन में भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव की फाँसी न देने का कोई औपचारिक संकल्प (resolution) पारित नहीं किया।

बल्कि यह भी ऐतिहासिक तथ्य है कि रणदिवे और मुजफ्फर अहमद आदि कम्युनिस्टों ने भगतसिंह और उनके साथियों को एडवेंचरिस्ट और काउंटर प्रोडक्टिव कहा था। मजे की बात है कि इनके लिए भगतसिंह एडवेंचरिस्ट थे पर नक्सल न थे। कि जैसे भगतसिंह mass revolution इनके हिसाब से इन मेथड्स से नहीं करवा सकते थे तो नक्सल mass revolution करवा सकते थे!

बल्कि कांग्रेस ने तो फिर भी कराची अधिवेशन (29 मार्च 1931) में प्रस्ताव पारित किया, जिसमें उनकी बहादुरी की प्रशंसा की गई, फाँसी को “wanton vengeance” (निरर्थक बदला) कहा गया और ब्रिटिश सरकार की आलोचना की गई। यह कांग्रेस का आधिकारिक स्टैंड था। लेकिन कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (CPI) ने अपने किसी अधिवेशन या सम्मेलन में भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव की फाँसी की निंदा का कोई औपचारिक प्रस्ताव (resolution) पारित नहीं किया।

लेकिन मिथक तो गढ़ा ही जा सकता है ताकि भगतसिंह के आकर्षण का विनियोग अपने हित में किया जा सके और गढ़ने वाला स्वयं साहित्यकार हो तो और कुशलता से।

अब एक मिथक और ताजा ताजा आया है। कि सुभाष ने किसी मंदिर से बाहर निकलते समय अपना तिलक पोंछ लिया और कहा कि वर्दीधारियों का कोई धर्म नहीं होता।

और इसे भी वे ही वामपंथी प्रचारित कर रहे हैं जो सुभाष को Tojo’s dog,” a “running dog of Japanese imperialism,” “quisling,” या “agent of fascism” कह रहे थे।

पर इस बार की गढ़न उतनी भी साहित्यिक नहीं है। अंतर्विरोधी अलग है।यदि उस समय सुभाष वर्दी में थे और धर्म व कर्त्तव्य में इस द्वैत के प्रति सजग थे तो वर्दी में मंदिर गये ही क्यों थे? गये थे तो तिलक लगवाया ही क्यों था? और बाहर निकलकर ही क्यों पोंछा था, वहीं क्यों नहीं पोंछ दिया ?

और वैसे थोड़ी देर बाद सभी पोंछ देते हैं पर उनसे इनका नैरेटिव निर्माण नहीं होता।

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