भारत के लिए वैश्विक स्तर पर बदल रहे हैं राजनैतिक एवं रणनीतिक समीकरण

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वैश्विक स्तर पर आज परिस्थितियां, विशेष रूप से राजनैतिक, रणनीतिक एवं आर्थिक क्षेत्र में, तेजी से बदल रही हैं। नए नए समीकरण बनते हुए दिखाई दे रहे हैं। जी-7, जी-20 एवं नाटो के सामने ब्रिक्स अपने पांव पसारता नजर आ रहा है। अमेरिका के साथ साथ यूरोपीयन देश अपनी चमक खो रहे हैं। इन देशों को विकसित देश तो कहा ही जाता रहा हैं, साथ ही, वैश्विक स्तर पर कई संगठनों को खड़ा करने में इन देशों की महत्वपूर्ण भूमिका भी रही है और इन संगठनों की मदद से इन देशों का दबदबा भी पूरे विश्व में कायम रहता आया है। यूनाइटेड नेशनस, विश्व बैंक, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष, नाटो, फाइव आइज, अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन, अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य संगठन, जी-7 एवं जी-20 जैसे अन्य कई संगठनों के माध्यम पूरे विश्व में ही लगभग प्रत्येक क्षेत्र को यह विकसित देश प्रभावित एवं नियंत्रित करते रहे हैं। परंतु, आज दक्षिणी अफ्रीकी उपमहाद्वीप के देशों, मध्य एशिया में अरब देशों एवं भारतीय उपमहाद्वीप स्थित देशों ने उक्त संगठनों में सुधार कार्यक्रम लागू करने के लिए आवाज उठाना शुरू कर दिया है। उक्त वर्णित लगभग समस्त अंतरराष्ट्रीय संगठनों की स्थापना 1900-2000 शताब्दी में की गई थी। इतने लम्बे अंतराल के बाद भी विश्व के अन्य देशों को इन संगठनों में महत्वपूर्ण भूमिका प्रदान नहीं की गई है। कुल मिलाकर, अमेरिका एवं यूरोपीयन देशों का दबदबा इन संगठनों की स्थापना के बाद से ही लगातार कायम रहा है।

भारत सदैव से ही एक शांतिप्रिय देश रहा है और वसुधैव कुटुम्बकम की भावना में विश्वास करता आया है। इन्हीं कारणों के चलते भारत के लगभग समस्त देशों से अच्छे सम्बंध रहे हैं। रूस-यूक्रेन युद्ध में रूस और यूक्रेन दोनों ही देश युद्ध को समाप्त करने में भारत की मदद चाहते हैं तो उधर इजराईल-हमास/लेबनान/ईरान युद्ध में ये समस्त देश भी युद्ध को समाप्त करने में भारत की मदद चाहते हैं। दूसरी ओर, ग्लोबल साउथ सहित कई अफ्रीकी देश भी आज भारत का नेतृत्व स्वीकार करने को तैयार हैं। इन परिस्थितियों के बीच वैश्विक स्तर पर यह मांग बहुत जोर पकड़ती जा रही है कि भारत को यूनाइटेड नेशन्स की सुरक्षा समिति में स्थाई सदस्यता प्रदान की जाए। परंतु रूस, अमेरिका, फ्रांन्स एवं अन्य वीटो प्राप्त देशों द्वारा भारत का समर्थन किए जाने के बावजूद यह कार्य सम्पन्न नहीं हो पा रहा है क्योंकि चीन नहीं चाहता कि भारत सुरक्षा समिति का स्थाई सदस्य बने और वीटो प्राप्त करने का अधिकारी बने।

उक्त संगठनों के इत्तर हाल ही में सम्पन्न हुई ब्रिक्स समूह देशों की बैठक में रूस, भारत एवं चीन की तिकड़ी बनती हुई दिखाई दे रही है। इस तिकड़ी द्वारा ब्रिक्स समूह की बैठक में लिए गए कुछ निर्णयों के चलते यदि भारत, रूस एवं चीन के बीच बदलते राजनीतिक एवं रणनीतिक सम्बंध इसी प्रकार आगे बढ़ते हैं तो इसका प्रभाव वैश्विक स्तर पर रणनीतिक, आर्थिक एवं राजनैतिक क्षेत्र पर भी पड़ेगा और आगे आने वाले दिनों में भारत के आर्थिक परिदृश्य में भी व्यापक बदलाव देखने को मिलेंगे। आज विदेशी व्यापार के मामले में अमेरिकी का भारत के साथ सबसे अधिक व्यापार होता है। दूसरे स्थान पर चीन है। विशेष रूप से कोविड महामारी के बाद से भारत द्वारा किए जाने वाले तेल के आयात में, रूस से तेल के आयात में बहुत अधिक वृद्धि दर्ज हुई है इससे रूस के साथ भी भारत का विदेशी व्यापार तेजी से आगे बढ़ा है। इसके पूर्व तक भारत का विदेशी व्यापार यूरोपीयन देशों एवं अमेरिका के साथ ही अधिक मात्रा में होता आया है, परंतु हाल ही समय में इसमें कुछ परिवर्तन होता हुआ दिखाई दे रहा है क्योंकि एक तो यूरोपीयन देशों की आर्थिक वृद्धि दर कम हो रही है और दूसरे भारत को अपने विदेशी व्यापार में वृद्धि करने हेतु अब नए बाजार की तलाश करना आवश्यक हो गया है। दक्षिणी अफ्रीकी देश, मध्य एशिया के अरब देश, भारतीय उपमहाद्वीप में स्थित देश एवं चीन आदि देशों के रूप में भारत के उत्पादों के लिए एक बड़ा बाजार खड़ा हो सकता है। इस प्रकार, चीन के साथ हुए हाल ही के समझौते से केवल दोनों देशों के बॉर्डर पर ही शांति स्थापित नहीं होगी बल्कि चीन सहित अन्य पड़ौसी देशों के साथ भी भारत के सम्बंध सुधर सकते हैं। अतः भारत, रूस एवं चीन की दोस्ती यदि इसी प्रकार मजबूत होना आगे भी जारी रहती है तो पश्चिमी देशों का दबदबा अब विश्व में कम हो सकता है।

भारत की नीतियों के चलते भारत के विचारों को विश्व के समस्त देश अब गम्भीरता से लेने लगे हैं। भारत वैसे भी विश्व मित्र की भूमिका का निर्वहन करना चाहता है। भारत के आज विश्व के समस्त प्रभावशाली देशों के साथ प्रगाढ़ सम्बंध है। हां, कुछ देशों जैसे चीन के साथ कुछ मुद्दे हैं, जिन्हें सुलझाना शेष हैं परंतु भारत की संघर्ष जैसी स्थिति किसी भी देश के साथ नहीं है। कुछ देशों के साथ हमारी प्रतिस्पर्धा जरूर है परंतु शत्रुता नहीं है। अभी हाल ही में जून 2024 माह में भारत के प्रधानमंत्री ने इटली में जी-7 देशों के सम्मेलन में भाग लिया था, जुलाई 2024 माह में प्रधानमंत्री रूस में थे एवं रूस के राष्ट्रपति ब्लादिमिर पुतिन के साथ यूक्रेन युद्ध को हल करने एवं अन्य विषयों पर महत्वपूर्ण चर्चा में व्यस्त रहे। अगस्त 2024 में प्रधानमंत्री यूक्रेन में पहुंचे एवं यूक्रेन के रूस के साथ युद्ध को हल करने सम्बंधी प्रयासों को गति देने का प्रयास किया। सितम्बर 2024 में प्रधानमंत्री अमेरिका पहुंचें एवं अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन के साथ मुलाकात की एवं क्वाड सम्मेलन में जापान, आस्ट्रेलिया, एवं अमेरिका सहित भाग लिया। भारत के प्रधानमंत्री अक्टोबर 2024 में पुनः रूस में ब्रिक्स देशों के सम्मेलन में भाग लेने पहुंचे। अक्टोबर माह में ही जर्मन के चांन्सलर भारत में पधारे। देखिए, विश्व के मई महत्वपूर्ण मंचों पर आज भारत अपनी उपस्थिति मजबूत तरीके से दर्ज कराता हुआ दिखाई दे रहा है। जी-7, क्वाड एवं ब्रिक्स सभी सम्मेलनों में भारत की महत्वपूर्ण भूमिका स्पष्टतः दिखाई दे रही है। आज विश्व के समस्त प्रभावशाली देश भारत के साथ अपने सम्बन्धों को प्रगाढ़ करना चाहते हैं क्योंकि भारत का आर्थिक विकास तेज गति से आगे बढ़ रहा है, तेज गति से हो रही इस आर्थिक प्रगति के कारण भारत में विभिन्न उत्पादों की मांग भी तेजी से बढ़ रही है और भारत पूरे विश्व में एक बहुत बड़े बाजार के रूप में विकसित हो रहा है तथा ये देश भारत में अपने विभिन्न उत्पादों के निर्यात को बढ़ाना चाहते हैं। दूसरे, भारत में कुशल एवं युवा नागरिकों की पर्याप्त उपलब्धता है जिसका उपयोग विश्व के अन्य देश भी करना चाहते हैं। तीसरे, भारत आज विश्व के शक्तिशाली देशों की सूची में तीसरे स्थान पर पहुंच गया है एवं सुरक्षा की दृष्टि से भी बहुत शक्तिशाली देश बन गया है, भारत ने बहुत अच्छे स्तर पर अपनी मिलिटरी क्षमता को विकसित किया है। चीन की विस्तारवादी नीतियों के चलते अपने लगभग समस्त पड़ौसी देशों के साथ सम्बंध अच्छे नहीं है, साथ ही कोविड महामारी के दौरान चीन का व्यवहार विश्व के अन्य देशों के साथ ठीक नहीं रहा है, सप्लाई चैन पर आधारित कम्पनियों में समस्या खड़ी हुई थी जिससे लगभग पूरे विश्व में आवश्यक वस्तुओं की उपलब्धता पर विपरीत प्रभाव पड़ा था। अतः विशेष रूप से विकसित देशों ने चीन+1 की नीति का अनुसरण करना प्रारम्भ किया है जिसका सबसे अधिक लाभ भारत को होने जा रहा है और ये देश भारत में अपने निवेश को बढ़ा रहे हैं एवं भारत में अपनी विनिर्माण इकाईयों की स्थापना कर रहे हैं। उक्त कारणों के अतिरिक्त, भारत में स्थिर लोकतंत्र, स्थिर आर्थिक व्यवस्था, स्थिर सरकार एवं भारत के एक शांतिप्रिय देश होने के चलते भी अन्य देशों से निवेशक आज भारत की आकर्षित हो रहे हैं। इस प्रकार आज विश्व के लगभग समस्त शंक्तिशाली देश भारत के साथ मजबूत सम्बंध स्थापित करने के लिए प्रेरित हो रहे हैं।

भारत ने भी पिछले वर्ष, अपनी अध्यक्षता में, जी-20 समूह में कुछ अफ्रीकी देशों को शामिल कर अफ्रीकी महाद्वीप के समस्त देशों को प्रभावित करने में सफलता प्राप्त की थी। इन देशों पर इसका बहुत अच्छा असर भी हुआ था। भारत आज विश्व के कई समूहों में अन्य देशों की बीच सेतु के रूप में उभर रहा है। जी-7 से लेकर ब्रिक्स देशों के समूहों में भारत उपस्थित है, रूस एवं यूक्रेन दोनों देशों के बीच युद्ध समाप्त करने में भारत प्रभावशाली भूमिका निभा सकने की स्थिति में हैं। इसी प्रकार, इजराईल एवं ईरान के बीच भी मध्यस्थता की भूमिका निभाने को भारत तैयार है। भारत को विश्व के लगभग समस्त देशों के साथ अपने मजबूत होते रिश्तों को भारत के विदेश व्यापार में वृद्धि करने के रूप में इस्तेमाल करना चाहिए।

अपने गौरवशाली स्मृतियों के इतिहास को संजोये पुनः स्वर्णिम स्वरूप की ओर अग्रसर

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अठहत्तर वर्ष पूर्व वर्तमान मध्यप्रदेश की यात्रा एक अविकसित और बीमारू प्रदेश से आरंभ हुई थी । अब वही बीमारू प्रदेश अपनी समस्याओं उभरकर प्रगति का इतिहास रच रहा है । यह प्रदेश और प्रदेश वासियों की संकल्प शक्ति ही है कि अनेक उतार-चढ़ाव के बाद भी मध्यप्रदेश की गणना अब भारत के विकसित राज्यों में होने लगी है ।

मध्यप्रदेश की धरती संसार के प्राचीनतम भूभागों में से एक है । ऐसा कोई युग नहीं जिसमें इस भूभाग का उल्लेख न हो । अद्भुत प्राकृतिक सौंदर्य और संपदा ने हर युग के मानव को इस ओर आकर्षित किया है । मध्यप्रदेश के लगभग हर क्षेत्र में आदि मानव की सक्रियता के प्रमाण मिलते हैं। इसमें प्रवाहित नर्मदा, चंबल, बेतवा जैसी सदानीरा नदियाँ तब भी थीं जब हिमालय पर्वत और गंगा नदी धरती पर नहीं थे । अरावली, विन्ध्याचल और सतपुड़ा के मध्य की इस धरती का अस्तित्व सृष्टि के आरंभिक काल में ही उभर आया था । संसार के प्राचीनतम जीव डायनासोर के जीवाश्म भी मध्यप्रदेश के मंडला जिले में मिले हैं। मंडला से लेकर ग्वालियर तक और रीवा से लेकर मंदसौर तक वैदिककालीन ऋषियों की तपोस्थली होने के चिन्ह मिलते हैं।

नारायण के छठे अवतार भगवान परशुराम जी का अवतार मध्यप्रदेश के जानापाव में हुआ था । जानापाव इंदौर जिले की महू तहसील के अंतर्गत है। लंका पति रावण की राजमहीषि मंदोदरी मध्यप्रदेश के मंदसौर जिले की थीं । रामजी भी अपने वनवासकाल में मध्यप्रदेश आये थे तो योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण का विद्या अध्ययन उज्जैन स्थित संदीपनी आश्रम आये थे । सुप्रसिद्ध पुरातत्ववेत् वाकणकर जी ने मध्यप्रदेश में आदिम युग सहित रामायण काल और महाभारत काल के प्रमाण खोजे हैं । ये उज्जैन के वाकणकर शोध संस्थान में सुरक्षित हैं। संसार की पहली वैज्ञानिक गणना “विक्रम संवत” का आरंभ भी मध्यप्रदेश के उज्जैन से हुआ था । विक्रम संवत पंचाग केवल तिथि और दिन बताने का कैलेण्डर भर नहीं है । इसमें अंतरिक्ष में स्थित ग्रहों की गणना भी समाई है जिससे कब सूर्यग्रहण होगा, कब चन्द्र ग्रहण होगा यह गणना भी हो सकती है । पौराणिक काल के बाद नंदवंश, मौर्यकाल, शुंग काल गुप्त काल के भी प्रतीक चिन्ह मध्यप्रदेश की धरती पर मिलते हैं ।

प्रकृति ने भी इस भूभाग अपने संपूर्ण वैभव से परिपूर्ण किया है । पन्ना में हीरे की खदाने, सतपुड़ा के घने जंगल और सागौन वृक्षों, बैतूल की कोल खदानों, बासोदा का साधारण पत्थर, चूने में चूना पत्थर, नर्मदा पट्टी की तुअर दाल, विदिशा सीहोर जिले के शरवती गेहूँ की प्रसिद्धि विश्व भर में है ।
लेकिन समय की गति से मध्यप्रदेश का यह वैभव धूल धूसरित हो गया । मध्यप्रदेश पर दोनों से आक्रमण हुये ।गुजरात के सुल्तानों के भी और दिल्ली सल्तनत से भी । मेहमूद गजवनी से औरंगजेब तक प्रत्येक हमला झेला है इस धरती ने । सल्तनतकाल का पतन हुआ तो अंग्रेजीकाल प्रभावी हुआ । अंग्रेजीकाल में भी शोषण की कोई सीमा न थी । सल्तनतकाल की लेट और अंग्रेजीकाल के शोषण से यह उन्नत प्रदेश एक बीमारू राज्य में बदल गया ।

मध्यप्रदेश में स्वतंत्रता संग्राम

मध्यप्रदेश ने अपने स्वत्व और स्वाभिमान की रक्षा का संघर्ष प्रत्येक युग में किया है । अलाउद्दीन खिलजी का ग्वालियर और बुन्देलखण्ड पर हमला, लोदी सल्तनतकाल का ग्वालियर पर हमला, बाबर, अकबर और औरंगजेब का चंदेरी पर हमला, गुजरात के शेरशाह और बहादुरशाह का रायसेन पर हमला इतिहास प्रसिद्ध है । गौंडवाना की रानी दुर्गावती और बुन्देलखण्ड के राजा छत्रसाल की वीरता और इंदौर की रानी अहिल्याबाई द्वारा मानविन्दुओं का जीर्णोद्धार करके चलाया गया देश भर चलाया साँस्कृतिक पुनर्जागरण अभियान भी इतिहास प्रसिद्ध है ।

अंग्रेजों से मुक्ति के संघर्ष में भी मध्यप्रदेश ने बढ़ चढ़ कर योगदान दिया । मध्यप्रदेश के वनवासी क्षेत्रों यह संघर्ष 1822 के आसपास आरंभ हो गया था । नागपुर के शासक भोंसले को मध्यप्रदेश के वनवासियों ने ही संरक्षण दिया था । छिंदवाड़ा, बालाघाट से लेकर पचमढ़ी तक हुये इस संघर्ष का विवरण इतिहास के पन्नों में है । 1924 में नरसिंहगढ़ के कुँअर चैन सिंह का सशस्त्र संघर्ष और सीहोर में उनका बलिदान हुआ । मालवा के वनवासी क्षेत्र में भी 1840 से संघर्ष का विवरण मिलता है । मध्यप्रदेश का ऐसा कोई क्षेत्र नहीं जहाँ 1857 की क्राँति की ज्वाला विकराल न बनी हो । महू इन्दौर, सीहोर बैरसिया, राहतगढ़, सागर, जबलपुर, ग्वालियर, नीमच आदि सभी स्थानों पर बलिदान हुये । नाना साहब पेशवा और तात्या टोपे की सर्वाधिक सक्रियता इसी क्षेत्र में रही । मध्यप्रदेश में 1857 की क्रांति का दमन करने केलिये अंग्रेजों ने कितनी शक्ति लगाई थी इसकी झलक अंग्रेज अधिकारियों के पत्र व्यवहार से मिलती है । यह पत्राचार भोपाल स्थित स्वराज संस्थान संचालनालय की “मध्यभारत में विद्रोह” नामक पुस्तक में दिया है । 1884 में वनवासी संघर्ष कर्ता टंट्या भील का बलिदान हुआ ।

इसके बाद आरंभ हुये क्राँतिकारी और अहिसंक दोनों प्रकार के आँदोलन में मध्यप्रदेश की सक्रिय भूमिका रही है । क्राँतिकारी आँदोलन केलिये गठित अनुशीलन समिति का केन्द्र ग्वालियर रहा । क्राँतिकारी दास गुप्ता बाबू ने ग्वालियर आकर क्रांतिकारी दल गठित किया । जो बाद में मध्यप्रदेश के अन्य भागों में भी फैला । जनकगंज के एक मकान में बम और हथियार बनाने का गुप्त कार्य होता था । क्रांतिकारी रामप्रसाद बिस्मिल की बहन शास्त्री देवी कपड़ों में हथियार छिपाकर ग्वालियर से ही शाहजहांपुर ले गईं थीं। काॅकोरी काँड में प्रयुक्त हथियार ग्वालियर में बने थे । सुप्रसिद्ध क्रांतिकारी चंद्रशेखर, भगत सिंह, रामप्रसाद बिस्मिल, भगवानदास माहौर, भाई परमानंद, गेंदालाल दीक्षित आदि की गतिविधियों का केन्द्र भी मध्यप्रदेश का मध्यभारत क्षेत्र रहा है ।
स्वाधीनता केलिये अहिसंक आँदोलन केलिये मध्यप्रदेश का जबलपुर एक बड़ा केन्द्र बना। 1921 के असहयोग आँदोलन के साथ ही पूरे मध्यप्रदेश में प्रभात फेरियों, स्वदेशी खादी और चरखा अभियान चला वह फिर कभी थमा नहीं। जिस त्रिपुरी अधिवेशन में नेताजी सुभाषचन्द्र बोस काँग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष चुने गये थे । वह त्रपुरी मध्यप्रदेश में जबलपुर के समीप ही है । 1942 के भारत छोड़ो आँदोलन में सिवनी, छिदवाड़ा, जबलपुर सहित अनेक स्थानों पर गोलियाँ चलीं थीं। 1942 के अंग्रेजों भारत छोड़ों आँदोलन इस आँदोलन में बंदी बनाये जाने वालों में सबसे कम आयु के श्री अटल बिहारी बाजपेई थे ।

मध्यप्रदेश का वर्तमान स्वरूप

अंग्रेजीकाल में भारत के अन्य भागों की तरह मध्यप्रदेश की शासन व्यवस्था दो प्रकार की थी । एक वे जो अंग्रेजों के सीधे आधीन थे और दूसरे वे जहाँ रियासतें थीं। मध्यप्रदेश का महाकौशल क्षेत्र अंग्रेजों के सीधे आधीन था । यह विदर्भ के अंतर्गत आता था । इसके अतिरिक्त ग्वालियर, इंदौर, भोपाल, रीवा सहित छोटी बड़ी कुल तेरह रियासतें थीं। स्वतंत्रता के साथ सबका विलय हुआ । इनमें बारह रियासतों ने तो स्वयं को भारतीय गणराज्य में विलीन कर लिया था । लेकिन भोपाल रियासत के प्रमुख नबाब हमीदुल्ला खान ने अपनी रियासत को पाकिस्तान में मिलने का प्रयास किया था । इसके लिये पृथक से विलीनीकरण आँदोलन आरंभ हुआ जिसमें सीहोर ,बरेली और उदयपुरा में गोलियाँ चलीं आँदोलन कारी बलिदान हुये । अंत में 1 जून 1949 को भोपाल भी भारतीय गणतंत्र का अंग बन गया । तब कुल चार राज्य बने । मध्यभारत, विन्ध्य प्रदेश, भोपाल राज्य, मध्यप्रदेश का महाकौशल क्षेत्र को विदर्भ से जोड़ा गया । इसे सीपी एण्ड बरार नाम मिला।

1 नवंबर 1956 में राज्यों का पुनर्गठन हुआ और मध्यप्रदेश का जन्म हूआ । इसमें मध्यभारत, विन्ध्य, भोपाल राज्य, सीपी एण्ड बरार से महाकौशल क्षेत्र तथा राजस्थान से सिरीज जिला लेकर मध्यप्रदेश अस्तित्व में आया । आगे चलकर 1 नवंबर 2000 विभाजन हुआ और इसके एक भाग को अलग करके छत्तीसगढ प्राँत बना । वर्तमान मध्यप्रदेश का क्षेत्रफल लगभग 3,08,245 वर्ग किलोमीटर है। इसकी राजधानी भोपाल है। और प्रदेश का उच्च न्यायालय जबलपुर है । मध्य प्रदेश की सीमा पाँच राज्यों की सीमाओं से मिलती है। इनमें उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, गुजरात, तथा उड़ीसा हैं।

विकसित मध्यप्रदेश की यात्रा

वर्तमान मध्यप्रदेश 1 नवंबर 1956 को अस्तित्व में आया । मध्यप्रदेश निर्माण के इन अठहत्तर वर्षों की यात्रा अविकसित और बीमारू प्रदेश से उभरकर स्वर्णिम स्वरूप की ओर बढ़ने की यात्रा है । यह प्रदेश और प्रदेश वासियों की संकल्प शक्ति ही है कि अनेक उतार-चढ़ाव के बाद भी मध्यप्रदेश की गणना भारत के अग्रणी राज्यों में होने लगी । जब मध्यप्रदेश ने आकार लिया था तब अनेक आधारभूत चुनौतियाँ थीं। अशिक्षा, कुपोषण और अनेक क्षेत्रों में भुखमरी जैसी स्थिति भी। विकास की नीतियाँ बनी और काम आगे बढ़ा और धीरे धीरे विकास की ओर कदम बढ़े। औद्योगिकीकरण एवं बड़े बाधों की नीव रखी गई। अब मध्यप्रदेश कृषि उत्पादन में न केवल आत्मनिर्भर है अपितु निर्यातक भी बना । प्रदेश की इस प्रगति यात्रा को वर्तमान मुख्यमंत्री डा मोहन यादव के नेतृत्व में क्राँतिकारी आयाम मिले । उनके नेतृत्व अनेक ऐसे निर्णय हुये जिससे मध्यप्रदेश की विकास गति तीव्र हुई और मध्यप्रदेश ने अन्य प्राँतों की तुलना में अपना अग्रणी स्थान बनाया । इसमें सबसे अनूठा निर्णय औद्योगिकीकरण के लिये क्षेत्रीय इन्वेस्टर्स समिट का आयोजन करना । वे पहले मुख्यमंत्री हैं जिन्होंने उज्जैन, ग्वालियर, जबलपुर जैसे क्षेत्रीय स्थानों पर इन्वेस्टर्स समिट की इससे स्थानीय उत्पाद के आधार पर औद्योगिकीकरण की नींव पड़ी । दूसरा नदी जोड़ो अभियान के अंतर्गत केन बेतवा-केन लिंक योजना पर काम तेज हुआ । प्रधानमंत्री श्रीनरेंद्र मोदी ने अपने पहले कार्यकाल में देशभर के सभी प्राँतों से इस दिशा में काम करने की अपेक्षा की थी । योजनाएँ भी बनी लेकिन काम में गति न आ सकी थी । मध्यप्रदेश पहला राज्य है जहाँ यह काम निर्णायक दिशा में आगे बढ़ा। और केन्द्र सरकार से प्रशंसा भी मिली ।

मुख्यमंत्री डा मोहन यादव ने अपने क्राँतिकारी निर्णयों की शुरुआत पद संभालने के पहले दिन से ही कर दी थी । उन्होंने अपने मंत्रीमंडल की पहली बैठक में ही दो बड़े निर्णय लिये । पहला सायवर तहसील की व्यवस्था पूरे प्रदेश में लागू की । इसके अंतर्गत संपत्ति की रजिस्ट्री होते ही अपने आप नामांतरण की सुविधा उपलब्ध कराना है । दूसरा ध्वनि प्रदूषण को नियंत्रित करने केलिये लाउड स्पीकर सीमित करने के आदेश दिये । इसमें धार्मिक स्थल भी शामिल किये गये । इसके साथ ही सरकार ने खुले में मांस की बिक्री पर भी रोक लगाने के भी आदेश दिये । इसके अतिरिक्त वर्तमान सरकार ने जो बड़े क्राँतिकारी निर्णय लिये उनमें इंदौर की हुकुमचंद मिल के 4 हजार 800 मजदूरों को उनके अधिकार दिलाना, प्रदेश के छोटे-छोटे शहरों को एयर कनेक्टिविटी से जोड़ने के लिए पीएम श्री वायुसेवा शुरू करना, गंभीर बीमारी के मरीजों को एयर एंबुलेंस सेवा आरंभ करना ताकि उन्हें देश के किसी अन्य अस्पताल में भेजा जा सके । आयुष्मान कार्ड धारकों के लिए यह सेवा नि:शुल्क रहेगी । युवाओं को रोजगार उपलब्ध कराने के लिये 46000 से अधिक नए पद सृजित करना आदि निर्णय हैं।

यह डा मोहन यादव की वर्तमान सरकार का कुशल प्रशासन ही है कि मध्यप्रदेश का जीएसटी संग्रहण भी बढा है । मध्यप्रदेश के इतिहास में पहली बार 26 प्रतिशत जीएसटी संग्रहण की वृद्धि दर्ज की गई है। साथ ही मध्य प्रदेश पर दो फीसदी कर्ज का भार भी कम हुआ है । निसंदेह इस सरकार की नीतियाँ, निर्णय और प्रशासन शैली मध्यप्रदेश को न केवल आत्मनिर्भर अपितु स्वर्णिम प्रदेश बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण हैं।

मीडिया को अंधविश्वास और पाखंड को नहीं, वैज्ञानिक सोच को बढ़ावा देना चाहिए

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दिवाली के अवसर पर अधिकांश त्योहारी बधाई और शुभकामना संदेश अज्ञान के अंधकार को ज्ञान के प्रकाश से दूर करने की बात करते हैं। लेकिन हकीकत में, वर्तमान युग में आस्था और भक्ति के नाम पर रूढ़िवादिता, पाखंडी अंधविश्वास और संकीर्णता को बढ़ावा दिया जा रहा है। यह देखने की होड़ लगी हुई है कि कौन सबसे ज्यादा नफरत, द्वेष और दूरियां बढ़ा सकता है।

आज की दुनिया में मीडिया का महत्वपूर्ण स्थान है। यह न केवल सूचना प्रसारित करता है, बल्कि समाज के विचारों और विश्वासों को भी आकार देता है। यही कारण है कि यदि मीडिया वैज्ञानिक दृष्टिकोण को बढ़ावा नहीं देता है, तो यह अप्रत्यक्ष रूप से समाज में भ्रम, अंधविश्वास और अंध विश्वास को बढ़ावा देता है।

जब हम कोई भी स्थानीय समाचार पत्र उठाते हैं, तो हम आमतौर पर धार्मिक गतिविधियों, त्योहारों और आस्थाओं का प्रचार अधिक देखते हैं। तथ्य यह है कि सौ में से केवल कुछ ही समाचार विज्ञान या तकनीकी विषयों पर होते हैं। ऐसे में क्या विज्ञान को नज़रअंदाज़ करके जीवन को सिर्फ़ आस्था और धर्म के चश्मे से देखना सही है? देश को विकास के लिए विज्ञान, तकनीक और आधुनिक चिकित्सा ज्ञान की ज़रूरत है।

विज्ञान की कमी से न सिर्फ़ ज्ञान की कमी होती है बल्कि लोगों में अंधविश्वास और झूठी ख़बरों को भी बढ़ावा मिलता है। हमारे समाज को ऐसे लेखकों की ज़रूरत है जो अंधविश्वास और पाखंड के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाएँ। मुख्यधारा के मीडिया कर्मियों को अपनी ज़िम्मेदारी समझनी चाहिए कि वे कृषि, विज्ञान और जनकल्याण जैसे विषयों को प्राथमिकता दें और “आदमी ने कुत्ते को काटा” जैसी कहानियों को नज़रअंदाज़ करें।

21वीं सदी के पत्रकारों को गणित, विज्ञान और तकनीकी विषयों पर गंभीर चिंतन और चर्चा को बढ़ावा देना चाहिए। यह न सिर्फ़ छात्रों और शोधकर्ताओं के लिए बल्कि आम जनता के लिए भी ज़रूरी है। जब लोग वैज्ञानिक और तकनीकी विकास के महत्व को समझेंगे, तभी वे अपने जीवन में सकारात्मक बदलाव ला सकते हैं।

अख़बारों की स्थिति को समझने के लिए आप किसी भी दिन का अख़बार उठाकर देख सकते हैं। धार्मिक गतिविधियों की कवरेज तो काफ़ी होती है, लेकिन आधुनिक विचारों और विज्ञान को कितनी जगह दी जाती है? यह एक बड़ा सवाल है।

आधुनिक मीडिया के इस दौर में जब सूचना इतनी आसानी से उपलब्ध है, तो क्यों न इसका सही दिशा में उपयोग किया जाए? समाज के तौर पर हमें वैज्ञानिक दृष्टिकोण और विचारों को प्राथमिकता देनी चाहिए।

मीडियाकर्मियों और संपादकों को यह समझना चाहिए कि केवल धार्मिक समाचार प्रकाशित करने से जनता का भला नहीं होगा। आबादी के हर वर्ग को, चाहे वह छोटा किसान हो या छात्र, वैज्ञानिक सोच और सूचना की जरूरत है। अगर मीडिया इस जिम्मेदारी को पूरा करने में विफल रहता है, तो न केवल सूचना का संचार रुकता है, बल्कि समाज के विकास की गति भी प्रभावित होती है।

इसलिए मीडिया के लिए अपनी भूमिका को समझना और वैज्ञानिक दृष्टिकोण को बढ़ावा देना जरूरी है। समाज में ज्ञान का सही प्रसार होना चाहिए ताकि हम सभी एक शिक्षित और विकसित समाज का निर्माण कर सकें।

भौतिक प्रगति केवल विज्ञान और प्रौद्योगिकी के माध्यम से ही हो सकती है। विज्ञान के आविष्कारों ने ही मानवता को पाषाण युग से इंटरनेट युग में पहुंचाया है। चिकित्सा विज्ञान ने आज औसत जीवनकाल बढ़ाया है और हमें गंभीर बीमारियों से मुक्ति दिलाई है। कल्पना कीजिए कि अगर कोविड महामारी 16वीं सदी में आती तो क्या होता।

आध्यात्मिक ज्ञान और धार्मिक गतिविधियों का अपना स्थान और आवश्यकता है, लेकिन ज्ञान, विज्ञान और प्रौद्योगिकी की कीमत पर नहीं।

आइए इस दिवाली सच्चे ज्ञान के प्रकाश से अज्ञानता पर विजय प्राप्त करें और धार्मिक कट्टरपंथियों को उनके पवित्र समूहों या निवासों में आराम करने दें।

भारत के आर्थिक विकास में जनजाति समाज का है भरपूर योगदान

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भारत भूमि का एक बड़ा हिस्सा वनों एवं जंगलों से आच्छादित है। भारतीय नागरिकों को प्रकृति का यह एक अनोखा उपहार माना जा सकता है। इन वनों एवं जंगलों की देखभाल मुख्य रूप से जनजाति समाज द्वारा की जाती रही है। जनजाति समाज की विकास यात्रा अपनी भूख मिटाने एवं अपने को सुरक्षित रखने के उद्देश्य से केवल वनों के इर्द गिर्द चलती रहती है। वास्तविक अर्थों में इसीलिए जनजाति समाज को धरतीपुत्र भी कहा जाता है। प्राचीन काल से केवल प्रकृति ही जनजाति समाज की सम्पत्ति मानी जाती रही है, जिसके माध्यम से उनकी सामाजिक, आर्थिक एंव पारिस्थितिकीय आवश्यकताओं की पूर्ति होती रहती है। ऐसा कहा जाता है कि अनादि काल से जनजाति संस्कृति व वनों का चोली दामन का साथ रहा है और जनजाति समाज का निवास क्षेत्र वन ही रहे हैं। इस संदर्भ में यह भी कहा जा सकता है कि वनों ने ही जनजातीय जीवन एंव संस्कृति के उद्भव, विकास तथा संरक्षण में अपनी आधारभूत भूमिका अदा की है। भील वनवासियों का जीवन भी वनों पर ही आश्रित रहता आया है। जनजाति समाज अपनी आजीविका के लिए वनों में उत्पन्न होने वाली विभिन्न प्रकार की वस्तुओं का उपयोग करते रहे हैं।

भारतीय वन क्षेत्रों में पाए जाने वाले प्रमुख वनस्पतियों, पेड़ों एवं उत्पादित वस्तुओं में शामिल रहे हैं बबूल, बेर, चन्दन, धोक, धामन, धावडा़, गुदी, हल्दू, इमली, जामुन, कजरी, खेजडी़, खेडा़, कुमटा, महुआ, नीम, पीपल, सागवान, आम, मुमटा, सालर, बानोटीया, गुलर, बांस, अरीठा, आंवला, गोंद, खेर, केलडी, कडैया, आवर, सेलाई वृक्षों से करा, कत्था, लाख, मौम, धोली व काली मुसली, शहद, आदि। इनमें से कई वनस्पतियों की तो औषधीय उपयोगिता है। कुछ जड़ी बूटियों जैसे आंवला का बीज, हेतडी़, आमेदा, आक, करनीया, ब्राह्मी, बोहडा़, रोंजडा, भोग पत्तियां, धतुरा बीज, हड, भुजा, कनकी बीज, मेंण, अमरा, कोली, कादां, पडूला, गीगचा, इत्यादि का उपयोग रोगों के निवारण के लिए किया जाता रहा है। आमेदा के बीजों को पीसकर खाने से दस्त बंद हो जाते हैं। अरण्डी के तेल से मालिश एंव पत्तों को गर्म करके कमर में बांधने से दर्द कम हो जाता है। बुखार को ठीक करने के लिए कड़ा वृक्ष के बीजों को पीस कर पीते हैं। जोडों में दर्द ठीक करने के लिए ग्वार व सैजने के गोंद का उपयोग करते हैं। फोडे फुन्सियों एवं चर्म रोग को ठीक करने के लिए नीम के पत्तों को उबालकर पीते हैं। इसके अलावा तुलसी, लौंग, सोठ, पीपल, काली मिर्च का उपयोग बुखार एवं जुखाम ठीक करने के लिए किया जाता है।

शुरुआती दौर में तो जनजाति समाज उक्त वर्णित वनस्पतियों एवं उत्पादों का उपयोग केवल स्वयं की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए ही करते रहे हैं परंतु हाल ही के समय में इन वनस्पतियों का उपयोग व्यावसायिक रूप से भी किया जाने लगा है। व्यावसायिक रूप से किए जाने वाले उपयोग का लाभ जनजाति समाज को न मिलकर इसका पूरा लाभ समाज के अन्य वर्गों के लोग ले रहे हैं। उक्त वनस्पतियों एवं उत्पादों का व्यावसायिक उपयोग करने के बाद से ही प्रकृति का दोहन करने के स्थान पर शोषण किया जाने लगा है क्योंकि कई उद्योगों द्वारा उक्त उत्पादों का कच्चे माल के रूप में उपयोग किया जाने लगा है। इससे ध्यान में आता है कि जनजाति समाज द्वारा देश की अर्थव्यवस्था में विकास को गति देने के उद्देश्य से अपनी भूमिका का निर्वहन तो बहुत सफल तरीके से किया जाता रहा है परंतु अर्थव्यवस्था के विकास का लाभ जनजातियों तक सही मात्रा में पहुंच नहीं सका है।

हालांकि भारत में प्राचीन काल से ही जनजाति समाज जंगलों में अपना जीवन यापन करता रहा है और वनोपज (जैसे मध्यप्रदेश में तेन्दु पत्ता को एकत्रित करना) को एकत्रित करता रहा है परंतु अब धीरे धीरे अपने आप को यह समाज कृषि कार्य एवं पशुपालन जैसे अन्य कार्यों में भी संलग्न करने लगा है। जनजाति समाज ने बिना किसी भय के सघन वनों में जंगली जानवरों व प्राकृतिक आपदाओं से लड़ते हुए अपने जीवन को संघर्षमय बनाया है। जनजाति समाज ने कृषि कार्य के लिए सर्वप्रथम जंगलों को काटकर जलाया। भूमि साफ कर इसे कृषि योग्य बनाया और पशुपालन को प्रोत्साहन दिया। विकास की धारा में आगे बढ़ते हुए धीरे-धीरे विभिन्न गावों एवं कस्बों का निर्माण किया।

आज भी जनजाति समाज की अधिकांश जनसंख्या दुर्गम क्षेत्रों में निवास करती है। इन इलाकों में संचार माध्यमों का अभाव है। हालांकि धीरे धीरे अब सभी प्रकार की सुविधाएं इन सुदूर इलाकों में भी पहुंचाई जा रही हैं। परंतु, अभी भी जनजातीय समाज कृषि सम्बन्धी उन्नत विधियों से अनभिज्ञ है। सिंचाई साधनों का अभाव एवं उपजाऊ भूमि की कमी के कारण ये लोग परम्परागत कृषि व्यवस्था को अपनाते रहे हैं और इनकी उत्पादकता बहुत कम है।

जनजाति समाज ने वनों के सहारे अपनी संस्कृति को विकसित किया। घने जंगलों में विचरण करते हुए उन्होंने जंगली जानवरों शेर, भालु, सुअर, गेंडे, सर्प, बिच्छु आदि से बचने के लिए आखेट का सहारा लिया। वनों एवं पहाडियों के आन्तरिक भागों में रहते हुए भील समाज शिकार करके अपनी आजीविका चलाता रहा है। भील समाज जंगलों में झूम पद्धति से खेती, पशुपालन, एवं आखेट कर अपने परिवार का पालन पोषण करते रहे हैं।

घने जंगलों में जनजाति समाज को प्रकृति द्वारा, स्वछंद वातावरण, स्वच्छ जल, नदियां, नाले, झरने, पशु पक्षियों का कोलाहल, सीमित तापमान, हरियाली, आर्द्रता, समय पर वर्षा, मिटटी कटाव से रोक, आंधी एंव तूफानों से रक्षा, प्राकृतिक खाद, बाढ़ पर नियंत्रण, वन्य प्राणियों का शिकार व मनोरंजन इत्यादि प्राकृतिक रूप से उपलब्ध कराया जाता रहा है। इसी के चलते जनजाति समाज घने जंगलों में भी बहुत संतोष एवं प्रसन्नता के साथ रहता है।

जनजाति समाज आज भी भारतीय संस्कृति का वाहक माना जाता है क्योंकि यह समाज सनातन हिंदू संस्कृति का पूरे अनुशासन के साथ पालन करता पाया जाता है। जनजाति समाज आज भी आधुनिक चमक दमक से अपने आप को बचाए हुए है। इसके विपरीत शहरों में रहने वाला समाज समय समय पर भारतीय परम्पराओं में अपनी सुविधानुसार परिवर्तन करता रहता है।

हाल ही के समय में अत्यधिक आर्थिक महत्वकांक्षा के चलते वनों का अदूरदर्शितापूर्ण ढंग से शोषण किया जा रहा है। विश्व पर्यावरण एवं विकास आयोग के अनुसार विश्व में प्रतिवर्ष 110 लाख हैक्टर भूमि के वन नष्ट किये जा रहे है। पर्यावरण विशेषज्ञों के अनुसार प्रत्येक देश में उपलब्ध भूमि के लगभग 33 प्रतिशत भाग पर वन होना आवश्यक है। यदि वनों का इस प्रकार कटाव होता रहेगा तो जनजाति समाज पर विपरीत प्रभाव पड़ना स्वाभाविक ही है।

भारत द्वारा इस संदर्भ में कई प्रयास किए जा रहे हैं। देश में वनों के कटाव को रोकने के लिए वर्ष 2015 एवं 2017 के बीच देश में पेड़ एवं जंगल के दायरे में 8 लाख हेक्टेयर भूमि की वृद्धि दर्ज की है। साथ ही, भारत ने वर्ष 2030 तक 2.10 करोड़ हेक्टेयर जमीन को उपजाऊ बनाने के लक्ष्य को बढ़ाकर 2.60 करोड़ हेक्टेयर कर दिया है ताकि वनों के कटाव को रोका जा सके।

भारत में सम्पन्न हुई वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार भारत में अनुसूचित जनजातियों की कुल जनसंख्या 10.43 करोड़ है, जो भारत की कुल जनसंख्या का 8.6 प्रतिशत है। जनजाति समाज को देश के आर्थिक विकास में शामिल करने के उद्देश्य से केंद्र एवं राज्य सरकारों द्वारा कई योजनाएं चलाई जा रही हैं ताकि इस समाज की कठिन जीवनशैली को कुछ हद्द तक आसान बनाया जा सके।

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