भारत की आर्थिक प्रगति में समाज से अपेक्षा

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विश्व के लगभग समस्त देशों में पूंजीवादी मॉडल को अपनाकर आर्थिक विकास को गति देने का प्रयास पिछले 100 वर्षों से भी अधिक समय से हो रहा है। पूंजीवाद की यह विशेषता है कि व्यक्ति केवल अपनी प्रगति के बारे में ही विचार करता है और समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी के एहसास को भूल जाता है। जिससे, विभिन्न आर्थिक गतिविधियों के चलते समाज में असमानता स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। विनिर्माण इकाईयों में मशीनों के अधिक उपयोग से उत्पादन में तो वृद्धि होती है परंतु रोजगार के पर्याप्त अवसर निर्मित नहीं हो पाते हैं। रोजगार की उपलब्धता में कमी के चलते समाज में कई प्रकार की बुराईयां जन्म लेने लगती हैं क्योंकि यदि किसी नागरिक के पास रोजगार ही नहीं होगा तो वह अपनी भूख मिटाने के लिए चोरी चकारी एवं हिंसा जैसी गतिविधियों में लिप्त होने लगता है। पूंजीवाद की नीतियों के अनुपालन के चलते वर्तमान में विश्व के कई देशों में सामाजिक तानाबाना छिन्न भिन्न हो रहा है। परंतु, प्राचीनकाल में भारत में उपयोग में लाए जा रहे आर्थिक मॉडल को अपनाए जाने के कारण भारत में प्रत्येक नागरिक को रोजगार उपलब्ध रहता था। भारत में अतिप्राचीन काल से ग्रामीण क्षेत्र ही विकास के केंद्र रहते आए हैं। भारत का कृषि क्षेत्र तो विकसित था ही, साथ में, कुटीर उद्योग भी अपने चरम पर था। पीढ़ी दर पीढ़ी व्यवसाय को आगे बढ़ाया जाता था। नौकरी शब्द तो शायद उपयोग में था ही नहीं क्योंकि परिवार के सदस्य ही अपने पुरखों के व्यवसाय को आगे बढ़ाने में रुचि लेते थे अतः भारत के प्राचीन काल में नागरिक उद्यमी थे। नौकरी को तो निकृष्ट कार्य की श्रेणी में रखा जाता था।

भारत में भी आर्थिक विकास की दर में तेजी तो दृष्टिगोचर है तथा प्रति व्यक्ति आय में भी वृद्धि हो रही है और आज यह लगभग 2500 अमेरिकी डॉलर प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष हो गई है। प्रति व्यक्ति आय यदि 14000 अमेरिकी डॉलर प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष हो जाती है तो भारत विकसित राष्ट्र की श्रेणी में शामिल हो जाएगा। अतः प्रति व्यक्ति आय को बढ़ाने के लिए भारत में गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन कर रहे नागरिकों की आय में वृद्धि करने पर अधिक ध्यान देने की आवश्यकता है। भारत में आर्थिक विकास के साथ साथ मध्यमवर्गीय परिवारों की संख्या भी बढ़ रही है। परंतु, साथ में आय की असमानता की खाई भी चौड़ी हो रही है, क्योंकि उच्चवर्गीय एवं उच्च मध्यमवर्गीय परिवारों की आय तुलनात्मक रूप से तेज गति से बढ़ रही है। हालांकि केंद्र सरकार एवं राज्य सरकारों द्वारा गरीब वर्ग, विशेष रूप से गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन कर रहे नागरिकों, के लिए कई विशेष योजनाएं चलाई जा रही हैं और इसका असर भी धरातल पर दिखाई दे रहा है। हाल ही के वर्षों में गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन कर रहे नागरिकों की संख्या में भारी कमी दिखाई दी है।

भारत में आर्थिक प्रगति के चलते सम्पत्ति के निर्माण की गति भी तेज हुई है। वित्तीय वर्ष 2023 के अंत में आयकर विभाग में जमा की गई विवरणियों के अनुसार, 230,000 नागरिकों ने अपनी कर योग्य आय को एक करोड़ रुपए से अधिक की बताया है। यह संख्या पिछले 10 वर्षों के दौरान 5 गुणा बढ़ी है। वित्तीय वर्ष 2012-13 में 44,078 नागरिकों ने अपनी कर योग्य आय को एक करोड़ रुपए से अधिक की घोषित किया था। उक्त आंकड़ों में वेतन पाने वाले नागरिकों का प्रतिशत वित्तीय वर्ष 2022-23 में 52 प्रतिशत रहा है, वित्तीय वर्ष 2021-22 में यह 49.2 प्रतिशत था तथा वित्तीय वर्ष 2012-13 में यह प्रतिशत 51 प्रतिशत था। इस प्रकार एक करोड़ रुपए से अधिक का वेतन पाने वाले नागरिकों की संख्या में कोई परिवर्तन नहीं आया है। जबकि व्यवसाय करने वाले नागरिकों की आय और अधिक तेज गति से बढ़ी है। 500 करोड़ रुपए से अधिक की कर योग्य आय घोषित करने वाले नागरिकों में समस्त करदाता व्यवसायी हैं। 100 करोड़ रुपए से 500 करोड़ रुपए की कर योग्य आय घोषित करने वाले नागरिकों में 262 व्यवसायी हैं एवं केवल 19 वेतन पाने वाले नागरिक हैं। भारत के एक प्रतिशत नागरिकों के पास देश की 40 प्रतिशत से अधिक की सम्पत्ति है। अतः देश में आय की असमानता स्पष्टतः दिखाई दे रही है।

एक अनुमान के अनुसार यदि उच्चवर्गीय एवं उच्च मध्यमवर्गीय परिवार की आय में 100 रुपए की वृद्धि होती है तो वह केवल 10 रुपए का खर्च करता है एवं 90 रुपए की बचत करता है जबकि एक गरीब परिवार की आय में यदि 100 रुपए की वृद्धि होती है तो वह 90 रुपए का खर्च करता है एवं केवल 10 रुपए की बचत करता है। इस प्रकार किसी भी देश को यदि उपभोक्ताओं की संख्या में वृद्धि करना है तो गरीब वर्ग के हाथों में अधिक धनराशि उपलब्ध करानी होगी। जबकि विकसित देशों एवं अन्य देशों में इसके ठीक विपरीत हो रहा है, उच्चवर्गीय एवं उच्च मध्यमवर्गीय परिवारों की आय में तेज गति से वृद्धि हो रही है जिसके चलते कई विकसित देशों में आज उत्पादों की मांग बढ़ने के स्थान पर कम हो रही है और इन देशों के सकल घरेलू उत्पाद में वृद्धि की दर बहुत कम हो गई है तथा इन देशों की अर्थव्यवस्था में आज मंदी का खतरा मंडरा रहा है।

उक्त परिस्थितियों के बीच वैश्विक पटल पर भारत आज एक दैदीप्यमान सितारे के रूप में चमक रहा है। भारत में आर्थिक विकास दर 8 प्रतिशत के आसपास आ गई है और इसे यदि 10 प्रतिशत के ऊपर ले जाना है तो भारत में ही उत्पादों की आंतरिक मांग उत्पन्न करनी होगी इसके लिए गरीब वर्ग की आय में वृद्धि करने सम्बंधी उपाय करने होंगे तथा रोजगार के अधिक से अधिक अवसर निर्मित करने होंगे। प्राचीनकाल में भारत में उपयोग किए जा रहे आर्थिक दर्शन को एक बार पुनः देश में लागू किए जाने की आवश्यकता है। आज भारत में शहरों को केंद्र में रखकर विकास की विभिन्न योजनाएं (स्मार्ट सिटी, आदि) बनाई जा रही है, जबकि, आज भी 60 प्रतिशत से अधिक आबादी ग्रामीण इलाकों में ही निवास करती है। इसलिए भारत को पुनः ग्रामों की ओर रूख करना होगा। न केवल कृषि क्षेत्र बल्कि ग्रामीण इलाकों में कुटीर एवं लघु उद्योगों की स्थापना की जानी चाहिए जिससे रोजगार के पर्याप्त अवसर ग्रामीण इलाकों में ही निर्मित हों और इन स्थानों पर उत्पादित की जा रही वस्तुओं के लिए बाजार भी ग्रामीण इलाकों में ही विकसित हो सकें। लगभग 50 गावों के क्लस्टर विकसित किए जा सकते हैं, इन इलाकों में निर्मित उत्पादों को इस क्लस्टर में ही बेचा जा सकता है और यदि इन इलाकों के स्थित कुटीर एवं लघु उद्योगों में उत्पादन बढ़ता है तो उसे आस पास के अन्य क्लस्टर एवं शहरों में बेचा जा सकता है। इससे स्थानीय स्तर पर ही उत्पादों की मांग को बढ़ावा मिलेगा एवं रोजगार के अवसर निर्मित होने से ग्रामीण इलाकों में निवास कर रहे परिवारों के शहरों की ओर पलायन को भी रोका जा सकेगा। अंततः इससे शहरों के बुनियादी ढांचे पर लगातार बढ़ रहे दबाव को भी कम किया जा सकेगा।

भारत में हिंदू सनातन संस्कृति की यह विशेषता रही है कि समाज में निवास कर रहे गरीब वर्ग के नागरिकों की सहायता के लिए सक्षम समाज हमेशा से ही आगे रहता आया है। यह सेवा कार्य विभिन्न मंदिरों, मट्ठ, सामाजिक संस्थाओं, सांस्कृतिक संस्थाओं एवं न्यासों द्वारा सफलता पूर्वक किया जाता रहा हैं। एक अनुमान के अनुसार, भारत में प्रतिदिन लगभग 10 करोड़ नागरिकों के लिए अन्न क्षेत्रों में भोजन प्रसादी उपलब्ध कराई जाती है। इसी प्रकार कई सामाजिक, सांस्कृतिक एवं न्यासों द्वारा अस्पताल चलाए जाते हैं, जहां मुफ्त अथवा बहुत ही कम कीमत पर स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराई जाती हैं। कुछ संस्थानों द्वारा स्कूल भी चलाए जाते हैं जहां गरीब वर्ग के बच्चों को शिक्षण सुविधाएं उपलब्ध कराई जाती है। इस प्रकार समाज के गरीब वर्ग को यदि भोजन, स्वास्थ्य एवं शिक्षा सुविधाएं मुफ्त अथवा कम कीमत पर उपलब्ध हो सकती हैं तो उनके द्वारा अर्जित की जा रही आय को अन्य उत्पादों को खरीदने में उपयोग किया जा सकता है जिससे अंततः विभिन्न उत्पादों की मांग में वृद्धि दर्ज होती है। यह मॉडल भी केवल भारत में ही दिखाई देता है। वरना, अन्य विकसित देशों में तो कुछ भी मुफ्त नहीं है। विकसित देशों में नागरिकों को केवल अपनी प्रगति की चिंता है, समाज में गरीब वर्ग के अन्य नागरिकों के लिए कोई चिंता का भाव दिखाई ही नहीं देता है। अतः भारत में समाज के नागरिकों द्वारा गरीब वर्ग के सहायतार्थ चलाई जा रही विभिन्न योजनाओं को गति देने के प्रयास करने चाहिए, जिससे देश के विकास को और अधिक गति मिल सके।

अब जांजगीर-चांपा में कांग्रेस पार्षद ने की युवक की हत्या

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पंकज कुमार झा

– पूज्यनीय गुरु प्रकाशमुनि के आश्रम पर कांग्रेसियों द्वारा हमला। बलौदबाजार में कलक्टर/एसपी का कार्यालय जला कर हिंसा किया जाना, जिसमें विधायक की संलिप्तता के इतने मजबूत साक्ष्य हैं कि उनकी जमानत तक नहीं हो पा रही है।

– रायपुर जेल प्रांगण में गोलीबारी, दो शांतिदूत गिरफ्तार।

– सूरजपुर में पुलिस अधिकारी की पत्नी और बच्ची की कांग्रेस के बड़े नेता द्वारा जघन्य हत्या।

सिलसिला रुकने का नाम ही नहीं ले रहा है। हर जगह अपराध को कांग्रेस के लोगों द्वारा अंजाम देना, और फिर उस अपराध पर हल्की और सस्ती राजनीति उसके बड़े नेताओं द्वारा करना!

ऐसा लगता है कि पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल और उनकी पार्टी ने सत्ता में रहते हुए पूरे पांच वर्ष अपने लोगों को अपराध की ट्रेनिंग देने में ही खर्च किया है। आज कांग्रेस पार्टी मानो जरायम पेशा वाले लोगों का गिरोह मात्र होकर रह गयी है।

आज भी दुर्भाग्य से प्रदेश में कांग्रेस का एक बड़ा जनाधार है, लेकिन जनता द्वारा मिली उस ताकत का उपयोग कांग्रेस यहां भी केवल अराजकता और आतंक फैलाने में कर रही है। दुःख की बात यह है कि कांग्रेस का राष्ट्रीय नेतृत्व भी कुछ करने की स्थिति में नहीं है क्योंकि राहुल गांधी स्वयं अपनी निरंतर हार की बौखलाहट में सरगना जैसा व्यवहार कर रहे हैं।

कांग्रेस को कवि गोपाल दास नीरज के शब्दों में यही कहा जा सकता है :-

आग लेकर हाथ में पगले जलाता है किसे
जब न ये बस्ती रहेगी, तू कहां रह पायेगा!

नोट : फोटो रायपुर जेल प्रांगण में गोलीबारी करने वाले तीन अपराधियों में से एक का बताया जा रहा है। दो गिरफ्तार हो चुके हैं। क्या तीसरे को ‘संरक्षण’ में छिपा कर रखा गया है? सवाल तो बनता है।

विश्वासघाती ने मारा था तीर : दिल्ली पर पुनः मुगलों का कब्जा

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भारतीय इतिहास की घटनाओं में एक विवरण हर कालखंड में मिलता है । वह यह है कि भारत कभी भी विदेशी आक्रांताओं के शक्ति बल से पराजित नहीं हुआ । भारत की पराजय सदैव अपने ही लोगों के विश्वासघात के कारण हुई । सिकन्दर के आक्रमण से लेकर मराठों के हिन्दवी साम्राज्य के पतन और 1857 की क्राँति की असफलता तक एक ही कहानी है । कोई भी युद्ध ऐसा नहीं जिसमें भारत के ही किसी अपने ने किसी अपने के साथ विश्वास घात करके पीठ में वार न किया हो । अधिकांश युद्ध विवरण में इन विश्वासघातियों का नाम भी मिल जाता है पर कुछ युद्ध ऐसे भी हैं जिनमें पता ही न चलता कि किसने विश्वासघात किया था । वह अंत तक गुप्त रहा और समय के इतिहास में खो गया। मध्यकालीन युद्धों के इतिहास में एक यौद्धा ऐसा भी हुआ जिसने मुगलों और पठानों दोनों को पराजित करके दिल्ली से बाहर कर दिया और अपना शासन स्थापित कर लिया था । उसके शौर्य और शक्ति से पराजित होकर शेरशाह सूरी के वंशजों को दिल्ली से भागना पड़ा था और मुगल शासक हुमायूँ ने गुमनामी में भटकते हुये अपने प्राण त्याग दिये थे ।

इतिहास में यह महान यौद्धा हेमचंद्र भार्गव था । जो हेमचंद्र विक्रमादित्य के नाम से सुप्रसिद्ध है । यह एक ऐसा सितारा था जिसे भारत का नेपोलियन कहा जा सकता है । इसने जितने युद्ध किये सबमें जीत हासिल की । इतिहास में इनका उल्लेख बहुत कम है और कहीं कहीं तो अपशब्द का भी प्रयोग हुआ । यह अपशब्द मुगल और सल्तनत समर्थक इतिहासकारों ने डाले । सुप्रसिद्ध विजेता हेमू के उनकी बारे में राय अलग हो सकती है । पर भारतीय जन मानस के मन में इनकी छवि एक उज्जवल नक्षत्र की है । किंतु 5 नवम्बर 1556 इतिहास का एक दिन आया जब पानीपत के दूसरे युद्ध में विश्वासघात के तीर से वे न केवल हेमचंद्र विक्रमादित्य के प्राणों का बलिदान हुआ अपितु भारत के माथे पर पुनः एक लंबी पराजय की लकीर खींच दी । जिससे मुगल पुनः दिल्ली की गद्दी पर आसीन हो गये ।

सुप्रसिद्ध विजेता हेमचंद्र विक्रमादित्य का जन्म रिवाड़ी के एक साधारण भार्गव ब्राह्मण परिवार में हुआ उनकी जन्मतिथि 1501 मानी जाती है । उनके वंशजों की कुछ शाखायें आज भी देश के विभिन्न भागों में हैं । उनके घरों में अपने इस बलिदानी वीर के चित्र भी हैं और वे पूजा करते हैं । पर कुछ इतिहासकार उन्हें भार्गव गोत्रीय क्षत्रिय जाट मानते हैं। सत्य जो भी हो पर हेमचंद्र विक्रमादित्य अपने कौशल और योग्यता से आगे बढ़े । पहले वे दक्षिण भारत में आदिलशाही के प्रधान सेनापति और प्रधानमंत्री बने । उन्होंने जितनी लड़ाइयाँ लड़ी सब जीते । उन्होंने यह युद्ध आदिलशाही के लिये जीते थे । पर उनके मन में भारतीय संस्कृति की रक्षा का संकल्प दृढ़ होता रहा । वे भारतीय संस्कृति की पुनर्प्रतिष्ठा के लिये ततपर रहे । उन्होंने अपनी शक्ति बढ़ाई ।

और उत्तर भारत की ओर अभियान चलाया । वे विभिन्न क्षेत्रों को सल्तनत से मुक्त करते हुये आगरा पहुँचे। आगरा पर अधिकार किया और 1555 में दिल्ली की ओर अभियान छेड़ा। दिल्ली पर उन दिनों शेरशाह सूरी के वंशजों का अधिकार था । शेरशाह ने मुगल बादशाह हुमायूँ को खदेड़ कर दिल्ली पर अधिकार किया था । लेकिन शेरशाह 1545 कालिंजर के युद्ध में राजकुमारी दुर्गावती के हाथों मारा गया । ये वही सुविख्यात दुर्गावती हैं जो बाद में गोंडवाना की रानी बनी और जिनका अकबर के सेनापति आसफ खाँ से भयानक युद्ध हुआ था । पराजित होकर हुमायूँ पहले यहाँ वहां छिपते फिर रहे थे । फिर अपना परिवार लेकर काबुल भाग गये लेकिन उनका दिल्ली में संपर्क बना रहा । हुमायुँ दिल्ली पर पुनः अधिकार करने की योजना बना ही रहे थे कि दुनियाँ छोड़ गये । उनकी इच्छा पूरा करने का काम उनके सेनापति बेहराम खाँ ने किया । बेहराम खान अपनी जमावट कर रहा था कि यह घटनाक्रम घट गया । हेमचंद्र विक्रमादित्य ने दिल्ली पर धावा बोला और अफगानों की सेना को पराजित खदेड़ दिया । और अपना अधिकार कर लिया । बेहराम खान ने इस स्थिति का लाभ उठाया और दिल्ली में पराजित सूरी सल्तनत के उत्तराधिकारियों को अपनी ओर मिला लिया ।

दोनों ने मिलकर दिल्ली पर आक्रमण किया । कुशल यौद्धा हेमू ने उसे भी पराजित किया और खदेड दिया । लेकिन बेहराम खान ने दिल्ली में विश्वासघाती तलाशे और नवम्बर 1556 में पुनः धावा बोल दिया । जिसमें हेमचंद्र विक्रमादित्य पुनः भारी पड़े। मुगल सेना का भारी विनाश हुआ । यह विनाशकारी समाचार सुनकर बेहराम खाँ ने अली कुली खान शैबानी के नेतृत्व में घुड़सवार सेना को साथ आगे भेजा । तब हेमू हाथी पर सवार होकर युद्ध का संचालन कर रहे थे । अकबर और बैहराम खान ने युद्ध के मैदान से आठ मील की दूरी पर अपना कैंप लगाया था । यह मुगलों की रणनीति रहती थी कि शासक और प्रधान सेनापति सदैव युद्ध मैदान से दूर रहकर युद्ध संचालन करते थे जबकि भारतीय नायक आगे रहकर । इस युद्ध में भी ऐसा ही था । मुगल और सूरी की अफगान सेना ने मिलकर तीन ओर से हमला बोला । बायीं अली कुली खान शैबानी ने केंद्र में सिकंदर खान और अब्दुल्ला खान उज़्बक और दाँयी ओर मोहरा हुसैन कुली बेग और शाह कुली महरम के नेतृत्व में युद्ध आरंभ हुआ । हेमू ने हाथी पर सवार होकर युद्ध का संचालन किया । बाँयीं ओर उनकी बहन के बेटे राम्या,और दाहिनी ओर शादी खान कक्कड़ ने किया था। यह 5 नवम्बर 1556 का दिन था । दोपहर तक के भयानक युद्ध मुगल सेना के पैर उखड़ गये । तीनों मोर्चे से पीछे हटने लगी । हेमू ने अपने दल के हाथियों और घुड़सवारों सैनिकों से शत्रु सेना कुचलने के आदेश दिया । हेमू जीत के शिखर पर थे । तभी उनकी आँख में आकर एक तीर लगा और वे बेहोश हो गये । इससे उनकी सेना में खलबली मच गई । सैनिक युद्ध क्षेत्र से भागने लगे । मोर्चा टूट गया और युद्ध का पांसा पलट गया । जिस हाथी पर हेमू सवार थे वह पकड़ लिया गया और मुगल शिविर में ले जाया गया। बैरम खान ने हेमू के सिर काटकर दिल्ली में घुमाया । कत्लेआम आरंभ हुआ । लगभग पाँच हजार लोग मार डाले गये । मृतकों के सिरों की एक मीनार बनाई गई। उन दिनों अकबर की आयु लगभग तेरह वर्ष थी अकबर को हुमाँयु के उत्तराधिकारी के रूप में गद्दी पर बैठा तो दिया गया था पर सारे राजकाज का संचालन बेहराम खान के हाथ में था ।

यह अंत तक पता नहीं चला कि हेमू को तीर किसने मारा । इसका कारण यह हो सकता कि जब विजेता सेनाओं ने कत्लेआम किया तब उस विश्वासघाती का भी कत्लेआम हो गया हो । बहरहाल विश्वासघात के तीर ने भारत में भविष्य केलिये दासत्व से भरी एक लंबी रात्रि का आरंभ कर दिया था ।

काली पूजा की रात मूर्ति तोड़ने की घटना की खबर करने पर पत्रकार गिरफ्तार, पत्रकारिता की स्वतंत्रता पर सवाल

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कोलकाता, 5 नवंबर (हि.स.) । प्रेस की स्वतंत्रता का ढोल पीटने वाली मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के राज में पुलिस ने पत्रकारिता को बेड़ियों में जकड़न की कोई भी कोर कसर बाकी नहीं छोड़ी है। काली पूजा की रात लेक टाउन में मूर्ति तोड़ने की घटना की खबर करने पर दो पत्रकारों को गिरफ्तार किया गया है, जिससे पत्रकारिता की स्वतंत्रता पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। मंगलवार शाम को लेक टाउन इलाके में स्थित एक स्वतंत्र खबर एजेंसी माध्यम के ऑफिस से दो पत्रकारों, आकाश विश्वास और अनन्य गुप्ता को पुलिस ने हिरासत में लिया।

लेक टाउन थाने की पुलिस ने दोनों पत्रकारों पर भारतीय न्याय संहिता की धारा 196(2), 299 और 302 के तहत मामला दर्ज किया है। इन धाराओं के तहत गंभीर आरोप लगाए गए हैं, जिससे पत्रकारों के लिए आने वाले समय में सामाजिक दायित्वों का निर्वहन करते हुए खबर करने में कठिनाईयों का सामना करना पड़ सकता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि इस प्रकार की कार्रवाई से समाज में जिम्मेदारी से पत्रकारिता करना और जनता तक सत्य पहुंचाना कठिन होता जा रहा है।

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