पत्रकार गणेशशंकर विद्यार्थी राष्ट्र और संस्कृति को सर्वोपरि मानते थे

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पत्रकार गणेशशंकर विद्यार्थी राष्ट्र और संस्कृति को सर्वोपरि मानते थे

सार्वजनिक जीवन या पत्रकारिता में ऐसे नाम विरले हैं जिनका व्यक्तित्व व्यापक है और जो विभिन्न विचारों में समन्वय बिठा कर राष्ट्र और संस्कृति की सेवा में समर्पित रहे हों । ऐसे ही क्राँतिकारी पत्रकार थे गणेश शंकर विद्यार्थी । उन्हे उनके जीवन में और जीवन के बाद भी सब अपना मानते हैं । वे भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के अहिसंक आँदोलन में जहाँ स्वयं सीधे जुड़े थे तो वहीं क्राँतिकारी आँदोलन के बलिदानियों के अज्ञातवास की व्यवस्था करते थे । यह व्यवस्था उनके रुकने से लेकर धन प्रबंध तक होती थी । वे पाँच बार जेल गये । वे राष्ट्र के लिये सामाजिक और साम्प्रदायिक एकता आवश्यक मानते थे और कहते थे कि राष्ट्र का आधार समन्वय और सद्भाव है संस्कृति राष्ट्र पहचान है । पूजा उपासना पद्धति पृथक होने से राष्ट्रीयता नहीं बदलती। इसलिये सबके लिये राष्ट्र और संस्कृति सर्वोपरि होना चाहिए । वे सदैव इसी अभियान में लगे रहे और इसी अभियान में उनका बलिदान भी हुआ ।

गणेश शंकर विद्यार्थी जी का जन्म 26 अक्टूबर 1890 को उत्तर प्रदेश के प्रयागराज के अतरसुइया मोहल्ले में हुआ था । प्रयागराज का नाम उन दिनो इलाहाबाद हुआ करता था । उनके पिता जयनारायण श्रीवास्तव उत्तर प्रदेश में ही फतेहपुर के निवासी थे लेकिन मध्यप्रदेश के मुंगावली में आकर बस गये थे । यहां प्रधान अध्यापक थे और इसी स्थान को उन्होंने अपना स्थाई निवास बना लिया था । मुंगावली अशोकनगर जिले के अंतर्गत यह एक तहसील मुख्यालय है । प्रयागराज विद्यार्थी का ननिहाल था । गर्भ अवस्था में माता गोमती देवी मुंगावली से अपने माॅयके प्रयागराज गयीं और विद्यार्थी जी का जन्म वहीं हुआ । नानी गंगा देवी गणेश जी की भक्त थीं । नाम “गणेश शंकर” उनकी नाना गंगा देवी ने ही रखा था । शिक्षा और साहित्य विधा में ननिहाल भी परिवार प्रतिष्ठित था इस नाते विद्यार्थी के ननिहाल की निकटता प्रयागराज में नेहरु परिवार से भी थी और प्रेमनारायण श्रीवास्तव परिवार से रिश्तेदारी भी । प्रेम नारायण जी यनि अभिताभ बच्चन के दादाश्री । विद्यार्थी जी की मित्रता बचपन में पं जवाहरलाल नेहरु से हुईं जो आखिर तक रही । लेकिन यह मित्रता विद्यार्थी जी की पत्रकारिता और प्रखर राष्ट्र भाव जाग्रति के अभियान में बाधा न बनी । उनके संबंध कितने गहरे रहे होंगे इसका अनुमान इस एक बात से लगाया जा सकता है कि विद्यार्थी जी के विरुद्ध लगाये गये एक मानहानि मुकदमे में गवाही देने के लिये पं जवाहरलाल नेहरू अदालत तक गये थे । यह बात अलग है कि न्यायधीश ने गवाही के तथ्य को शंकित माना और विद्यार्थी जी को सजा सुना दी । ठीक इसी प्रकार वे गाँधी जी के प्रशंसक थे । वे गाँधी जी के व्यक्तित्व को चमत्कारिक कहते थे किंतु स्वतंत्रता संग्राम में अंग्रेजों से तालमेल के पक्ष में नहीं थे । असहयोग आँदोलन में जब गाँधी जी ने खिलाफत आँदोलन को सम्मिलित किया तो इस पर भी विद्यार्थीी जी ने असहमति को प्रदर्शित करते प्रताप में संपादकीय लिखा था । उनका मानना था कि खलीफा व्यवस्था का समर्थन करना है तो यह आँदोलन अलग हो और भारत की स्वतंत्रता का आंदोलन अलग । 1913 के बाद के उनके तमाम लेखों में पूर्ण स्वतंत्रता का अव्हान ही होता था । जो नारा तिलक जी ने दिया था ।

विद्यार्थी जी की प्रारंभिक शिक्षा अपने पिता के सानिध्य में मुंगावली में ही हुई, और मिडिल परीक्षा 1905 में विदिशा नगर से । महाविद्यालयीन शिक्षा वे पुनः प्रयागराज आये । यहीं से उनका सार्वजनिक जीवन आरंभ हुआ । लेखन में रुचि बचपन से थी । यह विधा उन्हे विरासत में मिली थी । पिता और नाना दोनों परिवार शिक्षा और साहित्य सृजन से जुड़े थे । इस नाते लेखन चिंतन उनके रक्त में आया । जब वे सोलह वर्ष के थे तब उनकी रचना “सरस्वती” पत्रिका में हुई थी । महाविद्यालयीन शिक्षा के दौरान वे सुप्रसिद्ध क्रांतिकारी लेखक पत्रकार पं सुन्दर लाल और साहित्यकार एवं पत्रकार पं महावीर प्रसाद द्विवेदी के संपर्क में आये । साहित्य में द्विवेदीजी को और पत्रकारिता में पं सुन्दर लाल को वे अपना आदर्श और गुरु मानते थे । साहित्य एवं पत्रकारिता में यह अंतर्धारा उनके प्रत्येक लेखन में झलकती है । उन्हे पढ़ने और लिखने का शौक बचपन से था इसी शौक ने उन्हें लेखक पत्रकार बनाया । उन्होंने सोलह वर्ष की आयु में “आत्मोसर्जना” लघु उपन्यास लिख दिया था । प्रयागराज में अपनी पढ़ाई के साथ उनकी रचनायें पत्र पत्रिकाओं में स्थान बनाने लगीं थीं । परिचय भी बढ़ा और समय के साथ “कर्मयोगी” के संपादकीय विभाग में सहयोगी हो गये थे । वे लेखन में अपने नाम आगे परिवार का पारंपरिक उपनाम “श्रीवास्तव” की बजाय “विद्यार्थी” लिखते थे । वे कहते कि अभी मैं विद्यार्थी हूँ इसलिये लिखता हूं । 1908 में अपनी पढ़ाई पूरी करके वे कानपुर आ गये यहाँ पहले करेंसी आफिस में नौकरी कर ली । तब उन्हें तीस रुपये माहवार वेतन मिला करता था । लेकिन अध्ययन और लिखना सतत जारी रहा उनके लेखन में समाज को जाग्रत रहने और स्वयं के सम्मान का ध्यान रखने का आव्हान होता था । लेखन की यह विधा अंग्रेज अधिकारी को पसंद न थी । इसलिये विवाद हुआ और वे नौकरी छोड़कर हाई स्कूल में शिक्षक हो गये । विद्यालय का वातावरण उनके अनुकूल था । पठन-पाठन और लेखन का कार्य तेज चला । कर्मयोगी, स्वराज्य और कलकते की हितवार्ता में वे नियमित लिखते । 1911 में वे शिक्षक की नौकरी छोड़कर पत्रिका सरस्वती में सहायक हो गये । महावीर प्रसाद द्विवेदी सरस्वती के संपादक थे । यहाँ वे दो वर्ष रहे । 9 नवम्बर 1913 को उन्होंने प्रताप नाम से अपनी पत्रिका आरंभ की । यह नाम उन्होंने महाराणा प्रताप के ओज के रूप में माना था । प्रताप निकालने का निर्णय लिया तब उनकी आयु तेइस वर्ष की थी । परिवार की विरासत, अध्ययन और आयु का ओज इनकी त्रिवेणी ने उनका विचार बनाया था कि राष्ट्र का निर्माण महाराणा प्रताप जैसी संघर्ष शीलता और समर्पण से ही संभव है इसलिये उन्होंने पत्रिका का नाम “प्रताप” रखा । सात वर्ष पश्चात 1920 में प्रताप को दैनिक कर दिया ।

भारत की स्वतंत्रता और सार्वजनिक अभियान में ऐसा कोई नहीं था जो उनके नाम और निर्भीक लेखन से परिचित न हो । 1916 में तिलक जी उनके कार्यालय आये थे । पत्रकारिता, लेखन, और समाज सेवा के साथ वे एनीवेसेन्ट के होमरूल आँदोलन से जुड़े थे । नेहरु जी के आग्रह पर विद्यार्थी जी काँग्रेस के सदस्य बन गये । वे 1925 में काँग्रेस के कानपुर अधिवेशन में स्वागताध्यक्ष बने और बाद मै उत्तरप्रदेश काँग्रेस के अध्यक्ष भी बने । उन्होनें 1930 के सत्याग्रह में हिस्सा भी लिये और जेल गये । विद्यार्थी जी काँग्रेस के सदस्य तो बन गये पर न तो उनके लेखन की दिशा बदली और न अन्य गतिविधियँ । उन्होंने प्रताप के कार्यालय के नीचे एक गुप्त तहखाना बनाया हुआ था जहाँ देश का समस्त प्रतिबंधित साहित्य एकत्र रहता था । और वही क्राँतिकारियों के छिपने का स्थान था । विद्यार्थी जी को प्रताप में माखनलाल चतुर्वेदी और बालकृष्ण शर्मा नवीन जैसे सहयोगी मिल गये । इनके कारण प्रताप की यात्रा निर्वाध रही । विद्यार्थी जी के आँदोलन में जाने अथवा जेल जाने का प्रताप पर कोई अंतर न पड़ता था । सुप्रसिद्ध क्रांतिकारी भगतसिंह ने अपने अज्ञातवास का ढाई वर्ष का काल-खंड विद्यार्थीी जी के सानिंध्य में ही गुजारा । वे “बलवंतसिंह” के नाम से प्रताप में काम करने लगे और इसी नाम से लेख लिखते । यह समाचार पत्र “प्रताप” की क्राँतिकारी आवाज थी कि तब कलकत्ता और पंजाब के बाद कानपुर ही क्रांतिकारी गतिविधियों का केन्द्र बन गया । प्रताप में भगतसिंह ही नहीं राम दुलारे त्रिपाठी ने भी काम किया । इन्हें भी काकोरी कांड में सजा हुई थी । गणेश शंकर विद्यार्थी जी ने ही अपने कार्यालय में क्राँतिकारी चंद्र शेखर आजाद और भगतसिंह की भेंट कराई थी । विद्यार्थी जी की प्रेरणा से ही श्यामलाल जी गुप्त ने “विश्व विजयी तिरंगा प्यारा” झंडा गीत लिखा । और यहीं माखन लाल चतुर्वेदी जी ने अपना कालजयी गीत पुष्प की अभिलाषा लिखा । ये दोनों गीत सबसे पहले प्रताप में प्रकाशित हुये । विद्यार्थी जी के प्रयत्न से ही झंडा गीत कानपुर में काँग्रेस अधिवेशन में गाया गया । विद्यार्थी जी के प्रयत्न से ही क्राँतिकारी अशफाक उल्ला खान की कब्र बन सकी । बलिदानी अशफाक उल्ला को 1927 में फैजाबाद जेल में फाँसी दी गयी थी ।

विद्यार्थी संस्कृत, हिन्दी, उर्दू फारसी और अंग्रेजी भाषाओं के जानकार थे । उनकी भाषा सरल शुद्ध और मुहावरेदार होती थी । पत्रकारिता में शुद्ध, सरल और मुहाबरे दार भाषा का चलन विद्यार्थी जी ने ही आरंभ किया था । उनका प्रत्येक पल राष्ट्र, संस्कृति और पत्रकारिता के लिये समर्पित था । पर यह जीवन यात्रा दीर्घ जीवी न रह सकी । मात्र 41 वर्ष की आयु में ही उनका बलिदान हो गया । वह 25 मार्च 1931 का दिन था । कानपुर बंद का आयोजन हुआ था । यह बंद क्राँतिकारी भगतसिंह को फाँसी दिये जाने के विरोध में आयोजित था । क्राँतिकारी भगतसिंह को 23 मार्च को फाँसी दी गई थी । गम, गुस्से और विरोध में देश के विभिन्न स्थानों पर बंद का आयोजन हुआ । इसकी पहल विद्यार्थी जी और प्रताप ने की थी । लेकिन मुस्लिम लीग और कुछ संगठन थे जिन्होंने बंद का विरोध किया 24 मार्च से कानपुर में साम्प्रदायिक दंगे शुरु हो गये । विद्यार्थी जी को लगा कि वे दंगाइयो को जाकर समझा सकते हैं कि भगतसिंह का बलिदान इस राष्ट्र की स्वाधीनता के लिये हुआ है । सबको मिलकर विरोध करना चाहिए । हालांकि प्रताप के सहयोगियों ने विद्यार्थी जी को रोकना चाहा पर वे न रुके । विद्यार्थी जी जितने सरल और सहज थे उतने ही अपने निर्णय और लेखन पय दृढ़ रहते थे । वे न माने और समझाने के लिये दंगाइयो के बीच चले गये । वस न लौट सके । दो तीन बाद दंगा थमा तब विद्यार्थी जी को ढूंढने का प्रयत्न हुआ । लेकिन वे कहीं न मिले अंत में 29 मार्च को उनका शव ‘अज्ञात शवों’ के ढेर में मिल सका । देखकर लगा कि शव के साथ भी अमानुषिकता बरती गयी । शव निकाला और अंतिम संस्कार किया गया । किस गली में प्रहार हुआ किसने किया यह प्रश्न आज भी अनुत्तरित है ।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बढ़ते कदम

Rss.avif

दिनांक 21 से 23 मार्च तक बंगलूरू में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा की बैठक सफलतापूर्वक सम्पन्न हुई। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना वर्ष 1925 में दशहरा के पावन पर्व पर हुई थी, और इस प्रकार संघ अपनी स्थापना के 100वें वर्ष में प्रवेश कर चुका है एवं इस वर्ष दशहरा के शुभ अवसर पर ही अपनी स्थापना के 100 वर्ष पूर्ण कर लेगा। संघ की स्थापना विशेष रूप से भारतीय हिंदू समाज में राष्ट्रीयत्व का भाव जागृत करने एवं हिंदू समाज के बीच समरसता स्थापित करने के लक्ष्य को लेकर हुई थी। इन 100 वर्षों के अपने कार्यकाल में संघ ने हिंदू समाज को एकजुट करने में सफलता तो हासिल कर ही ली है साथ ही विशेष रूप से समाज की सज्जन शक्ति में राष्ट्रीयत्व का भाव पैदा करने में सफलता अर्जित की है। सज्जन शक्ति समाज की वह शक्ति है कि जिनकी बात समाज में गम्भीरता से सुनी जाती है एवं उस पर अमल करने का प्रयास भी होता है। संघ ने अपने उद्देश्यों को प्राप्त करने हेतु शाखाओं की स्थापना की थी। इन शाखाओं में देश की युवा पीढ़ी में राष्ट्रीयत्व का भाव जगाकर ऐसे स्वयंसेवक तैयार किए जाते हैं जो समाज के बीच जाकर देश के आम नागरिकों में राष्ट्र भावना का संचार करते हैं एवं समाज के बीच समरसता का भाव पैदा करने का प्रयास करते हैं।

संघ द्वारा स्थापित की गई शाखाओं की कार्यपद्धति पर आज विश्व के अन्य कई देशों में शोध कार्य किए जाने के बारे में सोचा जा रहा है कि किस प्रकार संघ द्वारा स्थापित इन शाखाओं से निकला हुआ स्वयंसेवक समाज परिवर्तन में अपनी महती भूमिका निभाने में सफल हो रहा है और पिछले लगातार 100 वर्षों से इस पावन कार्य में संलग्न है। हाल ही में, दिनांक 14 जनवरी 2025 से 26 फरवरी 2025 तक (44 दिन) प्रयागराज में लगातार चले एवं सफलतापूर्वक सम्पन्न हुए महाकुम्भ के मेले में पूरे विश्व से 66 करोड़ से अधिक हिंदू धर्मावलम्बियों ने पवित्र त्रिवेणी में आस्था की डुबकी लगाई। इतनी भारी संख्या में हिंदू समाज कभी भी किसी महान धार्मिक आयोजन में शामिल नहीं हुआ होगा और संभवत: पूरे विश्व में कभी भी इस तरह का आयोजन सम्पन्न नहीं हुआ होगा। इस महाकुम्भ में समस्त हिंदू समाज एकजुट दिखाई दिया, न किसी की जाति, न किसी का मत, न किसी के पंथ का पता चला। बस केवल सनातनी हिंदू हैं, यही भावना समस्त श्रद्धालुओं में दिखाई दी। इसी का प्रयास राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पिछले 100 वर्षों से करता आ रहा है।

संघ द्वारा आज न केवल भारतीय हिंदू समाज को एकता के सूत्र में पिरोए जाने का कार्य किया जा रहा है बल्कि पूरे विश्व में अन्य देशों में निवासरत भारतीय मूल के हिंदू समाज के नागरिकों को भी एक सूत्र में पिरोए जाने का प्रयास किया जा रहा है। यह कार्य संघ के स्वयंसेवकों द्वारा संघ की शाखा में प्राप्त प्रशिक्षण के बाद सम्पन्न किया जाता है। संघ द्वारा संचालित शाखाओं की संख्या 14 प्रतिशत की वृद्धि दर के साथ वर्ष 2024 के 73,117 से बढ़कर वर्ष 2025 में 83,129 हो गई है। इन शाखाओं के लगने वाले स्थानों की संख्या भी वर्ष 2024 में 45,600 से बढ़कर 51,710 हो गई है। विद्यार्थियों में राष्ट्रीयता की भावना जगाने के उद्देश्य से विशेष रूप से विद्यार्थियों के लिए विद्यार्थी संयुक्त शाखाएं भी देश के विभिन्न भागों में लगाई जाती हैं। विद्यार्थी संयुक्त शाखाओं की संख्या 17 प्रतिशत की वृद्धि दर के साथ वर्ष 20224 में 28,409 से बढ़कर वर्ष 2025 में 33,129 हो गई हैं। इसी प्रकार महाविद्यालयीन छात्रों के लिए भी विशेष शाखाएं लगाई जाती हैं। महाविद्यालयीन (केवल तरुणों के लिए) शाखाओं की संख्या 10 प्रतिशत की वृद्धि दर के साथ वर्ष 2024 में 5,465 से बढ़कर वर्ष 2025 में 5,991 हो गई है। तरुण व्यवसायी शाखाओं की संख्या भी 14 प्रतिशत की वृद्धि दर के साथ वर्ष 2024 में 21,718 से बढ़कर वर्ष 2025 में 24,748 हो गई है, इस शाखाओं में विशेष रूप से तरुणों को शामिल किया जाता है। प्रौढ़ व्यवसायी शाखाओं की संख्या 14 प्रतिशत की वृद्धि दर के साथ वर्ष 2024 में 8,241 से बढ़कर वर्ष 2025 में 9,397 हो गई है एवं बाल शाखाओं की संख्या भी वर्ष 2024 में 9,284 से बढ़कर वर्ष 2025 में 9,864 हो गई है। बाल शाखाओं में छोटी उम्र के बालकों को शामिल किया जाता है।

उक्त वर्णित शाखाओं के माध्यम से आज संघ का देश के कोने कोने में विस्तार सम्भव हुआ है। संघ की दृष्टि से देश भर में कुल खंडों की संख्या 6,618 है। इनमें से शाखायुक्त खंडों की संख्या वर्ष 2024 में 5,868 थी जो वर्ष 2025 में बढ़कर 6,112 हो गई है। साथ ही, कुल 58,939 मंडलों में से 30,770 मंडलों में संघ की शाखा लगाई जा रही है। देश भर में महानगरों के अतिरिक्त कुल 2,556 नगर हैं। इन नगरों में से 2,476 नगरों में संघ की शाखा पहुंच गई है।

संघ द्वारा विभिन्न श्रेणियों यथा चिकित्सक, अधिवक्ता, शिक्षक, सेवा निवृत अधिकारी एवं कर्मचारी, पत्रकार, प्रोफेसर, युवा उद्यमी जैसी श्रेणीयों के लिए साप्ताहिक मिलन कार्यक्रम भी आयोजित किए जाते हैं। आज देश भर में 32,147 साप्ताहिक मिलन लगाए जा रहे हैं। साथ ही, संघ मंडलियों का गठन भी किया गया है और आज देश भर में 12,091 संघ मंडलियां भी नियमित रूप से लगाई जा रही हैं। भारत में संघ द्वारा चलाए जा रहे विभिन्न सेवा कार्यों को सम्पन्न करने की दृष्टि से 37,309 सेवा बस्तियां हैं। इनमें से 9,754 सेवा बस्तियां संघ की शाखा से युक्त हैं।

संघ के स्वयसेवकों को प्रशिक्षित करने के उद्देश्य से देश भर में प्राथमिक शिक्षा वर्ग भी लगाए जाते हैं। वर्ष 2023-24 में कुल 1,364 प्राथमिक शिक्षा वर्ग लगाए गए एवं इन प्राथमिक शिक्षा वर्गों में 31,070 शाखाओं के 106,883 स्वयंसेवकों ने भाग लिया।

वैश्विक पटल पर भी संघ का कार्य द्रुत गति पकड़ता दिखाई दे रहा है। विश्व के अन्य देशों में हिंदू स्वयंसेवक संघ कार्य कर रहा है। आज विश्व के 53 देशों में 1,604 शाखाएं एवं 60 साप्ताहिक मिलन कार्यरत हैं। पिछले वर्ष 19 देशों में 64 संघ शिक्षा वर्ग लगाए गए। विश्व के 62 विभिन्न स्थानों पर संस्कार केंद्र भी कार्यरत हैं। जर्मनी से इस वर्ष 13 विस्तारक भी निकले हैं। हिंदू स्वयंसेवक संघ के माध्यम से भारत से नई उड़ान भर रहे युवाओं को जोड़ा जाता है ताकि एक तो विदेशों में इनकी कठिनाईयों को दूर किया जा सके तथा दूसरे इनमें सनातन संस्कृति के भाव को जागृत किया जा सके। साथ ही, इन युवाओं के भारत में रह रहे बुजुर्ग माता पिता से भी सम्पर्क बनाया जाता है। संघ के स्वयंसेवक भारत में इनकी समस्याओं को हल करने का प्रयास भी करते हैं। भारत में धार्मिक पर्यटन पर आने वाले भारतीय मूल के नागरिकों की सहायता भी संघ के स्वयंसेवकों द्वारा किए जाने का प्रयास किया जाता है तथा भारतीय मूल के नागरिक यदि भारत में वापिस आकर बसने के बारे में विचार करते हैं तो उन्हें भी इस सम्बंध में उचित सहायता उपलब्ध कराए जाने का प्रयास किया जाता है।

कुल मिलाकर आज राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ हिंदू सनातन संस्कृति को भारत के जन जन के मानस में प्रवाहित करने का कार्य करने का प्रयास कर रहा है ताकि प्रत्येक भारतीय के मन में राष्ट्रीयता की भावना जागृत हो एवं उनके लिए भारत प्रथम प्राथमिकता बन सके। यह कार्य संघ की शाखाओं में प्रशिक्षित होने वाले स्वयसेवकों द्वारा समाज के बीच में जाकर करने का सफल प्रयास किया जा रहा है। और, यह कार्य आज पूरे विश्व में शांति स्थापित करने के लिए एक आवश्यक आवश्यकता भी बन गया है।

‘राष्ट्रनिष्ठ – शुचितापूर्ण पत्रकारिता के प्रखर स्तम्भ गणेश शंकर विद्यार्थी’

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~कृष्णमुरारी त्रिपाठी अटल

स्वातन्त्र्य आन्दोलन के क्रान्तिकारी सम्पादक पत्रकार गणेश शंकर विद्यार्थी जी ने अपने समूचे जीवन को स्वतन्त्रता की बलिवेदी को होम कर दिया। वे राष्ट्र धर्म का निर्वहन करते हुए लेखनी व आन्दोलन के दोनों मोर्चों में निर्भीक योध्दा की भांति डटकर खड़े थे। नवम्बर 1913 को उनके द्वारा साप्ताहिक प्रताप के प्रथमांक में ‘कर्मवीर महाराणा प्रताप’ शीर्षक से लिखे गए लेख की यह पँक्ति उनके सर्वोच्च आदर्श को प्रतिबिम्बित करती है — “ जो सिर स्वतन्त्रता देवी के सामने झुका, याद रखो, उसे अधिकार नहीं कि संसार की किसी शक्ति के सामने झुके।”

फिर उनकी लेखनी और ध्येयनिष्ठा ने क्रांतिकारी विचारों का चारों ओर अथाह प्रवाह निर्मित कर दिया। पत्रकारिता में उनके आदर्श को खड़ा करने में – ‘कर्मयोगी’ पत्र के सम्पादक पं. सुन्दरलाल और लोकमान्य बालगंगाधर तिलक, आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी, महामना पं. मदनमोहन मालवीय जी की भूमिका थी। उन्होंने जहाँ आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के सानिध्य में हिन्दी भाषा के संस्कार सीखे। वहीं पं.सुन्दरलाल से ‘कर्मयोगी’ की भाँति ही राष्ट्र एवं समाज के उत्थान व स्वातन्त्र्य के लिए विचारों का प्रखर स्वर अपनाया। और उनके ये तेवर महामना पं मदनमोहन मालवीय के पत्र ‘अभ्युदय’ में भी निरन्तर परिष्कृत होते रहे। तत्पश्चात नौ नवम्बर 1913 को कानपुर से शुरू हुए ‘प्रताप’ की अठारह वर्षों तक चली ‘स्वातन्त्र्य यात्रा’ में यह क्रम दिनानुदिन अपने तीव्र वेग को प्राप्त करता गया। उनकी पत्रकारिता का ध्येय सुस्पष्ट था – वह ध्येय था स्वाधीनता के महत् उद्देश्य को प्राप्त करना । और समाज के वंचित – पीड़ित, उपेक्षितों की आवाज़ बनना। किसान – मजदूरों को न्याय दिलाना। चाहे इसके दोषी ब्रिटिश हुक्मरान रहे हों, याकि देशी रियासतों के राजा- रजवाड़े। याकि शोषणकारी सामन्त।

विद्यार्थी जी ने जिस मुखरता के साथ ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध पत्रकारिता को जन आन्दोलन बनाया। उसी तरह उन्होंने – भारतीय समाज में व्याप्त रुढ़ियों, कुरीतियों एवं समस्याओं पर तीखे तेवर में अपनी कलम चलाई। और समाज को आत्मचिंतन के लिए झकझोर कर रख डाला था।
पत्रकारिता के आदर्श एवं दायित्वबोध को लेकर वे बेहद सजग एवं स्पष्टवादी थे। सन् 1930 में उन्होंने लिखा था — “पत्रकार की समाज के प्रति बड़ी जिम्मेदारी है, वह अपने विवेक के अनुसार अपने पाठकों को ठीक मार्ग पर ले जाता है, वह जो कुछ लिखे प्रमाण और परिणाम काविचार रखकर लिखे, और अपनी गति-मति में सदैव शुद्ध और विवेकशील रहे। पैसा कमाना उसका ध्येय नहीं है, लोक सेवा उसका ध्येय है।”

उनकी यही प्रखर विचार रश्मि ने उन्हें इतना क्रान्तिकारी बना दिया था कि – उन्होंने सत्य को आधार बनाकर राष्ट्र के प्रति असंदिग्ध श्रध्दा एवं समर्पण के साथ गतिमान रहे। उन्हें कोई भी परिस्थितियां – कभी भी उनके कर्त्तव्यपथ सू विचलित न कर सकीं। उनके ओजस्वी विचारों से भयभीत ब्रिटिश सरकार ने सुनियोजित ढंग से उन्हें गिरफ्तार किया। जेल की यातनाएं दी। लेकिन विद्यार्थी जी ‘लोकसेवा-राष्ट्रसेवा’ का लक्ष्य लिए निरन्तर गतिशील बने रहे। प्रताप में उनके जाज्वल्यमान क्रान्तिकारी तेवरों पर आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी जी ने लिखा था —“उनके उग्र लेख देखकर मैं कभी-कभी कांप उठता था।’ मगर ओज और सत्याग्रह ही ‘प्रताप’ और संपादक गणेश शंकर विद्यार्थी की ज्वलंत पहचान थी। लप्पो-चप्पो का स्वर उसके चरित्र के लिए सर्वथा विजातीय था। सतेज सत्य के बल पर ही ‘प्रताप’ लोकप्रियता के उत्कर्ष पर पहुंचा था और उसकी लोकप्रियता का स्तर यह था कि हिंदी भाषी प्रदेश की जनता ‘समाचारपत्र का अर्थ’ केवल ‘प्रताप’ ही समझती थी । और यह धारणा गणेशशंकर के लोकमानस के प्रतिनिधित्व करने के सामर्थ्य को दर्शाती है। ”

प्रसिद्ध पत्रकार रहे मुकुटबिहारी वर्मा ने भी गणेश शंकर विद्यार्थी जी की गौरवपूर्ण राष्ट्रपरक विशद् विचार दृष्टि पर लिखा – “ ‘प्रताप’ के लिए पत्रकारिता व्यवसायपरक नहीं लोक-कल्याणार्थ थी। इसीलिए आर्थिक प्रलोभनों से मुक्त रहते हुए अन्याय-अत्याचार के खिलाफ सब तरह के बलिदान के लिए वह तैयार रहा। फलत: कई रियासतों में उस पर प्रतिबंध लगे, तरह- तरह की धमकियां दी गईं और मुकदमे भी चले। साथ ही अर्थ प्रलोभन भी उसके सामने आए। पर वह बिना झुके और बगैर प्रलोभन में आए अपने रास्ते चलता रहा; यहां तक कि उन लोगों पर हुए अन्याय के विरुद्ध भी उसने अपनी आवाज उठाई जिनके अन्याय के खिलाफ वह लड़ रहा था और खुद जिनके अन्याय का शिकार था।”
देश के जातीय स्वाभिमान पर आधारित उनकी अग्निधर्मी लेखनी ने अपनी परिपाटी का सृजन किया। और राष्ट्रीय परिदृश्य के प्रत्येक घटनाक्रमों एवं विषयों को मुखरता के साथ उठाया। उन्होंने राष्ट्र की चेतना को जागृत करने के लिए विचारों का ज्वार उत्पन्न किया। यह उनकी उसी राष्ट्रनिष्ठा का परिणाम था कि — जिस प्रकार लोकमान्य तिलक जी द्वारा सम्पादित ‘मराठा’ एवं ‘केसरी’ ने राष्ट्रवादी पत्रकारिता का श्रेष्ठ स्थान प्राप्त किया। उसी प्रकार विद्यार्थी जी द्वारा सम्पादित ‘प्रताप’ ने हिन्दी भाषा में राष्ट्रवादी पत्रकारिता में अपनी अनन्य प्रतिष्ठा पाई। और जन- जन की आवाज़ के रूप में जाना जाने लगा। विद्यार्थी जी की ‘स्वराज्य’ विषयक विचार दृष्टि का दर्शन ‘प्रताप’ में 14 जुलाई 1924 के ‘स्वराज्य किसके लिए?’ शीर्षक से लिखे लेख के अंश से मिलता है —
“इस युग में, केवल भारतवर्ष के करोड़ों नर-नारियों के ललाट पर ये शब्द नहीं हैं कि जब सब आजाद होंगे तब तुम्हीं गुलाम बने रहोगे, तुम्हारी राह में रोड़े अटकाएंगे और तुम्हें अज्ञान और अंधकार में रखेंगे। यदि सचमुच इस देश के भाग्य में ही बदा है, तो हम यहीं कहेंगे, हमें स्वराज्य नहीं चाहिए। हमारे करोड़ों भाई, यदि गुलामी के बंधन में जकड़े हुए हैं, यदि वे अज्ञान और अंधकार में पड़े हैं, यदि उन्हें पेट भर खाने को नहीं मिलता और पहनने भर को कपड़ा, यदि उन्हें रहने के लिए जगह नहीं मिलती और चलने के लिए राह तो—उस दिशा की ओर जिधर हमारे इने-गिने आदमी सुख से समय बिताते हों और प्रभुता के अधिकारी बने हुए हों-उधर हम अपना मुंह भी नहीं करना चाहते। हम तो उसी ओर जाएंगे, उसी ओर रहेंगे-सड़ने, घुटने, और गुमनामी में मर जाने तक के लिए जिधर हमारे शरीर, हमारे हृदय, हमारे दीन-हीन और पीड़ित करोड़ों भाई होंगे। उस दुःख में एक शांति होगी, और उस सुख में करोड़ों के कंकाल पर भोगे जाने वाले थोड़े से आदमियों के उस सुख में- एक गहरी ग्लानि।”

उपर्युक्त उद्धृत अंश से यह सुस्पष्ट होता है कि – विद्यार्थी जी केवल ‘राजनैतिक स्वतन्त्रता ‘ की भी बात नहीं कहते थे। बल्कि उनकी दृष्टि में ‘स्वाधीनता’ यानी ‘स्वराज्य’ अर्थात् — भारतीय जनमानस के सर्वांगीण विकास एवं कल्याण के लिए वे प्रतिबद्ध थे। विद्यार्थी जी लोकमान्य तिलक के प्रखर – मुखर राष्ट्रवादी विचारों के पक्षधर थे। लेकिन दूसरी ओर महात्मा गाँधी की ‘अहिंसा’ की अवधारणा पर भी उतना ही विश्वास रखते थे। इतना ही नहीं गांधीजी के प्रति उनकी निष्ठा ‘सत्याग्रह’ आन्दोलन के दौरान सर्वाधिक मुखरता के साथ देखने को मिली थी। उनके सम्पादन में ‘प्रताप’ ने सत्याग्रह आन्दोलन को‌ लेकर व्यापक जनचेतना का प्रसार किया था। याकि फिर बात देश के किसानों या मजदूरों की हो ; उन्होंने भारत के कृषक व श्रमिक – इन दोनों वर्गों के लिए भी अपनी लेखनी और आन्दोलन दोनों से लड़ाई लड़ी थी। उन्होंने किसानों पर होने वाले अत्याचारों के लिए रियासतों के राजाओं, सामंतों एवं अंग्रेजी सरकार के विरुद्ध मोर्चा खोला। होमरुल आन्दोलन के समय ही कानपुर में मिल मालिकों के विरुद्ध हुई हड़ताल का गणेश जी ने नेतृत्व किया था। इसमें 25000 की संख्या में मजदूर शामिल थे। वहीं बिहार के चम्पारण में अंग्रेजों द्वारा किसानों के शोषण के विरोध में जब गांधी जी वहां पहुंचे। तब प्रताप ने उस मुद्दे को उठाया। रायबरेली के निरंकुश जमींदार वीरपाल सिंह द्वारा किसानों पर गोली चलवाने की घटना को — उन्होंने ‘प्रताप’ में विस्तार से प्रकाशित किया था। इसी के चलते अंग्रेज सरकार व वीरपाल सिंह द्वारा सुनियोजित ढंग से उन पर मानहानि का मुकदमा दर्ज किया गया था। इसमें उन्हें आठ महीने की सजा हुई थी।

वे किसानों से जुड़े हुए ब्रिटिश सरकार के दमनकारी – शोषणकारी निर्णयों का निरन्तर निर्भीकतापूर्वक प्रतिकार करते थे। वे स्वयं को एक पत्रकार या राजनेता के स्थान पर गर्वपूर्वक ‘किसान’ कहा करते थे। किसानों – मजदूरों के सच्चे हितचिन्तक के रूप में वे प्रसिद्ध हो चुके थे। उनकी हत्या के बाद एक श्रद्धांजलि सभा में पं. बनारसीदास चतुर्वेदी जी ने विद्यार्थी जी के विषय में कहा था —“आज उस दीनबंधु के लिए किसान रो रहे हैं। कौन उनकी उद्गार-ज्वाला को शांत करने के लिए स्वयं आग में कूद पड़ेगा? मजदूर पछता रहे हैं, कौन उन पीड़ितों का संगठन करेगा, मवेशीखाने से भी बदतर देशी राज्यों के निवासी अश्रुपात कर रहे हैं, कौन उनका दुखड़ा सुनेगा और सुनाएगा? राजनीतिक कार्यकता रो रहे हैं, कौन उन्हें आश्रय देकर स्वयं आफत में फंसेगा? कौन उनके कंधे से कंधा मिलाकर स्वातंत्र्य संग्राम में चलेगा? और एक कोने में पड़े हुए उनके पत्रकार बंधु भी अपने को निराश्रित पाकर चुपचाप चार आंसू बहा रहे हैं। आपातकाल में कौन उन्हें सहारा देगा, किससे वे दिल खोलकर बात कहेंगे, किसे वे अपना बड़ा भाई समझेंगे, और कौन छुटभइयों का इतना खयाल करेगा ?”

उन्होंने ‘प्रताप’ में उस समय चलने वाली मुस्लिम तुष्टिकरण की निरन्तर भर्त्सना करते थे। और साम्प्रदायिक सद्भाव के लिए उन्होंने इस बात पर जोर डाला था कि – मुसलमानों को अपने मूल यानि भारतीय संस्कृति पर आधारित रास्ते में चलना चाहिए। हिन्दू – मुस्लिम समस्या पर वे अत्यन्त स्पष्ट थे। वे दूरदर्शी थे। अतएव उन्होंने प्रताप में लिखा था — “शुभ होगा वह दिन तब इस देश के मुसलमान यह समझने लगेंगे कि हमारा नाता इस देश के हिंदुओं से तुर्कों और काबुलियों की अपेक्षा अधिक बड़ा और स्वाभाविक है, और जब वे उसी प्रकार जिस प्रकार रोम और ग्रीस के वर्तमान ईसाई, निवासी अपने गैर-ईसाई पूर्वजों की कीर्ति और कला को अपनाते हैं, भारतवर्ष की प्राचीन कीर्ति एवं कला को अपनाने लगेंगे।”

वे जिस साम्प्रदायिक तुष्टिकरण के विरुद्ध लड़ते रहे। बाद में उसी तुष्टिकरण एवं मुस्लिम हठधर्मिता ने देश को विभाजन की त्रासदी में झोंका। और नरसंहार की विभीषिका से देश को रक्त रंजित कर दिया। इतना ही नहीं गणेश शंकर विद्यार्थी जी की हत्या भी कानपुर के साम्प्रदायिक दंगे में अज्ञात धर्मांध मुसलमानों द्वारा 25 मार्च 1931 को की गई थी। जबकि विद्यार्थी जी दंगे से हिन्दू – मुसलमानों को सुरक्षित लाने में जुटे हुए थे।

विद्यार्थी जी की पत्रकारिता के कई आयाम थे। वे हिन्दी के प्रति विशेष निष्ठा रखते थे। यह बात कम लोगों को ही पता होगी मुंशी प्रेमचंद को उर्दू से हिन्दी की ओर लाने में विद्यार्थी जी का ही अतुलनीय योगदान था। इस तथ्य की पुष्टि इस बात से होती है कि – मुंशी प्रेमचंद की पहले -पहल कई कहानियां 1920 —1925 के दौरान ‘प्रभा’ में ही प्रकाशित हुईं थी। इस समय ‘प्रभा’ कानपुर से ‘प्रताप’ प्रेस से प्रकाशित होती थी। 1929 में हिन्दी साहित्य सम्मेलन के गोरखपुर अधिवेशन की अध्यक्षता करते हुए विद्यार्थी जी ने हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने के विषय में कहा था — “हिंदी राष्ट्रभाषा बने, इसका यह अर्थ कदापी नहीं कि हिंदू हिंदू होने के नाते हिंदी सीखें। मेरे लिए तो हिंदी एक संस्कृति की प्रतीक है और केवल हिंदी के द्वारा ही बिखरे हुए भारत में एकत्व की भावना भरी जा सकती है और सबको एक सूत्र में आबद्ध करने का हिंदी एकमेव साधन है।”

इसी तरह उन्होंने राष्ट्र के स्वत्वबोध को जगाते हुए राष्ट्र भाषा के सन्दर्भ में कहा था—

“ राजनीतिक पराधीनता पराधीन देश की भाषा पर अत्यंत विषम प्रहार करती है। विजयी लोगों की विजय-गति विजित के जीवन के प्रत्येक विभाग पर अपनी श्रेष्ठता की छाप लगाने का सतत प्रयत्न करती है। स्वाभाविक ढंग से विजितों की भाषा पर उनका सबसे पहले वार होता है । भाषा जातीय जीवन और उसकी संस्कृति की सर्वप्रधान रक्षिका है, वह उसके शील का दर्पण है, उसके विकास का वैभव है। भाषा जीती, और सब जीत लिया। फिर कुछ भी जीतने के लिए शेष नहीं रह जाता।विजितों के मुंह से निकली हुई विजयी जनों की भाषा उनकी दासता की सबसे बड़ी चिह्नानी है- पराई भाषा चरित्र की दृढ़ता का अपहरण कर लेती है, मौलिकता का विनाश कर देती है और नकल करने का स्वभाव बना करके उत्कृष्ट गुणों और प्रतिभा से नमस्कार करा देती है।”

वे पत्रकारिता को देश सेवा का सबसे अच्छा माध्यम मानते थे। उनकी पत्रकारिता के सिद्धान्त सत्यनिष्ठा, राष्ट्रनिष्ठा, स्वदेशी एवं स्वराज्य की संकल्पना पर आधारित थे। उनके ध्येय में भारतीय समाज का उत्थान एवं स्वाधीनता की चैतन्यता थी। उन्होंने भारतीय समाज की ‘न्यासत्व’ की पध्दति को ‘प्रताप’ में अपनाया। और ‘प्रताप ट्रस्ट’ का गठन किया था। 15 मार्च 1919 को रजिस्टर्ड प्रताप ट्रस्ट में पाँच सदस्य थे — गणेश शंकर विद्यार्थी, शिवनारायण मिश्र ‘वैद्य’, मैथिलीशरण गुप्त, डॉ. जवाहरलाल रोहतगी और लाला फूलचंद। विद्यार्थी जी की पत्रकारिता में ‘प्रताप’ की यात्रा के साथ – पं.माखनलाल चतुर्वेदी, बालकृष्ण शर्मा नवीन, श्रीकृष्ण दत्त पालीवाल, श्रीराम शर्मा, देवव्रत शास्त्री, सुरेशचंद्र भट्टाचार्य और युगल किशोर सिंह शास्त्री इत्यादि का नाम प्रमुख सहयोगी पत्रकारों के रूप में जाना जाता है।

सरस्वती से अभ्युदय एवं तदुपरान्त ‘प्रताप’ व ‘प्रभा’ के माध्यम से उन्होंने भारतीय पत्रकारिता की क्रान्तिकारी धुरी का निर्माण किया। और स्वातन्त्र्य समर में भारतीय चेतना को जागृत करने के अभूतपूर्व पुरुषार्थ को उन्होंने निभाया। 18 वर्ष के प्रतापी ‘प्रताप’ ने भारत को ‘स्वत्व-स्वाभिमान- स्वदेशी – स्वराज्य – स्वाधीनता एवं स्वधर्म ‘ का महान पथ प्रशस्त किया। युगबोध दिशाबोध प्रदान किया। गणेश शंकर विद्यार्थी जी के अनन्य सहयोगी -मित्र दादा माखनलाल चतुर्वेदी ने ‘कर्मवीर’ में 28 मार्च 1935 को उनका स्मरण करते हुए लिखा —“कठिनाइयों में उन दिनों संकटों की अपेक्षा संन्यास अधिक यशस्वी होता था। गणेश जी ने इस प्रवाह को सीधा संकटों की ओर घुमा दिया। जमानतें, तलाशियां, मुकदमे, सजा-दंड देकर शासक सुखी होते, दंड पाकर गणेश गर्वीले होते क्योंकि गणेश जी संकटों में चाहे जो सोचते, किंतु सहस्र-सहस्र हिंदी भाषी, गणेश जी और ‘प्रताप’ के संकटों के साथ सोचते और सेवा के लिए प्रस्तुत रहते। पत्रकार-कला के हिंदी स्वरूप के ‘प्रताप’ नामक राष्ट्र मंच से गणेशी जी ने कायरों को, देश-घातकों को, महलों को, मुकुटों को, अत्याचारियों को और स्वार्थियों को लगातार चुनौतियां दीं और परिणाम में तलाशियां, अपमान, अर्थ हानि और कारागर सहे।”

( साहित्यकार – स्तम्भकार एवं पत्रकार)

सन्दर्भ ग्रन्थ : गणेश शंकर विद्यार्थी और स्वतन्त्रता आन्दोलन
लेखक – विष्णु कुमार राय

२. पत्रकारिता के युग निर्माता गणेश शंकर विद्यार्थी — सुरेश सलिल

कैमरा कामरा और सलेक्टिव आजादी

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बिपिन पांडेय

कुछ साल पहले जब कुणाल कामरा ने अर्नब गोस्वामी को प्लेन में हैकल किया था तो सारे वामपंथी लोगों ने उसका बीच – बचाव किया था। वरुण ग्रोवर ने समर्थन करते हुए कहा था – “अगर आपके घर में सांप निकल आए तो सांप – सांप चिल्लाने से अच्छा है कि सांप को मार दो, और उस दिन प्लेन में एक सांप तो बैठा ही था “।

आज संविधान की लाल कॉपी हाथ में लेकर कॉमेडी करने वाले कामरा ने कंगना रनौत के घर पर बुलडोजर चलने पर खुशी मनाई थी। शिव सेना के हारमोनियम संजय राउत के साथ संवाद में उन्होंने कहा था कि उन्हें कंगना के घर बुलडोजर चलता देख अच्छा लगा।

अर्नब और कंगना वाले मुद्दे पर बहुतेरे बुद्धिजीवियों ने उद्धव ठाकरे की बलैया लेने का और उन्हें संविधान रक्षक बनाने का काम किया था।
समय पलटा, सरकार बदली और अब कामरा की राजनैतिक कॉमेडी के चलते जब शिव सेना में से निकली शिव सेना ने कॉमेडी स्थल पर तोड़ – फोड़ की तो वही बुद्धिजीवी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के पैरोकार बने घूमते दिख रहे हैं ।

वामपंथियों का पुराना शगल रहा है कि वे केवल अपनी अभिव्यक्ति को ही अभिव्यक्ति मानते हैं और बाकी की अभिव्यक्ति को मानवता के लिए खतरा । इस हिपोक्रेसी के आपको हजारों उदाहरण मिल जाएंगे।

पर क्या एक लोकतांत्रिक देश में सेलेक्टिव चुप्पी और सलेक्टिव समर्थन जायज है ?

इसका एकदम सीधा उत्तर होगा – नहीं, एकदम नहीं।

कॉमेडी करने पर, किताब लिखने पर, किसी अन्य दूसरे तरीके से अभिव्यक्त करने पर हिंसा और तोड़ – फोड़ का विरोध होना ही चाहिए।
जब भी नागरिक बनाम राज्य में किसी का पक्ष लेना हो तो हमें हमेशा नागरिक के पक्ष में खड़े दिखना चाहिए। इस आधार पर मै कुणाल कामरा के खिलाफ की गई हिंसा का विरोध करता हूं।

जहां तक कुणाल कामरा के कॉमेडी की बात है तो वह एक सस्ते और गालीबाज कॉमेडियन से ज्यादा कुछ भी नहीं हैं । हर तीसरी लाइन में गाली निकाले बिना खुद को अभिव्यक्त नहीं कर सकते।

पता नहीं किसी ने ध्यान दिया या नहीं पर विवादित वीडियो में ही एक जगह वो घोर असंवेदनशील बात कर रहे हैं।
वीडियो की शुरुआत में ही वे मुकेश अंबानी के बेटे के मोटापे, उनकी बहु के पतले शरीर और खोले गए अस्पताल को लेकर व्यंग करते हैं। सबको पता है कि अनंत अंबानी स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों से गुजर रहे हैं और चाहकर भी अपने मोटापे को कम नहीं कर सकते । ऐसे में उनके मोटापे का मजाक उड़ाया जाना कहां तक ठीक है ? निसंदेह यह घोर असंवेदनशीलता की निशानी है।

कुणाल कामरा और उनके जैसे तमाम लोग अक्सर कहते हैं कि वे सत्ता के विरोध में हैं।

पूछो कौन सी सत्ता के विरोध में हो ?

केवल केंद्र सरकार या हर राज्य सरकार ?

राज्य सरकारों के विरोध में हो तो क्या सभी राज्य सरकारों के विरोध में हो या जहां आपके पसंद की सरकार नहीं है उसके विरोध में भी हो ? ध्यान से देखने और समझने पर पता लगता है कि ये लोग उसी सत्ता का विरोध करते हैं जो कि पसंद की ना हो।

पसंद की सत्ता होने पर घर बुलडोज किए जाने पर ऑन कैमरा खुशी मनाते हैं। सांप को मार देने की बात करते हैं।

शायद इसी हिपोक्रेसी के चलते अब विभाजन रेखाएं और स्पष्ट एवं गहरी होती जा रही हैं। समय रहते चेतना होगा। अभिव्यक्ति की आजादी बचानी है, स्वतंत्रता, समानता , धर्म निरपेक्षता के लिए लड़ाई लड़नी है तो सबके लिए लड़नी होगी
खेमेबाजी से केवल और केवल नुकसान ही होगा.. बाकी जो है सो हैइये है….

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