ओवैसी जिस यूसीसी का विरोध और शरिया की वकालत कर रहे, क्या उन्हें महिलाओं का दर्द दिखता है?

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डॉ. मयंक चतुर्वेदी

दिल्ली । असदुद्दीन ओवैसी का समान नागरिक संहिता का विरोध करना कोई नया राजनीतिक रुख नहीं है। 15 सितंबर को भोपाल में आयोजित सभा में ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) प्रमुख ने एक बार फिर यूसीसी पर सवाल उठाते हुए कहा, “मुसलमानों के अपने मजहबी कानून और पहचान हैं तथा संविधान के अनुच्छेद 14, 25, 26 और 29 के तहत मिले अधिकारों की अनदेखी नहीं की जा सकती।” उनका तर्क है कि समान नागरिक संहिता (यूसीसी) के नाम पर हिंदू व्यक्तिगत कानूनों की संरचना दूसरे समुदायों पर नहीं थोपी जा सकती।

यह बहस लोकतंत्र में पूरी तरह वैध है। धार्मिक स्वतंत्रता, अल्पसंख्यक अधिकार और व्यक्तिगत कानून संविधान के गंभीर विषय हैं। चलो हमने यह एक बार को मान भी लिया, किंतु क्‍या इसकी आड़ लेकर मुस्लिम महिलाओं के समानता, गरिमा, स्वतंत्रता और सुरक्षा के अधिकार से खिलवाड़ किया जाता रहना चाहिए? ऐसे में एडवोकेट औवेसी और उन तैसे तमामों से सवाल सीधा है- जब व्यक्तिगत कानून या धार्मिक परंपरा के नाम पर किसी महिला की इच्छा, गरिमा अथवा शारीरिक स्वायत्तता प्रभावित होती है, तब उसकी सुरक्षा का रास्ता क्या होगा?

निकाह हलाला से जुड़े हालिया मामलों ने यह बार-बार सोचने पर मजबूर किया है कि क्‍या मुस्‍लिम महिला की गरिमा का ध्‍यान नहीं रखा जाना चाहिए, क्‍या उसका सम्‍मान, सम्‍मान नहीं है? उत्तर प्रदेश के अमरोहा मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जुलाई 2026 में उस एफआईआर को रद्द करने से इनकार कर दिया, जिसमें एक महिला ने आरोप लगाया था कि उसके नाबालिग रहते हुए और बाद में वयस्क होने पर भी निकाह हलाला के नाम पर उसके साथ यौन अपराध किए गए। न्‍यायालय ने स्पष्ट किया कि आपराधिक कृत्य को व्यक्तिगत कानून की आड़ नहीं दी जा सकती। साथ ही अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि उसके समक्ष हलाला की संवैधानिक वैधता का प्रश्न विचाराधीन नहीं था।

वस्‍तुत: यहां यह समझना जरूरी है कि धार्मिक आस्था और आपराधिक कृत्य एक ही चीज नहीं हो सकते हैं। किसी भी समुदाय की धार्मिक (मजहबी, रिलीजियस) पहचान का सम्मान लोकतांत्रिक समाज में होना ही चाहिए, इससे मना कौन करता है, किंतु किसी महिला के साथ जबरदस्ती, यौन शोषण अथवा हिंसा को मजहबी या अन्‍य किसी भी स्‍तर पर शब्दावली गढ़कर वैध नहीं माना जा सकता। यह तो सीधे तौर पर मजहब की आड़ लेकर किसी महिला के साथ बलात्‍कार करना है!

उत्तराखंड में यूसीसी लागू होने के बाद मई 2026 में हलाला से जुड़ा पहला मामला सामने आया। हरिद्वार के बुग्गावाला क्षेत्र में एक महिला की शिकायत पर पुलिस ने उसके पति और ससुराल पक्ष के लोगों के खिलाफ कार्रवाई की और आरोप-पत्र दाखिल किया। महिला ने बताया था कि उस पर निकाह हलाला के लिए दबाव बनाया गया। यदि किसी महिला को उसके वैवाहिक जीवन में वापस लौटने के लिए किसी दूसरे पुरुष से विवाह और फिर संबंध-विच्छेद की प्रक्रिया से गुजरने के लिए मजबूर किया जाता है, तो सबसे पहले उसकी स्वतंत्र इच्छा और गरिमा का प्रश्न सामने आता है, इसीलिए ओवैसी सहित उन सभी नेताओं से सवाल पूछा जाना चाहिए जो यूसीसी का विरोध करते हैं कि वे मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों की सुरक्षा के लिए कौन-सा स्पष्ट वैकल्पिक विधिक ढांचा चाहते हैं।

यदि उनका तर्क है कि व्यक्तिगत कानूनों की रक्षा होनी चाहिए, तो क्या उस संरक्षण के भीतर महिला की समानता और गरिमा की भी उतनी ही मजबूत गारंटी होगी? यदि कोई महिला स्वयं अपने अधिकारों के लिए न्‍यायालय का दरवाजा खटखटाती है, तो क्या उसकी आवाज को मजहबी पहचान के प्रश्न के नीचे दबा दिया जाना चाहिए?

ध्‍यातव्‍य हो कि सर्वोच्च न्यायालय में भी बहुविवाह और निकाह हलाला से जुड़े संवैधानिक प्रश्नों पर विधिक प्रक्रिया जारी है। 31 जुलाई 2026 को मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने महिला अधिकार कार्यकर्ता जकिया सोमन, डॉ. नूरजहाँ सफिया नियाज और अन्य की याचिका पर केंद्र सरकार से जवाब मांगा और उसे पहले से लंबित मामलों के साथ जोड़ दिया। वस्‍तुत: यह घटनाक्रम बताता है कि प्रश्न अब महज राजनीतिक भाषणों तक सीमित नहीं रह गया है। यह संविधान के उन मूल्यों तक पहुंच चुका है जिनमें समानता, गरिमा और व्यक्तिगत स्वतंत्रता शामिल हैं।

बेशक, भारत का संविधान नागरिक को धार्मिक स्वतंत्रता देता है, पर उसी संविधान में समानता और जीवन तथा व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार भी है, यह भी किसी अधिवक्‍ता या अन्‍य औवेसी जैसे व्‍यक्‍तियों को नहीं भूलना चाहिए, इसलिए किसी भी व्यक्तिगत कानून की चर्चा करते समय यह प्रश्न अनिवार्य है कि उसका वास्तविक प्रभाव उस व्यक्ति पर क्या पड़ रहा है जो उस व्यवस्था के भीतर सबसे कमजोर स्थिति में है।

यहां सभी को यह भी समझना चाहिए कि मुस्लिम महिला को सिर्फ मुस्लिम पहचान के प्रतिनिधि के रूप में देखने की दृष्टि भी अधूरी है, क्‍योंकि एक देश के लिए वह पहले एक नागरिक है, फिर एक महिला है और उसके बाद उसकी अन्य सामाजिक तथा मजहबी पहचानें आती हैं। उसके अधिकारों का निर्धारण उसकी मजहब पहचान के कारण कम या अधिक नहीं हो सकता। तब ऐसे में यूसीसी हो या व्यक्तिगत कानून, कसौटी एक ही होनी चाहिए कि क्या कानून नागरिक को समान सुरक्षा देता है? क्या वह महिला की सहमति और गरिमा की रक्षा करता है? क्या वह हिंसा और शोषण के विरुद्ध प्रभावी सुरक्षा देता है?

ओवैसी को यूसीसी का विरोध करने का लोकतांत्रिक अधिकार है। उन्हें शरीया और मुस्लिम व्यक्तिगत कानून के पक्ष में तर्क रखने का भी अधिकार है, वह उसे रख भी रहे हैं, किंतु उसी लोकतांत्रिक अधिकार के साथ उनसे यह सवाल भी पूछा जाना चाहिए कि उन मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों की गारंटी कैसे होगी जो व्यक्तिगत कानून की किसी व्याख्या या उसके दुरुपयोग से स्वयं को पीड़ित मानती हैं?

आज उनसे पूछा जाना चाहिए कि यदि शरिया की आड़ लेकर मुस्‍लिम महिलाओं पर अत्‍याचार किया जा रहा है तो एक वकील होने के बाद भी उन तमाम शरिया नियमों की वकालात आखिर वह क्‍यों कर रहे हैं और अपनी कौम को गुमराह क्‍यों कर रहे हैं ? यदि शरिया से मुस्‍लिम महिला अपने को असुरक्षित महसूस करती है, तब वह उसके पक्ष में क्‍यों खड़े हैं ? और यदि किसी महिला को अपनी ही वैवाहिक जिंदगी में सम्मान, सहमति और न्याय के लिए संघर्ष करना पड़े, तो उसकी पीड़ा को मजहबी पहचान की आड़ देकर उसे नहीं देखना, क्‍या यह संविधान की भावना के अनुरूप हो सकता है?

व्यक्तिगत कानून की बहस में यदि महिला की आवाज गायब हो जाए, तो वह बहस अधूरी है। यह बात भी ओवैसी और उन तमाम लोगों को समझना चाहिए जोकि आज यूसीसी का विरोध कर रहे हैं। भारतीय संविधान की नजर में प्रत्‍येक नागरिक समान हैं। जिसमें कि जो कमजोर हैं उनके लिए समान होने के बाद फिर कुछ विशेष अधिकार दिए गए हैं, किंतु इसका मतलब यह नहीं हैं कि कोई किन्‍हीं नियमों का हवाला देकर परस्‍पर शोषण ही करने लगे। इस संबंध में हिन्‍दू कानून अपने आप में आदर्श हैं, और जो आदर्श होता है, अनुसरण समाज में उन्‍हीं का किया जाता है, यही सदियों से परंपरा रही है, इसलिए अच्‍छा हो कि यूसीसी के विरोध में माहौल बनाने के स्‍थान पर उसके समर्थन के लिए मुस्‍लिम समाज आगे आए, यही वक्‍त की नजाकत है और यही समय की आवश्‍यकता भी…।

सुप्रसिद्ध क्राँतिकारी बलवंत सिंह : जेल में कठोर यातनाएँ और फाँसी

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भोपाल । भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में कितने बलिदान हुये, बलिदानियों को कितनी यातनाएँ दीं गईं, इसका विवरण आज बहुत कठिनाई से मिलता है । ऐसे ही क्राँतिकारी थे बलवंत सिंह जो अंग्रेजी सेना की नौकरी छोड़कर क्राँतिकारी बने । जेल में यातनाएँ सहीं और बलिदान हुये ।
भारत और भारत के बाहर विदेशों में क्राँति की ज्योति जलाने वाले क्राँतिकारी बलवंत सिंह का जन्म पंजाब प्रांत के जालंधर जिला अंतर्गत ग्राम खुर्दपुर में 15 सितंबर 1882 को हुआ था। इनकी प्रारंभिक शिक्षा अपने गाँव में ही हुई और जालंधर आकर अंग्रेजी सीखी । पिता जीवा सिंह अंग्रेजी फौज में थे । उन्नीस साल के हुये तो अंग्रेजी फौज में भर्ती हो गये । उन्हें सेना की 36 वीं बटालियन में जमादार पद मिला । इस बटालियन का काम शोषण के विरुद्ध आवाज उठाने वालों का दमन करना था । उनका परिवार गुरुद्वारे से जुड़ा था । जालंधर और उसके आसपास आर्यसमाज भी अपने प्रवचनों से स्वत्व एवं सांस्कृतिक भाव जगा रही थी । ऐसे वातावरण में बलवंत सिंह का बचपन बीता था । इसलिए अंग्रेज द्वारा भारतीयों का दमन करने में सहभागी होना उन्हें स्वीकार नहीं था । उनके एक भाई रंगा सिंह क्राँतिकारी गतिविधियों से जुड़ गये थे । अब यह भाई की प्रेरणा हो उनकी या उनकी अपनी अंतरात्मा की आवाज । बलवंत सिंह ने केवल साढ़े चार साल की नौकरी के बाद 1905 में सेना त्यागपत्र दे दिया ।

बलवंत सिंह और पंजाब के अन्य क्राँतिकारी 1857 की भाँति सशस्त्र क्रांति करना चाहते थे । इसके लिये धन की आवश्यकता थी । विदेशों में रहने वाले भारतीयों से धन जुटाने के प्रयास में बलवंत सिंह 1906 में कनाडा चले गये । और एक लकड़ी मिल में काम करने लगे । पारिवारिक वातावरण के कारण उनकी दिनचर्या अपेक्षाकृत अधिक धार्मिक थी । इससे जल्दी ही विदेश में रह रहे सिक्ख समुदाय में लोकप्रिय हो गये । और उन्हें उत्तरी अमेरिका में पहले गुरुद्वारे में ज्ञानी नियुक्त हुये । बलवंत सिंह ने इस गुरुद्वारे ने सिखों के बीच मजबूत सामाजिक संबंध बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका रही ।

इसी बीच कनाडा सरकार ने एक कानून पारित किया । इस कानून के माध्यम से भारतीय प्रवासियों को वोट देने के अधिकार और कुछ नागरिक अधिकारों से वंचित कर दिया। सरकार ने चीनी और जापानी अप्रवासी परिवारों को तो नागरिकता की अनुमति दी लेकिन भारतीय परिवारों को प्रतिबंधित कर दिया। इस कानून के विरुद्ध आँदोलन की योजना बनी । बलवंत सिंह और भाग सिंह के नेतृत्व में सिक्ख परिवारों ने आँदोलन आरंभ किया । हालाँकि कनाडा सरकार ने किसी भारतीय या सिक्ख परिवार को बेदखल नहीं किया लेकिन नये परिवारों की नागरिकता पर रोक लगा दी थी । सिक्ख समुदाय ने कानूनी लड़ाई के लिए एक समिति का गठन किया और अदालत में याचिका लगाई लेकिन सफलता नहीं मिली । इसी बीच एक ब्रिटिश खुफिया अधिकारी विलियम हॉपकिंसन की हत्या हो गई। जिस इलाके में हत्या हुई वह गुरुद्वारा का प्रभाव क्षेत्र था । आसपास अधिकार सिक्ख परिवार ही रहते थे । बलवंत सिंह गिरफ्तार हुये । लेकिन सुबूतों के अभाव में रिहा कर दिये गये । रिहाई के बाद वे जनवरी 1915 शंघाई पहुँचे। उन्होंने वहाँ रह रहे भारतीयों के बीच क्रांति का प्रचार किया। वहाँ से बैंकाक चले गये । वहाँ भी क्राँति का प्रचार किया अगस्त 1915 को उन्हें गिरफ़्तार करके ब्रिटिश अधिकारियों को सौंप दिया गया । उन्हें बंदी बनाकर सिंगापुर लाया गया । यहाँ अमानवीय प्रताड़नाएँ दीं गई। क्रूरतापूर्वक प्रताड़ित किया। बाद में कलकत्ता की अलीपुर जेल लाया गया । जुलाई 1916 में उन्हें लाहौर लाया गया और नये सिरे से पूछताछ आरंभ हुई । दरअसल पंजाब में अंग्रेजों के विरुद्ध सशस्त्र संघर्ष की योजना थी जिसकी सूचना किसी विश्वासघाती ने अंग्रेजों को दे दी। गिरफ्तारियाँ हुई। इन गिरफ्तारियों में बलवंत सिंह के भाई रंगा सिंह भी थे । अंग्रेज सरकार को सूचना थी कि इस क्राँति के लिये धन का प्रबंध विदेशों में हुआ और बलवंत सिंह के माध्यम से यह धन भारत आया । इतिहास के पन्नों में यह असफल क्राँति पहला “लाहौर षडयंत्र” के नाम से जाना जाता है । लाहौर में उनपर सरकार के विरुद्ध षडयंत्र करने के नये सिरे से आरोप लगे जिसमें प्रमुख “लाहौर षडयंत्र” की योजना बनाना था। 5 जनवरी 1917 को उन्हें भारतीय दंड संहिता की धारा 121 और 121 ए के तहत मौत की सज़ा सुनाई गई और 29 मार्च 1917 को लाहौर जेल में फाँसी दे दी गई।

शादी की कोई एक्सपायरी डेट नहीं होती: ‘दुल्हनियां ले आएगी’

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दिल्ली। आकाशादित्य लामा की ‘दुल्हनियां ले आएगी’ 24 जुलाई 2026 को आई पारिवारिक फिल्म है। यह शादी की हल्की कॉमेडी को एक साफ सामाजिक बात से जोड़ती है। नव्या (खुशाली कुमार) 32 साल की है। परिवार और समाज की नजर में उसकी शादी देर हो चुकी है। तय विवाह में थोड़ा केमिकल लोचा आता है तो वह पिता की सेहत बचाने के लिए सही दूल्हा तलाशने निकल पड़ती है। कहानी को सूत्रों में इसलिए लिखा गया है ताकि फिल्म आपने नहीं देखी है फिर उसे देखते हुए आपका टेस्ट खराब ना हो। कहानी पूछती है—लड़की शादी की उम्र 18 साल सरकार ने तय कर दी है, लेकिन क्या लड़की की शादी की कोई एक्सपायरी डेट भी होती है?

कहानी, अभिनय और परिवार का भाव

खुशाली कुमार नव्या को सहज और ईमानदार अंदाज में निभाती हैं। फिल्म देखते हुए ऐसा लगता है कि पूरी फिल्म का बोझ आकाशादित्य ने खुशाली के नाजुक कंधे पर ही डाल रखा है। वे फिल्म के लगभग हर फ्रेम में दिखाई देती हैं।

महेश मांजरेकर पिता के रूप में कमाल करते हैं। वरिष्ठ पत्रकार दयानंद पांडेय के शब्दों में उन्होंने फिल्म को थाम लिया। खुशाली और महेश का पिता-पुत्री वाला रिश्ता फिल्म की असली ताकत है। पीयूष मिश्रा सीमित भूमिका में भी वजन देते हैं। वैसे उनकी भूमिका कोई भी हो। अंदाज एक ही रहता है। स्नेहिल दीक्षित मेहरा और ओमकार कपूर हल्के हास्य में कामयाब हैं

छोटे किरदारों में अतुल गंगवार मिरेकल बाबा बने हैं। उन्होंने भूमिका को सादगी से निभाया है और कुछ दृश्यों में हल्की मुस्कान छोड़ जाते हैं। लड़की के फूफा का किरदार अरुण अरोरा के पास था। सेहत की वजह से उनका किरदार विस्तार नहीं पा सका है, वरना उनका यह नया अवतार दर्शकों को पसंद आता। फिल्म में ईशान तुली की एक झलक भी है। समीक्षक विष्णु शर्मा के अनुसार उन्होंने छोटी भूमिका को ईमानदारी से निभाया।

निर्देशन, संगीत और कुछ खामियां

लामा ने गंभीर विषय को उपदेश जैसा नहीं बनने दिया। गीत ‘बिटिया पराई नहीं होती’ खास तौर पर छूता है। दूसरी ओर पटकथा कई पुरानी शादी वाली फिल्मों जैसा चलती है और दूसरे भाग में गति कुछ ढीली पड़ जाती है। संपादन और तेज होता तो फिल्म और निखरती।

कुल मिलाकर फिल्म साफ-सुथरा फैमिली एंटरटेनर है। कॉमेडी, इमोशन और संदेश का संतुलन इसे परिवार के साथ देखने लायक बनाता है। रेटिंग करीब साढ़े तीन स्टार और आईएमडीबी पर अच्छा स्कोर बताता है कि फिल्म पसंद की जा रही है। लड़कियों की शादी में जल्दबाजी की सोच रखने वालों के लिए यह मार्गदर्शन देने वाली फिल्म है।

डेमोग्राफी परिवर्तन : जहां घटे वहां हि’न्दू क-टे !

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कृष्णमुरारी त्रिपाठी अटल

रायपुर : राजस्थान नगरीय निकाय चुनाव के 14 सितंबर 2026 को परिणाम आए। उनमें भाजपा प्रत्याशी को केवल 1 वोट मिलने वाले एक चुनाव परिणाम ने सुर्खियां बटोरी। राष्ट्रीय चर्चा का विषय बनी। हर ओर इसकी ज़्यादा चर्चा है। लेकिन इसकी पृष्ठभूमि क्यों बनी? इसके पीछे की कहानी जानना ज़रूरी है।

दरअसल, राजस्थान के डीडवाना-कुचामन जिले के परबतसर नगर पालिका चुनाव में बीजेपी उम्मीदवार कैलाश चंद्र को वार्ड नंबर 13 से मात्र 1 वोट मिला। जबकि कांग्रेस की हिना खानम को 376 वोट और निर्दलीय प्रत्याशी रसीद खां को 195 वोट मिले। हिना खानम जीतकर पार्षद बनीं। ये तथ्य है।

चूंकि यहां से मामला भाजपा कैंडिडेट का था। सो 1 वोट मिलना सुर्खियां बना। ये तक दावे किए गए कि ख़ुद कैलाशचंद्र को उनके परिवार वालों ने वोट नहीं दिए। जबकि तथ्य ये है कि – कैलाशचंद्र परबतसर नगर पालिका के मु-स्लिम बाहुल्य वार्ड 13 के नहीं बल्कि वारड नंबर 12 के निवासी हैं। ऐसे में उस वार्ड में उनका तक नाम नहीं है।

—•भाजपा को जब मु’स्लि-म बाहुल्य वार्ड में कोई प्रत्याशी नहीं मिला तो कैलाशचंद्र को औपचारिकता के लिए मैदान में उतार दिया गया। परिणाम जो पहले से तय थे, वही सामने आए। यानी हार।

—• अब चुनाव परिणाम के बाद ऐसा बताया जा रहा है कि — मानो राजस्थान की परबतसर नगर पालिका में पूरे देश की जनता ने भाजपा के प्रधानमंत्री को हरा दिया गया है। जबकि सत्य ये है कि मुस्लिम बहुल वार्ड में भाजपा को वहां के केवल बहुसंख्यक मु’स्लिम समुदाय ने सिरे से ख़ारिज किया है।

—• ये सोचने योग्य बात है कि मु’स्लिम बाहुल्य वार्ड से भाजपा को कोई मु’स्लिम प्रत्याशी क्यों नहीं मिला? मु’स्लिम – बाहुल्य वार्ड में भाजपा को सिर्फ़ 1 वोट मिलने का अर्थ क्या है? क्या ये कि जहां हिंदू नहीं हैं, वहां भाजपा साफ़ है।

—• वो क्यों? क्योंकि भाजपा हिन्दुत्व की पताका लेकर आगे चलती है ‌। भाजपा तुष्टिकरण की नहीं बल्कि ‘सबका साथ-सबका विकास और सबका प्रयास’ की बात करती है। इसके बावजूद क्या ये मु-स्लिम समुदाय की भाजपा से नफ़रत मानी जानी चाहिए?

—• मुद्दा ये भी कि क्या परबतसर नगर पालिका का वार्ड 13 हमेशा से मु’स्लिम बाहुल्य ही रहा होगा? ऐसा क्यों होता है कि- देश में जहां भी मुस्लिम समुदाय की जनसंख्या बढ़ती है। वहां से धीरे-धीरे हिन्दुओं का सफ़ाया हो जाता है। हिन्दू पलायन के लिए मजबूर होता है।

—• देश के किसी भी कोने में हिन्दू बाहुल्य क्षेत्र से किसी भी राजनीतिक दल के मु’स्लिम प्रत्याशी चुनाव जीतते हैं। किन्तु जहां भी मु’स्लिम समुदाय की आबादी बढ़ती है। वहां कभी भी कोई हिन्दू क्यों नहीं जीत पाता है? दूजे समय-समय पर ये नैरेटिव चलाए जाते हैं कि भाजपा मुस्लिमों को टिकट ही नहीं देती है। ऐसे में इस पर भी विचार किया जाना चाहिए कि – वार्ड का चुनाव भले ही बहुत छोटा है‌। किन्तु वहां भाजपा को कोई प्रत्याशी क्यों नहीं मिलता है? फिर जब भाजपा का हिंदू प्रत्याशी चुनाव में उतरता है तो 573 वोटों में से उसके केवल 1 वोट ही क्यों मिल पाता है? गणितीय आकलन के अनुसार कुल मतदान का 0.1745% । ऐसे में इस परिणाम के गहरे निहितार्थ क्या माने जाने चाहिए?

—•क्या समाज को इस पर विचार नहीं किया जाना चाहिए? क्योंकि इसके पीछे का सबसे बड़ा कारण है डेमोग्राफी परिवर्तन। धीरे-धीरे हर ओर हो रहा डेमोग्राफी परिवर्तन ये बताता है कि- समाज अस्थिरता की ओर बढ़ चला है।

हि’न्दू ख़तरे में है। ये कोई भाजपा का नारा नहीं है। बल्कि ऐसे चुनावी परिणाम स्पष्ट घोषणा करते हैं कि जहां भी हिन्दू जनसंख्या कम होगी। वहां से उनका अस्तित्व संकट में पड़ेगा। डेमोग्राफी परिवर्तन के संकट के उदाहरण के लिए आप कश्मीर देखिए, बंगाल, कैराना देखिए, शाहीन बाग, दिल्ली दंगा 2020 देखिए।मेवात, नूंह ( हरियाणा) देखिए। ज्यादा दूर जाइए तो मोपला देखिए, नोआखली और 1947 का डायरेक्ट एक्शन देखिए। दिल्ली के ब्रह्मपुरी और उत्तम नगर , रतलाम के सुराना गांव, इंदौर और जबलपुर के मु-स्लिम बाहुल्य क्षेत्र में — हिन्दुओं के घरों में ‘यह मकान बिकाऊ है’ के पोस्टर देखिए। गणेश शोभायात्रा, श्रीरामनवमी शोभा यात्रा और हिन्दू त्योहारों में मु’स्लिम बाहुल्य क्षेत्रों में होने वाले पथराव को देखिए। विवादों को देखिए। ये सभी तथ्य डेमोग्राफी परिवर्तन का भारतीय समाज पर कैसा विपरीत असर पड़ता है। उसके बारे में बताते हैं। इन तथ्यों और संदर्भों को उद्धृत करने के पीछे का मंतव्य ये नहीं है कि किसी से नफ़रत पाली जाए। किन्तु डेमोग्राफी परिवर्तन से हमारा सामाजिक ताना-बाना कैसे बिखरता है? कैसे अस्तित्व पर चुनौती खड़ी होती है। ये समझना आवश्यक है। इस पर समाज के मध्य चिंतन-मंथन होना चाहिए।

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